पञ्चम सुमन · प्रकरण 64
पंक्ति भोजन समाप्त होनेपर इकट्ठा उठना
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541इसलिए ऋषियोंने ग्रहणके बाद स्नानकी व्यवस्था आदिष्ट की है । गर्भवती स्त्रियाँ बाहर नहीं निकलतीं; नहीं तो भविष्यद् - चालकके किसी अवयव में काले चिन्ह हो जाते हैं । जुयालोजी - विषयके प्रोफेसर मिस्टर टारिस्टनने पर्याप्त अनुसन्धान करके सिद्ध किया है कि - सूर्य - चन्द्र के ग्रहण - समय में उदरकी पाचनशक्ति कम हो जाती है । तब भोजन करनेपर अजीर्ण तथा उससे बहुत रोगोंकी आशंका रहती है । इसलिए हमारे शास्त्रों में सूर्य - चन्द्र - ग्रहणके समय भोजन निषिद्ध किया गया है । इस विषय में अधिक ' चतुर्थपुष्प ' में ' ग्रहणविषय ' में देखिये ।
( ६१ ) समान वर्णवालोंकी पंक्ति में भोजन 1
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंका जो एक - दूसरेकी पंक्ति में बैठकर भोजनका निपेध है, और अपने - अपने वर्णकी पंक्तियों में बैठकर जो भोजनकी आज्ञा है, उसमें कारण यह है कि प्रत्येक वर्णकी बिजली वा प्रकृति जन्मसे ही एक - दूसरे से विलक्षण होती है । उसका दूसरे की प्रकृतिपर संक्रमण होना स्वाभाविक है । अपनी अपेक्षा निम्न श्रेणीके व्यक्तियोंके साथ बैठकर भोजन करनेसे अपनी उच्च - गुणवाली विद्युत् मलिन हो जाती है । अथवा नानाजातीय विद्युतके विपरीत - संघर्ष से किन्हींको भोजन हज़म नहीं होता । अथवा निम्न विचार हो जाया करते हैं ।
( ६२ ) पंक्तिके भोजन समाप्त होनेपर इकट्ठा उठना ।
एक वर्णवालोंकी पंक्तिके भोजन समय में यह ध्यान देना चाहिये कि जितने आदमी इकट्ठे बैठें; वे इकट्ठा ही भोजन शुरू करें; और 542इकट्ठा ही समाप्त करें, और इकट्ठे ही उठें; क्योंकि –पंक्ति - भोजनके समय सबके शारीरिक - यन्त्र में क्रियाविशेषवश और इकट्ठे बैठने से सभीके भीतर एक ही विद्युत्की शृङ्खला वन जाती है । उनमें जो पहले उठेगा; यदि वह दुर्बल मनःशक्ति वाला है; तो उसकी विद्युत्- शक्ति बाकी बैठे हुओं से खिंच जाएगी; जिससे पहले उठे हुए व्यक्तिको भोजन नहीं पचेगा; उसकी मनःशक्ति और भी दुर्बल हो जावेगी ।
यदि पहले उठनेवाला भीतरसे अधिक शक्तिशाली है; तो सब बैठे हुत्रकी विद्युत् शक्तिको खैंचकर उठेगा, जिससे दूसरोंके उदरमें विकार हो सकता है । अतः पंक्ति भोजन में इकट्ठे ही बैठना चाहिये, और इकट्ठे ही उठना चाहिये । बल्कि शेष खाने वालोंकी भोजन- समाप्तिसे पूर्व हाथ भी नहीं धोना चाहिये, आचमन भी नहीं करना चाहिए । खा चुकनेपर भी भोजनका एक - आध करण साथ खाते ही रहना चाहिए ।
( ६३ ) भोजन के बादके नियम ।
( क ) भोजनके बाद कठिन श्रम, वा शीघ्र दौड़ नहीं कर चाहिये; उससे रक्त - संचलन अधिक हो जाने से पाकक्रियामें बाधा उपस्थित हो जाती है । ( ख ) भोजनके बाद कुल्ला करना चाहिये- जिससे दान्तों में उच्छिष्ट न रह जावे । दांतों द्वारा ही सब रोग प्रारम्भ होते हैं I । उनमें जूठन बहुत देर तक रहे तो दांतोंमें मैल होजानेसे उसका रस भीतर जाने से हानि प्राप्त होती है । दांत भी जल्दी टूटते हैं; दन्तशूल भी हो जाता है । ( ग ) फिर हाथ धोकर
In English
Rules for Eating and Post-Meal Conduct
This text explains the spiritual and physical rules regarding eclipses, social dining arrangements, and post-meal habits. It argues that eating during an eclipse disrupts digestion and that people of different social classes should eat in separate groups to prevent the exchange of different natural energies. It also instructs that group meals should begin and end at the same time to maintain balanced energy levels among participants.
This chapter answers
- Why is eating prohibited during a solar or lunar eclipse?
- Why do different varnas eat in separate rows?
- Why should people start and end a meal at the same time?
- What are the rules for behavior after eating a meal?
Also written: Pankti, Bhojana, Samapta, Honepara, Ikattha, Uthana, Pankti Bhojana Samapta Honepara Ikattha Uthana, पंक्ति भोजन समाप्त होनेपर इकट्ठा उठना