द्रष्टास्वरूप वर्णन – NATURE OF THE OBSERVER (PART -1)
द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः। योगसूत्रम् साधनपाद -२०। द्रष्टा दृशिमात्र (चिन्मात्र – विशेषण के द्वारा अपरामृष्ट दृक् शक्ति), शुद्ध (त्रिगुण सङ्गवर्जित) होने पर भी प्रत्ययानुपश्य (बुद्धिवृत्तिका उपदर्शन कारक)। जो अपने स्वरूप में सदा स्थित रहता है, उसे प्रकृति कहते हैं। जो अपनी प्रकृति को त्याग कर अन्य प्रकृति दर्शाता है, उसे विकृति (परिणाम) कहते हैं। विकार […]
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