पञ्चम सुमन · प्रकरण 42

सूर्यको अर्ध्य और उसका उपस्थान

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383प्राणायाममें पहले मन्त्र द्वारा दाहिनी नाकको बन्द करके बाहरी शुद्ध वायु खींचनी पड़ती है; फिर बाईं ओर दाहिनी नाककी वायुको रोककर उसके बाद दाहिनी नाकके पुटको खोलकर भीतरी अशुद्ध वायुको धीरे - धीरे बाहिर निकालना पड़ता है । धीरे - धीरे प्राणायामका समय बढ़ानेपर क्रमशः उसकी परिपक्वतामें उक्त लाभ हुआ करते हैं । इससे फुप्फुसोंकी पूर्ण शुद्धि होती है । फुप्फुस -कोषों में वायु कुछ - अंशमें सदा भरी रहती है । जीवितावस्थामें कभी भी वे बिल्कुल खाली नहीं होते । उनमें प्राणायामसे नयी शुद्ध वायु प्रवेश करती है, पहले की दूषित वायु बाहर निकल जाती है । फेफड़ोंके शुद्ध रहने से राजयक्ष्मा आदि रोग नहीं होते ।

( ३१ ) सूर्यको अर्ध्य और उसका उपस्थान ।

प्राणायामके बाद मन्त्र द्वारा आचमन मार्जनादि करके सौना - मणी - स्नान, अश्वमेध - स्नान करके फिर आचमन करना पड़ता है, उसके बाद सूर्योपस्थानका क्रम होता है । सूर्योपस्थानके समय सूर्यको गायत्री मन्त्र बोलकर जलकी अञ्जलि दी जाती है । सूर्य ही हमारी आँख है । सूर्यमें सातों रङ्ग हैं । जिसमें सूर्यकी सातों किरणें प्राप्त होकर नहीं लौटती; वह काला रङ्ग होता है । जहांसे उसकी सारी किरणें लौट आती हैं, वह सुफेद रङ्ग होता है; तब जिस रङ्गकी किरणें हमारे शरीर वा आँखों में न्यून होती हैं, सूर्यके सामने जल डालने से वे ही उपयुक्त किरणें हमारे शरीर वा आंखमें प्राप्त हो जाती हैं, वह. न्यूनता पूर्ण हो जाती है । सूर्यकी किरणें 384जल पर शीघ्र प्रभाव दिखलाती हैं - इसीलिए अभिमन्त्रित जलका अर्घ्य दिया जाता है ।

हमारे स्वास्थ्यका सम्बन्ध सूर्यसे है, सूर्य हमारा हस्पताल है, हमारी उससे चिकित्सा होती है, सूर्यमें प्रसन्नता अप्रसन्नता के परमाणु भी हैं; अतः हमारी सन्ध्याका सूर्य से सम्बन्ध रखा गया है । मुख्य सन्ध्या है सावित्री - जपन, पहले तो उसके अङ्ग होते हैं । सावित्री - सविता की ऋचाका ही नाम है; और सविता से सूर्य तथा सूर्यमण्डलाभिमानी देव इष्ट होता है । यह हम ' गायत्री - मन्त्रकी महत्ता ' विषय में बता चुके हैं । जब हमने सविताका ध्यान करना है, तो अर्घ्य और उपस्थान भी तो उसीका करना चाहिए; सो वैसे किया जाता है । ' उद्वयं ' आदि चार मन्त्रोंसे सूर्यो - पस्थानमें सूर्यसे प्रार्थना की जाती है । ' सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ' ( यजु ० ७१४२ ) इस मन्त्रमें सूर्यको स्थावर - जङ्गम पदार्थोंका आत्मा माना गया है । इसीलिए ' जीवेम शरदः शतम् ' ( यजु ० ३६ २४ ) इत्यादि मन्त्रसे सौ वर्ष जीनेको, शतवर्ष बोलने - सुननेकी तथा अदीनतादिकी प्रार्थना भी उसी सूर्यसे की जाती है - उसमें रहस्य यह है कि जो ऊष्मा हमारे जीवनको धारण करती है; वह हमें सूर्यसे प्राप्त होती है । यदि ऊष्मा हमारे अन्दर सुरक्षित रह जावे तो हम कमसे कम चार सौ वर्ष तक जी सकते हैं, यह एक अमरिकाके वैज्ञानिकका कथन हालमें ही आया है । वह ऊष्मा सूर्यसे हमें प्राप्त होती है । सूर्यके न होनेसे ही प्रलय में ऊष्माके न रहनेसे सभी स्थावर - जङ्गम नष्ट हो जाते हैं, तभी वेदमें सूर्यको

In English

Pranayama and Sun Worship

This text explains the specific breathing techniques of pranayama to purify the lungs and prevent diseases like tuberculosis. It also describes the ritual of offering water to the sun through arghya and upasthana to restore missing light spectrums in the eyes and body. The passage argues that the sun is the soul of all living and non-living things and provides the heat necessary for life.

This chapter answers

  • How to do pranayama for lung purification?
  • Benefits of offering water to the sun?
  • Why is the sun important for health?
  • Meaning of surya upasthana ritual?

Also written: Suryako, Ardhya, Aura, Usaka, Upasthana, Suryako Ardhya Aura Usaka Upasthana, सूर्यको अर्ध्य और उसका उपस्थान

मूल ग्रन्थ

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