06.Mahabharata Volume 6 — पृष्ठ 381–390

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 381–390

पृष्ठ 381

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एकोनत्रिंशोऽध्यायः मतङ्गकी तपस्या और इन्द्रका उसे वरदान देना भीष्म उवाच

एवमुक्तो मतङ्गस्तु संशितात्मा यतव्रतः ।

सहस्रमेकपादेन ततो ध्याने व्यतिष्ठत ॥। १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इन्द्रके ऐसा कहनेपर मतंग अपने मनको और भी दृढ़ और संयमशील बनाकर एक हजार वर्षोंतक एक पैरसे ध्यान लगाये खड़ा रहा ॥ १ ॥

तं सहस्रावरे काले शक्रो द्रष्टुमुपागमत् ।

तदेव च पुनर्वाक्यमुवाच बलवृत्रहा ॥ २ ॥

जब एक हजार वर्ष पूरे होनेमें कुछ ही बाकी था, उस समय बल और वृत्रासुरके शत्रु देवराज इन्द्र फिर मतंगको देखनेके लिये आये और पुनः उससे उन्होंने पहलेकी कही हुई बात ही दुहरायी ॥ २ ॥

मतङ्ग उवाच

इदं वर्षसहस्रं वै ब्रह्मचारी समाहितः ।

अतिष्ठमेकपादेन ब्राह्मण्यं नाप्नुयां कथम् ॥ ३ ॥

मतंगने कहा— देवराज! मैंने ब्रह्मचर्य पालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो एक हजार वर्षोंतक एक पैरसे खड़ा होकर तप किया है। फिर मुझे ब्राह्मणत्व कैसे नहीं प्राप्त हो सकता? ॥ ३ ॥

शक्र उवाच

चण्डालयोनौ जातेन नावाप्यं वै कथंचन ।

अन्यं कामं वृणीष्व त्वं मा वृथा तेऽस्त्वयं श्रमः ॥ ४ ॥

इन्द्रने कहा – मतंग! चाण्डालकी योनिमें जन्म लेनेवालेको किसी तरह ब्राह्मणत्व नहीं मिल सकता; इसलिये तुम दूसरी कोई अभीष्ट वस्तु माँग लो । जिससे तुम्हारा यह परिश्रम व्यर्थ न जाय ॥ ४ ॥

एवमुक्तो मतङ्गस्तु भृशं शोकपरायणः ।

अध्यतिष्ठद् गयां गत्वा सोंगुष्ठेन शतं समाः ॥ ५ ॥

उनके ऐसा कहनेपर मतंग अत्यन्त शोकमग्न हो गयामें जाकर अंगूठेके बलपर सौ वर्षोंतक खड़ा रहा ॥ ५ ॥

सुदुर्वहं बहन् योगं कृशो धमनिसंततः ।

त्वगस्थिभूतो धर्मात्मा स पपातेति नः श्रुतम् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 382

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उसने दुर्धर योगका अनुष्ठान किया । उसका सारा शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया । नस-नाड़ियाँ उबड़ आयीं । धर्मात्मा मतंगका शरीर चमड़ेसे ढकी हुई हड्डियोंका ढाँचामात्र रह गया। उस अवस्थामें अपनेको न सँभाल सकनेके कारण वह गिर पड़ा — यह बात हमारे सुननेमें आयी है ॥ ६ ॥

तं पतन्तमभिद्रुत्य परिजग्राह वासवः ।

वराणामीश्वरो दाता सर्वभूतहिते रतः ॥ ७ ॥

उसे गिरते देख सम्पूर्ण भूतोंके हितमें तत्पर रहनेवाले वर देनेमें समर्थ इन्द्रने दौड़कर पकड़ लिया ॥ शक्र उवाच

मतङ्ग ब्राह्मणत्वं ते विरुद्धमिह दृश्यते ।

ब्राह्मण्यं दुर्लभतरं संवृतं परिपन्थिभिः ॥ ८ ॥

इन्द्रने कहा — मतंग! इस जन्ममें तुम्हारे लिये ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति असम्भव दिखायी देती है । ब्राह्मणत्व अत्यन्त दुर्लभ है; साथ ही वह काम-क्रोध आदि लुटेरोंसे घिरा हुआ है ॥ ८ ॥

पूजयन् सुखमाप्नोति दुःखमाप्नोत्यपूजयन् ।

ब्राह्मणः सर्वभूतानां योगक्षेमसमर्पिता ॥९ ॥

जो ब्राह्मणका आदर करता है वह सुख पाता है, और जो अनादर करता है वह दुःख पाता है । ब्राह्मण समस्त प्राणियोंको योगक्षेमकी प्राप्ति करानेवाला है ॥ ९ ॥

ब्राह्मणेभ्योऽनुतृप्यन्ते पितरो देवतास्तथा ।

ब्राह्मणः सर्वभूतानां मतंग पर उच्यते ॥ १० ॥

मतंग! ब्राह्मणोंके तृप्त होनेसे ही देवता और पितर भी तृप्त होते हैं । ब्राह्मणको समस्त प्राणियोंमें सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है ॥ १० । ।

ब्राह्मणः कुरुते तद्धि यथा यद् यच्च वाञ्छति ।

वह्वीस्तु संविशन् योनीर्जायमानः पुनः पुनः ॥ ११ ॥

पर्याये तात कस्मिंश्चिद् ब्राह्मण्यमिह विन्दति । ब्राह्मण जो-जो जिस प्रकार करना चाहता है, अपने तपके प्रभावसे वैसा ही कर सकता है । तात! जीव इस जगत्के भीतर अनेक योनियोंमें भ्रमण करता हुआ बारंबार जन्म लेता है । इसी तरह जन्म लेते - लेते कभी किसी समयमें वह ब्राह्मणत्वको प्राप्त कर लेता है ॥ ११ ॥

तदुत्सृज्येह दुष्प्रापं ब्राह्मण्यमकृतात्मभिः ॥ १२ ॥

अन्यं वरं वृणीष्व त्वं दुर्लभोऽयं हि ते वरः ।

पृष्ठ 383

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अतः जिनका मन अपने वशमें नहीं है, ऐसे लोगोंके लिये सर्वथा दुष्प्राप्य ब्राह्मणत्वको पानेका आग्रह छोड़कर तुम कोई दूसरा ही वर माँगो | यह वर तो तुम्हारे लिये दुर्लभ ही है ॥ १२ ॥

मतंग उवाच किं मां तुदसि दुःखार्तं मृतं मारयसे च माम् ॥ १३ ॥

त्वां तु शोचामि यो लब्ध्वा ब्राह्मण्यं न बुभूषसे । मतंगने कहा — देवराज! मैं तो यों ही दुःखसे आतुर हो रहा हूँ, फिर तुम भी क्यों मुझे पीड़ा दे रहे हो? मुझ मरे हुए को क्यों मारते हो? मैं तो तुम्हारे लिये शोक करता हूँ, जो जन्मसे ही ब्राह्मणत्वको पाकर भी तुम उसे अपना नहीं रहे हो ॥ १३३ ॥

ब्राह्मणं यदि दुष्प्रापं त्रिभिर्वर्णैः शतक्रतो ॥ १४ ॥

सुदुर्लभं सदावाप्य नानुतिष्ठन्ति मानवाः । शतक्रतो! यदि क्षत्रिय आदि तीन वर्णोंके लिये ब्राह्मणत्व दुर्लभ है तो उस परम दुर्लभ ब्राह्मणत्वको पाकर भी मनुष्य ब्राह्मणोचित शम-दमका अनुष्ठान नहीं करते हैं । यह कितने दुःखकी बात है! ॥ १४ ॥

यः पापेभ्यः पापतमस्तेषामधम एव सः ॥ १५ ॥

ब्राह्मण्यं यो न जानीते धनं लब्ध्वेव दुर्लभम् । वह पापियोंसे भी बढ़कर अत्यन्त पापी और उनमें भी अधम ही है, जो दुर्लभ धनकी भाँति ब्राह्मणत्वको पाकर भी उसके महत्त्वको नहीं समझता है ॥ १५३ ॥

दुष्प्रापं खलु विप्रत्वं प्राप्तं दुरनुपालनम् ॥ १६ ॥

दुरावापमवाप्यैतन्नानुतिष्ठन्ति मानवाः । पहले तो ब्राह्मणत्वका प्राप्त होना ही कठिन है । यदि वह प्राप्त हो जाय तो उसका पालन करना और भी कठिन हो जाता है; किंतु बहुत- से मनुष्य इस दुर्लभ वस्तुको पाकर भी तदनुकूल आचरण नहीं करते हैं ॥ १६ ॥

एकारामो ह्यहं शक्र निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः ॥ १७ ॥

अहिंसादममास्थाय कथं नार्हामि विप्रताम् । शक्र! मैं एकान्तमें आनन्दपूर्वक रहता हूँ तथा द्वन्द्वों और परिग्रहोंसे दूर हूँ । अहिंसा और दमका पालन किया करता हूँ। ऐसी दशामें मैं ब्राह्मणत्व पाने योग्य क्यों नहीं हूँ? ॥ १७ ॥

दैवं तु कथमेतद् वै यदहं मातृदोषतः ॥ १८ ॥

एतामवस्थां सम्प्राप्तो धर्मज्ञः सन् पुरंदर । पुरंदर! मैं धर्मज्ञ होकर भी केवल माताके दोषसे इस अवस्थामें आ पहुँचा हूँ । यह मेरा कैसा दुर्भाग्य है? ॥ १८३ ॥

पृष्ठ 384

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नूनं दैवं न शक्यं हि पौरुषेणातिवर्तितुम् ॥ १ ९ ॥ यदर्थं यत्नवानेव न लभे विप्रतां विभो । प्रभो! निश्चय ही पुरुषार्थके द्वारा दैवका उल्लंघन नहीं किया जा सकता; क्योंकि मैं जिसके लिये ऐसा प्रयत्नशील हूँ उस ब्राह्मणत्वको नहीं उपलब्ध कर पाता हूँ ॥ १ ९ ३ ॥ एवंगते तु धर्मज्ञ दातुमर्हसि मे वरम् ॥ २० ॥

यदि तेऽहमनुग्राह्यः किंचिद् वा सुकृतं मम । धर्मज्ञ देवराज! यदि ऐसी अवस्थामें मैं आपका कृपापात्र हूँ अथवा यदि मेरा कुछ भी पुण्य शेष हो तो आप मुझे वर प्रदान कीजिये ॥ २० ॥

वैशम्पायन उवाच वृणीष्वेति तदा प्राह ततस्तं बलवृत्रहा ॥ २१ ॥

चोदितस्तु महेन्द्रेण मतङ्गः प्राब्रवीदिदम् । वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तब बल और वृत्रासुरको मारनेवाले इन्द्रने मतङ्गसे कहा — ' तुम मुझसे वर माँगो। ' महेन्द्रसे प्रेरित होकर मतङ्गने इस प्रकार कहा ॥ २१३ ॥

यथा कामविहारी स्यां कामरूपी विहङ्गमः ॥ २२ ॥

ब्रह्मक्षत्राविरोधेन पूजां च प्राप्नुयामहम् ।

यथा ममाक्षया कीर्तिर्भवेच्चापि पुरंदर ॥ २३ ॥

कर्तुमर्हसि तद् देव शिरसा त्वां प्रसादये । देव पुरंदर! आप ऐसी कृपा करें जिससे मैं इच्छानुसार विचरनेवाला तथा अपनी इच्छाके अनुसार रूप धारण करनेवाला आकाशचारी देवता होऊँ। ब्राह्मण और क्षत्रियोंके विरोधसे रहित हो मैं सर्वत्र पूजा एवं सत्कार प्राप्त करूँ तथा मेरी अक्षय कीर्तिका विस्तार हो । मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखकर आपकी प्रसन्नता चाहता हूँ । आप मेरी इस प्रार्थनाको सफल बनाइये ॥ शक्र उवाच छन्दोदेव इति ख्यातः स्त्रीणां पूज्यो भविष्यसि ॥ २४ ॥

कीर्तिश्च तेऽतुला वत्स त्रिषु लोकेषु यास्यति । इन्द्रने कहा — वत्स! तुम स्त्रियोंके पूजनीय होओगे । 'छन्दोदेव ' के नामसे तुम्हारी ख्याति होगी और तीनों लोकोंमें तुम्हारी अनुपम कीर्तिका विस्तार होगा ॥ २४ ॥

एवं तस्मै वरं दत्त्वा वासवोऽन्तरधीयत ॥ २५ ॥

प्राणांस्त्यक्त्वा मतङ्गोऽपि सम्प्राप्तः स्थानमुत्तमम् । इस प्रकार उसे वर देकर इन्द्र वहीं अन्तर्धान हो गये । मतंग भी अपने प्राणोंका परित्याग करके उत्तम स्थान (ब्रह्मलोक ) को प्राप्त हुआ ॥ २५३ ॥

पृष्ठ 385

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एवमेतत् परं स्थानं ब्राह्मण्यं नाम भारत ।

तच्च दुष्प्रापमिह वै महेन्द्रवचनं यथा ॥ २६ ॥

भारत! इस तरह यह ब्राह्मणत्व परम उत्तम स्थान है । जैसा कि इन्द्रका कथन है, उसके अनुसार यह इस जीवनमें दूसरे वर्णके लोगोंके लिये दुर्लभ है ॥ २६ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि इन्द्रमतङ्गसंवादे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें इन्द्र और मतङ्गका संवादविषयक उनतीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २९ ॥

पृष्ठ 386

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त्रिंशोऽध्यायः वीतहव्यके पुत्रोंसे काशी - नरेशोंका घोर युद्ध, प्रतर्दनद्वारा उनका वध और राजा वीतहव्यको भृगुके कथनसे ब्राह्मणत्व प्राप्त होनेकी कथा युधिष्ठिर उवाच

श्रुतं मे महदाख्यानमेतत् कुरुकुलोद्वह ।

सुदुष्प्रापं यद् ब्रवीषि ब्राह्मण्यं वदतां वर ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— कुरुकुलमें उत्पन्न! वक्ताओंमें श्रेष्ठ पितामह! आपके मुखसे यह महान् उपाख्यान मैंने सुन लिया । आप कह रहे हैं कि अन्य वर्णोंके लिये इसी शरीरसे ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति बहुत ही कठिन है ॥ १ ॥

विश्वामित्रेण च पुरा ब्राह्मण्यं प्राप्तमित्युत ।

श्रूयते वदसे तच्च दुष्प्रापमिति सत्तम ॥ २ ॥

सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ पितामह! परंतु सुना जाता है कि पूर्वकालमें विश्वामित्रजीने इसी शरीरसे ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया था और आप जो उसे सर्वथा दुर्लभ बता रहे हैं ( ये दोनों बातें परस्पर विरुद्ध - सी जान पड़ती हैं ) ॥

वीतहव्यश्च नृपतिः श्रुतो मे विप्रतां गतः ।

तदेव तावद् गाङ्गेय श्रोतुमिच्छाम्यहं विभो ॥ ३ ॥

मेरे सुननेमें यह भी आया है कि राजा वीतहव्य क्षत्रियसे ब्राह्मण हो गये थे । गङ्गानन्दन प्रभो! अब मैं पहले उसी प्रसङ्गको सुनना चाहता हूँ ॥ ३ ॥

स केन कर्मणा प्राप्तो ब्राह्मण्यं राजसत्तमः ।

वरेण तपसा वापि तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ४ ॥

वे नृपशिरोमणि वीतहव्य किस कर्मसे, किस वर अथवा तपस्यासे ब्राह्मणत्वको प्राप्त हुए? यह मुझे विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें ॥ ४ ॥

भीष्म उवाच

शृणु राजन् यथा राजा वीतहव्यो महायशाः ।

राजर्षिर्दुर्लभं प्राप्तो ब्राह्मण्यं लोकसत्कृतम् ॥ ५ ॥

भीष्मजीने कहा- राजन्! महायशस्वी राजर्षि राजा वीतहव्यने जिस प्रकार लोकसम्मानित दुर्लभ ब्राह्मणत्व प्राप्त किया था, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ ५ ॥

मनोर्महात्मनस्तात प्रजा धर्मेण शासतः ।

बभूव पुत्रो धर्मात्मा शर्यातिरिति विश्रुतः ॥ ६ ॥

पृष्ठ 387

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तात! पूर्वकालमें धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करनेवाले महामनस्वी राजा मनुके एक धर्मात्मा पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम था शर्याति ॥ ६ ॥

तस्यान्ववाये द्वौ राजन् राजानौ सम्बभूवतुः ।

हैहयस्तालजंघश्च वत्सस्य जयतां वर ॥ ७ ॥

विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ नरेश! राजा शर्यातिके वंशमें दो राजा बड़े विख्यात हुए — हैहय और तालजंघ । ये दोनों ही राजा वत्सके पुत्र थे ॥ ७ ॥

हैहयस्य तु राजेन्द्र दशसु स्त्रीषु भारत ।

शतं बभूव पुत्राणां शूराणामनिवर्तिनाम् ॥ ८ ॥

भरतवंशी राजेन्द्र! उन दोनोंमें हैहयके (जिसका दूसरा नाम वीतहव्य भी था ) दस स्त्रियाँ थीं । उन स्त्रियोंके गर्भसे सौ शूरवीर पुत्र उत्पन्न हुए जो युद्धसे पीछे हटनेवाले नहीं थे ॥ ८ ॥

तुल्यरूपप्रभावाणां बलिनां युद्धशालिनाम् ।

धनुर्वेदे च वेदे च सर्वत्रैव कृतश्रमाः ॥ ९ ॥

उन सबके रूप और प्रभाव एक समान थे, वे सभी बलवान् तथा युद्धमें शोभा पानेवाले थे । उन्होंने धनुर्वेद और वेदके सभी विषयोंमें परिश्रम किया था ॥

काशिष्वपि नृपो राजन् दिवोदासपितामहः ।

हर्यश्व इति विख्यातो बभूव जयतां वरः ॥ १० ॥

उन्हीं दिनों काशी प्रान्तमें हर्यश्व नामके राजा राज्य करते थे, जो दिवोदासके पितामह थे । वे विजयशील वीरोंमें श्रेष्ठ समझे जाते थे ॥ १० ॥

सवीतहव्यदायादैरागत्य पुरुषर्षभ ।

गङ्गायमुनयोर्मध्ये संग्रामे विनिपातितः ॥ ११ ॥

पुरुषप्रवर! वीतहव्यके पुत्रोंने हर्यश्वके राज्यपर चढ़ाई की उन्हें गंगा- यमुनाके बीच युद्धमें मार गिराया ॥ ११ ॥

तं तु हत्वा नरपतिं हैहयास्ते महारथाः ।

प्रतिजग्मुः पुरीं रम्यां वत्सानामकुतोभयाः ॥ १२ ॥

राजा हर्यश्वको मारकर वे महारथी हैहय- राजकुमार निर्भय हो वत्सवंशी राजाओंकी सुरम्य पुरीको लौट गये ॥ १२ ॥

हर्यश्वस्य च दायादः काशिराजोऽभ्यषिच्यत ।

सुदेवो देवसंकाशः साक्षाद् धर्म इवापरः ॥ १३ ॥

हर्यश्वके पुत्र सुदेव जो देवताके तुल्य तेजस्वी और साक्षात् दूसरे धर्मराजके समान न्यायशील थे, पिताके बाद काशिराजके पदपर अभिषिक्त किये गये ॥

स पालयामास महीं धर्मात्मा काशिनन्दनः ।

तैर्वीतहव्यैरागत्य युधि सर्वैर्विनिर्जितः ॥ १४ ॥

पृष्ठ 388

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धर्मात्मा काशिनन्दन सुदेव धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन करने लगे । इसी बीचमें वीतहव्यके सभी पुत्रोंने आक्रमण करके युद्धमें उन्हें भी परास्त कर दिया ॥ १४ ॥

तमथाजी विनिर्जित्य प्रतिजग्मुर्यथागतम् ।

सौदेवस्त्वथ काशीशो दिवोदासोऽभ्यषिच्यत ॥ १५ ॥

समराङ्गणमें सुदेवको धराशायी करके वे हैहय- राजकुमार जैसे आये थे वैसे लौट गये ।

तत्पश्चात् सुदेवके पुत्र दिवोदासका काशिराजके पदपर अभिषेक किया गया ॥ १५ ॥

दिवोदासस्तु विज्ञाय वीर्यं तेषां यतात्मनाम् ।

वाराणसीं महातेजा निर्ममे शक्रशासनात् ॥ १६ ॥

दिवोदास बड़े तेजस्वी राजा थे । उन्होंने जब मनको वशमें रखनेवाले हैहयराजकुमारोंके पराक्रमपर विचार किया तब इन्द्रकी आज्ञासे वाराणसी नामवाली नगरी बसायी ॥ १६ ॥

विप्रक्षत्रियसम्बाधां वैश्यशूद्रसमाकुलाम् ।

नैकद्रव्योच्चयवतीं समृद्धविपणापणाम् ॥ १७ ॥

वह पुरी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रोंसे भरी हुई थी । नाना प्रकारके द्रव्योंके संग्रहसे सम्पन्न थी; तथा उसके बाजार- हाट और दूकानें धन- वैभवसे भरपूर थीं ॥ १७ ॥

गङ्गाया उत्तरे कूले वप्रान्ते राजसत्तम ।

गोमत्या दक्षिणे कूले शक्रस्येवामरावतीम् ॥ १८ ॥

नृपश्रेष्ठ! उस नगरीके घेरेका एक छोर गंगाजीके उत्तर तटतक दूसरा छोर गोमतीके दक्षिण किनारेतक फैला हुआ था । वह नगरी इन्द्रकी अमरावतीपुरीके समान जान पड़ती थी ॥ १८ ॥

तत्र तं राजशार्दूलं निवसन्तं महीपतिम् ।

आगत्य हैहया भूयः पर्यधावन्त भारत ॥ १ ९ ॥

भारत! उस नगरीमें निवास करते हुए राजसिंह भूपाल दिवोदासपर पुनः हैहयराजकुमारोंने धावा किया ॥

स निष्क्रम्य ददौ युद्धं तेभ्यो राजा महाबलः ।

देवासुरसमं घोरं दिवोदासो महाद्युतिः ॥ २० ॥

महातेजस्वी महाबली राजा दिवोदासने पुरीसे बाहर निकलकर उन राजकुमारोंके साथ युद्ध किया । उनका वह युद्ध देवासुर संग्रामके समान भयंकर था ॥

स तु युद्धे महाराज दिनानां दशतीर्दश ।

हतवाहनभूयिष्ठस्ततो दैन्यमुपागमत् ॥ २१ ॥

हतयोधस्ततो राजन् क्षीणकोशश्च भूमिपः ।

दिवोदासः पुरीं त्यक्त्वा पलायनपरोऽभवत् ॥ २२ ॥

पृष्ठ 389

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महाराज! काशिनरेशने एक हजार दिन ( दो वर्ष नौ महीने दस दिन) -तक शत्रुओंके साथ युद्ध किया । इस युद्ध में दिवोदासके बहुत- से सिपाही और हाथी, घोड़े आदि वाहन मारे गये । उनका खजाना खाली हो गया और वे बड़ी दयनीय दशामें पड़ गये । अन्तमें अपनी राजधानी छोड़कर भाग निकले ॥ २१-२२ ॥

गत्वाऽऽश्रमपदं रम्यं भरद्वाजस्य धीमतः ।

जगाम शरणं राजा कृताञ्जलिररिंदम ॥ २३ ॥

शत्रुदमन नरेश! बुद्धिमान् भरद्वाजके रमणीय आश्रमपर जाकर राजा दिवोदास हाथ जोड़े हुए वहाँ मुनिकी शरणमें गये ॥ २३ ॥

तमुवाच भरद्वाजो ज्येष्ठः पुत्रो बृहस्पतेः ।

पुरोधाः शीलसम्पन्नो दिवोदासं महीपतिम् ॥ २४ ॥

किमागमनकृत्यं ते सर्वं प्रब्रूहि मे नृप ।

यत् ते प्रियं तत् करिष्ये न मेऽत्रास्ति विचारणा ॥ २५ ॥

बृहस्पतिके ज्येष्ठ पुत्र भरद्वाजजी बड़े शीलवान् और दिवोदासके पुरोहित थे । उन्होंने राजाको उपस्थित देखकर पूछा— ' नरेश्वर! तुम्हें यहाँ आनेकी क्या आवश्यकता पड़ी? मुझे अपना सब समाचार बता दो । तुम्हारा जो भी प्रिय कार्य होगा उसे मैं करूँगा । इसके लिये मेरे मनमें कोई अन्यथा विचार नहीं होगा' ॥ २४-२५ ॥ राजोवाच

भगवन् वैतहव्यैर्मे युद्धे वंशः प्रणाशितः ।

अहमेकः परिद्यूनो भवन्तं शरणं गतः ॥ २६ ॥

राजाने कहा — भगवन्! संग्राममें वीतहव्यके पुत्रोंने मेरे कुलका विनाश कर डाला । मैं अकेला ही अत्यन्त संतप्त हो आपकी शरणमें आया हूँ ॥ २६ ॥

शिष्यस्नेहेन भगवंस्त्वं मां रक्षितुमर्हसि ।

एकशेषः कृतो वंशो मम तैः पापकर्मभिः ॥ २७ ॥

भगवन्! मैं आपका शिष्य हूँ और आप मेरे गुरु हैं । शिष्यके प्रति गुरुका जो सहज स्नेह होता है उसीके द्वारा आप मेरी रक्षा कीजिये । उन पापकर्मियोंने मेरे कुलमें केवल मुझ एक ही व्यक्तिको शेष छोड़ा है ॥ २७ ॥

तमुवाच महाभागो भरद्वाजः प्रतापवान् ।

न भेतव्यं न भेतव्यं सौदेव व्येतु ते भयम् ॥ २८ ॥

यह सुनकर प्रतापी महर्षि महाभाग भरद्वाजने कहा- ' सुदेवनन्दन! तुम न डरो, न डरो । तुम्हारा भय दूर हो जाना चाहिये ॥ २८ ॥

अहमिष्टिं करिष्यामि पुत्रार्थं ते विशाम्पते ।

वीतहव्यसहस्राणि येन त्वं प्रहरिष्यसि ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 390

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‘ प्रजानाथ! मैं तुम्हारी पुत्र-प्राप्तिके लिये एक यज्ञ करूँगा जिसकी सहायतासे तुम हजारों वीतहव्य- पुत्रोंको मार गिराओगे ' ॥ २ ९ ॥

तत इष्टिं चकारर्षिस्तस्य वै पुत्रकामिकीम् ।

अथास्य तनयो जज्ञे प्रतर्दन इति श्रुतः ॥ ३० ॥

तब ऋषिने राजासे पुत्रेष्टि यज्ञ कराया । इससे उनके प्रतर्दन नामसे विख्यात पुत्र हुआ ॥ ३० ॥

स जातमात्रो ववृधे समाः सद्यस्त्रयोदश ।

वेदं चापि जगौ कृत्स्नं धनुर्वेदं च भारत ॥ ३१ ॥

भारत! वह पैदा होते ही इतना बढ़ गया कि तुरंत तेरह वर्षकी अवस्थाका - सा दिखायी देने लगा । उसी समय उसने अपने मुखसे सम्पूर्ण वेद और धनुर्वेदका गान किया ॥ ३१ ॥

योगेन च समाविष्टो भरद्वाजेन धीमता ।

तेजो लोक्यं स संगृह्य तस्मिन् देशे समाविशत् ॥ ३२ ॥

बुद्धिमान् भरद्वाजमुनिने उसे योगशक्तिसे सम्पन्न कर दिया और उसके शरीरमें सम्पूर्ण जगत्का तेज भर दिया ॥ ३२ ॥

ततः स कवची धन्वी स्तूयमानः सुरर्षिभिः ।

वन्दिभिर्वन्द्यमानश्च बभौ सूर्य इवोदितः ॥ ३३ ॥

तदनन्तर राजकुमार प्रतर्दनने अपने शरीरपर कवच धारण किया और हाथमें धनुष ले लिया । उस समय देवर्षिगण उसका यश गाने लगे । वन्दीजनोंसे वन्दित हो वह नवोदित सूर्यके समान प्रकाशित होने लगा ॥ ३३ ॥

स रथी बद्धनिस्त्रिंशो बभौ दीप्त इवानलः ।

प्रययौ स धनुर्धुन्वन् खड्गी चर्मी शरासनी ॥ ३४ ॥

वह रथपर बैठ गया और कमरमें तलवार बाँधकर प्रज्वलित अग्निके समान उद्भासित होने लगा । ढाल, तलवार और धनुषसे सम्पन्न हो वह धनुषकी टंकार करता हुआ आगे बढ़ा ॥ ३४ ॥

तं दृष्ट्वा परमं हर्षं सुदेवतनयो ययौ ।

मेने च मनसा दग्धान् वैतहव्यान् स पार्थिवः ॥ ३५ ॥

उसे देखकर सुदेव- पुत्र राजा दिवोदासको बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने मन- ही- मन वीतहव्यके पुत्रोंको अपने पुत्रके तेजसे दग्ध हुआ ही समझा ॥ ३५ ॥

ततोऽसौ यौवराज्ये च स्थापयित्वा प्रतर्दनम् ।

कृतकृत्यं तदाऽऽत्मानं स राजा अभ्यनन्दत ॥ ३६ ॥

तत्पश्चात् राजा दिवोदासने प्रतर्दनको युवराजके पदपर स्थापित करके अपने आपको कृतकृत्य माना और बड़े आनन्दका अनुभव किया ॥ ३६ ॥

ततस्तु वैतहव्यानां वधाय स महीपतिः ।