पञ्चम सुमन · प्रकरण 86

गीताके अन्तिम मन्त्रका रहस्य

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747मरवा दिया । क्या यह धर्म था?

' अश्वत्थामा हतः, नरो वा कुञ्जरो वा ' ऐसा गोलमोल - शब्द युधिष्ठिरने कह दिया और ' कुञ्जरः ' कहने के समय श्रीकृष्णने शंख बजा दिया, भीमसेनने उस समय सिंहनाद कर दिया; शेष पाण्डव तथा सैनिक अपने ढोल बहुत जोर से बजाने लगे- जिससे उक्त शब्द द्रोणाचार्यके कानमें नहीं पहुँच सके । इससे उनने शस्त्र- त्याग करके प्राणायाम ' चढ़ा लिया । उसी समय धृष्टद्युम्नने द्रोणाचार्यका तलवारसे सिर काट लिया - क्या यह धर्म था?

वस्तुतः युद्धों में धर्म - अधर्म देखा भी नहीं जाता । इसका नाम नीति होता है । इस नीतिद्यूत से प्रतिपक्षीको पराजित करना पड़ता है । अतः यह अर्थ भी आधुनिक युगको नहीं रुचता । अब ऐसे अर्थकी आवश्यकता है - जो इस सुधार - युगमें भी सबका सिर स्वीकृति से हिलवा दे और वह अर्थ गहरे में गोता लगानेसे निकल सकता है, अब उसी अर्थ को हम उपस्थित करते हैं; जो आस्तिक- नास्तिक, धर्मात्मा तथा सुधारवादी सभीको सम्मत हो ।

( घ ) वह यह है - जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं । योगेश्वरसे यहाँ यह भाव है कि- ज्ञानके प्रतिनिधि, सजीव ज्ञान श्रीकृष्ण हैं 1

। जहाँ धनुर्धारी अर्जुन हैं । धनुषधारी से अभिप्राय है कि— कर्म - प्रवृत्त, सजीव कर्म अर्जुन हैं । निष्कर्ष यह है कि जहाँ ज्ञान और कर्मका समुच्चय है, समन्वय है; वहीं श्री ( शोभा ) और विजय है; वहीं ऐश्वर्य एवं ध्रुव नीति है - ऐसा मेरा मत है । क्योंकि पाण्डवोंके पक्षमें ज्ञान और कर्मका ठीक - ठीक मेल है । इसमें 748श्रीकृष्ण ज्ञान हैं और अर्जुन कर्म है, अतः इसी पक्षकी विजय होंगी - यह संजयका आशय है ।

यह बात ठीक भी है । जहाँ केवल कर्म होता है; वहाँ भी विजय नहीं होती; क्योंकि - वहाँ ज्ञानी न होने से मार्ग- प्रदर्शन नहीं होता । जहाँ केवल ज्ञान होता है, वहाँ भी विजय नहीं होती; क्योंकि- ज्ञान, क्रिया के बिना व्यर्थ हो जाता है - ' ज्ञानं भारः क्रियां विना । ' सभी उपदेशक हो जाएँ, केवल मार्ग - प्रदर्शक ही रहें; कर्म करनेवाला कोई न रहे; तब सफलता कैसे मिल सकती है? अतः दोनोंके समन्वयसे सफलता हुआ करती है ।

यही बात वेदमें भी कही है - ' अन्धं तमः प्रविशन्ति ये अवि- द्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां श्रिताः ॥ ( यजु ० वाज ० संहिता ४०।१२ ) यहाँ ' अविद्या ' केवल - कर्मकी उपासना करने वालेको अन्धेरेमें रहनेवाला बताया है और ' विद्या ' केवल- ज्ञानका अवलम्बन करनेवालेको पूर्वसे भी अधिक अन्धेरे में रहनेवाला बताया है । कर्मका नाम ' अविद्या ' इसलिए है कि - उसमें ज्ञानका सम्बन्ध नहीं होता; उसे जैसे कहा जाता है- वैसे ही करना पड़ता है । इससे केवल कर्म तथा केवल ज्ञान दोनों पृथक् - पृथक् असफलताके ही कारण बताये गये । अब वेद दोनोंका समुच्चय बताता है— ' विद्यां चाविद्यां च यस्तद् वेदोभयं सह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥ ( ४०।१४ )

यहाँ अविद्या ( कर्म ) से मृत्यु ( असफलता ) दूर होना तथा विद्या ( ज्ञान ) से अमृत ( सफलता ) की प्राप्ति कही है । इससे कर्म तथा ज्ञान 749के समवायको विजय - च्यादिका साधन बताया है । यह केवल यहां नहीं, किन्तु सर्वत्र ही यह समन्वित होगा ।

आप छात्रों की परीक्षा को ही ले लीजिये 1 । जो छात्र केवल रट लगानेवाला है; वह भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता । रटना ' अविद्या ' है । पर जो केवल समझ ( ज्ञान, विद्या ) रखनेवाला छात्र है; वह पूर्वसे भी अधिक असफलता प्राप्त कर सकता है । पर जो छात्र कर्म और ज्ञान, रट और समझ दोनों रखता है, वह रटने से अनुत्तीर्णताके भय ( मृत्यु ) को पार करके, समझसे उत्कर्षको, अच्छे अङ्कको प्राप्त करता है ।

यही बात आप युद्धों में ले लीजिये । युद्धों में सेना होती है- - कर्म, और ज्ञान होता है सेनानायक । यदि केवल सेना हो, मार्ग- प्रदर्शक ज्ञानी सेनानायक न हो; तब भी विजय कैसे मिले? यदि केवल ज्ञान सेनापतिही हो, सेनारूप कर्म न हो; तो पराजय निश्चित ही है । इसलिए ' कर्म ' चाहिये अधिक, ज्ञान चाहिये थोड़ा, पर उत्तमः. दोनोंका ठीक समन्वय हो; तब विजय असन्दिग्ध होगी । इसी प्रकार युद्धमें शस्त्र बल वा भुज - बल है कर्म, पालिसी है ज्ञान । यह दोनों जिस पक्षमें यथावत् होंगे; उस पक्ष की सफलता निश्चित होगी ।

इस बात को सभी ओर घटाइये । हमारे हिन्दु - जीवन को ही ले लीजिये । इसमें ७५ वर्ष तक यज्ञोपवीत रखकर कर्म करने पड़ते हैं । कर्मके साथ उपासना भी गृहीत हो जाती है । उपासनाका कर्म- ज्ञान दोनोंसे सम्बन्ध होता है । शेष २५ वर्ष तक ज्ञान रखना पड़ता 750है । इस समुच्चयसे मुक्ति - प्राप्ति सुलभ हो जाया करती है । इस प्रकार आप दूकानदारीको ही ले लीजिये; पुस्तक प्रकाशनको ही ले लीजिये, किसी देशको ही ले लीजिये; जिसमें ज्ञान और कर्मका समन्वय होगा; उसमें उसकी सफलता निश्चित है । दूकानदारीमें उपयोगी वस्तुओंोंका संग्रह कर्म है; उनका ग्राहकों की प्रसन्नताके उपायोंको आविष्कृत करके विक्रय करना यह ज्ञान है । दोनोंके समुच्चयसे दूकानदारी चल निकलेगी । पुस्तक प्रकाशन या पन्न- प्रकाशनमें बाहरी सज - धज ' कर्म ' है, भीतरी उपयोगी - सामग्री ' ज्ञान ' है । दोनोंका समन्वय लाभकारक होगा । देश में प्रजा ' कर्म ' है, उसका राजा, नायक ' ज्ञान ' है । समाज ' कर्म ' है, नेता- लीडर ' ज्ञान ' है । ' कर्म ' चाहिये अधिक, ' ज्ञान ' चाहिये थोड़ा, पर अत्युत्तम; तब तो सफलता होगी । यदि ज्ञान बहुत हुआ, और कर्म थोड़ा हुआ; लीडर बहुत हुए, जनता थोड़ी हुई, राजा बहुत हुए, प्रजा थोड़ी हुई, वक्ता बहुत हुए, श्रोता थोड़े हुए, तब उसमें भी सफलता मिलने की आशा नहीं होती । बहुत - ज्ञानसे फिर कुछ भी निश्चित नहीं हो पाता । बहुत लीडर हों; बहुत राजा हो जाएं; तो आपसमें तू - तू, मैं - मैं होकर कई विवाद खड़े हो जाएंगे । सफलता सर्वथा नहीं होगी । किसी सोसायटीके उत्सव में वक्ता अधिक हों, श्रोता कम हों; तो अपील करनेपर धन कहांसे जमा होगा?

' ज्ञानी भले ही अधिक न हों, पर चाहियें उत्तम; इससे वह सम्प्रदाय वा धर्मं खूब फैल जाता है । केवल उपदेशक हों तो धर्म पर विपत्ति पड़ने पर खड़े - खड़े ताका ही करते हैं; अपनी जान 751उनको प्यारी होती है; वे मरने - मारनेके लिए तैयार होना नहीं चाहते । जान इस समय में कट्टर लोग ही होमते हैं, उनको उस धर्मका अन्ध - मोह होता है । वे उस धर्मसे प्यार करते हैं; पीछे नहीं हटते; अतः वे धर्मकी रक्षार्थ मर मिटते हैं । अपना बलिदान दे देते हैं । प्रातः वे ही उठते हैं, सर्दीमें नहाते हैं, सन्ध्या- होमादि करते हैं, उपदेशक महोदय तो सूर्योदय होनेपर विस्तर छोड़ते हैं; सन्ध्या - हवनादि कर्म तो उनके नाममात्रके होते हैं । अतः दोनों ही चाहियें । सफलता ज्ञान और कर्मके समुच्चयसे ही होती है; तब वह धर्म वा सम्प्रदाय ओर से छोर तक फैल जाता है, उसके मानने वालोंकी संख्या बढ़ जाती है ।

यही बात जातियोंमें ले लीजिये । विश्व में कुछ मुसलमान - आदि जातियां ' कर्म ' स्वरूप हैं; इनमें कट्टरपना बहुत है, पर ' ज्ञान ' नहीं; अतः यह भी पूर्ण - सफल नहीं हो सकती । पर ' कर्म ' - परक जाति केवल ज्ञानवाली जातिकी अपेक्षा फिर भी अधिक लाभ उठा लेती है । ' हिन्दु ' जाति श्राजकल ' ज्ञान ' स्वरूप है - अतः यह भी पूर्ण सफल नहीं होती । अतः इसकी संख्या भी अब घटती चली जा रही है । पर पूर्व- समय इसमें ज्ञान और कर्म दोनों समुचित थे; अतः इसका ही तो सारे भू - मण्डल पर शासन था । पर जो जाति वा जो सम्प्रदाय कर्म और ज्ञान दोनोंका समन्वय न रखेगा; उसका - पतन हो जाया करेगा 1

। ' कर्म ' फिरभी कुछ समय तक टिका देता है, पर ज्ञानके पांव नहीं होते । केवल ज्ञान पतन करा देता है । इसीसे ही हिन्दु -

जातिका शासन भू - मण्डल परसे फिसला; अत्र 752फिर अपने देश से भी फिसलना चाहता है । पर हमें गीताका अन्तिम श्लोक समझा रहा है कि - योगेश्वर कृष्ण, मार्ग - प्रदर्शक, सजीव ज्ञान भी चाहिये, धनुर्धारी अर्जुन भी, सजीव कर्म भी अपेक्षित है; तभी श्री, विजय, ऐश्वर्य प्राप्त होगा । क्या कारण है कि बहुत होकर भी कौरव नहीं जीत सके, थोड़े पाण्डव जीत गये? कारण यह है कि — कौरव केवल ' कर्म ' रूप थे; उस पक्ष में अपेक्षित ' ज्ञान ' नहीं था । पर पाण्डवों के पक्ष में अर्जुन ' कर्म ' थे; ' श्रीकृष्ण थे मूर्त ' ज्ञान ' । कर्मका रहना तो आवश्यक होता ही है । तभी तो श्रीकृष्णने कर्णकी एकवीरशत्रुघातिनी शक्ति से अर्जुनको बचवानेकेलिए रात्रि - युद्ध शुरू करवाके घटोत्कचको मरवा दिया । और फिर ' श्रीकृष्ण ' रूप ' ज्ञान ' न होते; तो मार्ग - प्रदर्शन कौन करता? तभी तो अर्जुनने - शस्त्र के न उठानेकी प्रतिज्ञा करनेवाले भी - श्रीकृष्णको ही चुना; पर दुर्बुद्धि - दुर्योधनने ऐसे श्रीकृष्णको लेना व्यर्थ समझकर उनकी नारायणी सेनाको ही ले लिया । इसी

प्रतिवर्ष ' गीता जयन्ती

- ' हमें इसी ' ज्ञान'को देने वा बताने भूलका परिणाम उसे पराजय मिला ।

आती है; पर हम ' कर्म ' द्वारा उसे नहीं मिलते; उसका अवलम्बन नहीं करते; तब वह असफलताका साँस भरती हुई निराश होकर लौट जाती हैं । गीताका पाठ कीजिये, यह तो होगा ' कर्म ', फिर इसके निष्कर्ष - रूप अन्तिम पद्यका जिसकी हमने व्याख्या की है- मनन कीजिये, यह हो जायगा ' ज्ञान ' । बस दोनों के अवलम्बनसे और जनता को भी इधर चलाने से ' मानवधर्म ' का प्रचार वा प्रसार ही

In English

The Harmony of Knowledge and Action

This text argues that success requires a balance between knowledge (vidya) and action (avidya). It uses the relationship between Krishna and Arjuna to demonstrate that while action is necessary, it must be guided by superior knowledge to achieve lasting victory.

This chapter answers

  • What is the relationship between krishna and arjuna?
  • Difference between vidya and avidya in vedas?
  • Why is coordination of knowledge and action important for success?
  • How to balance knowledge and work in daily life?

Also written: Gitake, Antima, Mantraka, Rahasya, Gitake Antima Mantraka Rahasya, गीताके अन्तिम मन्त्रका रहस्य

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 747–752 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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