पञ्चम सुमन · प्रकरण 63

बाजारू अन्न खानेका निषेध

मुद्रित पृष्ठ 533–540 8 पृष्ठ

533उपकार कर सकता है । तब ' घृतपक्क अन्न ब्राह्मणगरण रसनाके लौल्यसे खाते हैं ' यह आक्षेप असत्य ही है, किन्तु वह विशुद्ध होने से ही सेवनीय है । यहाँ शास्त्रीयता ही है ।

( ५७ ) बाजारू अन्न खानेका निषेध ।

आजकलके व्यक्ति कहते हैं कि- ' खान - पानसे क्या होता है? ' परन्तु यह जानना चाहिये कि खान - पान में ही सभी कुछ निर्भर है । बाजारोंमें जो अन्न बेचा जाता है, उसमें एक निर्धन अन्त्यज वा मुसलमानकी दृष्टि भी पड़ती है । ( दृष्टिका क्या प्रभाव होता है- इसे अग्रिम निबन्धमें देखिये ) गर्म - गर्म मीठे पूएको देखकर उसका मन ललचाता है, मुखमें लार आ जाती है, लेकिन धनाभावादिके कारण वह खरीद नहीं सकता । तब जैसा मन उस निम्न जाति वालेका था; उसका प्रभाव उस भोज्य - वस्तुपर भी पड़ता है । आपने वही वस्तु खरीदी, और वह आपके भीतर पहुँची, वह भी वैसा ही प्रभाव करेगी । आपकी बुद्धि भी वैसी ही होगी, जैसी निम्न- जाति वालेकी थी । अन्नसे ही मन वनता है, ' जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन ' यह लोकोक्ति प्रसिद्ध है । छान्दोग्यका उद्दालक- श्वेतकेतुसंवाद पहले दिखलाया ही जा चुका है कि हम जो खाते हैं, उसके तीन भाग बनते हैं; मल, माँस और मन । हम जो पीते हैं; उसके भी मूत्र, रुधिर, प्रारण यह तीन भाग बनते हैं । इस प्रकार घृतके भी तीन भाग होते हैं, हड्डी, मज्जा, वाणी ।

संसारमें मन, वाणी, प्राणोंसे ही काम होता है, और वे अन्न, जल और घृतसे बनते हैं । तो अन्न, जल, घृत यदि शुद्ध हैं, 534निम्न- पुरुषकी दृष्टिसे रक्षित हैं; तब तो शुद्ध मन, प्रारण, वाणीके उत्पादक होंगे । विपरीत होने पर वे भी विपरीत होंगे । इसलिए कामीके अन्न खानेसे कामी, लोभी के अन्न खाने से लोभी, और ज्ञानीका अन्न खानेसे पुरुष ज्ञानी होता है । इसीलिए ही हमारे पूर्वज सब जातियोंका अन्न नहीं खाते थे, केवल सात्त्विक ब्राह्मणोंका, उसमें भी अपने वर्गके ब्राह्मणका बनाया, अथवा स्वयं निष्पादित अन्नका उपयोग करते थे । उसमें यही रहस्य था, जिसे न जानकर अर्वाचीन व्यक्ति उनपर तथा वैसे कहनेवाले शास्त्र - वचनोंपर उपहास करते हैं, और उनके खण्डनकी चेष्टा करते हैं ।

बाजारी पके हुए अन्नमें क्या कभी अपेक्षित पवित्रता, घृतकी शुद्धि, अन्नकी शुद्धि या जलकी शुद्धि हो सकती है? आजकल जो हमारे मन, प्राण और वाणियां भ्रष्ट हो रही हैं; उससे हम प्राचीनोंके वचनोंके रहस्य जानने में समर्थ न होकर उनपर फबतियां कसते हैं; उसमें कारण अन्नदोष ही होता है । ' अन्नदोषाच्च मृत्युर्विप्राञ्जिघांसति ' ( ५४ ) इस मनुके वचनमें जो कि अन्नदोषसे अकाल - मृत्यु कही है; उसमें अतिशयोक्ति नहीं; न ही उसमें असत्यता है । क्योंकि शारीरिक मृत्यु मूत्र, पुरीष, रक्त तथा हड्डियोंकी विकृतिसे होती है, विचार - सम्बन्धी मृत्यु होती है मन, वाणी और प्राणकी विकृतिसे । मल - मूत्र, रक्त - मांस, मज्जा- अस्थि, मन - वाक् - प्राण आदि सभी छान्दोग्यके पूर्वोक्त - वचनसे खान - पानके ही परिणाम होते हैं - यह विज्ञान - सिद्ध बात है; तब सब प्रकारकी अकालमृत्यु अन्नकी अशुद्धिका ही परिणाम सिद्ध

535बाजारू अन्न खानेका निषेध

हुई – इसमें थोड़ा भी सन्देह न रहा ।

पाश्चात्य देशों में युद्धों तथा तन्मूलक मृत्युओंका मूलकारण तामसिक - भोजन ही है- इस प्रकार यहां प्रत्यक्षका भी अनुग्रह है । दुष्ट अन्न वा दुष्टका अन्न खानेसे मन - वाणी आदिमें वैषम्य आ जाने से काम - क्रोध - लोभ - मोह - ईर्ष्या - अभिमान आदि शत्रुषड् - वर्ग की वृद्धिमें पुरुष दूसरेकी स्त्रीसे, वा दूसरेकी भूमिसे, वा दूसरेके धनसे सम्बन्ध करता हुआ, वा दूसरेसे कलह करता हुआ, पारस्परिक - द्वन्द्व उपस्थित होने पर, एक दूसरेपर अस्त्र - शस्त्रादि द्वारा प्रहार प्रारम्भ हो जानेपर जो कि दूसरेको मार देता है, वा स्वयं मारा जाता है, उसमें कारण अन्नदोष ही है । इसी बात को लक्ष्य करके ही शास्त्रोंमें वाजारू अन्न खानेका निषेध आया है । जैसे कि — श्रीआपस्तम्बमुनिने अपने धर्मसूत्रमें कहा है- ' नापणीयमन्नमश्नीयात् ' ( १।१७११४ ) ' शुना वा अपपात्रेण वा दृष्टम् [ तदपि अन्नमभोज्यम् ' ] ( १।१६।३० ) । यह वचन विज्ञान - सिद्ध होनेसे सत्य ही है, यह ' आलोक ' पाठकोंने अनुभूत किया होगा । आजकल हमारे मन, प्राण, वाणियां जो भ्रष्ट हो रही हैं; इन सबका कारण अन्नदोष ही है । तब ' हिन्दुधर्म प्रन्थोंमें अन्नमें धर्माधर्मका सम्बन्ध क्यों जोड़ा जाता है ' - ऐसा आपाततोदर्शियोंका कथन समाहित हो गया । वेदों में जो ' सग्धिश्व मे, सपीतिश्च मे, आयुष्मन्तः सहभक्षाः स्याम ' यह कथन आता है, यह अपने वर्ग वा पारिवारिक जनोंके लिए या ऋत्विजोंकेलिए है; सर्वसाधारण केलिए नहीं - यह हम अन्य किसी पुष्पमें विकसित करेंगे ।

536( ५८ ) दृष्टि - दोष ।

दृष्टिका प्रभाव सुकुमार वस्तुओं पर अधिक पड़ता है । दृष्टिदोष से गाय - भैंस का दूध थोड़ा हो जाता है, हँसते हुए बालक रोते हुए दीख जाते हैं; प्रसन्न मनवाले बच्चे उदास हो गये हुए दीखते हैं, उसमें कारण दूसरेकी दृष्टिका होता है, पाश्चात्य विद्वान् इच्छाशक्ति ( Will - Power ) को मानते हैं; तब उन्हें दृष्टिदोष मानने में भी कोई आपत्ति नहीं हो सकती । यदि इच्छाशक्तिका प्रभाव होता है, तब इच्छाशक्तिकी केन्द्रभूत दृष्टिका प्रभाव भी पड़ेगा ही । इसीलिए हमारे शास्त्रकारोंने प्रातः उठकर अपने हाथके दर्शनका विधान किया है - जिसे हम घारम्भमें बता चुके हैं ।

निद्रावस्थामें ऊष्माके इकट्ठे हो जानेसे नेत्र सुकुमार हो जाते हैं । तब यदि कोई कुत्सित पदार्थ सामने आ जावे तो उसका प्रभाव नेत्रपर तत्क्षण पड़ जाता है । अपने हाथके दर्शन से नेत्रका तेज हाथमें प्रविष्ट होकर फिर हमारे शरीर में प्राप्त होता है, उसका विनाश नहीं होता । यदि निकृष्ट पदार्थ दृष्टिपथमें पड़ जाय; तो उसका दुष्प्रभाव भी झट हो जाता है ।

किसीकी आंख यदि गर्मी में आजावे; स्वच्छ आंखों वाला यदि उसकी आंखको बार - बार देखे; तो उसकी आंख भी वैसी हो जाती है । ऐसा क्यों होता है? उसमें उत्तर यह है कि ध्याताकी आंखकी ज्योतिकी किरणें जब किसी ध्येय - पदार्थ में प्रविष्ट होती हैं; अथवा उस पदार्थसे टक्कर खाती हैं; तब उसके मुकाबलेमें वे किरणें- गुण - दोषके साथ उसके प्रतिबिम्बको लेकर नेत्रों में वापिस लौटतेः

537२३७ हैं; क्योंकि जो पदार्थ जिस मूल कारणसे पैदा होता है; फिर उसी में वह विश्रान्त होता है । मिट्टीका ढेला आकाशमें ऊपरको फेंका हुआ भी फिर पृथिवीमें आकर ही विश्राम लेता है । इस प्रकार नेत्रकी किरणें भी गुण - दोष लेकर फिर नेत्र में ही प्राप्त होती हैं । उसका प्रभाव मन पर और मनका प्रभाव शरीरपर होता है ।

इस प्रकार दृष्टिका दोष सदा ही होता है; पर प्रातःकाल तो विशेष होता है; क्योंकि नींद में सारी रात आँख बन्द होने के कारण आँखों में बाहरी पदार्थके देखनेका कार्य नहीं होता; तब वे आंखें रूपादि - विकार से रहित होकर मिट्टी के पात्रकी भांति हो जाती हैं । तब प्रातः आँख खुलने पर जिस पदार्थका प्रतिबिम्ब उन पर पड़ता है, उसीका प्रभाव अधिकतासे होता है । जव मिट्टीके पात्र में पहले तैल भरा जाए; उसमें तेलका प्रभाव इतना दृढ़ हो जाता है कि — कोई पदार्थ उसमें रखा जावे; वह तेलके प्रभावसे मुक्त नहीं होता । इस प्रकार दृष्टिदोषके प्रभावसे भी पुरुष नहीं छूटता ।

वैज्ञानिकोंके मतमें एक शक्ति होती है, जिसे वह आकाशी शक्ति कहते हैं - वह मस्तिष्कसे प्रवाहित होकर मनोवृत्तिके साथ सम्बन्धित हो जाती है, और स्नायुपथ से प्रवाहित होकर हाथ - पाँव आँख, एड़ी आदि तक प्राप्त हो जाती है । इसके द्वारा वह अन्तड़ियों में प्रभाव डालती है । सबसे अधिक इसका प्रभाव हाथके स्पर्श- द्वारा होता है 1

। उसकी अपेक्षा न्यून मात्रा में दृष्टि - द्वारा उस शक्तिका दूसरेके भोजन वा दूसरी वस्तुपर प्रभाव पड़ता है । अवर - कोटि वाले, तमोगुणी वा उस वस्तुकी प्राप्तिसे रहित पुरुषोंकी विषाक्त - दृष्टि 538अन्नमें संक्रान्त होकर उस अन्न खानेवालोंकी हानि कर दिया करती है । जैसे कि प्रसिद्ध है - ' श्वा तु दृष्टिनिपातेन ' ( मनु ० ३।२४१ ) ' कुत्ता दृष्टि डालने से अन्नको खराब कर दिया करता है । ' चाण्डालश्च वराहश्च कुक्कुटः श्वा तथैव च । रजस्वला च पण्ढश्च नेतेरन् अश्नतो द्विजान् ' ( मनु ० ३।२३६ ) ' अन्त्यज, सुअर, मुर्गा, कुत्ता, रजस्वला स्त्री और नपुंसक यह लोग जीमते हुए ब्राह्मणोंको न देख सकें, ऐसा प्रबन्ध करना चाहिये । ' यह भी कहा है- ' हीनदीन - क्षुधार्तानां पाषण्डस्त्रैण - रोगिणाम् । कुक्कुटाहिशुनां दृष्टि- जने नैव शोभना ' क्योंकि हीन एवं दीन लोगोंकी हीन दृष्टि जब अन्न पर पड़ती है; तत्फल - स्वरूप उसको खाने वालेको अजीर्ण आदि हो जाता हुआ देखा गया है । नेत्रोंकी अदृश्य किरणें सामनेके पदार्थ पर पहुँचती हैं — यह नैयायिकोंका सिद्धान्त प्रसिद्ध है ही । तब निम्न- जातिबालों वा निम्न - प्रकृतिवालोंकी तीक्ष्ण - लालसासे पूर्ण, उस वस्तुके न मिलनेके कारण हुए - हुए अपने दुःख वा अभिशाप से भरी हुई नेत्ररश्मियाँ दृश्य वस्तु पर अपना प्रभाव डालें; इसमें आश्चर्यका कोई असर नहीं । इसलिए प्रसिद्ध है कि – ' दृष्टि पत्थरको भी फोड़ देती है । '

दृष्टि तथा कुदृष्टिमें कैसी शक्ति है - यह आजकल मैस्मरेजम, हिपनोटिज्म आदि द्वारा प्रमाणित हो चुका है । उसमें दृष्टि द्वारा तथा हाथके संकेत से पुरुषको लेटाया जाता है, उठाया जाता है, निर्बल करके उसे मूर्च्छित भी कर दिया जाता है । इस प्रकार छोटे बच्चे तथा स्त्रियोंपर भी निर्बलता के कारण दूसरेकी दृष्टिका

539शूङ्गादिके भोजनका निषेध

प्रभाव आक्रमण करता है, इसलिए स्त्रीकेलिए पढेका विवान शास्त्रों में दीखता है, इसमें कुछ भी असत्यता नहीं ।

अन्य यह भी जान रखना चाहिये कि - सुफेद वस्तु पर नज़र जल्दी लगती है; क्योंकि सुफेद वस्तुमें दूसरेकी दृष्टि पहुँचकर निकल जाती है; पर काली वस्तु दूसरेकी दृष्टिको आत्मसात् कर लेती है; वह निकल नहीं पाती । अतः दूध आदि सुफेद बस्तु पर काला कोयला रख देते हैं, जिससे उसे नज़र न लगे । मन्दिरों में राधाकी मूर्ति गोरी और श्रीकृष्णकी काली होती है । उसमें भी यही दृष्टिका आदान - प्रदान सम्बन्धका विज्ञान स्थित होता है । सुफेदका हमारी दृष्टि आकर्षण करती है; और कालीको हमारी दृष्टि आकर्षित नहीं कर पाती । यही दृष्टि - विज्ञान में भी जाना चाहिए ।

( ५६ ) शूद्रादिके भोजनका निषेध ।

स्पर्शसे एकके शरीरसे दूसरेके शरीर में रोग संक्रान्त हो जाते हैं । मिस हेलनने यन्त्र द्वारा स्पष्ट प्रमाणित कर दिया है कि- हाथ से हाथ मिलानेसे भी रोगके बीज एक - दूसरे में संक्रान्त हो जाते हैं । केवल रोग ही नहीं; बल्कि स्पर्शसे शारीरिक एवं मानसिक वृत्तियों पर भी प्रभाव हो जाता है । प्रत्येक मनुष्य में विद्युत् - शक्ति रहा करती है, जो मनुष्यकी प्रकृति तथा चरित्रके भेदसे विभिन्न - विभिन्न होकर रहती है । तामसिक व्यक्तियों में तमोमयी, राजसिक लोगों में वह विद्युत् - शक्ति रजोमयी और सात्त्विकों में सत्त्वगुणमयी हुआ करती है ।

540श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )

तब जैसे आचरण वालोंके साथ निवास होगा, जिस वृत्ति वाले व्यक्तियोंसे हुए हुए वा दिये हुए अन्नका उपयोग किया जायगा, वैसी ही वृत्ति वा प्रभाव सहवासियों वा सहभोज करने वालों पर पड़ेगा । भिन्न - भिन्न विद्युत्की प्रकृतिका परिणाम एक- दूसरे पर हुआ करता है । अतः दूसरेसे हुए हुए अन्नका सेवन नहीं करना चाहिये | हिन्दुधर्म - शास्त्रों में नीच, अपवित्र, पापी, शूद्र, चाण्डाल आदि से स्पर्श किये वा बनाये अन्न ग्रहणका जो निषेध है, वह इसी कारण है । इस प्रकार मुसलमान तथा ईसाइयोंके अन्न ग्रहणका भी पूर्वोक्त कारणों से निषेध है ।

आर्यसमाज मूर्खोको शूद्र मानता है; तब उनके अन्न खानेसे भी मूर्खता बढ़ेगी ही तो । कणाद - जैसे सुनि अन्न कणोंको स्वयं इकट्ठा करके खाया करते थे; उनके कैसे विशुद्ध - बुद्धिके ग्रन्थ बने? परन्तु स्वा ० दयानन्द स्वयं शूद्र - भोजनका आदेश कर गये; तब उनके खानेवाले भी विधवा - विवाह आदि शास्त्र - विरुद्ध आचारोंमें क्यों न लगें? क्योंकि - - स स्वा ० द ० जीके अनुसार विधवा - विवाह शूद्रों में ही होता है ।

( ६० ) ग्रहण में भोजनादिका निषेध ।

सूर्य और चन्द्रके प्रहण समय में जल तथा अन्नादिमें विषोत्पादक कीटाणु बहुलतासे हो जाते हैं । इसका अनुभव अणुवीक्षण - यन्त्र से किया जा सकता है । इसीलिए ऋषियोंने पात्रोंमें कुश डालनेकी आज्ञा दी थी, क्योंकि सभी कीटाणु कुशों में आजाते हैं । ग्रहणके बाद कुशा बाहर फैंक दी जाती हैं ।

In English

The Prohibition of Market Food and the Effect of Sight

This text argues that food consumed in public markets can corrupt a person's mind, speech, and life force due to the mental states of those who look at it. It also explains how sight can transfer qualities between objects and people, emphasizing why one should protect their senses, especially upon waking.

This chapter answers

  • Why is market food prohibited in hinduism?
  • How does food affect the mind and speech?
  • What is drishti dosha?
  • Why should one look at their hands after waking up?

Also written: Bajaru, Anna, Khaneka, Nishedha, Bajaru Anna Khaneka Nishedha, बाजारू अन्न खानेका निषेध

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 533–540 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

पृष्ठ 533 से मूल ग्रन्थ पढ़ें →