पञ्चम सुमन · प्रकरण 82
गोपाष्टमी - विज्ञान
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717के लिये परमात्मा दृश्यकाव्यकी भान्तिं अवतार धारण करता है । वेद - द्वारा परमात्माने हमें बतलाया कि - ' गोस्तु मात्रा न विद्यते ' ( यजुः वा ० सं ० २३४८ ) गायके समान अन्य नहीं हैं । वही बात भगवान्ने गोपालनके विषयमें करके दिखायी । परमात्मा स्वयं नन्दनन्दनरूपमें अवतीर्ण होकर गोपाल बन गये । गोपाल बनकर उन्होंने गौत्रोंका पालन किया । इस अभिनयसे उन्होंने हमें दिखलाया कि ' तुम लोग भी गोपालन करो, गायकी पूजा करो. गायका उपयोग लो । इस तरह जहाँ देवपूजा होगी वहीं तुम लोग बलवान् भी बनोगे । मक्खन खाओ, तुम्हारे पास न हो तो दूसरेसे लो । दूसरा न दे, राजा अत्याचार कर सारा मक्खन छीन रहा हो, तो चुराकर - दूसरे से छीनकर - खाओ । राजाकी नाकके बाल बने हुए लोगों को लूट लो । इससे स्वावलम्बी बनोगे । गायके भक्त बनो, स्वराज्य तुम्हारे चरणोंमें लोटेगा ।
यदि ऐसा न करोगे - गायके भक्त न बनोगे, गायकी उपेक्षा करोगे, तो तुम लोगोंका शरीर क्षीण हो जायगा, बल कम हो जायगा और तुम लोगों को निर्बल जानकर सब तुम्हें पैरों तले रौदेंगे । तुम लोग परमुखापेक्षी बन जाओगे । देवता लोग भी तुम्हारी सहायता छोड़ देंगे । '
· आज गोवंशका जिस प्रकार भीषणता से ह्रास हो रहा है, उसके फलस्वरूप हम भी तो मर रहे हैं । आज हम दूध, माखन, घी आदिकेलिए उत्कण्ठित हैं । कीजिये न गोमाताकी उपेक्षा! दूध - घोके तो अब स्वप्न ही आ सकते हैं । खाइये न, अब बनस्पति 718घी और पीजिये ग्लैक्सो- दूध । तब सन्तानें उत्पन्न कीजिये – अपने से भी निर्बल, प्रतिदिन अस्वस्थ । तब भारत क्यों न परसुखा- पेक्षी हो? देवगण हम पर क्यों न क्रुद्ध हों; जबकि हम उन्हें शुद्ध घृत समर्पित नहीं करते । अतः वे क्रुद्ध होकर हमारा पराभव क्यों न करें? इसी बात को प्रतिवर्ष याद दिलानेकेलिए ' गोपाष्टमी ' या करती है कि ' भारतीयो! चेतो, अव भी गौओं का पालन, पूजन तथा सम्मान करना सीखो । गायके तिरस्कार में अपना तिरस्कार समझकर प्राणोंकी बाज़ी लगा दो । तभी पूर्ण ' हिन्दु ' बने रहोगे । ' हिन्दु ' शब्द हमारी जातिने गोवर्णनपरक - वेदमन्त्र से लिया है ।
हमारी जाति गोभक्त है । गोभक्तिके कारण ही इसने ' हिन्दु ' नाम धारण किया है । ' अथर्ववेद ' तथा ' ऋग्वेद ' में एक मन्त्र आया है -
हिं कृण्वती वसुपत्नी वसूनां वत्समिच्छन्ती मनसाभ्यागात् ।
दुहामश्विभ्यां पयो अघ्न्या इयं सा वर्धतां महते सौभगाय ॥
( ऋ ० १।१६४।२७, अथर्व ६।१०।५ )
यह गोवर्णनपरक -मन्त्र है इसके पूर्वार्धका आदिम वर्ण ' हिं ' है और उत्तरार्धका आदिम वर्ण है ' दु ' । गोभक्त हिन्दुजा तिने ' हिन्दु ' यहीं से अपना नाम स्वीकृत किया है । जैसे एक वेद से ' अ ' दूसरेसे ' उ ' तथा तीसरे वेदसे ' म् ' लेकर ' ओम् ' बनाया गया है ( देखिये इसपर ' मनुस्मृति ' २ | ७६ ), वैसे ही वेदके गोवर्णनपरक एक ही मन्त्र के पूर्वार्ध तथा उत्तरार्धके आदिम वर्णको लेकर ' हिन्दु ' नाम, वैदिककालसे चला आ रहा है ।
719गोपाष्टमी में गोपाल बनकर भगवान् ने हमें यह सिखलाया कि तुम्हारी गौधों को चुराने वाला ब्रह्मा भी क्यों न हो, उसे वह पाठ पढ़ाओ कि फिर वह तुम्हारे पैरोंपर आ गिरे । कोई दैत्य गुप्त होकर अथवा भिन्न - वेष धारणकर तुम्हारी गौ चुरा ले, तो उसे मारने में भी पाँव पीछे मत रखो । प्रतिवर्ष ' गोपाष्टमी ' हमें यही बताती है ।
वेदमें देवपूजनपर बहुत बल दिया गया है । यह जगत् देवताओं के आश्रयसे ठहरा है, अतः जागतिक पुरुषोंके विविध प्रकारके होनेसे देवपूजाके भी विविध प्रकार रखे गये हैं । जैसे आयुर्वेद में विविध रोगियों की चिकित्सा के अवसर पर मुख्यतया रोगबीजरूप. दूषित - मलके निकालनेकेलिए विविध ओषधियाँ स्वस्वप्रकृत्यनुकूल दी जाती हैं, अथवा दूषित - मलके निःसारणार्थ भिन्न - भिन्न उपाय ( वमन, विरेचन, मलद्रवीकरण, मलक्वथन, एनीमा आदि ) हुआ करते हैं, वैसे ही शास्त्रों में पाप रूप रोगके मुख्य - बीजरूप मानसिक - मलके दूरीकरणार्थ देवपूजाके भी विविध उपाय बताये गये हैं जिनसे मुख्यतः मानसिक मल दूर किया जाता है 1 । उनमें एक प्रकार है— महायज्ञों द्वारा देवगरणकी तृप्ति अथवा साधारण - यज्ञों द्वारा देवगणका पूजन । इसमें देवताओंके मुख- स्थानीय अग्निको प्रतिनिधि बनाकर देवपूजन किया जाता है ।
एक अन्य उपाय भी है और वह है - मूर्तिपूजन । इसमें किसी प्रस्तर आदिकी मूर्ति में वेदमन्त्रोंसे देवताओंको प्रतिष्ठापितकर उसके द्वारा देवपूजन किया जाता है । एक अन्य प्रकार है तीर्थका 720सेवन । इसमें किसी विशिष्ट नदी तीर्थको माध्यम बनाकर देवपूजा की जाती है । अपर प्रकार है - वेदविद्वान् ब्राह्मणोंका दान - मान आदि द्वारा सत्कार । यहाँ पर ब्राह्मरणको माध्यम बनाकर उसके द्वारा देवपूजन किया जाता है । अन्य भी देवपूजनके बहुतसे प्रकार हैं, उनमें यह भी एक विशिष्ट प्रकार माना गया है कि गायको माध्यम बनाकर गोपूजासे उसमें व्याप्त सब देवताओं का पूजन किया जाय । वेदमें ' गोस्तु मात्रा न विद्यते ' ( यजुः वा ० सं ० २३।४८ ) गाय- को अनुपमेय माना गया है । अथर्ववेदकी ' पैप्पलादसंहिता के ' गोपथब्राह्मण ' में कहा है- ' यद् गां ददाति, वैश्वदेवी वै. गौः,. विश्वेषामेव तदा देवानां तेन प्रियं धाम उपैति ( २।३।१६ ) गायको वैश्वदेवी या सब देवताओं से उपजीव्य कहा है । ' ये देवास्तस्यां ( गवि ) प्राणन्ति, ( १०।१०।७ ) ' देवांश्च याभिर्यजते ' ( अ ० ४।२१।३ ) इस ' अथर्ववेद संहिता ' ( शौ ० सं ० ) के वचनमें गाय में देवताओंका निवास स्वीकृत किया गया है । न केवल यहीं पर, प्रत्युत ' अथर्ववेद ' का एक सम्पूर्ण सूक्त ( ६ | १२ | ७ ) ही इस प्रकारका है, जहाँ गायके प्रत्येक अवयवमें भिन्न - भिन्न देवताओं का निवास मानागया है ।
यहाँ यह जो आक्षेप किया जाता है कि ' सनातनधर्मके सिद्धान्तमें तैंतीस करोड़ देवता माने गये और उनकी पूजा भी मानी गयी है, ' यथा सम्पूजिता देवास्त्रयस्त्रिंशत्तु कोटिशः ' ( पद्मपुराणीय कार्तिकमाहात्म्य २८ | २६ ) अब कोई इन सबका एक साथ पूजन करना चाहे, तो कैसे करे? तब यदि प्रत्येक देवताकेलिए दो - तीन अक्षत भी चढ़ाये जायँ, तो तदर्थ कई मन चावल चाहियें । एक - एक 721जलकी बून्द भी प्रत्येककेलिए समर्पित की जाय, तो उसकेलिए भी कई गागर पानी चाहिये । एक - एक बादाम भी नैवेद्य- रूपमें एक- एक पर चढ़ाया जाय तो कई मन बादाम चाहियें । एक - एक पैसा भी दक्षिणा चढ़ायी जाय, तो कई सौ रुपये खर्च पड़ेंगे । धूप - दीप स्वयं सोच लेने चाहियें | यह है संक्षिप्त पूजाका हाल, षोडशोपचार तो प्रत्येकका असम्भव हो जायगा । " इस आक्षेपका उत्तर सब देवताओंको अपनेमें व्यापक रखे हुए गाय दे रही है । उसीकी पूजा से सर्व - देवपूजा अनायास हो जाती है, जैसे कि हम पहले शास्त्रीय वचन दे चुके हैं । इसी कारण भगवान्ने गोपाल बनने में अपना गौरव समझा |
गाय जहां शास्त्रीय दृष्टिसे उपासनीय है, वहीं लौकिक एवं वैज्ञा- निक दृष्टि से भी उपासनीय है । गायकी वस्तुओंको रसायन, पथ्य, बलप्रद, आयुष्प्रद्, त्रिदोषनाशक तथा हृदय रोगके दूर करनेवाला कहा गया है । जिस घीको ' आयुर्वै घृतम् ' ( तै. सं. श । २।२ ) इस प्रकार श्रायुरूप माना है, उसी घृतकी माता गायकी सेवा कर भगवान्ने हमें यह शिक्षा दी कि उसे सन्तुष्ट रखनेसे प्राप्त हुआ दुग्ध ही हमारी सर्वविध - कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है । ' सर्वान् कामान् यमराज्ये वशा प्रददुशे दुहे । अथाहुर्नारकं लोकं निरुन्धानस्य याचिताम् ' ( अथर्व ० शौ ० सं ० १२ | ४ | ३६ ) इस मन्त्रमें गोदान करनेपर दाताको सब कामनाओंका यमराज्यमें पूर्ण होना कहा है । उसकी याचना करनेपर रुकावट डालनेवालेको नरक - लोककी प्राप्ति कही है । ' ब्राह्म- णेभ्यो वशां ( गां ) दत्त्वा सर्वान् लोकान् समश्नुते ' ( अथर्व ० 722.१०।१०।३३ ) यहांपर ब्राह्मणको गोदान देनेका बहुत फल बताया गया है । ' यां ते धेनु ' निष्पृणामि यमु ते क्षीर - ओढ़नम् ' ( अथर्व ० १८ | २ | ३० ) इस मन्त्र में मृतकके उद्देश्यसे गोदान तथा खीरका विधान किया गया है ।
आजकल छुआछूतको निर्दयता से हटाया जा रहा है, जो लोग बाज़ारका कुछ नहीं खाना चाहते और स्वादिष्ठ पदार्थ भी खाना . चाहते हैं उन्हें चाहिये कि घरमें गाय रखें और उसकी सेवा करें, उनकी इच्छा पूर्ण होगी । गाय ही दूध, मक्खन, घी, खोया, रबड़ी, मलाई सब देती है । ' आयुर्वै घृतम् ' घीको आयुरूप माना गया है, उस घृतकी देवी, हमारी आयुकी देवता, हमारे बालबच्चों को पालने बाली, हमसे बड़े - बड़े ग्रन्थ लिखवानेवाली, हमसे हज़ारों प्रवचन करानेवाली, हमें सब मिठाइयां खिलानेवाली, हमारे मस्तिष्कको सुरक्षित एवं उज्ज्वल रखनेवाली गोमाताकी सेवाके इस प्रकार के फलोंको देखकर भगवान्ने दृश्य - काव्यके रूप में स्वयं गोपाल बनकर गोपालन किया । हमें इस दृश्यकाव्यको मन लगाकर देखना चाहिये और उसपर मनन करना चाहिये, तभी गोपाष्टमीको हम सफल बना सकेंगे ।
( ११ ) गीताजयन्ती एवं गीतोपदेशकी तिथि ।
गीता - जयन्तीके दिनके सम्बन्धमें कई विद्वानोंने अनुसन्धान किया है । यह तो सभी मानते हैं कि गीताका उपदेश उसी दिन हुआ था, जिस दिन महाभारतका युद्ध प्रारम्भ हुआ था । और यह भी मानते हैं कि यह युद्ध मार्गशीर्ष मास में हुआ था; परन्तु ठीक 723दिनके सम्बन्धमें विद्वानों में मतभेद हैं ।
महाभारतमें जो अठारह दिनोंकी लड़ाईका वर्णन है, उसपर ध्यान देने से इस विषयमें बहुत कुछ पता लग सकता है । इन वर्णनों में स्थान - स्थानपर जो नक्षत्रों और चन्द्रमाका वर्णन आता है, उसपर उस समयके भारतीय ज्योतिष - शास्त्र के अनुकूल विचार करनेसे महाभारतका युद्ध आरम्भ होनेके दिनका अनुमान हो
है ।
भारतीय ज्योतिष शास्त्रमें और आजकलकी गणनामें बहुत अन्तर है । वैसे तो सालके ३६५ दिन बने हैं, लेकिन नाम और तरीकोंमें हेर - फेर होगया है । एक उद्धरणमें यही बात आती है कि उन दिनों महीने शुक्लपक्ष से आरम्भ होते थे और आजकल कृष्णपक्षसे आरम्भ होते हैं; गुजरात - महाराष्ट्रादिमें अब भी शुक्ल- पक्षसे आरम्भ होते हैं । इस पुरानी प्रथाका इतना ही चिह्न इधर रह गया है कि नये वर्ष का शुक्लपक्ष चैत्रमें प्रारम्भ होता है, पूर्णमासीके लिए १५ का अङ्क लिखा जाता है और अमावास्याकेलिए ३० का ।
अठारहवें दिन अर्थात् अन्तिम दिनके युद्धमें राजा दुर्योधनके हारनेके बाद रातको अश्वत्थामाने पाण्डवोंके डेरेपर आक्रमण किया था । इस आक्रमणका वर्णन ' रौद्री ' नामसे किया गया है । ' रौद्री ' के अर्थ हैं कृष्णपक्षकी चतुर्दशीकी रात्रिमें होनेवाली । इससे स्पष्ट प्रकट है कि युद्धका अन्तिम दिन मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्दशी ( आजकलकी पौषकृष्ण चतुर्दशी ) था । इस दिनसे उलटे अठारह 724दिन गिननेपर महाभारतका युद्ध आरम्भ होने की तिथि मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी ही पड़ती है ।
भीष्मपर्वके सत्रहवें अध्याय में युद्धका वर्णन करते हुए संजय राजा - धृतराष्ट्र से कहते हैं कि युद्ध वड़े अशुभ समय में प्रारम्भ हुआ है; -क्योंकि - ' मघाविषयगः सोमस्तद्दिनं प्रत्यपद्यत । ' ( भीष्म ० १७१२ ) उस - दिन चन्द्रमा ' मघाविषयग ' होगया था । ' मघा ' स्वयं और उसके दलके कुछ नक्षत्र बड़े अशुभ माने गये हैं । ज्योतिषके विद्वानोंके मतानुसार युद्धके प्रसङ्गमें जिस दिन भीष्म पितामह शरशय्या पर गिरे थे, उस दिन चन्द्रमा मघा नक्षत्र में था और मघाके दलमेंसे केवल भरणी नक्षत्र मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशीको था । संजय मघा नक्षत्रका नाम नहीं लेते हैं; परन्तु मघाके दुलके नक्षत्रका | इससे यह मानना पड़ता है कि युद्ध आरम्भ होनेके दिन चन्द्रमा भरणी नक्षत्र में होगा और इस दिन मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी ही थी ।
वीर अभिमन्यु युद्धके तेरहवें दिन मारे गये थे । इसके दूसरे दिन अर्थात् चौदहवें दिन सूर्यास्तपर राजा जयद्रथका वध हुआ और रातभर युद्ध चलता रहा । आधी रात में घटोत्कच मारा गया । घटोत्कच - वधके बाद दोनों सेनाओंने थोड़ा विश्राम किया । इस समय चन्द्रमाके उदय, आकार और प्रकाश आदिका बड़ा चित्ताकर्षक वर्णन है । ज्योतिषियों की सम्मति में चन्द्रमाका यह दृश्य कृष्णपक्ष की दशमी के अतिरिक्त और किसी दिन नहीं पड़ता । इसके हिसाब से युद्धके चौदहवें दिन मार्गशीर्ष कृष्ण ( आजकलका
In English
The Importance of Cow Protection and Gopashtami
This text explains the spiritual and practical significance of cows in Hindu life, noting that all deities reside within them. It argues that protecting and serving cows is essential for physical strength, social independence, and divine favor.
This chapter answers
- Why did krishna become a cowherd?
- What is the meaning of gopashtami?
- How are all gods worshipped through a cow?
- Is there a connection between cows and the name hindu?
- What are the benefits of serving a cow in ayurveda?
Also written: Gopashtami, Vigyana, Gopashtami Vigyana, गोपाष्टमी - विज्ञान