पञ्चम सुमन · प्रकरण 8
जातकर्म - रहस्य
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229कर दिया, तब दिलीपकुमार रघु अपने स्वाभाविक तेजसे अधिक प्रकाशित होने लगा । ) यहाँपर रघुके जातकर्म संस्कार से श्रीकालिदास ने रघुकी प्रकाशमानता बताई है ।
' जाते जातक्रिया भवेत् ' ( व्यासस्मृति १।१७ )
' बालकके जन्म लेनेपर जातकर्म संस्कार होता है । ' इस • संस्कार से लड़केको गर्भमें माताके रस पीनेका दोष हटता है । यह संस्कार पुत्रके जन्म - समय में किया जाता है । इसमें सोनेकी शलाकासे बालककी जिह्वापर असम मधु तथा घृत घिसाकर चटाया जाता है । यह बच्चेकी आयु और मेधा बढ़ानेवाली रासायनिक ओषधि वन जाती है । सुवर्ण वातदोषको शान्त करता है, मूत्रको स्वच्छ करता है, रक्तकी ऊर्ध्वगतिके दोषको दूर करता है । वह विषनाशक, स्मृति तथा पवित्रताकारक होता है । छोटे शिशुकी जिह्वापर उस सुवर्णको घिसाकर किये स्पर्शसे ही उस सुवर्णका गुण परमाणु- रूपसे वा विद्युदुरूपसे उसके अन्दर पहुँच जाता है, जैसा कि थर्मामीटरको जीभपर रखने से भीतरी ऊष्मा व्यतिरेकसे उसमें प्राप्त हो जाती है । यहाँ जिह्वाके स्पर्शसे उसका प्रभाव अन्दर पड़ता है; घृत और मधुके परमाणुओं से मिलकर अपूर्व प्रभावको उत्पन्न करता है ।
मधु लालाका संचार करता है, पित्तकोषकी क्रियाको बढ़ाता है । कफ - दोषको दूर करता है । यह रूपसुधारक, बलकारक, रक्त- संशोधक, त्रिदोषका शान्तिकर्ता होता है - ( सुश्रुत ० सूत्रस्थान ४५ अ ० ) । घृत वायु तथा पित्तको शान्त करता है; स्मृति, मेधा, कान्ति, " 230` स्वर, लावण्य, ओज, तेज एवम् आयुको बढ़ाता है- ' आयुर्वे घृतम् ' ( कृष्णयजुर्वेद तै ० सं ० २।३।२।२ ) विषैले परमाणुओंका नाशक भी होता है ( सुश्रुत ० सूत्र ० ४५।१ घृतवर्गे ) । प्रसवकी यन्त्रणा से सद्योजात शिशुकी रक्तगति ऊपरको हो जाती है, कफदोष वढ़ जाता है । उसकी डाँतड़ियों में काले रंगका मल इकट्ठा हो जाता है, उसके न निकलने में बच्चेको अनेक प्रकारकी पीड़ाए हो जाती हैं । जात- कर्म में की जाती हुई उक्त क्रिया और अभिमन्त्रणका प्रभाव इस समय जादूका काम करता है, शिशुका उपकार करता है, उसे जीवन - प्रदान करता है । जीवनकी वाधाओं को दूर करता है ।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि संस्कारोंकी क्रियाएं स्वयं ही लाभ पहुँचानेवाली होती हैं; पर जब साथ ही अभिमन्त्रण - क्रिया होती ' है तो उसका विशेष महत्त्व हो जाता है; उससे अभ्युदय होता है । ' महाभाष्य में इस विषय में प्रकाश डाला गया है - ' अग्नौ कपालानि अधिश्रित्य अभिमन्त्रयते - ' भृगूणामङ्गिरसां धर्मस्य तपसा तप्यध्वम् ' इति । अन्तरेणापि मन्त्रमग्निर्दहनकर्मा कपालानि संतापयति, वेद- मन्त्रप्रयुक्तसंस्कारेण च धर्मनियमः क्रियते — - एवं क्रियमाणमभ्युद्य- कारि भवति । ' ( पस्पशाह्निक ) ' आगपर कपालोंको रखकर अभि- मन्त्रित करते हैं । ( मन्त्र पढ़ते हैं ) कि तुम सब भृगु और अङ्गिरा गोत्र वाले महर्षियोंके धर्मकी तपस्यासे तप जाओ । यद्यपि बिना ' मन्त्रके भी दाहक अग्नि कपालोंको तपा दे सकती है तथापि वेद- मन्त्रप्रयुक्त संकारद्वारा उसमें धर्मका नियमन किया जाता है । इस प्रकार किया हुआ कर्म अभ्युदयकारक होता है ।
231नामकरण
' - रहस्य २३१
( ५ ) नामकरण - रहस्य
' एकादशेऽह्नि नाम ' ( व्यासस्मृति १।१७ )
' म्यारहवें दिन नामकरण संकार करे । इस संस्कारसे आयु एवं तेजकी वृद्धि एवं व्यवहारकी सिद्धि होती है । नामके विना भला संसारी व्यवहार कैसे चले? पहलेकी दस रात्रियाँ अशौचके कारण छोड़ दी जाती हैं—
' अशुद्धा वान्धवाः सर्वे सूतके च तथोच्यते । ' ( मनु ० ५५८ ) ' यथेदं शावमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते । जननेऽप्येवमेव स्यान्निपुणं शुद्धिमिच्छताम् । ( ५/६१ ) ( सूतकमें सभी भाई - बन्धु अशुद्ध होते हैं । जिस प्रकार सपिण्डोंपर यह मरणाशौच लागू होता है उसी प्रकार पूर्णरूपसे शुद्धि चाहनेवाले पुरुषोंकेलिए बालकके जन्म होनेपर भी सपिण्डों को अशौच प्राप्त होता है । ) इसीके साथ एक अन्य पद्य भी मिलता है- ' उभयत्र दशाहानि ( जननाशौच
' और मरणाशौच दोनोंमें ही दस दिनों तक
कुलस्यान्नं न भुज्यते । दानं प्रतिग्रहो यज्ञः स्वाध्यायश्च निवर्तते ॥
अशौचग्रस्त कुलका अन्न नहीं खाया जाता तथा दान, प्रतिग्रह, यज्ञ • और स्वाध्याय भी बन्द रहते हैं । ' )
जाता है । में लिखा है - अथ '
इस कारण ब्राह्मरणका ग्यारहवें दिन नामकरण संस्कार किया
पारस्करसूत्र ( १ | १७ | १ ) के हरिहरभाष्य
' दशम्यामिति सूतकान्तोपलक्षणम् । ततश्च यस्य [ वर्णस्य ]. यावन्ति दिनानि सूतकम्, तदन्तदिने सूतकोत्थापनमित्यर्थः । अपरदिने 232च ' ' नामकरणम् । '
( ‘ यहाँ ' दशम्याम् ' यह पद अशौच के अन्तका सूचक है । अतः जिस वर्णकेलिए जितने दिन सूतक बताये गये हैं, उतने दिन पूरे होने पर सूतककी निवृत्ति होती है और दूसरे दिन बालकका नामकरण - संस्कार किया जाता है । ' )
मनुस्मृति ( २।३० ) के पद्यके भाष्य में मेधातिथि भी व्याख्या करते हैं - ' इह केचिद् दशमीग्रहणमशौच निवृत्तिरिति उपलक्षणार्थं वर्णयन्ति, अतीतायामिति वा अध्याहारः । दशम्यामतीतायां ब्राह्मणस्य, द्वादश्यां क्षत्रियस्य, पञ्चदश्यां वैश्यस्येति । यदि तु ब्राह्मणभोजनं विहितं क्वचित्, तदा लक्षणा, अन्यथा जातकर्मवद् अशौचेऽपि करिष्यते । ' ( यहां कुछ लोग ' दशमी - पदका प्रयोग अशौचकी निवृत्ति सूचित करने के लिए है ' यह कहकर उसे उपलक्षणार्थक बताते हैं । अथवा ' दशम्याम् ' पदके आगे ' अतीतायाम् ' पदका अध्याहार कर लेना चाहिए । तात्पर्य यह कि दसवीं रात्रि व्यतीत होनेपर ब्राह्मण - बालकका, बारहवीं बीतनेपर क्षत्रिय बालकका और पन्द्रहवीं बीतने पर वैश्य - बालकका नामकरण - संस्कार करना चाहिये । यदि कहीं उस दिन ब्राह्मण भोजनका विधान हो, तो इस प्रकार लक्षणाका आश्रय लेकर अर्थ करना चाहिये । अन्यथा जातकर्मसंस्कारकी भांति नामकरण भी अशौच में भी किया जा सकेगा । )
यही श्रीकुल्लूकभट्टने भी कहा है- ' अशौचे तु व्यतिक्रान्ते नामकर्म विधीयते । ' इतिशङ्खवचनाद् दशमेऽहनि अतीते एकाद-
In English
The Jatakarma and Namakarana Rituals
This text explains the Jatakarma ceremony performed at birth, which involves applying honey and ghee to a newborn's tongue using a gold rod to improve health and intellect. It also discusses the Namakarana (naming) ceremony held on the eleventh day after birth once ritual impurity has passed.
This chapter answers
- What is the purpose of jatakarma sanskara?
- How does applying honey and ghee to a baby's tongue help?
- When should the namakarana ceremony be performed?
- Why are the first ten days after birth considered impure?
Also written: Jatakarma, Rahasya, Jatakarma Rahasya, जातकर्म - रहस्य