पञ्चम सुमन · प्रकरण 83
श्रीगीतोपदेशकी तिथि और गीताकी महत्ता
मुद्रित पृष्ठ 725–728 4 पृष्ठ
725पौष - कृष्ण ) दशमी पड़ती है । चौदह दिन पीछे गिननेसे युद्ध आरम्भ होनेकी तिथि मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी ही ठहरती है ।
भीष्मपर्वमें एक और भी पद्य आता है । उसका ठीक - ठीक अर्थ तभी लगता है, जब हम यह मान लेते हैं कि युद्ध मार्गशीर्ष - शुक्ल- एकादशीको आरम्भ हुआ । वह श्लोक यह है- ' श्वेतो ग्रहस्तथा चित्रां समतिक्रम्य तिष्ठति । श्रभावं हि विशेषेण कुरूणां तत्र पश्यति ' ( भीष्म ० ३।१२ ) यह युद्धके चौदहवें दिनका वर्णन मालूम होता है । इसी दिन अर्जुन, भीम, घटोत्कच आदिने कौरवोंका विशेष - नाश और नुकसान किया था । इसी दिन ' श्वेत ' ग्रह चित्रा नक्षत्र में आया, ऐसा मालूम होता है ।
इसी मार्गशीर्ष शुक्ल - एकादशीके दिन युद्ध आरम्भ होनेसे पहले भगवान् श्रीकृष्णने अपने प्रिय सखा भक्त अर्जुनको गीताका उपदेश दिया था । इसी दिन अर्जुनको जीवन्मुक्ति प्राप्त हुई थी । इसीलिए तो इस एकादशीको ' मोक्षदा ' कहते हैं ।
( १२ ) श्रीगीतोपदेशकी तिथि और गीताकी महत्ता ।
यह प्रश्न होता है कि - ' श्रीगीताजयन्ती मार्गशीर्ष शुक्ला ११ को ही क्यों मनायी जाती है? इसी दिन भगवान् श्रीकृष्णाने अर्जुनके प्रति गीताका उपदेश दिया था, इसका क्या प्रसारण है '? इसके लिए हमें महाभारतके युद्धारम्भ एवं पितामह भीष्मके परलोकगमनके कालपर दृष्टिपात करना आवश्यक है । महाभारत, भीष्मपर्वके अध्याय २, श्लोक २३-२४ में लिखा है कि कार्तिककी पूर्णिमाके चन्द्रमाको देखकर श्रीवेदव्यासजीने धृतराष्ट्रसे कहा कि निकट 726भविष्य में बड़ा भयंकर युद्ध होनेवाला है; क्योंकि चन्द्रमाका रूप अग्निके समान लाल, कान्तिहीन और लक्ष्य दिखाई पड़ता है । महाभारत, अनुशासनपर्वके १६७ वें अध्यायके २७ वें -२८ वें श्लोकोंमें वर्णन आता है कि भीष्मजीने माघ शुक्ला अष्टमी के दिन अपने शरीरका परित्याग किया था । श्री भीष्मजी बहुत दिनों तक शरशय्या पर पड़े रहे । इस हिसाब से माघशुक्लपक्षमें तो गीताजयन्ती हो नहीं सकती, प्रत्युत मार्गशीर्ष में ही हो सकती है ।
यदि शुक्लपक्ष न मानकर कृष्णपक्ष ही गीताजयन्तोका काल मान लिया जाय तो यह भी ठीक नहीं । क्योंकि महाभारत, द्रोण- पर्व में वर्णन है कि चौदहवें दिन की रात्रिमें जो संग्राम हुआ था, उस समय घोर - अन्धकार था, प्रज्वलित दीपकों ( मशालों ) के प्रकाश में ही वह युद्ध हुआ था ( देखिये अ ० १६३ ); वहाँ अंधेरे में अपने- परायेका ज्ञान न रहनेसे लोग अपने पक्षके वीरोंका भी संहार करने लगे । तब अर्जुनने युद्ध बन्द करके विश्राम करनेकी आज्ञा. दे दी ( देखिये ० १८४ ) । इस प्रकारकी अन्धकारमयी रात्रि कृष्णपक्ष में ही रहती है । इस हिसाब से गीता के प्राकट्य का समय कृष्णपक्ष नहीं हो सकता; क्योंकि गीता युद्धारम्भके कुछ पहले ही कही गई थी और उक्त चौदहवें दिनकी रात्रिके युद्धके समय में से तेरह दिन घटानेपर शुक्लपक्ष ही सिद्ध होता है ।
यदि कहें कि ' एकादशी के दिन ही गीता कही गई, इसका क्या प्रमाण है '? तो इसका उत्तर यह है कि उक्त चौदहवें दिनकी रात्रि में आधी रात के पश्चात् चन्द्रमाके उदय होनेपर पुनः युद्ध 727आरम्भ हुआ था | वहाँका चन्द्रमाका वन कृष्णपक्षकी नवमीके जैसा है; क्योंकि अर्धरात्रि के बाद चन्द्रोदय अष्टमीके पूर्व हो नहीं सकता । अतः उस युद्धकी रात्रिको पौष कृष्णपक्षकी नवमी मानें तो उससे तेरह दिन घटानेपर मार्गशीर्ष शुक्ला ११ ही ठहरती है ।
यदि यह मानें कि प्राचीन कालकी गणना में शुक्लपक्ष पहले गिना जाता था, कृष्णपक्ष बादमें - इस न्यायसे मार्गशीर्ष कृष्ण नवमीकी रात्रिमें युद्ध हुआ, तो इसमें कोई विरोध नहीं है । उस कालसे भी १३ दिन घटानेपर तिथि मार्गशीर्ष शुक्ला ११ ही ठहरती है ।
इसके अतिरिक्त एकादशीका दिन पर्वकाल है और मार्गशीर्षका महीना सबसे उत्तम माना गया है, जिसके लिए स्वयं भगवान्ने गीता में कहा है- ' मासानां मार्गशीर्षोऽहम् - ( १०१३५ ) । ' इन सब प्रमाणोंके आधारपर ही अनेक पण्डितोंने यह निर्णय किया है कि मार्गशीर्ष शुक्ला ११ को ही युद्ध आरम्भ हुआ था और उसी दिन भगवान श्रीकृष्णने अर्जुनके प्रति गीतोपदेश दिया ।
संसारमें अध्यात्मविषयक ग्रन्थ गीता के समान और कोई नहीं है । गीतापर जितनी टीकाएं, भाष्य और अनुवाद नाना - प्रकारकी भाषाओं और लिपियों में मिलते हैं, उतने दूसरे किसी धार्मिक ग्रन्थपर नहीं मिलते ।
गीताकी महिमा जो पद्मपुराण में मिलती है, उसे देखनेपर मालूम होता है कि गीताके सदृश महिमा दूसरे किसी ग्रन्थकी नहीं । गीताकी महिमा महाभारतमें स्वयं वेदव्यासजी ने भी कही है- ' गीता 728· सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रसंग्रहैः । या स्वयं पद्मनाभस्य मुख- पद्माद् विनिःसृता ॥ ( भीष्मपर्व ४३ । १ ) गीताका ही अच्छी प्रकार से श्रवण, कीर्तन, पठनपाठन, मनन और धारण करना चाहिये; अन्य शास्त्रों के संग्रहकी क्या आवश्यकता है? क्योंकि वह स्वयं पद्मनाभ - भगवान्के साक्षात् मुखकमलसे निकली हुई है । '
' सर्वशास्त्रमयी गीता सर्वदेवमयो हरिः । सर्वतीर्थमयी गङ्गा सर्व- वेदमयो मनुः ' ॥ ( भीष्मपर्व ४३।२ ) ' जैसे मनुजी सर्ववेदमय हैं, गङ्गा सकलतीर्थमयी है और श्रीहरि सर्वदेवमय हैं, इसी प्रकार गीता सर्वशास्त्रमयी है । ' ' भारतामृतसर्वस्व गीताया मथितस्य च । सारमुद्- धृत्य कृष्णेन अर्जुनस्य मुखे हुतम् ॥ ( भीष्मपर्व ४३ । ५ ) ' महाभारत रूपी अमृतके सर्वस्व गीताको मथकर और उसमें से सार निकाल कर भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनके मुखमें उसका हवन किया है । '
गीता सारे उपनिषदोंका सार है । शास्त्रमें बतलाया है-
' सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः । पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् ' ॥ ‘ सम्पूर्ण उपनिषद् गायें हैं, गोपालनन्दन श्रीकृष्ण उनको दुहने वाले ( ग्वाला ) हैं, अर्जुन बछड़ा है और गीताप्रेमी भगवत् जन
- उनसे निकले हुए महान् गीतामृतरूपी दूधका पान करनेवाले हैं । ' सम्पूर्ण शास्त्रों में गीताको सर्वोपरि माना गया है । कहा है- ' एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतमेको देवो देवकीपुत्र एंव । एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा ' | ' श्रीदेवकीनन्दन श्रीकृष्णका कहा हुआ गीताग्रन्थही एक सर्वोपरि शास्त्र है, श्रीकृष्ण ही एकमात्र सर्वोपरि देव हैं,
In English
The Date of the Gita's Teaching and Its Importance
This text calculates that the Kurukshetra war began on Margashirsha Shukla Ekadashi, which is also the day Krishna taught the Gita to Arjuna. It uses astronomical observations and historical timelines from the Mahabharata to prove this specific date and explains why the Gita is considered the essence of all scriptures.
This chapter answers
- When did the kurukshetra war begin?
- Why is margashirsha shukla ekadashi called mokshada?
- What is the significance of the gita in the mahabharata?
- How is the date of the gita's teaching calculated?
Also written: Shrigitopadeshaki, Tithi, Aura, Gitaki, Mahatta, Shrigitopadeshaki Tithi Aura Gitaki Mahatta, श्रीगीतोपदेशकी तिथि और गीताकी महत्ता