सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 741–750
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 741–750
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दीपावलीका वैज्ञानिक- रहस्य ७१३ 5 “ समय में महिषमर्दिनी श्रीदुर्गादेवीको आधारभूत करके शक्ति-· उपासनामें लग जाते थे । इसमें विद्याका भी अनध्याय करके सभी लोग स्वदेशकी रक्षार्थ विदेशी शत्रुओं के दमनार्थ आपसमें संघटन द्वारा शक्ति - संचय करके विजयदशमीके दिन विजययात्रा प्रारम्भ कर देते थे; और पड़ोसी शत्रुके दांत खट्टे करके उससे धन प्राप्त कर लाते थे । फिर उस धनका धनत्रयोदशीवाले दिन संग्रह करके नरक चतुर्दशीवाले दिन शत्रुको नरक दिखलाकर, अमावास्यावाले दिन अपने विजयोपलक्ष्य में दीपमाला करते थे । इस प्रकार यह दीपमाला विजयसन्देश - वाहिनी भी है । इस दिन धनाधिष्ठात्री लक्ष्मीकी पूजा करने से दैवी शक्ति प्राप्त होकर लक्ष्मीकी • स्थिरता हो जाती है । लक्ष्मी - पूजन | इस दिन सायं स्वच्छ नवीन वस्त्रोंसे लक्ष्मीका मण्डप बनाकर पत्र - पुष्प, तोरण - ध्वजापताका आदिसे उसे सुसज्जित करके उसमें रति -कुबेरादि अन्य देवी- देवोंके साथ भगवती लक्ष्मीका षोडशो-पचार पूजन किया जाता है; प्रार्थना की जाती है । फिर देवी-देवताओंको दीपदान करके दीपकोंको घरके भीतर, बाहर, : चौराहे में, गलीमें, कूप, मन्दिर, तुलसी आदिके पास रखना ' पड़ता है, मोमबत्ती वा मट्टीके तेलके दीपकोंको दीपावली में जलाना भी हानिकर है । रात्रिको लक्ष्मीकी कृपा के प्राप्त्यर्थ गोपालसहस्र-नामके पाठ भी यथासम्भव करने - कराने पड़ते हैं । लक्ष्मीका • गायसे सम्बन्ध है - यह हम अन्यत्र बता चुके हैं, गायसे सम्बन्ध
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७१४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) गोपालका है । गोपालसे लक्ष्मीका सम्बन्ध है, इसलिए दूसरे दिन गोवर्धन - पूजा तथा गोपालकृष्णकी पूजा, फिर अष्टमी में गोपूजा-गोपाष्टमी मनाई जाती है । दीपमाला और द्यूत | दीपमालाके दूसरे दिन पति - पत्नीका द्यूत - विधान भी आता है, केवल इस बातकी परीक्षार्थ कि — दोनोंमें जो जीतेगा, वर्षभर उसीका दूसरे पर आधिपत्य रहेगा, यह जानने के लिए, व्यसन के -लिए नहीं । द्यूतका व्यसन तो लक्ष्मीका शत्रु है । इस संसार में कोई वस्तु न सर्वथा निर्गुण होती है, न सर्वेथा निर्दोष । सगुण भी दुरुपयोग वा व्यसनसे सदोष सिद्ध हो जाती है, सदोष वस्तु भी गुणवाली । इस संसार में विषका भी सूपयोग हो सकता है, विधिसे संखिया गुणकारी एवं वाजीकरण सिद्ध हो जाता है । अन्न भी दुरुपयोगवश विष वा मारक सिद्ध हो जाता है । द्यूत भी कई प्रकार के होते हैं । राजनीति में नई - नई नीतियां चलती हैं; यह सब भी द्यूत हैं । श्रीगान्धीजी लण्डनकी गोलमेज़ कान्फ्र ेन्समें हिन्दुस्थानका जुआ खेलने गये थे । अंग्रेजोंने उस समय मि ० जिन्नाको आगे करके अल्पसंख्यक बहुसंख्यकोंका दांव लगा दिया, जिससे गांधीजी हिन्दुस्थानके स्वराज्यका द्यूत हारकर वापिस लौट आये थे । गत महायुद्ध में हुई हुई रूसी - जर्मनी सन्धिको अंग्रेजोंने दांव - पेच लगाकर उनमें एक - दूसरेपर अविश्वास उत्पन्न कराकर आपसी - युद्ध में परिणत कर दिया, जिससे वे स्वयं बच गये और जर्मनीको हरवा दिया गया और स्वयं रूससे
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दीपमाला और तं ७१५ सन्धि कर ली । यह सब द्यूत हैं । श्रीरामने विभीषणको रावणसे अलग करवानेमें यही नीतिका द्यूत खेला था । भगवान् श्रीकृष्णने भी यही द्य ूत खेलकर, दांव - पेच लगाकर घटोत्कचको कर्णकी एक-वीरघ्नी शक्ति से मरवाकर अर्जुनको बचा लिया; घटोत्कचकी राक्षसी शक्ति से अपनी सेनाको भी बचवा लिया । कृषक भी खेतमें अन्नके दानोंके पांसे फेंककर दांव लगाता है, कभी जीत जाता है, तो बहुत अन्न पाता है । कभी उसपर ओले पड़ गये; तो उसकी अन्नकी आशापर भी तुषारपात हो जाता है । पहलवानोंके आपसके दांव - पेच, मछली पकड़नेवालोंका पानीमें मछली पकड़नेकेलिए कांटा डालना - यह सब छूत हैं । जैसे यह द्यूत शास्त्र - विरुद्ध नहीं, वैसे दीपमालाके दूसरे दिन पति - पत्नीका, अभिन्न घनिष्ठ - मित्रोंका वर्तमान वर्षकी परीक्षार्थ द्यूत - कीडा भी निन्दित नहीं । द्यूत कानूनके अनुसार निषिद्ध है, पर लाटरी तथा सट्टासदृश द्यूत कानूनके अनुसार भी निन्दित नहीं माने जाते । चौपड़ - शतरञ्ज आदि भी द्यूत कानूनन निषिद्ध नहीं; तब पुराण - निर्दिष्ट द्यूत भी निषिद्ध न होनेसे निन्दित - कोटि में नहीं आ सकता । हां, द्यूतका व्यसन तो संगृहीत धन - राशिको शीघ्र ही समाप्त कर देता है, अतः उसे खेलना तो शास्त्र - विरुद्ध है । न शास्त्र वैसी आज्ञा देता ही है । वैसे ही द्यूतसे महाभारत हुआ; जिससे हमारा भारतवर्ष वीरों, विद्वानों, तथा कला - विज्ञान आदि से शून्य हो गया । अतः इससें तथाऽभिधायक पुराणोंकी निन्दा करना अपने अज्ञानको प्रकट
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७१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) करना है । दीपावलीके इसी दूसरे दिन गोवर्धन पूजा भी होती है, अन्न-कूट भी होता है, जिसमें विविध अन्न खाये - खिलाये जाते हैं । इसी दिन भगवान् कृष्णने इन्द्रकी पूजाके स्थानमें गोवर्धन पूजा कराई थी, और इन्द्रका मान - मर्दन किया था, और गोवर्धन पर्वत से ही गौकी तथा प्रजाकी रक्षा की थी । इससे दूसरे दिन यमद्वितीया होती है । इस दिन यमीने अपने भाई यमको तिलक लगाया था और यमने उस बहिनका दान - मानसे सत्कार किया था । यह भाई बहिन के पारस्परिक स्नेह-- को अक्षुण्ण रखनेका तथा भाई - बहिनको समय पर कुछ देता रहे, भुला न दे, उसकी श्वशुरगृह में स्थिति कैसी है इस बातका ' ध्यान रखे — इस भावनाको प्रोत्साहित करनेका यह ऐतिहासिक पर्व है । ( १० ) गोपाष्टमी - विज्ञान यह कार्तिक शुक्ल अष्टमी गोपाष्टमी है । द्वितीयावाले दिन भगवान्ने गोवर्धन पूजा करवाके, वर्षासे संत्रस्त - प्रजा की रक्षा करके अष्टमीवाले दिन गौओंका जलूस निकाला, गौओंकी आरती की, गौओंको अन्न खिलाया । वैसे तो गोपाल- कृष्णका यह दैनिक कृत्य था, पर आज के दिन उसके स्मरणार्थ विशेष पर्व नियत कर दिया गया; जिससे जनताको गोपूजा भूल न जावे । हम ' श्रीरामनवमी ' के अवतारवाद - विषयमें लिख चुके हैं कि अपने श्रव्यकाव्य वेदके विशेष - उपदेशको जनतामें प्रचलित करने
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गोपाष्टमी - विज्ञान ७१७ के लिये परमात्मा दृश्यकाव्यकी भान्तिं अवतार धारण करता है । वेद - द्वारा परमात्माने हमें बतलाया कि - ' गोस्तु मात्रा न विद्यते ' ( यजुः वा ० सं ० २३४८ ) गायके समान अन्य नहीं हैं । वही बात भगवान्ने गोपालनके विषयमें करके दिखायी । परमात्मा स्वयं नन्दनन्दनरूपमें अवतीर्ण होकर गोपाल बन गये । गोपाल बनकर उन्होंने गौत्रोंका पालन किया । इस अभिनयसे उन्होंने हमें दिखलाया कि ' तुम लोग भी गोपालन करो, गायकी पूजा करो. गायका उपयोग लो । इस तरह जहाँ देवपूजा होगी वहीं तुम लोग बलवान् भी बनोगे । मक्खन खाओ, तुम्हारे पास न हो तो दूसरेसे लो । दूसरा न दे, राजा अत्याचार कर सारा मक्खन छीन रहा हो, तो चुराकर - दूसरे से छीनकर - खाओ । राजाकी नाकके बाल बने हुए लोगों को लूट लो । इससे स्वावलम्बी बनोगे । गायके भक्त बनो, स्वराज्य तुम्हारे चरणोंमें लोटेगा । यदि ऐसा न करोगे - गायके भक्त न बनोगे, गायकी उपेक्षा करोगे, तो तुम लोगोंका शरीर क्षीण हो जायगा, बल कम हो जायगा और तुम लोगों को निर्बल जानकर सब तुम्हें पैरों तले रौदेंगे । तुम लोग परमुखापेक्षी बन जाओगे । देवता लोग भी तुम्हारी सहायता छोड़ देंगे । ' · आज गोवंशका जिस प्रकार भीषणता से ह्रास हो रहा है, उसके फलस्वरूप हम भी तो मर रहे हैं । आज हम दूध, माखन, घी आदिकेलिए उत्कण्ठित हैं । कीजिये न गोमाताकी उपेक्षा! दूध - घोके तो अब स्वप्न ही आ सकते हैं । खाइये न, अब बनस्पति
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७१८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) घी और पीजिये ग्लैक्सो- दूध । तब सन्तानें उत्पन्न कीजिये – अपने से भी निर्बल, प्रतिदिन अस्वस्थ । तब भारत क्यों न परसुखा-पेक्षी हो? देवगण हम पर क्यों न क्रुद्ध हों; जबकि हम उन्हें शुद्ध घृत समर्पित नहीं करते । अतः वे क्रुद्ध होकर हमारा पराभव क्यों न करें? इसी बात को प्रतिवर्ष याद दिलानेकेलिए ' गोपाष्टमी ' या करती है कि ' भारतीयो! चेतो, अव भी गौओं का पालन, पूजन तथा सम्मान करना सीखो । गायके तिरस्कार में अपना तिरस्कार समझकर प्राणोंकी बाज़ी लगा दो । तभी पूर्ण ' हिन्दु ' बने रहोगे । ' हिन्दु ' शब्द हमारी जातिने गोवर्णनपरक - वेदमन्त्र से लिया है । हमारी जाति गोभक्त है । गोभक्तिके कारण ही इसने ' हिन्दु ' नाम धारण किया है । ' अथर्ववेद ' तथा ' ऋग्वेद ' में एक मन्त्र
आया है -हिं कृण्वती वसुपत्नी वसूनां वत्समिच्छन्ती मनसाभ्यागात् ।
दुहामश्विभ्यां पयो अघ्न्या इयं सा वर्धतां महते सौभगाय ॥
( ऋ ० १।१६४।२७, अथर्व ६।१०।५ ) यह गोवर्णनपरक -मन्त्र है इसके पूर्वार्धका आदिम वर्ण ' हिं ' है और उत्तरार्धका आदिम वर्ण है ' दु ' । गोभक्त हिन्दुजा तिने ' हिन्दु ' यहीं से अपना नाम स्वीकृत किया है । जैसे एक वेद से ' अ ' दूसरेसे ' उ ' तथा तीसरे वेदसे ' म् ' लेकर ' ओम् ' बनाया गया है ( देखिये इसपर ' मनुस्मृति ' २ | ७६ ), वैसे ही वेदके गोवर्णनपरक एक ही मन्त्र के पूर्वार्ध तथा उत्तरार्धके आदिम वर्णको लेकर ' हिन्दु ' नाम, वैदिककालसे चला आ रहा है ।
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गोपाष्टमी - विज्ञान ७१६ गोपाष्टमी में गोपाल बनकर भगवान् ने हमें यह सिखलाया कि तुम्हारी गौधों को चुराने वाला ब्रह्मा भी क्यों न हो, उसे वह पाठ पढ़ाओ कि फिर वह तुम्हारे पैरोंपर आ गिरे । कोई दैत्य गुप्त होकर अथवा भिन्न - वेष धारणकर तुम्हारी गौ चुरा ले, तो उसे मारने में भी पाँव पीछे मत रखो । प्रतिवर्ष ' गोपाष्टमी ' हमें यही बताती है । वेदमें देवपूजनपर बहुत बल दिया गया है । यह जगत् देवताओं के आश्रयसे ठहरा है, अतः जागतिक पुरुषोंके विविध प्रकारके होनेसे देवपूजाके भी विविध प्रकार रखे गये हैं । जैसे आयुर्वेद में विविध रोगियों की चिकित्सा के अवसर पर मुख्यतया रोगबीजरूप. दूषित - मलके निकालनेकेलिए विविध ओषधियाँ स्वस्वप्रकृत्यनुकूल दी जाती हैं, अथवा दूषित - मलके निःसारणार्थ भिन्न - भिन्न उपाय ( वमन, विरेचन, मलद्रवीकरण, मलक्वथन, एनीमा आदि ) हुआ करते हैं, वैसे ही शास्त्रों में पाप रूप रोगके मुख्य - बीजरूप मानसिक - मलके दूरीकरणार्थ देवपूजाके भी विविध उपाय बताये गये हैं जिनसे मुख्यतः मानसिक मल दूर किया जाता है 1 । उनमें एक प्रकार है— महायज्ञों द्वारा देवगरणकी तृप्ति अथवा साधारण - यज्ञों द्वारा देवगणका पूजन । इसमें देवताओंके मुख-स्थानीय अग्निको प्रतिनिधि बनाकर देवपूजन किया जाता है । एक अन्य उपाय भी है और वह है - मूर्तिपूजन । इसमें किसी प्रस्तर आदिकी मूर्ति में वेदमन्त्रोंसे देवताओंको प्रतिष्ठापितकर उसके द्वारा देवपूजन किया जाता है । एक अन्य प्रकार है तीर्थका
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७२० श्रीसनातन धर्मालोक ( ५ ) सेवन । इसमें किसी विशिष्ट नदी तीर्थको माध्यम बनाकर देवपूजा की जाती है । अपर प्रकार है - वेदविद्वान् ब्राह्मणोंका दान - मान आदि द्वारा सत्कार । यहाँ पर ब्राह्मरणको माध्यम बनाकर उसके द्वारा देवपूजन किया जाता है । अन्य भी देवपूजनके बहुतसे प्रकार हैं, उनमें यह भी एक विशिष्ट प्रकार माना गया है कि गायको माध्यम बनाकर गोपूजासे उसमें व्याप्त सब देवताओं का पूजन किया जाय । वेदमें ' गोस्तु मात्रा न विद्यते ' ( यजुः वा ० सं ० २३।४८ ) गाय-को अनुपमेय माना गया है । अथर्ववेदकी ' पैप्पलादसंहिता के ' गोपथब्राह्मण ' में कहा है- ' यद् गां ददाति, वैश्वदेवी वै. गौः,. विश्वेषामेव तदा देवानां तेन प्रियं धाम उपैति ( २।३।१६ ) गायको वैश्वदेवी या सब देवताओं से उपजीव्य कहा है । ' ये देवास्तस्यां ( गवि ) प्राणन्ति, ( १०।१०।७ ) ' देवांश्च याभिर्यजते ' ( अ ० ४।२१।३ ) इस ' अथर्ववेद संहिता ' ( शौ ० सं ० ) के वचनमें गाय में देवताओंका निवास स्वीकृत किया गया है । न केवल यहीं पर, प्रत्युत ' अथर्ववेद ' का एक सम्पूर्ण सूक्त ( ६ | १२ | ७ ) ही इस प्रकारका है, जहाँ गायके प्रत्येक अवयवमें भिन्न - भिन्न देवताओं का निवास मानागया है । यहाँ यह जो आक्षेप किया जाता है कि ' सनातनधर्मके सिद्धान्तमें तैंतीस करोड़ देवता माने गये और उनकी पूजा भी मानी गयी है, ' यथा सम्पूजिता देवास्त्रयस्त्रिंशत्तु कोटिशः ' ( पद्मपुराणीय कार्तिकमाहात्म्य २८ | २६ ) अब कोई इन सबका एक साथ पूजन करना चाहे, तो कैसे करे? तब यदि प्रत्येक देवताकेलिए दो - तीन अक्षत भी चढ़ाये जायँ, तो तदर्थ कई मन चावल चाहियें । एक - एक
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गोपाष्टमी - विज्ञान ७२१ जलकी बून्द भी प्रत्येककेलिए समर्पित की जाय, तो उसकेलिए भी कई गागर पानी चाहिये । एक - एक बादाम भी नैवेद्य- रूपमें एक-एक पर चढ़ाया जाय तो कई मन बादाम चाहियें । एक - एक पैसा भी दक्षिणा चढ़ायी जाय, तो कई सौ रुपये खर्च पड़ेंगे । धूप - दीप स्वयं सोच लेने चाहियें | यह है संक्षिप्त पूजाका हाल, षोडशोपचार तो प्रत्येकका असम्भव हो जायगा । " इस आक्षेपका उत्तर सब देवताओंको अपनेमें व्यापक रखे हुए गाय दे रही है । उसीकी पूजा से सर्व - देवपूजा अनायास हो जाती है, जैसे कि हम पहले शास्त्रीय वचन दे चुके हैं । इसी कारण भगवान्ने गोपाल बनने में अपना गौरव समझा | गाय जहां शास्त्रीय दृष्टिसे उपासनीय है, वहीं लौकिक एवं वैज्ञा-निक दृष्टि से भी उपासनीय है । गायकी वस्तुओंको रसायन, पथ्य, बलप्रद, आयुष्प्रद्, त्रिदोषनाशक तथा हृदय रोगके दूर करनेवाला कहा गया है । जिस घीको ' आयुर्वै घृतम् ' ( तै. सं. श । २।२ ) इस प्रकार श्रायुरूप माना है, उसी घृतकी माता गायकी सेवा कर भगवान्ने हमें यह शिक्षा दी कि उसे सन्तुष्ट रखनेसे प्राप्त हुआ दुग्ध ही हमारी सर्वविध - कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है । ' सर्वान् कामान् यमराज्ये वशा प्रददुशे दुहे । अथाहुर्नारकं लोकं निरुन्धानस्य याचिताम् ' ( अथर्व ० शौ ० सं ० १२ | ४ | ३६ ) इस मन्त्रमें गोदान करनेपर दाताको सब कामनाओंका यमराज्यमें पूर्ण होना कहा है । उसकी याचना करनेपर रुकावट डालनेवालेको नरक - लोककी प्राप्ति कही है । ' ब्राह्म-णेभ्यो वशां ( गां ) दत्त्वा सर्वान् लोकान् समश्नुते ' ( अथर्व ० ४६ स ० ध
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७२२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) .१०।१०।३३ ) यहांपर ब्राह्मणको गोदान देनेका बहुत फल बताया गया है । ' यां ते धेनु ' निष्पृणामि यमु ते क्षीर - ओढ़नम् ' ( अथर्व ० १८ | २ | ३० ) इस मन्त्र में मृतकके उद्देश्यसे गोदान तथा खीरका विधान किया गया है । आजकल छुआछूतको निर्दयता से हटाया जा रहा है, जो लोग बाज़ारका कुछ नहीं खाना चाहते और स्वादिष्ठ पदार्थ भी खाना . चाहते हैं उन्हें चाहिये कि घरमें गाय रखें और उसकी सेवा करें, उनकी इच्छा पूर्ण होगी । गाय ही दूध, मक्खन, घी, खोया, रबड़ी, मलाई सब देती है । ' आयुर्वै घृतम् ' घीको आयुरूप माना गया है, उस घृतकी देवी, हमारी आयुकी देवता, हमारे बालबच्चों को पालने बाली, हमसे बड़े - बड़े ग्रन्थ लिखवानेवाली, हमसे हज़ारों प्रवचन करानेवाली, हमें सब मिठाइयां खिलानेवाली, हमारे मस्तिष्कको सुरक्षित एवं उज्ज्वल रखनेवाली गोमाताकी सेवाके इस प्रकार के फलोंको देखकर भगवान्ने दृश्य - काव्यके रूप में स्वयं गोपाल बनकर गोपालन किया । हमें इस दृश्यकाव्यको मन लगाकर देखना चाहिये और उसपर मनन करना चाहिये, तभी गोपाष्टमीको हम सफल बना सकेंगे । ( ११ ) गीताजयन्ती एवं गीतोपदेशकी तिथि । गीता - जयन्तीके दिनके सम्बन्धमें कई विद्वानोंने अनुसन्धान किया है । यह तो सभी मानते हैं कि गीताका उपदेश उसी दिन हुआ था, जिस दिन महाभारतका युद्ध प्रारम्भ हुआ था । और यह भी मानते हैं कि यह युद्ध मार्गशीर्ष मास में हुआ था; परन्तु ठीक