पञ्चम सुमन · प्रकरण 50

चरणामृतका वैज्ञानिक महत्त्व

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471पुनर्जन्म न विद्यते ' इसका अर्थ यह है कि - यह चरणामृत अकाल- मृत्युको दूर करनेवाला है, और सब व्याधियोंको दूर करता है; इसका पान करके पुनर्जन्म नहीं होता । प्रतिपक्षी लोग इसपर फबतियाँ कसते हैं, और इसे दबी जवानसे अर्थवाद ( बहुत बढ़ा- चढ़ाकर कहा हुआ ) कहते हैं । पर वे इसके महत्त्वको न जाननेके कारण ऐसा कहते हुए सचमुच दयनीय हैं । वस्तुतः यह अर्थवाद नहीं; किन्तु यथार्थवाद है । इसे यों समझिये—

चरणामृत जहाँ भगवान्का प्रसाद है; जिन चरणोंकी हम पूजा करते हैं; उनका धोवन है, अमृत है, वहाँ एक दिव्य महौषधि भी है । पूजाके समय तांबेके पात्रमें रखी हुई शालग्रामकी प्रतिमाका मन्त्रोपचार तथा गङ्गाजलके द्वारा स्नान एवं संस्कार किया जाता है । उसमें तुलसीदल, केशर, चन्दन, कस्तूरी - आदि पदार्थ भी मिले होते हैं । यही चरणामृत है ।

शालग्राम गण्डकी नदीमें प्राप्त होनेवाला एक कसौटीकी तरह पत्थर होता है, जिसमें स्वभावसे सूक्ष्म सुवर्णके करण हुआ करते हैं । वेद सोनेसे सौ वर्षकी आयु बताता है । ' सुवर्णसे घातक- कीटाणु भी दूर होते हैं । उसका प्रमाण यह है कि शेरनीका दूध अन्य पात्रोंमें कीटाणुओंके कारण विकृत हो जाता है; पर सुवर्णके पात्रमें विकृत नहीं होता । वह जल सुवर्णके करणवाले शालग्रामसे स्पृष्ट होनेसे उसके गुण लेता है । हमारे देशकी स्त्रियाँ भंगीसे छूगये हुए अपने लड़केपर अपने कानके सुवर्णभूषणसे जलको • स्पृष्ट करके वही जल उस पर डालती हैं; उसमें भी अशुद्ध 472कीटाणुओंका दूर करना ही लक्ष्य होता है । अस्तु ।

तांबेका प्रभाव तो विज्ञान - सिद्ध है । उसमें रखा हुआ जल रोग नाशक हुआ करता है । अव गङ्गा - जल लीजिये । उसकी घातक - कीटाणुनाशिनी शक्ति तो विश्व विश्रुत है; उसकी महत्ता हम आगे भी बतायेंगे । तुलसीदल में भी अनेक व्याधियोंके दूर करनेकी सामर्थ्य है - यह आगे बताया जायगा । विशेप करके मलेरिया के कीटाणुओं को दूर करने में तो उसकी पूर्व - शक्ति प्रसिद्ध है ।

शेष रहे केसर, चन्दन और कस्तूरी आदि । यह बहुत उत्तम ओषधियाँ मानी जाती हैं, वहुतसे रोगों में इनका उपयोग आयुर्वेद- प्रसिद्ध है । वेदमन्त्र जिनसे स्नान कराया जाता है; उनकी विलक्षण शक्ति तो प्रसिद्ध है ही; यह हम ' मन्त्रशक्ति ' निबन्धमें लिख चुके हैं । फिर वही जल शंखमें डाला हुआ अद्भुत शक्तिसम्पन्न हो जाता है । इस प्रकार चरणामृत रूपमें हमें केशर, कस्तूरी, चन्दन, तुलसीदलसे मिश्रित ताम्रपात्र निहित सुवर्ण - करणोंका मन्त्रोपचार से संस्कृत जल मिलता है | फिर उस देवमन्दिर में धूप, घृत - दीपके शुद्ध लोककी प्राप्ति आदिसे कीटाणुके प्रभाववश वह जल अमृत - सा हो जाता है, वह मकरध्वज ओषधि के समान सामर्थ्यको धारण कर लेता है । उसके सेवन से अकालमृत्यु - हरण तथा सर्व- व्याधि - विनाशनमें सहायता मिलना स्वाभाविक ही है । उस समय निःस्वार्थ एवं निष्काम - भगवद्भक्ति हो; तो वह पुनर्जन्मको भी दूर कर देती है । इस प्रकार चरणामृतपानसे अकालमृत्युहरण- श्रादि वाली बात यथार्थ सिद्ध हुई । जहाँ चरणामृत -पानसे दैहिक - लाभ

In English

The Meaning and Benefits of Charanamrita

This chapter explains the composition and medicinal properties of charanamrita, which is water used to wash a Shalgram deity. It argues that the combination of sacred water, specific ingredients like tulsi and sandalwood, and ritual mantras creates a substance capable of curing diseases and preventing untimely death. The text asserts that these benefits are grounded in the purifying qualities of the materials used.

This chapter answers

  • What is charanamrita?
  • How is charanamrita prepared?
  • Benefits of drinking charanamrita?
  • Medicinal properties of shalgram water?
  • Why is tulsi used in rituals?

Also written: Charanamritaka, Vaigyanika, Mahattva, Charanamritaka Vaigyanika Mahattva, चरणामृतका वैज्ञानिक महत्त्व

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 471–472 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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