पञ्चम सुमन · प्रकरण 49
देवमन्दिरगमन - विज्ञान
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465देवताओंका पूजन ही यज्ञ होता है । यही वात श्रीमद्भागवत- पुराण में भी सूचित की गई है । वहां ( ११।२७११५-१६ में ) मूर्तिपूजा तथा अग्निहोत्र दोनों को ही ' याग ' कहा गया है ।
जिस प्रकार लोकमें पत्थरकी मूर्ति जड़ मानी जाती है, वैसे ही अग्नि भी । परन्तु ' अभिमानिव्यपदेश: ' ( वेदान्त ० २।१५ ) ' सर्वस्य वा चेतनावत्त्वात् ' ( महाभाष्य - वार्तिक ३ | १ | ७ ) इस शास्त्रीय कथनसे दोनों ही मूर्तियां चैतन्य धारण करती हैं । मन्त्र - संस्कृ अग्नि उस हविके स्थूलभागको भस्म करके उसका सूक्ष्म भाग देवताओंको देती है, और मन्त्रसंस्कृत - मूर्ति मधुमक्षिकासे पिये हुए पुष्पकी भांति उसका सूक्ष्म अंश देवताओं को समर्पित करती है । उस मन्त्रसंस्कृत - मूर्तिको देवमन्दिर में प्रतिष्ठापित किया जाता है । तव देवमूर्तिकी नमस्कार आदि पूजाकेलिए देवमन्दिरमें जाना भी बहुत विज्ञान - पूर्ण तथा लाभ प्रद है ।
देवमन्दिर धार्मिक जनताके प्राण हैं, भारतीय सभ्यता एवं संस्कृतिके केन्द्र हैं, मनकी एकाग्रता तथा शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्यलाभके प्रबल साधन हैं । देवप्रतिमा - केन्द्रके द्वारा भगवान् की समशक्तिको भक्तोंकी विश्वासरूपिणी विपमशक्ति खींच लेती है । सम - विषम शक्तिका इस प्रकारका आकर्षण विज्ञान - सिद्ध है । वही प्रतिमा प्रभुशक्तिको इस प्रकार खींचती और प्रकट करती है; जैसे सूर्यकान्तमणि सूर्य की शक्तिको । इसमें वेदमन्त्रोंकी शक्ति उसमें सहायक हो जाती है ।
इस वार्तिककी स्पष्टता इस पुस्तकके १६७-१६८ पृष्ठमें देखें ।
466मूर्ति में दिव्य - ज्योति एवं सूक्ष्मशक्ति जिस प्रकार ठीक रह जाए; उसी प्रकार से देवमन्दिर ( गर्भगृह ) बनाये जाते हैं । धूप, दीप आदिके रखनेसे मन्दिर में दिव्यशक्तिका संचार रहता है । सुगन्धित द्रव्योंके प्रयोगसे भूतबाधाकी निवृत्ति वैज्ञानिक भी मानते हैं, कीटाणुनाशिनी शक्ति भी उनमें हुआ करती है ।
प्रत्येक पुरुषमें पञ्चभूतात्मकतावश पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश इन तत्त्वोंमें एक प्रबल होता ही है । गन्ध, रस, रूप, स्पर्श तथा शब्दका प्रभाव एकतत्त्व- प्रधान शरीरमें रहता है । जिस पुरुष में अग्नितत्त्वकी प्रधानता हो; उसमें रूपका अधिक प्रभाव होता है । इस प्रकार पृथिवी तत्त्वकी प्रधानता में गन्धका, जलकी प्रधानता में रसका, वायुतत्त्वकी प्रधानता में स्पर्शका, आकाशकी प्रधानता में शब्दका अधिक प्रभाव पड़ता है । देवमन्दिरमें सब प्रकारके पुरुष जाते हैं; इसलिए उसमें सब प्रकारके द्रव्योंका समुच्चय रहता है । विविध रत्नोंसे जड़ी हुई प्रतिमाएँ; विविध - वर्णसुसज्जित स्थान, विविध ग्रन्धद्रव्योंका सुगन्ध, शंख, घण्टा आदिका शब्द, विविध- प्रकारका भगवान्का भोग ( प्रसाद ) आदि रहा करता है । यह स्थूलरूप से जानना चाहिये ।
सूक्ष्मरूपसे तो विभिन्न - तत्त्वोंकी प्रधानता के अनुरूप भिन्न - भिन्न प्राणियोंकेलिए भिन्न - भिन्न देवोंकी उपासना बताई गई है । मनुष्यका शरीर पाँच तत्त्वोंसे बना हुआ है । इसलिए शास्त्रने भी सगुण - ब्रह्मकी पञ्चदेवोंके रूपमें उपासना बताई है । विष्णु, शिव, शक्ति, सूर्य, गणपति — यह ईश्वरकी पाँच प्रमुख मूर्तियाँ हैं । 467आकाशतत्त्वके साथ विष्णुका, पृथिवीतत्त्व से शिवका, अग्नितत्त्वके साथ शक्तिका, वायुतत्त्वके साथ सूर्यका, जलतत्त्व के साथ गणपति ( गणेश ) का सम्बन्ध है । जिस प्राणी में जिस तत्त्वकी प्रधानता होती है; उसकी स्वाभाविक रुचि उस देवकी उपासना में होती है । सव प्राणियों में समान तत्त्वकी प्रधानता नहीं होती; अतः सबका हृदय एक देवमें निश्चल रूपसे नहीं रहता । इसलिए मुनियोंने भिन्न - भिन्न पुरुषोंकेलिए भिन्न - भिन्न देवोंकी उपासना बताई है ।
पर इसका यह तात्पर्य नहीं कि पुरुष एक ही देवकी पूजा करेगा, और दूसरोंसे घृणा करेगा । नहीं; मनुष्य में न्यूनाधिकतासे पाँचों तत्त्व रहते हैं । तव प्रधानतासे उसकी रुचि एक देवमें होती है; किन्तु अन्य तत्त्वोंके भी शरीर में गौणरूपसे होनेसे अन्य देवोंसे उसकी अरुचि नहीं होती । इस प्रकार रत्न, रंग, गन्ध, शब्द आदिका भी प्रभाव प्रत्येक पुरुषपर पड़ता है । शब्दको ही ले लीजिये । शब्द अपनी प्रकृतिवाले पुरुषको जहाँ लाभ पहुँचाता है; वहाँ सर्व - साधारणको भी कुछ लाभ पहुँचावेगा ही । देवालयों में शंख और घड़ियालकी ध्वनि होती है । इसकी ध्वनिका स्थूल एवं सूक्ष्म दोनों ही प्रकारका प्रभाव हमपर पड़ता है । श्रीजगदीशचन्द्र- वसु नामक भारतीय - वैज्ञानिकने शंखके शब्द के विषय में अनेक रोगा- गुत्रों का नाश एवं वायुका शुद्ध होजाना प्रमाणित कर दिया है; जिसे हम पहले ' शंखध्वनिविज्ञान ' में लिख चुके हैं । घड़ियाल में कांसेका प्रयोग होता है । कांसा तांबे और रांगेसे बनता है । तांबा विद्युत्का परिचालक होता है, और रांगा होता है संग्रहकोष । 468घड़ियालपर चोट पड़ने से उसमें विद्युत् - शक्तिका संग्रह होता है । तभी घड़ियालका जल पिलानेपर प्रसव - कष्टमें स्त्रीका शीघ्र प्रसव होता है । तब घण्टा - शब्दसे उत्पन्न हुई विद्युत् हमारे शरीर में प्रविष्ट होती है । और फिर हमारे मन्दिरोंमें खड़ाऊँ पहरकर जानेका नियम है; जिससे वह बिजली हमारे पाँवके नीचेसे निकलकर पृथिवीमें न चली जावे, और हमारे शरीर में व्याप्त होकर उसे शक्तिशाली बनावे ।
इस प्रकार देवमन्दिरमें स्थित पीपलका वृक्ष, तुलसी, मृगचर्म, व्याघ्रचर्म, पञ्चगव्य, चन्दन, केसर आदि भी लाभदायक सिद्ध होते हैं । इसमें पीपल वन्ध्यात्वको दूर करनेवाला सिद्ध हो चुका है, उसके मूलमें जल डालने से ज्वर नहीं होता । इसके विशेष गुण हम आगे बतावेंगे । तुलसी दल में भी घातक कीटाणुओंको दूर करनेकी अद्भुत क्षमता है । विज्ञानाचार्य सर जगदीशचन्द्र वसुने लिखा है कि- तुलसी - सुवासित वायु, घातक कीटाणुओंको दूर करती है । तुलसीका पौधा धनीसे लेकर निर्धन तक समान रूपसे आरोग्य देनेवाला ईश्वरीय औषधालय है - इसके गुण हम आगे लिखेंगे । यदि तुलसीदलको दांतों से चबाया जाय; तो दांत निर्बल हो जाते हैं । इस कारण हमारे मुनियोंने तुलसीदलको भगवान्के चरणामृतमें स्थान दिया है कि बिना ही दांतोंके चचाये वह पेटमें पहुँच जाय ।
इस प्रकार देवमन्दिर में रखे हुए मृगचर्म और व्याघ्रचर्मको भी देखिये । लोग प्रायः उसपर बैठकर भगवान्का भजन करते 469हैं । मृगचर्मपर बैठनेसे भगन्दर आदि रोग नहीं होते; जो प्रायः बैठने वालों एवं कामियोंको हो जाते हैं । अथवा यदि होते हैं; तो उसपर बैठनेसे शान्त हो जाते हैं । इसके विशेष गुण ‘ मृगचर्मका वैज्ञानिक - रहस्य ' में हम लिख चुके हैं । व्याघ्रचर्म आदिके गुण भी हम पूर्व लिख चुके हैं । उसपर साँप - बिच्छू आदि चढ़नेका भय भी नहीं रहता । उसपर बैठ कर उपासक निर्विघ्न, निर्भय एवं एकाग्रचित्तसे भगवान् की उपासना करता है ।
इस प्रकार पञ्चगव्य तथा चरणामृत एवं चन्दनादिके विषय में भी जान लेना चाहिये, जिनमें चन्दन - केसरादिके गुण पूर्व बता चुके हैं; शेषके आगे बताने वाले हैं । इनसे जहाँ सूक्ष्म दैवी - शक्ति प्राप्त होती है; वहाँ स्थूल लौकिक - शक्ति भी । इनके कारण स्वास्थ्य अच्छा होता है । अकालमृत्यु दूर होती है ।
देवालय में जानेसे जहाँ देवपूजा होती है; वहाँ शारीरिक एवं मानसिक लाभ भी होते हैं । देवालय में जानेकेलिए सूर्योदयसे पहले उठते हैं; और सूर्योदयसे पूर्व ही स्नान करते हैं; क्योंकि स्नान करते ही देवालय में जाना पड़ता है 1
। इससे रूप, तेज, आरोग्य, बल, आयु, दुःस्वप्न - नाश और मेधा प्राप्त होती है । देवमन्दिर प्रायः नगरसे बाहर होते हैं, उनमें कोई बागीचा भी होता है । देवपूजाकेलिए बगीचेसे हम फूल चुनते हैं, जिससे हमें शुद्ध - वायु भी मिलती है, नगरके बाहरकी शुद्ध - वायुमें भ्रमण भी हो जाता है । प्रातः भ्रमणके लाभ जगत्प्रसिद्ध ही हैं । इससे हमें शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य तथा शक्तिका लाभ होता है । शुद्ध 470-४७० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )
वायुमण्डलके कारण हमारे भीतर कुविचार नहीं रह पाते । चन्दन मस्तिष्कपर लगानेसे मस्तिष्क - शक्ति में और दृष्टिमें वृद्धि हुआ करती है ।
मन्दिरमें शंखनादसे फेफड़ोंकी शुद्धि तथा कीटाणुओंका दूरीभाव होता है; यह हम पहले लिख ही चुके हैं । तब भगवान् की उपासनासे हमारा भगवान्से ऐक्य हो जाता है । धूप, घीका चौमुखा दीया, और उसका प्रकाश यह सब भी अकाल मृत्युको रोकते हैं । इस समयको निष्काम भक्तिसे मुक्ति मिलने से हमें पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता ।
इस प्रकार के सूक्ष्म स्थूल लाभोंके कारण देवस्थानों तथा उनकी वेदमन्त्र - संस्कृत मूर्तियों में दिव्यशक्तिके प्रभावसे अनेक रोगोंको दूर करनेकी शक्ति है - यह सिद्ध होगया । हमारी भारतीय - संस्कृति भी इन्हींके कारण हमारे अन्दर रहती है । यदि देवमन्दिरों में हमारी हिन्दु - संस्कृतिका हिताधायक कुछ भी न होता; तो मुसलमानी सम्राट् औरङ्गजेव हिन्दु - संस्कृति के विनाशकेलिए देवमन्दिरोंको न तुड़वाता । तब देवमन्दिरमें जाना और उसमें देवपूजन करना यज्ञकी भांति ही ऐहिक और मुष्मिक दोनों ही लाभ देनेवाला सिद्ध हुआ ।
( ४० ) चरणामृतका वैज्ञानिक - महत्त्व ।
देवमन्दिर जाकर देवमूर्तिका नमस्कारादि - द्वारा पूजन करके फिर हम चरणामृत लेते हैं; और उस समय एक मन्त्र पढ़ते हैं- ' अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम् । विष्णुपादोदकं पीत्वा
In English
The Science of Temple Worship and Devotion
This chapter explains how temple worship and rituals provide both spiritual and physical benefits. It argues that deities, icons, and temple elements like bells and plants interact with the five elements of the human body to promote health and mental focus.
This chapter answers
- Why do hindus worship specific deities based on the five elements?
- What are the health benefits of visiting a hindu temple?
- How does the sound of a bell or conch affect the body?
- Why is tulsi used in religious offerings?
- What is the purpose of wearing footwear in a temple?
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