पञ्चम सुमन · प्रकरण 62
घृतपक्व भोजन की शुद्धताका विज्ञान
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529वन्द रह जाते हैं ।. यदि स्नान न किया जावेगा; तो रोमकूपोंके मलावृत होने से उनके द्वारा भोजनकी ऊष्मा बाहर नहीं निकल सकेगी, उससे भीतर बड़ी हानि पहुँचती है; उससे भीतर मल बना रहेगा । तब ' अस्नायी समलं भुङ्क्ते ' वाली बात ठीक है । उसका बुद्धि और मस्तिष्कपर कुप्रभाव रहता है । इसलिए स्नान न करनेवाली मुसलमान - आदि जातियां भी मस्तिष्ककी कमजोरीसे युक्त होती हैं— अतः हृदयहीन भी होती हैं । ( ञ ) चलते हुए भी भोजन ठीक नहीं; क्योंकि चलते समय रक्तकी गति तीव्र होती है; उस समय भीतर डाला हुआ भोजन रक्तको विकृत कर दिया करता है, रक्तके विकृत होने से अन्न ठीक हज़म नहीं होता । शान्त - चित्तसे रक्तगतिकी समतामें ही भोजन करना लाभदायक होता है । ' अब्राह्मणोऽयं यस्तिष्ठन् भक्षयति ' यह उदाहरण महा- भाष्यकारने नञ्सूत्र में दिया है । यहां खड़े हुए भोजन करनेवालेको ' अब्राह्मण ' कहा है । ' नत्र ' यहाँ अप्रशस्त अर्थ में है । सो यह निन्दार्थवाद खड़े होकर भोजन करनेमें हानि सूचित कर रहा है ।
( ५६ ) घृतपक्व - भोजनकी शुद्धताका विज्ञान ।
घृतपक्व अन्न विशुद्ध होता है । कई आप्ता लोग ब्राह्मणोंकी घृतपक्व अन्न खानेमें प्रवृत्ति देखकर उसमें कारण उनकी रसनाका, लौल्य बताते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है । घृतपक्व अन्न विशेष - शुद्ध होता है — इस विशुद्धिके कारण से ही घृतपक्व अन्नका उपयोग होता है । ब्राह्मणगण ' तस्मात् शास्त्र ' प्रमाणं ते ' ( गीता १६।२४ ) यहां भगवान् से अनुज्ञात शास्त्रानुसरण के प्रणयी होते हैं ।
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उसी शास्त्र से वे लोग ' यह कर्तव्य है - यह अकर्तव्य है ' यह जानते हैं ।
शास्त्रों में लिखा है - घृत देवताओंका अन्न होता है । जब देवाप्सरा उर्वशी शापवश मनुष्य- लोकसें पुरूरवाके घर पहुँची, तब खानेकेलिए पूछनेपर उसने कहा - ' घृतं मे वीर! भक्ष्यं स्यात् ' ( श्रीमद्भागवत ॥१४।२२ ) । यही बात ब्राह्मणभागात्मक वेदमें भी कही है - ' घृतस्य स्तोकं सकृद् अह्न आइनाम् ' ( शतपथ ० ११।५।१।१० ) यही बात मन्त्रभागात्मक वेद में भी कही है - ' घृतस्य स्तोकं सकृद् अह्न आश्नाम् ' ( ऋ ० सं ० १०६५।१६ ) । दोनों जगह उर्वशी कहनेवाली ( ऋषिका ) है । इसी कारण देवयज्ञ होम में भी शुद्ध घृतका ही उपयोग होता है ।
इस प्रकार घृत देवभोजन होनेसे जब वह विशुद्ध सिद्ध हुआ; तो घृतपक्व अन्न भी स्वतः विशुद्ध सिद्ध हुआ । इसीलिए ' रस्याः स्निग्धाः ( घृतपक्वाः ) स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विक प्रियाः ' ( गीता १७१८ ) यहांपर स्निग्ध आहारको सात्त्विक ( तमोगुणको दूर करनेवाला ) कहा गया है । इसीलिए अपनी अशुद्धि हो जाने- पर स्मृतियोंमें घृतप्राशनसे शुद्धि मानी गई है । जैसे कि मनुजीने कहा है- ' घृतं प्राश्य विशुद्धयति ' ( ५१०३ ) । घृत विषघ्न भी होता है; अतः जब सांप काट जाय; तो उसके विष- दूरीकरणार्थ उसे घी पिलाते हैं । छोटे बच्चेको जातकर्म संस्कार में सुवर्ण- शलाकासे मधु और घृत चटाते हैं; वहां भी विष प्रभाव दूर करना लक्ष्य होता है । रोटीको घृत से चुपड़नेका लक्ष्य भी यही होता है ।
531' शुक्तं पर्युषितं चैव शूद्रस्योच्छिष्टमेव च ' ( मनु ० ४।२११ ) यहाँ पर्युषित ( बासी ) अन्नको निषिद्ध माना गया है, परन्तु यदि बांसी ( कलका ) अन्न भी घृतपक्क हो; तो उसे भी मनुजीने शुद्ध माना है । जैसे कि - ' यत्किञ्चित् स्नेहसंयुक्तं भोज्यं भोज्यमगर्हितम् । तत् पर्युषितमप्याद्य ं हविः - शेषं च यद् भवेत् ' ( ५४ ) इससे घृत - संस्कृत अन्नकी शुद्धता सिद्ध हो जाती है । इसलिए शीतला आदिके अवसर पर घृतपक्क पर्युषित ( बासी ) भोजनका भी उपयोग होता है । ग्रहण के समयमें पड़ा हुआ घृतपक्व मिष्टान्न भी इसी कारण अशुद्ध नहीं माना जाता ।
घृतपक्ककी शुद्धतामें कारण यह है कि घृत गौसे उद्भूत हुए दुग्धका सार है । सार - वस्तु लाभदायक और श्रेष्ठ एवं बलप्रद हुआ करती है । और फिर वेदादि - शास्त्रों के अनुसार गाय में भी देवताओं का निवास तथा सात्त्विकता मानी गई है । इसी कारण उसके पञ्चगव्यका भी महापापोंके प्रायश्चित्तों एवं अशुद्धकी शुद्धि में उपयोग किया जाता है । पञ्चगव्यमें घृत श्रेष्ठ है । घृत बनानेकेलिए दुग्धसे फल्गु पानी निकाल दिया जाता है । इस कारण जलसे संस्कृत अन्न भी तैजस - घृत से संस्कृत अन्नके समान शुद्ध नहीं माना जाता । कीटाणु जलको शीघ्र दूषित एवं विकृत कर दिया करते हैं । इसलिए जल संस्कृत अन्न भी शीघ्र बिगड़ जाता सूर्यादिके ग्रहणके अवसरपर कीटाणुओंके फैल जानेपर जल- संस्कृत अन्न तो अशुद्ध हुआ माना जाता है, इसलिए फेंक दिया 532जाता है, पर घृत- संस्कृत अन्नको न तो अशुद्ध माना जाता है; और न ही उसे फैंक दिया जाता है ।
दूधसे जलके भागको दूर करनेकेलिए उसे जमाया जाता है, वह दही बन जाता है । दहीसे भी जलके भागको दूर करके उसका माखन बना दिया जाता है । उसके बचे - खुचे जलको भी अग्नि द्वारा जलाकर अवशिष्ट परम - विशुद्ध सार - भाग घृत बन जाता है । इसीलिए सद्योजात वालकके भी अशुद्ध होनेसे उसकी शुद्ध्यर्थ ‘ पारस्करगृह्यसूत्र’में जातकर्म संस्कार में घृतप्राशन कहा गया है- ' अनामिकया सुवर्णान्तर्हितया मधुघृते प्राशयति घृतं वा ' ( १।१६।४ ) ।
इस प्रकार घृत- संस्कृत अन्नकी शुद्धता शास्त्रीय भी सिद्ध हुई; परन्तु उस घृतमें अशुद्ध - घृतादिका मिश्रण न हो । मूत्र वा मद्यसे मिला हुआ गङ्गाजल भी अशुद्ध ही हुआ करता है । घृत बनाने वाला विधर्मी भी न हो, भिन्न जाति वाला भी न हो । देवयज्ञों में वनस्पति घृतका उपयोग करके हम लोग देवताओंको भी ठगते हैं, फल भी तो वैसा ही मिलता है । अस्तु ।
घृतकी शुद्धिसे हमारा मस्तिष्क शुद्ध हो जाने पर हमारे वाक्, शरीर और मन पुष्ट होंगे । छान्दोग्यके उद्दालक- श्वेतकेतुके संवाद के ' अनुसार घृतके स्थूल भागसे अस्थि, मध्यम से मज्जा और सूक्ष्मसे वाणी बनती है । अस्थि शरीरका मूल है, मज्जा बलका, वाणी सारे संसारके व्यवहारका मूल है । ' आयुर्वै घृतम् ' ( तैत्ति ० सं ० २।३।२।२ ) यहाँ घृतको श्रायु पैदा करने वाला माना गया है । इसलिए भी यह सेवनीय है । आयुकी वृद्धिमें पुरुष शास्त्रीय आचरण करके जगत्का
In English
The Purity of Food Cooked in Ghee
This chapter explains why eating food cooked in ghee is considered pure and beneficial for the mind and body. It argues that bathing before meals and eating while sitting calmly are necessary for digestion, and that ghee serves as a purifying agent that protects against toxins.
This chapter answers
- Why is bathing important before eating?
- Is it bad to eat while walking?
- Why is food cooked in ghee considered pure?
- What are the benefits of consuming ghee?
- How does ghee help with purification?
Also written: Ghritapakva, Bhojana, Ki, Shuddhataka, Vigyana, Ghritapakva Bhojana Ki Shuddhataka Vigyana, घृतपक्व भोजन की शुद्धताका विज्ञान