पञ्चम सुमन · प्रकरण 9
नामकरण - रहस्य
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233शाहे इति । ' अशौच बीतने पर नामकरण संस्कार किया जाता है'- इस शङ्खस्मृतिके वचनके अनुसार दसवाँ दिन बीतने पर ग्यारहवें दिन उसकी विधि सूचित होती है । यही बात राघवानन्दने भी लिखी है - ' दशम्यामिति पूर्वाशौचनिवृत्तिपरम् । ' अशौचे तु व्यतिक्रान्ते नामकर्म विधीयते ' इति शङ्खोक्त
: ' ।
सुश्रुत संहिता ( शारीरस्थान १०।२४ ) में भी कहा है- ' ततो दशमेऽहनि मातापितरौ कृतमङ्गलकौतुकौ स्वस्तिवाचनं कृत्वा नाम कुर्याताम्, यद् अभिप्रेतं नक्षत्रनाम वा । ' ( तदनन्तर दसवें दिन माता- पिता माङ्गलिक आचार करके स्वस्तिवाचन कराकर अपनी रुचिके अनुसार बालकका नाम नियत करें अथवा नक्षत्रके अनुसार उसका नाम रक्खें । )
नामकरणका प्रभाव आगे बालक
पर भी पड़ता है, इससे उसके व्यक्तित्वका प्रादुर्भाव होता है
। उसका उस पर बहुत गम्भीर प्रभाव पड़ता है; अतः उसका
व्याकरण - सिद्ध शुद्ध एवं सुन्दर नाम रखना चाहिए । यही बात
महाभाष्य प्रत्याहाराह्निक
संज्ञादिषु ' – इस वार्तिकमें ' ऋलृक् ' सूत्रके ' न्याय्यभावात् कल्पनं
सूचित की गई है । यदि शब्दों के अर्थ
न होते; तब तो कोई भी बात नहीं थी; जैसा तैसा नाम रक्खा जा सकता था; पर शब्दोंके अर्थ होते हैं; नहीं तो, ' दुष्ट ' कहनेपर हमें क्यों क्रोध चढ़ आता है; ' महोदय ' कहनेपर हमें क्यों प्रसन्नता प्राप्त होती है? अतः स्पष्ट है कि नामका मनुष्यपर बहुत गम्भीर प्रभाव पड़ता है । ज्यौतिष - शास्त्रानुसार जो नाम आवे, उसे रखकर फिर प्रसिद्ध नाम 234बालकका संस्कृत तथा सुन्दर रखना चाहिए, जिससे पुरुष नामके लजाने के डरसे दुष्कर्म न कर सके ।
ज्योतिषशास्त्रानुकूल नाम रखनेकी समूलकता
ज्यौतिषशास्त्रानुसार जो नाम रक्खा जाता है, उसे नक्षत्राश्रय कहते हैं । यह निर्मूल भी नहीं है, शास्त्रों में उसका वर्णन आता है । जैसे कि उपवेद आयुर्वेद ' ' सुश्रुत संहिता ' शारीरस्थानमें - ' ततो दशमेऽहनि मातापितरौ तु स्वस्तिवाचनं कृत्वा नाम कुर्याताम्, यद् ' अभिप्रेतं नक्षत्रनाम वा । ' ( १०।२० ) मानवगृह्यसूत्रमें भी कहा है- ' यशस्यं नामधेयं देवताश्रयं नक्षत्राश्रयं च । ' ( १ । १८२ ) ( ' नाम ऐसा रखना चाहिए जो यशोवर्धक या यशका सूचक हो अथवा देवता या नक्षत्र के आश्रित हो । ' )
' चरकसंहिता'के जातिसूत्रके शारीरस्थानमें भी कहा है- ' कुमारं प्राक्शिरसमुदशिरसं वा संवेश्य देवतापूर्वं द्विजातिभ्यः प्रणमति — इत्युक्त्वा कुमारस्य पिता नक्षत्र देवतायुक्तं नाम कारयेत् । द्वे नामनी कारयेत् नाक्षत्रिकं नाम, अभिप्रायिकं च । ' ( ८४६ ) ( ' बालकको पूर्व या उत्तरकी ओर सिर करके सुलाकर देवताओं और ब्राह्मणोंको प्रणाम करे । फिर कुमारका पिता नक्षत्र देवतायुक्त नाम रक्खे | दो नाम निश्चित करे - एक नक्षत्र - सम्बन्धी नाम हो और दूसरा अपनी अभिरुचिके अनुसार हो । ' )
इस प्रकार ' आपस्तम्बगृह्यसूत्र में भी कहा है- ' नक्षत्रनाम च ' निर्दिशति तद् रहस्यं भवति । ' ( ६।१५।२-३ ) ' बोधायनगृह्यशेषसूत्र ' में भी ऐसी ही बात कही गई है - ' नामास्मै दधाति नक्षत्र - नामधेयेन '
235नामकरण - रहस्य
२३५ ( १ । ११ । ४ ) । गोभिल - गृह्यसूत्रमें भी यही बात है — ' अभिवादनीयं नामधेयं कल्पयित्वा देवताश्रयं नक्षत्राश्रयं वा ' ( २/१०/२३ ) ' द्राह्यायणगृह्यसूत्र ' में भी ऐसा ही कहा गया है- " देवताश्रयं नक्षत्राश्रयं वा अभिवादनीयं नाम ब्रूयात् । ' ( ३ । ४ । १२ ) ' वैखानस- गृह्यसूत्र ' में भी यही कहा गया है - ' द्वे नामनी तु, नक्षत्रनाम रहस्यम् । ’ ( ३ । १ ९ ) ' काठकगृह्यसूत्र ' में - ' पुत्रे जाते नाम निधीयते ' ( ३४।१ ) यहाँ उत्पन्नमात्रका नामकरण कहा है ।
‘ वीरमित्रोदय ' नामकरण संस्कार २३६ पृष्ठमें कहा है- ‘ ज्योतिर्विदस्तु जन्मनक्षत्रचरणलक्षितस्वरोदयाभिहितशतपदचक्रान्त- र्गताक्षरादिकमेव कार्यम् — इत्याहुः । तथा चात्र गृह्यपरिशिष्टे ' तदक्ष- रादिकं नाम यस्मिन् धिष्णे तदक्षरमिति । शतपदचक्रसारोद्धारो ' ज्यौतिषार्केऽभिहितः चू चे चो ला पदेष्वाद्ये — इत्यादिना ' । ( ज्यौतिषशास्त्रके विद्वान् कहते हैं कि जन्म - नक्षत्र के चरण से लक्षित एवं स्वरोदयसे प्रतिपादित जो शतपद - चक्र के अन्तर्गत अक्षर हो, उसीको आदिमें रखकर नाम नियत करना चाहिए । यही बात
परिशिष्ट में कही गई है । जिस नक्षत्रमें जो अक्षर हो, उसीको आदिमें रखकर नाम निश्चित करना चाहिए । ज्योतिषार्क में शतपदचक्रसारोद्धारका इस प्रकार वर्णन आया है - आदिनक्षत्र अश्विनीके चारों चरणोंमें क्रमशः चू चे चो ला ये अक्षर हैं- इत्यादि । )
इससे स्पष्ट सिद्ध होगया कि बच्चेके जन्म होते ही नाक्षत्रिक नाम रखा जाता है । नक्षत्राश्रय नाममें दो प्रकार हैं- या तो 236नक्षत्र के नामसे, अथवा उस नक्षत्र के देवताके नामसे नाम रक्खा जाय, अथवा नक्षत्रके पादोंके चार अक्षरोंमें ज्योतिषगणितके अनुसार जन्म - समयके अनुकूल जो अक्षर आवे, उसे आदिमें रखकर नाम रक्खा जाय । नक्षत्र के नामसे ही पता चल जाता है कि यह पुरुष अमुक वर्षके अमुक मास, अमुक तिथि, अमुक वार तथा अमुक समय में उत्पन्न हुआ है । जन्म - लग्नकुण्डली उसमें सहायक होती है । केवल ऐच्छिक नाम रखने पर यह सप्रमाण सिद्ध नहीं किया जा सकता कि यह पुरुष अमुक दिन उत्पन्न हुआ । नामकरणके साथ नक्षत्रोंका सम्बन्ध होनेसे ही आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्दजीने गोभिलगृह्यसूत्रानुसार अपनी संस्कारविधिमें नामकरण संस्कार में नक्षत्र तथा उसके देवता, तिथि तथा उसके देवताके नामसे आहुति दिलवायी है । ( पृष्ठ ६४ )
नक्षत्र - नाम से ही वैद्यको भी लाभ पहुँचता है । वैद्य जब रोगी का जन्म - नक्षत्र जान जाता है, तब उसके सामने रोगीकी प्रकृति मूर्तिमती होकर उपस्थित हो जाती है । वह जानता है कि अमुक नक्षत्रमें उत्पन्न होनेसे सामान्यतया इस शिशुकी प्रकृति यह है । वह तदनुकूल ही चिकित्सा करता है ।
उत्पत्तिवाले दिन - नामकरण
' शाङ्खायनगृह्यसूत्र ' में जातकर्म में कहा है - ' नाम अस्य दधाति घोषवदादि अन्तरन्तःस्थं द्वयक्षरं चतुक्षरं वा, अपि वा षडक्षरं कृतं कुर्यान्न तद्धितम् । ' ( १।२४।२६७ )
( पिता इस बालकका नाम रक्खे । उस नामका आदि अक्षर 237घोष प्रयत्नवाला हो । बीचमें अन्तःस्थ ( य, र, ल, च ) वर्ण हों । नाम दो अक्षरका, चार अक्षरका, अथवा छः अक्षरका कृदन्त हो रक्खे, तद्धित नहीं ) । यह कहकर वहां जातकर्म में रक्खे हुए नामके लिए कहा गया है - ' तद् ( नाम ) अस्य पिता माता च विद्याताम् । ' ( १ । २४ । २६८ ) ( इसके उस नामको केवल पिता - माता ही जानें । )
' दशम्यां व्यावहारिकं ब्राह्मणजुष्टम् । ' ( १।२४।२६६ ) ( दसवें दिन ऐसा व्यावहारिक नाम रक्खे, जिसे ब्राह्मणोंने अपनाया हो । ) यह कहकर जन्म- नामको गुप्त रखना तथा दसवें दिन के नामको प्रसिद्ध करना कहा है । जैसे कि –— ' दशरात्रे चोत्थानम्, मातापितरौ शिरः- स्नातौ, हतवाससौ कुमारश्च । ' ( १।२६।२७८-२७६ )
' नामधेयं प्रकाशं कृत्वा । ' ( २८४ ) ( दुस रातके बाद उत्थान होता है । माता - पिता सिरसे स्नान करके नूतन वस्त्र धारण करें । फिर कुमारको भी नहलाकर नूतन वस्त्र धारण कराया जाय । तत्पश्चात् लोक - प्रसिद्ध नाम निश्चित करके ) ।
इस प्रकार ‘ वीरमित्रोदय ' जातकर्म संस्कार ( १६ ९ पृष्ठ ) में कहा है - ( पारस्कर ) ' जातस्य कुमारस्य अच्छिन्नायां नाडचाम् अस्य शुद्ध नाम करोति । ' ' गुह्यम् — मातापितृवेद्यम् । ' ( उत्पन्न हुए कुमार नाल - छेदनके पहले ही गुप्त नाम रक्खे । गुप्तका तात्पर्य यह है कि वह नाम माता - पिताके सिवा और किसीको मालूम न हो । बहीं नामकरण ( पृष्ठ २३१ ) में कहा है- ' जन्माई द्वादशाहे वा दशाहे वा
* ' ग, घ, ङ, ज, झ, स, ड द ध क ब य र ब व ह ' यह घोष अक्षर हैं ।
238विशेषतः । कुर्याद् वै नामकरणं कुमारस्येति वै श्रुतेः । ' ( जन्मके दिन ' बारहवें दिन अथवा विशेषतः दसवें दिन कुमारका नामकरण करे 1 यह श्रुतिका विधान है । ) इस ' ज्योतिर्वसिष्ठ ' के वचनसे जन्मवाले दिन भी नामकरण कहा है । वहीं महेश्वरका - ' कार्यं सूनोर्जननसमये जातकर्मार्थनाम । ' यह वचन भी दिया है । वहीं आश्वलायन - सूत्र वृत्तिकारकी - ' जातकर्मानन्तरमेव नामकरणं कार्यम् । ' ( जातकर्मके बाद ही नामकरण करना चाहिये । ) इस अभिप्रायकी ' नाम चास्मै दद्युः ' इस सूत्रकी व्याख्या बताई है कि - ' नामकरणमाचार्येणानुक् जातकर्मानन्तरं कार्यमिति । '
( नामकरण आचार्य के द्वारा करनेका विधान न होनेसे जातकर्म के बाद उसे कर डालना चाहिये । ) बृहदारण्यकोपनिषद् में भी भी कहा है- ' जाते अग्निमुपसमाधाय.... अथास्य नाम करोति वेदोऽसीति, तद् अस्य गुह्यमेव नाम भवति । ' ( ६ । ४ । २४-२६ ) ( पुत्रका जन्म होनेपर अग्निकी स्थापना करके फिर उसका नाम नियत करे । तुम वेद हो । उसका यह नाम अत्यन्त ही गोपनीय होता है । )
इससे दो बातें सिद्ध होती हैं । एक यह कि —
जन्मवाले दिन भी शिशुका नाम किया जाय, पर वह गुप्त रहे, वह नक्षत्राश्रय नाम हो । दूसरा ऐच्छिक नाम हो, पर हो शास्त्र - नियमानुकूल । ( मनु ० ३।६ पद्य ) में कन्याका नाक्षत्रिक नाम निषिद्ध करनेसे ऐसे नामकी प्राचीनता सिद्ध होती है । नक्षत्रके चार पादोंके तत्समयागत नाम रखनेसे मनुप्रोक्त दोष नाममें न रह सकेगा । पूर्व प्रमाणोंमें यद्यपि 239पिता द्वारा नामकरण कहा है तथापि पिताके ज्योतिषी वा वैयाकरण न होनेपर पितृप्रतिनिधि पुरोहित वा कोई विद्वान् ब्राह्मण भी कर सकता है । संस्कार भी तो वही कराता है ।
नामगोपन - रहस्य
पहला नाम जातकर्मके समय किया जाता है - यह पूर्व कहा जा चुका है । उसे केवल माता - पिता जानें, अन्य न जानें । ' आत्मनाम गुरोर्नाम नामातिकृपणस्य च । श्रेयस्कामो न गृह्णीयात् । ' ( कल्याण चाहनेवाला पुरुष अपने नाम, गुरुके नाम तथा अत्यन्त कृपण मनुष्यके नामका उच्चारण न करे । ) इस स्मृति - वचनमें जो कि अपने नामके छिपानेका वर्णन आया है - वह उसके पूर्वके नामको समझना चाहिये 1 । जैसे कि ' खादिरगृह्यसूत्र ' में लिखा है-
' असौ इति नाम दध्यात, तद् गुह्यम । ' ( २२/३२ ) इस पर श्रीरुद्रस्कन्द - टीकाकारने लिखा है - ' वैदिककर्मार्थकं तत् । व्यावहारिक तु अन्यदेव, गुह्यत्वोक्त: । नामाऽपरिज्ञाने
अभिचाराद्यसिद्धिः फलम् । '
( यह नाम वैदिककर्मकेलिए होता है ।
लोकव्यवहारकेलिए तो दूसरा ही नाम रखना चाहिये; क्योंकि उसे
गुह्य कहा गया है । उस नामको जब दूसरे लोग नहीं जानेंगे तो
उसके प्रति मारण- मोहन आदिका प्रयोग सफल नहीं होगा
। यही उस नामको गोपनीय रखनेका फल है । )
इस प्रकार ' काठकगृह्यसूत्र ' में भी कहा
है- ' पुत्रे जाते नाम निधीयते । ' ( ३४।१ ) ( पुत्रका जन्म होनेपर उसका नाम रक्खा जाता 240है । ) यहां पर जातकर्ममें नाम रखना कहा है । देवपालने इस पर लिखा है - ' पुत्रे जाते जातकर्म कृत्वा नाभिवर्धनादनन्तरं नाम धीयते । ' नामकरणं हि ' एकादश्यां नाम कुर्वीत पुण्ये वाऽहनि ' इति अशौचशुद्धौ स्मृतम् । अन्ये त्वाहुः - जाते सति एकादशीं तदनन्तरं वा सुलग्नं नामकर्मरिण नातिक्रामेद् इत्येवंपरमेतद् इति ।
( पुत्रका जन्म होनेपर जातकर्म करके नाभिवर्द्धन के पश्चात् नाम रक्खा जाता है । ग्यारहवें दिन अथवा किसी पवित्र दिन नामकरण करे । इसके अनुसार अशौचकी निवृत्ति होनेपर नामकरणकी विधि है, परन्तु दूसरे विद्वान् ऐसा कहते हैं कि बालक उत्पन्न होनेपर नामकरणकेलिए ग्यारहवां दिन अथवा उसके वादका कोई उत्तम लग्न बीतने नहीं देना चाहिये । यही उपर्युक्त वाक्यका तात्पर्य है । '
' तदेव नाम धीयते । ' ( ३६ ३ ) इसका तात्पर्य बताते हुए देवपालने लिखा है- ' अत्रानुवाके असौ इत्यस्य स्थाने तदेव नाम धीयते, यत्तु जातकर्मणि कृतं नान्यत् । '
( इस अनुवाक में सौ ( अमुक ) के स्थानमें वही नाम रक्खा जाता है, जो जातकर्मके समय निश्चित किया गया है दूसरा नहीं । )
' अन्यदित्येके ' ( ३६।४ ) इस सूत्रपर देवपालने लिखा है - ' एके पुनराहुः - अन्यद् निधीयते । द्वे नाम्नी ब्राह्मणस्य कर्तव्ये । तत्र यद् रहस्यं जातकर्मण्युक्तं- ' पुत्रे जाते नाम धीयते ' इति । प्रयो- जनम् - परैरभिचारे क्रियमाणे अनुच्चाराद् अप्रकटम्, प्रकटं तु एकादशादौ व्यावहारिकम् । तथा च श्रुतिः — ' तस्माद् ब्राह्मणो 241द्विनामा ' इति ( काठक २६।१ )
( कुछ लोगोंका कहना है कि दूसरा नाम रक्खा जाता है । त्राह्मण के दो नाम रखने चाहियें । इनमें ' पुत्रे जाते नाम धोयते ' के अनुसार जातकर्मके समय जो नाम रक्खा गया है, वह गोपनीय है । उसे गोपनीय रखनेका प्रयोजन यह है कि शत्रुओं द्वारा मारण - मोहन आदिका प्रयोग किये जानेपर वह नाम अप्रकट होने से कोई हानि न होगी; क्योंकि उसका कोई उच्चारण नहीं करता । प्रकट नाम तो वही है जो ग्यारहवें आदि दिनोंमें व्यवहारकेलिए रखा गया है । इसीलिए श्रुति कहती है, ब्राह्मण दो नामवाला होता है । )
इससे सूचित किया गया है कि जातकर्मके समयमें जो ज्योतिष आदिके अनुसार नाम आता है, उसे प्रसिद्ध नहीं करना चाहिये, इसलिए कि उस नामपर अभिचार- क्रिया कोई न कर सके, जिस का जन्म - नाम से ही विशेष सम्बन्ध हो सकता है । यह आचार ( जन्मनामको प्रसिद्ध न करना ) इतिहासमें मिलता भी है । पाणिनि, कात्यायन, वार्ष्यायणि, यास्क, औदुम्बरायण, गार्ग्य, शाकटायन आदि व्यावहारिक नाम हैं - यह पिताके नामसे रक्खे गये हैं; यह अपने नाम नहीं हैं; नहीं तो जब कि - ' कृतं कुर्यान्न तद्धितम् ' ' अवृद्धम् ' इस प्रकार आदि वृद्धिरहित तथा कृदन्तीय नाम रखना वृद्धिसहित नाम क्यों रक्खे गये? स्पष्ट है कि - आत्मनाम
' न कहा है, तद्धितीयका निषेध किया है; तब ये तद्धितीय एवं आदि- गृह्णीयात् ' इस स्मृति - वचनका हो अनुसरण किया गया है । इसीके अनुकरणमें अंग्रेजोंके तथा तदनुसारी हिन्दुस्थानियोंके नाम भी 242एम. के. गान्धी, के. एल. मुंशी इत्यादि गुप्त नाम रखे जाते हैं । इंसी नामकरणके दिन नामके साथ ' शर्मा, वर्मा, गुप्त, दास ' आदि पितृवर्णिक चिह्न रखकर उसकी जातिका निर्धार जन्म से कर दिया जाता है । नामकरण कर देनेसे उस नामके साथ आत्मीयता, ममता तथा आकर्षण आदि उत्पन्न हो जाते हैं । शत्रुवाला नाम अपने लड़केका नहीं करना चाहिये ।
( ६ ) निष्क्रमणसंस्कार - रहस्य
' ' अर्कस्येक्षा मासि चतुर्थके ' - ( व्यास ० १।१७ ) ( चौथे मासमें सूर्यका दर्शन करावे । )
यह संस्कार बालक - जन्मके चतुर्थ मासमें किया जाता है । इस में शिशुको सूर्य - दर्शन कराया जाता है । इसका यह तात्पर्य है कि- तीन मासतक बच्चेको घरके अन्दर रखना चाहिये; उसे तबतक सूर्यप्रकाशदर्शन न कराना चाहिये । इसमें कारण यह है कि- पहले तीन मासतक बच्चेकी आंखें कोमलतावश कच्ची होती हैं । यदि शिशुको शीघ्र ही सूर्यप्रकाश में लाया जायगा तो उसकी आंखों पर उसका दुष्प्रभाव पड़ेगा; भविष्य में उसकी आँखोंकी शक्ति या तो मन्द रहेगी या उसका शीघ्र ही ह्रास होगा । इस कारण हमारे यहाँकी नारियाँ छोटे बच्चेको शीशा भी नहीं देखने देतीं । इसका " कारण भी यही प्रतीत होता है कि शीशेकी चमक भी की आँखों को चौंधिया देती है जिससे उनकी हानिको सम्भावना रहतीहै । तीन मासतक शिशुका शक्ति - सचय हो जानेपर क्रम - क्रमसे घरके दीपककी ज्योति देखनेमें अभ्यस्त होकर तब उसकी आंखें बाह्य
In English
The Naming Ceremony
This chapter explains the timing and method for a child's naming ceremony. It states that names should be chosen based on astrology, stars, or personal preference after the ten-day period of impurity ends. The text argues that a name has a profound impact on a person's character and future.
This chapter answers
- When is the naming ceremony performed?
- How to choose a name according to astrology?
- Why is it important to have a meaningful name?
- What are the two types of names to be given to a child?
Also written: Namakarana, Rahasya, Namakarana Rahasya, नामकरण - रहस्य