पञ्चम सुमन · प्रकरण 43

जप- पाठ विज्ञान

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385स्थावर - जङ्गमका आत्मा ( ऋ ० ११११५/१ ) माना गया है । आत्माके आराधना बताई गई है, इसीलिए मनुस्मृतिमें ऋषयो ' दीर्घसन्ध्य- न होनेसे तो मृत्यु होती है । अतः सनातनधर्मकी सन्ध्यामें सूर्यकी त्वाद् दीर्घमायुरवाप्नुयुः । प्रज्ञां यशश्च कीर्तिं च ब्रह्मवर्चसमेव च ' ( ४६४ ) सन्ध्यासे दीर्घ आयु तथा बुद्धि - प्राप्ति बताई है । जो सन्ध्यामें सूर्यके सम्बन्धको जड़ - पूजा समझते हैं उन्हें अपनी भूल ठीक कर लेनी चाहिए । जप भी बुद्धि प्राप्त्यर्थ उसी ( सूर्य ) का करना पड़ता है, सूर्यका ही बुद्धिसे सम्बन्ध होता है यह हम पूर्व ' गायत्रीमन्त्रकी महत्ताका रहस्य ' में बता चुके हैं । अस्तु

सूर्यको गायत्री मन्त्र से अर्घ्य ( जलांजलि ) देनेसे मन्देह - नामक दैत्योंका जो सूक्ष्म - कीटाणुस्वरूप हैं ( जो कि तमः और प्रकाशके मिश्रणसे स्वयं प्रकट हो जाते हैं, जिनकी लोगोंको दृष्ट करनेकी मन्द ईहा ( चेष्टा ) होने से वे मन्देह - नामसे कहे जाते हैं ), नाश भी बताया गया है | जैसे कि वेद में कहा है- ' तदु ह वा एते ब्रह्मवादिनः पूर्वाभिमुखाः सन्ध्यायां गायत्रिया अभिमन्त्रिता आपः ऊर्ध्वं विक्षि- पन्ति; ता एता आपो वीभूत्वा तानि रक्षा थं सि मन्देहारुणे द्वीपे प्रक्षिपन्ति ' ( कृष्णयजुर्वेद - तैत्तिरीयारण्यक २ ( २२ ) सूर्यका उपस्थान करने से हमारा सूर्यस्नान भी हो जाता है । सूर्यस्नानके लाभ जग- त्प्रसिद्ध हैं; उसीसे टाईफाईड तथा राजयक्ष्माके कीटाणु दूर हो जाते हैं ।

( ३२ ) जप- पाठविज्ञान

सूर्योपस्थान करके फिर गायत्री मन्त्रके जपका क्रम होता है । 386पहले उस सविताकी शक्तिका देवीरूप में ध्यान एवम् उसका उप- स्थान करके जप प्रारम्भ किया जाता है । इस विषय में पाठक सदा याद रखें कि प्रत्येक विशिष्ट शब्द अपनी एक विशेषता रखता है । इसीलिए वेदके शब्दोंकी विशिष्टताके कारण वेदके शब्दों की आनुपूर्वी में परिवर्तन नहीं किया जाता, क्योंकि उनका उसी आनु- पूर्वी से पढ़ने में लाभ - विशेष होता है । उसी धानुपूर्वीका मेघों पर भी प्रभाव पड़ता है, वृष्टि हो जाती है । सूर्यादि देवोंपर भी प्रभाव पड़ता है, जिससे वे प्रसन्न होकर हमारी इष्टपूर्ति करते हैं ।

फ्रांस देशकी प्रसिद्ध वैज्ञानिक महिला मैडम फिनेलाङ्ग है, उसने शब्द के विषय में पर्याप्त अनुभव किये हैं । एक दिन विशेष अनुभवकेलिए उसने बिजली के तारोंको एक स्थानमें जोड़ा । साथ ही एक चाकका टुकड़ा भी बाँध दिया, और काला बोर्ड भी रख दिया । निकटमें ही वह एक कुर्सीपर बैठकर गाने लगी । कुछ समयके बाद मुखको ऊँचा करके उसने देखा और हैरान होगई । उस बोर्ड पर कई रेखायें खिंचीं थीं; उसने बोर्डको साफ कर दिया ।

फिर वह अपने प्रेमीके विषयमें गाने लगी । साथ ही उसने देखा कि उस स्वरसे विजली के तारोंमें कम्पन हो रहा है; और उस बोर्ड पर आकृति बन रही है । यह जानकर वह प्रसन्न हुई कि शब्दोंका आभ्यन्तरिक भावोंसे गम्भीर सम्बन्ध है । यह प्रत्यक्ष है कि - मृग आदि पशु तथा सर्प भी गाने वा वंशीध्वनिमें मस्त होकर झूमते हैं । युद्धमें विशिष्ट गानसे अश्वोंमें आवेश आ जाता है । वे कूदते हुए युद्ध में अग्रसर होते हैं । अस्तु ।

387जब उस महिलाने गानेसे आकृतियाँ बनती हुई देखीं, तब उसने भिन्न - भिन्न गानोंका प्रभाव जाननेकेलिए यत्न किया । वह रोमन कैथलिक - गिरजागृह में प्रार्थनाकेलिए गई । यहाँ भी उसने विजलीका वह यन्त्र लगाया । जव प्रार्थना समाप्त होगई; तब बोर्ड पर एक स्त्री तथा एक लड़केकी आकृति बन गई । इन आकृतियोंका सम्वन्ध ईसा तथा उसकी माँ मरियम से था ।

फिर भी वह सन्तुष्ट नहीं हुई । पैरिसके एक महाविद्यालय में एक वङ्गाली विद्यार्थी पढ़ता था । उसने उसे कोई धार्मिक गाना गानेकेलिए कहा । वह विद्यार्थी नये वायुमण्डलमें पला होनेसे धार्मिक गानोंसे अनभिज्ञ था । हाँ, बाल्यावस्था में पिताने उसे भैरवाष्टक सिखाया था । जब उसने वह स्तोत्र ऊँचे स्वर से सुनाया तब उस काले वोर्डमें भैरवकी मूर्ति बन गई । इन बातोंसे स्पष्ट है कि जपमें तथा उच्चस्वरसे पाठ में कितनी शक्ति है । इसी सिद्धान्तसे ग्रामोफोन - यन्त्रका आविष्कार हुआ । इसलिए मन्त्रोंकी श्रानुपूर्वी नियत हुआ करती है; विशेष रूपसे वेदमन्त्रोंकी ।

वेदका महत्त्व जगत् में विदित नहीं है । इस वेदके ही मन्त्रोंसे संस्कृत हुई अन्यकी कन्या हमारी पत्नी बन जाती है । वेदके अक्षर - अक्षरमें विशेषता होती है । इसीलिए वेदको नियतानु- पूर्वी वाला तथा नियतपदप्रयोगपरिपाटी वाला माना गया है; क्योंकि वह मन्त्रोंका एक कोष है । लोकमें तो ' आहर पात्रम्, पात्रम् आह; इस आगे - पीछे कहने में स्वातन्त्र्य होता है; पर ' अग्न! आयाहि वीतये ' ( साम ० सं ० १ १ १ ) आदि मन्त्रों में ' विभावसो! 388आगच्छ भक्षणाय ' ऐसा नहीं कहा जा सकता । अथवा कहा भी जावे; तो फिर वह मन्त्र नहीं रहता, वह मान्त्रिक शक्ति भी फिर उसमें नहीं रह जाती; क्योंकि फिर वह मन्त्र ईश्वरीय न होकर मानुषी हो जाता है । इसी विशेषतासे वेद सत्य - विद्या के निधान तथा सत्य माने जाते हैं — यह हिन्दुओं का चिरन्तन विश्वास है ।

तभी कुमारिलभट्ट सौगतों ( बौद्धों ) को जीतने के लिए उनके रहस्यको जाननेके इच्छुक होकर उनके मध्यमें जब गुप्तरूपमें प्रविष्ट होगये; तब बौद्धोंके द्वारा वेद - निन्दा सुनकर कुमारिलभट्टकी आँखों से आँसू गिर पड़े । इसी कारण ' शङ्कर -दिग्विजय ' में कहा गया है— ' अदृदुषद् वैदिकमेव मार्गं तथागतो जातु कुशाग्रबुद्धिः । तदाऽपतन्मे सहसाऽश्रुबिन्दुः तच्चाविदुः पार्श्वनिवासिनोऽन्ये ' ( १६४-६५ ) यह देखकर बौद्धोंने अनुमान कर लिया कि यह वैदिक - धर्मी है । उन्होंने सोचा कि - ' विपक्षपाठी बलवान् द्विजातिः, प्रत्याददद् दर्शनमस्मदीयम् । उच्चाटनीयः कथमप्युपायैर्नैतादृशः स्थाप- यितु ं हि योग्य: ' ( ७६६ ) ' यह हमारे रहस्यको जानकर हमें हानि पहुँचावेगा; अतः इसे मार देना चाहिये । ' यह सोचकर उन अहिंसकों (? ) ने उन्हें ऊंचे महलपर ले जाकर उसे धक्का देकर नीचे फैंक दिया कि- मर जावेगा । ' सम्मन्त्र्य चेत्थं कृतनिश्चयास्ते, ये चापरेऽहिंसनवादशीलाः । व्यपातयन् उच्चतरात् प्रमत्तं मामत्र- सौधाद् विनिपातभीरुम् ' ( ७७६७ )

तब कुमारिलभट्टने गिरते हुए कहा कि यदि वेद सच्चे हैं; तो मैं गिरकर भी न मरू - — ' पतन् पतन् सौधतलान्यरोरुहं, यदि 389प्रमाणं श्रुतयो भवन्ति । जीवेयमस्मिन् पतितोऽसमस्थले, मज्जीवने तच्छ्रुतिमानतागतिः ' ( ७ | ८ ) यहाँ एक ब्राह्मणका वेदमें कैसा विश्वास बताया गया है? इससे वेदोंकी सत्यता सिद्ध हो रही है । कुमा- रिलभट्ट गिरे; वे मरे नहीं; किन्तु उनकी एक आँख फूट गई । उन्होंने सोचा कि - मैंने इस अपने वाक्यमें कि - ' यदि वेद सच्चे हैं ' ' यदि ' शब्दका प्रयोग किया; इसी सन्देहके कारण मुझे यह हानि पहुँची — ' यदीह सन्देहपदप्रयोगाद् व्याजेन [ बौद्ध ] शास्त्र - श्रवणाच्च हेतोः । ममोच्चदेशात् पततो व्यनङ्क्षीत् तदेकचक्षुर्विधिकल्पना सा ' ( ७ | ε ९ ) यदि मैं वेदकी सत्यताके विषय में सन्देहापादक ' यदि ' शब्दका प्रयोग न करता; तो ऊंचेसे गिराये जानेपर मेरी एक चांख भीन फूटती ।

पाठकगण! देखिये वेदकी कैसी सत्यता है? और वेदके विश्वासको कैसी महिमा है? इस प्रकार जब वेदके प्रामाण्यके विश्वासमानसे इस प्रकारका फल है; तव वेदमन्त्रोंके अधिकारी द्वारा शुद्ध एवं वैध जपन करनेपर हमें फल क्यों न मिलेगा? तभी तो वेदमन्त्रों से हुआ हुआ दूसरेकी कन्याका सम्बन्ध पतिसे अविच्छिन्न होता है कि पति के मरनेपर भी स्त्री उस सम्बन्धको विच्छेद्य नहीं मानती, बल्कि परलोक तक में भी उससे अपना सम्बन्ध मानती है । उसी वेद में यदि विविध मनोरथपूरक मन्त्र दीखें; तो उनका भी महत्त्व अवश्य ही होगा । परन्तु उसमें हार्दिक अतिशयित श्रद्धा तथा विश्वास चाहिये । फल तभी प्राप्त होता है ।

वेदमन्त्रोंके स्वर - सहित उच्चारण द्वारा भौतिक तत्त्वों एवं भौतिक 390जगत् पर एवं जिस मन्त्रका जो देवता है उन मन्त्रों द्वारा उस - उस देवतापर प्रभाव डाला जा सकता है, या उसको वशीभूत किया जा सकता है । वेदमन्त्रोंके शुद्ध, स्वरसहित उच्चारण एवं उनकी क्रियाओं द्वारा अग्नि, जल, वायु, मेघ, विद्युत् आदि तत्त्व एवं शक्तियों से विविध उपयोग मन्त्रशक्ति द्वारा लिया जा सकता है । वैदिक कर्मकाण्ड इसी विज्ञानसे ओतप्रोत है । प्राचीनकाल में दिव्य- द्रष्टा महर्षि एक - एक मन्त्रके ही रहस्य एवं विज्ञानके अन्वेषण में अपना सुदीर्घ - ब्रह्मचर्यमय जीवन इसकेलिए अर्पित कर देते थे

वेदमन्त्रोंमें प्रयुक्त उदात्तादि स्वर तथा पड्जादि स्वर एवं उनका छन्दोमय - रूप विशेष - सामर्थ्यमय है । स्वरों में पर्याप्त सामर्थ्य है । संगीत - शास्त्र दीपक - राग द्वारा दीपकोंका जलना, मल्हार रागद्वारा वर्षाका होना इत्यादि बातें भारत के कोने - कोने में सदियों से बाल- वृद्धविश्रुत हैं । अभी वैज्ञानिकोंने परीक्षणों द्वारा सिद्ध कर दिया है कि तीव्र स्वरोंके भोंपू जिनकी फ्रीक्वेन्सी ३००० से लगाकर ३४००० साइकल प्रति - सेकन्ड हो; तो उसके द्वारा उत्पादित ध्वनि- तरंगोंके बीच काफीकी एक बड़ी केटली रखनेसे वह काफी उबल- जाती है और यदि उनकी गति और बढ़ा दी जावे तो छोटे छोटे सिक्के हवामें भी तैराये जा सकते हैं । अतः वर्तमान विज्ञानने जो शक्ति स्वरों में या ध्वनिमें ज्ञात की है उससे हमें अपनी प्राचीन स्वर - विद्याकी उपेक्षा न करते हुए उसके अनुसन्धानमें और अग्रसर होना चाहिये ।

' छन्दांसि छादनात् ' की व्युत्पत्तिसे छन्दोंका प्रसारण - कर्म एवं

391जप- पाठविज्ञान

आच्छादन - कर्म प्रकट होता है । पिंगलशास्त्र में छन्दों का नियत मात्रा वा वर्णमें छादन - कर्म वताया है । संगीतशास्त्रमें उन्हीं छन्दोंका नियतकाल में छादन- कर्म होता है और वेदमन्त्रोंका यथाविधि उच्चारण द्वारा छन्दोंका छादन कर्म ब्रह्माण्ड पर होता है ।

' गायत्रेण त्वा छंदसा परिगृह्णामि, जागतेन त्वा छन्दसा परि- गृह्णामि, त्रैष्टुभेन त्वां छंदसा परिगृह्णामि, ( यजु ० १।२७ ) ' गायत्रेण त्वा छंदसा मंथामि, त्रैष्टुभेन त्वा छंदसा मंथामि, ' एवं ' रुद्र

त्रैष्टुभेन च्छन्दसा भक्षयंतु, आदित्यास्त्वा जागतेन च्छंदसा भक्षयन्तु, वसवस्त्वा गायत्रेण च्छन्दसा भक्षयन्तु ' इत्यादि मन्त्र - वाक्य छन्दोंकी उक्त व्युत्पत्तिको सार्थक करते हैं ।

जब छन्दोंका - छादन कर्म अथवा प्रसारण कर्म अथवा उनके द्वारा इष्टकी प्राप्ति उक्त प्रमाण से प्रतीत होने लगती है तो यह

स्वभावतः ज्ञात होने लगती है कि उन छन्दोंका ग्रहण या उनका लाभ दूर - देशस्थ व्यक्ति देश या स्थान आदिको भी प्राप्त हो सकता है; यदि किसी एक स्थानसे उपयुक्त साधनों द्वारा छन्दोंका प्रसारण किया जावे ।

अथवा यह भी समझ सकते हैं कि छान्दस क्रिया वह है जिसके द्वारा याज्ञिक द्रव्य एवं वाक्को अथवा विचारोंको इस विश्वमें यथास्थान पहुँचाते थे । इस छान्दस क्रियाकी क्रमानुसार शक्ति या स्थानान्तरेण सामर्थ्य छन्दोंके पृथक् - पृथक् वर्गीकरणद्वारा नियत की गई ज्ञात होती है । वैदिक विविध छन्दों के इस छान्दस विज्ञान एवं उनके सामर्थ्यको ज्ञात करके जनताके सम्मुख रखनेके 392लिए समय एवं परीक्षण की सुविधाकी अपेक्षा है ।

आजकल विविध मन्त्रोंके ज्ञाता मिलते हैं; वे उन उन कर्मों में सफल होते हुए देखे भी गये हैं, उसमें कारण श्रद्धा और विश्वास भी है । जिस सत्य भी विषय में हमारा श्रद्धा एवं विश्वास नहीं; उसका फल प्राप्त होता नहीं दीखता । जब असंस्कृत भी मन्त्रों में श्रद्धा- विश्वाससे सफलता दीखती है; तब वैदिक मन्त्रों में भी पूर्ण श्रद्धा करके विधिसे उनका उपयोग किया जावे, जप किया जाय, तब उसमें फल अवश्य ही प्राप्त होगा । अतः मन्त्रशक्तिमें भी विश्वास रखना चाहिये । इसी कारण योगदर्शन में कहा है- ' जन्मौषधि - मन्त्र - तपः - समाधिजाः सिद्धयः ' ( ४१ ) अर्थात् कई सिद्धियां जन्म से हुआ करती हैं, जैसे भैंस के बच्चेका पैदा होते ही जल में तैरने लग जाना आदि । देवताओंका जन्मसे ही विद्वान् तथा अणिमा यदि सिद्धियों से युक्त हो जाना, पक्षियोंका जन्म से ही आकाशमें उड़ना । कई सिद्धियां अजरामरता आदि रसायनादि ओषधियोंसे प्राप्त हो जाती हैं । पारे आदि रसोंके द्वारा वायुयान बना लेना, वा स्वयं आकाशमें उड़ जाना । यह सिद्धि प्रायः असुरों में थी । कई सिद्धियां मन्त्रोंसे होती हैं; कई तपस्याओं से, कई समाधिसे । योगियोंको आकाशगमनादि सिद्धि समाधि से प्राप्त होती है । अन्य सिद्धि है मन्त्रसिद्धि ।

मन्त्र शब्दात्मक होता है । शब्दमें अचिन्त्य शक्ति होती है । वैर, प्रेम, क्रोध, शान्ति, कार्यसिद्धि तथा विविध क्रान्तियां जो नैत्यिक व्यवहारमें दीखती हैं, यह सब शब्दशक्तिसे ही हुआ 393करती हैं । शब्दोंके क्रमविशेषसे ही सङ्गीत वन जाता है, जिससे पशु - पक्षी भी प्रभावित होते हैं । इससे शब्द की अचिन्त्य शक्तिमें किसीका भी विरोध नहीं हो सकता । मन्त्र - शास्त्र भी शब्दक्रम पर ही निर्भर है | कई क्रियाओंका मन्त्रसे विधान होनेसे विशिष्ट प्रभाव उत्पन्न होता है । उन्हीं मन्त्रोंका संग्रह मन्त्रभाग - वेद प्रसिद्ध है । उपवेद आयुर्वेद में भी मन्त्र होते हैं; इस प्रकार तन्त्र - शास्त्रमें भी । मन्त्रशक्तिसे ही ब्राह्मण वृष्टि करवाने वा रोकने में समर्थ होते हैं - यह प्रसिद्ध ही है । इस विषय में हम कलकत्ताके ‘ विश्वमित्र ' ( मासिक - पत्र ) में प्रकाशित आर्यसमाजी श्रीसन्तराम बी. ए. के ' रहस्यमय भारत ' लेखका एक अंश उद्धृत करते हैं-

“ मन्त्रबलसे वर्षा बन्द ”... इसी प्रकार हाल में ' एस्ट्रालोजिकल मेगज़ीनमें ' एक लेख छपा है । उसमें लिखा है - लामा लोग मन्त्र- बलसे ओले बरसा सकते हैं; और वर्षा बन्द कर सकते हैं । इस सचाईका अब स्पष्ट रूपसे प्रदर्शन किया जा सकता है, जो लोग आध्यात्मिक अनुभवोंको समझ नहीं सकते; वे केवल इनको विशृङ्खलित - बुद्धि लोगोंकी साक्षियां कहकर बहुधा हँसा करते हैं, परन्तु इस प्रकारके मनोभावके मूलमें है अविद्या, और आजकल

में दी जानेवाली एकपक्षीय शिक्षा । उसी पत्रिका में के शिक्षणालयों

फिर लिखा है- ' वर्षाको बन्द करनेकेलिए एक तुरही ली जाती है । इसके बाहरकी ओर सांकेतिक चिह्न बड़े सुन्दर ढङ्गसे खुदे होते हैं, और उसके भीतर सुवर्ण आदि अनेक धातुओं के टुकड़े कुछ गोरी सरसोंके दानोंके साथ इकट्ठे रखे होते हैं ।

394जिस समय तूफानका प्रकोप हो रहा हो, लामा उस तुरहीको हाथमें पकड़े हुए मन्त्र पढ़ता है । उसके मन्त्रपाठसे बड़े - बड़े ओले टूटकर बहुत छोटे - छोटे टुकड़े हो जाते हैं; और फसलको हानि नहीं पहुँचाते । इसका पूरा - पूरा वर्णन ' लाइस इलेजवेथ ड्राकोट्टस ' लिखित ' वाइस अफ सिस्टिक इण्डिया ' में मिलता है । लामाओंकी दूसरी रीति यह है कि ओले गिरनेकी ऋतु लामा लोग वाटिकाओं की सीमापर रक्षाप्रद प्रार्थना - पताका लगा देते हैं । जब वादलकी गरज और ओलोंके तूफान गिर रहे होते हैं; लामा अपनी धर्म- पुस्तक लेकर उसमें एक प्राचीन संस्कृत - मन्त्र पढ़ता है । इस मन्त्रका पाठ बड़ी भारी तैयारी, उपासना, उपवास और चिन्तनके अनन्तर ही किया जा सकता है । ओले गिरनेसे पहले जो मेघ - नाद होता है, पहले उसे बन्द करना होता है । इसकेलिए एक विशेष मन्त्र है । फिर जव सचमुच ओले गिरने लगते हैं; तो लामा हाथमें तुरही लिए खेत में जाता है, और जिस दिशा से ओले आ रहे होते हैं; उधर पीली सरसोंके दाने छिड़ककर वह मन्त्र पढ़ता है, उससे ओलोंका बरसना बन्द कर देता है ।

लोगोंका विश्वास है, और यह विश्वास कुछ झूठा भी नहीं कि मन्त्रके बलसे बड़ेसे बड़े ओले भी टुकड़े - टुकड़े होकर परमाणुके बराबर छोटे हो जाते हैं । इसकी व्याख्या सरल है । मन्त्रोच्चारण से वायुमण्डलमें जो कम्पन उत्पन्न होता है, वह श्रलेपर बिजलीके आघातके सदृश कार्य करता है । इस प्रकार मनुष्यके मुखसे निकले हुए शब्दका प्राकृतिक तत्त्वोंपर प्रभुत्व सिद्ध होता है ' । अलाइस 395इलिनबथ यों लिखती हैं - ' श्रीमान् महाराजा साहबने वर्षामें हमें लामानाच देखनेकेलिए बुलाया । यह नाच साधारणतः खुले मैदान में होते हैं । मैंने महाराजा से पूछा कि – लामाओं के पहिने हुए सुन्दर वस्त्र वर्षांमें खराव न हो जाएंगे? परन्तु उन्होंने इस ढंगसे उत्तर दिया, मानो ऐसी आश्चर्यजनक बातें बिल्कुल साधारण हों । ' मेरा ख्याल नहीं कि उनके कपड़े खराब होंगे; क्योंकि मेरे लामा मन्त्र पढ़कर वर्षाको रोक सकते हैं । " यह बात स्वयं मुझे भी मालूम थी । लामा - नाचके दिन मूसलाधार पानी बरस रहा था । हम वाटरप्रूफ और छातोंसे सुसज्जित होकर घरसे चले । परन्तु जब हम राजभवनके आँगनमें पहुँचे, जहां नाच आरम्भ होनेको था; तो वर्षांकी एक बूँद नहीं गिर रही थी । किसी रहस्यमय रीतिसे ये लोग आँधी - पानीको अपने वशमें करनेकी क्षमता रखते हैं ' ( ट्रिव्यून २० जनवरी १६४१ )

पाठकोंने मन्त्रशक्ति देख ली । इस प्रकार मन्त्रोंके साथ विशेष बीजमन्त्रोंको भी मिलाकर उनमें विशेष - शक्ति प्रादुर्भूत की जा सकती है । इस विषयमें १६२४ अप्रैल मासमें प्रकाशित ' फिजिकल कल्चर ' नामक अमेरिकी मासिक पत्र में ' लेसर लेजारियो ' नामक अष्ट्रियन शास्त्रज्ञका एक लेख प्रकाशित हुआ था; उसमें उसने स्पष्ट किया है कि - ' ह्रां ह्रीं क्लीं ' इत्यादि एकाक्षर मन्त्रोंका उच्चारण करने से क्या लाभ होता है । बीजाक्षरोंके उच्चारणसे उसका प्रभावशाली कार्य शरीर के भीतरी भागमें होता है - इस बातको देखनेकेलिए औंधनरेश श्रीभवानदेव पन्त से बनाई ' सूर्य नमस्कार ' 396नामक अंग्रेजी पुस्तक देखनी चाहिए । उसके अष्टम अध्याय में उस विषय में स्पष्टता की गई है ।

फलतः वेदमन्त्रोंमें भी विशेष - शक्ति हुआ करती है । जपनादिमें यदि उसकी स्वर वर्ण आदिकी आनुपूर्वीका भङ्ग कर दिया जावे; तो उसके फल में भी भङ्ग होता है; इसलिए प्रसिद्ध है - ' मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिध्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह । स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति, यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपराधात् ' यद्यपि जपमें मन्त्रोच्चारण एवं शब्दका ही महत्त्व है; तथापि अर्थज्ञानसहित जपन करनेसे उसका विशेष फल होता है । जप करनेवालोंका भी कभी पतन नहीं हुआ करता । जैसा कि मनुस्मृति में कहा है- ' जपतां जुह्वतां चैव विनिपातो न विद्यते ' ( ४।१४६ ) ।

' जप ' धातुके दो अर्थ होते हैं, एक ' जप व्यक्तायां वाचि ' स्पष्ट बोलना, दूसरा ' जप मानसे च ' मनमें उसे कहना । अब प्रश्न है कि स्पष्ट बोलनेसे तो मन्त्रकी ध्वनिका प्रभाव माना जा सकता है, पर मन्त्रके मानस जपका क्या प्रभाव पड़ सकता है? इसपर यह जानना चाहिए कि स्पष्ट बोलने से वह वाणी स्थूलतामें होती है; और उसका प्रभाव भी सीमित स्थलमें होता है; पर मनके द्वारा मन्त्रके उच्चारणसे वह वाकू सूक्ष्म हो जाती है । परा पश्यन्ती मध्यमा - यह तीन वाक् भी सूक्ष्म होती हैं; उनके समय में नाभि प्रदेश आदि में प्रयत्न होता है, उससे विद्युत् प्रकट होती है; उसका प्रभाव अपेक्षित स्थल पर स्थूल वाकूकी अपेक्षा अधिक पड़ता है । सूक्ष्म शक्ति

In English

The Science of Chanting and the Power of Sound

This chapter explains the spiritual and physical importance of sun worship, Gayatri mantra recitation, and the precise pronunciation of Vedic mantras. It argues that sound vibrations have a concrete impact on both the material world and the human consciousness.

This chapter answers

  • Benefits of surya upasana and gayatri mantra?
  • Importance of correct pronunciation in vedic mantras?
  • Relationship between sound vibrations and physical matter?
  • Why is the specific order of vedic words important?

Also written: Japa, Patha, Vigyana, Japa Patha Vigyana, जप- पाठ विज्ञान

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 385–396 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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