पञ्चम सुमन · प्रकरण 44
मालाकी मणियोंकी १०८ संख्याका विज्ञान
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397स्थूलकी अपेक्षा अधिक होती है । मन्त्रमें ' मन्त्रि गुप्तभाषणे ' धातु है; मन्त्रका मन्त्रत्व इसी गुप्त - भाषण - मानस जपनसे होता है । उसका प्रभाव भी बहुत पड़ता है । प्रलय में वेद - शब्द भी सूक्ष्म- रूपमें मन्त्रात्मक ही तो थे पर उनका प्रभाव समाधिस्थ ऋषियों पर भी पड़ा । फलतः मानस जपका प्रभाव सारे आकाशमें व्याप्त हो जाता है । अपेक्षित स्थलपर तो पड़ता ही है ।
( ३३ ) मालाकी मणियोंकी १०८ संख्याका विज्ञान
जपनकेलिए संख्या १०८ होती है, तदर्थ मालाकी आवश्यकता होती है । बिना संख्याके जप करना ठीक नहीं । बृहत्पराशरस्मृतिमें कहा है- ' अप्समीपे जपं कुर्यात् संसंख्यं तद् भवेद् यथा ' ( ४ | ४० ) असंख्यमासुरं यस्मात् तस्मात् तद् गणयेद् ध्रुवम् ' । अब वहाँ जपमालाके विषयमें कहा है- ' स्फाटिकेन्द्राक्ष - रुद्रात्तैः पुत्रजीव- समुद्भवैः । अक्षमाला प्रकर्तव्या प्रशस्ता चोत्तरोत्तरा । श्रभावे त्वक्ष- मालायाः कुशप्रन्ध्याथ पाणिना । यथाकथञ्चिद् गणयेत् ससंख्यं तद् भवेद् यथा ' ( ४।४१-४२ ) यहां रुद्राक्षकी मालाको अन्य मालाओं से श्रेष्ठ माना गया है; उसमें कीटाणुनाशिनी शक्ति भी हुआ करती है । तुलसीकी भी सात्त्विक विद्युत्प्रदान- शक्ति विज्ञान सम्मत होनेसे जपमें तुलसीकी मालाका उपयोग भी हो सकता है । गलेमें भी तुलसी आदिको कण्ठी पहननेका यही लाभ हो जाता है । मौन रूपसे जप करनेसे गलेकी नसोंपर जोर पड़नेसे गलेमें गण्डमाला आदि रोगोंकी आशंका बनी रहती है; तब गलेमें उक्त कण्ठी पड़ी रहने से, गलेसे उसका स्पर्श होते रहनेसे उक्त रोगोंकी आशङ्का 398नहीं रह जाती । मालामें तर्जनी अंगुलि नहीं लगाई जाती - यह ध्यान रखनेकी बात है; क्योंकि तर्जनी अंगुली दूसरोंको डाँटने वाली, मारने आदिका भय देनेवाली होनेसे पापयुक्ता एवं निकृष्ट होती है; और जपमें चाहिए पवित्रता; अतः तर्जनी अंगुलीका मालासे स्पर्श नहीं कराया जाता ।
अब मालाके मणियोंकी १०८ संख्या के विषय में जानना चाहिए । हमारे प्रत्येक पलमें ६ श्वास निकलते हैं । ढाई पल वा एक मिनटमें १५ श्वास निकलते हैं । एक घण्टे में ६०० श्वास हो जाते हैं । १२ घण्टों में १०,८०० श्वास हो जाते हैं । दिन - रात २४ घण्टोंमें हमारे २१,६०० श्वास होते हैं । इसलिए ' योगचूडा- मणि ' उपनिषद् में कहा है- ' पट्शतानि दिवारात्रौ सहस्राण्येक- विंशतिः । एतत् - संख्यान्वितं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा ' ( ३२ ) ।
इन अहोरात्र के श्वासोंमें आधा भाग यदि सोना, भोजन तथा अन्य सांसारिक कार्यों के लिए रख दिया जाय, अवशिष्ट आधा समय परमार्थ - साधनाका स्थिर किया जाय तो दिनभागके १०८०० श्वासोंमें हमें इष्टदेवको भी इतने बार स्मरण करना चाहिए । परन्तु लोकयात्रामें इतना सम्भव नहीं हो सकता, तब १०८,०० संख्याके पिछले दो शून्योंको हटाकर १०८ वार इष्टदेवका जप किया जाता है । यद्यपि दिन कभी १०॥ घण्टोंका, कभी १३ ॥ घण्टोंका भी हो जाता है; तथापि उसका मध्यभाग १२ घण्टोंका है । रात विश्रामकेलिए होती है, उसमें तम तथा तमोगुणका बाहुल्य होता है; अतः इष्टदेवके स्मरणके लिए दिनके घण्टे ही 399ठीक माने जाते हैं । दिनके श्वास १०८०० माने गये हैं । उनकी पूर्ति केलिए १०८ मनकोंवाली माला ही उपाय है ।
' जप्येनैव तु संसिध्येद् ब्राह्मणो नात्र संशयः ' ( मनु ० २।८७ ) ' यज्ञानां जपयज्ञोस्मि ' ( गीता १०।२५ ) ' विधियज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टो दशभिर्गु णैः । उपांशु स्यात् शतगुणः, साहस्रो मानसः स्मृतः ( मनु -२।८५ ) यह जपकी महिमा बताई गई है । इसमें उपांशु ( धीमें - धीमें ) जप करने का सौ - गुणा फल बताया गया है । मालाको मणियां १०८ होती हैं; उसके द्वारा उपांशु - मन्त्र जपनेसे सौ - गुना फल होगा । तब १०८ × १०० = १०८०० यह पूर्वोक्त दिनके श्वासोंकी संख्या पूर्ण हो जाती है । इसी कारण मालाकी मणियोंकी संख्या १०८ रखना निराधार नहीं ।
यह भी जानना चाहिये कि - मायाका अङ्क आठ माना गया है और ब्रह्मका ६ । इसपर गो ० तुलसीदासने ' मानस ' में लिखा है- मायामें परिवर्तन न्यूनता वा परिवर्धन होता है, ब्रह्ममें नहीं । ब्रह्मका अङ्क ६ होता है, हमें परिवर्तन नहीं होता । देखिये- ε × १ = ε । ६ × २ = १८ | ६४३ = २७ | यहाँ १८ में +5 के, और २७ में २ + ७ के जोड़ने से ६ ही होता है । इस प्रकारके ६ के अग्रिम पहाड़ेमें भी स्वयं जाना जा सकता है । अब आठके पहाड़े में न्यूनाधिकता देखिये । ८ १ = ८, ८ २ = १६ ( १ + ६ = ७ ) । ८ × ३ = २४ ( २ + ४ = ६ ) इस प्रकार उत्तरोत्तर न्यूनता होती गई है । ८ × ५ = ४० ( ४ + ० = ४ ) यहाँ ४ ही बचा है । = ६ = ४८ ( ४ + ६ = १२, १ + २ = ३ ) यहाँ ३ ही बचा है । ८७ = ५६ ( ५ + ६ 400= ११, १ + १ = २ ) यहाँ दो ही बचा है! ८
== ६४ ( ६ + ४ = १०, १ + ० = १ ) यहाँ एक ब्रह्म ही अवशिष्ट हुआ । ब्रह्मके अङ्क ६ में तो विकार नहीं होता ८ × ६ = ७२ ( ७ + २ = ६ ) यह यहाँ प्रत्यक्ष है ।
हिन्दुजाति प्रारम्भसे ही सूर्यकी भक्त है; इसलिए उसकी सन्ध्यामें सूर्यको अर्घ्य दिया जाता है, सूर्यका ही उपस्थान किया जाता है । सूर्यके ही मन्त्र सावित्री ऋचाका जपन होता है । उस सूर्यके १२ भेद होते हैं; उनमें १२ खां भेद है विष्णु । इधर सूर्यकी १२ राशियां होती हैं । वह सूर्य ब्रह्मरूप होता है - जैसे कि यजुर्वेदसंहितामें कहा है- ' तदेवाग्निः, तदादित्यः, तद् वायुः, तदु चन्द्रमाः । तदेव शुक्र ', तद् ब्रह्म ' ( वा ० सं ० ३२।१ ) । ब्रह्मका अङ्क ६ बताया जा चुका है । तब १२ अङ्कवाले सूर्यका अङ्कवाले ब्रह्मके साथ गुणन करनेसे १०८ संख्या होती है । तब सूर्यात्मक विष्णुका जप भी १०८ वार ठीक है । जपमें साधन होती है माला; तब मालाकी मणियाँ भी १०८ ठीक हैं । १०८ अङ्क १ + = मिलकर ६ अङ्क हो जाता है । ६ अङ्क ब्रह्मका प्रतीक है- यह कहा ही जा चुका है । इसलिए ब्रह्मवित् - संन्यासियोंके नामके साथ भी ' ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति ' ब्रह्मके प्रतिनिधि ' श्री १०८ ' के लिखनेकी शैली चली आती है ।
इसके अतिरिक्त ‘ ब्रह्म ' अक्षरोंके अनुसार भी १०८ संख्याका होता है । ' क ' से लेकर ' म ' तक २५ अक्षर हैं, ४ य, र, ल, व, हैं ' अ ' तक १६ हैं । उनका क्रम अ १, २, इ ३, ई ४, ५, और ४ श, ष, स, ह । इस प्रकार व्यंजन ३३ हुए । स्वर ' अ ' से 401. ऊ ६, ए ७, ऐ, ओ, औ १०, ॠ ११, ऋ १२, ऌ १३, लू ( प्लुत ) १४, १५, अ: १६ । ए, ऐ और ओ औ का इ - उके साथ सम्बन्ध होनेसे ही उनका इनके आगे क्रम रखा गया है । ऋ ८, लृ ६, लु १०, ए ११, ऐ १२, ओ १३, औ १४, १५, प्रसिद्ध क्रम यह है अ १, आ २, इ ३, ई ४, उ ५, ऊ ६, ऋ ७, अः १६ ।
' ब्रह्म ' शब्द में ' व, र, ह, म, यह वर्ण हैं । उसमें ' ब ' २३ संख्याका है, ' र ' है २७ संख्याका । ' ह ' की संख्या है ३३, ' म ' की संख्या २५ है । ' अ ' सर्वत्र व्यापक होने से पृथक नहीं गिना जाता । २३ + २७ + ३३ + २५ संख्या जोड़ने से १०८ संख्या होती है । तब ब्रह्मके प्रतिपादक सूर्यका भी १०८ बार जप ठीक है । ' संसार ' शब्दमें ' स - अं - स - आ - र ' वह वर्ण हैं । इनमें स ३२, १५, स ३२, आ २, र २७ यह वर्ण मिलकर १०८ संख्या होती है । तब १०८ संख्यावाले संसार ( जन्म ) के हटानेकेलिए, मुक्तिप्राप्त्यर्थ १०८ संख्यावाले ब्रह्मका जप ठीक ही है ।
' सीताराम ' भी ब्रह्म हैं । इसमें स ३२, ई ४, त १६, आ २, र २७, आ -२, म २५ इस संख्यावाले हैं; इन अङ्कोंके भी जोड़ने- पर १०८ संख्या बनती है । इस प्रकार ' रामकृष्ण ' भी ब्रह्म हैं । इनकी संख्या भी देखिये - र २७, आ २, म २५, क १, ऋ ७, ( प्रसिद्ध क्रमसे ), ष ३१, ण १५ । इनके जोड़नेपर भी १०८ होता है । इस प्रकार ' राधाकृष्ण ' भी ब्रह्म हैं । र २७, आ २, ध १६, आ २, क १, ऋ ११ ( पहले कहे हुए विशेष क्रमसे ) घ् ३१, ण १५ । 402-४०२ श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 )
यहाँ भी १०८ संख्या बनती है । इस प्रकार ' कैलाशनाथ ' भी ब्रह्म है । इनकी संख्या भी देखिये- ' क १, ऐ ८ ( पूर्व कहे हुए विशेष क्रमसे ), ल २८, आ २, श ३०, न २०, आ २, थ १७ । इनका भी जोड़ १०८ होता है । इनका भी जप होता है ।
इस प्रकार मालाकी मणियोंकी १०८ संख्याका ब्रह्मसे सम्बन्ध सिद्ध हुआ । १०८ अङ्क १ + ८ = १ जोड़कर ६ होता है - यह हम पहले कह ही चुके हैं । इस १०८,१८, ६ संख्याका ' ब्रह्मसे ' सम्बन्ध होनेसे अक्षय होनेके कारण हमारे पूर्वजोंने भी ग्रन्थ- प्रणयनमें इसका ध्यान रखा । जैसे कि - श्रीवेदव्यासने पुराण भी लिखे १८, उपपुराण भी १८, और औपपुराण भी १८ । महा- भारत के पर्व भी १८ । महाभारतकी अक्षौहिणीकी संख्या भी १८ । गीता में ब्रह्म - श्रीकृष्णके उपदेश भी १८ अध्यायोंमें संगृहीत हैं । श्रीमद्भागवतपुराणके श्लोक भी १८ हजार हैं । गोस्वामी तुलसी- दासने श्रीरामकी सेनामें बन्दर भी १८ पद्म बताये हैं ।
१८ का योग १ + ८ = ६ है । यह ब्रह्मरूप है - यह कह ही चुके हैं । युगोंकी संख्या भी ऐसी ही है । सत्ययुगके वर्ष १७,२८,००० हैं ।
के योगमें ६ संख्या बनती १ + है ७ +
। २
त्रेतायुगको
+ ८ के योगमें
वर्ष संख्या १८,
१२,६६,०००
और १ + ८ है । इनका जोड़ भी १ + २ + ६ + ६ = १८, १ + ८ = है । द्वापरयुगकी वर्षसंख्या ८,६४,००० है । इनके जोड़ में भी ८ + ६ + ४ = १८, १ + ८ = ६ संख्या ही निकलती है । कलियुगकी वर्षसंख्या . ४,३२,००० है । इनका जोड़ भी ४ + ३ + २ = ६ ही होता है । चार
403मालाकी मणियोंकी १०८ संख्याका विज्ञान ४.०३ युगों का जोड़ ४३,२०,००० है, यहां भी ६ अङ्क ही बनता है । इकहत्तर चतुर्युगोंका १ मन्वन्तर होता है, उसके ३०,६७,२०,००० वर्ष होते हैं; इनका भी जोड़ ३ + ६ + ७ + २ = १८, १ + ८ = ६ ही होता हैः । १४ मन्वन्तरोंका १ कल्प होता है; उसके वर्ष ४,२६,४०,८०,००० होते हैं; इनका जोड़ ४ + २ + ६ + ४ + ८ = २७, २ + ७ = है । इनमें १५ सन्धियां जोड़नी पड़ती हैं, जिनके वर्ष २,५६,२०,००० होते हैं, इनका भी जोड़ २ + ५ + १ + २ = १८, १ + ८ = ६ होता है । सारे कल्पके वर्ष ४,३२,००,००,००० होते हैं । इनका भी जोड़- १ अङ्क बनता है । यह ब्रह्माका दिन है, उतनी ही उसकी रात होती है । इस प्रकार ब्रह्माके दिन - रातका जोड़ ८,६४,००,००,००० है । यहां
जोड़ होता है । ब्रह्माका १ मास २,५६,२०,००,००,००० मानुषी, वर्षोंका होता है । एक वर्ष उसका होता है- ३१,१०,४०,००,००,००० वर्षोंका । ब्रह्माकी १०० वर्षकी आयु होती है; उसके वर्ष ३१,१०,४०,००,००,००,००० यह हैं । इन सबका जोड़ होता है । अङ्क ब्रह्मका प्रतीक है — यह कहा ही जा ' चुका है ।
यह नौ का अङ्क अक्षय होता है, इसलिए सत्ययुगका प्रारम्भ भी अक्षयनवमीसे माना जाता है । आज भी कार्तिक शुक्ला नवमी को अक्षय नवमी कहते हैं । इस & के ब्रह्मके अङ्क होनेसे महत्ताके कारण नवदुर्गा होती हैं । नवार्णमन्त्रके वर्ण भी नौ, ग्रह भी ध, नक्षत्र भी २७ ( २ + ७ = ६ ) नौगुणे हैं । नौ अङ्क होनेसे ही ' न ' क्षरतीति नक्षत्रम् ' इस निर्वचनसे नक्षत्र अक्षय होता है । राशियों 404के पादोंके अक्षर भी हैं । तीन व्याहृतियोंके साथ गायत्रीमन्त्रके अक्षर भी २७ ( २ + ७ = ९ ) हैं; इसलिए उसका जपन १०८ भी १ + ५ = ९ होकर अक्षयफल वाला होता है ।
महाभारत युद्ध में भी मरने से बचे भी थे नौ । पांच पाण्डव, श्रीकृष्ण, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, कृतवर्मा | हमारे शरीर में छिद्र भी ६ हैं । अङ्क भी होते हैं । इस प्रकार नौसे गुणे हुए बहुत अङ्कोंका योग भी ६ हुआ करता है । जैसे १०८ × १ = १७२ ( ε + ७ + २, = १८, १ + ८ = ९ ) । १६४८५६ = १७५३२ ( १ + ७ + ५ + ३ + २ = १८, १ + ८ = ९ ) । १६५६ × ६ = १७६०४ = ( १ + ७ + ६ + ४ = १८, १ + ८ = ९ ) इत्यादि । इस प्रकार अङ्कोंके गुणनफलकी शुद्धता देखनी हो; तब भी ' नौ - कटी की कल्पनासे नौ को कम करना पड़ता है । इस प्रकार सारा संसार भी हमें विभक्त होनेसे • ब्रह्म ही सिद्ध हुआ ।
इस प्रकार नक्षत्र २७ होते हैं; प्रत्येक नक्षत्रके ' चू चे चो ला अश्विनी ' इत्यादिरूप से चार पाढ़ होते हैं । उनका भी गुणनफल १०८ होता है । इस प्रकार नक्षत्रोंकी मालाके १०८ संख्यावाला होनेसे जपमालाकी मणियोंकी संख्या भी १०८ है । नक्षत्रमालाका जहां दोनों ओरसे सम्मेलन होता है; वह सुमेरु - पर्वत होता है । इस प्रकार जपमालाका भी संयोजन स्थान ' सुमेरु ' है— इस प्रकार मालाके मणियोंकी १०८ संख्या सोपपत्तिक सिद्ध हुई । सुमेरुको लांघना नहीं पड़ता; इस प्रकार ६ अङ्क तथा उसके प्रतिनिधि ब्रह्म . को भी लांघना ठीक नहीं होता । ठीक नहीं होता क्या, लांघा नहीं 405जा सकता । सुमेरु - पहाड़का भी कोई अतिक्रमण नहीं कर सकता ।
अन्य उपपत्ति ।
जाती है । आलोक
' ' - पाठक उसका भी सावधानता से मनन करें ।
माला के मणियोंकी १०८ संख्यामें एक उपपत्ति अन्य भी दी भगवान् कृष्णने कहा है- ' वेदा ब्रह्मात्मविषयाः त्रिकाण्डविषया इमे । परोक्षवादा ऋषयः परोक्षं मम च प्रियम् ' ( भागवत ११ | २१ | ३५ ) अर्थात् वेदोंके कर्म, उपासना, एवं ज्ञान तीन काण्ड ब्रह्म और आत्माकी अद्वैतता बतानेवाले हैं । ऋषि लोग सब बातोंको परोक्षता से कहते हैं, मुझे भी परोक्ष - कथन ही प्रिय है । इसीलिए देवताओंके लिए भी कहा है- ' परोक्षप्रिया इव हि देवाः प्रत्यक्षविद्विषः ( गोपथ १।१।१ ) । सो सृष्टिकी उत्पत्ति- प्रलयको परोक्षतासे १०८ रूपमें कहा गया है ।
भगवान् ने गीता में कहा है- ' अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ' ( ७१६ ) समस्त जगत्की उत्पत्ति तथा प्रलय मैं ही हूँ । और फिर कहा है- ' मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ( ७७७ ) यह सम्पूर्ण जगत् मुझ परमेश्वरमें ऐसे पिरोया हुआ है जैसे सूत्रमें मणियां । यहां मालाका स्वरूप बता दिया गया । अर्थात् दोनों ( परा, अपरा ) प्रकृतिरूप मणियां परमेश्वररूप - सूत्र से गुथी हुई हैं - वही मणिमालाका सूत्र है ।
भगवान्ने जगदुत्पत्तिरूप अपरा प्रकृतिका वर्णन आठ भेदोंसे किया है — ' भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ' ( गीता ७१४ ) यहां मनसे अहङ्कारका, 406४०६: श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )
वुद्धिसे महत्तत्त्वका और अहङ्कार से अव्यक्तका तात्पर्य है । दूसरी प्रकृति अपरा है— ' अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो! ययेदं धार्यते जगत् । ( १५ ) । परा प्रकृतिके जो आठ भेद बताये गये हैं; इन्हें अन्तसे आदि तक विपरीत - क्रमसे. गिनना चाहिये; क्योंकि - सृष्टिक्रम इसी प्रकारका होता है,. इनके गुण भिन्न - भिन्न संख्याके होते हैं ।
प्रकृतियोंको पैदा करनेवाला मूल है ब्रहा, वह है एक एवं सत् । उससे उत्पन्न अहंकार ( अव्यक्त - प्रकृति ) दूसरी संख्या में है, उसके दो गुण होते हैं - एक ब्रह्मका, एक उसका अपना, आवरण | उससे उत्पन्न बुद्धि ( महान् ) तीसरी और तीन गुण -- वाली होती है । पहलेवाले दो गुण, तीसरा उसका अपना, विक्षेप । मन ( अहंकार ) ब्रह्मका चौथा विकार है; उसके चार गुण हैं; तीन पहलेके, चौथा उसका अपना, मल । पांचवां विकार ख ( आकाश ) ५ गुणोंवाला, चार पूर्वके गुण, एक उसका अपना । इसी प्रकार आगे भी जानना चाहिये । छठा विकार वायु है, उसके ६ गुण. हैं । सातवां विकार अनल ( तेज ) है, उसके ७ गुण हैं । आठवाँ विकार, आपः ( जल ) है, उसके ८ गुण हैं । नौवां विकार भूमि है, उसके गुण हैं । यही बात मनुजीने भी कही है - परला- परला. अपने से पूर्व गुणको भी लेता जाता है, जो जितनी संख्यावाला. हैं, वह उतने ही गुणोंवाला हो जाता है- ' आद्याद्यस्य गुणं त्वेषा- मवाप्नोति परः परः । यो - यो यावतिथश्चैषां सन्स तावद्गुणः स्मृतः । ( १।२० ) इस अष्टधा प्रकृति से ही समस्त ब्रह्माण्डः एवं.
407मालाकी मणियोंकी १०८ संख्याका विज्ञान II शरीरोंकी. सृष्टि होती है । यह संसार - बन्धनरूप अपरा प्रकृति है । इसमें ब्रह्मके एक भेदको तो गिनना नहीं है; वह तो माला में. सुमेरुस्थानीय है; उसे गिना नहीं जाता । शेष अष्टधा अपरा प्रकृतिके २ + ३ + ४ + ५ + ६ + ७ + ८ + ६ = कुल ४४ भेद हुए ।
ब्रह्मकी परा - प्रकृति जीवरूपा कही गई है; वह जीव अपरा. प्रकृति से निर्मित सम्पूर्ण अपरा प्रकृतिरूप ६ गुणोंवाले जगत्को धारण कर लेता है; अतः दसवां होनेसे १० गुण वाला होता है ।: नौ पहले गुण, १० वां उसका अपना । पहले वे ४४ गुण थे;. अब १० यह होगए । यह ५४ संख्या होगई । यह ५४ मणियों की आधी माला तो तैयार होगई । यह आधी संख्या केवल उत्पत्तिकी है । उत्पत्तिसे विपरीत प्रलय होता है; उसकी भी संख्या ५४ होगी । इस प्रकार १०८ मणियोंकी माला हो जाती है । बिना दोनों.: उत्पत्ति - प्रलय के केवल एकका वर्णन व्यर्थ हो जाता है । तभी तो. कहा है- ' अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ' ( ७१६ ) । ' मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगरणा इव ' ( ७/७ ) यह मालाकी उपमा भी बता दी गई ।
' मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनंजय ' ( ७१७ ) यहां बताया गया है कि मुझ परमेश्वरसे अतिरिक्त जगत्का कारण अन्य कुछः नहीं । यही एक मालाका सुमेरु हुआ । प्रलयोत्पत्तिका वर्णन केवलः व्यावहारिक है; सुमेरु जीव - ब्रह्मकी एकता बताता है । ब्रह्ममें और जीवमें अन्तर यही है कि ब्रह्मकी संख्या १ है, और जीवको १० । यहाँ १० में शून्यं मायाका प्रतीक है । जब तक वह जीवके साथ है, 408तव तक जीव बन्धनमें है; जब उस मायारूप शून्यको - जो असत् है - जीवने त्याग दिया; तब वह भी एक हो जाने से ' एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म ' ब्रह्म बन जाता है । ' वासुदेवः सर्वमिति ' ( गीता ७११६ )
मालाका भी यही उद्देश्य है कि - जीव जब तक १०८ मणियोंका विचार नहीं करता, और कारणस्वरूप सुमेरु ( ब्रा ) तक नहीं पहुँचता; तब तक इस १०८ में घूमता रहता है । जब सुमेरुरूप अपने वास्तविक स्वरूपको प्राप्त कर लेता है; तब १०८ से निवृत्त हो जाता है, माला समाप्त हो जाती है । सुमेरुको फिर लांघा नहीं: जाता । जो तात्पर्य प्रलय- उत्पत्तिका है; वही १०८ संख्याकी मालाके जपका भी है । जिस प्रकार जीव ब्रह्म हो जानेपर उत्पत्ति - प्रलय से निवृत्त हो जाता है; उसी प्रकार ब्रह्म - स्थानीय सुमेरु प्राप्त होनेपर मालाकी आवृत्ति से भी निवृत्त हो जाता है । जब तक वह ब्रह्मभाव प्राप्त न हो; तब तक १०८ मणियोंकी मालाकी आवृत्ति होती ही रहेगी । जब पुरुष मालाके समाप्त होने पर भी जप करता रहता है; तब सुमेरुको लांघा नहीं जाता; किन्तु उसे उलटकर फिर शुरू से वह १०८ का चक्र जारी कर देता है ।
यह जगत् परमेश्वरसे ही उत्पन्न, परमेश्वरमें ही स्थित और परमेश्वरमें ही विलीन होता है — यही भाव मालाका सूत्र प्रदर्शित करता है । सूत्रके दोनों सिरे सुमेरुमें ही स्थित होते हैं; और सूत्रमें सब मणियां स्थित हैं । इस प्रकार १०८ की उपाधिवाला होनेसे जीवके नामके पूर्व १०८ लिखा जाता है । यह १०८ संख्याका शास्त्रीय अन्य रहस्य है ।
409मन्त्रसिद्धिका सूक्ष्म - विज्ञान
( ३४ ) मन्त्र - सिद्धिका सूक्ष्म - विज्ञान ।
मन्त्र - शक्तिपर कुछ प्रकाश पूर्व डाला जा चुका है । कुछ यहाँ भी लिखा जाता है । योगदर्शन में कहा है- ' जन्मौषधिमन्त्रतपः- समाधिजाः सिद्धयः ' ( ४ | १ ) यहाँ पर मन्त्र, तप तथा समाधि द्वारा सिद्धि कही गई है । आजकलके व्यक्ति मन्त्र - सिद्धिपर विश्वास नहीं करते 1
। उसे वे प्रकृति - नियम से विरुद्ध मानते हैं, परन्तु मानुष- ज्ञान अत्यन्त सीमित होता है । उनके पास प्रकृति - नियमोंकी पूर्ण सूची नहीं है । लोहा पानी में डूबता है - यह प्राकृतिक नियम है; पर अन्य प्राकृतिक नियमोंके आश्रयसे लोहेका भारी जहाज पानी पर तैरता है । क्या साधारण लोग उन नियमोंको जानते हैं, जिनके अनुसार वायुयान उड़ता है? बिना ही तारके देश - विदेशों के साथ संवाद होता है । इस जगत् में निरन्तर शक्तिका संघर्ष होता रहता है । कभी एक शक्ति, कभी दूसरी शक्ति दबती रहती है । जिसे जितनी शक्तियोंका तथा उसके प्रचालनका जितना ज्ञान है, उसमें उतनी ही सिद्धि है । जब तक हम निश्चयपूर्वक न कह सकें कि इस शक्तिके आगे किसी शक्तिका अस्तित्व नहीं है; तब तक यह कहना कि — अमुक सिद्धि असम्भव है - यह ठीक नहीं ।
दर्शन - शास्त्रोंके अनुसार मनुष्यका प्रकृति - संयुक्त आत्मा अनन्त- शक्तियोंका भण्डार है । ज्यों - ज्यों चित्तको अन्तर्मुख किया जावे, त्यों - त्यों शक्तियोंका आविर्भाव होता है । योगदर्शनके शब्दों में वह पुरुष पूर्ण - योगी, सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान् हो जाता है; पर उसे सृष्टि - विरुद्ध कार्य करना नहीं चाहिये, यद्यपि वह कर सकता है ।
410वैज्ञानिकोंके अनुसन्धानसे चित्तके चार स्तर जाने गये हैं । सबसे ऊपर तथा सबसे नीचे स्तर वह है, जिसका धर्म चेतना वा विज्ञान है । यही संवेदनाओंका आलय है । इससे नीचे गम्भीर स्तर वह है जिसे ' उपचेतन ' शब्द से कह सकते हैं । यह स्मृतियोंका आलय है । तीसरा स्तर वह है - जिसे ' उपाऽचेतन ' शब्द से कहा. जा सकता है । यह हमारे संस्कार, स्मृति, इच्छा और विचारोंका आलय है । सबसे नीचेका स्तर ' चेतन ' शब्दसे कहा जाता है । यह मनुष्यको सव शक्तियोंका आश्रय है, और पूर्व जन्मके संस्कारोंका आश्रय होता है । इस स्तर के अध्ययनसे मनुष्य- शक्तियोंका वास्तविक ज्ञान होता है ।
आजके मनोवेत्ता मानते हैं कि - दो प्रकारके मनुष्य होते हैं । पहले वे हैं - जिनकी वृत्ति बहिर्मुखी रहती है । वे चित्तको व्यावहारिक जगत्की ग्रन्थियोंके उद्घाटनका साधन मानते हैं । दूसरे व्यक्ति व्यावहारिक जगत्से दूर रहते हैं, इनकी वृत्ति अन्तर्मुखी होती है; वैसे लोग प्रयत्नसे चित्तके ' अचेतन ' स्तर तक पहुँच सकते हैं । वे उसमें प्रविष्ट होकर जिस किसी भी विषय में अपने आत्माको जोड़ते हैं; चित्तकी एकाग्रतासे उसमें उनका अद्भुत प्रवेश हो जाता है । इस प्रकार वह अननुभूत भी ऐन्द्रियक अनुभवको प्राप्त होता है, अर्थात् अतीन्द्रिय - ज्ञानको धारण करता है । इस प्रकार वह क्रमशः सिद्ध एवं महासिद्ध हो सकता है ।
अब कर्मकी सिद्धिके सम्भव पर विचार करना चाहिए । जब कि ज्ञान होता है, तब कर्म भी उसके साथ होता है । जिन्हें
In English
The Science of the 108 Beads in a Mala
This chapter explains why prayer beads consist of 108 beads, linking the number to human respiration and mathematical properties. It argues that this number connects the practitioner to Brahman through numerology, linguistics, and solar cycles.
This chapter answers
- Why are there 108 beads in a mala?
- What is the significance of 108 in hinduism?
- Why should one not use the index finger for jap?
- How does breath count relate to mantra repetition?
- Is rudraksha better than tulsi for chanting?
Also written: Malaki, Maniyonki, 108, Sankhyaka, Vigyana, Malaki Maniyonki 108 Sankhyaka Vigyana, मालाकी मणियोंकी १०८ संख्याका विज्ञान