पञ्चम सुमन · प्रकरण 85

भगवद्गीताकी सर्वप्रियताका कारण

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735संन्यस्यास्ते सुखं वशी ' ( ५/१३ ) ' सर्वधर्मान् ( कर्माणि परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ' ( १८६६ ) इन पद्योंकी संगति कठिनता से बैठती है ।

यदि गीतामें केवल कर्म विवक्षित हो; उपासना नहीं; तो ' नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया । शक्य एवं विधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ' ( ११।५३ ) यहाँपर कही हुई कर्मकी निन्दा तथा ' भक्तया त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन । ज्ञातु द्रष्टु ं च तत्त्वेन प्रवेष्टु ं च परन्तप । ' ( ११।५४ ) यहाँपर की हुई उपासनाकी प्रशंसा अन्वित नहीं हो सकती ।

यदि गीता के ' योग ' शब्द से ' कर्मयोग ' इष्ट हो तो ' कर्मिभ्य- श्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन! ' ( ६४६ ) इस पद्यकी भी संगति नहीं लगती । ' योगस्थः कुरु कर्माणि ' ( २।४८ ) यहाँ भी पुनरुक्ति होती है ।

' यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येवात्मना तुष्टस्तस्य कार्यं ( कमैं ) न विद्यते ' ( ३।१७ ) यहाँ पर आत्मतृप्त - पुरुषके लिए कर्म करने की आवश्यकता ही नहीं स्वीकृत की गयी । अर्जुन इस प्रकारका नहीं था, इसलिए उसके लिए कहा है- ' तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ' ( ३ । १ ९ ) । इन सब बातोंको देखकर सिद्ध होता है कि - गीताको कर्म, उपासना, ज्ञान सभी इष्ट हैं, केवल एक - एक नहीं । कर्मयोग आदिम सोपान, उपासना मध्यम तथा ज्ञानयोग अन्तिम सोपान इष्ट है । यही बात ' आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ' ( ६।३ ) यह पद्य बता रहा है । ' योगमारो दुमिच्छतो 736मुनेः- कर्मफलसंन्यासिनः कर्म कारणं साधनम् उच्यते । योगारूढस्य पुनस्तस्यैव शमः - उपशमः, सर्वकर्मभ्यो निवृत्तिः कारणं - योगारूढत्वस्य साधनमुच्यते ' ।

अर्जुन दृष्टान्तसे गीताकी कर्मयोगपरता भी हृदयंगम नहीं

.

मालूम होती । अर्जुन तो गीता में निमित्तमात्र है । भगवान् ने गीता अर्जुनको नई नहीं सुनाई; किन्तु इससे पूर्व भी विवस्वानको सुनाई थी — ' इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवान् अहमव्ययम् । विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ' ( ४।१-२-३-४-५-६ ) । तब अर्जुनका उदाहरण देकर गीता में केवल कर्म बताना ऐकदेशिकता है । ' सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः । पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् ' इस प्रसिद्ध - पद्य में अर्जुनको ' वत्स ' कहा है, गीतामृतको दुग्ध कहा है । बछड़ा सारा दूध नहीं पीता; तब अर्जुन तो बछड़े की तरह दूधको क्षरण करानेका निमित्त है; तभी यहाँपर सुधीगणोंको ' भोक्ता ' कहा है; अर्जुनको नहीं । तब अर्जुन ' निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्! ' ( ११।३३ ) इस प्रकार भीष्मादिके- मारणकी तरह गीताज्ञानके अधिकार में भी निमित्तमात्र है, उसका एकमात्र आधार नहीं । तभी श्रीशंकराचार्य - स्वामीने भी कहा है- ‘ सर्वलोकसंग्रहार्थम् अर्जुनं निमित्तीकृत्य आह भगवान् ' ( २।११ ) ।

' गीताके सुनने के बाद अर्जुनका युद्ध में उद्यम देखकर उससे गीताको कर्म इष्ट है'- इसपर भी जानना चाहिये कि भगवान् युद्धका फल स्वर्ग ( २२३७ ) बताते हैं; परन्तु सिद्धान्तपक्ष में वे स्वर्गको अवर ( ६।२१ ) बताकर मुक्तिको श्रेष्ठ ( १५/६ ) बताते हैं । इससे स्पष्ट है. 737कि वे निष्काम कर्म कराकर ज्ञानकी ही पुष्टि चाहते हैं; क्योंकि, कर्म सदा सकाम ही होता है निष्काम नहीं - ' प्रयोजनमनुद्दिश्य न मन्दोऽपि प्रवर्तते ' ।

हाँ, पहली अज्ञानावस्था में वे सकाम कर्मका निषेध भी नहीं करते, बल्कि वैसे अज्ञानीको कर्मसे रोकना वे ज्ञानीकेलिए भी उचित नहीं मानते, ' न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसंगिनाम् । जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् ( ज्ञानी ) युक्तः समाचरन् ' ( ३।२६ ) । तब कर्मकी निष्कामता गीताके मत में अकर्मतामें परिणत हो जाती है । वह अकर्मता ज्ञानमें पर्यवसित हो जाती है ।

अर्जुनको युद्धमें ही प्रवृत्त करना सम्पूर्ण गीताका उद्देश्य नहीं । दस अध्याय तक गीता सुनानेपर भी अर्जुनका अन्तःकरण समाधानको प्राप्त नहीं हुआ । विराट् रूप दिखलाकर जब भगवान्

अर्जुनको निमित्तमात्र सिद्ध कर दिया; तभी उसके हृदयका समाधान हुआ । तब केवल अर्जुनको युद्धमें प्रवृत्त करने के लिए इतनी विशाल - गीता सुनानेका प्रयोजन नहीं रहता । अर्जुन तो गायसे दूध निकलवाने में बछड़ेकी तरह निमित्तमात्र था | भगवान्

यहाँ पर सोचा कि मेरे पृथिवी - लोकसे तिरोभाव होनेपर कलियुगके भीषण आक्रमणवश लोग कर्म - उपासना - ज्ञानसे भ्रष्ट होकर बड़ी हानि उठायेंगे; इस कारण उनके कल्याणार्थ कर्म- उपासना -

ज्ञानके सामञ्जस्यसे पूर्ण उपदेश किया । गीताका कर्म- संन्यासपूर्वक केवल ज्ञानपरता भी विषय नहीं; अन्यथा गाण्डीवको छोड़ चुके अर्जुनके लिए यह कर्म त्यागकी प्रोत्साहना हो जाती ।

738' कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ' ( ३३२० ) इत्यादि पद्योंसे कर्मसे भगवान्‌को मुक्ति इष्ट है - ज्ञानसे नहीं; यह भी नहीं कहा जा सकता । यदि गीताके मत में कर्मसे मुक्ति इष्ट होती, तो वह ‘ यामिमां पुष्पितां वाचं ' ( २।४२-४३-४४ ) इस प्रकार कर्मनिन्दा न करती 1 । इससे स्पष्ट है कि - ' कर्मणैव हि संसिद्धिम् ' इत्यादि - पद्योंका ' कर्म ' शब्द ' फलेच्छाविरहितकर्म ' -परक होने से पारिभाषिक है । ' आपाततः वह ' कर्म ' है, पर गीता के मत में वह अकर्म है ( ४/१८ ) । वेदान्तदर्शन में भी कहा है- ' तुल्यं तु दर्शनम् ' ( ३ | ४ | १ ) अर्थात् जो ३ | ४ | ३ सूत्रके पूर्वपक्षमें कहा है कि - जनक आदि आत्मज्ञानी कर्म करते थे, उसका उत्तर यह है कि इस प्रकार के आत्मज्ञानियों का कर्म करना न करना तुल्य ही है । उसमें तो ' लोकसंग्रहमात्र ' है, वास्तव में वह ' कर्म ' नहीं ।

तब गीता में कर्म से मुक्ति आदिकी प्राप्ति नहीं समझनी चाहिये; किन्तु ' कर्म ' से ही । वानप्रस्थ आश्रम तक कर्मनिरत पुरुष कभी भी वासना - त्याग नहीं कर सकता । ७५ वर्षके बाद जब सब वासनाओंके क्षयकी अवस्था आती है; तभी संन्यासकी आज्ञा है; तब वासना - क्षयवश कर्मफलकी आकांक्षा नष्ट होने से कर्मत्व हो जाने पर, ज्ञानोदयसे क्योंकि - ' तत् ( ज्ञानं ) स्वयं योग - ( कर्मयोग ) संसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ' ( गी ० ४।३८ ) यथैधांसि समिद्धोग्नि- र्भस्मसात्कुरुतेर्जु ' न! ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा ' ( ४ । ३७ ) पूर्व - कर्मोंके क्षय होनेपर वही ' ज्ञान ' से मुक्ति हो जाती है ।

फलतः गीता - प्रोक्त सिद्धि भी अन्तमें संन्यासित्वमें कर्म वा 739कर्मफल - त्याग होनेपर ज्ञानावस्था में फलित होती है; जैसे वेदमें भी कहा है – ' अविद्यया ( कर्मणा ) मृत्यु तीर्त्वा विद्यया ( ज्ञानेन ) अमृतमश्नुते ' ( यजुः सं ० ४० १४ ) । ' संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेय- सकरावुभौ । तयोस्तु कर्मसंन्यासात् कर्मयोगो विशिष्यते ' ( ५२ ) यहाँ पर भगवान्ने कर्मसंन्याससे भी मुक्ति मानी है । जो कि – ' यस्तु कर्मफल- त्यागी स त्यागी ( संन्यासी ) त्यभिधीयते ' ( १८ | ११ ), यहाँ भगवान् कर्मफल - त्यागीको ही यौगिक - संन्यासी मानते हैं । ' भवत्य- • त्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां कचित् ' ( १८ | १२ ), यहाँ भगवान्ने अत्यागीसे विपरीत त्यागीको ' संन्यासी ' कहा है । तब कर्म करनेकी अवस्था - वानप्रस्थाश्रम तक वासनाक्षयके असम्भव होनेसे अन्त में वही ज्ञानावस्था पर्यवसित हो जाती है । उसी चतुर्थ अवस्था में ' समलोष्टाश्मकाञ्चनः ' ( ६८ ), ' साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धि: ( ८६ ), ' गवि - शुनि, ब्राह्मणे- श्वपाके समदृष्टिः ' ( ५१८ ) ये बातें हो सकती हैं । प्रथम अवस्थाओं में यह साम्यवाद नहीं हो सकता । इस कारण कर्म - द्वारा सिद्धिमें कर्मत्याग ही फलीभूत हुआ ।

इससे स्पष्ट है कि गीता प्राणिमात्र केलिए है, केवल अर्जुन वा केवल कर्मीकेलिए नहीं । प्राणिमात्र केलिए कर्मकाण्ड व्यावहारिक है और ज्ञानकाण्ड पारमार्थिक । इस कारण गीता में भी कर्मयोग और ज्ञानयोग दोनों ही हैं । ज्ञानाग्निमें ही सब कर्मोंका भस्मीभाव ( ४/३७ ) कहा है । अतः गीतामें केवल कर्म इष्ट नहीं ।

जिस प्रकार पूर्णपुरुष - भगवान्की वाणी वेदमें कर्म, उपासना, ज्ञान -तीनों सम्बद्ध हैं । वेदके ब्राह्मण - भाग में कर्म, मन्त्र - भाग में 740उपासना, उपनिषद्भागमें ज्ञान है, वैसे ही पूर्णपुरुष- भगवान्की गीता में भी तीनों सम्बद्ध हैं । अतः गीताका उपदेश भी पूर्ण ही है, अपूर्ण नहीं । ' कर्मण्येवाधिकारस्ते ' ( २।४७ ) इत्यादि स्थलों में कर्म, ' सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ' ( १८६६ ) ' पत्रं पुष्पं ' ( ६।२६ ) इत्यादिमें उपासना, ' सर्वं कर्माखिलं पार्थ! ज्ञाने परिसमा- प्यते ' ( ४ | ३३ ) इत्यादि में ज्ञान ' मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ' ( ११।५५ ) इत्यादिमें कर्म, उपासना, ज्ञान तीनोंका समुच्चय है ।

संसारमें कर्मियोंकी संख्या अधिक होनेसे गीता में कर्म भी अधिक रखा गया है इसलिए कर्मकाण्डकी अवधि भी ७५ वर्ष तक रखी गई है । उपासनाको मध्यम और ज्ञानको अल्पमात्रा में कहा गया है । इसी कारण वेदमें भी कर्मकाण्डके मन्त्रोंकी संख्या ८० प्रतिशत है, उपासना - काण्डकी १६ और ज्ञानकाण्डकी ४ प्रतिशत है । लोकमें भी ज्ञानस्वरूप - नेता थोड़ी संख्या में होते हैं, उनके पीछे चलनेवाली कर्मठ जनता

- अधिक होती है; अधिक होनी भी चाहिये । जनता प्रायः वासनावश सकाम कर्म करती है; जहाँ उसे वासना की तृप्तिका अवसर नहीं मिलता; उस कर्मको सर्वथा छोड़ देती है । निष्काम - कर्म करने पर तो कर्म - अकर्मका सामञ्जस्य हो जाता है; क्योंकि उसमें कर्मका त्याग भी सर्वथा नहीं होता और फिर फलमें अस्पृहतावश वह कर्म भी कर्म - त्याग के तुल्य हो जाता है । इस प्रकार पूर्णपुरुष - प्रोक्त गीता भी पूर्ण ही है । प्रवृत्ति - निवृत्ति दोनोंसे युक्त है, केवल कर्मपरक नहीं ।

जैसे वेदमें केवल ज्ञानकाण्ड माननेवाले त्रुटि करते हैं, वैसे 741ही गीतामें केवल कर्म मानना भी त्रुटिपूर्ण है । वेदकी तरह गीता में भी कर्मप्रवृत्ति और ज्ञान दोनों हैं । उपासनाका कर्म - ज्ञान दोनोंसे संबंध है; अतः गीता में कर्म - ज्ञान दोनों ही हैं । यदि उसमें कर्म होता; ज्ञान न होता; ज्ञान होता, कर्म न होता; प्रवृत्ति उसमें होती, निवृत्ति न होती; केवल निवृत्ति होती, प्रवृत्ति न होती; तो ' भगवद्गीता ' एकदेशीय पुस्तक हो जाती, अपूर्ण रहती; अतः सर्वप्रिय भी न बन सकती । त्रिविधता होनेसे ही सब प्रकारके अधिकारियोंके लिए... उपयोगी हो जानेसे यह सर्व प्रिय है । सब एक प्रकारके अधिकारी नहीं हो सकते । इसी कारण ' श्रीमद्भागवत ' में भगवान्ने उद्धवको कहा था - ' योगायो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया । ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योस्ति कुत्रचित् ' ( ११।२०१६ ) इस प्रकार कर्म, उपासना, ज्ञानके सामञ्जस्य - द्वारा सारे संसारका कल्याणं - साधन, साथ ही साथ युद्ध कराकर धर्मकी विजय करना ही गीताका उद्देश्य है ।

इसके अतिरिक्त गीता में प्रायः उपनिषदोंको आधार बनाया गया है; इसीलिए भगवद्गीताकी पुष्पिकाओं में ' श्रीमद्भगवद्गीतासूप- निषत्सु ' ऐसा पाठ मिलता है । ' सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः ' यह पद्य भी प्रसिद्ध है । उपनिषदों में यद्यपि कर्म है, तथापि ज्ञान भी है । उपनिषदों में प्रसिद्ध जनक, अजातशत्रु आदि राजर्षि कर्मपरक भी ब्रह्मज्ञानी थे । उनके आधारसे बनी हुई गीता में भी कर्मयोगके साथ ज्ञानयोग भी स्वतः सिद्ध है । हाँ, कर्मकी प्रधानता तथा ज्ञानकी अल्पता तो सम्भव है, जैसे कि वेदमें

742श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )

भी है । वस्तुतः कर्मको निष्कामता से करनेका उपदेश उसमें ज्ञान- योगकी प्रधानता बता रहा है । ' कर्मण्यकर्म यः पश्येत् ' ( ४ । १८ ) इसमें अपने इष्टकर्मको वस्तुतः अकर्म बताकर उसके आचरण ` करनेवालोंको ' बुद्धिमान् ' बताकर, वस्तुतः उसी अकर्मको कर्म कहने वालोंको, ढंगसे बुद्धि - रहित बताया गया है । इसीलिए अर्जुनने भी ' ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन! ' ( ३ | १ ) भगवान् के मतमें कर्मकी अपेक्षा ज्ञानको श्रेष्ठ समझनेका भगवान्का अभिप्राय समझा है ।

इससे स्पष्ट है कि - कर्म श्रादिम - सोपान होनेसे व्यावहारिक है, क्योंकि वही मल - आवरण - विक्षेप आदि दोषोंके हटाने में सहायता कर चित्त - शुद्धि करता है, अथवा कर्मके द्वारा मलनाश, उपासनासे विक्षेपका नाश होता है । फिर परमार्थ - कोटि में ज्ञान- योगका अवसर होनेसे, उससे आवरणके नष्ट होनेपर जीव ब्रह्मत्वको प्राप्त करता है । इसी कारण द्वैतवाद व्यावहारिक होता है और अद्वैतवाद पारमार्थिक ।

फलतः भगवद्गीता में केवल कर्म नहीं है । कर्म भी है, उपासना भी है, ज्ञान भी है । बल्कि ज्ञानको विशिष्ट पद दिया गया है- ' तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थ - महं स च मम प्रियः ॥ उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् । आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ' ( ७ । १७-१८ ) । ‘ अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तम् ' ( १३ । ११ ) । तब जिस काण्डका प्रेमी भगवद्गीता को उठाता है, उससे 743उसकी इष्टसिद्धि होती है, उसके चित्तको शांति मिलती है । यह अवश्य है कि गीता के मत में भी कर्म आदिम - काण्ड है और ज्ञान अन्तिम । कर्मकी सिद्धता से ही ज्ञानकी प्राप्ति होती है । ' न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ' ( ४ । ३८ ) । यहाँपर कर्मयोगकी सिद्धतासे, समयपर ज्ञानका प्राप्त हो जाना कहा है । अतः गीता के मतमें भी ज्ञान अन्तिम उद्देश्य सिद्ध हुआ; कर्म उसमें साधन बना, अस्तु ।

कर्मी भी इसी गीतासे शान्ति, अपना मनोरथ और अपने पक्षका समन्वय प्राप्त करते हैं । उपासक भी इसीसे उपासना सीखते हैं, इसीमें अपना मनोरथ एवं अपने पक्षका समन्वय पाते हैं । ज्ञानी भी इसीसे शान्ति पाते हैं, अपना मनोरथ तथा अपने पक्षका समन्वय पाते हैं । इस प्रकार ' भगवद्गीता ' वेदकी भांति मान्य है । वेद भी भगवद्वाणी है, यह भी । ' भगवद्गीता ' संसारकी महोच्च - पुस्तक है । वेदके विषय में तो अधिकार अनधिकारका प्रश्न साथ है; पर इसकेलिए तो वह भी नहीं है; क्योंकि वेदकी वाणी छान्दस है, गीताकी वाणी लौकिक है । छान्दस - वाणीमें अयज्ञोपवीतियोंका अधिकार नहीं होता; पर लौकिक - भाषाबद्ध- इसमें वह बन्धन नहीं; तभी तो यह क्या देशमें और क्या विदेश में सर्वत्र आहत है । इसी कारण यह सर्वप्रिय भी है ।

744( १५ ) गीताके अन्तिम मन्त्रका रहस्य ।

भगवद्गीताका अन्तिम मन्त्र यह है । ' यत्र योगेश्वरः कृष्णो यन्त्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिध्रुवा नीतितिर्मम ॥ ’ ( १८७८ )

इसे यदि सम्पूर्ण गीताका निष्कर्ष ( निचोड़ ) कहा जावे; तो कोई अत्युक्ति न होगी । सम्पूर्ण रोमहर्षण – श्रीकृष्णार्जुन - संवाद सुननेवाले सञ्जयकी यह उक्ति है । इस पद्यका साधारण अर्थ तो यह है कि - ' जिस पक्ष में योगके अधिष्ठाता श्रीकृष्ण हैं और जिस पक्षमें धनुषधारी अर्जुन हैं, उसी पक्षमें श्री, विजय, भूति ( ऐश्वर्य ); और स्थिर - नीति है - यह मेरा मत है । '

: ( क ) यह वाच्यार्थ है; यह केवल महाभारत युद्धकी तात्कालिक परिस्थिति बता रहा है । इससे संजयने पाण्डवोंकी विजय आंकी है । तब यह अर्थ उस समय के अनुकूल होनेसे सार्वकालिक नहीं रहता और गीता भी एकदेशी बन जाती है । कई लोग अब भी इसका यही अर्थ मानते हैं, पर यह अर्थ केवल भक्तोंको प्रसन्न कर सकता है, आजकलके सुधार - युग में जिसमें सब बातें विज्ञानसे परखी जाती हैं; ऐसे अर्थ मानने में उत्सुकता नहीं दीखती । उनके मतमें न श्रीकृष्ण अब हैं, न अर्जुन । किसी प्रकार श्रीकृष्णको परमात्माका अवतार मानकर उनको अब भी विद्यमानता मान ली जावे, पर अर्जुनके मनुष्य होनेसे उसकी तो अब विद्यमानता उनके मत में नहीं हो सकती । तब इस अर्थके एकदेशी होने से अव्यापक हो जाने के कारण वे फिर गीताकी ओर ध्यान भी नहीं 745दे सकते |

( ख ) कई भक्त लोग इस मन्त्रके अर्थ में दूरकी उड़ान भरते हैं । वे इसीसे ' श्रीकृष्णः शरणं मम ' इस महामन्त्रकी उत्पत्ति बताते हैं । उनका अभिप्राय यह है कि जिस मन्त्रमें योग ( व्युत्पत्ति ) का अधिपति अर्थात् शब्द ' कृष्ण ' है; क्योंकि व्युत्पत्ति शब्दकी

करती है । ' यत्र पार्थो धनुर्धरः ' जहाँ पर धनुषसे धारण किया जानेवाला शर ( बाण ) ' पार्थ: ' ' पा ' धातुके अर्थको धारण करनेवाला हो, ' पा ' का अर्थ होता है ' रक्षण ' । सो. ' शर ' का ' रक्षा ' अर्थ कब हो सकता है? वह तब हो सकता है; जब उसे ' शरणं ' बना दिया जावे । अब मन्त्र बन गया ' कृष्णः शरणं ' ।

' तत्र श्रीः, मम ' उक्त मन्त्रकी आदिमें ' श्री ' रखदो; अन्त में ' मम ' रख दो । अब बन गया ' श्रीकृष्णः शरणं मम ' । अब इसी पद्य में इस गुप्त - मन्त्रका माहात्म्य बताते हैं - ' विजयो भूतिः, ध्रुवा, नीतिः, मतिः ' अर्थात् ' इस महामन्त्रका जप करने से विजय प्राप्त होगी, ऐश्वर्य प्राप्त होगा, अचल - नीति प्राप्त होगी, मति अर्थात् बुद्धि प्राप्त होगी ' ऐसा अर्थ नैरुक्त - शैली हो जाती है ।

पर आजका युग नैरुक्त - शैलीका पक्षपाती होता हुआ भी इस मन्त्र के केवल - जापसे भी इतने फलकी प्राप्ति नहीं मानता । वह केवल - शब्दके जपने से कुछ भी फल नहीं मानता । यद्यपि विज्ञान आजकल शब्द - रूप मन्त्रमें भी बड़ी शक्ति मानने लग गया है, संगीतके शब्द से ही मृग पकड़ा जा सकता है, किसीके मनको पकड़ा जा सकता है । शब्दसे ही सारी सेनाका संचालन किया 746जाता है । मल्हार रागके शब्द गानेसे ही वर्षा होती है; शब्द से ही बड़े - बड़े युद्ध और शब्द से ही बड़े - बड़े संघ - संघटन बना करते हैं; तथापि नास्तिकता की ओर प्रवृत्त यह युग उक्त अर्थको भी स्वीकार करनेमें नाक - भौं सिकोड़ता है ।

( ग ) कई भक्तिकी कोटिसे ऊँचे उठे हुए और वर्तमान युगकी गतिविधिको समझनेवाले विद्वान् उक्त पद्यका आशय यह बताते हैं कि - ' श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों धर्मके सजीव प्रतिनिधि हैं । सो वे जिस पक्ष में हैं; उसी पक्षकी विजय होती है । पाण्डवोंके पक्षमें धर्म है; उनकी विजय होगी । कौरवोंके पक्ष में अधर्म है; उनकी पराजय होगी ' - यह इस पद्यका उनके मत में संजयाभिमत आशय है । वैसा हुआ भी । अधर्मी कौरव हार गये, धर्मात्मा पाण्डव जीत गये ।

पर आज के धर्म - निरपेक्ष राज्यमें ' धर्म ' शब्द सुनते ही सुधार- वादी अपने कानोंको बन्द करने लगते हैं । वे कहते हैं कि - इसी धर्मसे महायुद्ध हुए और हो रहे हैं और होंगे । हम शान्तिके इच्छुक हैं; अब इस धर्मको कनमें दफना देना चाहिये । और पाण्डव तथा श्रीकृष्ण कितने भी धर्मात्मा हों; पर युद्ध के समय इन्होंने भी कम अधर्म नहीं किया । अर्जुनने थके हुए अपने शिष्य सात्यकिका सिर काटनेकेलिए उठाए हुए खड्गवाले भूरिश्रवा - योद्धा • का हाथ, दूरसे बाण मारकर काट दिया; और फिर सात्यकिने उसी खड्गसे भूरिश्रवाका सिर काट दिया । क्या यह धर्म था? श्रीकृष्णने रथके चक्रके उद्धार में लगे हुए कर्णको अर्जुन द्वारा

In English

The Relationship Between Karma, Upasana, and Jnana in the Gita

This text argues that the Bhagavad Gita does not prioritize action (karma) alone, but rather presents a progression of karma, worship (upasana), and knowledge (jnana). It contends that Arjuna serves merely as an instrument to transmit this wisdom to others, and that the ultimate goal is the attainment of knowledge.

This chapter answers

  • Is the bhagavad gita about karma or knowledge?
  • What is the relationship between karma upasana and jnana in the gita?
  • Was arjuna the primary recipient of the gita's wisdom?
  • Does the gita promote action or renunciation?

Also written: Bhagavadgitaki, Sarvapriyataka, Karana, Bhagavadgitaki Sarvapriyataka Karana, भगवद्गीताकी सर्वप्रियताका कारण

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 735–746 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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