बृहद्देवता (Brihaddevata, Brihad devata, Brihaddevta) of Shaunaka (Saunaka) with Hindi translation. Read, download, search through and research for free.
अथ शौनकीयबृहद्देवतारम्भः
प्रथम अध्याय
१. देवताओं को जानने का महत्त्व , वैदिकत्रयी
मन्त्रदृग्भ्यो नमस्कृत्वा१ समाम्नायानुपूर्वशः ।
सूक्तर्घर्धर्चपादानाम् ऋग्भ्यो वक्ष्यामि दैवतम् ॥१ ॥
मन्त्र – द्रष्टा ऋषियों को प्रणाम कर , मैं ( शौनक ) समाम्नाय ( वेदोक्त ) -क्रम से सूक्तों , ऋचाओं , आधी ऋचाओं तथा पादों के अनुसार ऋग्वेदीय देवताओं का कथन करूँगा।॥१ ॥
टिप्पणी – यास्कीय निरुक्त के अनुसार ‘ समाम्नाय ‘ शब्द का तात्पर्य वैदिक शब्दों की सूची से है , जिनका चयन ‘ निघण्टु ‘ के अन्तर्गत हो चुका है — ‘समाम्नाय : समाम्नातः ।’ यों ‘ आम्नाय ‘ शब्द का अर्थ वेद या वेद – मन्त्र है ।
वेदितव्यं दैवतं हि मन्त्रे मन्त्रे प्रयत्नतः ।
दैवतज्ञो हि मन्त्रणां तदर्थमवगच्छति ॥२ ॥
प्रत्येक मन्त्र के देवता का ज्ञान प्रयत्नपूर्वक ( वेदानुशीलियों को ) करना चाहिए , क्योंकि मन्त्रों के देवताओं का ज्ञाता उनके अर्थ को भी समझ लेता है ॥२ ॥
तद्धितांस्तदभिप्रायान् ऋषीणां मन्त्रदृष्टिषु ।
विज्ञापयति विज्ञानं कर्माणि विविधानि च ॥३ ॥
मन्त्रों के साक्षात्कार प्रसंग में , उनमें निहित ऋषियों के अभिप्रायों को जानने समझने वाला ( वेदपाठी ही ) मन्त्रगत विज्ञान तथा अनेक प्रकार के कर्मों को व्यक्त कर ( सकता ) है ।
टिप्पणी – महर्षि यास्क ने निरुक्त ( ७.३ ) में भी इस तथ्य को उपस्थापित किया है कि छोटे – बड़े ( अनेक प्रकार के ) अभिप्राय ऋषियों के मन्त्र – दर्शन में निहित होते हैं — ‘ एवमुच्चावचैरभिप्रायैः ऋषीणां मन्त्रदृष्टयो भवन्ति । ‘
न हि कश्चिदविज्ञाय याथातथ्येन दैवतम् ।
लौक्यानां वैदिकानां वा कर्मणां फलमश्नुते ॥ ४ ॥
क्योंकि कोई भी देवतत्त्व का यथावत् ज्ञान प्राप्त किये बिना लौकिक अथवा वैदिक कर्मों ( के अनुष्ठान ) का ( पूर्ण ) फल नहीं प्राप्त करता है ।
टिप्पणी — यहाँ वैदिक कर्मों का अभिप्राय श्रौत और गृह्यानुष्ठानों से है तथालौकिक कर्म वे हैं , जिनका उल्लेख स्मृतियों तथा अन्य धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों में है ।
प्रथमो भजते त्वासां वर्गोऽग्निमिह दैवतम् ।
द्वितीयो वायुमिन्द्रं वा तृतीयः सूर्यमेव च ॥५ ॥
( वेद में ) देवों की दृष्टि से प्रथम वर्ग अग्नि का , द्वितीय वायु या इन्द्र का तथातृतीय वर्ग सूर्य का ही है ॥५ ॥
अर्थमिछन्नृषिर्देवं यं यमाहायमस्त्विति ।
प्राधान्येन स्तुवन्भक्त्या मन्त्रस्तद्देव एव सः ॥ ६ ॥
प्रयोजनवश ( अथवा अपनी आकांक्षा के अनुसार कोई ऋषि जिस देवता कीप्रमुख रूप से श्रद्धा – भक्तिपूर्वक स्तुति करता है और कहता है कि यह ( उसे प्राप्त ) हो जाये , उस मन्त्र का वही देवता ( मान्य ) है ।
२। स्तुति और आशीष
स्तुतिस्तु नाम्ना रूपेण कर्मणा बान्धवेन च ।
स्वर्गायुर्धनपुद्यैर् अर्थैराशीस्तु कथ्यते ॥७ ॥
किसी भी देवता की स्तुति उसके नाम , स्वरूप , कर्म और सम्बन्ध के आधारपर की जाती है , जबकि आशीर्वाद स्वर्ग , आयुष्य , धन और पुत्र ( -पौत्रादि ) प्रयोजनों अथवा आकांक्षाओं के अनुसार प्रदेय है ॥७ ॥
स्तुत्याशिषौ तु यास्वृक्षु दृश्येतेऽल्पास्तु ता इह ।
ताभ्यश्चाल्पतरास्ताः स्युः स्वर्गो याभिस्तु याच्यते ॥ ८ ॥
जिन ऋचाओं में आशीर्वचन और स्तुति दोनों हों , ऐसे मन्त्र थोड़े ( ही ) हैं । और जिन ऋचाओं के माध्यम से स्वर्ग की याचना की गयी हो , ऐसे मन्त्र उनसे भी कम हैं ।। ८ ।।
स्तुवन्तं वेद सर्वोऽयम् अर्थयत्येष मामिति ।
स्तौतीत्यर्थं ब्रुवन्तं च सार्थं मामेष पश्यति ॥ ९ ॥
अपनी स्तुति करने वाले को सभी देव जान लेते हैं । वे यह भी जान जाते हैं कि यह स्तुति करके हमसे ( क्या ) आकांक्षा कर रहा है ! स्वप्रयोजन के कथनपूर्वक स्तुति करने वाले के विषय में देवता भी यह समझ लेता है कि हम इसके द्वारा आकांक्षित वस्तु से युक्त हैं — और यह ( स्तोता ) मुझे इसी दृष्टि से देख रहा है ।॥ ९ ॥
स्तुवद्भिर्वा ब्रुवद्भिर्वा ऋषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।
भवत्युभयमेवोक्तम् उभयं ह्यर्थतः समम् ॥१० ॥
तत्त्वद्रष्टा ऋषिगण ( चाहे ) स्तुति कर रहे हों अथवा ( अपनी आकांक्षा ) व्यक्तकर रहे हों , उनकी कही गयी दोनों बातें ( -स्तुति और इच्छा- ) घटित हो जाती हैं ,क्योंकि दोनों तात्पर्य की दृष्टि से वस्तुतः एक ही हैं ॥ १० ॥
प्रत्यक्षं देवतानाम यस्मिन्मन्त्रेऽभिधीयते ।
तामेव देवतां विद्यान् मन्त्रे लक्षणसंपदा ॥ ११ ॥
जिस मन्त्र में ( जिस ) देवता का नाम प्रत्यक्ष अर्थात् स्पष्ट रूप से प्रोक्त है ,उसे ही उस मन्त्र में , लक्षणों के अनुरूप देवता जानना चाहिये।।११ ।।
३. ऋग्वैदिक सूक्तों के विभिन्न प्रकार
तस्मात्तु देवतां नाम्ना मन्त्रे मन्त्रे प्रयोगवित् ।
बहुत्वमभिधानां च प्रयत्नेनोपलक्षयेत् ॥१२ ॥
इसलिये मन्त्रों के प्रयोग से परिचित व्यक्ति को यह प्रयास करना चाहिये किवह देवताओं के नाम और उनकी विभिन्न उपाधियों के माध्यम से मन्त्रगत देवता कोसमझने का प्रयास करे । ॥ १२ ॥
सम्पूर्णमृषिवाक्यं तु सूक्तमित्यभिधीयते ।
दृश्यन्ते देवता यस्मिन्न् एकस्मिन् बहुषु द्वयोः ॥ १३ ॥
किसी ऋषि के सम्पूर्ण वाक्य को सूक्त संज्ञा प्रदान की जाती है । इसके एक ,दो अथवा अनेक मन्त्रों में ( एक से अधिक ) देवता ( भी ) दिखाई देते हैं ।।१३ ।।
देवतार्षार्थछन्दस्तो वैविध्यं च प्रजायते ।
ऋषिसूक्तं तु यावन्ति सूक्तान्येकस्य वै स्तुतिः ॥ १४ ॥
श्रूयन्ते तानि सर्वाणि ऋषेः सूक्तं हि तस्य तत् ।
यावदर्थसमाप्तिः स्याद् अर्थसूक्तं वदन्ति तत् ॥ १५ ॥
देवता , ऋषि , विषय – वस्तु ( Subject – matter ) और छन्द के अनुसार सूक्तपृथक् – पृथक् प्रतीत होते हैं । ऐसे सूक्तों को , जिनका सम्बन्ध किसी ऋषि की स्तुतिविशेष के साथ परिलक्षित होता है , उन्हें ( उस ) ‘ ऋषि ( विशेष का ) सूक्त ‘ कहा जाताहै , क्योंकि ये सभी सूक्त मिलकर उसी ऋषि के सूक्त होते हैं । जब अनेक ऋचाओं मेंमिलकर एक विषय पूर्ण हो जाता है , उसे ‘ अर्थ – सूक्त ‘ कहते हैं।।१४-१५ ।।
समानछन्दसो याः स्युस् तच्छन्दःसूक्तमुच्यते ।
वैविध्यमेवं सूक्तानाम् इह विद्याद्यथातथम् ॥१६ ॥
उन ऋचाओं को , जिनका छन्द एक समान होता है , ऐसे सूक्त ‘ छन्दस् सूक्त ‘कहलाते हैं । इस प्रकार लोगों को सूक्तों के यथार्थ रूप से भिन्न – भिन्न स्वरूप का ध्यानरखना चाहिये।।१६
४. सूक्तों एवं मन्त्रों के नियत देवों के नैपातिक देवता
देवतानामधेयानि मन्त्रेषु त्रिविधानि तु ।
सूक्तभाञ्ज्यथवर्भाञ्जि तथा नैपातिकानि तु ॥१७ ॥
प्राय : मन्त्रों में देवताओं के नामों का उल्लेख तीन प्रकार से किया गया है१. ऐसे देवता जिनका उल्लेख सम्पूर्ण सूक्त में प्राप्त होता है , द्वितीय श्रेणी में वे देवताजो केवल एक ही मंत्र विशेष में ही वर्णित हैं तथा तीसरे वे देवता जिनका उल्लेखमात्र नैपातिक ( आकस्मिक ) रूप से ( किसी विशेष सन्दर्भ में ) ही किया गया है ॥ १७ ॥
सूक्तभाञ्जि भजन्ते वै सूक्तान्यृग्भाञ्जि वै ऋचः ।
मन्त्रेऽन्यदैवतेऽन्यानि निगद्यन्तेऽत्र कानिचित् ॥ १८ ॥
पूरे सूक्त में आने वाले देवता उस सम्पूर्ण सूक्त के मान्य हैं और केवल ऋचामें आने वाले देवताओं का सम्बन्ध मात्र उस ऋचा से होता है । किसी एक देवता कोसम्बोधित मन्त्र में कुछ अन्य देवताओं के नामों का परिगणन भी किया जा सकताहै । १८ ॥
सालोक्यात्साहचर्याद्वा तानि नैपातिकानि तु ।
तस्माद्बहुप्रकारेऽपि सूक्ते स्यात्सूक्तभागिनी ॥१ ९ ॥
देवता तद्यथा सूक्तम् अविशेष्यं प्रतीयते ।
भिन्ने सूक्ते वदेदेव देवतामिह लिङ्गतः ॥ २० ॥
भले ही वे एक लोक के हों अथवा परस्पर सम्बद्ध हों , फिर भी ऐसे देवताओं का उल्लेख नैपातिक ही माना जाता है , इसलिये बहुविध स्वरूप वाले एक सूक्त का भी सम्पूर्णत : एक ही देवता हो सकता है । इस प्रकार के सूक्तों को निश्चित निर्देश सीमा में आबद्ध नहीं किया जा सकता । यदि एक ही सूक्त विभिन्न भागों में विभाजित हो तो उस स्थिति में उसमें बताये गये विशेष लक्षणों के अनुसार उसमें वर्णित देवता का बोध करना चाहिये।।१९ -२० ॥
तत्र तत्र यथावच्च मन्त्रान्कर्मसु योजयेत् ।
देवतायाः परिज्ञानात् तद्धि कर्म समृध्यते ॥ २१ ॥
प्रत्येक स्थिति में देवता के विषय में यथावत् निर्णयपूर्वक ही मन्त्रों को उससे सम्बन्धित कर्मों में विनियुक्त करना चाहिए , क्योंकि देवता विषयिणी सम्पूर्ण जानकारी के द्वारा ही अनुष्ठित कर्म पूर्णतः फलप्रद होता है ॥२१ ॥
५. नामों की उत्पत्ति
आद्यन्तयोस्तु सूक्तानां प्रसङ्गपरिकीर्तनात्।
स्तोतृभिर्देवता नाम्ना उपेक्षेतेह मन्त्रवित् ॥ २२ ॥
क्योंकि स्तुतिकर्ता सूक्तों के आरम्भ और अन्त में देवताओं के नाम और प्रसंगकी घोषणा करते हैं , इसलिए मन्त्रज्ञाता व्यक्ति को देवता के नाम को इन स्थानों परसमुचित रूप से अवश्य देख लेना चाहिये || २२ ||
तत्खल्वाहुः कतिभ्यस्तु कर्मभ्यो नाम जायते ।
सत्त्वानां वैदिकानां वा यद्वान्यदिह किञ्चन ॥ २३ ॥
वैदिक व्यक्तियों अथवा अन्य लोगों के जो नाम यहाँ मिलते हैं , उनके विषयमें वस्तुत : लोग यह प्रश्न पूछते हैं कि कितने प्रकार के कर्मों के द्वारा नामों की उत्पत्ति होती है ? ॥२३ ॥
नवभ्य इति नैरुक्ताः पुराणाः कवयश्च ये ।
मधुकः श्वेतकेतुश्च गालवश्चैव मन्यते ॥ २४ ॥
( निर्वचन के ज्ञाता ) निरुक्तकारों का मत है कि नौ कर्मों से ( देव- ) नामों कीउत्पत्ति होती है । यही धारणा पौराणिकों , ऋषियों के साथ मधुक , श्वेतकेतु और गालव आदि आचार्यों की भी है ॥ २४ ॥
निवासात्कर्मणो रूपान् मङ्गलाद्वाच आशिषः ।
यदृच्छयोपवसनात् तथामुष्यायणाच्च यत् ॥२५ ॥
इन नौ कर्मों के अन्तर्गत ( देवों के ) आवासों , कर्मों , कल्याणमयता , वाणी , आशीर्वाद , स्वेच्छा , निकटवास और उच्चकुलत्व का परिगणन ( भी ) है ॥२५ ॥
चतुर्भ्य इति तत्राहुर्यास्कगार्ग्यरथीतराः ।
आशिषोऽथार्थवैरूप्याद् वाचः कर्मण एव च ॥ २६ ॥
इस सन्दर्भ में यास्क , गार्ग्य और रथीतर ने चार आधार स्वीकार किये हैं — १. आशीस् , २. अर्थों की विविधरूपता , ३. वाणी और ४. कर्म ॥२६ ॥
६. नाम और कर्म विषयक शौनकीय दृष्टिकोण
सर्वाण्येतानि नामानि कर्मतस्त्वाह शौनकः ।
आशी रूपं च वाच्यं च सर्वं भवति कर्मतः ॥२७ ॥
लेकिन ( इस ‘ बृहद्देवता ’ के प्रणेता ) आचार्य शौनक का मत है कि सभी नामोंकी उत्पत्ति कर्मों से ही संभव है । तात्पर्य यह कि आशीस् , रूप , वाणी आदि सभी कर्मों से ही तो उत्पन्न होते हैं ।। २७ ॥
यदृछयोपवसनात् तथामुष्यायणाच्च यत् ।
तथा तदपि कर्मैव तच्छृणुध्वं च हेतवः ॥ २८ ॥
इसी तरह स्वेच्छा , निकटवास एवं उच्च कुल से उत्पन्न नामों को भीकर्मजन्य ही मानना चाहिये । इस तथ्य की पृष्ठभूमि में निहित कारण को सुनिये ॥ २८ ॥
प्रजाः कर्मसमुत्था हि कर्मतः सत्त्वसंगतिः ।
क्वचित्सञ्जायते सच्च निवासात्तत्प्रजायते ॥ २ ९ ॥
प्राणियों के जीवन की उत्पत्ति भी कर्म से ही होती है , कर्म से ही उसमेंशक्ति – सामर्थ्य का विकास होता है और हर व्यक्ति वास्तव में किसी न किसी स्थान परही रहता है अर्थात् वह अपने निवास में ही उत्पन्न होता है ।।२९ ।।
यादृच्छिकं तु नामाभिधीयते यत्र कुत्रचित् ।
औपम्यादपि तद्विद्याद् भावस्यैवेह कस्यचित् ॥ ३० ॥
स्वेच्छानुसार रखे गये नाम भी किसी न किसी स्थान पर ही रखे जाते हैं । यहभी समझना चाहिये कि यहाँ यह किसी न किसी भाव अर्थात् क्रिया की समानता मेंही अस्तित्व में हैं ॥ ३० ॥
नाकर्मकोऽस्ति भावो हि न नामास्ति निरर्थकम् ।
नान्यत्र भावान्नामानि तस्मात्सर्वाणि कर्मतः ॥ ३१ ॥
क्योंकि किसी की सत्ता का कोई भी रूप ऐसा नहीं है , जो कर्म से जुड़ा नहो और न कोई ऐसा नाम है , जिसे निरर्थक कहा जा सके । इसके अतिरिक्त नामों के अस्तित्व का कोई अन्य आधार है ही नहीं । अतः सभी नामों को कर्म के प्रभाव से ही निष्पन्न समझना चाहिए ।। ३१ ॥
७. मंगलसूचक नाम एवं मन्त्रों बहुसंख्यक प्रकार
मङ्गलात्क्रियते यच्च नामोपवसनाच्च यत् ।
भवत्येव तु सा ह्याशीः स्वस्त्यादेर्मङ्गलादिह ॥३२ ॥
मंगल – कामना से रखे गये और निवास से जुड़े हुए नाम भी ‘ स्वस्ति ‘ के सदृश सौभाग्यसूचक शब्दों के आधार पर केवल आशीष का रूप धारण कर लेते हैं ।। ३२ ॥
अपि कुत्सितनामायम् इह जीवेत्कथं चिरम् ।
इति क्रियन्ते नामानि भूतानां विदितान्यपि ॥३३ ॥
प्राणियों के प्रचलित नाम इस ( मंगल भावना ) के आधार पर रखे जाते हैं कि ( किसी ) कुत्सित नाम वाला व्यक्ति दीर्घजीवी तक कैसे हो सकता है ? ।। ३३ ।।
मन्त्रा नानाप्रकाराः स्युर्दृष्टा ये मन्त्रदर्शिभिः ।
स्तुत्या चैव विभूत्या च प्रभावाद्देवतात्मनः ॥ ३४ ॥
मन्त्रद्रष्टा ऋषियों के द्वारा साक्षात्कृत मन्त्र , देवता के अपने प्रभाव से उत्पन्न विभूति और स्तुति की दृष्टि से विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं || ३४ ||
स्तुतिः प्रशंसा निन्दा च संशयः परिदेवना ।
स्पृहाशीः कत्थना याच्ञा प्रश्नः प्रैषः प्रवह्लिका ॥३५ ॥
( वैदिक मन्त्रों के अनेक प्रकार हैं , यथा— ) स्तुति , प्रशंसा , निन्दा , संशय ,परिदेवन , स्पृहा ( ईर्ष्या ) , आशीस् , दम्भ , याचना , प्रश्न , प्रैष , ‘ प्रेरणार्थकर ‘ तथा प्रवह्लिका ( पहेली , रूप ) ।। ३५ ।।
नियोगश्चानुयोगंश्च श्लाघा विलपितं च यत् ।
आचिख्यासाथ संलापः पवित्राख्यानमेव च ॥३६ ॥
( उपर्युक्त प्रकारों के अतिरिक्त ) नियोग ( कार्य में संलग्न करना ) , अनुयोग ,श्लाघा ( प्रशंसा ) , विलाप , वृत्तान्तकथन , वार्तालाप और पवित्र आख्यान — ये सात अन्य प्रकार भी मन्त्रों के मिलते हैं ॥३६ ॥
८. बहुविध मन्त्र – प्रकार एवं उनकी अभिव्यक्तिमूलक पद्धतियाँ
आहनस्या नमस्कारः प्रतिराधस्तथैव च ।
संकल्पश्च प्रलापश्च प्रतिवाक्यं तथैव च ॥३७ ॥
प्रतिषेधोपदेशौ च प्रमादापह्नवौ च ह ।
उपप्रैषश्च यः प्रोक्तः संज्वरो यश्च विस्मय ॥ ३८ ॥
आक्रोशोऽभिष्टवश्चैव क्षेपः शापस्तथैव च ।
उपसर्गो निपातश्च नाम चाख्यातमित्यपि ॥३ ९ ॥
भूतं भव्यं भविष्यं च पुमान् स्त्री च नपुंसकम् ।
एवंप्रकृतयो मन्त्राः सर्ववेदेषु सर्वशः ॥४० ॥
सभी वेदों में प्रत्येक स्थान पर उपसर्ग , निपात , संज्ञा एवं क्रिया , भूत ,वर्तमान तथा भविष्य , पुल्लिंग , स्त्रीलिंग और नपुंसकलिङ्ग आदि के स्वरूप से सम्पन्न कुछ अन्य मन्त्रों के प्रकार हैं— आहनस्या ( सम्मोहन या कामनापरक ) मन्त्र , नमस्कारात्मक , प्रतिराध , संकल्प , प्रलाप , प्रत्युत्तर , प्रतिषेध और उपदेश , प्रमाद और अपह्नव , आमंत्रण , संक्षोभ , विस्मय , आक्रोश , अभिष्टव , आक्षेप एवं शाप ।। ४० ।।
टिप्पणी —१ . आहनस्या , प्रतिराध – ये नाम अथर्ववेदीय दूसरे काण्ड के कुन्तापसूक्तगत कुछ मन्त्रों के लिए प्रचलित हैं , जिनकी व्याख्या भाष्यकारों ने प्राय : नहीं की है ।
२. इस प्रकार बृहद्देवताकार ने कुल अट्ठावन प्रकार के मन्त्रों का उल्लेखकिया है और उनके उदाहरण भी दिये ।
३. नाम , आख्यात , उपसर्ग और निपात – पदों के ये चार भेद निरुक्त केअतिरिक्त यहाँ भी दिये गये हैं । इससे स्पष्ट है कि यास्क और शौनक के काल में बहुतदूरी नहीं है ।
वाक्यार्थदर्शनार्थीया ऋचोऽर्धर्चाः पदानि च ।
ब्राह्मणे चाथ कल्पे च निगद्यन्तेऽत्र कानिचित् ॥४१ ॥
वस्तुत : ऋचाओं , अर्धऋचाओं और पदों का उद्देश्य वाच्यार्थ को ही स्पष्टकरना होता है । साथ ही ब्राह्मण – ग्रन्थों और कल्पसूत्रों की भी कुछ ऋचाएँ उदाहरण केरूप में यहाँ उल्लिखित हैं ॥४१ ॥
९ . संज्ञा और क्रिया की परिभाषाएँ
शब्देनोच्चरितेनेह येन द्रव्यं प्रतीयते ।
तदक्षरविधौ युक्तं नामेत्याहुर्मनीषिणः ॥४२ ॥
कोई भी उच्चारण किया गया शब्द , जिससे किसी द्रव्य या वस्तु का ज्ञानहो और वह उच्चारण के अनुकूल अक्षरों के संयोग से युक्त हो तो उसे मनीषीजन ‘ संज्ञा ’बतलाते हैं । ४२ ॥
अष्टौ यत्र प्रयुज्यन्ते नानार्थेषु विभक्तयः ।
तन्नाम कवयः प्राहुर्भेदे वचनलिङ्गयोः ॥४३ ॥
जिसमें विभिन्न अर्थों में आठ – विभक्तियों का पृथक् – पृथक् वचनों और लिङ्गोंमें प्रयोग होता है , उसे विद्वज्जन संज्ञा कहते हैं ॥ ४३ ॥
टिप्पणी – शौनक के समय सम्बोधन को भी विभक्ति माना जाता था ।
क्रियासु बह्वीष्वभिसंश्रितो यः पूर्वापरीभूत इहैक एव ।
क्रियाभिनिर्वृत्तिवसेन सिद्ध आख्यातशब्देन तमर्थमाहुः ॥४४ ॥
अनेक क्रियाओं से सम्बद्ध ( कालक्रमानुसार ) पूर्व अथवा अपर रूप धारण करने पर भी एक होते हुए भी यदि कोई शब्द क्रियाजन्य व्यवहारपूर्ण होने पर सिद्ध होता है तो भी उसे आख्यात ही कहा जाता है ।। ४४ ॥
क्रियाभिनिर्वृत्तिवशोपजातः कृदन्तशब्दाभिहितो यदा स्यात् ।
संख्याविभक्त्यव्ययलिङ्गयुक्तो भावस्तदा द्रव्यमिवोलक्ष्यः ॥४५ ॥
जो भाव किसी क्रिया की निर्वृत्ति से उत्पन्न हों और जो कृदन्त शब्दों से व्यक्त हों तथा जो संख्या , विभक्ति , अव्यय और लिंग से जुड़ा हुआ हो , उसे द्रव्य माना जाता है ॥४५ ॥
टिप्पणी — कृदन्त शब्दों की सिद्धि तो क्रिया ( धातु ) में ही प्रत्यय के योग से होती है , लेकिन प्रत्ययान्त होने के बाद उसे संज्ञा ही माना जाता है ।
१०. विभिन्न प्रकार के मन्त्रों के उदाहरण
यथा नानाविधैः शब्दैर् अपश्यन्नृषयः पुरा ।
विविधानीह वाक्यानि तान्यनुक्रमतः शृणु ॥४६ ॥
अब यह क्रमपूर्वक सुनिए कि पहले ऋषियों ने विभिन्न प्रकार के शब्दों केयोग से कैसे उनके विभिन्न वाक्यों का साक्षात्कार किया ॥ ४६ ॥
रूपादिभिः स्तुतिः प्रोक्ता आशीः स्वर्गादिभिस्तथा ।
यानि वाक्यान्यतोऽन्यानि तान्यपि स्युरनेकधा ॥४७ ॥
सुन्दर रूपादि को अभिव्यक्त करने वाले वाक्यों को स्तुति कहा गया है । स्वर्गइत्यादि को प्रकट करने वाले वाक्यों को आशीष कहा गया है । इनके अतिरिक्त जो अन्यप्रकार के वाक्य हैं , वे अन्य विभिन्न प्रकार के हो सकते हैं ॥४७ ॥
टिप्पणी —१ . स्तुतिवाचक वाक्यों में प्रायः देवों के रूप – स्वरूप , वस्त्र ,आयुध और अलंकारों का उल्लेख होता है ।
२. आशीर्वादपरक वचनों में कल्याणमूलक उपलब्धियों का उल्लेख रहता है ।
मन्त्रे प्रशंसा भोजस्य चित्र इत् सोभरे स्तुतिः ।
आक्रोशार्थास्तु दृश्यन्ते माता चेत्यभिमेथति ॥ ४८ ॥
‘ चित्र इत् ‘ ( ऋ ० ८.२१.१८ ) मन्त्र में सोभरि के द्वारा उदारतापूर्वक दान करनेवाले की प्रशंसा की गई है । आक्रोश को प्रकट करने वाले ‘ माता च ‘ इत्यादि मन्त्र भीपरिलक्षित होते हैं।।४८ ।।
ऋङ् मोघमन्नं निन्दा च शापो यो मेत्यृगेव तु ।
याच्ञा यदिन्द्र चित्रेति क्षेपोऽभीदमिति त्वृचि ॥४ ९ ॥
‘ मोघम् अन्नम् ‘ ( ऋ ० १०.११७.६ ) ऋचा में निन्दा का तथा ‘ यो मा ‘ ( ऋ ०७.१०४.१६ ) में शाप का वर्णन है । इसी के सदृश ‘ यद् इन्द्र चित्र ‘ ( ऋ ० ५.३ ९ .१ )में याचना की और ‘ उम्मीदम् ’ ( ऋ ० १०.४८.७ ) में आक्षेप की भावना परिलक्षित होती ।है ।॥ ४ ९ ॥
आशीस्तु वात आ वातु दण्डेति परिदेवना ।
प्रश्नश्च प्रतिवाक्यं च पृछामि त्वेत्यृचौ पृथक् ॥ ५० ॥
‘ वात आ वातु ‘ ( ऋ ० १०.१८६.१ ) आशीष और ‘ दण्डाः ‘ ( ऋ ० ७.३३.६ )में परिदेवन हैं , जबकि ‘ पृछामि त्वा ‘ ( ऋ ० १.१६४.३४-३५ ) से प्रारम्भ होने वाली दोनों ऋचाएँ प्रश्न और उत्तर के रूप में हैं ॥५० ॥
संशयोऽधः स्विदासीच्च कत्थना स्यादहं मनुः ।
इमं नो यज्ञमित्यस्यां नियोगः पाद उच्यते ॥ ५१ ॥
इसी प्रकार ‘ अध: स्विद् आसीत् ‘ ( ऋ ० १०.१२९ .५ ) में संशयात्मक स्थिति और ‘ अहं मनुः ’ ( ऋ ० ४.२६.१ ) में आत्मप्रकाशन की भावना है । ‘ इमं नो यज्ञम् ‘ ( ऋ० ३.२१.१ ) मन्त्र के प्रथम पाद में नियोग बताया गया है ॥५१ ॥
इह ब्रवीत्वनुयोगः संलाप ऋगुपोप मे ।
प्रतिषेधोपदेशौ तु अक्षैर्मेत्यक्षसंस्तुतौ ॥५२ ॥
इस तरह के बहुत से अन्य उदाहरण भी दृष्टिगोचर हो सकते हैं । ‘ इह ब्रवीतु ’( ऋ ० १.१६४.७ ) में अनुयोग और ‘ उपोप मे ‘ ( ऋ ० १.१२६.७ ) में बातचीत काप्रसंग है , लेकिन द्यूतक्रीड़ा की निन्दापरक ‘ अक्षैर् मा ‘ ( ऋ ० १०.३४.१३ ) सूक्त मेंनिषेध और उपदेश दोनों ही भाव निहित हैं ॥५२ ॥
आख्यानं तु हये जाये विलापः स्यान्नदस्य मा ।
अवीरामात्मनः श्लाघा सुदेव इति तु स्पृहा ॥ ५३ ॥
‘ हये जाये ‘ ( ऋ ० १०.९ ५.१ ) आख्यान और ‘ नदस्य मा ‘ ( ऋ ० १.१७ ९ .४ )विलाप के परक मन्त्र हैं । ‘ अवीराम् ‘ ( ऋ ० १०.८६.९ ) में आत्मप्रशंसा की गई है । एकअन्य मन्त्र ‘ सुदेव : ’ ( ऋ ० १०.९ ५.१४ ) में स्पृहा का प्रकाशन है ॥५३ ॥
नमस्कारः शुनःशेपे नमस्ते अस्तु विद्युते ।
संकल्पयन्निदं तुल्योऽहं स्यामिति यदुच्यते ॥५४ ॥
शुन : शेप आख्यान से सम्बद्ध मन्त्र ‘ नमस्ते अस्तु विद्युते ‘ ( अथर्व ० १.१३.३ )में नमस्कार किया गया है , लेकिन जब व्यक्ति शब्दों से व्यक्त भाव द्वारा संकल्प लेताहै , जैसे ‘ इदं तुल्योऽहं स्याम् ‘ तो ॥५४ ॥
संकल्पस्तु यदिन्द्राहं प्रलापस्त्वैतशस्य यः ।
महान्ग्न्याहनस्या स्यात् प्रतिराधो भुगित्यपि ॥५५ ॥
वह संकल्प कहलाता है । ‘ यद् इन्द्राहम् ‘ ( अथर्व० ८.१४.१ ) ऐतश का प्रलाप मात्र है — जबकि महानग्नी ( अथर्ववेद २०.१३६.५ कुन्तापसूक्तगत ) अभिलाषापरक मन्त्र है । पूर्ववर्ती ‘ भुक् ’ ( अथर्ववेद २०.१३५.१-३ ) से प्रारम्भ लघुकाय मन्त्रों में प्रतिराध व्यक्त किया गया है ॥ ५५ ॥
टिप्पणी — इस श्लोक में सन्दर्भित मन्त्र कुन्तापसूक्तान्तर्गत हैं , जिन्हें भाष्यकारों ने जटिल कह कर अव्याख्यात ही छोड़ दिया है ।
प्रमादस्त्वेष हन्ताहं न स स्व इत्यपह्नवः ।
इन्द्राकुत्सेत्युपप्रैषो न विजानामि संज्वरः ॥५६ ॥
‘ हन्ताहम् ‘ ( ऋ० १०.११९.९ ) मन्त्र में प्रमाद , ‘न स स्व :’ ( ऋ ० ७.८६.६ )में अपह्नव ( छिपाना ) , ‘ इन्द्राकुत्सा ‘ ( ऋ ० ५.३१.९ ) में आमन्त्रण और ‘ न वि जानामि ‘( ऋ ० १.१६४.३७ ) में क्षोभ का भाव है ॥५६ ॥
होता यक्षदिति प्रैषः को अद्येति तु विस्मयः ।
जामयेऽपह्नवो नैषा विततादिः प्रवह्निका ॥ ५७ ॥
‘ होता यक्षत् ‘ ( ऋ ० १०.१३ ९ .१० ) में ‘ प्रैष ‘ ( प्रेरणार्थक या निर्देशात्मकवाक्य ) ‘ को अद्य ’ ( ऋ ० १.८४.१६ ) में आश्चर्य ‘ न जामये ‘ ( ऋ ० ३.३१.२ ) मेंअपह्नव ( गोपनीयता ) और विततौ ( अथर्व ० २०.१३३.१-६ ) में प्रवह्निका ( पहेली )है।।५७ ॥
न मृत्युरासीदित्येताम् आचिख्यासां प्रचक्षते ।
अभिशापोऽप्रजाः सन्तु भद्रमाशीस्तु गौतमे ॥५८ ॥
‘ न मृत्युर् आसीत् ‘ ( ऋ ० १०.१२ ९ .२ ) से आरम्भ ऋचा को वृत्तान्तकथनकी इच्छा कहा गया है और ‘ अप्रजाः सन्तु ‘ ( ऋ ० १.२५.५ ) एक शाप ( सन्तान न होने का ) है , जबकि ‘ भद्रम् ‘ ( ऋ ० १.८ ९ .८ ) में गौतम ऋषि का आशीष् है।।५८ ।।
बह्वऽप्येवं प्रकारं तु शक्यं द्रष्टुमितीदृशम् ।
वक्तुं प्रयोगतश्चैषाम् ऋक्सूक्तार्धर्चसंश्रितम् ॥ ५ ९ ॥
इस प्रकार के अनेक अन्य उदाहरण भी प्राप्त होते हैं और किसी भी ऋचा ,सूक्त और आधी ऋचा में निहित भावों को उनके प्रयोगजन्य अभिप्रायों के आधार पर ऊपर बताये गये प्रकारों में रखा जा सकता है ।। ५ ९ ॥
एते तु मन्त्रवाक्यार्था देवतां सूक्तभागिनीम् ।
संश्रयन्ते यथान्यायं स्तुतिस्त्वत्रानुमानिकी ॥६० ॥
मन्त्रों के वाक्यों के अनुसार अर्थ अपने सूक्त के देवता के साथ उचित रूपसे सम्बद्ध है , लेकिन यहाँ पर उनकी स्तुति को अनुमानमूलक कहा गया है ।। ६० ।।
११. सूर्य एवं प्रजापति : चराचर एवं तीनों कालों के स्वरूप
भवद्भूतस्य भव्यस्य जङ्गमस्थावरस्य च ।
अस्यैके सूर्यमेवैकं प्रभवं प्रलयं विदुः ॥ ६१ ॥
कुछ ( विद्वान् ) , जो भूतकाल में था , जो वर्तमान में है और जो भविष्य में होगातथा जो समस्त चर और अचर है , उनकी उत्पत्ति और विनाश का मूल कारण सूर्य को ही मानते हैं।।६१ ।।
असतश्च सतश्चैव योनिरेषा प्रजापतिः ।
यदक्षरं च वाच्यं च यथैतद्ब्रह्म शाश्वतम् ॥६२ ॥ ॥
जिसका अस्तित्व है और जिसका अस्तित्व नहीं है , वास्तव में उन सभी कामूल प्रजापति ही है । वह शाश्वत ब्रह्म के समान कभी क्षय न होने वाला और वर्णनीयहै ।। ६२ ॥
कृत्वैष हि त्रिधात्मानम् एषु लोकेषु तिष्ठति ।
देवान्यथायथं सर्वान् निवेश्य स्वेषु रश्मिषु ॥६३ ॥
यह ( सूर्य ) स्वयं को विभाजित करके तीन लोकों में प्रतिष्ठित है और यहीअन्य दूसरे देवताओं को भी क्रमानुसार अपनी रश्मियों में समाविष्ट रखता है || ६३ ॥
एतद्भूतेषु लोकेषु अग्निभूतं स्थितं त्रिधा ।
ऋषयो गीर्भिरर्चन्ति व्यञ्जितं नामभिस्त्रिभिः ॥ ६४ ॥
अग्नि के रूप में जो भूतों और लोकों में तीन भागों में विभाजित होकर स्थितहै तथा ( तदनुसार ) तीन नामों से व्यक्त है , उसी की ऋषिगण अपनी स्तुतियों के माध्यमसे उपासना करते हैं।।६४ ॥
तिष्ठत्येष हि भूतानां जठरे जठरे ज्वलन् ।
त्रिस्थानं चैनमर्चन्ति होत्रायां वृक्तबर्हिषः ॥६५ ॥
वही प्राणियों के अन्त : करण में देदीप्यमान है , इसलिए यज्ञों में कुशासन पर विराजमान होतागण तीन स्थानों वाली अग्नि के रूप में उसी की पूजा करते हैं ।। ६५ ॥
टिप्पणी- अग्नि की स्थिति , पृथ्वी , अन्तरिक्ष और द्युलोक— तीनों ही लोकों में हैं । यज्ञानुष्ठान का भी वही मूलाधार है , अत : होतृगण के द्वारा उसकी सर्वाधिक स्तुति स्वाभाविक ही है ।
१२. त्रिविध अग्नि का स्वरूप
पवमानोऽग्निर् मध्यमोऽग्निर्वनस्पतिः
अमुष्मिन्नेव विप्रस्तु लोकेऽग्निः शुचिरुच्यते ॥६६ ॥
ऋत्विग्गण इस अग्नि को पृथ्वी पर पवमानाग्नि , मध्य भाग में वानस्पतिक और द्युलोक में ‘ अग्नि शुचि ‘ के नाम से सम्बोधित करते हैं ॥६६ ॥
इहाग्निभूतस्त्वृषिभिर् लोके स्तुतिभिरीळितः ।
जातवेदा स्तुतो मध्ये स्तुतो वैश्वानरो दिवि ॥६७ ॥
ऋषियों ने इस लोक में ‘ अग्नि ‘ के रूप में , मध्य लोक में ‘ जातवेदस् ‘ के रूप में तथा दिव्य लोक में वैश्वानर के रूप में ( अग्नि की ही ) स्तुति की है || ६७ ॥
रसान् रश्मिभिरादाय वायुनायं गतः सह ।
वर्षत्येष च यल्लोके तेनेन्द्र इति स स्मृतः ॥ ६८ ॥
क्योंकि अपनी किरणों से जल ग्रहण करके वायु के साथ वह इस लोक में वर्षा करता है , इसीलिए उसे इन्द्र कहा गया है । ६८ ॥
टिप्पणी — वैदिक देवों में इन्द्र मुख्यतः वर्षा के ही अधिष्ठातृ देव हैं ।
अग्निरस्मिन्नथेन्द्रस्तु मध्यतो वायुरेव च ।
सूर्यो दिवीति विज्ञेयास् तिस्त्र एवेह देवताः ॥ ६ ९ ॥
इस लोक में अग्नि , मध्य लोक में इन्द्र और वायु तथा द्युलोक में सूर्य कोही वेद में तीन देवता समझना चाहिए || ६ ९ ।
एतासामेव माहात्म्यान् नामान्यत्वं विधीयते ।
तत्तत्स्थानविभागेन तत्र तत्रेह दृश्यते ॥ ७० ॥
इन देवों की महानता के कारण ही इनके लिये विभिन्न नामों का व्यवहारकिया जाता है । इनके क्षेत्रों में विभाजन के अनुसार ही इनके नामों में विविधता परिलक्षितहोती है ॥७० ॥
१३. देवत्रयी के नामों की अनेकता का कारण
तासामियं विभूतिर्हि नामानि यदनेकशः ।
आहुस्तासां तु मन्त्रेषु कवयोऽन्योन्ययोनिताम् ॥७१ ॥
यह इनके वैभव का ही प्रतिफल है कि इनको विविध नामों से सम्बोधितकिया गया है । फिर भी ऋषि – कवियों ने इन देवों की उत्पत्ति से जुड़े मन्त्रों को एक दूसरेपर अवलम्बित बताया है ।॥ ७१ ॥
टिप्पणी — निरुक्त ( ७.४ ) में यास्क ने भी देवों को एक – दूसरे से प्रकट कहाहै — ‘ इतरेतरजन्मानः ’ ।
यथास्थानं प्रदिष्टास्ता नामान्यत्वेन देवताः ।
तद्भक्तास्तत्प्रधानाश्च केचिदेवं वदन्ति ताः ॥७२ ॥
ये देवता अपने नामों की भिन्नता के कारण ही अपने स्थान पर प्रतिष्ठित हैं ।कुछ ( सुधीजनों ) का विचार है कि जो व्यक्ति जिस देवता का भक्त होता है , वह उसे ही उस स्थान पर प्रमुख समझता है ॥७२ ॥
टिप्पणी – गोस्वामी तुलसीदास का भी इसी प्रकार का कथन है
‘ जाकी रही भावना जैसी , प्रभु मूरत देखी तिन तैसी । ‘
पृथक्पुरस्ताद्ये तूक्ता लोकाधिपतयस्त्रयः ।
तेषामात्मैव तत्सर्वं यद्यद्भक्तिः प्रकीर्त्यते ॥७३ ॥
ऊपर कहे गये अलग – अलग तीनों लोकों के स्वामियों के गुण अर्थात् भक्तिका वर्णन है । वही उनकी आत्मा अर्थात् सब कुछ ( सर्वस्व ) है ॥७३ ॥
तेजस्त्वेवायुधं प्राहुर् वाहनं चैव यस्य यत् ।
इमामैन्द्रीं च दिव्यां च वाचमेवं पृथक् स्तुताम् ॥७४ ॥
( ऋषियों की ) उक्ति है कि तेज ही देवता विशेष का आयुध होता है । इसीप्रकार उनका आगे कथन है कि इस पृथ्वी पर ( पार्थिव ) अन्तरिक्ष लोक में ( ऐन्द्री ) औरद्युलोक में वाणी की ही इन देवताओं के वाहन के रूप में स्तुति करनी चाहिये।।७४ ॥
बहुदेवता स्तुतयो द्विवत्संस्तुतयश्च याः ।
प्राधान्यमेव सर्वासु पतीनामेव तास्वपि ॥७५ ॥
अनेक देवताओं को सम्बोधित स्तुतियों में तथा उन सम्मिलित स्तुतियों में भीजो द्वित्ववाचक मानी गई हैं , उनमें इन्हीं तीन लोकों के स्वामी मुख्य रूप से होतेहैं ।७५ ॥
१४ सूक्तगत प्रमुख देवता
स्थानं नामानि भक्तीश्च देवतायाः स्तुतौ स्तुतौ ।
संपादयन्नुपेक्षेत यां काञ्चिदिह संपदम् ॥ ७६ ॥
सभी स्तुतियों में किसी देवता के स्थान , नाम और गुण अर्थात् भक्ति कोप्रकट करने के लिए ( मनुष्य को ) निकट से देखकर प्रत्येक संभव माध्यम का अवलम्बग्रहण करना चाहिए ॥७६ ॥
अग्निभक्तिस्तुतान्सर्वान् अग्नावेव समापयेत् ।
यदिन्द्रभक्ति तच्चेन्द्रे सूर्ये सूर्यानुगं च यत् ॥७७ ॥
जिन देवताओं की अग्नि के गुणों के साथ स्तुति की गई है , उन सभी देवताओं को अग्नि में समाहित मानना चाहिए । इसी प्रकार इन्द्र और सूर्य देवताओं को भी समझना चाहिए । ( तात्पर्य यह कि ) इन्द्र के गुणों की जिन देवताओं के प्रति स्तुति हो , उनको इन्द्र देवता में और जिनकी स्तुति सूर्य के साथ हो , उन्हें सूर्य में समाहित मानना चाहिए।।७७ ।।
निरूप्यते हविर्यस्यै सूक्तं च भजते च या ।
सैव तत्र प्रधानं स्यान् न निपातेन या स्तुता ॥ ७८ ॥
जिस देवता के लिए जहाँ पर हवि अर्पित की गई हो और उसे कोई सूक्त समर्पित हो तो उस स्थान पर स्तुति के लिए उसी देवता को मुख्य माना जाता है , कि वह देवता , जिसकी साथ में स्तुति की गयी हो ।। ७८ ॥
इति त्रयाणामेतेषाम् उक्तः सामासिको विधिः ।
समासेनैवमुक्तस्तु विस्तरेण त्वनुक्रमः ॥७ ९ ॥
यहाँ तीन मुख्य देवताओं को आधार मानकर उनसे सम्बद्ध नियमों का संक्षेपमें वर्णन किया गया है । इस संक्षिप्त वर्णन के बाद देवताओं के विषय में विस्तार सेक्रमश : चर्चा की जा रही है ।॥ ७ ९ ॥
अवश्यं वेदितव्यो हि नाम्नां सर्वस्व विस्तरः ।
न हि नामान्यविज्ञाय मन्त्राः शक्या हि वेदितुम् ॥८० ॥
( वेदाध्येता को ) प्रत्येक देवता के नाम के विस्तृत वर्णन से परिचित होनाचाहिए अन्यथा नामों के ज्ञान के बिना मन्त्रों का बोध संभव प्रतीत नहीं होता है ।। ८० ॥
१५ देवताओं के नामों की गणना
सत्त्वान्यमूर्तान्यपि च देवतावन्महर्षयः ।
तुष्टुवुर्ऋषयः शक्त्या तासु तासु स्तुतिष्विह ॥ ८१ ॥
महान् ऋषियों और मन्त्रद्रष्टाओं ने अपनी बहुविध स्तुतियों में शक्ति के अनुसारअमूर्त पदार्थों तक को देवता के सदृश स्वीकार कर उनकी स्तुति की है ।८१ ॥
यैस्त्वग्निरिन्द्रः सोमश्च वायुः सूर्यो बृहस्पतिः ।
चन्द्रोऽथ विष्णुः पर्जन्यः पूषा चाप्यृभवोऽश्विनौ ॥ ८ २ ॥
( ऋषियों ने ) अग्नि , इन्द्र , सोम , वायु , सूर्य , बृहस्पति , चन्द्रमा , विष्णु , पूषा ,पर्जन्य , ऋभुओं और अश्विन् देवताओं की स्तुति की है ) ।। ८२ ।।
रोदसी मरुतो देवाः पृथिव्यापः प्रजापतिः ।
देवौ च मित्रावरुणौ पृथक् सह च तावुभौ ॥ ८३ ॥
द्यावा पृथिवी ( दिव्य ) मरुतों , पृथिवी , ( जलराशि ) , प्रजापति , एक साथ अथवाअलग – अलग दिव्य मित्र – वरुण ( भी संस्तुत हैं ) || ८३ ।।
विश्वे च देवाः सविता त्वष्टा वै रूपकृन्मतः ।
अश्वोऽन्नमृत्विजो वज्रो ग्रावणो रथसंयुताः ॥८४ ॥
स्तुताः पृथक् पृथक् स्वैः स्वैः सूक्तैर्ऋग्भिश्च नामभिः ।
स्तुतौ स्तुतो प्रवक्ष्यामि तानि तेषामनुक्रमात् ॥८५ ॥
विश्वेदेवता , सविता , रूपों का निर्माण करने वाले त्वष्टा , अश्व , अन्न ,ऋत्विग्गण , वज्र , सोमाभिषवण में सहायक पत्थर और इन सभी देवताओं की उनकेरथों सहित , विभिन्न सूक्तों और ऋचाओं में जिन नामों से अलग – अलग स्तुति की गयीहै , उन नामों का मैं प्रत्येक स्तुति में क्रमानुसार वर्णन करूँगा।।८४-८५ ॥
१६. अग्नि , इन्द्र – वायु और सूर्य विषयक सूक्तों का वैशिष्ट्य
व्यवस्येन्मन्त्रमाग्नेयं लिङ्गैरग्नेश्च लक्षितम् ।
हविष्पङ्क्तिप्रधानैश्च नामाह्वानैश्च केवलैः ॥८६ ॥
अग्नि को आहूत करने के लिए किसी मन्त्र का विनियोग तभी करना चाहिए ,जब उसमें अग्नि के विशिष्ट लक्षण उपलब्ध हों और इन लक्षणों के अन्तर्गत एक ओरमुख्य रूप से पाँच प्रकार की हविष् पंक्तियों के प्रधान देवों का उल्लेख है और दूसरीओर · नाम मात्र से अग्नि का आवाहन किया गया हो ॥८६ ॥
ऐन्द्रस्तु मन्त्रो वायव्यैर् लिङ्गैरैन्द्रैश्च लक्ष्यते ।
नामधेयैश्च वज्रस्य बलकृत्या बलेन च ॥८७ ॥
इन्द्र का आवाहन करने के लिए मन्त्रों को वायु तथा इन्द्र दोनों के ही विशेषलक्षणों तथा वज्र , महान् कर्मों और पराक्रम के वर्णन द्वारा विनियुक्त किया जा सकताहै | ८७ ||
सौर्यस्तु लिङ्गैः सूर्यस्य गुणैः सर्वैश्च तैजसैः ।
नामधेयैश्च चन्द्रस्य सूक्तं च भजतेऽत्र यैः ॥ ८८ ॥
सूर्य के आवाहन में विनियोज्य मन्त्रों का वैशिष्ट्य यह है कि उनमें सूर्य केविशेष गुणों के वर्णन के साथ तेज से सम्बद्ध सभी गुणों और चन्द्रमा के नामों काविवरण भी सूक्त में वर्णित हो ॥८८ ॥
एतासां देवतानां तु नामधेयानुकीर्तनैः ।
यस्य यस्येह यावन्ति न व्यवस्यन्त्यतोऽन्यथा ॥ ८ ९ ।।
किसी मन्त्रद्रष्टा के सभी सूक्तों का , जिनका देवताओं के नामों को आधार बना कर निश्चय नहीं किया जा सकता है , अन्य आधारों के अनुसार ( अनुष्ठाता ) निर्णय कर लेते हैं।।८९ ॥
अयं प्रयोगस्त्वेतेषां ज्योतिषां त्रिषु वर्तताम् ।
लोकेषु मन्त्रविद्विद्वान् प्रयोगे नावसीदति ॥ ९ ० ॥
इन तीनों ज्योतिष्मान् देवों का क्रमपूर्वक तीनों लोकों में प्रयोग विनियोग करना चाहिए । इसी ज्ञान के परिणामस्वरूप मन्त्रज्ञ विद्वान् लोक में किये गये प्रयोग विनियोग में कभी विफल नहीं होता है ।।९ ० ॥
१७. त्रिविध अग्नियाँ
नीयतेऽयं नृभिर्यस्मान् नयत्यस्मादसौ च तम् ।
तेनेमौ चक्रतुः कर्म सनामानौ पृथक् पृथक् ॥ ९ १ ॥
इस पार्थिव अग्नि को मनुष्य आगे ले जाते हैं और वह दिव्य अग्नि उसे इससंसार में आगे ले जाती है , अतः नामों की समानता होते हुए भी दोनों प्रकार कीअग्नियाँ अपने – अपने कार्यों में अलग – अलग उपादेय होती हैं।।९ १ ।।
यद्विद्यते हि जातः सञ् जातैर्यद्वात्र विद्यते ।
तेनेमौ तुल्यनामानौ उभौ लोकौ समाप्नुतः ॥ ९ २ ॥
अग्नि उत्पन्न लेने पर ही जानी जाती है अथवा वह यहाँ पर उत्पन्न जीवों केद्वारा जानी जाती है । इसीलिए यह कहा गया है कि ये दोनों अग्नियाँ नामों की समानताअर्थात् ‘ जातवेदस् ’ होते हुए भी दोनों लोकों के अनुष्ठानों में अलग – अलग व्यवहृतहोती हैं।।९ २ ।।
विसृजन्नयमेतेषां भ्राजते व्योम्नि मध्यमः ।
निपातमात्रे कथ्यन्ते तथाग्नेयानि कानिचित् ॥ ९ ३ ॥
यह अग्नि आकाश के मध्य में स्थित होकर प्रकाशित होते हुए वर्षा करतीहै , अतः यहाँ इसका केवल नैपातिक अर्थात् आंशिक उल्लेख भी है । इसी प्रकार अन्यआग्नेय मन्त्रों में भी अग्नि के नैपातिक नाम हो सकते हैं । ९ ३ ।।
अर्चिभिः केश्ययं त्वग्निर् विद्युद्भिश्चैव मध्यमः ।
असौ तु रश्मिभिः केशी तेनैनानाह केशिनः ॥ ९ ४ ॥
यह ( पार्थिव ) अग्नि ज्वालारूपी और मध्यम में स्थित विद्युत् रूपी केशों सेयुक्त है । जबकि वह दिव्य अग्नि रश्मियों के केश से युक्त है , अतः ऋषि – कविगण उसेकेशिन : ( केशों से युक्त ) कहते हैं॥९ ४ ॥
एतेषां तु पृथक्त्वेन त्रयाणां केशिनामिह ।
संलक्ष्यन्ते प्रक्रियासु त्रयः केशिन इत्यृचि ॥१५ ॥
यहाँ इन तीन केश – युक्तों के पृथक् – पृथक् स्वरूप के कारण ऋचाओं में भीइन तीनों के विशेष गुणों के आधार पर अंतर दिखलायी देता है , यथा ‘ त्रय : केशिनः ‘ ( ऋ ० सं ० १.१६४.४४ ) ।। ९ ५ ।।
१८. अग्नि , जातवेदस् तथा वैश्वानर : साम्य एवं वैषम्य
न चैवैषां प्रसूतिर्वा विभूतिस्थानजन्म वा
निर्वक्तुं शक्यमेतैर्हि कृत्स्नं व्याप्तमिदं जगत् ॥९ ६ ॥
इनकी उत्पत्ति अथवा वैभव , स्थान और जन्म का समग्र वर्णन करना असम्भव कामकहै , क्योंकि ये सभी लोक इनसे भलीभाँति परिपूर्ण हैं ।। ९ ६ ॥
बृहद्देवता
वैश्वानरं श्रितो ह्यग्निर् अग्निं वैश्वानरः श्रितः ।
अनयोर्जातवेदास्तु म् तथैते जातवेदसी॥९ ७ ॥
मांग अग्नि वैश्वानर में समाहित है , वैश्वानर अग्नि में निहित है और जातवेदस् दोनों रूपों में । इसी प्रकार ये दोनों भी जातवेदस् के ही रूप माने गये हैं।९ ७ ||
सालोक्याच्चैकजातत्वाद् व्याप्तिमत्त्वात्तु तेजसः ।
तस्य तस्येह देवत्वं दृश्यन्ते च पृथक् स्तुताः॥९ ८ ॥
प्रत्येक देवता के दिव्य स्वरूप , उनकी एक ही लोक में स्थिति और समान जन्म के होने से , उन सभी का देवत्व दिखलायी देता है , तथापि इनकी अलग – अलग स्तुतियाँ भी हैं । ९ ८ ॥
यत्त्वाग्नेयमिति ब्रूमः सूक्तभाक् तत्र पार्थिवः ।
जातवेदस्यमित्युक्ते सूक्तेऽस्मिन्मध्यमः स्मृतः ॥ ९९ ॥
जब हम किसी सूक्त के माध्यम से अग्नि को सम्बोधित करते हैं तो उस अवस्था में उस सूक्त का देवता पार्थिव अग्नि होता है , लेकिन यदि कोई सूक्त जातवेदस् को सम्बोधित होता है तो मध्यम लोक अर्थात् अन्तरिक्ष में स्थित अग्नि को ही उसका देवता समझना चाहिए ।। ९९ ॥
वैश्वानरीयमिति तु यत्र ब्रूमोऽथ वा क्वचित् ।
सूर्यः सूक्तस्य भाक् तत्र ज्ञेयो वैश्वानरस्तुतौ ॥ १००
अथवा यदि हम कहीं पर कोई सूक्त वैश्वानर को सम्बोधित करते हैं तो उस अवस्था में वैश्वानर की स्तुति में सूर्य को ही उस सूक्त का देवता स्वीकार करना चाहिए ।। १०० ।।
१९ . अवरोहण क्रम से तीनों लोकों के देवता
सूर्यप्रसूतावग्नी तु दृष्टौ पार्थिवमध्यमौ ।
एतेषामेव लोकानां त्रयाणामध्वरेऽध्वरे ॥१०१ ॥
रोहात्प्रत्यवरोहेण चिकीर्षन्नाग्निमारुतम् ।
शस्त्रं वैश्वानरीयेण सूक्तेन प्रतिपद्यते ॥१०२ ॥
पार्थिव और मध्यम अग्नियाँ सूर्य से उत्पन्न होती हुई दिखाई देती हैं । प्रत्येक यज्ञकाल में अवरोहण – क्रम से , जो तीनों भुवनों के आरोहण – क्रम के विपरीत है , अग्नि और मरुतों की प्रार्थना करने का इच्छुक ऋत्विक् वैश्वानर को सम्बोधित शस्त्र ( सूक्त ) का पाठ करता है।।१०२ ।।
ततस्तु मध्यमस्थाना देवतास्त्वनुशंसति ।
रुद्रं च मरुतश्चैव स्तोत्रियेऽग्निमिमं पुनः ॥१०३ ॥
तत्पश्चात् वह मध्यम स्थान के देवता रुद्र और मरुतों की स्तुति , तदनन्तरपार्थिव अग्नि की स्तोत्रिय ऋचा से उसकी स्तुति करता है।।१०३ ॥
यथैतदुक्तमेतेषां विभूतिस्थानसंभवम् ।
तथा च देवदेवस्य तत्र तत्रेह दृश्यते ॥१०४ ॥
जिस प्रकार से इन तीनों देवताओं का अपना – अपना वैभव , निवास और उत्पत्ति स्थान कहा गया है , वैसे ही यहाँ अपने – अपने स्थानों पर देवों के देव अर्थात्प्रजापति की भी ये सभी विशेषताएँ दिखलाई देती हैं ।। १०४ ॥
यद्यत्र पृथिवीस्थानं पार्थिवं चाग्निमाश्रितम् ।
तत्सर्वमानुपूर्व्येण कथ्यमानं निबोधत ॥१०५ ॥
जो कुछ और जहाँ भी पृथ्वी – स्थान से सम्बद्ध और पार्थिव अग्नि में समाविष्टप्रतीत हो , उसकी उससे क्रमशः सम्बद्धता बतलायी जा रही है , उसे समझिये ।। १०५ ।।
२०. पार्थिव अग्नि का प्रतिनिधित्व करने वाले देवता
जातवेदाः श्रितो ह्यग्निम् अग्निं वैश्वानरः श्रितः ।
द्रविणोदास्तथेध्मश्च श्रितश्चाग्निं तनूनपात् ॥१०६ ॥
अग्नि के विभिन्न पर्याय , यथा जातवेदस , वैश्वानर , द्रविणोदा , इध्म तथातनूनपात् — सभी ( वास्तव में ) अग्नि ही आश्रित हैं ( अभिप्राय यह कि इनको अग्नि सेपृथक् नहीं मानना चाहिए ) ।। १०६ ।।
नराशंसः श्रितश्चैनम् एनमेवाश्रितस्त्विळः ।
बर्हिद्वारश्च देव्योऽग्निम् एनमेव तु संश्रिताः ॥१०७ ॥
नराशंस इसी में समाविष्ट है , इला भी इसी के अन्तर्गत है ; बर्हि और दिव्यद्वार भी इसी अग्नि में ही आश्रित हैं । ( मात्र नामों की भिन्नता से इन्हें अग्नि से पृथक्नहीं मानना चाहिए ) ।। १०७ ।।
नक्तोषासा च दैव्यौ च होतारावेतदाश्रयौ ।
देव्यस्तिस्त्रः श्रिताश्चैनं त्वष्टा चैवैतदाश्रयः ॥ १०८ ॥
रात्रि और ऊषा तथा दो दिव्य होता इसी में निहित हैं — तीन देवियाँ इसी के अन्तर्गत हैं और त्वष्टा की गणना भी इसी में की गई है । १०८ ॥
श्रितो वनस्पतिश्चैनं स्वाहाकृतय एव च ।
अश्वश्च शकुनिश्चैव मण्डूकाश्चैवतदाश्रयाः ॥१० ९ ॥
वनस्पति और स्वाहाकृतियाँ भी इसी के अन्तर्गत हैं और अश्व , पक्षी औरमाण्डूक्य भी इसी में आश्रित हैं ।। १० ९ ।।
बृहद्देवता
ग्रावाणश्चैनमक्षाश्च नराशंसस्तथा रथः ।
दुन्दुभिश्चेषुधिश्चैनं हस्तघ्नोऽभीशवो धनुः ॥११० ॥
सोमाभिषवण में प्रयुक्त पाषाण , इसी में निहित हैं । अक्ष , नराशंस , रथ , दुन्दुभितथा तरकश , हस्तघ्न , वल्गारों ( लगाम ) और धनुष भी इसी के अन्तर्गत हैं ।। ११० ॥
ज्या चतदाश्रितेषुश्च श्रिता अश्वाजनी च या ।
वृषभो द्रुघणश्चैनम् एनं पितुरुलूखलम् ॥१११ ॥
धनुष की प्रत्यञ्चा और बाण इसी में समाविष्ट हैं । इसी में अश्व – गमन का मार्ग ,वृषभ , मोंगरी या हथौड़ा तथा पैतृक उलूखल भी निहित हैं ।। १११ ॥
टिप्पणी — ‘ पितुरुलूखलम् ’ का अर्थ अस्पष्ट है । एक अनुवादक ने ‘ पितुः ’ काअर्थ ‘ पेय ’ किया है , जो सर्वथा अनुपयुक्त प्रतीत होता है ।
नद्यश्चैवैनमापश्च सर्वा ओषधयश्च हा।
रात्र्यप्वाग्नाय्यरण्यानी श्रद्धेळा पृथिवी तथा ॥ ११२ ॥
नदियां और जल , औषधियों के साथ – साथ रात्रि , अप्वा ( अथवा अध्वा – मार्ग ) ,अग्नायी , अरण्यानी , श्रद्धा , इळा और पृथिवी भी इसी के अन्तर्गत हैं।।११२ ॥टिप्पणी — ‘ अप्वा ’ शब्द सन्दिग्ध है । ‘ अध्वा ‘ ( मार्ग ) पाठ अधिक शुद्ध प्रतीत होता है ।
भजेते चैनमेवार्ली द्वन्द्वभूते च रोदसी ।
मुसलोलूखले चैनं हविर्धाने च ये स्मृते ॥ ११३ ॥
धनुष के दोनों किनारे इसी के हैं ; युग्म स्वरूप में मूसल में माने गये हैं और जिनका हविर्धान के रूप में वर्णन है , वह भी इसी से सम्बद्ध और हैं ।। ११३ ॥
जोष्ट्री चोर्जाहुती चैनं शुतुद्र्या च विपाट् सह ।
यौ च देवौ शुनासीरी तौ चाग्नी चैतदाश्रयौ ॥११४ ॥
दो धात्री देवियों और दो ऊर्जा – आहुतियों द्वारा पूजनीय इसी में हैं । विपाशा एवं शुतुद्री संज्ञक नदियाँ दो अग्नियाँ तथा शुन तथा शीर सभी इसी के अन्तर्गत कहे गये हैं ।। ११४ ।।
लोकोऽयं यच्च वै प्रातः सवनं क्रियते मखे ।
वसन्तशरदौ चर्तु स्तोमोऽनुष्टुबधो त्रिवृत् ॥११५ ॥
यह लोक ( यज्ञगत ) प्रात: सवन , वसन्त एवं शरद् ऋतुएँ , अनुष्टुप् छन्द और त्रिवृत् स्तोम — ये सभी अग्नि के अन्तर्गत हैं ।। ११५ ।।
२१. अग्नि से सम्बद्ध अन्य देवता
गायत्री चैकविंशश्च यच्च साम रथंतरम् ।
साध्याः साम च वैराजम् आप्त्याश्च वसुभिः सह ॥११६ ॥
गायत्री छन्द , एकविंश स्तोम , रथन्तर साम तथा वैराज साम , साध्यगण औरआप्त्यगण एवं वसुगण — इन सबको अग्नि से ही सम्बद्ध माना जाता है ।।११६ ॥
इन्द्रेण च मरुद्भिश्च सोमेन वरुणेन च ।
पर्जन्येनर्तुभिश्चैव विष्णुना चास्य संस्तवः ॥ ११७ ॥
अग्निदेव इन्द्र और मरुतों , सोम और वरुण , पर्जन्य और ऋतुओं तथा विष्णुके साथ स्तुतियों को स्वीकार करते हैं । तात्पर्य यह कि वैदिक संहिताओं में उपर्युक्तसभी देवों के साथ अग्नि की स्तुतियाँ हैं ॥ ११७ ।।
अस्यैवाग्नेस्तु पूष्णा च साम्राज्यं वरुणेन च ।
देवतामर्थतत्त्वज्ञो मन्त्रैः संयोजयेद्धविः ॥११८ ॥
इनको अग्नि , पूषा और वरुण देवताओं के साथ साम्राज्य का भी भागीदारकहा गया है । जो मन्त्रों के ( इन ) अपरिहार्य तत्त्वों को जानता है , उसे मन्त्र के द्वारा देवताको हविष् समर्पित करनी चाहिए ।। ११८ ॥
असंस्तुतस्यापि सतो हविरेकं निरुप्यते ।
देवतावाहनं चैव वहनं हविषां तथा ॥ ११९ ॥
जहाँ एक देवता की किसी अन्य देवता के साथ युग्म रूप से स्तुति नहीं कीजाती है , उस स्थान पर भी एक ही और एक समान हवि कभी – कभी दोनों को समर्पित की जाती है । देवों को उस स्थान पर लाने और उन्हें हवि के पास पहुँचाने ( का कार्य इसी दृष्टि से किया जाता है ) ।। ११९ ।।
कर्म दृष्टे च यत्किंचिद् विषये परिवर्तते ।
इत्युक्तोऽयं गणः सर्वः पृथिव्याग्न्याश्रयो महान् ॥ १२० ॥
इस दृष्ट जगत् में जो कुछ भी कर्म हैं तथा गतिशील हैं , वह सब कुछ उसीसे जुड़ा हुआ है । इसी प्रकार पार्थिव अग्नि में समाविष्ट इस महान् देव – समुदाय का वर्णन मिलता है।।१२० ।।
२२. इन्द्र से सम्बद्ध मध्यम स्थानीय देवता
यश्चैन्द्रो मध्यमस्थानो गणः सोऽयमतः परः ।
विमानानि च दिव्यानि गणश्चाप्सरसां तथा ॥ १२१ ॥
इसी क्रम में आगे मध्य स्थानीय गणों का वर्णन इन्द्र के साथ सम्बद्ध कर किया जा रहा है । इनमें दिव्य रथ और अप्सराओं को भी सम्मिलित किया गयाहै ।। १२१ ॥
इन्द्राश्रयस्तु पर्जन्यो रुद्रो वायुर्बृहस्पतिः ।
मृत्यु वरुणः कश्च मृत्युश्च देवश्च ब्रह्मणस्पतिः ॥१२२ ॥
इन्द्र के साथ पर्जन्य , रुद्र , वायु , बृहस्पति , वरुण , ‘ क ’ संज्ञक प्रजापति ,और ब्रह्मणस्पति को सम्मिलित किया गया है ।। १२२ ॥
मन्युश्च विश्वकर्मा च मित्रः क्षेॠपतिर्यमः ।
तार्क्ष्यो वास्तोष्पतिश्चैव सरस्वांश्चैवमत्र ह ॥ १२३ ॥
मन्यु , विश्वकर्मा , मित्र , क्षेत्रपति , यम , तार्क्ष्य एवं वास्तोष्पति और सरस्वत् भीइन्हीं को कहा गया है ।। १२३ ॥
अपांनपाद्दधिक्राश्च सुपर्णोऽथ पुरूरवाः ।
ऋतोऽसुनीतिर्वेनश्च तस्यैतस्याश्रयेऽदितिः ॥१२४ ॥
अपां नपात् तथा दधिक्रा एवं सुपर्ण , पुरूरवा , ॠत , असुनीति , वेन आदि भीइसी के अन्तर्गत कहे गये हैं एवं अदिति के क्षेत्र के रूप में भी इसका ही ग्रहण कियागया है।।१२४ ॥
त्वष्टा च सविता चैव वातो वाचस्पतिस्तथा ।
धाता प्रजापतिश्चैव अथर्वाणश्च ये स्मृताः ॥ १२५ ॥
इसी के अन्तर्गत त्वष्टा तथा सवितृदेव , वात एवं वाचस्पति , धाता और प्रजापति और जिन्हें अथर्वन् के नाम से जाना जाता है , वे भी हैं।।१२५ ॥
श्येनश्चैवैवमग्निश्च तथेळा चैव या स्मृता ।
विधातेन्दुरहिर्बुध्न्यः सोमोऽहिरथ चन्द्रमाः ॥१२६ ॥
और श्येन , अग्नि और जिसकी संज्ञा इळा है , वे सभी इसी में स्थित हैं । विधाता , इन्दु , अहिर्बुध्न्य , सोम , अहिरथ और चन्द्रमा भी इसी के अन्तर्गत हैं ।। १२६ ॥
२३. इन्द्र के क्षेत्रीय और दैवीय पदार्थ
विश्वानरश्च वै देवो रुद्राणां संस्तुतो गणः ।
मरुतोऽङ्गिरसश्चैव पितरश्चर्भुभिः सह ॥ १२७ ॥
दिव्य वैश्वानर , रुद्रगण , मरुद्गण तथा साथ ही साथ अङ्गिरसों , पितरों , ऋभुओं की भी इन्हीं के साथ स्तुति की गई है ।।१२७ ।।
राका वाक् सरमाप्त्याश्च भृगवोऽघ्न्या सरस्वती ।
यम्युर्वशी सिनीवाली पथ्या स्वस्तिरुषाः कुहूः ॥१२८ ॥
२३ प्रथम अध्याय
राका , वाणी , सरमा , आप्त्यगण , भृगुगण , अघ्न्या , सरस्वती , .यमी , उर्वशी ,सिनीवाली , पथ्या , स्वस्ति , उषस् , कुहु ( भी इसी के अन्तर्गत हैं ) ।। १२८ ।।
पृथिव्यनुमतिर्धेनुः सीता लाक्षा तथैव गौः ।
गौरी च रोदसी चैव इन्द्राण्याश्चैष वै पतिः ॥ १२ ९ ॥
पृथिवी , अनुमति , धेनु , सीता , लाक्षा , गौ एवं गौरी के साथ घुलोक औरपृथ्वी भी इन्द्र के क्षेत्र में स्थित मानी गयी हैं एवं इन्द्र को इन्द्राणी का पति कहा गयाहै।।१२९ ॥
छन्दस्त्रिष्टुप् च पङ्क्तिश्च लोकानां मध्यमश्च यः ।
एतेष्वेवाश्रयो विद्यात् सवनं मध्यमं च यत् ॥ १३० ॥
त्रिष्टुप् और पंक्ति छन्द , तीनों लोकों के केन्द्र और मध्याह्न में होने वाला सोमसवन — इन्हीं देवताओं के सदृश इन्द्र के ही क्षेत्र में संस्थित मान्य हैं ।। १३० ॥
ऋतू च ग्रीष्महेमन्तौ यश्च सामोच्यते बृहत् ।
शक्करीषु च यद्गीतं नाम्ना तत्साम शाक्करम् ॥ १३१ ॥
दो ऋतुएँ ग्रीष्म और हेमन्त , बृहत् नामक साम , शक्करी छन्द में गाया जानेवाला शाक्कर साम — सभी का सम्बन्ध इसी क्षेत्र से है।।१३१ ॥
।।इति बृहद्देवतायां प्रथमोऽध्यायः ॥
द्वितीय अध्याय
१. इन्द्र स्थानीय देवता
आह चैवास्य द्वौ स्तोमाव् आश्रयौ शाकटायनः ।
यश्च पञ्चदशो नाम्ना संख्यया त्रिणवञ्च यः ॥ १ ॥
शाकटायन ने कहा है कि उनके ( इन्द्र के ) निमित्त दो स्तोम विहित हैं । प्रथम पञ्चदश है और द्वितीय वह जो नौ की संख्या का तीन से गुणन करने पर सत्ताइस होता है ॥१ ॥
विशेष – निरुक्त ( ७.१०-११ ) में भी ‘पञ्चदश स्तोम’ एवं ‘त्रिणव स्तोम’ इन्द्र से सम्बद्ध बताये गये हैं ।
संस्तुतश्चैव पूष्णा च विष्णुना वरुणेन च ।
सोमवाय्वग्निकुत्सैश्च ब्रह्मणस्पतिनैव च ॥२ ॥
पूषन् , विष्णु , वरुण , सोम , वायु , अग्नि , कुत्स तथा ब्रह्मणस्पति के साथ भीउनकी स्तुतियाँ हैं।।२ ।।विशेष — प्रस्तुत श्लोक एवं आगे के श्लोकों में जिन दस देवताओं की इन्द्रके साथ स्तुतियाँ उल्लिखित हैं , वे ही देवता निरुक्त में भी इन्द्र के साथ स्तुत्य बतलायेगये हैं । “ अथ अस्य संस्तविका देवा : अग्निः , सोमो वरुणः पूषा बृहस्पतिर् ब्रह्मणस्पतिःपर्वतः कुत्सो विष्णुर् वायुः । ”
बृहतस्पतिना चैव नाम्ना यश्चापि पर्वतः ।
कासुचित्केचिदित्याहुर्निपाता स्तुतिषु स्तुताः ॥३ ॥
बृहस्पति एवं उसके साथ भी जिसका नाम पर्वत है , उनकी ( इन्द्र की ) स्तुति की जाती है । कुछ लोगों का मानना है कि कुछ स्तुतियों में कुछ देवों की केवल आंशिक स्तुति हुई है ॥३ ॥
विशेष — यहाँ ‘ बृहतस्पति ’ तथा ‘ बृहस्पति ‘ दोनों ही शब्दों में व्युत्पत्ति की दृष्टि से समानता परिलक्षित होती है — ‘ बृहत : पाता ‘ ( निरुक्त , १०.११ ) । इसी प्रकार इन्द्र के ‘ वज्र ‘ का प्रतिनिधित्व करने वाले स्वरूप का वर्णन किया गया है ।
यहाँ ‘ निपाता : ’ पद ‘ नपातिनः ‘ के रूप में प्रयुक्त किया गया है – काश्चन देवताः — निपातभाज : ( निरुक्त , १०-१३ ) ।
–२५ द्वितीय अध्याय–
मित्रश्च श्रूयते देवो वरुणेन सहासकृत् ।
रुद्रेण सोमः पूष्णा च पुनः पूषा च वायुना ॥४ ॥
वातेनैव च पर्जन्यो लक्ष्यतेऽन्यत्र वै क्वचित् ।
ऋक्ष्वर्धर्चेषु पादेषु सूक्तेष्वेषु तु कृत्स्नशः ॥ ५ ॥
मित्रदेवता प्राय : वेदों में वरुणदेव के साथ , सोम , रुद्र तथा पूषन् देवताओंके साथ तथा पूषन वायु के साथ और पर्जन्य वात के साथ संस्तुतियाँ की गई हैं । लेकिनअन्य स्थलों पर वह ( इन्द्रदेव ) यत्र – तत्र ऋचाओं , आधी ऋचाओं , मन्त्रों ( या ) सम्पूर्णसूक्तों ( ऋग्वेद के ) में अकेले देव के रूप में मिलते हैं॥४-५ ॥
विशेष – प्रस्तुत श्लोकों में कथित पाँच युग्म देवताओं की स्तुति सम्बन्धीवर्णन का आधार निरुक्त में भी है— “ अथापि मित्रो वरुणेन संस्तूयते पूष्णा रुद्रेण चसोमोऽग्निना च पूषा वातेन च पर्जन्य :। ” ( निरुक्त , ७.१० ) ।
रसादानं तु कर्मास्य वृत्रस्य च निबर्हणम् ।
स्तुतेः प्रभुत्वं सर्वस्य बलस्य निखिला कृतिः ॥६ ॥
जल को ग्रहण करना ( तथा वृष्टि करना ) तथा वृत्र को नष्ट करना — ये इन्द्रकी स्तुतियों का प्रमुख वैशिष्ट्य है — और प्रत्येक प्रकार के पराक्रमपूर्ण कामों को पूर्णरूप से सम्पादित करना ही उनका कार्य है ॥ ६ ॥
विशेष — इस श्लोक में प्रतिपादित इन्द्र के मुख्य तीनों कार्यों — रसादान , वृत्रका नाश एवं शक्तिपूर्ण कार्यों का आधार भी निरुक्त ही है— “ अथास्य कर्म रसानुप्रदानंवृत्रवधो या च का च बलकृतिर् इन्द्रकर्मैव तत् । ” ( निरुक्त , ७.१० ) ।
२. सूर्य क्षेत्रीय देवतागण तथा सूर्य की तीन पत्नियाँ
इत्यैन्द्रो मध्यमस्थानो गणः सम्यगुदाहृतः ।
यः परस्तु गणः सौर्यो स्थानस्तं निबोधत ॥ ७ ॥
इसी प्रकार मध्यम स्थान में रहने वाले इन्द्रवर्ग के देवताओं का यथोचितउल्लेख किया गया है । अब सूर्य से सम्बन्धित दिव्य स्थानीय देवों की जानकारी प्राप्त करें ।।७ ।।
तस्य मुख्यतमौ देवाव् अश्विनौ सूर्यमाश्रितौ ।
वृषाकपायी सूर्योषाः सूर्यस्यैव तु पत्नयः ॥ ८ ॥
सूर्य से सम्बन्धित इस क्षेत्र के दो प्रमुख देव अश्विन् युग्म हैं , जबकि वृषाकपायी , सूर्या और उषस् सूर्य की तीन पत्नियाँ हैं ।। ८ ॥
तुलनीय— “ तासाम् ( द्युस्थानानां देवतानाम् ) अश्विनौ प्रथमागामिनौ भवतः । ”( निरुक्त , १२.१ )‘ सूर्या सूर्यस्य पत्नी ‘ ( निरुक्त , १२.७ )।
अमुतोऽर्वाङ् निवर्तन्ते प्रतिलोमास्तदाश्रयाः ।
सूर्यां मध्यंदिने पुरोदयात्तामुषसं स्थिते ॥ ९ ॥
पुनः उसके ( सूर्य के ) आश्रय में ( अन्य ) दिव्य लोक से इधर आते हैं और
वापस चले जाते हैं । उसे सूर्योदय के पूर्व उषस् , मध्याह्न के समय सूर्या , ॥९ ॥
विशेष — ‘ अमुतोऽर्वाङ् ’ शब्द का अभिप्राय ‘ सूर्य ‘ ‘ सूर्य की रश्मियों ‘ से है’ अमुतोऽर्वाञ्चः पर्यावर्तन्ते ‘ ( निरुक्त , ७.२४ ) ।
वृषाकपायीं सूर्यस्य तामेवाहुस्तु निमुचि ।
तस्याश्रये सरण्यूश्च भगः पूषा वृषाकपिः ॥ १० ॥
यमो वैश्वानरो विष्णुर् वरुणश्चैकपादजः ।
पृथिवी च समुद्रश्च देवाः सप्तर्षयश्च ये | ११ ॥
आदित्याः केशिसाध्याश्च सविता वसुभिर्मनुः ।
दध्यङ्ङथर्वा विश्वे च वाजिनो देवपत्नयः ॥ १२ ॥
वृषाकपायी का कथन है कि सूर्यास्त के समय उसी के आश्रय में सरण्यू ,भग , पूषन् , वृषाकपि , यम , वैश्वानर , विष्णु , वरुण , अज , एकपाद और पृथिवी , समुद्र , देवगण , सप्तर्षिगण , आदित्यगण , केशिगण , साध्यगण , सविता , वसुगण , मनु , दध्यञ्च , अथर्वा , विश्वेदेव , अश्व तथा देवों की पत्नियाँ भी रहती हैं।१०-१२ ॥
असौ तृतीयं सवनं लोकः साम च रैवतम् ।
वैरूपं चैव वर्षाश्च शिशिरोऽथ ऋतुस्तथा ॥ १३ ॥
त्रयस्त्रिंशश्च य स्तोमः क्लृप्त्या सप्तदशश्च यः ।
छन्दश्च जगती नाम्ना तथातिछन्दसश्च याः ॥ १४ ॥
उसी दिव्य लोक में तृतीय सोम – सवन , रैवत और वैरूप साम तथा वर्षा और शिशिर ऋतु , तैंतीस स्तोम एवं वह जो व्यवस्था में सत्रह हैं तथा अतिछन्दस् भी स्थित हैं ।। १३-१४ ॥
विशेष — प्रस्तुत दोनों ही श्लोक निरुक्त के इस अंश पर आधृत हैं “ अथैतान्य् आदित्यभक्तीनिः असौ लोकस् तृतीयसवनं वर्षा जगती सप्तदशस्तोमो वैरूपं साम । ”तथा “ शिशिरोऽतिछन्दास् त्रयस्त्रिंशस्तोमो रैवतं सामेति घुर्भक्तीनि । ” ( निरुक्त , ७.११ ) ।
द्वितीय अध्याय २७
पौरुषं चाहुरस्यैतत् सर्वमेव ते पौरुषम् ।
एतस्यैव तु विज्ञेया देवाः संस्तविकास्त्रयः ॥ १५ ॥
जो कुछ भी पुरुष से सम्बद्ध है , वह उसका ही कहा गया है ; तथा यह सम्पूर्ण विश्व पुरुष से सम्बद्ध है । चन्द्रमा , वायु और वैश्वानर तीनों देवताओं को सूर्य से ही सम्बद्ध माना गया है।।१५ ॥
चन्द्रमाश्चैव वायुश्च यं च संवत्सरं विदुः ।
केचित्तु निर्वपन्त्यस्य सौर्यवैश्वानरं हविः ॥ १६ ॥
चन्द्रमा , वायु और वह जिसे ( लोग ) सम्वत्सर जानते हैं , कुछ लोग उसको सूर्य और वैश्वानर को सम्बोधित हवियाँ भी अर्पित करते हैं।॥१६ ॥
विशेष — यह श्लोक निरुक्त के इस भाव के साथ साम्य रखता है—
“ चन्द्रमसा वायुना संवत्सरेणेति संस्तवः । ”
३. सूर्य और वैश्वानर अग्नि के स्वरूपता
सौर्यवैश्वानरीयं हि तत्सूक्तमिव दृश्यते ।
ऋगर्धर्चोऽथवा पादो द्वृचो वा यदि वा तृचः ॥१७ ॥
चाहे ऋचा हो या आधी ऋचा , चाहे वह मन्त्र हो अथवा दो या तीन पदों का श्लोक , सूर्य तथा वैश्वानर के प्रति उक्त होने पर सूर्य का ही सूक्त प्रतीत होता है।॥१७ ॥
अनेन तु प्रवादेन दृष्टा मूर्धन्वता स्तुतिः ।
सूर्यवैश्वानराग्नीनाम् ऐकात्म्यमिह दृश्यते ॥ १८ ॥
इस प्रवाद के अनुसार जिस व्याहृति में ‘ मूर्धन्य ‘ शब्द प्रयुक्त होता है , उसकीस्तुति स्पष्ट है । इस प्रकार यहाँ सूर्य , वैश्वानर और अग्नि का एकात्मस्वरूप दृष्टिगोचरहोता है ॥१८ ॥
हरणं तु रसस्यैतत् कर्मामुत्र च रश्मिभिः ।
येन नातिविजानन्ति सर्वभूतानि चक्षुषा ॥ १ ९ ॥
अपनी रश्मियों के द्वारा उस दिव्य लोक में जल का हरण भी उसका कार्यहै , जिसे सभी प्रकार के प्राणी अपने नेत्रों से स्पष्ट रूप से जान नहीं पाते ॥१ ९ ॥
विशेष – निरुक्त में इसी प्रकार का आशय अभिव्यक्त है“ अथास्य कर्म रसादानं रश्मिभिश् च रसाधारणम् । ” अर्थात् रश्मियों से जलको ग्रहण करना एवं उसे अपने में धारण कर रखना ।
विभागमिममेतेषां विभूतिस्थानसंभवम् ।
संयग्विजानन्मन्त्रेषु तं तु कर्मसु योजयेत् ॥ २० ॥
अध्यापयन्नधीयानो मन्त्रं चैवानुकीर्तयन् ।
स्थानं सालोक्यं सायुज्यम् एतेषामेव गच्छति ॥ २१ ॥
मन्त्रों में , वैभव और स्थान की दृष्टि से उत्पन्न ( इन तीन देवों की ) विशिष्टताओंको विभक्त कर ठीक प्रकार से समझते हुए तथा पठन – पाठन और मन्त्रोच्चारण करतेहुए , मनुष्य इन्हीं देवताओं के स्थान तथा लोक एवं उनके साहचर्य को प्राप्त करताहै।।२०-२१ ॥
४. अग्नि के पञ्च नामः अग्नि , द्रविणोदस् , तनूनपात् की उत्पत्ति
अग्नेस्तु यानि सूक्तानि पञ्च नामानि कारवः ।
षड्विंशतिस्तथेन्द्रस्य प्राहुः सूर्यस्य सप्त च ॥२२ ॥
सूक्तों में ऋषियों ने अग्नि के पाँच , इन्द्र के छब्बीस तथा सूर्य के सात नामोंकी उद्घोषणा की है || २२ ||
तेषां पृथङ्निर्वचनम् एकैकस्येह कर्मजम् ।
उच्यमानं यथान्यायं शृणुध्वमखिलं मया ॥ २३ ॥
यहाँ मैं इनमें से प्रत्येक देवता के कर्म पर आधारित नामों का अलग – अलगववेचन करूंगा , उसे पूर्णतया सुनिये ॥ २३ ॥
जातो भूतानाम् अग्रणीरध्वरे च यत् ।
नाम्ना संनयते वाङ्गं स्तुतोऽग्निरिति सूरिभिः ॥२४ ॥
क्योंकि उसका जन्म सभी प्राणियों के पहले हुआ था तथा वह यज्ञ का अग्रणी है , अथवा वह अपने शरीर को एकीभूत कर लेता है , अतः ऋषिगण उसकी ‘ अग्नि ‘ के नाम से स्तुति करते हैं ॥ २४ ॥
विशेष — निरुक्त में भी अग्नि के स्वरूप का वर्णन इसी प्रकार मिलता है “ अग्रणीर् भवति , अग्रं यज्ञेषु प्रणीयते , अङ्गं नयति संनममान :। ” ( निरुक्त , ७.८४ ) ।
द्रविणं धनं बलं वापि प्रायछद्येन कर्मणा ।
तत्कर्म दृष्ट्वा कुत्सस्तु प्राहैनं द्रविणोदसम् ॥२५ ॥
धन एवं बलप्रदानरूप उसके कार्य को देखकर ऋषि कुत्स ने उसे द्रविणोदा कहा है ॥ २५ ॥
अयं तनूनपादग्निर् असौ हि तननात्तनुः ।
ततस्तु मध्यमो जज्ञे स्थानेऽयं मध्यमात्ततः ॥२६ ॥
यही पार्थिव अग्नि ‘ तनूनपात् ‘ है । यह दिव्य स्वरूप वाली अग्नि ‘ तनन ‘ व्याप्ति से ‘ तनु ‘ हुई है । उससे ही मध्यम स्थान पर रहने वाली अग्नि की उत्पत्ति हुईहै । तत्पश्चात् मध्यम स्थान वाली अग्नि से अपने उपयुक्त स्थान पर इस ‘ पार्थिव ’ अग्निका उद्भव हुआ है।॥२६ ॥
५. नराशंस , पवमान तथा जातवेदस् की व्युत्पत्तियाँ
अनन्तरां प्रजामाहुर् नपादिति कृपण्यवः ।
नपादमुष्य चैवायम् अग्निस्तेन तनूनपात् ॥२७ ॥
कृपालु ऋषियों ने प्रथम वंशज के पश्चात् वंश में उत्पन्न व्यक्ति को पौत्र कहाहै । यह पार्थिव अग्नि उस दिव्य अग्नि की पौत्ररूप है , अतः इसे ‘ तनूनपात् ‘ कहतेहैं ।। २७ ||
विशेष — यास्क ने भी ‘ तनूनपात् ‘ का तात्पर्य ‘ पौत्र ’ किया है ।
पृथक्त्वेन समासैस्तु यज्ञे यच्छस्यते नृभिः ।
स्तुवन्त्याप्रीषु तेनेमं नराशंसं तु कारवः ॥ २८ ॥
क्योंकि यज्ञ के समय मनुष्य एक साथ ही इनकी स्तुति करते हैं , इसलियेआप्री सूक्तों में ऋषियों ने ‘ नराशंस ‘ के रूप में अग्नि की स्तुति की है ॥२८ ॥
विशेष — आचार्य शाकपूणि की ‘ नराशंस ‘ की व्युत्पत्ति में कथन है — ‘ नरैःप्रशस्यो भवति ‘ जो लोगों के द्वारा प्रशंसनीय है ।
पुनाति यदिदं विश्वम् एवाग्निः पार्थिवोऽथ च ।
वैखानसर्षिभिस्तेन पवमान इति स्तुतः ॥ २ ९ ॥
और चूंकि यह पार्थिव अग्नि विश्व को पवित्र करती है , इसलिए ऋषि वैखानसने उसकी ‘ पवमान ‘ स्वरूप में स्तुति की है ॥२ ९ ॥
भूतानि वेद यज्जातो जातवेदाथ कथ्यते ।
यच्चैष जातविद्योऽभूद् वित्तं जातोऽधिवेत्ति वा ॥ ३० ॥
विद्यते सर्वभूतैर्हि यद्वा जातः पुनः पुनः ।
तेनैष मध्यभागेन्द्रो जातवेदा इति स्तुतः ॥ ३१ ॥
क्योंकि प्रादुर्भाव हो जाने पर अग्नि सभी प्राणियों को जान लेते हैं , इसलियेउन्हें ‘ जातवेदस् ’ भी कहा गया है और चूंकि अग्निदेव जातविद्य बने , जिसमें विद्या काजन्म हुआ , अथवा क्योंकि जन्म ग्रहण करने पर वह विशेष रूप से जान लेते हैं , अथवाबार – बार उत्पन्न होने पर सभी प्राणी उन्हें जान लेते हैं । इस प्रकार मध्यम स्थान के देवताइन्द्र की ही भांति इनकी भी ‘ जातवेदस् ‘ के रूप में स्तुति होती है।३०-३१ ॥
विशेष— ‘ जातवेदस् ‘ की पाँच व्युत्पत्तियाँ मानी गयी हैं । ये हैं – “जातविद्या: जातानि वेद , जातानि वा एनं विदुः , जाते जाते विद्यते जातवित्त ।”( निरुक्त , ७.११ ) ।
६. इन्द्र के छब्बीस नाम
अणिष्ठ एष यत्तु त्रीन् व्याप्यैको व्योम्नि तिष्ठति ।
तेनैनमृषयोऽर्चन्तः कर्मणा वायुमब्रुवन् ॥३२ ॥
जो अत्यन्त सूक्ष्म रूप से तीनों लोकों को व्याप्त करता हुआ वायुमण्डल मेंप्रतिष्ठित है । कर्म की दृष्टि से उसकी अर्चना करते हुए उसे ऋषिगण वायु कहते हैं ।। ३२ ।।
त्रीणीमान्यावृणोत्येको मूर्तेन तु रसेन यत् ।
तयैनं वरुणं शक्त्या स्तुतिष्वाहुः कृपण्यवः ॥ ३३॥
तीनों लोकों को जो जल से आच्छादित करते हैं , उन्हें उनके कर्म के कारणऋषिवृन्द स्तुतियों में वरुण के नाम से पुकारते हैं || ३३ ॥
विशेष — निरुक्त में ‘वरुण’ शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है— ‘वरुणोवृणोतीति सतः।’
अरोदोदन्तरिक्षे यद् विद्युद्वृष्टिं ददन्नृणाम् ।
चतुर्भिऋषिभिस्तेन रुद्र इत्यभिसंस्तुतः ॥३४ ॥
इन्द्रदेव ने अन्तरिक्ष लोक में गर्जन करते हुए , मानवों के लिये विद्युत् सहित वर्षा की , इसलिए चारों ऋषियों ने उनकी ‘रुद्र‘ के रूप में विशेष स्तुति की । ॥ ३४ ॥
विशेष — निरुक्त में ‘ रुद्र ’ शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार प्रदत्त है— “यद् अरोदीत् तद् रुद्रस्य रुद्रत्वम् ।” ( निरुक्त , १०.५ ) ।
यहाँ सन्दर्भित चार ऋषियों के नाम हैं— कण्व , कुत्स , गृत्समद तथा वसिष्ठ ( ऋग्वेद , १.४३ , १.११४ , २.३३ एवं ७.४६ ) ।
शिक्षालचतुर्विधानां भूतानां प्राणो भूत्वा व्यवस्थितः ।
ईष्टे चैवास्य सर्वस्य तेनेन्द्र इति स स्मृतः ॥ ३५ ॥
चार विविध प्राणियों के जीवन के क्रमबद्ध स्रोत के रूप में इन्द्र इस जगत् पर शासन करते हैं , इसलिए भी उनको इन्द्र नाम दिया गया है ॥ ३५ ॥
इरां दृणाति यत्काले मरुद्भिः सहितोऽम्बरे ।
रवेण महता युक्तस् तेनेन्द्रमृषयोऽब्रुवन् ॥३६ ॥
उन्होंने मरुतों के साथ संयुक्त होकर उचित समय पर घनघोर गर्जन के साथ आकाश में जलों को प्रकट किया , अतः ऋषियों के द्वारा इन्हें इन्द्र के रूप में भी सम्बोधित किया गया है ॥ ३६ ॥
७. पर्जन्य , बृहस्पति , ब्रह्मणस्पति , क्षेत्रपति तथा ऋत अभिधान
यदिमां प्रार्जयत्येको रसेनाम्बरजेन गाम् ।
कालेऽत्रिरौर्वशश्चर्षी तेन पर्जन्यमाहतुः ॥३७ ॥
केवल वही उचित समय पर आकाश में उत्पन्न नमी इस पृथिवी को देते हैं , अतः उन्हें अत्रि ऋषि और ऋषि वसिष्ठ के द्वारा ‘पर्जन्य’ नाम से भी संबोधित किया गया है ॥३७ ॥
विशेष — प्रस्तुत श्लोक और निरुक्त में प्रतिपादित पर्जन्य विषयक व्युत्पत्तियों में उपलब्ध साम्य है , यथा— “पर्जन्यस् तृपरे आद्यन्तविपरीतस्य तर्पयिता जन्य:, परो जेता वा जनयिता वा, प्रार्जयिता वा रसानाम् ।” ( निरुक्त , १०.१० ) ।
तर्पयत्येष यल्लोकाञ् जन्यो जनहितश्च यत् ।
परो जेता जनयिता यद्वाग्नेयस्ततो जगौ ॥ ३८ ॥
इन्द्र तीनों लोकों में प्रसन्नता प्रदान करने वाला है और सभी प्राणियों का हितचिन्तक भी है । अथवा वह परम विजेता या जनयिता है , अतः कुमार आग्नेय ने उनकी पर्जन्य के रूप में स्तुति की है || ३८ ॥
बृहन्तौ पाति यल्लोकाव् एष द्वौ मध्यमोत्तमौ ।
बृहता कर्मणा तेन बृहस्पतिरितीळितः ॥ ३ ९ ॥
इन्द्र के द्वारा दो बृहत् , मध्यम और उच्चतम लोकों की रक्षा की जाती है , अतः इस महान् कर्म के कारण इन्हें बृहस्पति भी कहा जाता है ।। ३ ९ ॥
ब्रह्म वाग् ब्रह्म सत्यं च ब्रह्म सर्वमिदं जगत् ।
पातारं ब्रह्मणस्तेन शौनहोत्र स्तुवञ्जगौ ॥४० ॥
वाणी ब्रह्म है और सत्य भी ब्रह्म है , यह अखिल संसार भी ब्रह्म माना गया है , अतः शौनहोत्र ( ऋषि गृत्समद ) ने स्तुति करते हुए उन्हें ब्रह्म का रक्षक कहा है ॥४० ॥
विशेष — यहाँ ‘ब्रह्म का रक्षक’ का अभिप्राय ‘ब्रह्मणस्पति’ से है “ब्रह्मणस्पतिर्ब्रह्मणः पाता वा पालयिता वा ।” ( निरुक्त , १०.१२ )
अन्नं क्षितिभ्यो विदधद् यदृतुष्वविशत्क्षितौ ।
तेनैनमाह क्षेत्रस्य वामदेव स्तुवन्पतिम् ॥४१ ॥
क्योंकि वह उचित समय पर पृथिवी में प्रविष्ट होकर भूमण्डल के निवासियों को अन्न प्रदान करते हैं , अतः उनकी स्तुति करते हुए ऋषि वामदेव ने उन्हें ‘क्षेत्रों के अधिपति’ की संज्ञा प्रदान की ॥४१ ॥
विशेष — ‘क्षेत्रपति’ शब्द का अभिप्राय स्पष्ट करते हुए यास्क का निरुक्त मेंकथन है—‘क्षेत्रस्य पतिः’ क्षेत्रं क्षियतेर् निवासकर्मणस्, तस्य पाता वा पालयिता वा ।( १०.१३ )
मनसेमं तु यद्दृश्यं मध्यमं लोकमाश्रितम् ।
शंसत्सत्येन सत्ये वै स एष स्तुतवानृतम् ॥ ४२ ॥
क्योंकि उन्होंने उसको प्रकट किया था , जो मध्यम स्थान से सम्बद्ध होते हुए ,सत्य स्वरूप में सत्य के द्वारा मात्र मन से जाना जा सकता है , अतः वामदेव ऋषिके द्वारा इनके ऋत स्वरूप की स्तुति की गयी ॥४२ ॥
विशेष – निरुक्तकार ने ‘ ऋत ‘ का निर्वचन किया है ‘सत्यं वा यज्ञं वा ।’
रवेणान्तारसैः क्षिप्तै स्थितो व्योम्न्येष मायया ।
ऋतस्य श्लोक इत्येष पुनश्चैनं ततोऽब्रवीत् ॥४३ ॥
इन्द्र अपनी मायावी शक्ति के द्वारा गर्जना के साथ वर्षा करने वाली आन्तरिक नमी के साथ आकाश में रहता है , अतः ऋषि वामदेव ने पुनः उन्हें ‘ऋत–श्लोक’ कहा है | ४३ ॥
८. वास्तोष्पति , वाचस्पति , अदिति तथा यम प्रभृति अभिधान
वास्तु प्रयछंल्लोकस्य मध्यमः स तु पाति यत् ।
तेन वास्तोष्पतिं प्राह चतुर्भिरिममौर्वशः ॥४४ ॥
क्योंकि वह मध्यम स्थान में स्थित है, जिसके कारण वह जगत् में आवास प्रदान करता है । साथ ही उसकी रक्षा भी करता है , अत : उर्वशी पुत्र (वसिष्ठ) ने उन्हें चार मन्त्रों में ‘वास्तोष्पति’ संज्ञा प्रदान की है ॥४४ ॥
विशेष — निरुक्त में ‘वास्तोष्पतिर्’ के सम्बन्ध में व्युत्पत्तिपूर्वक कहा गया है— “वास्तु वसतेः निवासकर्मणस्, तस्य पाता वा पालयिता वा ।”
वाचा वेदा ह्यधीयन्ते वाचा छन्दांसि तत्र ह ।
अथो वाक् सर्वमेवेदं तेन वाचस्पति स्तुतः ॥ ४५ ॥
इन्द्र की ‘वाणी के अधिपति’ के रूप में स्तुति की जाती है, क्योंकि वेदों का वाणी के द्वारा ही ग्रहण और उनके छन्दों का वाणी के द्वारा ही उच्चारण किया जाता है । इसी कारण इस वाणी को विश्वरूप कहा गया है ।॥ ४५ ॥।
न कुतश्चन यद्दीनो वृत्वा तिष्ठति मध्यमः ।
राहूगण ऋषिस्तेन प्राहैनं गोतमोऽदितिम् ॥४६ ॥
यह संसार को आच्छादित करते हुए मध्यम स्थान में रहता है और यह किसी भी दिशा से दीन – हीन नहीं है , इसीलिए राहूगण गौतम ऋषि के द्वारा इन्हें अदिति कहा गया है ॥ ४६ ॥
प्रजाभ्यस्त्वेष यच्छर्म कमिछन्मनसा सुखम् ।
हिरण्यगर्भस्तेनैनम् ऋषिरर्चन्नुवाच कम् ॥४७ ॥
लेकिन वह प्राणियों के भी रक्षक हैं और अपने अन्तःकरण में प्राणियों के सुख की कामना करते हैं , अतः ऋषि के द्वारा उनकी उपासना करते हुए उन्हें ‘क’ सम्बोधित किया गया है ॥४७ ॥
विशेष — यहाँ ‘ क ‘ का अभिप्राय ‘ सुख ‘ से है – “ कः कमनो वा क्रमणो वा सुखो वा । ” ( निरुक्त , १०.२२ ) ।
इह प्रजाः प्रयछन्स संगृहीत्वा प्रयाति च ।
ऋषिर्विवस्वतः पुत्रं तेनाहैनं यमो यमम् ॥ ४८ ॥
यहाँ ( यम ) का सन्तान देने वाला स्वरूप वर्णित है और उन सन्तानों को एकत्र करके दूसरे लोक में वे ले जाते हैं , अतः यम ऋषि उन्हें विवस्वान् – पुत्र ‘यम’ कहते हैं । ४८ ॥
विशेष— इसी प्रकार के सन्दर्भ निरुक्त में भी हैं— “ यमो यछतीति सतः ।” ( निरुक्त , १०.१ ९ )“ अग्निर् अपि यम उच्यते । ” ( निरुक्त , १०.२० ) ।
९ . मित्र , विश्वकर्मा , सस्वत् , वेन तथा मन्यु
मित्रीकृत्य जना विश्वे यदिमं पर्युपासते ।
मित्र इत्याह तेनैनं विश्वामित्र स्तुवन्स्वयम् ॥४ ९ ॥
क्योंकि सभी मनुष्य उन्हें अपना मित्र मानकर उनकी उपासना करते हैं , अतः स्वयं विश्वामित्र भी उनकी स्तुति करते हुए उन्हें मित्र ही सम्बोधित करते हैं ॥४ ९ ॥
निदाघमासातिगमे यदृतेनावति क्षितिम् ।
विश्वस्य जनयन्कर्म विश्वकर्मेष तेन सः ॥५० ॥
क्योंकि गर्मी के महीनों के बीत जाने पर वह भूमि को जल से संतुष्ट कर देतेहैं, साथ ही सभी वस्तुओं में क्रियाशीलता उत्पन्न कर देते हैं, अत : उन्हें विश्वकर्मा भी कहा गया है।॥५० ॥
विशेष – निरुक्त में ‘विश्वकर्मा’ का अभिप्राय है— ‘विश्वकर्मा सर्वस्य कर्ता’ सब कुछ करने वाले ( निरुक्त , १०.२५ ) ।
सरांसि घृतवन्त्यस्य सन्ति लोकेषु यत्त्रिषु ।
सरस्वन्तमिति प्राह वाचं प्राहुः सरस्वतीम् ॥५१ ॥
सरस्वत के पास तीनों लोकों में घी से व्याप्त सरोवर हैं , इसीलिए ऋषिगणउन्हें सरस्वत और ‘ वाक् ‘ को सरस्वती कहते हैं । ५१ ॥
प्राणभूतस्तु भूतेषु यद्वेनत्येषु तिष्ठति ।
तेनैनं वेनमाहर्षिर् वेनो नामेह भार्गवः ॥५२ ॥
भूतों में प्राण स्वरूप होने तथा गतिशील होने के कारण वेन भार्गव नामकऋषि ने उन्हें वेन कहा है ॥५२ ॥
विशेष — यास्क ने ‘इच्छा करने’ के अर्थ में ‘वेन‘ शब्द की, ‘वेन’ क्रिया से व्युत्पत्ति बतलाई है — ‘वेनतेः कान्तिकर्मणः ।‘
आर्षानुक्रमणी में इस सन्दर्भ में कहा गया है – ‘वेनो नाम भृगो: सुत:।’ ( आर्षानुक्रमणी , १०.६० )
ससृजे मासि मास्येनम् अभिमत्य तपोऽग्रजम् ।
तेनैनं मन्युरित्याह मन्युरेव तु तापसः ॥५३ ॥
इच्छा करते हुए अग्रज तप ने उनका प्रतिमास सृजन किया था , अतः मन्युतापस ने उन्हें ‘मन्यु‘ संज्ञा से सम्बोधित किया।॥५३ ॥
विशेष — यास्क की दृष्टि में ‘मन्यु’ शब्द का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है— “मन्युर्मन्यतेर् दीप्तिकर्मणः क्रोधकर्मणो वर्धकर्मणो वा । ” ( निरुक्त , १०.२ ९ ) ।
१०. असुनीति , अपां नपात् , दधिक्रा , धाता तथा तार्क्ष्य
यदन्तकाले भूतानाम् एक एव नयत्यसून् ।
तेनासुनीतिरुक्तोऽयं स्तुवता श्रुतबन्धुना ॥ ५४ ॥
मनुष्य की मृत्यु होने के पश्चात् उसकी आत्मा ही उसका मार्ग – निर्देशन कर सकती है , अत: इनकी स्तुति करने वाले श्रुतबन्धु ऋषि ने इन्हें ‘असुनीति’ कहा है ॥५४॥
विशेष — महर्षि यास्क के अनुसार ‘असुनीतिर्’ का अभिप्राय है — ‘असुनीतिर्असून् नयति ।’ ( निरुक्त, १०.३९ ) ।
निदाघमासातिगमे जन्म मध्ये भवत्यपाम् ।
नप्तारमाह तेनैनम् ऋषिर्गृत्समद स्तुवन् ॥५५ ॥
गर्मी के महीनों के बीत जाने के पश्चात् जल के मध्य इनका जन्म होता है । इसी कारण गृत्समद ऋषि ने उनकी स्तुति करते समय उन्हें जल का पुत्र (नप्तारम्) कहा है ।॥ ५५ ॥
अपामम्बरगर्भोघम् आदधत्सोऽष्टमासिकम् ।
यत्क्रन्दत्यसकृन्मध्ये दधिक्रास्तेन कथ्यते ॥५६ ॥
चूँकि वह आठ महीनों तक आकाश में जलराशि को धारण किये रखते हैं और कभी-कभी उनके मध्य गरजते भी हैं , इसीलिए उन्हें ‘दधिक्रा‘ कहा जाता है।॥५६ ॥
धारण-पोषण अर्थ वाली ‘धा’ धातु से यह शब्द निष्पन्न है । ‘क्रा’ शब्द काअर्थ बतलाया गया है — क्रमण या क्रन्दन ।
विशेष — तदनुसार निरुक्त में ‘दधिक्रा’ शब्द की व्युत्पत्ति दी गई है — ‘दधत्क्रामतीति वा दधत् क्रन्दतीति वा दधदाकारी भवतीति वा ।’ ( निरुक्त , २.२७ ) ।
मासेन संभृतं गर्भं नवमेनाथ मासिकम् ।
स्वयं क्रन्दन्दधात्युर्व्या धातेत्यृग्भिः स गीयते ॥५७ ॥
स्वयं गर्जना करते हुए नवें मास में धाता विकसित गर्भ को एक मास तकपृथिवी में स्थापित रखते हैं । इसीलिए ऋग्वेद में उनका ‘धाता ‘ के रूप में ऋचाओं के अन्तर्गत उल्लेख है ।५७ ||
स्तीर्णेऽन्तरिक्षे क्षियति यद्वा तूर्णं क्षरत्यसौ ।
अरिष्टनेमिस्तार्क्ष्यर्षिस् तार्क्ष्यं तेनैवमुक्तवान् ॥ ५८ ॥
यह विस्तीर्ण अन्तरिक्ष में निवास करते अथवा उसमें शीघ्रता से खिसकतेरहते हैं, इसी कारण अरिष्टनेमि तार्क्ष्य के द्वारा उन्हें ‘तार्क्ष्य‘ की संज्ञा प्रदान कीगई।।५८ ।।
विशेष—तार्क्ष्य गरुड़ का पर्याय अथवा नामान्तर है , जैसा कि अमरकोश में उल्लेख है — ‘गरुत्मान् गरुडस्तार्क्ष्यो वैनतेयः खगेश्वर:’ ( प्रथम काण्ड ) । निरुक्त ( १०.२७ ) के अनुसार वे मार्ग को अतिशीघ्र ( अपनी तीव्र गति से ) व्याप्त कर लेते हैं , वहाँ उन्हें ‘त्वष्टा’ भी कहा गया है ।
११. पुरूरवा , मृत्यु तथा सूर्य के सविता एवं भग नाम
रुवन्व्योम्न्युदयं याति कृन्तत्राद्विसृजन्नपः ।
पुरूरवसमाहैनं स्ववाक्येनोरुवासिनी ॥ ५ ९ ॥
आकाश में गर्जना के साथ वह सूर्योदय की ओर आगे बढ़ते हुए विदीर्ण गर्तसे वर्षा करते हैं , अत: उर्वशी अपने शब्दों में उन्हें पुरूरवस् नाम से सम्बोधित करतीहै ।॥ ५ ९ ॥
विशेष — ऋग्वेद के संवाद सूक्तों में पुरूरवा और उर्वशी के संवाद का सूक्तभी सुचर्चित है ।
वेद में इतिहास न मानने वाले इसकी व्युत्पत्ति पुरु ( बहुत ) + रव ( गर्जना करना ) के रूप में करते हुए मेघ अर्थ करते हैं । निरुक्त भी शब्दों की प्राकृतिक व्याख्या का पक्षधर है। प्रचलित लौकिक व्युत्पत्ति भी इसकी इस प्रकार है – “पुरु प्रचुरं यथा स्यात्तथा रोति ।” कालान्तर से पुरूरवा और उर्वशी के प्रेमाख्यान पर संस्कृत में साहित्य – सर्जना हुई ।
यत्तु प्रच्यावयन्नेति घोषेण महता मृतम् ।
तेन मृत्युमिमं सन्तं स्तौति मृत्युरिति स्वयम् ॥६० ॥
नाम्ना संकुसुको नाम यमपुत्रो जघन्यजः ।
क्योंकि वह बहुत अधिक घोष के साथ मृत व्यक्तियों को ले जाते हैं , इसीलिए संकुसुक नामक यम के कनिष्ठ पुत्र स्वयं मृत्यु के स्वरूप में उनकी स्तुति करते हैं ।। ६०-६०.५ ॥
संवर्तयंस्तमः सूर्याद् उषसं च प्रवर्तयन् ॥६१ ॥
दिवाकरं प्रसौत्येकः सविता तेन कर्मणा ।
उदितो भासयंल्लोकान् इमांश्चैष स्वरश्मिभिः ।
स्वयं वसिष्ठस्तेनैनम् ऋषिराह स्तुवन्भगम् ॥६२ ॥
अंधकार को सूर्य के प्रकाश से भगाते हुए एवं ऊषा को प्रकट करते हुए एकमात्र वह ही सूर्य की रश्मियों को आगे बढ़ाते हैं , उनके इस कार्य के कारण ही उन्हें सविता कहा गया है और वह अपनी किरणों से इन लोकों को चमक प्रदान करते हुए उदित हुए हैं स्वयं ऋषि वसिष्ठ के द्वारा उन्हें ‘भग’ (ऐश्वर्यसम्पन्न) कहा गया है।
विशेष — निरुक्त ( १०.३१ ) गत ‘ सविता सर्वस्य प्रसविता ‘ – इस निरुक्ति का प्रभाव बृहद्देवता पर सुस्पष्ट है । आगे ‘रात्रेर्जरयिता स एव भासाम्’ (निरुक्त , १२.१४) के रूप में भी ‘सूर्य’ की प्रशस्ति यास्क ने की है ।
१२. पूषा , विष्णु , केशी , विश्वानर तथा वृषाकपि
पुष्यन् क्षितिं पोषयति प्रणुदन् रश्मिभिस्तमः ।
तेनैनमस्तौत्पूषेति भरद्वाजस्तु पञ्चभिः ॥६३ ॥
पूषा पृथिवी को पोषण प्रदान करते हुए आयु को बढ़ाते हैं और अपनी किरणों के द्वारा अन्धकार को तिरोहित करते हैं , अतः महर्षि भरद्वाज के द्वारा ( ऋग्वेद के ) पाँच सूक्तों में उनकी ‘पूषन्‘ के रूप में स्तुति की गई है || ६३ ॥
विशेष – यास्क की दृष्टि में ‘पूषन्’ का अभिप्राय है — ‘ यद् रश्मिपोषं पुष्यति तत् पूषा भवति । ‘
द्वितीय अध्याय ३७
त्रीणि भान्ति रजांस्यस्य यत्पदानि तु तेजसा ।
तेन मेधातिथिः प्राह विष्णुमेनं त्रिविक्रमम् ॥ ६४ ॥
तीनों लोक विष्णु के पादों के रूप में प्रकाशित होते हैं । अत : मेधातिथि ने उन्हें तीन पाद प्रक्षेप करने वाले ‘विष्णु‘ का स्वरूप कहा है || ६४ || (त्रिविक्रम)
विशेष — वेदों में तीनों लोकों का तात्पर्य अन्तरिक्ष , पृथिवी और द्युलोक है ।
कृत्वा सायं पृथग्याति भूतेभ्यस्तमसोऽत्यये ।
प्रकाशं किरणैः कुर्वंस् तेनैनं केशिनं विदुः ॥६५ ॥
प्राणियों के लिये अपनी किरणों से प्रकाश बिखेरते हुए , अन्धकार के समाप्त हो जाने पर , सायंकाल ( विष्णु ) पृथक् चले जाते हैं । इस कारण उन्हें ‘ केशी ‘ नाम से ( भी ) जाना जाता है ॥६५ ॥
विशेष— ‘ केशी ‘ विष्णु का पर्याय है । ‘ केश ‘ का अभिप्राय है — रश्मियाँ । ‘ केशिन् ’ का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ निरुक्त में इस प्रकार है — ‘ केशी , केशा रश्मयस् , तै : तद्वान् भवति , काशनाद् वा प्रकाशनाद् वा । ‘ वेद के अनेक मन्त्रों में विष्णु और सूर्य में अभेद दिखलाई देता है ।
संप्रत्येकैकशस्त्वेनं यन्मन्यन्ते पृथङ्नराः ।
विश्वे विश्वानरस्तेन कर्मणा स्तुतिषु स्तुतः ॥६६ ॥
सभी मनुष्य अपनी – अपनी बुद्धि के अनुसार और अलग – अलग उनके सम्बन्ध में ही विचार करते हैं , अतः इस प्रकार की कार्यशैली के कारण उनकी विश्वानर नाम से स्तुति की जाती है || ६६ ॥
वृषैष कपिलो भूत्वा यन्नाकमधिरोहति ।
वृषाकपिरसौ तेन विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ।
रश्मिभिः कम्पयन्नेति वृषा वर्षिष्ठ एव सः ॥६७ ॥
सायाह्नकाले भूतानि स्वापयन्नस्तमेति यत् ।
वृषाकपिरितो वा स्याद् इति मन्त्रेषु दृश्यते ॥ ६८ ॥
त्रिषु धन्वेति हीन्द्रेण प्रयुक्तो वारिषाकपे ।
क्योंकि एक कपिल का रूप धारण करके यह आकाश में ऊपर चढ़ते हैं , अतः ‘ विश्वस्मान्दिन्द्र उत्तर : ‘ ( ऋ ० सं ० , १०.८६.२ ) ऋचा में यह ‘ वृषाकपि ‘ के रूप में उल्लिखित है । अथवा यह उच्चतम वृषभ अपनी रश्मियों से कम्पित करते हुए जाते हैं , क्योंकि सायंकाल यह प्राणिमात्र को प्रसुप्त करते हुए अपने घर जाते हैं । इसी कारण इनका ‘ वृषाकपि ‘ नाम इस कर्म से भी व्युत्पन्न माना जा सकता है ।
‘वृषाकपि – सूक्त’ की ‘धन्व’ से प्रारम्भ होने वाली ऋचाओं में इन्द्र ने इनकी स्तुति इसी प्रकार की है।।६७-६८ ॥
विशेष — ‘ वृषाकपि ‘ शब्द कहीं सूर्य , कहीं विष्णु , कहीं अग्नि और कहीं इन्द्र के विशेषण के रूप में प्रयुक्त है ।
१३. विष्णु का प्राकट्य
विष्णातेर्विशतेर्वा स्याद् वेवेष्टेर्व्याप्तिकर्मणः ।
विष्णुर्निरुच्यते सूर्यः सर्वं सर्वान्तरश्च यः ॥६ ९ ॥
यहाँ पर ‘ विष्णु ’ शब्द की व्याख्या व्याप्ति के आधार पर ( विभिन्न धातुओं से ) हुए कहा गया है कि अपने व्यापनशील स्वरूप को अभिव्यक्त करते हुए ‘ विष्णु ’ नाम ‘ विष् ’ ( विष्णाति ) अथवा ‘ विश् ‘ ( विशति ) अथवा ‘ वेविष् ‘ ( वेवेष्टि ) धातु से व्युत्पन्न है । इसी कारण विष्णु की उस सूर्य के रूप में व्याख्या की गई है जो सब कुछ और सब में व्याप्त है || ६ ९ ॥
विशेष — निरुक्त में भी विष्णु के सन्दर्भ में यही भाव प्राप्य है— “ अथ यद् विषितो भवति तद् विष्णुर् भवति , विष्णुर् विशतेर वा व्यश्नोतेर् वा । ”
पञ्च षड्विंशतिश्चैव यानि नामानि सप्त च ।
सम्यगग्नीन्द्रसूर्याणां तान्युक्तानि यथाक्रमम् ॥ ७० ॥
इस प्रकार अग्नि के पाँच , इन्द्र के छब्बीस तथा सूर्य के सात नामों का क्रमश : कथन किया गया है ।। ७० ॥
नैपातिकानां नाम्नां तु प्रागुक्तैर्नामलक्षणैः ।
संपन्नानां पृथक्त्वेन परिसंख्या न विद्यते ॥ ७१ ॥
लेकिन पूर्व में बतलाये गये नामों पर आधृत लक्षणों के साथ प्राप्त होने वाले नैपातिक ( आकस्मिक ) नामों की अलग से गणना उपलब्ध नहीं है ॥७१ ॥
विशेष— इन्द्र की ‘ वृत्रहा ‘ उपाधि इसी प्रकार की अर्थात् नैपातिक है । इन आकस्मिक विशेषणों की संख्या इतनी अधिक है कि उनकी गणना नहीं की जा सकती है । यही अवधारणा निरुक्त में भी व्यक्त की गयी है ।
“ अभिधानैः संयुज्य हविश् चोदयतीन्द्राय वृत्रघ्न इन्द्राय वृत्रतुर इन्द्रायांहोमुच इति ; तान्यप्येके समामनन्ति , भूयांसि तु समाम्नानात् । ” ( निरुक्त ७.१३ )
१४. वाक् के त्रिविध रूप
पार्थिवी मध्यमा दिव्या वागपि त्रिविधा तु या ।
तस्याः सूक्तानि नामानि यथास्थानं निबोधत ॥७२ ॥
‘वाक्’ के भी पार्थिव , मध्यम और दिव्य तीन प्रकार के स्वरूप हैं । उनके स्थान के अनुसार नामों और सूक्तों का विवरण जानिए ( सुनिये ) ।। ७२ ।।
कृत्स्नं तु भजते सूक्तम् एषा नद्य स्तुता भुवि ।
यदा चैनं भजन्त्यापो यदा चौषधयो यदा ॥७३ ॥
ऐसी समस्त सामग्री को, जिसमें पृथिवी, नदियों, जलराशि और पौधों की स्तुतियाँ की गई हों, सम्पूर्ण रूप से इसके ही सूक्त समझना चाहिए।।७३ ।
अरण्यानी च रात्री च श्रद्धा चोषाः सरस्वती ।
पृथिवी चैव नामैषा भूत्वावर्चं भजन्ति च ॥७४ ॥
और जब यह अरण्यानी ( वनस्थली ) रात्रि , श्रद्धा , उषस् एवं पृथिवी और आप्वा के वर्णन में प्रयुक्त होती है , उस समय भी इन विविध नामों से ही इसकी स्तुति होती है ॥७४ ॥
विशेष— ‘आप्वा’ देवी का ही एक नाम है । निघण्टु ( ५.३ ) में इसका उल्लेख है ।
अग्नायी नामतोऽप्येषा भूत्वाग्नेयेषु केषुचित् ।
स्तुता निपातमात्रेण तत्र तत्रेह दृश्यते ॥७५ ॥
तथा जब यह अग्नायी हो जाती है उस समय ऋग्वेद में विभिन्न स्थानों पर अग्नि को अभिप्रेत सूक्तों में इसकी मात्र नैपातिक (आकस्मिक) स्तुति का ही विधान मिलता है ॥७५ ॥
मध्ये सत्यदितिर्वाक् च भूत्वा चैषा सरस्वती ।
समग्रं भजते सूक्तं त्रिभिरेव तु नामभिः ॥७६ ॥
इसी प्रकार जब मध्यम स्थानीय ‘वाक्’ के रूप में यह अदिति और सरस्वती हो जाती है , उस स्थल पर भी वह मात्र अपने तीन नामों से सम्पूर्ण सूक्त की अधिष्ठात्री होती है ॥७६ ॥
१५. वाक् के मध्यम स्थानीय रूप एवं उसके चार दिव्य स्वरूप
एषैंव दुर्गा भूत्वर्चं कृत्वा स्यात्सूक्तभागिनी ।
तन्नामानि यमीन्द्राणी सरमा रोमशोर्वशी ।
भवत्यग्र्या सिनीवाली राका चानुमतिः कुहूः ॥७७ ॥
अपने दुर्गा स्वरूप में और एक ऋचा का उच्चारण करती हुई यह सम्पूर्ण सूक्त की भागिनी होती है । इसके विविध नाम हैं— यमी , इन्द्राणी , उर्वशी । इसके अतिरिक्त यह सर्वप्रथम सिनीवाली, राका, अनुमति तथा कुहु स्वरूप में भी वर्णित है ।। ७७ ||
गौर्धेनुर्देवपत्न्योऽघ्न्या पथ्या स्वस्तिश्च रोदसी ।
नैपातिकानि ऋग्भाञ्जि येषां नामानि कानिचित् ॥ ७८ ॥
और इसके पश्चात् उल्लिखित हैं— गो, धेनु, देवपत्नियाँ, अघ्न्या, पथ्या, स्वस्ति तथा रोदसी ( द्यावापृथिवी )। जिस देवता का नाम आकस्मिक रूप से रहता है , वह केवल उस विशेष ऋचा का ही भागीदार होता है ॥७८ ॥
यदा तु वाग्भवत्येषा सूर्यामुं लोकमाश्रिता ।
तथा सूक्तमुषा भूत्वा सूर्या च भजतेऽखिलम् ॥७ ९ ॥
किन्तु जब यह वाक् सूर्या बन जाती है , तब यह दिव्य लोक को प्राप्त करती है , अत : ऊषस् और साथ ही साथ सूर्या के रूप में यह सम्पूर्ण सूक्त की भागिनी होती है ॥७ ९ ॥
विशेष — वस्तुतः दिव्य वाक् के प्रधान नामों में सूर्या की गणना होती है । इसी कारण सूर्या को एक और उषस् को अनेक सम्पूर्ण सूक्त समर्पित हैं ।
वृषाकपाय्यृचं भूत्वा सरण्यूर्द्वे च ते ध्रुवम् ।
निपातमात्रं भजते ध्रुवच्च पृथिवी सती ॥८० ॥
तथा जब उसको वृषाकपायी और सरण्यू कहा जाने लगता है , तब वह दोनों रूपों में नि:सन्देह ऋचा की भागिनी होती है । जब द्युवत् ( दिव्य स्थानीय ) और पृथिवी होती है तो वह केवल नैपातिक रूप में ही किसी ऋचा की भगिनी होती है ॥ ८० ॥
सूर्यामेव सतीमेतां गौरीं वाचं सरस्वतीम् ।
पश्यामो वैश्वदेवेषु निपातेनैव केवलाः ॥ ८१ ॥
हम देखते हैं कि जब यह वाक , सूर्या , गौरी और सरस्वती होती है तो इनके ये नाम केवल विश्वेदेवों की स्तुति करने वाले सूक्तों में मात्र नैपातिक ( आकस्मिक ) रूप में ही प्रकट होते हैं ।। ८१ ॥
१६. ऋषिकाओं के नामों के तीन वर्ग
घोषा गोधा विश्ववारा अपालोपनिषन्निषत् ।
ब्रह्मजाया जहूर्नाम अगस्त्यस्य स्वसादितिः ॥८२ ॥
इन्द्राणी चेन्द्रमाता च सरमा रोमशोर्वशी ।
लोपामुद्रा च नद्यश्च यमी नारी च शश्वती ॥८३ ॥
श्रीर्लाक्षा सार्पराज्ञी वाक् श्रद्धा मेधा च दक्षिणा ।
रात्री सूर्या च सावित्री ब्रह्मवादिन्य ईरिताः ॥ ८४ ॥
घोषा , गोधा , विश्ववारा , अपाला , उपनिषद् , निषद् , ब्रह्मजाया ( अर्थात् जुहू ) , अगस्त्य की बहन , अदिति , इन्द्राणी एवं इन्द्र की माता , सरमा , रोमशा , उर्वशी तथा लोपामुद्रा और नदियाँ , यमी एवं पत्नी शश्वती , श्री , लाक्षा , सार्पराज्ञी , वाक् , श्रद्धा , मेधा , दक्षिणा , रात्रि और सूर्या , सावित्री इन सभी को ऋषिका अथवा ब्रह्मवादिनी कहा गया है।।८२-८४ ।।
विशेष – उपनिषद् और निषद् दोनों की ‘ प्रधारयन्तु मधुनो घृतस्य ‘ से प्रारम्भ होने वाली खिलान्तर्गत सप्त ऋचाओं की दृष्टियों के रूप में मान्यता प्राप्त है ।
नवकः प्रथमस्त्वासां वर्गस्तुष्टाव देवताः ।
ऋषिभिर्देवताभिश्च समूदे मध्यमो गणः ॥८५ ॥
इन में से नौ के पहले वर्ग ने देवताओं की स्तुति की , मध्यम वर्ग ने ऋषियों तथा देवताओं से परस्पर बातचीत की ॥८५ ॥
आत्मनो भाववृत्तानि जगौ वर्गस्तथोत्तमः ।
उत्तमस्य तु वर्गस्य य ऋषिः सैव देवता ॥८६ ॥
इनके अन्तिम वर्ग ने अपने भाव वृत्त अर्थात् सृष्टिप्रक्रिया का गान किया । इस अन्तिम वर्ग में से किसी एक के द्वारा रचित सूक्त का जो ऋषि है , वह स्वयं देवता भी है ॥८६ ॥
१७. आत्म – स्तुतियों तथा संवादों के देवता
आत्मानमस्तौद्वर्गस्तु देवतां यस्तथोत्तमः ।
तस्मादात्मस्तवेषु स्याद् य ऋषिः सैव देवता ॥८७ ॥ १
इस प्रकार अन्तिम वर्ग के हर एक ऋषि ने देव स्वरूप में अपनी ही स्तुति की है । इसलिए आत्मस्तुति से सम्बद्ध जो भी ऋषि है , वह साथ ही साथ देवता भी है | ८७ ||
संवादेष्वाह वाक्यं यः स तु तस्मिन्भवेदृषिः ।
यस्तेनोच्येत वाक्येन देवता तत्र सा भवेत् ॥८८ ॥
( इस श्लोक में संवाद वाक्यों में किसे ऋषि समझना चाहिए और किसे देवता , इस सन्दर्भ में विचार व्यक्त किये गये हैं ) । ऋषि – जो वाक्यों का संवाद के रूप में उच्चारण करता है, उसको ही संवाद-वाक्यों के ऋषि की संज्ञा प्रदान की गई है ।
देवता – उस संवाद वाक्य के द्वारा जिसे सम्बोधित किया जाए, हमें उसे ही देवता समझना चाहिए । ८८ ॥
उच्चावचेषु चार्थेषु निपाताः समुदाहृताः ।
कर्मोपसंग्रहार्थे च क्वचिच्चौपम्यकारणात् ॥८ ९ ॥
निपातों के उच्च और निम्न , अर्थात् विभिन्न अर्थों के प्रयोग के उदाहरण प्राप्त होते हैं । कहीं वे क्रियाओं को पूर्णता प्रदान करने के लिए और कहीं उपमाओं के वाचकरूप ( —इव इत्यादि ) में व्यवहृत होते हैं ।। ८ ९ ॥
विशेष — निपातों के सन्दर्भ में इसी प्रकार का विवरण निरुक्त में भी प्राप्तहोता है — ‘अथ निपाता उच्चावचेष्वर्थेषु निपतन्ति अपि उपमार्थेऽपि कर्मोपसंग्रहार्थे ( निरुक्त , १.४ ) ।
ऊनानां पूरणार्था वा पादानामपरे क्वचित् ।
मिताक्षरेषु ग्रन्थेषु पूरणार्थास्त्वनर्थकाः ॥ ९ ० ॥
( कदाचित् ) निपातों का प्रयोग पादों को पूर्णता प्रदान करने के लिये किया जाता है । वे निपात जो केवल छन्दोबद्ध सन्दर्भों में अक्षरों की न्यूनाधिकता की दृष्टि से प्रयुक्त किये जाते हैं , वे प्रायः निरर्थक माने जाते हैं ।९० ॥
तुलनीय – ‘अथ ये प्रवृत्तेऽर्थेऽमिताक्षरेषु ग्रन्थेषु वाक्यपूरणा आगच्छन्ति, पदपूरणास् ते मिताक्षरेष्व् अनर्थकाः कम् ईम् इद् व् इति ।’ ( निरुक्त , १.१० ) ।
कमीमिद्विति विज्ञेया ये त्वनेकार्थकाश्च ते ।
इव न चिन्नु चत्वार उपमार्था भवन्ति ते ॥११ ॥
इस प्रकार के निपातों के अन्तर्गत ‘ कम् ‘ , ‘ ईम् ‘ ‘ इद् ‘ , ‘ वति ‘ इत्यादि प्रयुक्त होते हैं , परन्तु कुछ निपात ऐसे भी होते हैं , जिनके तात्पर्य भिन्न-भिन्न होते हैं । ‘ इव ‘ , ‘ न ‘ , ‘ चिद् ‘ एवं ‘ नु ‘ – ये चारों निपात उपमा के अर्थ को द्योतित करने के लिये प्रयोग किये जाते हैं॥९ १ ॥
विशेष — ‘ एते चत्वार उपमार्थे भवन्तीति । ‘ ( निरुक्त , १.४ ) ।
उपमार्थे नकारस्तु क्वचिदेव निपात्यते ।
मिताक्षरेषु ग्रन्थेषु प्रतिषेधे त्वनल्पशः॥९२
निपात के रूप में ‘न’ का उपमा के अर्थ में तो कभी-कभी ही प्रयोग मिलता है , लेकिन नकारात्मक अभिप्राय को व्यक्त करने के लिए ‘ न ‘ निपात प्रायः प्रयोग में आता है।९ २ ॥
विशेष – निरुक्तकार का भी यही कथन है–
‘नेति प्रतिषेधार्थीयो भाषायाम् , उभयम् अन्वध्यायं प्रतिषेधार्थीयः …….उपमार्थीयः ।’
इयन्त इति संख्यानं निपातानां न विद्यते ।
वशात्प्रकरणस्यैते निपात्यन्ते पदे पदे ॥९ ३ ॥
निपात कितने हैं , इसका सही – सही आकलन प्राप्त नहीं होता है । प्रकरण केअनुसार निपातों का पद – पद पर प्रयोग किया गया है ।। ९ ३ ।।
१८. उपसर्गों एवं लिङ्गों का स्वरूप
उपसर्गास्तु विज्ञेयाः क्रियायोगेन विंशतिः ।
विवेचयन्ति ते ह्यर्थं नामाख्यातविभक्तिषु ॥९ ४ ॥
क्रियाओं में युक्त उपसर्गों की संख्या बीस मानी जानी चाहिए । ये उपसर्ग संज्ञाऔर क्रिया की ( विभिन्न ) विभक्तियों में अर्थ में भिन्नता उत्पन्न कर देते हैं । ९ ४ ॥
अच्छ श्रदन्तरित्येतान् आचार्यः शाकटायनः ।
उपसर्गान् क्रियायोगान् मेने ते तु त्रयोऽधिकाः॥९ ५ ॥
आचार्य शाकटायन की दृष्टि में ‘अच्छ ‘, ‘श्रद्’ एवं ‘अन्तर’ ये तीनों क्रिया के साथ योग के कारण उपसर्ग माने गये हैं , साथ ही इनके साथ अन्य तीन भी आतेहैं ।। ९ ५ ॥
त्रीण्येव लोके लिङ्गानि पुमान् स्त्री च नपुंसकम् ।
नामसूक्तप्रयोगेषु वाच्यं प्रकरणं तथा ॥९ ६ ॥
इस लोक में तीन प्रकार के लिङ्ग ही प्रचलित हैं , जैसे पुल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग एवं नपुंसकलिङ्ग। संज्ञाओं (और सर्वनामों) के सन्दर्भ में इन्हीं तीन का प्रयोग विधेयहै ।। ९ ६ ॥
१ ९ . संज्ञा , सर्वनाम अर्थ एवं अन्वय
तेषां तु नामभिर्लिङ्गैर् ग्रहणं सर्वनामभिः |
कृताकृतस्य सदृशो गृहीतस्य पुनर्ग्रहः ॥९ ७ ॥
इन नामों का न केवल संज्ञाओं के रूप में अपितु लिङ्ग के माध्यम से भीउल्लेख हुआ है । सर्वनामों के द्वारा किसी पहले उल्लिखित संज्ञा का और इसी भांति किसी कृत या अकृत कार्य का भी बार – बार उल्लेख किया जाता है॥९ ७ ॥
पादसूक्तऋगर्धर्चनामान्यन्यानि यानि च।
सर्वे नामानि चैवाहुर् अन्ये चैवं यथा कथा ॥ ९ ८ ॥
सभी विद्वानों की मान्यता है कि श्लोकों , सूक्तों , ऋचाओं एवं आधी ऋचाओं में तथा साथ ही साथ अन्य स्थलों पर कहीं आने वाले अन्य नाम , संज्ञा कहलाते हैं । कुछ लोग परिस्थिति विशेष के अनुसार भी इन्हें ऐसा कहते हैं।।१८ ।।
प्रधानमर्थः शब्दो हि तद्गुणायत्त इष्यते ।
तस्मान्नानान्वयोपायैः शब्दानर्थवशं नयेत् ॥ ९९ ॥
शब्दों का तात्पर्य या आशय ही प्रधान होता है , क्योंकि प्रत्येक शब्द आशयके गुणों पर ही निर्भर है । इसी कारण विभिन्न उपायों के माध्यम से शब्दों को आशयके अन्तर्गत ही रखना चाहिए ।। ९९ ।।
अतिरिक्तं पदं त्याज्यं हीनं वाक्ये निवेशयेत् ।
विप्रकृष्टं च संदध्याद् आनुपूर्वी च कल्पयेत् ॥१०० ॥
वाक्य में ( आवश्यकता से अधिक या ) अतिरिक्त पदों का त्याग और न्यून पद को समाविष्ट किया जाना चाहिए । अत्यधिक दूर स्थित शब्द को समीप लाना चाहिए एवं उसके बाद शब्दों के क्रम को उचित रूप से व्यवस्थित करना चाहिए ।। १०० ।।
लिङ्गं धातुं विभक्तिं च संनमेत्तत्र तत्र च ।
यद्यत्स्याच्छान्दसं मन्त्रे तत्तत्कुर्यात्तु लौकिकम् ॥ १०१ ॥
लिङ्ग , धातु और विभक्ति का सन्निवेश उनके अपने – अपने स्थान पर हीअभिप्राय के अनुसार होना चाहिए । यदि किसी भी मन्त्र में जो कुछ भी वैदिक हो , उसे ( यथावश्यक ) लौकिक बना लेना चाहिए । १०१ ॥
२०. शब्द – विग्रह तथा समास के प्रकार
यावतामेव धातूनां लिङ्गं रूढिगतं भवेत् ।
अर्थश्चाप्यभिधेयः स्यात् तावद्भिर्गुणविग्रहः ॥ १०२ ॥
रूढि के अनुसार विशेष गुणों से युक्त और जो तात्पर्य को स्पष्ट कर सके , उन धातुओं के माध्यम से ही गुणों का स्वरूप निष्पन्न होता है ।। १०२ ॥
धातूपसर्गावयवगुणशब्द द्विधातुजम् ।
बढेकधातुजं वापि पदं निर्वाच्यलक्षणम् ॥१०३ ॥
दो धातुओं , बहुत – सी धातुओं अथवा एक धातु से निष्पन्न पद ध्वनि ( अथवा ) शब्द से युक्त होता है । इसमें धातु , उपसर्ग , अवयव और गुण उपस्थित रहते हैं ।। १०३ ॥
धातुजं धातुजाज्जातं समस्तार्थजमेव वा ।
वाक्यजं व्यतिकीर्णं च निर्वाच्यं पञ्चधा पदम् ॥ १०४ ॥
किसी भी पद की पाँच प्रकार से व्याख्या हो सकती है । जैसे —१ . किसी धातु से व्युत्पन्न होने पर , २. किसी धातु के व्युत्पन्न रूप से व्युत्पन्न होने पर , ३. किसी समासान्त प्रत्यय सहित व्युत्पन्न होने पर , ४. किसी वाक्य से व्युत्पन्न होने के रूप में तथा ५. जिसकी व्युत्पत्ति व्यतिकीर्ण ( मिश्रित , अस्तव्यस्त ) हो।।१०४ ।।
द्विगुर्द्वन्द्वोव्ययीभावः कर्मधारय एव च ।
पञ्चमस्तु बहुव्रीहिः षष्ठस्तत्पुरुषः स्मृतः ॥१०५ ॥
१. द्विगु , २. द्वन्द्व , ३. अव्ययीभाव , ४. कर्मधारय , ५. बहुब्रीहि और ६ .तत्पुरुष — ये छह प्रकार के समास होते हैं ।। १०५ ॥
विग्रहान्निर्वचः कार्यं समासेष्वपि तद्धिते ।
प्रविभज्यैव निब्रूयाद् दण्डार्हो दण्ड्य इत्यपि ॥१०६ ॥
समास और तद्धित पदों की विग्रह के अनुसार ही व्याख्या की जानी चाहिएअर्थात् पदों को पृथक् करके ही व्याख्येय हैं । यथा— दण्ड्य और दण्डार्ह ( दण्ड के योग्य ) , इन दोनों का एक ही अभिप्राय है।।१०६ ॥
२१. शब्दों का विग्रह तथा तज्जन्य अर्थ
भार्या रूपवती चास्य रूपवद्धार्य इत्यपि ।
इन्द्रश्च सोमश्चेत्येवम् इन्द्रासामौ निदर्शनम् ॥१०७ ॥
( किसी की ) पत्नी यदि रूपवती है , तो उसे ‘ रूपवदभार्य ‘ वाला भी कहा जासकता है । इसी के अनुसार इन्द्र और सोम के लिये प्रयुक्त ‘इन्द्रा-सोमौ’ ( इन्द्रश्च सोमश्च तौ ) द्वन्द्व समास का उदाहरण है । १०७ ॥
शब्दरूपं पदार्थश्च व्युत्पत्तिः प्रकृतिर्गुणः ।
सर्वमेतदनेकार्थं दशानवगमे होता गुणाः ॥१०८ ॥
शब्द के रूप , पद के अर्थ , प्रकृति , गुण तथा व्युत्पत्ति — इन सभी पाँचप्रकारों के अनेक अभिप्राय होते हैं । इसी प्रकार अनवगमन ( मिथ्या ग्रहण ) की स्थिति में व्याख्या के दस गुण स्वीकार किये गये हैं — पाँच शुद्ध और पाँच अशुद्ध ॥ १०८ ॥
सामान्यवाचिनः शब्दा विशेषे स्थापिताः क्वचित् ।
पलायने यथा वृत्तिः को नु मर्या इतीषते ॥ १० ९ ॥
कभी-कभी सामान्य अर्थ वाले शब्द भी किसी विशेष तात्पर्य के लिये प्रयोगकिये जाते हैं । उदाहरण के लिए ‘ईषते’ का सामान्य अर्थ ‘जाता है’ होता है , लेकिन ऋग्वेद के ‘ को नु मर्याः ‘ ( ऋग्वेद , ८.४५.३७ ) मन्त्र में ‘ ईषते ‘ का विशेष अभिप्राय ‘पलायन’ से है।।१०९ ॥
विशेषवाचिनस्त्वन्ये सामान्ये स्थापिताः क्वचित् ।
हिमेनाग्निमिति मन्त्रे हिमशब्दो निदर्शनम् ॥ ११० ॥
इसी प्रकार कभी – कभी कुछ अन्य विशेष अर्थ वाले शब्द भी सामान्य अर्थमें प्रयोग किये जाते हैं , यथा ‘ हिमेनाग्निम् ‘ ( ऋग्वेद , १.११६.८ ) मन्त्र में प्रयुक्त ‘ हिम ‘शब्द इसका उदाहरण है ।। ११० ।।
विशेष — यास्क ने इस मन्त्र की टिप्पणी करते हुए ‘हिमेन‘ शब्द की ‘उदकेन ग्रीष्मान्ते‘ व्याख्या प्रस्तुत की है (निरुक्त , ६.३६) । अभिप्राय यह कि ‘ हिम ’ शब्द का विशेष अर्थ है— बर्फ , लेकिन उद्धृतवाक्यांश में वह जल के लिये प्रयुक्त है ।
पदमेकं समादाय द्विधा कृत्वा निरुक्तवान् ।
पूरुषादः पदं यास्को वृक्षेवृक्ष इति त्वृचि ॥१११ ॥
ऋग्वेद के ‘वृक्षे-वृक्षे’ मन्त्र ( ऋग्वेद १०.२७.२२ ) में ‘पूरुषाद:’ जैसे एक पद को यास्क ने दो भागों में विभक्त करके व्याख्या की है । १११ ॥
विशेष — यास्क ने ‘ पुरुषादः ‘ की ‘ पुरुषान् अदनाय ‘ इस रूप में व्याख्या कीहै , जो ‘ पुरुषादः ‘ की ‘ पुरुष ‘ और ‘ अदः ‘ इन दो शब्दों में विभक्त करके की गयी व्याख्या है । उद्धृत प्रसंग में इसका औचित्य प्रतीत नहीं होता है ( निरुक्त , २.३६ ) ।
२२. अशुद्ध व्याख्या के कुछ अन्य स्थल
अनेकं सत्तथा चान्यद् एकमेव निरुक्तवान् ।
अरुणो मा सकृन्मन्त्रे मासकृद्विग्रहेण तु ॥११२ ॥
ऐसे ही ऋग्वेद की ऋचा ‘अरुणो मा सकृत्’ ( ऋग्वेद , १.१ ९ ५.१८ ) में एक अन्य व्याहृति दिखाई देती है — जो एक पद नहीं हैं , यास्क ने उनको भी ‘मास-कृत ‘ के रूप में ग्रहण करके, केवल एक पद के रूप में व्याख्या की है ।। ११२ ।।
विशेष — यास्क ने स्वयं टिप्पणी करते हुए ‘मास-कृत ‘ शब्द की ‘मासानां कर्ता’ के रूप में व्याख्या की है ।
पदव्यवायेऽपि पदे एकीकृत्य निरुक्तवान् ।
गर्भं निधानमित्येते न जामय इति त्वृचि ॥ ११३ ॥
‘न जामये’ ( ऋग्वेद , ३.३१.२ ) ऋचा में यास्क ने दो पदों ‘गर्भं निधानम्’ को एक पद बना कर ही व्याख्या की है, लेकिन इन दोनों के बीच में एक अन्य पद भी व्यवहृत होता है।।११३ ।।
विशेष — ऋग्वेद में इसकी व्याख्या ‘ गर्भं सनितुर निधानम् ‘ और यास्क के द्वारा ‘ गर्भनिधानीम् ‘ की गई है ।
पदजातिरविज्ञाता त्वः पदेऽर्थः शितामनि ।
स्वरानवगमोऽधायि वने नेत्यृचि दर्शितः ॥११४ ॥
यहाँ ‘त्वः’ पद में पद की श्रेणी ज्ञात नहीं होती है और न ही ‘शितामन्’ शब्दमें तात्पर्य ही प्रतीत होता है । इसी प्रकार ‘ अधायि ‘ में स्वर का अज्ञान ‘ वने न ’ ऋचा में प्रकट हुआ है।।११४ ||
विशेष — यास्क की दृष्टि में ‘ त्व ‘ भी निपात है , लेकिन वह इसको स्पष्ट रूपसे विकृत शब्द मानते हैं ( निरुक्त , १.८ ) ।
शुनःशेपं नराशंसं द्यावा नः पृथिवीति च ।
निरस्कृतेति प्रभृतिष्व् अर्थादासीत्क्रमो यथा ॥ ११५ ॥
जिस प्रकार ‘ शुन: शेपम् ’ , ‘ द्यावा नः पृथिवी ‘ , ‘ निरअस्कृत ‘ तथा अन्य में अर्थके अनुसार पदों का क्रम व्यवस्थित किया गया है।।११५ ॥
वर्णस्य वर्णयोर्लोपो बहूनां व्यञ्जनस्य च ।
अत्राणीति कपिर्नाभा दनो यामीत्यघासु च ॥११६ ॥
उसी प्रकार एक वर्ण, दो वर्णों और एक व्यञ्जन का भी लोप होता है ; जैसे अत्राणि ( ऋ ० सं ० १०.७ ९ .२ ) , कपिः ( वही, १०.८६.५ ) , नाभा:, दन: ( ऋ ०, १.१७४.२ ) , यामि और ‘ अघासु ‘ ( ऋ ० , १०.८५.१३ ) ।। ११६ ।।
२३. शब्द और अर्थ; क्रिया की भावप्रधानता
अर्थात्पदं स्वाभिधेयं पदाद्वाक्यार्थनिर्णयः ।
पदसंघातजं वाक्यं वर्णसंघातजं पदम् ॥ ११७ ॥
अर्थ से पद और उसके अभिधेय उत्पन्न होते हैं, पद से किसी वाक्य के अर्थका निर्णय होता है । वाक्यों का पदों के समूह से और पदों का वर्णों के समूह से निर्माण होता है।।११७ ॥
अर्थात्प्रकरणाल्लिङ्गाद् औचित्याद्देशकालतः ।
मन्त्रेष्वर्थविवेकः स्याद् इतरेष्विति च स्थितिः ॥ ११८ ॥
( पदों के ) अर्थ , प्रकरण , लिङ्ग , औचित्य तथा देश और काल के विचार से मन्त्र के सम्पूर्ण अर्थ का विवेचन किया जा सकता है । अन्य ( सन्दर्भों ) में भी यही नियम निर्धारित है।।११८ ॥
इति नानान्वयोपायैर् नैरुक्ते यो यतेत सः ।
जिज्ञासुब्रह्मणो रूपम् अपि दुष्कृत्परं व्रजेत् ॥११ ९ ॥
ब्रह्म स्वरूप वेद के स्वरूप का जो जिज्ञासु निरुक्तगत विविध उपायों द्वाराअध्ययन करता है , वह दुष्कर्मों से मुक्त होकर परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।।११९ ।
यथेतदमग्रे नैवासीद् असदप्यथवापि सत् ।
जज्ञे यथेदं सर्वं तद् भाववृत्तं वदन्ति तु ॥१२० ॥
बृहद्देवता ४८
जिस प्रकार आरम्भ में यह लोक अव्यक्त अथवा व्यक्त था । ( बाद में ) किस प्रकार इस विश्व का ( वर्तमान रूप में ) अस्तित्व हुआ , इस समस्त सृष्टितत्त्व को ‘भाववृत्त ‘ कहा जाता है ।। १२० ।।
भावप्रधानमाख्यातं षड्विकारा भवन्ति ते ।
जन्मास्तित्वं परीणामो वृद्धिर्हानं विनाशनम् ॥ १२१ ॥
भाव अर्थात् क्रिया प्रधानता आख्यात का प्रमुख लक्षण है और इसके छह विकार ( कार्य ) माने गये हैं— जन्म , अस्तित्व , परिणाम , वृद्धि , क्षय और विनाश ।। १२१ ॥
विशेष — इन षड्भावविकारों के नामों को यास्क ने निरुक्त में वार्ष्यायणि केमत के रूप में उद्धृत किया है— “ जायतेऽस्ति विपरिणमते वर्धतेऽपक्षीयते विनश्यतीति । ”
२४. व्याहृतियों और ओंकार के देवता
एतेषामेव षणां तु येऽन्ये भावविकारजाः ।
ते यथावाक्यमभ्यूह्याः सामर्थ्यान्मन्त्रवित्तमैः ॥ १२२ ॥
इन छह भावविकारों से जो अन्य विकारों ( कार्यों ) की उत्पत्ति होती है उनका ,मन्त्र तत्त्व को जानने वालों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार वाक्यों के अनुसार आकलन कर लेना चाहिए ।। १२२ ॥
विशेष — निरुक्तकार का भी यही मत है— “ ते यथावचनम् अभ्यूहितव्याः । ”( निरुक्त , १.३ ) ।
देवानां च पितॄणां च नमस्कारैस्तथैव च ।
अथ व्यस्तं समस्तं वा शृणु व्याहृतिदैवतम् ॥१२३ ॥
और इसी प्रकार उनकी , देवताओं तथा पितरों के प्रति नमस्कारों के स्वरूप के अनुसार भी , आकलन कर लेना चाहिए।।१२३ ।। का
अब अलग-अलग और सामूहिक स्वरूप से से व्याहृतियों के देवताओं के विषय में सुनिएव्याहृतियाँ तीन हैं — ‘भू , भुवः और स्वः ।’ इनका सामान्य अर्थ है पृथ्वी , अन्तरिक्ष और द्युलोक ।
व्याहृतीनां समस्तानां दैवतं तु प्रजापतिः ।
व्यस्तानामयमग्निश्च वायुः सूर्यश्च देवताः ॥१२४ ॥
सामूहिक दृष्टि से व्याहृतियों के देवता प्रजापति हैं , जबकि पृथक् – पृथक् इनके देवता क्रमश : अग्नि , वायु और सूर्य हैं । १२४ ॥
विशेष— “ समस्तानां प्रजापतिः ” ( सर्वानुक्रमणी , भूमिका , २.१० ) ।
वाग्देवत्योऽथवाप्यैन्द्रो यदि वा परमेष्ठिनः ।
ओंकारो वैश्वदेवो वा ब्राह्मो दैवः क एव वा ॥१२५ ॥
‘ ओङ्कार ’ शब्द की देवता ‘ वाक् ‘ है या यह इन्द्र को सम्बोधित है । इसी प्रकार या तो इसका देवता परमेष्ठी है अन्यथा यह विश्वेदेवों या ब्रह्म को अथवा साधारणरूप में देवताओं को सम्बोधित ‘क’ को भी इसके देवता के रूप में मान्यता प्रदान कीजाती है , जो प्रजापति का ही पर्याय है।।१२५ ॥
२५. ऋग्वेदीय देवता
आग्नेयं प्रथमं सूक्तं मधुछन्दस आर्षकम् ।
ज्ञेयाः सर्वेऽन्यदेवत्यास् तृचाः सप्तात उत्तराः ॥१२६ ॥
ऋग्वेद का पहला सूक्त अग्नि को सम्बोधित है , जिसके ऋषि मधुछन्दा हैं । इसके पश्चात् तीन – तीन ऋचाओं के सात त्रिक विभिन्न देवताओं को सम्बोधित हैं।।१२६ ॥
वायव्यः प्रथमस्त्वेषाम् ऐन्द्रवायव उत्तरः ।
मैत्रावरुणोऽथाश्विनोऽप्यैन्द्रोऽतो वैश्वदेवकः ॥ १२७ ॥
इनमें से पहले तीन वायुदेव को सम्बोधित हैं ( १.२, १-३ ) , तत्पश्चात् इन्द्र( २ , ४-६ ) वायु ( २ , ७ – ९ ) , मित्रावरुण , अश्विन देवता युग्म ( ३ , १-३ ) , इन्द्र ( ३ ,४-६ ) और विश्वेदेवों ( ३ , ७ – ९ ) को सम्बोधित हैं ।।१२७ ॥
तन्नामा विश्वलिङ्गो वा गायत्रोऽन्त्यस्तु यस्तृचः ।
बहुदैवतमन्यत्तु वैश्वदेवेषु शस्यते ॥ १२८ ॥
इसी प्रकार गायत्री छन्द में निबद्ध अन्तिम तीन ऋचाओं के मुख्य लक्षण मेंवह ‘ नाम ’ अथवा ‘ विश्व ‘ उल्लिखित है । लेकिन विश्वदेव सूक्तों के स्थान पर विभिन्नदेवताओं का सम्बोधन जिस सूक्त में हो , उसके माध्यम से भी स्तुति की जा सकतीहै।।१२८ ॥
विशेष — इन ऋचाओं में ‘ विश्वे देवासः ‘ पदों का उल्लेख प्रत्येक मन्त्र में होनेके कारण विद्वानों ने ‘ विश्व ‘ शब्द का प्रयोग इसके प्रमुख लक्षण के रूप में स्वीकारकिया है । वास्तव में , सभी देवों को एक साथ सम्बोधित करने के लिए भी ‘ विश्वेदेवाः ’का प्रयोग है । यास्क का मत है कि ‘ विश्वेदेवों ‘ को सम्बोधित ये ही ऋचाएँ मात्र गायत्रीछन्द में रची गई हैं । साथ ही वह यह भी कहते हैं कि विभिन्न देवताओं को सम्बोधितअन्य किसी भी सूक्त का पाठ विश्वेदेवों की स्तुति के सन्दर्भ में किया जा सकता है—
‘ यत् तु किं चिद् बहुदैवतं तद् वैश्वदेवानां स्थाने युज्यते । ‘ ( निरुक्त , १२.४० ) ।
कतिपय आधुनिक विद्वानों का मत है कि ‘ विश्वेदेवाः ‘ के रूप में देवताओं के गणविशेष का सन्दर्भ है ।
लुशे दुवस्यौ शार्याते गोतमेऽथ ऋजिश्वनि ।
अवत्सारे परुछेपे अत्रौ दीर्घतमस्पृषौ ॥१२९ ॥
वसिष्ठे नाभानेदिष्ठे गये मेधातिथौ मनौ ।
कक्षीवतिं विहव्ये च बहुष्वन्येष्वथर्षिषु ॥१३० ॥
अगस्त्ये बृहदुक्थे च विश्वामित्रे च गाथिनि ।
दृश्यन्ते विप्रवादाश्च तासु तासु स्तुतिष्विह ॥१३१ ॥
लशु, दुवस्यु, शार्यात, गोतम, ऋजिश्वा, अवत्सार, परुच्छेप, अत्रि ,दीर्घतमा , वसिष्ठ , नाभानेदिष्ठ , गय , मेधातिथि , मनु , कक्षीवत् , विहव्य एवं अन्य बहुत सारे ऋषियों तथा अगस्त्य , बृहदुक्थ , विश्वामित्र और गाथा गायकों प्रभृति समस्त ऋषियों की स्व – स्व स्तुतियों में विभिन्नताएँ परिलक्षित होती हैं ।। १२ ९ -१३१ ।।
२६. विश्वेदेव विषयक सूक्तों का स्वरूप
बह्वीनां संनिपातस्तु यस्मिन्मन्त्रे प्रदृश्यते ।
आचार्यौ यास्कशाण्डिल्यौ वैश्वदेवं तदाहतुः ॥१३२ ॥
यास्क एवं शाण्डिल्य नामक आचार्य भी यही कहते हैं कि कोई भी मन्त्र जसमें विविध देवता समाविष्ट हों , विश्वेदेवों को सम्बोधित किया जाता है।।१३२ ।।
पादं वा यदि वार्धर्चम् ऋचं वा सूक्तमेव वा ।
वैश्वदेवं वदेत्सर्वं यत्किंचिद्बहुदैवतम् ॥१३३ ॥
विभिन्न देवताओं को सम्बोधित श्लोक , आधी ऋचा , पूर्ण ऋचा अथवा सूक्त या जो भी सम्बोधन किया गया हो , वह सब कुछ विश्वेदेवों को ही सम्बोधित मानना चाहिए ।। १३३ ।।
ऋषिभिर्देवताः सर्वा विश्वाभि स्तुतिभि स्तुताः ।
संज्ञा तु विश्वमित्येषा सर्वावाप्तौ निपातिता ॥ १३४ ॥
सभी प्रकार के देवताओं की ऋषि विश्वदेव स्तुतियों के माध्यम से स्तुति करते हैं । इसलिये यहाँ ‘ विश्व ‘ संज्ञा का अभिप्राय आकस्मिक रूप से ‘ सर्वव्याप्तिता ‘ समझना चाहिए ।। १३४ ॥
२७. ऋग्वेद में सरस्वती को सम्बोधित प्रसङ्गः इन्द्रसूक्त
सारस्वतस्तु सप्तम एताः प्रउगदेवताः ।
सरस्वतीति द्विविधम् ऋक्षु सर्वासु सा स्तुता ॥ १३५ ॥
तीन ऋचाओं वाला सप्तम त्रिक सरस्वती के प्रति कहा गया है । सरस्वती की प्रतिष्ठा प्रउग देवी के रूप में है । इसकी सभी मन्त्रों में सरस्वती के नाम से दो प्रकार से स्तुति की गई है।।१३५ ।।
नदीवद्देवतावच्च तत्राचार्यस्तु शौनकः ।
नदीवन्निगमाः षट् ते सप्तमो नेत्यु वाच ह || १३६ ॥
इसका एक स्वरूप तो नदी के रूप में है और दूसरा देवी के रूप में । इससन्दर्भ में आचार्य शौनक कहते हैं कि नदी के रूप में सरस्वती की स्तुति छह स्थानोंपर की गई है , सातवें स्थान पर नहीं ॥ १३६ ॥
अम्ब्येका च दृषद्वत्यां चित्र इच्च सरस्वती ।
इयं शुष्पेभिरित्येतं मेने यास्कस्तु सप्तमम् ॥१३७ ॥
ये छह स्थल इस प्रकार हैं —१ . ‘ अम्बितमे ‘ ( ऋग्वेद , २.४१.६ ) , २. ‘ एका ‘( ऋग्वेद , ७.९ ५.२ ) , ३. ‘ दृषद्वत्याम् ‘ ( ऋग्वेद , ३.२३.४ ) , ४. ‘ चित्र इत् ‘ ( ऋग्वेद ,८.२१.१८ ) , ( ५ , ६ ) ‘ सरस्वती ‘ ( ऋग्वेद , १०.६४.९ और ६.५२.६ ) । किन्तु यास्क‘ इयं शुष्मेभिः ’ ( ऋग्वेद , ६.६१.२ ) को सातवाँ स्थल मानते हैं।।१३७ ।
विशेष — यास्क की दृष्टि में ‘ इयं शुष्मेभि ‘ मन्त्र स्पष्ट रूप से सरस्वती को सम्बोधित किया गया है — ‘ अथैतन नदीवत् ‘ ( निरुक्त , २.२३ ) ।
पशोः सारस्वतस्यैतां याज्यां मैत्रायणीयके ।
प्राधान्याद्धविषः पश्यन् वाच एवैतरोऽब्रवीत् ॥ १३८ ॥
इतरा के ऋषि पुत्र ने ‘ मैत्रायणीय ‘ संहिता में सरस्वती के प्रति समर्पित हविके लिये यह मन्त्र ‘ याज्या ‘ माना है और ‘ वाक् ‘ को सम्बोधित किया है , क्योंकि यहाँ‘ हवि ’ ही प्रमुख है।।१३८ ।।
विशेष — निघण्टु ( १.११ ) और निरुक्त ( ७.२३ ) दोनों में ही ‘ सरस्वती ‘ का वाक् के सत्तावन नामों में परिगणन है ।
सुरूपकृत्नुमित्यैन्द्रं सप्त चान्यान्यतः परम् ।
षळादह स्वधामनु मारुत्योऽनन्तरा ऋचः ॥ १३ ९ ॥
‘ सुरूपकृत्नुम् ’ सूक्त और इसके आगे के सात अन्य मन्त्र ( ऋग्वेद , १-४ , ५-११ ) सभी इन्द्र देवता को सम्बोधित हैं । इनमें से एक साथ छः मन्त्र ( ‘ आदह स्वधामनु ‘ऋग्वेद में १.६.४ – ९ से प्रारम्भ होने वाले मंत्र ) मरुतों को सम्बोधित हैं ।। १३ ९ ।।
२८. मरुद्गण के साथ संस्तुत इन्द्र
एका वीळु चिदिन्द्राय मरुद्भिः सह गीयते ।
तस्या एकान्तरायास्तु अर्धर्चोऽन्त्यो द्विदेवतः ॥१४० ॥
उक्त छ : मन्त्रों में से एक ‘ वीळुचित् ‘ ( ऋग्वेद , १.६.५ ) मन्त्र में मरुद्गणों५२ बृहद्देवताके साथ इन्द्र की प्रशंसा है । लेकिन इसके बाद वाले मन्त्र की आधी ऋचा ( ऋग्वेद ,१.६.७ ) दो देवताओं को सम्बोधित है।।१४० ॥
मरुद्गणप्रधानो हीत्थं चेन्द्रो विचिकित्सितः ।
मन्दू समानवर्चसा मन्दुना वा सवर्चसा ॥ १४१ ॥
चूंकि यह ऊपर कही गई आधी ऋचा मुख्य रूप से मरुद्गणों के प्रति हीहै , फिर भी इस मन्त्र में इन्द्र की विशेषता इस प्रकार प्रकट की गई है ” दोनों ही एकसमान तेज वाले हैं । ” ( मन्दू समानवर्चसा ) ; अथवा इसका अभिप्राय है— “ उसके साथ जो समान तेज वाला है ” ॥१४१ ॥
मन्दू इति प्रगृह्णन्ति येषामेव द्विदेवतः ।
एकदेवत्यमाश्राव्यो विज्ञायाध्ययनात्पदम् ॥१४२ ॥
जिन्हें यह आधी ऋचा दो देवताओं को सम्बोधित प्रतीत होती है , वह ‘ मन्दू ’की ‘ प्रगृह्य ‘ के रूप में व्याख्या करते हैं । परन्तु जो स्वाध्याय की दृष्टि से इस पाद मेंन देवता ही स्वीकार करते हैं , उनके पक्ष को भी समझना चाहिए ।। १४२ ।।विशेष — यहाँ पर दो देवों से तात्पर्य ‘ इन्द्र ‘ एवं मरुद्गणों से है ।
रोदसी देवपत्नीनाम् अथर्वाङ्गिरसे यथा ।
मरुद्गणप्रधानेयम् आचार्याणां स्तुतिर्मता ॥ १४३ ॥
जिस प्रकार अथर्ववेद में रोदसी को देवताओं की पत्नियों में से एक के रूप में मान्यता दी गई है , उसी प्रकार इस स्तुति को आचार्यों ने मरुद्गणों को ही सम्बोधितमाना है।।१४३ ॥
विशेष — यास्क ने ‘ रोदसी ‘ की ‘ रुद्रस्य पत्नी ‘ के रूप में व्याख्या की है । यों सामान्यतः यह शब्द द्यावापृथिवी का वाचक माना जाता है ।
मरुद्गणप्रधानत्वाद् इन्द्रस्तु विचिकित्सितः ।
मरुद्गणं महेन्द्रस्य समांशं सकलं विदुः ॥ १४४ ॥
यहाँ मुख्य रूप से मरुद्गणों के प्रति ही सम्बोधन है । मरुद्गणों का इन्द्र के साथ विभेद बतलाते हुए यह भी कहा गया है कि सभी मरुत्गण महान् इन्द्र के अंश के रूप में ही मान्य हैं ।। १४४ ॥
२ ९ . ऋग्वेद ( १.१२ ) तथा आप्रीसूक्त ( १.१३ ) के देवता
अग्निमित्यग्निदैवत्यं पादस्तत्र द्विदेवतः ।
निर्मथ्याहवनीयार्थाव् अग्निनाग्निः समिध्यते ॥१४५ ॥
वैसे तो ‘ अग्नि ‘ सूक्त ( ऋग्वेद , १.१२ ) विशेषत : अग्निदेव से ही सम्बद्ध है , लेकिन इसी सूक्त का एक पाद ( अग्निनाग्निः समिध्यते , १.१२.६ ) दो देवताओं कोसम्बोधित है । इनमें से एक है निर्मथ्य और दूसरा है आहवनीय।।१४५ ॥
विशेष — यहाँ ‘ निर्मथ्य ‘ का अर्थ मन्थन द्वारा उत्पन्न अग्नि से है औरआहवनीय अग्नि से अभिप्राय है याज्ञिक क्रियाकलापों में प्रयुक्त अग्नि
‘ पादो द्वयग्निदैवतो निर्मथ्याहवनीयौ ‘ ( ऋक्सर्वानुक्रमणी , १.१२ ) ।
द्वितीये द्वादशर्चे तु प्रत्यृचं यास्तु देवताः ।
स्तूयन्ते ह्यग्निना सार्धं तासां नामानि मे शृणु ॥ १४६ ॥
अब मेरे द्वारा प्रत्येक ऋचा के अनुसार उन देवगण के नामों को सुनिये । उनकीद्वादश मन्त्रात्मक दूसरे सूक्त ( ऋग्वेद , १.१३ ) में अग्निदेव के साथ स्तुति है ।। १४६ ॥
प्रथमायां स्तुतश्चेमो द्वितीयायां तनूनपात् ।
नराशंसस्तृतीयायां चतुर्थ्यां स्तूयते त्विळः ॥ १४७ ॥
इन चारों ऋचाओं में स्तुति का क्रम इस प्रकार है — पहली ऋचा में ‘ इध्म ‘की , द्वितीय में ‘ तनूनपात् ‘ की , तीसरी में ‘ नराशंस ‘ की और चौथी ऋचा में ‘ इळा ‘ कीस्तुति की गई है ॥ १४७ ॥
बर्हिरेव तु पञ्चम्यां द्वारो देव्यस्ततोऽन्यया ।
नक्तोषासा तु सप्तम्याम् अष्टम्यां संस्तुतौ सह ॥ १४८ ॥
दैव्याविति तु होतारौ नवम्यामृचि संस्तुताः ।
तिस्रो देव्यो दशम्यां तु ज्ञेयस्त्वष्टैव तु स्तुतः ॥ १४ ९ ॥
आगे पाँचवीं ऋचा में ‘ बर्हि ‘ की , उसके पश्चात् दिव्य द्वारों की , सातवीं ऋचामें रात्रि और ऊषस् की और आठवीं ऋचा में दो दिव्य होताओं की स्तुति का विधानहै । इसी क्रम में नवीं ऋचा में दिव्य देवियों का का स्तवन है तथा दसवीं ऋचा में त्वष्टाकी स्तुति समझनी चाहिए ।। १४८-१४९ ।।
३०. एकादश आप्रीसूक्त
एकादश्यां तु सूक्तस्य स्तुतं विद्याद्वनस्पतिम् ।
द्वादश्यां तु स्तुता देवीर् विद्यात्स्वाहाकृतीरिति ॥१५० ॥
इसी क्रम में आगे ग्यारहवीं ऋचा में वनस्पतियों की स्तुति अभिप्रेत है औरबारहवीं ऋचा में दिव्य स्वाहाकृतियों की स्तुति समझनी चाहिए ।। १५० ।।
सूक्तेऽस्मिन्प्रत्यृचं यास्तु देवता परिकीर्तिताः ।
ता एव सर्वास्वाप्रीषु द्वितीया तु विकल्पते ॥१५१ ॥
ऋग्वेद के इस सूक्त ( १.१३ ) की ऋचाओं में जिन – जिन देवताओं की प्रशंसा की गई है , वे ही सब देवता आप्री – सूक्तों के अन्तर्गत भी हैं । इनमें भी दूसरा देवतावैकल्पिक ही है।।१३१ ।।
विशेष — इस वैकल्पिक संख्या का प्रतिपादन अग्रिम श्लोकों ( २.१५५-१५७ ) में है ।
प्रैषैः सहाप्रीसूक्तानि तान्येकादश सन्ति च ।
यजूंषि प्रैषसूक्तं वा दशैतानीतराणि तु ॥१५२ ॥
प्रैषों और आप्री – सूक्तों की संख्या एकादश मानी गई है । अथवा प्रैष – सूक्त मेंयज्ञ सम्बन्धी मन्त्र ( यजूंषि ) है , जबकि इन अन्य ऋग्वेद के सूक्तों की संख्या दस हीस्वीकार की गई है।।१५२ ।।
विशेष — ‘ प्रैष ‘ शब्द अपने मूल रूप में अथर्ववेद , तैत्तिरीय संहिता औरवाजसनेयि संहिता में सर्वप्रथम मिलता है । ब्राह्मणों में ऐतरेय , शतपथ और कौषीतकिब्राह्मण इस दृष्टि से उल्लेख्य हैं । ऐतरेय ब्राह्मण में कहा गया है कि यज्ञ देवों के पाससे चला गया । उसे उन्होंने प्रैष मन्त्रों के द्वारा खोजना चाहा , यही उनका प्रैषत्व है ।नैत्तिरीय और शतपथ ने इसका समर्थन किया है । यह शब्द सामान्यत : ‘ प्र ‘ उपसर्गपूर्वक ‘इष्’ धातु से निष्पन्न माना जाता है ।मैक्डॉनेल और कीथ के अनुसार यह एक सामाजिक प्रार्थना विषयक शब्द है , जिनका अर्थ निर्देशन या आमंत्रण है । ऋक् प्रातिशाख्यकार ने इन्हें ‘ पादवच्च प्रैषान् ‘ कह कर पाद की मान्यता दी है ( ऋक् प्रातिशाख्य , १.५७ ) । प्रैषों और आप्री – सूक्तों का घनिष्ठ सम्बन्ध है ।१
यास्क ने इन प्रैष – सूक्तों को ग्यारह आप्री – सूक्तों के अन्तर्गत रखा है- ‘ तान्ये तान्येकादशाप्रीसूक्तानि । ’ ( निरुक्त , ८.२२ ) । PA
सौत्रामणानि तु त्रीणि प्राजापत्याश्वमेधिके।
पुरुषस्य तु यन्मेधे यजुःष्वेव तु तानि षट् ॥ १५३ ॥
इन आप्री – सूक्तों का सम्बन्ध स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि इनमें से तीन सौत्रामणि से और एक प्रजापति से जुड़े हुए हैं । इसी भांति एक का अश्वमेध के समय और दूसरे का पुरुषमेध के समय प्रयोग किया जाता है ॥ १५३ ॥
१ वैदिक साहित्य और संस्कृति का स्वरूप और विकास , पृ ० ९ ७ , ९ ८ , प्रो ० ओमप्रकाश पाण्डेय
अत्रैव प्रैषसूक्तं स्यान् न यजुःष्वाद्रियेत तत् ।
तेषां प्रैषगतं सूक्तं यच्च दीर्घतमा जगौ ॥ १५४ ॥
यहाँ केवल उन्हीं प्रैष – सूक्तों पर विचार किया गया है , जो वाजसनेयि संहिता, २१.२ ९ -४० में मिलते हैं । अन्य जो प्रैष – सूक्त यजुर्वेद में उल्लिखित हैं , उनका नहीं ।। १५४ ।।
३१. आप्रीसूक्तगत तनूनपात् , नराशंस तथा इध्म
मेधातिथौ यदुक्तं च त्रीण्येवोभयवन्ति तु ।
ऋषौ गृत्समदे यच्च वाध्यश्वे च यदुच्यते ॥१५५ ॥
और जो ऋषि मेधातिथि के सूक्त ( ऋग्वेद १.१३ ) में कहा गया है , मात्र इन्हींतीनों में ये दोनों ( तनूनपात् और नराशंस ) समाविष्ट हैं । इनका उल्लेख गृत्समद ( ऋ ० , २.३ ) तथा वध्र्यश्व में ( ऋ ० , १०.७० ) भी मिलता है ॥१५५ ॥
नराशंसवदत्रेश्च ददर्श च यदौर्वशः ।
तनूनपादगस्त्यश्च जमदग्निश्च यज्जगौ ॥ १५६ ॥
अत्रि के दो ( ५.५ ) और उसमें जिसका उर्वशी के बेटे वसिष्ठ के द्वारा दर्शनकिया गया था ( ७.२ ) , नराशंस निहित है । तनूनपात् का विवरण वहाँ प्राप्य है , जिनका साक्षात्कार अगस्त्य ( १.१.८८ ) और जमदग्नि ( १०.११० ) ने किया था ।। १५६ ।।
विश्वामित्र ऋषिर्यश्च जगौ वै काश्यपोऽसितः ।
मेधातिथेर्ऋचां यास्तु प्रोक्ता द्वादश देवताः ॥ १५७ ॥
इन सभी में मात्र वे ही हैं , जिनका ऋषि विश्वामित्र और कश्यप के पुत्र असित ( ३.४ तथा ९ .५ ) के द्वारा साक्षात्कार किया गया । मेधातिथि की ऋचाओं में द्वादश देवों का वर्णन है।।१५७ ॥
संपद्यन्ते यथाग्निं ताः संपदं तां निबोधत ।
इध्मो यः सर्वमेवाग्निर् अयं हीध्मः समिध्यते ॥
ध्मातेर्वैतत्कृतं रूपं ध्मातो हीध्मः समिध्यते ॥ १५८ ॥
उस पद्धति को भी जानना आवश्यक है , जिसके माध्यम से अग्नि को प्रकटकिया जाता है ।
इसके अनुसार इध्म वह अग्नि है जो सब कुछ है , क्योंकि यह वह अग्निहै जो ईंधन के रूप में प्रकट होती है । इसकी व्युत्पत्ति ‘ ध्मा ‘ धातु से निष्पन्न होती है । धौंकने से ही ईंधन को प्रज्वलित किया जाता है।।१५८ ॥
।।इति बृहद्देवतायां द्वितीयोऽध्यायः ॥
तृतीय अध्याय
१. तनूनपात् ; नराशंस ; इळ ; बर्हिस्
तनूनपादयं त्वेव नाम्ना यच्छत्यसौ तनुम् ।
नापादिति प्रजामाहुर् अमुतोऽस्य च संभवम् ॥ १ ॥
इसी अग्नि को नाम से तनूनपात् भी कहते हैं । यह दिव्य गुणों से उपेत अग्निअपने शरीर को प्रसारित करती है । यह भी मान्यता है कि ‘ नपात् ‘ से अभिप्राय वंश परम्परामें उत्पन्न है और तनूनपात् की उत्पत्ति अग्नि के माध्यम से हुई है ॥ १ ॥
नराशंसमिहैके तु अग्निमाहुरथेतरे ।
नराः शंसन्ति सर्वेऽस्मिन्न् आसीना इति वाध्वरे ॥ २ ॥
कुछ लोगों की उक्ति है कि ‘ नराशंस ‘ का अभिप्राय यहाँ अग्नि है । कुछ अन्य लोग कहते हैं कि मनुष्य यज्ञानुष्ठान में आसीन होकर प्रशंसा करते हैं ॥२ ॥
विशेष — निरुक्त में उद्धृत शाकपूणि का मत इस सन्दर्भ में यह है ‘ अग्निः इतिगकपूणिर् : नरैः प्रशस्यो भवति ‘ ( निरुक्त ८.६ ) ।
एतमेवाहुरन्येऽग्निं नराशंसोऽध्वरे ह्ययम् ।
नरैः प्रशस्य आसीनैर् आहुश्चैर्वित्वजो नरः ॥ ३ ॥
अन्य जन इसे इसलिये भी अग्नि कहते हैं , क्योंकि यज्ञस्थल पर आसीनऋत्विग्गण इनकी प्रशंसा मानवों के द्वारा प्रशंसनीय रूप में करते हैं ॥३ ॥
इळस्त्वृषिकृतं रूपम् ईडेश्च स्तुतिकर्मणः ।
इळावांस्तेन वोक्तोऽग्निर् इडिना वर्द्धिकर्मणा ॥ ४ ॥
इळा नाम ऋषियों के द्वारा रचित है , जो स्तुति के अर्थ में ‘ईळ्‘ धातु से निष्पन्न है । इसी धातु को आधार मानकर या वृद्धि – वाचक धातु ‘ इड ‘ के आधार पर अग्नि को ‘ इळावान् ‘ कहा गया है । ॥ ४ ॥
विशेष — यास्क ‘ इळ ’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘ ईध् ‘ अथवा ‘ इथ् ‘ धातुओं से मानते हैं — ‘ ईड् ईट्टेः स्तुतिकर्मण इन्धतेर्वा ’ ( निरुक्त ८.७ ) ।
बर्हि रेवायमग्निस्तु सर्वं हि परिबृंहितम् ।
अन्नेन यद्धतो वा सन्न् इध्मेन परिबृंहितः ॥५ ॥
यह अग्नि ‘बर्हिस्’ भी है , क्योंकि वह सभी प्रकार से अन्न के द्वारा ही समृद्ध होता है । अथवा ( याज्ञिक अनुष्ठान ) में अग्नि ईंधन के द्वारा समृद्धि को प्राप्त करता है ॥५ ॥
२. दिव्य द्वार ; रात्रि और उषस्
द्वारस्तु देव्यो याः प्रोक्ता विश्वेषां तास्तु पत्नयः ।
अग्नायीमनुवर्तन्ते तथाग्नाय्यग्निमेव च ॥६ ॥
जिस प्रकार यह कहा जाता है कि दिव्य द्वार विश्वदेवों की पत्नियाँ हैं , यह अग्नायी का भी उसी प्रकार अनुवर्तन करती है , जैसे अग्नायी अग्नि का ॥६ ॥
विशेष — बृहद्देवताकार के इस कथन का प्रयोजन ‘ देव्यो द्वारः ‘ और ‘ अग्नि ‘ केसम्बन्ध को स्पष्ट करना है । देवताओं की पत्नियों के रूप में अग्नायी ( अग्नि की पत्नी )के अन्तर्गत समस्त पार्थिव देवियों को समझना चाहिए । निरुक्त में कात्थक्य का मत हैकि ‘ यज्ञे गृहदारः ’ इति । अर्थात् यज्ञ में द्वार गृहद्वार है । शाकपूणि इसे अग्नि ही मानते हैं—‘ अग्निर् इति शाकपूणि : ’ ( निरुक्त ८.१० ) ।
अग्नौ ध्रुवं स्थितास्तास्तु संस्तूयन्तेऽग्निना सह ।
प्राधान्यं तासु कैवाग्ने स्तुतिष्वेव हविःषु च ॥७ ॥
अग्नि में दृढ़ता से स्थित होने के कारण इनकी स्तुति भी अग्नि के साथ कीजाती है । इस स्वरूप में भी इनकी स्तुतियों तथा हवियों में अग्नि की ही मुख्यता है ॥७ ॥
नक्तोषासौ च ये देव्याव् आग्नेय्यावेव ते स्मृते ।
श्याव्याग्नेयी हि कालस्य तस्यैवोषाः कलेव तु ॥ ८ ॥
अग्नि के साथ दो देवियों रात्रि और उषस् को भी सम्बद्ध माना जाता है । इससम्बद्धता के पीछे कारण है अन्धकार युक्त रात्रि का अग्नि के साथ सम्बन्ध । रात्रि ( श्यावी )को अग्नि के साथ सम्बद्ध माना जाता है , जबकि उषस् भी उसी काल अर्थात् समय कीएक कला ( सोलहवाँ अंश ) है ॥८ ॥विशेष — निरुक्त में रात्रि तेइस नामों में ( श्यावी ) प्रथम है । ऋग्वेद ( १.७१.१ )में इसका उदाहरण इस प्रकार है — ‘ स्वसार : श्यावी मरुषीमजुञ्चित्रमुच्छन्ती मुषस न गावः । ‘उषा : रात्रेर् अपर : काल : ( निरुक्त २.१८ ) ।
शिज तम उच्छत्युषा नक्तानक्तीमां हिमबिन्दुभिः ।
अपि वाव्यक्तवर्णेति नञ्पूर्वाञ्चेरिदं भवेत् ॥ ९ ॥
‘ उषस् ’ अन्धकार को क्षीण कर देती है । रात्रि भी उसे हिमबिन्दुओं से आच्छादितकर देती है अथवा यह भी कहा जाता है कि यह ‘ नञ् ‘ उपसर्ग के साथ ‘ अञ्च ‘ धातु सेव्युत्पन्न है और इसका अर्थ अव्यक्त वर्ण भी हो सकता है ॥९ ॥
सा हि दोषा भवत्यादौ निशीथे सा तमस्वती ।
नाम्ना भवत्युषाश्चैव सैषा प्रागुदयाद्रवेः ॥१० ॥
उषस् को तीन नामों से , रात्रि के आरम्भ , मध्य और अन्त में सम्बोधित कियाजाता है । रात्रि के प्रारम्भ में इसे ‘ दोषा ’ , मध्य रात्रि में ‘ तमस्वती ’ और सूर्योदय के पूर्व मेंइसका नाम ‘ उषस् ’ होता है । ॥ १० ॥विशेष — रात्रि के पर्यायवाची शब्दों में ‘ दोषा ‘ , ‘ तमस्वती ‘ , ‘ श्यावी ‘ और‘ नक्ता ’ का परिगणन निघण्टु ( १.७ ) में है ।
३. दो दिव्य होता ; तीन देवियाँ ; त्वष्टा
दैव्याविति तु होताराव् अग्नी पार्थिवमध्यमौ ।
दिव्यादग्नेर्हि जज्ञाते दैव्यौ तेनेह जन्मना ॥ ११ ॥
दो दिव्य होता अग्नि के पार्थिव तथा मध्यम रूप में जाने जाते हैं । इनकोदिव्यजन्मा कहा जाता है , क्योंकि इनका जन्म दिव्य अग्नि से हुआ है।।११ ।।
तिस्त्रस्तु देव्योः याः प्रोक्तास् त्रिस्थानैवेह सा तु वाक् ।
त्रिविधेनोच्यते नाम्ना ज्योतिःषु त्रिषु वर्तिनी ॥१२ ॥
जिनकी तीन देवियों के रूप में गणना की गई है , वे यहाँ तीन स्थान से उच्चार्यपी ही हैं । तीनों ज्योतियों के अन्तर्गत इसे तीन नामों से सम्बोधित किया जाता है।।१२ ।।
अग्निमेवानुगेळा तु मध्यं प्राप्ता सरस्वती ।
अमुं स्थिताधि लोकं तु भारती भवति ह्यसौ ॥ १३ ॥
‘ इड़ा ‘ को अग्नि का अनुसरण करने वाली कहा गया है , सरस्वती का सम्बन्ध मध्यम स्थान से है और वाक् का दैवीय रूप भारती माना गया है , क्योंकि वह दिव्य लोक में स्थित रहती है।।१३ ।।
सैषा तु त्रिविधा वाग्वै दिवि च व्योम्नि चेह च ।
व्यस्ता चैव समस्ता च भजत्यग्नीनिमानपि ॥ १४ ॥
अब इसी वाक् के दिव्य , अन्तरिक्ष और पार्थिवगत विभिन्न स्वरूप हैं । व्यष्टि एवं समष्टि दोनों ही दृष्टियों से यह इन अग्नियों से सम्बन्धित है ॥१४ ॥
त्वष्टा तु यस्त्वयमेव पार्थिवोऽग्निरिति स्तुतिः ।
पार्थिवस्यास्य वर्चः स्युः कस्याप्यृक् चार्तवेषु च ॥ १५ ॥
जिस प्रकार पार्थिव अग्नि की स्तुति की जाती है , उसी प्रकार अज त्वष्टा के लिए भी स्तुति की गई है या ऋग्वेद के मन्त्रों द्वारा पार्थिव अग्नि के रूप में इसकी स्तुति की गई है तथा ऋतुओं के सूक्तों में भी जो एक – न – एक ऋचा अग्नि के रूप में इन्हें समर्पित है।।१५ ।
४. दिव्य त्वष्टा ; दध्यञ्च और मधु का आख्यान
त्विषितस्त्वक्षतेर्वा स्यात् तूर्णमश्नुत एव वा ।
कर्मसूत्तारणो वेति तेन नामैतदश्नुते ॥ १६ ॥
‘ त्वष्टा ’ शब्द की ‘ त्विष् ’ अथवा ‘ त्वक्ष् ‘ धातु से व्युत्पत्ति संभव है अथवा वहशीघ्र ही प्राप्त कर लेते हैं अथवा वह कार्यों में सहायक सिद्ध होते हैं । इसी कारण इन्हेंयह नाम दिया गया है । ॥ १६ ॥विशेष — यास्क कृत निरुक्त में त्वष्टा शब्द के तीन निर्वचन मिलते हैं — त्वष्टातूर्णम् अश्नुते इति नैरुक्ता :, त्विषेर्वा स्याद् दीप्तिकर्मणः , त्यक्षतेर्वा स्यात् करोतिकर्मणः( निरुक्त ८.१३ ) ।
यः सहस्त्रतमो रश्मी रवेश्चन्द्रमुपाश्रितः ।
सोऽपि त्वष्टारमेवाग्निं परं चेह च यन्मधु ॥ १७ ॥
सूर्य की हजारों किरणें जो चन्द्रमा में समाश्रित हैं तथा वह मधु भी जो पृथिवीतथा उसके ऊपर है , उसी त्वष्टा के अन्तर्गत है , जो अग्नि के स्वरूप में है।।१७ ।।
प्रादाद्ब्रह्मापि सुप्रीतः सुताय तदथर्वणः ।
स चाभवदृषिस्तेन ब्रह्मणा दीप्तिमत्तरः ॥ १८ ॥
अश्विनों के द्वारा मधु को दध्यञ्च से प्राप्त करने के तौर – तरीके का विवरण देते केहुए कहा गया है ) –
इन्द्र ने अत्यधिक प्रसन्न होकर अथर्वा के पुत्र दध्यञ्च को ब्रह्म अर्थात् ( वेदान्तर्गत )अभिचार कर्म प्रदान किया और इसी कारण इस उपलब्धि के माध्यम से दध्यञ्च ऋषि औरभी अधिक दीप्तिमान् हो गए ।॥ १८ ॥
तमृषिं निषिषेधेन्द्रो मैवं वोचः क्वचिन्मधु।
न हि प्राक्ते मधुन्यस्मिञ् जीवन्तं त्वोत्सृजाम्यहम् ॥१ ९ ॥
इन्द्र ने ऋषि से इसे ( किसी को ) न बताने की चेतावनी देते हुए कहा – ‘ इस प्रकार उद्घाटित मधु की चर्चा अन्यत्र कहीं भी मत करना , क्योंकि यदि इस मधु की घोषणाकर दी गई तो मैं तुम्हें भी जीवित नहीं रहने दूँगा ॥१ ९ ॥
तमृषिं त्वश्विनौ देवौ विवक्ते मध्वयाचताम् ।
स च ताभ्यां तदाचष्टे यदुवाच शचीपतिः ॥ २० ॥
लेकिन अश्विन देवों ने ऋषि से गुप्त रूप से मधु की याचना की और अश्विनोंने ऋषि को यह भी बता दिया कि शचीपति इन्द्र ने क्या कहा था || २० ॥
५. दध्यञ्च का अश्व-शिर; मध्यम त्वष्टा
तमब्रूतां तु नासत्याव् आश्व्येन शिरसा भवान् ।
मध्वाशु ग्राहयत्वावां मेन्द्रश्च त्वा वधीत्ततः ॥ २१ ॥
उनसे नासत्यों ( अश्विनों ) ने कहा- ‘ आप हम दोनों को शीघ्रता से अश्व – शिरधारण करके मधु ग्रहण करवाइये । इसके लिये इन्द्र आपका वध नहीं करेंगे ।॥ २१ ॥
आशव्येन शिरसा तौ तु दध्यङ्ङ्काह यदश्विनौ ।
तदस्येन्द्रोऽहरत्स्वं तन् न्यधत्तामस्य यच्छिरः ॥ २२ ॥ तु
क्योंकि अश्व: शिर के रूप में दध्यञ्च ने अश्विनयुग्म को रहस्य का ज्ञान करा दियाथा , इसीलिये इन्द्र ने उनके उस शिर को अलग कर दिया , लेकिन अश्विनों ने उनके शिरको पुनः उनके ऊपर स्थापित कर दिया || २२ ||
विशेष – शतपथ ब्राह्मण में भी यह कथा प्राप्त होती है , लेकिन वहाँ यह कथाकेवल शिर के पुन: जोड़ने तक ही दी गई है — अथास्य स्वं शिर आहृत्य तद् धास्य प्रतिदधतुः ( शतपथ ब्राह्मण , १४.१.१.२३ ) । सायण के कथन से भी कथा की यहीं परमाप्ति की सूचना प्राप्त होती है — ‘ स्वकीयं मानुषं शिरः प्रत्यधत्ताम् ‘ ।
दधीचश्च शिरश्चाश्यं कृतं वज्रेण वज्रिणा ।
पपात सरसो मध्ये पर्वते शर्यणावतो ॥ २३ ॥
वज्रधर इन्द्र के द्वारा अपने वज्र से अलग कर दिया गया दध्यञ्च का अश्व – शिर शर्यणावत् पर्वत पर स्थित एक सरोवर में गिर गया । ॥ २३ ॥
तदद्भ्यस्तु समुत्थाय भूतेभ्यो विविधान्वरान् ।
प्रादाय युगपर्यन्तं यास्वेवाप्सु निमज्जति ॥ २४ ॥
जलों के ऊपर उठकर तथा जीवित प्राणियों को बहुत प्रकार के वरदान देते हुए वह युगों – युगों तक जल में डूबा रहता है || २४ ||
त्वष्टा रूपविकर्ता च योऽसौ माध्यमिके गणे ।
स्तुतः स च निपातेन सूक्तं तस्य न विद्यते ॥२५ ॥
वही त्वष्टा जिनकी गणना मध्यस्थानीय गणों के अन्तर्गत की जाती है रूपों के विकर्ता हैं । इनकी भी नैपातिक ( आकस्मिक ) स्तुति ही होती है । इनको अन्य कोई भी सूक्त समर्पित नहीं है ॥२५ ॥
विशेष — निरुक्तकार ने मध्यस्थानीय पद की व्युत्पत्ति की है माध्यमिकस्त्वष्टा इत्याहुर्मध्ये च स्थाने समाम्नात : ( निरुक्त ८.१४ ) । इसी प्रकार त्वष्टा को रूपों का निर्माता तथा ‘ रूपकृत ‘ कहा गया है ( ऋग्वेद तथा तैत्तिरीय संहिता )।
६. वनस्पति एवं स्वाहाकृतियाँ
वनस्पतिं तु यं प्राहुर् अयं सोऽग्निर्वनस्पतिः ।
अयं वनानां हि पतिः पाता पालयतीति वा ॥ २६ ॥
( यहाँ ‘ वनस्पति ’ पद की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि ) वनस्पति – वन के स्वामी के रूप में इसी अग्नि का ही एक रूप है , क्योंकि अग्नि ही वनों के रक्षक हैं । इसको वनस्पति कहने का कारण यह भी है कि यही वनों का पालन करते हैं।॥२६ ॥
विशेष— ऋग्वेद के प्रथम मण्डल में आप्री देवताओं के रूप में वनस्पति का पार्थिव अग्नि के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध ज्ञात होता है । निरुक्तकार का अभिप्राय बृहद्देवताकारके सदृश ही है — ‘ वनानां पाता वा पालयिता वा ‘ ( निरुक्त ८.३ ) ।
अग्निर्गृत्समदेनायं वनस्पतिरितीळितः ।
मन्दस्वेत्यस्य सूक्तस्य षळूचस्य तृतीयया ॥ २७ ॥
ऋग्वेद ( २.३७ ) में छह ऋचाओं से युक्त , ‘मन्दस्व’ से प्रारम्भ होने वाले सूक्तकी तृतीय ऋचा में ऋषि गृत्समद ने इस अग्नि की भी वनस्पति के रूप में स्तुति कीहै | २७ ||
यूपवत्तरुवच्चैव स्तुतिर्यास्य प्रसङ्गजा ।
सर्वेणाञ्जन्ति सूक्तेन तृतीये सा तु मण्डले ॥ २८ ॥
किन्तु एक यज्ञ-यूप तथा एक वृक्ष एवं उसकी वनस्पति के रूप में ‘अञ्जन्ति’से आरम्भ होने वाले समस्त सूक्त के माध्यम से प्रासंगिक स्तुति ऋग्वेद के तृतीय मण्डलमें प्राप्त होती है ॥२८ ॥
स्वाहाकृतयोऽनेकाश्च विदुषां मतयोऽभवन् ।
तत्सर्वं त्वयमेवाग्निर् भवतीति विनिश्चयः ॥२ ९ ॥
स्वाहाकृतियाँ अनेक हैं । उनके सम्बन्ध में विद्वानों के मत भिन्न-भिन्न हैं । लेकिन सभी मतों में निश्चित रूप से स्वाहाकृतियों को अग्नि के रूप में स्वीकार किया गयाहै ।। २ ९ ।।
अयं हि कर्ता स्वाहानां कृतिस्तासामिहैकजा ।
अयं प्रसूतिर्भूतानां सर्वेषामयमव्ययः ॥३० ॥
यही ‘ स्वाहा ’ ध्वनियों का कर्ता है , वहाँ इसके कृतित्व का स्वरूप एकज अर्थात्एक सदृश है , यह सभी में अव्यय तथा भूतों का मूल स्रोत है ॥ ३० ॥
७. तनूनपात् और नराशंस
तनूनपादिद्वतीया च नराशंसवती च या ।
समस्येते प्रयोक्तव्ये त्रिष्वेवोभयवत्सु तु ॥३१ ॥
जिसमें तनूनपात् और नराशंस एक साथ प्राप्य हों , इस प्रकार के मात्र तीन ही सूक्त हैं , जिनमें इन दोनों को एक स्थान पर देखा जा सकता है || ३१ ||
नराशंसवती वा स्याद् द्वितीया च प्रजार्थिनाम् ।
बलकामोऽन्नकामो वा भूमिमिच्छेदथापि यः ॥ ३२ ॥
नराशंस तथा तनूनपात् से युक्त ऋचा उनकी हो सकती है , जिन्हें सन्तान , बलअथवा अन्न प्राप्ति की कामना या समृद्धिशाली होने की कामना होती है ।॥ ३२ ॥
आग्नेयं सूक्तमैभिर्यद् वैश्वदेवमिहोच्यते ।
तद्विश्वलिङ्गं वैश्वदेवेषु गायत्रं शस्यते ॥ ३३ ॥
अग्नि का आवाहन करने वाला सूक्त ‘ऐभि:‘ ( ऋग्वेद १.१४ ) विश्वेदेवों से हीमुख्यतः सम्बन्धित बतलाया जाता है । वह विश्वेदेव सूक्तों के लक्षणों से युक्त है । इसकाशंसन गायत्री छन्द में निबद्ध वैश्वदेव शास्त्रों में किया जाता है | ३३ ॥
इन्द्र सोमं पिबेतीदं यद्द्वादशकमार्तवम् ।
तस्मिन्सहर्तुना सप्त प्रत्यृचं स्तौति देवताः ॥ ३४ ॥
ऋग्वेद की बारह ऋचाओं वाले तथा ऋतुओं को सम्बोधित ‘ इन्द्र सोमं पिब ‘ ( ऋ.सं. १.१५ ) सूक्त में ऋतुओं के साथ सात देवों की भी स्तुति की गयी है ॥ ३४ ॥
तत्रर्तुनेति षट्स्वृक्षु चतसृष्वृतुभिः सह ।
पुनर्द्वयोर्ऋतुनेति बहुत्वैकत्वलक्षिताः ॥३५ ॥
इसमें देवताओं की छह ऋचाओं , ‘ ऋतु ‘ के साथ उन्हें चार में ऋतुओं के साथ ही पुन : दो ऋचाओं तथा ऋतु के साथ बहुवचन तथा एकवचन में स्तुति की गई है ।॥ ३५ ॥
८. ऋतुओं को समर्पित सूक्त : ऋ.सं. १, १५
ऋतवो देवताभिश्च निपातेनेह संस्तुताः ।
तथर्तुप्रैषसूक्ते च तथा गार्त्समदेऽपि च ॥३६ ॥
यहाँ देवों के साथ ऋतुओं की केवल नैपातिक ( आकस्मिक ) स्तुति का ही उल्लेख है । स्तुति का यही स्वरूप हमें ऋतुओं को समर्पित प्रैष – -सूक्त और गृत्समद के सूक्त में भी मिलता है ॥३६ ॥
मुख्यया त्विन्द्रमेवास्तौन् मरुतस्तु द्वितीयया ।
तृतीयया तु त्वष्टारं चतुर्थ्या चाग्निमेव च ॥३७ ॥
पञ्चम्या तु पुनः शक्रं षष्ट्या देवावृतावृधौ ।
सप्तम्याद्याभिरग्निं च चतुर्भिर्द्रविणोदसम् ॥३८ ॥
यहाँ ऋषि के द्वारा विभिन्न देवताओं की स्तुतियों के क्रम का निरूपण किया गया है । ऋषि ने प्रथम ऋचा के द्वारा इन्द्र की , द्वितीय ऋचा के माध्यम से मरुतों की , तृतीयऋचा से त्वष्टा की और चौथी ऋचा के द्वारा अग्निदेव की स्तुति की । इसी प्रकार पाँचवींऋचा से शक्र अर्थात् इन्द्र की , छठी ऋचा से मित्र – वरुण अर्थात् सत्य में वृद्धि को प्राप्तकरने वाले देवताओं की और सप्तम से आरम्भ होने वाली चार ऋचाओं में अग्नि द्रविणोदाकी स्तुति ( ऋ . १.१५.७-१० ) में की गयी है ।। ३७-३८ ।।
आदेशाद्दैवतं ज्ञेयम् ऋङ्मन्त्राणां न लिङ्गतः ।
न शक्यं लिङ्गतो ह्यासां ज्ञातुं तत्त्वेन दैवतम् ॥३ ९ ॥
ऋग्वेद के मन्त्रों के देवताओं को लिङ्ग ( चिह्नों या लक्षणों ) के आधार पर नहीं ,अपितु निर्दिष्ट वचनों के द्वारा ही समझना चाहिए । मात्र मन्त्रों के लिङ्ग के आधार परदेवताओं के वास्तविक स्वरूप को समझना सम्भव नहीं है ॥३ ९ ॥
विशेष — यहाँ पर अग्नि को उसके तात्त्विक नहीं अपितु लाक्षणिक नाम‘ द्रविणोदस् ’ से प्रकट किया गया है । ‘ द्रविणोदस् ‘ अग्नि की उपाधि है , जिसका तात्पर्यअन्य देवता पर भी अन्वित हो जाने की संभावना बनी रहती है । इस कारण लक्षण मात्र विश्वसनीय नहीं हैं ।
एकादश्या तु नासत्यौ द्वादश्याग्निमिमं पुनः ।
पृथक्पृथक्स्तुतीदं तु सूक्तमाह रथीतरः ॥४० ॥
इसी क्रम में ग्यारहवें मन्त्र के द्वारा नासत्यों ( अश्विन देव युग्म ) की तथा बारहवेंमन्त्र से इसी अग्नि की पुनः स्तुति की गई है । लेकिन फिर भी ( ऋषि ) रथीतर का मत हैकि इस सूक्त में अलग – अलग देवताओं की स्तुतियाँ हैं ॥४० ॥
९ . विश्वेदेवों को समर्पित त्रिविध सूक्त
बहुदैवे द्विदैवे वा गुणैर्वा यत्र कर्मजैः ।
स्तूयते देवतैकैका विभक्तस्तुतिरूच्य ॥४१ ॥
विभक्त स्तुति उसे कहा जाता है , जहाँ विभिन्न देवताओं अथवा दो – दो देवताओं वाले सूक्त में हर एक देवता की अकेले उसके कर्म से उत्पन्न गुणों को आधार मानकर स्तुति की गयी है ॥४१ ॥
वैश्वदेवानि सूक्तानि त्रिविधानि भवन्ति तु
सूर्यंसंस्तवसंयुक्तं विश्वलिङ्गं पृथक्स्तुति ॥४२ ॥
विश्वेदेव विषयक सूक्त तीन प्रकार के हैं , जिनमें से एक में सूर्य के साथ जिसमें सम्मिलित रूप से स्तुति की गई है , दूसरे में विश्व – लिङ्ग होता है और तीसरा वह, अलग से स्तुति की जाती है ॥४२ ॥
पृथवस्तुतीति यत्प्रोक्तं तद्विद्याद्वहुदैवतम् ।
विश्वलिङ्गं तु तद्यत्र विश्वैः स्वैः कर्मजैर्गुणैः ॥४३ ॥
‘पृथक् स्तुति’ वह कहलाती है , जिसमें अनेक देवों की स्तुति की जाती है औरजिसमें देवताओं की उनके कर्म के आधार पर समस्त गुणों के साथ स्तुति की जातीहै।॥४३॥
विश्वानुद्दिश्य यद्देवान् स्तौति सूर्यमनेकधा ।
देवानेवाभिसंस्तौति तं प्राहुः सूर्यसंस्तवम् ॥४४ ॥
जो समस्त देवों को ध्यान में रखकर विभिन्न प्रकार से सूर्य की स्तुति करने केसाथ इन देवताओं की भी स्तुति करता है , उसे ‘ सूर्य संस्तव ‘ कहते हैं।॥४४ ॥
न तु भागस्य सूक्तादौ सूक्तेष्वेवौषसेषु वा ।
न सावित्रे ह्वयामीति न सूर्यायां क्रतौ मखे ॥ ४५ ॥
लेकिन ‘ विश्वेदेव ’ शब्द ‘ भग ‘ सूक्त के प्रारम्भ में प्रयुक्त नहीं होता और इसीप्रकार यह उषा या सविता के सूक्त ‘ ह्वयामि ….. ‘ ऋ.सं. में या सूर्य के सूक्त में ही याज्ञिक दृष्टि से ही प्रयोग किया जाता है ॥ ४५ ॥
१०. सूक्त में देवता के निर्णय का आधार ?
न चैवैवं प्रवादेषु मन्त्रेष्वन्येषु केषुचित् ।
कन च यत्र सजोषेति पदं वा स्यात्सजूरिति ॥४६ ॥
और न तो इसी प्रकार किसी दूसरे मंत्र में इसका प्रयोग होता है , जिनमें कुछ भी प्रवाद हो अथवा ऐसे मन्त्र जिनमें ‘ सजोषाः ‘ या ‘ सजूः ‘ शब्दों का प्रयोग किया गया हो।।४६ ॥
विशेष — ‘ प्रवाद ‘ का अभिप्राय यह है कि मात्र उन मन्त्रों में जहाँ केवल नामों का ही उल्लेख हो और उनमें आह्वान निहित न हो ।
यस्मिन्प्रसङ्गादपि तु बह्वीनां परिकीर्तनम् ।
वैश्वदेवं तदप्याह स्थविरो लामकायनः ॥४७ ॥
किन्तु वयोवृद्ध ऋषि लामकायन इस प्रकार के सूक्तों को विश्वेदेवों को सम्बोधित मानते हैं , जिनमें अनेक देवताओं की केवल प्रसंग के अनुकूल ही प्रशंसा की जाती है ॥४७ ॥
असंस्तुतं स्तुतं वापि प्रदिष्टं दैवतं क्वचित् ।
मन्त्रैस्तदृषयोऽर्चन्ति तां तु बुध्येत शास्त्रवित्॥४८ ॥
उस प्रकार के देवों की , जिनकी स्तुति की गई हो अथवा नहीं , किन्तु जिनके नाम का सूक्त में संकेत मिलता है , ऋषिगण मन्त्रों से उनकी अर्चना करते हैं । शास्त्रज्ञाताओं को ऐसे देवताओं पर ध्यान देना चाहिए ॥४८ ॥
आदौ हि मध्ये चान्ते च पृथक्त्वेषु च कर्तृभिः ।
कर्माण्यनपदिष्टानि प्रदिष्टान्यपि तु क्वचित् ॥४ ९ ॥
( यदा – कदा ) ऋषियों के द्वारा , सम्भव है , देवों के कर्मों का पृथक् – पृथक्उल्लेख , आदि , मध्य या अन्त में ( भी ) हो , ( लेकिन सामान्यतः ) उनके कर्मों का उल्लेख कहीं-न-कहीं रहता ही है ॥ ४ ९ ॥
कर्मैव तावत्सावित्र्यां निविदि स्तौति कर्मणा ।
यद्धेनुः सप्त्यनड्वाहौ बोळहा दोग्ध्याशुरेव वा ॥५० ॥
सविता देवता से सम्बद्ध निविद् मन्त्रों में स्वयं कर्म के ही द्वारा कर्म की स्तुतिकी गई है । यथाक्रम इनको अर्थात् धेनु को दोहन करने वाला , अनड्वाह को तेज दौड़नेवाला और बैल को वाहक कहा गया है ॥५० ॥
विशेष— ( १ ) वाजसनेयि संहिता में भी इसी प्रकार का प्रसंग मिलता है ‘ दोग्ध्रीधेनुर् वोढानड्वास आशुः सप्तिः ‘ ( वा.सं. २२.२२ ) ।
( २ ) ‘ निविद् ’ छोटे – छोटे गद्यात्मक मन्त्र हैं , यथा — ‘ अग्निर्देवेदः ‘ इत्यादि ।
११. प्रसंगात्मक देवता तथा सूक्त का स्वामित्व । वैश्वदेव सूक्तों के द्रष्टा
भागे यत्स्तौति चाग्न्यादीन् मित्रादींश्चाश्वसंस्तुतौ ।
यदैभिरिति चैतस्मिन् वैश्व देवेऽग्निमर्चति ॥५१ ॥
तदाहुरादावन्ते च प्रायशोऽन्या स्तुवन्नृचः ।
प्रतियोगात्प्रसङ्गाद्वा स्तौत्यन्यामपि देवताम् ॥५२ ॥
जब कभी कोई ऋषि अग्नि एवं दूसरे देवता की ‘ भग ‘ के सूक्त ( ऋग्वेद ७.४१ )के माध्यम से तथा मित्र एवं अन्य की , अश्व की प्रशंसा ( ऋग्वेद १.१६२ ) द्वारा स्तुतिऔर विश्वेदेव सूक्त ‘ ऐभि ’ ( ऋग्वेद १.१४ ) द्वारा अग्नि की अर्चना करता है । उस स्थलविशेष के सन्दर्भ में उल्लिखित है कि वह अपने स्तवन में बहुत प्रकार के सूक्तों में प्राय :आदि तथा अन्त में अन्य ऋचाओं का प्रयोग करता है और साथ ही प्रतियोग से अथवाप्रसंग के अनुकूल देवताओं की भी स्तुति करता है ॥५२ ॥
विशेष – विद्वानों के अनुसार किसी भी सूक्त की पहली एवं अन्तिम ऋचा मेंदेवता की दृष्टि से बहुधा विभिन्नता परिलक्षित होती है यथा भग सूक्त की प्रथम ऋचा‘ जगती ’ छन्द में तथा अवशिष्ट सूक्त ‘ त्रिष्टुप् ‘ में निबद्ध है । इसी प्रकार ऋग्वेद के सवितृसूक्त में भी प्रथम मन्त्र जगती छन्द में तथा इसके अतिरिक्त सभी मन्त्रों में त्रिष्टुप् छन्द है( ऋग्वेद १.३५ तथा ७.४१ ) ।
यस्यां वदत्यर्थवादान् सा ज्ञेया सूक्तभागिनी ।
यां तु स्तौति प्रसङ्गेन सा विज्ञेया निपातिनी ॥५३ ॥
जिस ऋचा में कोई देवता अर्थवाद ( स्तुति या अनुष्ठान जन्य फल ) काकथन करती है , वह उस सूक्त की भागिनी होती है और जिस ऋचा में मात्र प्रसंगतःस्तुति होती है , उस ऋचा की देवता निपातिनी ( अर्थात् अकस्मात् उल्लिखित ) मानीजाती है ॥५३ ॥.
१२ . वैश्वदेव सूक्तों के द्रष्टाओं की गणना
चतुर्धा भण्यते तस्मिन् सूक्ते वा सूक्तभागिनी ।
यस्मिन्सर्वास्तु राजर्षीन् ऋषीन्वापि स्तुवन्नृषिः ॥ ५४ ॥
मेधातिथिरगस्त्यस्तु बृहदुक्थो मनुर्गयः ।
हो किऋजिश्वा वसुकर्णश्च शार्यातो गोतमो लुशः ॥ ५५ ॥
स्वस्त्यात्रेयः परुच्छेपः कक्षीवान् गाथिनौर्वशौ ।
नाभाकश्चैव निर्दिष्टो दुवस्युर्ममतासुतः ॥५६ ॥
विहव्यः कश्यप ऋषिर् अवत्सारश्च नाम यः ।
वामदेवो मधुछन्दाः पार्थो दक्षसुतादितिः ॥५७ ॥
जुहूर्गृत्समदश्चर्षिर् देवाः सप्तर्षयश्च ये ।
यमोऽग्निस्तापसः कुत्सः कुसोदी त्रित एव च ॥५८ ॥
बन्धुप्रभृतयश्चैव चत्वारो भ्रातरः पृथक् ।
विष्णुश्च नेजमेषश्च नाम्ना संवननश्च यः ॥ ५ ९ ॥
एक विशेष प्रकार के सूक्तों में सूक्त के भागी देवताओं का चार प्रकार से निर्देश किया जाता है , जिनके द्वारा कोई द्रष्टा ऋषि समस्त राजर्षियों अथवा ऋषियों की स्तुति करता है ( ऐसे कतिपय ऋषि नाम ये हैं ) – मेधातिथि , अगस्त्य , बृहदुक्थ , मनु , गय , ऋजिश्वन् , वसुकर्ण , शार्यात , गौतम , लुश , स्वस्त्यात्रेय , परुच्छेप , कक्षीवत् , गाथिन के पुत्र विश्वामित्र , उर्वशी के पुत्र वसिष्ठ , नाभ्राक , दुवस्यु और ममता के पुत्र ( दीर्घतमस् ) , विहत्य , ऋषि काश्यप तथा वह जिनका नाम अवत्सार है ; वामदेव , मधुछन्दस् , पार्थ , दक्ष की पुत्री , अदिति , जुहू तथा ऋषि गृत्समद और वे जो दिव्य सप्तर्षि हैं ; यम , अग्नितापस , कुत्स , कुसीदिन् और त्रित तथा चार बन्धु तथा वे ही सभी अलग – अलग भी , विष्णु एवं नेजमेष तथा वह जिन्हें संवनन नाम से सम्बोधित किया जाता है।५४-५९
॥ विशेष — यहाँ आये हुए सभी सैंतीस नाम केवल ‘ नाभाक ‘ को छोड़कर वैश्वदेव सूक्तों के प्रसिद्ध द्रष्टा हैं ।
तृतीय अध्याय ६७
एते तु सर्व एवास्य विश्वैः स्वैः कर्मजैर्गुणैः ।
समस्तैरथ च व्यस्तैः पृथक्सूक्तेषु तुष्टुवुः ॥६० ॥
इन सभी द्रष्टाओं ने विभिन्न सूक्तों में विश्वेदेवों की उनके अपने कर्मों से उत्पन्नसमस्त गुणों के साथ स्तुति की है । इन गुणों का ( कहीं सामूहिक रूप में और कहीं ) पृथक्पृथक् उल्लेख हो सकता है ।६० ॥
१३. द्रविणोदा की व्याख्या । ऋग्वेद १.१३-१८ के देवता
पार्थिवौ द्रविणोदोऽग्निः पुरस्ताद्यस्तु कीर्तितः ।
तमाहुरिद्रं दातृत्वाद् एके तु बलवित्तयोः ॥६१ ॥
अब ‘ द्रविणोदा ‘ ( ऋग्वेद ३.३८ ) जिसका ऊपर पार्थिव अग्नि के रूप मेंउल्लेख है , उसे ही कुछ लोगों ने ‘ इन्द्र ‘ भी कहा है , क्योंकि यह शक्ति और धन प्रदाताभी है ।६१ ॥
अयं हि द्रविणोदोऽग्निर् अयं दाता बलस्य हि ।
जायते च बलेनायं मथ्यत्यृषिभिरध्वरे ॥६२ ॥
उस पार्थिव अग्नि को ही ‘ द्रविणोदस् ‘ कहा जाता है । इसके पीछे कारण यहहै कि यह शक्ति प्रदान करने वाले हैं और शक्ति द्वारा ही उनकी उत्पत्ति हुई है अर्थात्यज्ञकाल में ऋषि इनका ही मन्थन करते हैं ।। ६२ ॥
विशेष – निरुक्त में भी कहा गया है ‘ बलेन मध्यमानो जायते ‘ ( निरुक्त ८. २ ) ।
हवींषि द्रविणं प्रार् हविषो यत्र जायते ।
दातारश्चर्त्विजस्तेषां द्रविणोदास्ततः स्वयम् ॥६३ ॥
हवियों को ( ही ) द्रव्य कहते हैं , क्योंकि यह हवि से ही उत्पन्न हुआ है । वास्तवमें ये ऋत्विज ही हवि प्रदान करते हैं अतः वे ही स्वयं द्रविणोदस् भी हैं ।। ६३ ।।
विशेष — निरुक्त में भी इसी प्रकार का कथन है— ‘ ऋत्विजोऽत्र द्रविणोदस्उच्यते हविषो दातारः ’ ( निरुक्त ८.२ ) ।
ऋषीणां पुत्र इत्येषां दृश्यते सहसो यहो ।
मध्यमाद्वा यतो जज्ञे तस्माद्वा द्राविणोदः ॥ ६४ ॥
अथवा वह अग्नि इसलिए ‘ द्रविणोदस् ‘ कहलाता है , क्योंकि यह ‘ ऋषियों केपुत्र ’ , ‘ बल के पुत्र ’ आदि कथनों के द्वारा इनके साथ संयुक्त प्रतीत होते हैं अथवा मध्यअग्नि के द्वारा इनकी उत्पत्ति कही जाती है ।६४ ॥
विशेष – ( १ ) ‘ यहु ‘ शब्द निघण्टु में अपत्य का पर्याय कथित है ।
( २ ) ऋत्विग्गण बल से अग्नि को उत्पन्न करते हैं— ‘ बलेन मध्यमानो जायते ,तस्मादेनं आहु सहसः पुत्रं सहसः सूनुः सहसो यहुम् ‘ ( निरुक्त ८.२ )।
बृहद्देवता ६८
द्रविणोदोऽग्निरेवायं द्रविणोदास्तदोच्यते ।
आग्नेयेष्वेव दृश्यन्ते प्रवादा द्रविणोदसः ॥६५ ॥
यह पार्थिव अग्नि ही धन को प्रदान करने वाली ( द्रविणोद ) है , इसीलिये इसे ‘द्रविणोदस्’ कहते हैं , केवल अग्नि को सम्बोधित सूक्तों में ही ‘ द्रविणोदस् ‘ के प्रवाददिखाई देते हैं ॥६५ ॥
विशेष—निरुक्त ( ८.२ ) में शाकपूर्णि का भी यही मत है — ‘ अयमेवाग्निःद्रविणोदाः ’ ।
१४. ऋग्वेद १.१८ के देवता । प्राजापति के आठ नामों का उल्लेख
ऐन्द्रस्य नवकस्येह यदैन्द्रावरुणं परम् ।
तस्योत्तरं च सोमानं स्तूयते ब्रह्मणस्पतिः ॥६६ ॥
ऋग्भिः पञ्चभिराद्याभिस् तिसृभिः सदसस्पतिः ।
नराशंसोऽन्त्यया चर्चा सोमेन्द्रौ तु निपातितौ ॥६७ ॥
चतुर्थ्यां सोम इन्द्रश्च पञ्चम्यां दक्षिणाधिका
प्रसङ्गादृषिणा प्रोक्ताः सम्बन्धा स्थानलोकयोः ॥६८ ॥
यहाँ इन्द्रदेव के प्रति समर्पित नौ ऋचाओं के सूक्त ( ऋग्वेद १.१६ ) के पश्चात् आने वाला सूक्त इन्द्र – वरुण से सम्बद्ध है ( १.१७ ) । इसके बाद का ‘ सोमानम् ‘ ( ऋ . १.१८ ) शब्द से प्रारम्भ सूक्त है , जिसमें प्रारम्भ की पाँच ऋचाओं में ब्रह्मणस्पति की स्तुति की गई है ।
तत्पश्चात् चौथी ऋचा में सोम – इन्द्र की नैपातिक स्तुति है । तीन ऋचाओं में सदसस्पति की और अन्तिम ऋचा में नराशंस की स्तुति की गई है तथा पाँचवीं ऋचा में सोम और इन्द्र तथा दक्षिणा की भी स्तुति की गई है । ऋषि ने स्थान और श्लोक के सम्बन्ध की चर्चा प्रसंग के अनुसार की भी है ।
देवता चूंकि स्थान और लोक की दृष्टि के अनुसार परस्पर सम्बद्ध भी होते हैं , इसीलिये प्राय: देवताओं का एक साथ उल्लेख होता है।६६-६८ ॥
प्राजापत्यं तथेन्द्रः स्याद् इति तस्येह नामनी ।
कथिते द्वै च षट् चान्यान्य् एषां चाद्यः प्रजापतिः ॥६ ९ ॥
इसी प्रकार प्रजापति का एक नाम इन्द्र हो सकता है । अत : यहाँ पर इनके दो नामों का वर्णन है । इसके अतिरिक्त इनके छह अन्य नाम हैं , जिनमें से प्रजापति प्रथम है ।६ ९ ॥
विशेष — इस प्रकार यहाँ प्रजापति के आठ नामों की चर्चा मिलती हैं । इन आठ नामों में से चार नाम ब्रह्मणस्पति , वाचस्पति,’ क ‘ और प्रजापति इन्द्र स्थानीय देवों के विवरण में दिखाई देते हैं ।
शिष्टानि यानि नामानि तानि वक्ष्याम्यतः परम् ।
सत्पतिः कश्च कामश्च सदसस्पतिरेव च ॥ ७० ॥
इळस्पतिर्वाचस्पतिस् ततस्तु ब्रह्मणस्पतिः ।
तृतीयान्त्ये तु सूक्तस्य प्रथमं पञ्चमं च यत् ॥७१ ॥
इसके आगे अब मैं शेष नामों का उल्लेख करूंगा । ये हैं— सत्पति , क , काम ,सदस्पति , इळस्पति , वाचस्पति और पुनः ब्रह्मणस्पति । किसी सूक्त में इनमें से तृतीय औरअन्तिम तथा ( किसी में ) प्रथम और पञ्चम नाम मिलते हैं।७०-७१ ।।
१५. प्रजापति के नाम ऋग्वेद १.१ ९ के देवता
चतुभिरितरैस्त्वेनं न सूक्तं नाप्यृगश्नुते ।
सर्वाण्येव तु सर्वासां देवतानां प्रजापतेः ॥७२ ॥
नामानि कथयन्त्येते सम्यग्भक्तिदिदृक्षवः ।
तदाहुर्नैतदेवं स्याद् अष्टानामेष हि स्मृतः ॥७३ ॥
चार अन्य नामों से इनका न तो कोई सूक्त है और न ही कोई ऋचा । अब भक्ति – भावमें पूर्ण रूप से ओत – प्रोत रहने वाले कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि सभी देवताओं के सभी नामप्रजापति के ही ( तो ) हैं । इसी प्रसंग में अन्य दूसरे लोगों का मत है कि ऐसा नहीं माननाचाहिए , क्योंकि प्रजापति के केवल आठ नामों से ही स्मरण किया जाता है।।७२-७३ ।
तैरेव चास्य कल्प्यन्ते क्रतवश्च हवींषि च ।
मरुद्भिर्मध्यमस्थानैर् अयमग्निस्तु पार्थिवः ॥७४ ॥
नवकेनेह सूक्तेन प्रति त्यमिति संस्तुतः ।
मरुतां साहचर्यात्तु सूक्तेऽस्मिन्नाग्निमारुते ॥ ७५ ॥
मन्यते मध्यमं चैव यान्कोऽग्निं न तु पार्थिवम् ।
स्यादयं पार्थिवस्त्वेव तथा रूपं हि दृश्यते ॥७६ ॥
और केवल इन्हीं नामों से इन्हें यज्ञानुष्ठानजन्य हवियाँ पूर्णत : अर्पित की जाती है ।
अब , उन मरुतों के साथ जो मध्य – स्थानीय हैं , इस पार्थिव अग्नि की वहाँ नौऋचाओं वाले ‘ प्रतिर्तयम् ’ से आरम्भ ( ऋग्वेद १.१ ९ ) सूक्त में स्तुति की गयी है । यह सूक्तमूलत : अग्नि एवं मरुतों से ही सम्बद्ध है । इस विषय में यास्क का कथन है कि यहाँ अग्निका अभिप्राय पार्थिव अग्नि से न होकर मध्यम अग्नि से है । लेकिन यह केवल पार्थिव अग्निही है , क्योंकि यहाँ इसका ऐसा ही रूप है।७४-७६ ॥
१६. ऋचा या सूक्त में देवता के निर्धारण प्रकार
हूयसे पीतये चेति वैद्युते न तदस्ति हि।
अथ स्यादभिधानस्य देवतायाः पृथक् पृथक् ॥७७ ॥
इस प्रकार की स्तुति जैसे ‘तुम्हारा पान करने के लिए आवाहन करता हूँ’ को विद्युत् के लिए नहीं समझना चाहिए , अतः यह आह्वान पृथक् – पृथक् देवताओं के नामसे सम्बद्ध होना चाहिए।।७७ ||
ऋचोऽर्धर्चस्य पादस्य कथं ज्ञायेत दैवतम् ।
यथा निविदि सावित्र्यां स्तूयते कर्म कर्मणा ॥ ७८ ॥
यहाँ इस विषय में विधान किया गया है कि किसी ऋचा , आधी ऋचा और पादके देवता को किस प्रकार जानना चाहिए ? जिस प्रकार सविता के निविद् मन्त्रों में कहागया है कि किसी देवता के कार्य की कर्म के आधार पर ही स्तुति की जाती है ॥ ७८ ॥
दोग्ध्री धेनुर्वोढानड्वान् आशुः सप्तिः पुरंधिया ।
यथा च शंनोमित्रीया वरुणः प्राविता भुवत् ॥७ ९ ॥
जिस प्रकार दूध देने वाली गाय , अनड्वान ( गाड़ी में जुतने वाला बैल ) , तीव्रगति वाला ‘ सप्ति ’ और उद्योगशील स्त्री तथा ‘ शं नो मित्र : ‘ ( ऋ . १.९०.९ ) और ‘ वरुण: प्राविता भुवत् ’ ( ऋ . १.२३.६ ) मन्त्रों में है।।७९ ।।
विशेष — यहाँ क्रमश : ‘ मित्र ‘ और ‘ वरुण ‘ देवों का अभिप्राय ‘ कृपालु ‘ एवं ‘ रक्षक ‘ के रूप में ग्रहण करना चाहिए ।
सूक्तप्रायेणौभिरग्ने परीक्ष्यास्तत्र देवताः ।
शब्दानां द्वैपदादीनां द्विदैवबहुदैवतम् ॥८० ॥
‘ऐभिर अग्ने’ ( ऋ . १.१४.१ ) सूक्त के अनुसार– ( जिसमें एक साथ बहुसंख्यक देवों की स्तुति है ) सूक्त के अनुसार – सभी अवस्थाओं में सूक्त के सामान्य उद्देश्य के अनुसार ही देवताओं का परीक्षण करना चाहिए ।
इसी तरह दो या अधिक पद वाले शब्दों से दो अथवा अनेक देवता सम्बद्ध हो सकते हैं ।। ८० ।।
असंस्तुतं संस्तुतवत् प्रदिष्टं दैवतं क्वचित् ।
यत्र द्विदैवते मन्त्र एकवद्देवतोच्यते ॥८१ ॥
फिर भी यदि किसी देवता को किसी स्तुति में सम्बद्ध न किया गया हो , फिर भी उस देवता का कहीं उल्लेख हो तो उस देवता को भी स्तुति से सम्बद्ध माना जाता है ।
७१ तृतीय अध्याय
इसी के सदृश कहीं दो देवताओं को एक साथ सम्बोधित किसी मन्त्र में एकही देवता का एकवचन में उल्लेख हो सकता है । ८१ ॥
विभक्तस्तुति तद्विद्याद् बहुष्वबहुवच्च यत् ।
आशीर्वादेषु संज्ञासु कर्मसंस्थासु देवताः ।
बह्वयो ह बहुवत्तत्र द्विपदे यत्र संस्तुते || ८ २ ॥
उस प्रकरण विशेष में यह समझना चाहिए कि उसमें विभक्त स्तुति की गई हैऔर इसी प्रकार ऐसे मन्त्र में विभिन्न देवताओं का भी ‘अ-बहुवत्’ उल्लेख हो तो उसे भी इसी प्रकार स्वीकार करना चाहिए ।
ऐसे ही आशीर्वादात्मक मन्त्रों में , नामों के परिगणन में तथा समुख कर्मकाण्डपरकमन्त्रों में बहुत से देवता बहुवचन में मिलते हैं । इनको स्तुति की दृष्टि से दो देवताओं सेसम्बद्ध मानना चाहिए।।८२ ॥
१७. ऋभुओं और त्वष्टा का आख्यान
सुधन्वन आङ्गिरसस्यासन्पुत्रास्त्रयः पुरा ।
ऋभुर्विभ्वा च वाजश्च शिष्यास्त्वष्टुश्च तेऽभवन् ॥८३ ॥
प्राचीन समय में अङ्गिरस् के पुत्र सुधन्वा के ऋभु , विश्वा और वाज नामक तीनपुत्र हुए , और ये सभी त्वष्टा के शिष्य हुए || ८३ ||
विशेष— ऋग्वेद का ‘ ऋभु ‘ सूक्त ( ऋ . १.२० ) इसी दृष्टि से उपादेय है । उसमेंत्वष्टा के चमस् से ऋभुओं के द्वारा चार चमसों के निर्माण की प्रक्रिया दी गयी है ।
शिक्षयामास तांस्त्वष्टा त्वाष्ट्रं यत्कर्म किंचन ।
परिनिष्ठितकर्माणो विश्वे देवा उपाह्वयन् ॥८४ ॥
त्वष्टा ने उन्हें उन समस्त कार्यों की शिक्षा दी , जिनमें वे स्वयं पारंगत थे ।विश्वेदेवों ने , जो स्वयं भी समस्त कार्यों में निपुण थे , इन्हें चुनौती दी ॥८४ ॥
विश्वेषां ते ततश्चक्रुर् वाहनान्यायुधानि तु ।
धेनुं सबर्दुर्घा चक्रुर् अमृतं सर्वमुरुच्यते ॥८५ ॥
बृहस्पतेरथाश्विभ्यां रथं दिव्यं त्रिवन्धुरम् ।
इन्द्राय च हरी देवप्रहितेनाग्निनापि यत् ॥८६ ॥
इन लोगों ने विश्वेदेवों के लिये वाहनों और आयुधों का निर्माण किया । इन्होंनेदोहन से सब कुछ देने वाली गाय को तैयार किया । अमृत ही बृहस्पति का सर्वस्व कहा जाता है । फिर इन्होंने अश्विन – देवताओं के लिए तीन आसनों वाले दिव्य रथ और इन्द्र के लिए दो अश्वों को बनाया । देवों के द्वारा इनके पास भेजे गये अग्नि के माध्यम से भी इन्होंनेअपने कौशल का प्रदर्शन किया।।८५-८६ ॥
एकं चमसमित्युक्ते ज्येष्ठ आहेत्यथो दिवि ।
उक्त्वा ततक्षुश्चमसान् यथोक्तं तेन हर्षिताः ॥८७ ॥
जब उन्होंने अर्थात् अग्नि ने कहा कि ‘ एक चमस को चार कर दो ‘ ( ‘ एक चमसंचतुरं ’ ऋ . १.१६१.२ ) और जब इन लोगों ने ‘ ज्येष्ठ आह ‘ ( ऋ . ४.३३.५ ) ऋचा केअनुसार स्वर्गलोक में परस्पर परामर्श कर लिया तो उनके वचनों से हर्षित होकर इन्होंनेजैसा कि कहा गया है चार चमसों का निर्माण कर दिया।।८७ ॥
१८. ऋग्वेद १.२०-२१ के देवता
त्वष्टा च सविता चैव देवदेवः प्रजापतिः ।
सर्वान्देवान् समामन्त्र्य अमृतत्वं ददुश्च ते ॥८८ ॥
त्वष्टा तथा सविता और देवों के भी देव प्रजापति ने समस्त देवों को बुलाकर● ऋभुओं को अमरता प्रदान की । ८८ ॥
तेषामाद्यन्त्ययोर्नाम्ना दृश्यते बहुवत्स्तवः ।
तृतीयसवने तेषां तैस्तु भागः प्रकल्पितः ॥ ८ ९ ॥
इन ऋभुओं की पहले और अन्तिम नाम के साथ ऋग्वेद में , बहुवचन में स्तुति मिलती है ।तृतीय सवन में विश्वेदेवों के साथ इनके भाग का भी निर्धारण किया जाता है।।८९ ॥
अपिबत्सोममिन्द्रश्च तैस्तत्र सवने तेषां सह ।
स्तुतिरिदं सूक्तं त्वयमित्यष्टकं परम् ॥ ९ ० ॥
इन्द्र ने उस सवन के समय इन ( ऋभुओं ) के साथ सोमपान किया और उस सूक्त ( अयम , ऋ . १०.१० ) में , जिसमें आठ ऋचाएँ हैं , उनकी ही स्तुति की गई है।९ ० ॥
इहेन्द्राग्नी स्तुतौ देवौ तृतीयस्वादिरश्विनौ ।
हिरण्यपाणिं सावित्र्यश्चतस्त्रश्चाप्यथोत्तराः॥ ९ १ ॥
ऋग्वेद ( ऋ . १.२१ ) में दो देवताओं अर्थात् इन्द्र – अग्नि की स्तुति की गई है । तृतीय सूक्त के आरम्भ में आश्विनों की स्तुति है । तत्पश्चात् चारों ऋचाएँ ( हिरण्यपाणिम् १.२२.५-८ ) सविता को सम्बोधित है।९ १ ॥
एकाग्नेर्द्वे तु देवीनां द्वादश्यां देवपत्नयः ।
इन्द्राणी वरुणानी च अग्नायी च पृथक् स्तुताः॥९ २ ॥
७३ तृतीय अध्याय
इसके आगे एक नवीं ऋचा अग्नि को , लेकिन दसवीं और ग्यारहवीं ऋचादेवियों के प्रति कही गई है । इसी क्रम में बारहवें मंत्र में देवपत्नियों , इन्द्राणी और वरुणानीतथा अग्नायी की अलग – अलग स्तुति है।९ २ ॥
१ ९ . ऋग्वेद १.२२ ( क्रमशः ) , ऋग्वेद १.२३ के देवता पूषन् आघृणि
द्यावापृथिव्यौ द्वे च स्यात् स्योनेत्यृक् पार्थिवी स्मृता ।
देवानां इत्येषा सूक्तशेषस्तु वैष्णवः ॥ ९ ३ ॥
तत्पश्चात् दो ऋचाएँ ( १३ , १४ ) ‘ द्यावापृथिवी ‘ की स्तुतिपरक हैं । ‘ स्योना …. ‘से आरम्भ होने वाली ( १५ वीं ) ऋचा पृथिवी को सम्बोधित है । अतः देवो ….. ‘ ( १६ वीं )ऋचा विकल्प से विष्णु या अन्य देवता को सम्बोधित है , शेष सूक्त १७-२१ की ऋचाएँविष्णु को सम्बोधित हैं।।९ ३ ।।
वायोस्तीव्रेन्द्रवायुभ्यां द्वृचो द्वाभ्यां ततः परम् ।
तृचो मित्रावरुणयोस् तथेन्द्राय मरुत्वते ॥ ९ ४ ॥
तृचो विश्वेषां देवानां पूष्ण आघृणये तृचः ।
आसक्तो हि घृणिस्तस्य दध्नः पूर्णो दृती रथे ॥ ९ ५ ॥
‘ तीव्रा : ‘ ( १.२३.१ ) वायु को सम्बोधित है , उसके पश्चात् दूसरी और तीसरीदोनों ऋचाएँ इन्द्र वायु के लिए दो हैं । तदनन्तर मित्र – वरुण के लिए तीन ऋचाएँ ( ४६ ) और मरुतों के साथ इन्द्र के लिए भी तीन ऋचाएँ ( ७ – ९ ) हैं । इसके बाद की तीनऋचाएँ ( १०-१२ ) तथा तीन ऋचाएँ पूषा – आघृणि को समर्पित हैं । इन्हें पूषन् कहने केपीछे कारण यह है कि इनके रथ में एक ‘ घृणि ‘ अर्थात् चमकदार दही से पूर्ण चर्म – पात्रजुड़ा रहता है।।९ ४ – ९ ५ ।।
विशेष — अमरकोश के अनुसार ‘ घृणि ‘ शब्द किरण का पर्याय है ।
आघृणिस्तत्स्तुतः पूषा कीरिभी रिभ्यते ततः ।
यथा हि मधुनः पूर्णो दृतिरर्थ्यति चाश्विनौ ॥९ ६ ॥
आघृणि के रूप में भी पूषा की स्तुति है ( ऋ . १.२३.१४ ) और गायकों ने इनकीप्रशंसा की है । अश्विन् देवों का चमड़े का पात्र भी मधु से भरा हुआ है , अतः प्रार्थी उनकीभी इसी प्रकार स्तुति करता है ॥ ९ ६ ॥
आ वर्तनिं मधुनेति दृतिरेव च दृश्यते ।
अर्धाष्टमा अपां ज्ञेया अध्यर्धान्त्याग्निदेवता॥९ ७ ॥
आगे ‘ आ वर्तनि मधुना ’ ( ऋ.सं. ४.४५.३ ) मन्त्र में भी ‘ दृति ‘ का प्रयोग दिखाईदेता है । इसके आगे ( ऋ.सं. १.२२.१६-२३ ) सातों ऋचाएँ एवं एक अर्ध ऋचा आप्बृहद्देवता
( जल ) के प्रति समर्पित है और इसी सूक्त का २३ वी ऋचा का अर्ध भाग एवं उसके बादकी अन्तिम ( २४ वीं ) ऋचा के देवता अग्नि हैं ।। ९ ७ ।।
२०. ऋग्वेद १.२४-३० के देवता
कस्य नूनं तु काय्याद्या आग्नेय्यृक् सवितुस्तृचः ।
भगभक्तस्य भागी वा परं यच्चिच्च वारुणम्॥९ ८ ॥
‘ कस्य नूनम् ’ ( ऋग्वेद १.२४ ) सूक्त की पहली ऋचा ‘ क ‘ ( प्रजापति ) कोसम्बोधित है और इसके बाद की एक ऋचा ‘ अग्नेर्वयं ‘ अग्नि को सम्बोधित है । पुनः इसकेबाद की तीन ऋचाएँ सवितृदेव को तथा ‘ भग – भक्तस्य ‘ ( पाँचवीं ऋचा ) विकल्प से भगको ही सम्बोधत है । इसी क्रम में आगे की ऋचाएँ ( ऋ . १.२४.६-१५ ) एवं उसके बादका सूक्त ‘ यच् चित् ‘ ( ऋ.सं. १.२५ ) वरुणदेव के प्रति हैं ।। ९ ८ ।।
वसिष्वा हीति चाग्नेये ऋगग्नेर्मध्यमस्य तु ।
जराबोधेति विज्ञेया वैश्वदेव्युत्तमा नमः॥९९॥
‘ वसिष्वा हि ’ ( ऋ.सं. १.२६ ) और उसके बाद के सूक्त ( १.२७ ) दोनों ही अग्निको सम्बोधित हैं । लेकिन यहाँ ‘ जराबोध ….. ‘ मन्त्र ( ऋ . १.२७.१० ) को मध्यम अग्नि कोसम्बोधित मानना चाहिए और अन्त की ‘ नमो मरुद्भ्यो … ‘ ( ऋ . १.२७.१३ ) ऋचाविश्वेदेवों को सम्बोधित है ।। ९९ ।।
पराश्चतस्त्रो यत्रेति इन्द्रोलूखलयो स्तुतिः ।
मन्येते यास्ककात्थक्याव् इन्द्रस्येति तु भागुरिः ॥ १०० ॥
(‘ यत्र ‘ पद से प्रारम्भ चार ऋचाओं ( ऋ.सं. १.२८.१-४ ) को यास्क और कात्थक्य ने इन्द्र एवं उलूखल की स्तुतियाँ माना है , जबकि भागुरि के विचार में मात्र इन्द्रकी ही स्तुति है।।१०० ।
विशेष – आर्षानुक्रमणी में भी ये इन्द्र की ही कथित हैं ।
यच्चिड्यूलूखलस्य द्वे द्वे परे मुसलस्य तु ।
चर्माधिषवणीयं वा सोमं वान्त्या प्रशंसति ॥ १०१ ॥
‘ यच् चिद्धि ’ ( ऋ . १.२८.५ ) से शुरू होने वाली दो ऋचाएँ ( ५ , ६ ) उलूखल को और इसके बाद की दो ऋचाएँ ( ७ , ८ ) मूसल को समर्पित हैं और इसी भांति अन्तिम ऋचा में सोम का अभिस्तवन करने के लिए प्रयुक्त चर्म की प्रशंसा की गयी है ।। १०१ ॥
ऐन्द्र यच्चिद्धि सत्येति उत्तरं चाश्विनातृचात् ।
आश्विनादुत्तरः कस्त उषस्यस्तृच उत्तमः ॥ १०२ ॥
‘ यच्चिद्धि सत्य ’ ( ऋ . १.२ ९ ) तथा इसके बाद का सूक्त ( १.३० ) इन्द्र को
७५ तृतीय अध्याय
सम्बोधित है । ‘ आश्विना ’ से आरम्भ होने वाली तीन ऋचाएँ ( ऋ . १.३०.१७-१९ ) औरइसके बाद ‘ कस्ते … …. से ’ ( २०-२२ ) से आरम्भ होने वाली तीन अन्तिम ऋचाएँ उषा कोसम्बोधित हैं।।१०२ ॥
२१. ऋग्वेद १.३१-४० के देवता
( इनमें से १.३१ वें सूक्त से ३५ वें सूक्त तक हिरण्यस्तूप आङ्गिरस ही ऋषि हैं ) ।
स्तूयमानः शश्वदिति प्रीतस्तु मनसा ददौ ।
शुनः शेपाय दिव्यं तु रथं सर्वं हिरण्मयम् ॥ १०३ ॥
‘ शश्वत् ‘ ( ऋ . १.३०.१६ ) से आरम्भ ऋचा के माध्यम से स्तुति होने पर मनसे प्रसन्न इन्द्र ने शुन : शेप को स्वर्णनिर्मित एक दिव्य रथ प्रदान किया ।। १०३ ।।
आग्नेयं यत्त्वमैन्द्रे च त्रिश्चिदित्याश्विनं ततः ।
ऋतेऽर्थवादं कर्मैतद् इन्द्रस्येति तु शंसति ॥ १०४ ॥
‘ त्वमग्ने ‘ ( ऋग्वेद १.३१ ) से प्रारम्भ सूक्त अग्नि के प्रति है । इसके बाद इन्द्रको सम्बोधित दो सूक्त ( ऋ.सं. १.३२-३३ ) हैं । इसी क्रम में ‘ त्रिश्चिद् ‘ ( १.३४ ) अश्विनोंको सम्बोधित है । ‘ इन्द्रस्य ‘ ( १.३२ ) में विना किसी अर्थवाद के उल्लेख के ही इन्द्र केकार्यों की प्रशंसा है।।१०४ ॥
विशेष— ऋग्वेद के १.३२.५ मन्त्र में वृत्र एवं उनके संघर्ष का आख्यान है ।
पादोऽग्नये ह्रयामीति मैत्रावरुणः उत्तरः ।
तृतीयो रात्रिसंस्तावः सूक्तं सावित्रमुच्यते ॥ १०५ ॥
‘ ह्वयाम्याग्नि प्रथमं . … …. ’ ( ऋ.सं. १.३५ ) सूक्त के पहले मन्त्र का प्रथम पादअग्नि को और उसके बाद द्वितीय पाद मित्रावरुण को सम्बोधित है । तीसरे पाद में रात्रि कीस्तुति है । इस सूक्त के शेष मन्त्र सविता को सम्बोधित हैं।।१०५ ॥
पञ्चैतानि जगो दृष्ट्वा सूक्तान्याङ्गिरसो मुनि ।
हिरण्यस्तूपतां प्राप्य सख्यं चेन्द्रेण शाश्वतम् ॥१०६ ॥
ऋग्वेद के इन पाँच सूक्तों ( ऋ . १.३१-३५ ) का पाठ ऋषि अङ्गिरस के पुत्र के द्वारा किया गया । इनको हिरण्यस्तूप का पद प्राप्त हो गया था और साथ ही इन्द्र के साथ इनकी शाश्वत मित्रता हो गई थी । ॥ १०६ ॥
आग्नेयं प्रेति मरुतां क्रीळं त्रीणि पराण्यतः ।
उत्तिष्ठ ब्राह्मणस्पत्यं यं रक्षन्ति त्रयस्तृचाः ॥१०७ ॥
‘प्र वो यह्वम् ..’ सूक्त ( ऋ . १.३६ ) अग्नि को सम्बोधित है । ‘क्रीळेव:’ ( ऋ . १.३७ ) से आरम्भ बाद के तीन सूक्त मरुतों को सम्बोधित हैं । ‘ उत् त्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते ….. “
बृहद्देवता ७६
( ऋ . १.४० ) सूक्त ब्रह्मणस्पति को सम्बोधित है । ‘ यं रक्षन्ति प्रचेतसो ‘ ( ऋ . १.४१ ) सूक्तमें ऋचाओं के तीन त्रिक अर्थात् नौ मन्त्र मिलते हैं ।। १०७ ।।
२२. ऋग्वेद १.४१-४७ के देवता
वरुणार्यममित्राणां मध्य आदित्यदैवतः ।
पौष्णं सं पूषन्षड्रौद्रयस् तृतीया न तु केवला ॥ १०८ ॥
इसी प्रकार ऋग्वेद के सूक्तों ( १.४१-४७ ) की ऋचाओं के तीन त्रिकों में सेप्रथम और तृतीय ( क्रमश : १-३ ) और ( ७ – ९ ) वरुण , अर्यमा और मित्र को सम्बोधित हैं ।तत्पश्चात् रुद्र को सम्बोधित छह ऋचाएँ भी ( ऋ . १.४३.१-६ ) हैं , जिनमें से तृतीय मेंयद्यपि अकेले रुद्र की स्तुति नहीं की गई है ॥ १०८ ॥
मित्रेण वरुणेनात्र विश्वैर्देवैश्च संस्तवः ।
उक्तमत्रर्षिणा पूर्वम् आदेशाद्दैवतं विना ॥ १० ९ ॥ ॥
ज्ञातुं न शक्यते लिङ्गात् तथापि क्वचिदुच्यते ।
आदित्या वसवो रुद्रास् त्वमग्न इति संस्तुताः ॥११० ॥
‘ यथा नो मित्रो ’ ( ऋ.सं. ४३.३ ) मन्त्र में मित्र , वरुण और विश्वेदेवों के साथ रुद्र की भी स्तुति है । शौनक ऋषि ने इस बात की पहले ही चर्चा की है कि बिना किसी आदेश के केवल लिङ्ग या विशिष्ट लक्षण के आधार पर देवता को नहीं जाना जा सकता है । तथापि कुछ स्थलों पर देवता का इस प्रकार उल्लेख है , यथा ‘ त्वम् अग्ने ‘ ( ऋ . १.४५.१ ) में आदित्यों , वसुओं , रुद्रों की एक साथ ( अग्नि के साथ ) स्तुति है।।१०९ -११० ।।
तिस्त्रः सौम्योऽग्न आग्नेये प्रगाथेनाश्विनौ स्तुतौ ।
सहोषसा लिङ्गभाजा अयं सोमः सुदानवः ॥ १११ ॥
अधर्चो देवदेवत्य एषो इत्याश्विने परे।
आदित्यं मन्यते यास्को हविषेति सह स्तुतम्॥११२॥
सोम को सम्बोधित तीन मन्त्र ( ऋ.सं. १.४३.७ – ९ ) हैं । ‘ अग्ने ….. ‘ से प्रारम्भ दो सूक्त ( ऋ.सं. ४४ एवं ४५ ) अग्नि को सम्बोधित हैं । इसी स्थान पर ‘ प्रगाथ ‘ द्वारा उषस् के साथ उन अश्विनों की स्तुति है , जो उषस् के लक्षणों से युक्त हैं । ‘ अयं सोमः सुदानवः ‘ ( ऋ . १.४५.१० ) भी इसी प्रकार की ऋचा है जिसके देवता देवगण हैं । ‘ एषो ‘ से प्रारम्भ परवर्ती दो सूक्त ( ऋ.सं. ४६ एवं ४७ ) अश्विनों को सम्बोधित हैं । यास्क का मत है कि ‘ हविषा …. ‘ मन्त्र में ( ऋ.सं. १.४६.४ ) आदित्य की भी साथ ही स्तुति है।।१११-११२ ॥
२३. ऋ.सं. ४८-६० सव्य का आख्यान एवं शतर्चिन् गण
सहौषसे ततः सौर्यम् उदु त्यमिति संस्तुतः ।
द्युभक्तिर्येन वरुणो रोगघ्नस्तृच उत्तमः ॥११३ ॥
७७ तृतीय अध्याय
‘ सह ‘ पद से प्रारम्भ दो सूक्तों का सम्बन्ध उषस् से है । तत्पश्चात् ‘ उद् उ त्यम् ‘ ( १.५० ) सूर्य को सम्बोधित है । इसी तरह से ‘ येन ‘ ( ४.५०.६ ) मंत्र में आकाशके साथ वरुण की स्तुति है । इसका अन्तिम त्रिक ( ऋ.सं. १.५०.११-१३ ) रोगनाशक है ।। ११३ ॥
रोगापनुत्तिराद्याभ्याम् उद्यन्निस्युत्तमे तृचे ।
अर्धर्चे तु द्विषद्द्वेषः ऐन्द्रः सव्यः शतर्चिषु ॥११४ ॥
इस सूक्त में ‘ उद्यन् ‘ से आरम्भ अन्तिम तीन ऋचाओं में से प्रथम दो ( ऋ .१.५०.१ इत्यादि ) में रोग के निवारण का उल्लेख है । लेकिन इसी क्रम में अन्तिम मन्त्रकी आधी ऋचा में शत्रुओं के प्रति द्वेषभाव प्रकट किया गया है।।११४ ॥
स्वयमिन्द्रसमं पुत्रम् इच्छतोऽङ्गिरसो मुनेः ।
वज्रयेव सव्यो भृत्वर्षेर् योगित्वात्पुत्रतांगतः ॥ ११५ ॥
इन्द्र की भांति पुत्र की इच्छा रखने वाले अङ्गिरस् मुनि के, इस ऋषि के योगीहोने के कारण , स्वयं इन्द्र ही पुत्र का रूप धारण करके सव्यसंज्ञक पुत्र बन गये ।
( ये सव्य आङ्गिरस ही सात सूक्तों ( ऋ.सं. १.५१ से १.५७ तक ) के द्रष्टा हैं ।इन सूक्तों की मन्त्र – संख्या १०० से ऊपर होने के कारण इन्हें शतर्ची कहा जाताहै ) || ११५ ॥
विशेष — सर्वानुक्रमणी में भी इस सन्दर्भ का उल्लेख है — ‘ अङ्गिरा इन्द्रतुल्यंपुत्रम् इच्छन्न् अभ्यध्यायत् सव्य इतीन्द्र एवास्य पुत्रोऽजायत । ‘
प्रथमे मण्डले ज्ञेया ऋषयस्तु शतर्चिनः ।
क्षुद्रसूक्तमहासूक्ता अन्त्ये मध्येषु मध्यमाः ॥११६ ॥
ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के ऋषियों को शतर्ची समझना चाहिए , जबकि अन्तिममण्डल में लघुसूक्तों तथा महासूक्तों के ऋषि तथा मध्यवर्ती मण्डलों में मध्यम स्तरीय ऋषिसमझना चाहिए।।११६ ॥
विशेष — ‘ शतर्चिन आद्यमण्डलेऽन्त्ये क्षुद्रसूक्तमहासूक्ता मध्यमेषु माध्यमाः ‘( सर्वानुक्रमणी २.२ ) ।
नवकं जातवेदस्यं नू चिद् यत्तु वया इति ।
वैश्वानरीयं तत्सूक्तं वह्निमाग्नेयमुत्तरम् ॥११७ ॥
नौ ऋचाओं वाला ‘ नू चित् ‘ ( ऋ . १.५८ ) सूक्त जातवेदस् को सम्बोधित है और‘ वया : ‘ ( १.५ ९ ) से आरम्भ सूक्त वैश्वानर को तथा इसके पश्चात्वर्ती ‘ वह्निम् ‘ ( ऋ . १.६० )सूक्त अग्नि के प्रति है । ११७ ॥