सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 771–780

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 771–780

पृष्ठ 771

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गीताकी सर्वप्रियताका कारण ७४३ उसकी इष्टसिद्धि होती है, उसके चित्तको शांति मिलती है । यह अवश्य है कि गीता के मत में भी कर्म आदिम - काण्ड है और ज्ञान अन्तिम । कर्मकी सिद्धता से ही ज्ञानकी प्राप्ति होती है । ' न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते । तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ' ( ४ । ३८ ) । यहाँपर कर्मयोगकी सिद्धतासे, समयपर ज्ञानका प्राप्त हो जाना कहा है । अतः गीता के मतमें भी ज्ञान अन्तिम उद्देश्य सिद्ध हुआ; कर्म उसमें साधन बना, अस्तु । कर्मी भी इसी गीतासे शान्ति, अपना मनोरथ और अपने पक्षका समन्वय प्राप्त करते हैं । उपासक भी इसीसे उपासना सीखते हैं, इसीमें अपना मनोरथ एवं अपने पक्षका समन्वय पाते हैं । ज्ञानी भी इसीसे शान्ति पाते हैं, अपना मनोरथ तथा अपने पक्षका समन्वय पाते हैं । इस प्रकार ' भगवद्गीता ' वेदकी भांति मान्य है । वेद भी भगवद्वाणी है, यह भी । ' भगवद्गीता ' संसारकी महोच्च - पुस्तक है । वेदके विषय में तो अधिकार अनधिकारका प्रश्न साथ है; पर इसकेलिए तो वह भी नहीं है; क्योंकि वेदकी वाणी छान्दस है, गीताकी वाणी लौकिक है । छान्दस - वाणीमें अयज्ञोपवीतियोंका अधिकार नहीं होता; पर लौकिक - भाषाबद्ध-इसमें वह बन्धन नहीं; तभी तो यह क्या देशमें और क्या विदेश में सर्वत्र आहत है । इसी कारण यह सर्वप्रिय भी है । I

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७४४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ( १५ ) गीताके अन्तिम मन्त्रका रहस्य । भगवद्गीताका अन्तिम मन्त्र यह है । ' यत्र योगेश्वरः कृष्णो यन्त्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिध्रुवा नीतितिर्मम ॥ ’ ( १८७८ ) इसे यदि सम्पूर्ण गीताका निष्कर्ष ( निचोड़ ) कहा जावे; तो कोई अत्युक्ति न होगी । सम्पूर्ण रोमहर्षण – श्रीकृष्णार्जुन - संवाद सुननेवाले सञ्जयकी यह उक्ति है । इस पद्यका साधारण अर्थ तो यह है कि - ' जिस पक्ष में योगके अधिष्ठाता श्रीकृष्ण हैं और जिस पक्षमें धनुषधारी अर्जुन हैं, उसी पक्षमें श्री, विजय, भूति ( ऐश्वर्य ); और स्थिर - नीति है - यह मेरा मत है । ' : ( क ) यह वाच्यार्थ है; यह केवल महाभारत युद्धकी तात्कालिक परिस्थिति बता रहा है । इससे संजयने पाण्डवोंकी विजय आंकी है । तब यह अर्थ उस समय के अनुकूल होनेसे सार्वकालिक नहीं रहता और गीता भी एकदेशी बन जाती है । कई लोग अब भी इसका यही अर्थ मानते हैं, पर यह अर्थ केवल भक्तोंको प्रसन्न कर सकता है, आजकलके सुधार - युग में जिसमें सब बातें विज्ञानसे परखी जाती हैं; ऐसे अर्थ मानने में उत्सुकता नहीं दीखती । उनके मतमें न श्रीकृष्ण अब हैं, न अर्जुन । किसी प्रकार श्रीकृष्णको परमात्माका अवतार मानकर उनको अब भी विद्यमानता मान ली जावे, पर अर्जुनके मनुष्य होनेसे उसकी तो अब विद्यमानता उनके मत में नहीं हो सकती । तब इस अर्थके एकदेशी होने से अव्यापक हो जाने के कारण वे फिर गीताकी ओर ध्यान भी नहीं

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गीताके अन्तिम मन्त्रका रहस्य ७४दे सकते । ( ख ) कई भक्त लोग इस मन्त्रके अर्थ में दूरकी उड़ान भरते हैं । वे इसीसे ' श्रीकृष्णः शरणं मम ' इस महामन्त्रकी उत्पत्ति बताते हैं । उनका अभिप्राय यह है कि जिस मन्त्रमें योग ( व्युत्पत्ति ) का अधिपति अर्थात् शब्द ' कृष्ण ' है; क्योंकि व्युत्पत्ति शब्दकी करती है । ' यत्र पार्थो धनुर्धरः ' जहाँ पर धनुषसे धारण किया जानेवाला शर ( बाण ) ' पार्थ: ' ' पा ' धातुके अर्थको धारण करनेवाला हो, ' पा ' का अर्थ होता है ' रक्षण ' । सो. ' शर ' का ' रक्षा ' अर्थ कब हो सकता है? वह तब हो सकता है; जब उसे ' शरणं ' बना दिया जावे । अब मन्त्र बन गया ' कृष्णः शरणं ' । ' तत्र श्रीः, मम ' उक्त मन्त्रकी आदिमें ' श्री ' रखदो; अन्त में ' मम ' रख दो । अब बन गया ' श्रीकृष्णः शरणं मम ' । अब इसी पद्य में इस गुप्त - मन्त्रका माहात्म्य बताते हैं - ' विजयो भूतिः, ध्रुवा, नीतिः, मतिः ' अर्थात् ' इस महामन्त्रका जप करने से विजय प्राप्त होगी, ऐश्वर्य प्राप्त होगा, अचल - नीति प्राप्त होगी, मति अर्थात् बुद्धि प्राप्त होगी ' ऐसा अर्थ नैरुक्त - शैली हो जाती है । पर आजका युग नैरुक्त - शैलीका पक्षपाती होता हुआ भी इस मन्त्र के केवल - जापसे भी इतने फलकी प्राप्ति नहीं मानता । वह केवल - शब्दके जपने से कुछ भी फल नहीं मानता । यद्यपि विज्ञान आजकल शब्द - रूप मन्त्रमें भी बड़ी शक्ति मानने लग गया है, संगीतके शब्द से ही मृग पकड़ा जा सकता है, किसीके मनको पकड़ा जा सकता है । शब्दसे ही सारी सेनाका संचालन किया

पृष्ठ 774

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७४६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) जाता है । मल्हार रागके शब्द गानेसे ही वर्षा होती है; शब्द से ही बड़े - बड़े युद्ध और शब्द से ही बड़े - बड़े संघ - संघटन बना करते हैं; तथापि नास्तिकता की ओर प्रवृत्त यह युग उक्त अर्थको भी स्वीकार करनेमें नाक - भौं सिकोड़ता है । ( ग ) कई भक्तिकी कोटिसे ऊँचे उठे हुए और वर्तमान युगकी गतिविधिको समझनेवाले विद्वान् उक्त पद्यका आशय यह बताते हैं कि - ' श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों धर्मके सजीव प्रतिनिधि हैं । सो वे जिस पक्ष में हैं; उसी पक्षकी विजय होती है । पाण्डवोंके पक्षमें धर्म है; उनकी विजय होगी । कौरवोंके पक्ष में अधर्म है; उनकी पराजय होगी ' - यह इस पद्यका उनके मत में संजयाभिमत आशय है । वैसा हुआ भी । अधर्मी कौरव हार गये, धर्मात्मा पाण्डव जीत गये । पर आज के धर्म - निरपेक्ष राज्यमें ' धर्म ' शब्द सुनते ही सुधार-वादी अपने कानोंको बन्द करने लगते हैं । वे कहते हैं कि - इसी धर्मसे महायुद्ध हुए और हो रहे हैं और होंगे । हम शान्तिके इच्छुक हैं; अब इस धर्मको कनमें दफना देना चाहिये । और पाण्डव तथा श्रीकृष्ण कितने भी धर्मात्मा हों; पर युद्ध के समय इन्होंने भी कम अधर्म नहीं किया । अर्जुनने थके हुए अपने शिष्य सात्यकिका सिर काटनेकेलिए उठाए हुए खड्गवाले भूरिश्रवा - योद्धा • का हाथ, दूरसे बाण मारकर काट दिया; और फिर सात्यकिने उसी खड्गसे भूरिश्रवाका सिर काट दिया । क्या यह धर्म था? श्रीकृष्णने रथके चक्रके उद्धार में लगे हुए कर्णको अर्जुन द्वारा

पृष्ठ 775

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गीताके अन्तिम मन्त्रका रहस्य ७५७ मरवा दिया । क्या यह धर्म था? ' अश्वत्थामा हतः, नरो वा कुञ्जरो वा ' ऐसा गोलमोल - शब्द युधिष्ठिरने कह दिया और ' कुञ्जरः ' कहने के समय श्रीकृष्णने शंख बजा दिया, भीमसेनने उस समय सिंहनाद कर दिया; शेष पाण्डव तथा सैनिक अपने ढोल बहुत जोर से बजाने लगे- जिससे उक्त शब्द द्रोणाचार्यके कानमें नहीं पहुँच सके । इससे उनने शस्त्र-त्याग करके प्राणायाम ' चढ़ा लिया । उसी समय धृष्टद्युम्नने द्रोणाचार्यका तलवारसे सिर काट लिया - क्या यह धर्म था? वस्तुतः युद्धों में धर्म - अधर्म देखा भी नहीं जाता । इसका नाम नीति होता है । इस नीतिद्यूत से प्रतिपक्षीको पराजित करना पड़ता है । अतः यह अर्थ भी आधुनिक युगको नहीं रुचता । अब ऐसे अर्थकी आवश्यकता है - जो इस सुधार - युगमें भी सबका सिर स्वीकृति से हिलवा दे और वह अर्थ गहरे में गोता लगानेसे निकल सकता है, अब उसी अर्थ को हम उपस्थित करते हैं; जो आस्तिक-नास्तिक, धर्मात्मा तथा सुधारवादी सभीको सम्मत हो । ( घ ) वह यह है - जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं । योगेश्वरसे यहाँ यह भाव है कि- ज्ञानके प्रतिनिधि, सजीव ज्ञान श्रीकृष्ण हैं 1 । जहाँ धनुर्धारी अर्जुन हैं । धनुषधारी से अभिप्राय है कि— कर्म - प्रवृत्त, सजीव कर्म अर्जुन हैं । निष्कर्ष यह है कि जहाँ ज्ञान और कर्मका समुच्चय है, समन्वय है; वहीं श्री ( शोभा ) और विजय है; वहीं ऐश्वर्य एवं ध्रुव नीति है - ऐसा मेरा मत है । क्योंकि पाण्डवोंके पक्षमें ज्ञान और कर्मका ठीक - ठीक मेल है । इसमें

पृष्ठ 776

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७४८ श्रीसनातनधर्मालोंक ( रं ) श्रीकृष्ण ज्ञान हैं और अर्जुन कर्म है, अतः इसी पक्षकी विजय होंगी - यह संजयका आशय है । यह बात ठीक भी है । जहाँ केवल कर्म होता है; वहाँ भी विजय नहीं होती; क्योंकि - वहाँ ज्ञानी न होने से मार्ग- प्रदर्शन नहीं होता । जहाँ केवल ज्ञान होता है, वहाँ भी विजय नहीं होती; क्योंकि- ज्ञान, क्रिया के बिना व्यर्थ हो जाता है - ' ज्ञानं भारः क्रियां विना । ' सभी उपदेशक हो जाएँ, केवल मार्ग - प्रदर्शक ही रहें; कर्म करनेवाला कोई न रहे; तब सफलता कैसे मिल सकती है? अतः दोनोंके समन्वयसे सफलता हुआ करती है । यही बात वेदमें भी कही है - ' अन्धं तमः प्रविशन्ति ये अवि-द्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां श्रिताः ॥ ( यजु ० वाज ० संहिता ४०।१२ ) यहाँ ' अविद्या ' केवल - कर्मकी उपासना करने वालेको अन्धेरेमें रहनेवाला बताया है और ' विद्या ' केवल- ज्ञानका अवलम्बन करनेवालेको पूर्वसे भी अधिक अन्धेरे में रहनेवाला बताया है । कर्मका नाम ' अविद्या ' इसलिए है कि - उसमें ज्ञानका सम्बन्ध नहीं होता; उसे जैसे कहा जाता है- वैसे ही करना पड़ता है । इससे केवल कर्म तथा केवल ज्ञान दोनों पृथक् - पृथक् असफलताके ही कारण बताये गये । अब वेद दोनोंका समुच्चय बताता है— ' विद्यां चाविद्यां च यस्तद् वेदोभयं सह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥ ( ४०।१४ ) यहाँ अविद्या ( कर्म ) से मृत्यु ( असफलता ) दूर होना तथा विद्या ( ज्ञान ) से अमृत ( सफलता ) की प्राप्ति कही है । इससे कर्म तथा ज्ञान

पृष्ठ 777

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गीताके अन्तिम मन्त्रका रहस्य ७४६ के समवायको विजय - च्यादिका साधन बताया है । यह केवल यहां नहीं, किन्तु सर्वत्र ही यह समन्वित होगा । आप छात्रों की परीक्षा को ही ले लीजिये 1 । जो छात्र केवल रट लगानेवाला है; वह भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता । रटना ' अविद्या ' है । पर जो केवल समझ ( ज्ञान, विद्या ) रखनेवाला छात्र है; वह पूर्वसे भी अधिक असफलता प्राप्त कर सकता है । पर जो छात्र कर्म और ज्ञान, रट और समझ दोनों रखता है, वह रटने से अनुत्तीर्णताके भय ( मृत्यु ) को पार करके, समझसे उत्कर्षको, अच्छे अङ्कको प्राप्त करता है । यही बात आप युद्धों में ले लीजिये । युद्धों में सेना होती है- -कर्म, और ज्ञान होता है सेनानायक । यदि केवल सेना हो, मार्ग-प्रदर्शक ज्ञानी सेनानायक न हो; तब भी विजय कैसे मिले? यदि केवल ज्ञान सेनापतिही हो, सेनारूप कर्म न हो; तो पराजय निश्चित ही है । इसलिए ' कर्म ' चाहिये अधिक, ज्ञान चाहिये थोड़ा, पर उत्तमः. दोनोंका ठीक समन्वय हो; तब विजय असन्दिग्ध होगी । इसी प्रकार युद्धमें शस्त्र बल वा भुज - बल है कर्म, पालिसी है ज्ञान । यह दोनों जिस पक्षमें यथावत् होंगे; उस पक्ष की सफलता निश्चित होगी । इस बात को सभी ओर घटाइये । हमारे हिन्दु - जीवन को ही ले लीजिये । इसमें ७५ वर्ष तक यज्ञोपवीत रखकर कर्म करने पड़ते हैं । कर्मके साथ उपासना भी गृहीत हो जाती है । उपासनाका कर्म-ज्ञान दोनोंसे सम्बन्ध होता है । शेष २५ वर्ष तक ज्ञान रखना पड़ता

पृष्ठ 778

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७५० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) है । इस समुच्चयसे मुक्ति - प्राप्ति सुलभ हो जाया करती है । इस प्रकार आप दूकानदारीको ही ले लीजिये; पुस्तक प्रकाशनको ही ले लीजिये, किसी देशको ही ले लीजिये; जिसमें ज्ञान और कर्मका समन्वय होगा; उसमें उसकी सफलता निश्चित है । दूकानदारीमें उपयोगी वस्तुओंोंका संग्रह कर्म है; उनका ग्राहकों की प्रसन्नताके उपायोंको आविष्कृत करके विक्रय करना यह ज्ञान है । दोनोंके समुच्चयसे दूकानदारी चल निकलेगी । पुस्तक प्रकाशन या पन्न-प्रकाशनमें बाहरी सज - धज ' कर्म ' है, भीतरी उपयोगी - सामग्री ' ज्ञान ' है । दोनोंका समन्वय लाभकारक होगा । देश में प्रजा ' कर्म ' है, उसका राजा, नायक ' ज्ञान ' है । समाज ' कर्म ' है, नेता-लीडर ' ज्ञान ' है । ' कर्म ' चाहिये अधिक, ' ज्ञान ' चाहिये थोड़ा, पर अत्युत्तम; तब तो सफलता होगी । यदि ज्ञान बहुत हुआ, और कर्म थोड़ा हुआ; लीडर बहुत हुए, जनता थोड़ी हुई, राजा बहुत हुए, प्रजा थोड़ी हुई, वक्ता बहुत हुए, श्रोता थोड़े हुए, तब उसमें भी सफलता मिलने की आशा नहीं होती । बहुत - ज्ञानसे फिर कुछ भी निश्चित नहीं हो पाता । बहुत लीडर हों; बहुत राजा हो जाएं; तो आपसमें तू - तू, मैं - मैं होकर कई विवाद खड़े हो जाएंगे । सफलता सर्वथा नहीं होगी । किसी सोसायटीके उत्सव में वक्ता अधिक हों, श्रोता कम हों; तो अपील करनेपर धन कहांसे जमा होगा? ' ज्ञानी भले ही अधिक न हों, पर चाहियें उत्तम; इससे वह सम्प्रदाय वा धर्मं खूब फैल जाता है । केवल उपदेशक हों तो धर्म पर विपत्ति पड़ने पर खड़े - खड़े ताका ही करते हैं; अपनी जान

पृष्ठ 779

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. गीताके अन्तिम मन्त्र का रहस्य ७५१ उनको प्यारी होती है; वे मरने - मारनेके लिए तैयार होना नहीं चाहते । जान इस समय में कट्टर लोग ही होमते हैं, उनको उस धर्मका अन्ध - मोह होता है । वे उस धर्मसे प्यार करते हैं; पीछे नहीं हटते; अतः वे धर्मकी रक्षार्थ मर मिटते हैं । अपना बलिदान दे देते हैं । प्रातः वे ही उठते हैं, सर्दीमें नहाते हैं, सन्ध्या- होमादि करते हैं, उपदेशक महोदय तो सूर्योदय होनेपर विस्तर छोड़ते हैं; सन्ध्या - हवनादि कर्म तो उनके नाममात्रके होते हैं । अतः दोनों ही चाहियें । सफलता ज्ञान और कर्मके समुच्चयसे ही होती है; तब वह धर्म वा सम्प्रदाय ओर से छोर तक फैल जाता है, उसके मानने वालोंकी संख्या बढ़ जाती है । यही बात जातियोंमें ले लीजिये । विश्व में कुछ मुसलमान - आदि जातियां ' कर्म ' स्वरूप हैं; इनमें कट्टरपना बहुत है, पर ' ज्ञान ' नहीं; अतः यह भी पूर्ण - सफल नहीं हो सकती । पर ' कर्म ' - परक जाति केवल ज्ञानवाली जातिकी अपेक्षा फिर भी अधिक लाभ उठा लेती है । ' हिन्दु ' जाति श्राजकल ' ज्ञान ' स्वरूप है - अतः यह भी पूर्ण सफल नहीं होती । अतः इसकी संख्या भी अब घटती चली जा रही है । पर पूर्व- समय इसमें ज्ञान और कर्म दोनों समुचित थे; अतः इसका ही तो सारे भू - मण्डल पर शासन था । पर जो जाति वा जो सम्प्रदाय कर्म और ज्ञान दोनोंका समन्वय न रखेगा; उसका - पतन हो जाया करेगा 1 । ' कर्म ' फिरभी कुछ समय तक टिका देता है, पर ज्ञानके पांव नहीं होते । केवल ज्ञान पतन करा देता है । इसीसे ही हिन्दु - जातिका शासन भू - मण्डल परसे फिसला; अत्र

पृष्ठ 780

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७५२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) फिर अपने देश से भी फिसलना चाहता है । पर हमें गीताका अन्तिम श्लोक समझा रहा है कि - योगेश्वर कृष्ण, मार्ग - प्रदर्शक, सजीव ज्ञान भी चाहिये, धनुर्धारी अर्जुन भी, सजीव कर्म भी अपेक्षित है; तभी श्री, विजय, ऐश्वर्य प्राप्त होगा । क्या कारण है कि बहुत होकर भी कौरव नहीं जीत सके, थोड़े पाण्डव जीत गये? कारण यह है कि — कौरव केवल ' कर्म ' रूप थे; उस पक्ष में अपेक्षित ' ज्ञान ' नहीं था । पर पाण्डवों के पक्ष में अर्जुन ' कर्म ' थे; ' श्रीकृष्ण थे मूर्त ' ज्ञान ' । कर्मका रहना तो आवश्यक होता ही है । तभी तो श्रीकृष्णने कर्णकी एकवीरशत्रुघातिनी शक्ति से अर्जुनको बचवानेकेलिए रात्रि - युद्ध शुरू करवाके घटोत्कचको मरवा दिया । और फिर ' श्रीकृष्ण ' रूप ' ज्ञान ' न होते; तो मार्ग - प्रदर्शन कौन करता? तभी तो अर्जुनने - शस्त्र के न उठानेकी प्रतिज्ञा करनेवाले भी - श्रीकृष्णको ही चुना; पर दुर्बुद्धि - दुर्योधनने ऐसे श्रीकृष्णको लेना व्यर्थ समझकर उनकी नारायणी सेनाको ही ले लिया । इसी भूलका परिणाम उसे पराजय मिला । प्रतिवर्ष ' गीता जयन्ती - ' हमें इसी ' ज्ञान'को देने वा बताने आती है; पर हम ' कर्म ' द्वारा उसे नहीं मिलते; उसका अवलम्बन नहीं करते; तब वह असफलताका साँस भरती हुई निराश होकर लौट जाती हैं । गीताका पाठ कीजिये, यह तो होगा ' कर्म ', फिर इसके निष्कर्ष - रूप अन्तिम पद्यका जिसकी हमने व्याख्या की है-मनन कीजिये, यह हो जायगा ' ज्ञान ' । बस दोनों के अवलम्बनसे और जनता को भी इधर चलाने से ' मानवधर्म ' का प्रचार वा प्रसार ही