सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 491–500
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 491–500
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यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व ४६३ जीसे प्रणीत वेदोंकी पदानुक्रमणिकाओंको देख लीजिये; उसमें ' यज ' धातुका प्रयोग ऋग्वेद - पदानुक्रमणिकाके ३२२ पृष्ठके तीसरे कालमसे शुरू होकर ३२३ पृष्ठके तीनों कालमोंमें, ३२४ पृष्ठके तीनों कालमोंमें और ३२५ पृष्ठके २ कालमों तक आया है । यजुर्वेदकी पदानुक्रमणिकाके ७८ पृष्ठके पहले कालमके अन्तिम भाग़ से लेकर दूसरे, तथा तीसरे कालम में, तथा ७६ पृष्ठके पहले कालम के आधे भाग तक आया है । ' सामवेदकी पदानुक्रमणिका के ७४ पृष्ठके दूसरे कालमसे तीसरे कालम तक आया है । अथर्ववेद पदानुक्रमणिकाके १८७ पृष्ठके पहले कालम, दूसरे तथा तीसरे कालम, और १८८ पृष्ठके पहले, तथा दूसरे कालमके आरम्भिक भाग तक आया है । दूसरा अध्वर शब्द ऋ ० पदानु ० के २० पृष्ठके २॥ कालमोंमें, इस प्रकार ' वेन ' आदि यज्ञवाचक शब्द बहुत बार आये हैं । ' अग्नि ' देवतावाले तो सभी मन्त्र इस यज्ञमें ही शामिल हैं । सोमका वेदमें जहां - जहां भी वर्णन आया है, वह भी यज्ञ - विषयक ही है; क्योंकि सोमका यज्ञमें प्रयोग होता था । इसी पवमान-सोमकेलिए ऋग्वेदसंहिताका नवम - मण्डल तथा सामवेदका पवमानपर्व स्वतन्त्ररूपसे रखा गया है । अतः वेदका विषय यज्ञ और यज्ञका विषय वेद सिद्ध हो ही गया । यदि यह कहा जाय कि -यज्ञ वैदिक - सनातनधर्मका प्रारण है, तो इसमें कोई अत्युक्ति नहीं । ऋषिकालमें यज्ञ सदा हुआ करते थे, उसी समय यह भारतवर्ष खूब उन्नत भी था । यज्ञसे ही हमारी हिन्दुजाति जीवित है-
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४६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) और जीवित रहेगी - इसमें भी कोई अत्युक्ति नहीं । यज्ञमें " प्रयुक्त किये जाते हुए ' सोम ' के पर्यायवाचक तथा निघण्टुके अनुसार यज्ञके पर्यायवाचक ' इन्दु ' शब्दसे ही हमारी याज्ञिक जातिका नाम ' हिन्दु ' हुआ है । अतः यज्ञका हिन्दुजातिके लिए सब दृष्टियों से महत्त्व है । इसी वैदिक यज्ञका दूसरा तथा सस्ता संस्करण देवमूर्ति - पूजा है; उससे भी यज्ञवाले परिणाम प्राप्त हो जाते हैं । उसके लिए बहुत व्यय भी नहीं होता, और वहुत. विद्वत्ता भी अपेक्षित नहीं होती; अतः वह भी वैदिकधर्मका ही एक अङ्ग है ( ३६ ) देवमन्दिरगमन - विज्ञान । हम पूर्व कह चुके हैं कि — देवमूर्तिपूजा भी एक यज्ञ है; यज्ञवाले लाभ देवमूर्त्तिपूजामें भी प्रायः होते हैं; क्योंकि - यह भी देव - पूजा है । देवपूजा दो प्रकारकी होती है, एक हवन, दूसरी मूर्ति-पूजा । संस्कृत - अग्निमूर्तिद्वारा ' इन्द्राय स्वाहा, वरुणाय स्वाहा ' इत्यादि रूपसे उस - उस देवताको हवि देना - यह हवन - द्वारा देव-पूजा होती है, प्रस्तर - आदिकी संस्कृत - मूर्तिद्वारा उस - उस देवताको बलि देना मूर्तिद्वारा देवपूजा होती है । हवन तथा मूर्तिपूजा दोनों ही ' यज्ञ ' कहे जाते हैं; क्योंकि — देवपूजार्थक यजधातुका अर्थ दोनों स्थानोंमें देखा गया है । ' शाङ्खायनब्राह्मण ' में कहा है-' स एवास्मै यज्ञ ' ददाति तद् यद् एता देवता यजति ' ( ४२ ) अर्थात् * इसे जाननेकेलिए ' श्रीसनातनधर्मालोक'का चतुर्थ पुष्प हमसे शीघ्र मंगाइये । मूल्य ४1 )
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देवमन्दिरगमन - विज्ञान ४६१ देवताओंका पूजन ही यज्ञ होता है । यही वात श्रीमद्भागवत-पुराण में भी सूचित की गई है । वहां ( ११।२७११५-१६ में ) मूर्तिपूजा तथा अग्निहोत्र दोनों को ही ' याग ' कहा गया है । जिस प्रकार लोकमें पत्थरकी मूर्ति जड़ मानी जाती है, वैसे ही अग्नि भी । परन्तु ' अभिमानिव्यपदेश: ' ( वेदान्त ० २।१५ ) ' सर्वस्य वा चेतनावत्त्वात् ' ( महाभाष्य - वार्तिक ३ | १ | ७ ) इस शास्त्रीय कथनसे दोनों ही मूर्तियां चैतन्य धारण करती हैं । मन्त्र - संस्कृ अग्नि उस हविके स्थूलभागको भस्म करके उसका सूक्ष्म भाग देवताओंको देती है, और मन्त्रसंस्कृत - मूर्ति मधुमक्षिकासे पिये हुए पुष्पकी भांति उसका सूक्ष्म अंश देवताओं को समर्पित करती है । उस मन्त्रसंस्कृत - मूर्तिको देवमन्दिर में प्रतिष्ठापित किया जाता है । तव देवमूर्तिकी नमस्कार आदि पूजाकेलिए देवमन्दिरमें जाना भी बहुत विज्ञान - पूर्ण तथा लाभ प्रद है । देवमन्दिर धार्मिक जनताके प्राण हैं, भारतीय सभ्यता एवं संस्कृतिके केन्द्र हैं, मनकी एकाग्रता तथा शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्यलाभके प्रबल साधन हैं । देवप्रतिमा - केन्द्रके द्वारा भगवान् की समशक्तिको भक्तोंकी विश्वासरूपिणी विपमशक्ति खींच लेती है । सम - विषम शक्तिका इस प्रकारका आकर्षण विज्ञान - सिद्ध है । वही प्रतिमा प्रभुशक्तिको इस प्रकार खींचती और प्रकट करती है; जैसे सूर्यकान्तमणि सूर्य की शक्तिको । इसमें वेदमन्त्रोंकी शक्ति उसमें सहायक हो जाती है । इस वार्तिककी स्पष्टता इस पुस्तकके १६७-१६८ पृष्ठमें देखें । ३० स ० ध ०
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४६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) मूर्ति में दिव्य - ज्योति एवं सूक्ष्मशक्ति जिस प्रकार ठीक रह जाए; उसी प्रकार से देवमन्दिर ( गर्भगृह ) बनाये जाते हैं । धूप, दीप आदिके रखनेसे मन्दिर में दिव्यशक्तिका संचार रहता है । सुगन्धित द्रव्योंके प्रयोगसे भूतबाधाकी निवृत्ति वैज्ञानिक भी मानते हैं, कीटाणुनाशिनी शक्ति भी उनमें हुआ करती है । प्रत्येक पुरुषमें पञ्चभूतात्मकतावश पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश इन तत्त्वोंमें एक प्रबल होता ही है । गन्ध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्दका प्रभाव एकतत्त्व- प्रधान शरीरमें रहता है । जिस पुरुष में अग्नितत्त्वकी प्रधानता हो; उसमें रूपका अधिक प्रभाव होता है । इस प्रकार पृथिवी तत्त्वकी प्रधानता में गन्धका, जलकी प्रधानता में रसका, वायुतत्त्वकी प्रधानता में स्पर्शका, आकाशकी प्रधानता में शब्दका अधिक प्रभाव पड़ता है । देवमन्दिरमें सब प्रकारके पुरुष जाते हैं; इसलिए उसमें सब प्रकारके द्रव्योंका समुच्चय रहता है । विविध रत्नोंसे जड़ी हुई प्रतिमाएँ; विविध - वर्णसुसज्जित स्थान, विविध ग्रन्धद्रव्योंका सुगन्ध, शंख, घण्टा आदिका शब्द, विविध-प्रकारका भगवान्का भोग ( प्रसाद ) आदि रहा करता है । यह स्थूलरूप से जानना चाहिये । सूक्ष्मरूपसे तो विभिन्न - तत्त्वोंकी प्रधानता के अनुरूप भिन्न - भिन्न प्राणियोंकेलिए भिन्न - भिन्न देवोंकी उपासना बताई गई है । मनुष्यका शरीर पाँच तत्त्वोंसे बना हुआ है । इसलिए शास्त्रने भी सगुण - ब्रह्मकी पञ्चदेवोंके रूपमें उपासना बताई है । विष्णु, शिव, शक्ति, सूर्य, गणपति — यह ईश्वरकी पाँच प्रमुख मूर्तियाँ हैं ।
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देवमन्दिरगमन - विज्ञान ४६७ आकाशतत्त्वके साथ विष्णुका, पृथिवीतत्त्व से शिवका, अग्नितत्त्वके साथ शक्तिका, वायुतत्त्वके साथ सूर्यका, जलतत्त्व के साथ गणपति ( गणेश ) का सम्बन्ध है । जिस प्राणी में जिस तत्त्वकी प्रधानता होती है; उसकी स्वाभाविक रुचि उस देवकी उपासना में होती है । सव प्राणियों में समान तत्त्वकी प्रधानता नहीं होती; अतः सबका हृदय एक देवमें निश्चल रूपसे नहीं रहता । इसलिए मुनियोंने भिन्न - भिन्न पुरुषोंकेलिए भिन्न - भिन्न देवोंकी उपासना बताई है । पर इसका यह तात्पर्य नहीं कि पुरुष एक ही देवकी पूजा करेगा, और दूसरोंसे घृणा करेगा । नहीं; मनुष्य में न्यूनाधिकतासे पाँचों तत्त्व रहते हैं । तव प्रधानतासे उसकी रुचि एक देवमें होती है; किन्तु अन्य तत्त्वोंके भी शरीर में गौणरूपसे होनेसे अन्य देवोंसे उसकी अरुचि नहीं होती । इस प्रकार रत्न, रंग, गन्ध, शब्द आदिका भी प्रभाव प्रत्येक पुरुषपर पड़ता है । शब्दको ही ले लीजिये । शब्द अपनी प्रकृतिवाले पुरुषको जहाँ लाभ पहुँचाता है; वहाँ सर्व - साधारणको भी कुछ लाभ पहुँचावेगा ही । देवालयों में शंख और घड़ियालकी ध्वनि होती है । इसकी ध्वनिका स्थूल एवं सूक्ष्म दोनों ही प्रकारका प्रभाव हमपर पड़ता है । श्रीजगदीशचन्द्र-वसु नामक भारतीय - वैज्ञानिकने शंखके शब्द के विषय में अनेक रोगा-गुत्रों का नाश एवं वायुका शुद्ध होजाना प्रमाणित कर दिया है; जिसे हम पहले ' शंखध्वनिविज्ञान ' में लिख चुके हैं । घड़ियाल में कांसेका प्रयोग होता है । कांसा तांबे और रांगेसे बनता है । तांबा विद्युत्का परिचालक होता है, और रांगा होता है संग्रहकोष ।
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४६८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) घड़ियालपर चोट पड़ने से उसमें विद्युत् - शक्तिका संग्रह होता है । तभी घड़ियालका जल पिलानेपर प्रसव - कष्टमें स्त्रीका शीघ्र प्रसव होता है । तब घण्टा - शब्दसे उत्पन्न हुई विद्युत् हमारे शरीर में प्रविष्ट होती है । और फिर हमारे मन्दिरोंमें खड़ाऊँ पहरकर जानेका नियम है; जिससे वह बिजली हमारे पाँवके नीचेसे निकलकर पृथिवीमें न चली जावे, और हमारे शरीर में व्याप्त होकर उसे शक्तिशाली बनावे । इस प्रकार देवमन्दिरमें स्थित पीपलका वृक्ष, तुलसी, मृगचर्म, व्याघ्रचर्म, पञ्चगव्य, चन्दन, केसर आदि भी लाभदायक सिद्ध होते हैं । इसमें पीपल वन्ध्यात्वको दूर करनेवाला सिद्ध हो चुका है, उसके मूलमें जल डालने से ज्वर नहीं होता । इसके विशेष गुण हम आगे बतावेंगे । तुलसी दल में भी घातक कीटाणुओंको दूर करनेकी अद्भुत क्षमता है । विज्ञानाचार्य सर जगदीशचन्द्र वसुने लिखा है कि- तुलसी - सुवासित वायु, घातक कीटाणुओंको दूर करती है । तुलसीका पौधा धनीसे लेकर निर्धन तक समान रूपसे आरोग्य देनेवाला ईश्वरीय औषधालय है - इसके गुण हम आगे लिखेंगे । यदि तुलसीदलको दांतों से चबाया जाय; तो दांत निर्बल हो जाते हैं । इस कारण हमारे मुनियोंने तुलसीदलको भगवान्के चरणामृतमें स्थान दिया है कि बिना ही दांतोंके चचाये वह पेटमें पहुँच जाय । इस प्रकार देवमन्दिर में रखे हुए मृगचर्म और व्याघ्रचर्मको भी देखिये । लोग प्रायः उसपर बैठकर भगवान्का भजन करते
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देवमन्दिरगमन - विज्ञान ४६६ हैं । मृगचर्मपर बैठनेसे भगन्दर आदि रोग नहीं होते; जो प्रायः बैठने वालों एवं कामियोंको हो जाते हैं । अथवा यदि होते हैं; तो उसपर बैठनेसे शान्त हो जाते हैं । इसके विशेष गुण ‘ मृगचर्मका वैज्ञानिक - रहस्य ' में हम लिख चुके हैं । व्याघ्रचर्म आदिके गुण भी हम पूर्व लिख चुके हैं । उसपर साँप - बिच्छू आदि चढ़नेका भय भी नहीं रहता । उसपर बैठ कर उपासक निर्विघ्न, निर्भय एवं एकाग्रचित्तसे भगवान् की उपासना करता है । इस प्रकार पञ्चगव्य तथा चरणामृत एवं चन्दनादिके विषय में भी जान लेना चाहिये, जिनमें चन्दन - केसरादिके गुण पूर्व बता चुके हैं; शेषके आगे बताने वाले हैं । इनसे जहाँ सूक्ष्म दैवी - शक्ति प्राप्त होती है; वहाँ स्थूल लौकिक - शक्ति भी । इनके कारण स्वास्थ्य अच्छा होता है । अकालमृत्यु दूर होती है । देवालय में जानेसे जहाँ देवपूजा होती है; वहाँ शारीरिक एवं मानसिक लाभ भी होते हैं । देवालय में जानेकेलिए सूर्योदयसे पहले उठते हैं; और सूर्योदयसे पूर्व ही स्नान करते हैं; क्योंकि स्नान करते ही देवालय में जाना पड़ता है 1 । इससे रूप, तेज, आरोग्य, बल, आयु, दुःस्वप्न - नाश और मेधा प्राप्त होती है । देवमन्दिर प्रायः नगरसे बाहर होते हैं, उनमें कोई बागीचा भी होता है । देवपूजाकेलिए बगीचेसे हम फूल चुनते हैं, जिससे हमें शुद्ध - वायु भी मिलती है, नगरके बाहरकी शुद्ध - वायुमें भ्रमण भी हो जाता है । प्रातः भ्रमणके लाभ जगत्प्रसिद्ध ही हैं । इससे हमें शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य तथा शक्तिका लाभ होता है । शुद्ध
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-४७० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) वायुमण्डलके कारण हमारे भीतर कुविचार नहीं रह पाते । चन्दन मस्तिष्कपर लगानेसे मस्तिष्क - शक्ति में और दृष्टिमें वृद्धि हुआ करती है । मन्दिरमें शंखनादसे फेफड़ोंकी शुद्धि तथा कीटाणुओंका दूरीभाव होता है; यह हम पहले लिख ही चुके हैं । तब भगवान् की उपासनासे हमारा भगवान्से ऐक्य हो जाता है । धूप, घीका चौमुखा दीया, और उसका प्रकाश यह सब भी अकाल मृत्युको रोकते हैं । इस समयको निष्काम भक्तिसे मुक्ति मिलने से हमें पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता । इस प्रकार के सूक्ष्म स्थूल लाभोंके कारण देवस्थानों तथा उनकी वेदमन्त्र - संस्कृत मूर्तियों में दिव्यशक्तिके प्रभावसे अनेक रोगोंको दूर करनेकी शक्ति है - यह सिद्ध होगया । हमारी भारतीय - संस्कृति भी इन्हींके कारण हमारे अन्दर रहती है । यदि देवमन्दिरों में हमारी हिन्दु - संस्कृतिका हिताधायक कुछ भी न होता; तो मुसलमानी सम्राट् औरङ्गजेव हिन्दु - संस्कृति के विनाशकेलिए देवमन्दिरोंको न तुड़वाता । तब देवमन्दिरमें जाना और उसमें देवपूजन करना यज्ञकी भांति ही ऐहिक और मुष्मिक दोनों ही लाभ देनेवाला सिद्ध हुआ । ( ४० ) चरणामृतका वैज्ञानिक - महत्त्व । देवमन्दिर जाकर देवमूर्तिका नमस्कारादि - द्वारा पूजन करके फिर हम चरणामृत लेते हैं; और उस समय एक मन्त्र पढ़ते हैं-' अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम् । विष्णुपादोदकं पीत्वा
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चरणामृतका वैज्ञानिक महत्त्व ४७१ पुनर्जन्म न विद्यते ' इसका अर्थ यह है कि - यह चरणामृत अकाल-मृत्युको दूर करनेवाला है, और सब व्याधियोंको दूर करता है; इसका पान करके पुनर्जन्म नहीं होता । प्रतिपक्षी लोग इसपर फबतियाँ कसते हैं, और इसे दबी जवानसे अर्थवाद ( बहुत बढ़ा-चढ़ाकर कहा हुआ ) कहते हैं । पर वे इसके महत्त्वको न जाननेके कारण ऐसा कहते हुए सचमुच दयनीय हैं । वस्तुतः यह अर्थवाद नहीं; किन्तु यथार्थवाद है । इसे यों समझिये— चरणामृत जहाँ भगवान्का प्रसाद है; जिन चरणोंकी हम पूजा करते हैं; उनका धोवन है, अमृत है, वहाँ एक दिव्य महौषधि भी है । पूजाके समय तांबेके पात्रमें रखी हुई शालग्रामकी प्रतिमाका मन्त्रोपचार तथा गङ्गाजलके द्वारा स्नान एवं संस्कार किया जाता है । उसमें तुलसीदल, केशर, चन्दन, कस्तूरी - आदि पदार्थ भी मिले होते हैं । यही चरणामृत है । शालग्राम गण्डकी नदीमें प्राप्त होनेवाला एक कसौटीकी तरह पत्थर होता है, जिसमें स्वभावसे सूक्ष्म सुवर्णके करण हुआ करते हैं । वेद सोनेसे सौ वर्षकी आयु बताता है । ' सुवर्णसे घातक-कीटाणु भी दूर होते हैं । उसका प्रमाण यह है कि शेरनीका दूध अन्य पात्रोंमें कीटाणुओंके कारण विकृत हो जाता है; पर सुवर्णके पात्रमें विकृत नहीं होता । वह जल सुवर्णके करणवाले शालग्रामसे स्पृष्ट होनेसे उसके गुण लेता है । हमारे देशकी स्त्रियाँ भंगीसे छूगये हुए अपने लड़केपर अपने कानके सुवर्णभूषणसे जलको • स्पृष्ट करके वही जल उस पर डालती हैं; उसमें भी अशुद्ध
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४७२ श्रीसनातनधर्मालौक ( ५ ) कीटाणुओंका दूर करना ही लक्ष्य होता है । अस्तु । तांबेका प्रभाव तो विज्ञान - सिद्ध है । उसमें रखा हुआ जल रोग नाशक हुआ करता है । अव गङ्गा - जल लीजिये । उसकी घातक -कीटाणुनाशिनी शक्ति तो विश्व विश्रुत है; उसकी महत्ता हम आगे भी बतायेंगे । तुलसीदल में भी अनेक व्याधियोंके दूर करनेकी सामर्थ्य है - यह आगे बताया जायगा । विशेप करके मलेरिया के कीटाणुओं को दूर करने में तो उसकी पूर्व - शक्ति प्रसिद्ध है । शेष रहे केसर, चन्दन और कस्तूरी आदि । यह बहुत उत्तम ओषधियाँ मानी जाती हैं, वहुतसे रोगों में इनका उपयोग आयुर्वेद-प्रसिद्ध है । वेदमन्त्र जिनसे स्नान कराया जाता है; उनकी विलक्षण शक्ति तो प्रसिद्ध है ही; यह हम ' मन्त्रशक्ति ' निबन्धमें लिख चुके हैं । फिर वही जल शंखमें डाला हुआ अद्भुत शक्तिसम्पन्न हो जाता है । इस प्रकार चरणामृत रूपमें हमें केशर, कस्तूरी, चन्दन, तुलसीदलसे मिश्रित ताम्रपात्र निहित सुवर्ण - करणोंका मन्त्रोपचार से संस्कृत जल मिलता है | फिर उस देवमन्दिर में धूप, घृत - दीपके शुद्ध लोककी प्राप्ति आदिसे कीटाणुके प्रभाववश वह जल अमृत - सा हो जाता है, वह मकरध्वज ओषधि के समान सामर्थ्यको धारण कर लेता है । उसके सेवन से अकालमृत्यु - हरण तथा सर्व-व्याधि - विनाशनमें सहायता मिलना स्वाभाविक ही है । उस समय निःस्वार्थ एवं निष्काम - भगवद्भक्ति हो; तो वह पुनर्जन्मको भी दूर कर देती है । इस प्रकार चरणामृतपानसे अकालमृत्युहरण- श्रादि वाली बात यथार्थ सिद्ध हुई । जहाँ चरणामृत -पानसे दैहिक - लाभ