पञ्चम सुमन · प्रकरण 10

निष्क्रमण - रहस्य

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243प्रकाशमें गमनके योग्य होती हैं, तब वैधसंस्कार हो जानेपर सूर्य की जीवनीशक्तिका तथा घरसे बाहरी शुद्ध वायुका भी बच्चे के अन्दर सञ्चार होता है, जिससे उसकी आयु और लक्ष्मीकी वृद्धि होती है । धीरे - धीरे बाहरी शीतोष्णके सहनयोग्य भी बनता है । घरमें रहनेकी कोमलता धीरे - धीरे हटकर हृष्ट - पुष्टताकी दिशा में प्रवृत्त होती है, सृष्टिके अवलोकनका शिक्षण भी प्राप्त होता है ।

बिना संस्कारके इस लाभप्राप्तिके सम्भव होनेपर भी वेदमन्त्र- पाठादि - क्रियासे वैध - संस्कार होनेपर - ' यदि तर्हि लोक एषु प्रमारणम्, किं शास्त्रेण क्रियते ' ( यदि इन कर्मों में लोक ही प्रमाण है तो शास्त्रसे क्या किया जाता है? ) इस प्रश्नमें- ' लोकतो ऽर्थप्रयुक्ते प्रयोगे शास्त्रेण धर्मनियमः क्रियते । अन्तरेणापि मन्त्रमग्निर्द- हनकर्मा कपालानि संतापयति; तत्र [ वेदमन्त्रप्रयोगसंस्कारे ] धर्मनियमः क्रियते । एवं क्रियमाणमभ्युदयकारि भवति । ' ( लोकसे प्रयोजनवश कार्यका आरम्भ होनेपर शास्त्र के द्वारा धर्मका नियम किया जाता है । यद्यपि बिना मन्त्रके भी दाहक अग्नि कपालोंको संतप्त कर ही देगी तथापि वहाँ वेदमन्त्र - प्रयोग- पूर्वक संस्कार करनेपर धर्मका नियम किया जाता है । इस प्रकार किया जानेवाला कर्म अभ्युदयकारक होता है । ) पस्पशाह्निकके महाभाष्यके इस उत्तरके अनुसार शिशुका अभ्युदय प्रवृत्त होता है । इस प्रकार रात्रिमें शिशुको चन्द्रदर्शन कराया जाता है, जिससे वह चन्द्रमासे भी प्रकाश तथा आह्लाद प्राप्त करे । आश्वलायन- गृह्यसूत्रमें इसका वर्णन नहीं है ।

244बच्चोंके गलेमें रक्षापरिधान ।

आजकल दान्त निकलने के समय कष्ट न हो इसलिए बिजली के बने यन्त्र पहराये जाते हैं; जहांपर व्यर्थ व्यय अधिक होता है । यह कोई भिन्न वस्तु नहीं है; किन्तु प्राचीन रक्षा आदिका रूपान्तर ही है । यहांकी स्त्रियाँ कौड़ियाँ, शेर- रीछ आदिके नाखूनों को सोना चांदी

- आदिमें मढ़वाकर बच्चोंको पहिनाती हैं । ' वर्च ' नामक औषधि और पीली सरसों बच्चे के गलेमें पहराये जाते थे । गोरी सरसों आदिसे दान्त शीघ्र निकल आते थे ' वचके धारण करनेसे बालक बुद्धिमान् होता था । परन्तु आश्चर्य है कि— नवीन सभ्यताको आश्रित करके हमने घरके विज्ञानको भुला दिया!

( ७ ) अन्नप्राशनसंस्कारका महत्त्व

' षष्ठे मास्यन्नमश्नीयात् ' ( व्यासस्मृति १।१८ ) छठे महीने में बालकको अन्न खिलाना चाहिये ।

यह संस्कार छठे मासमें किया जाता है । इससे माताके गर्भ में मलिनता - भक्षणका दोष नष्ट हो जाता है । अबतक शिशु माताके दुग्धरूप भोजन में ही अपना भाग लेता था । माता जो कुछ खाती थी, उससे अपने शरीरको भी पालती थी, शिशुके शरीरका भी पोषण करती थी; पर उसे सदा परतन्त्र रखना उचित नहीं होता । धीरे - धीरे उसे अपने पैरोंपर भी तो उठाना है, स्वावलम्बी भी तो बनाना है, उसे शारीरिक स्वतन्त्रताका भी तो ग्रहण करना है । माताके स्तन्यका अपेक्षी होनेपर माताके अस्वस्थ रहनेपर वह भी अस्वस्थ बना रहता है । एतदर्थ प्रकृति उसके दाँत उत्पन्न करती

In English

The Importance of the Annaprashan Rite

This chapter discusses the significance of introducing solid food to an infant during the sixth month. It explains how Vedic rituals and traditional observances, such as moon viewing and wearing protective amulets, promote a child's physical growth, intelligence, and independence.

This chapter answers

  • When should a baby be given solid food?
  • What is the purpose of annaprashan sanskar?
  • Why are traditional protective amulets worn by children?
  • Benefits of moon viewing for infants?

Also written: Nishkramana, Rahasya, Nishkramana Rahasya, निष्क्रमण - रहस्य

मूल ग्रन्थ

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