पञ्चम सुमन · प्रकरण 95
' ओम् ' का महत्त्व
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875अनिवार्य अर्थ हैं । अतः संसारी जीवोंकेलिए इन बहुतसे का एक ही शब्द उस बीजमन्त्रकी भांति बन जाता है कि जिसके एक अक्षरमें बहुत - सा अर्थ सचित किया हुआ होता है ।
इसमें मुख्य अर्थ ' रक्षण ' है, परमात्मा सबका संरक्षण करता है । सबका प्रीतिका पात्र है । तृप्ति अर्थात् सेवन करनेपर हमारी • इच्छा पूर्ण करता है । हमें ज्ञान देता है, शोभा और तेज देता है । हिंसा— दुष्टों अथवा दुर्गुणोंका हनन करता है । हमारी वृद्धि करता है । गतिका अर्थ सर्वगतत्व सर्वव्यापकत्व है । आलिङ्गनसे प्रेमका अतिशय झलकता है । फलतः यही ' ओम् ' अपनी अनेक सांसारिक - क्रियाओं को हमें स्मरण दिलाता है, तभी तो ' ओम् ' के अर्थस्वरूप - ब्रह्मका चिन्तन करते हुए ' ओम् ' का जप करना पड़ता है । जैसे कि - ' योगदर्शन ' में कहा है- ' तस्य वाचकः प्रणवः, तज्जप- स्तदर्थभावनम् ' ( १।२७-२८ ) ।
तात्पर्य यह है ब्रह्मका नाम ( वाचक ) प्रणव ( ओम् ) है; उसके अर्थ ( वाच्य ब्रह्म ) का ध्यान करते हुए उसका जप करना चाहिये । उस योगसूत्रके ' वार्तिक ' में श्रीविज्ञानभिक्षुने ' अदृष्टविग्रहो देवो भावग्राह्यो मनोमयः । तस्योङ्कारः स्मृतो नाम तेनाहूतः प्रसीदति ' यह योगी - याज्ञवल्क्यका वचन उद्धृत किया है । इसका आशय यह है कि परमात्मा अद्भुत - शरीर है, भक्तिमात्र ग्राह्य है, और मनोमय हैं, उसे उसके नाम ' ओम् ' से आहूत करनेपर वह प्रसन्न होता है । उक्त - सूत्रके व्यासभाष्य में ईश्वर और ' ओम्'का वाच्य वाचकभाव स्थित - सम्बन्ध माना गया है, प्रदीप प्रकाशकी भांति अस्थित 876प्रकाश्यता सम्बन्ध नहीं माना गया ।
स्मरणकेलिए जप ही एक सर्वोत्तम साधन है । इसी कारण ही तो भगवान् श्रीकृष्णने ' यज्ञानां जपयज्ञोस्मि ' ( भगवद्गीता १०।२५ ) जपको यज्ञ मानते हुए- ' प्रोमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम् ' ( ८ | १३ ), यहां पर ' ओम् ' को ' एकाक्षर - ब्रह्म ' बताकर उसका जप बताया है और अन्तिम कालमें ओंकारको उच्चारण करते और भगवान्का स्मरण करते हुए देह - छोड़ने में परम गति ( मुक्ति ) बताई है ।
' ओम् ' की महिमा ।
वेदके उपनिषद् - भागान्तर्गत कृष्णयजुर्वेद ( कठोपनिषद् ) में तो इसी ' ओम् ' अक्षरके जान लेनेपर सब इच्छाओं का पूर्ण हो जाना कहा है । जैसे कि – ' एतद्धि एव अक्षरं ब्रह्म एतद्धि एव अक्षरं परम् । एतद्ध्य ेवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ' ( १।२।१६ ) । ' भगवद्गीता ' में ' प्रणवः सर्ववेदेषु ' ( ७१ ) यह कहकर श्रोङ्कारको समस्त - वेदोंका सारभूत माना है । वही ' वेद्यं पवित्रमोङ्कारः, ऋक्, साम, यजुरेव च ' ( ६।१७ ) इस पद्य में भगवान् ने ' ओम् ' को अपना स्वरूप कहा है । यह ठीक भी है; क्योंकि ' ओम् ' भगवान्का नाम है; नाम और नामीका अभेद हुआ करता है । ' भगवद्गीता ' के ( १७१२३ पद्य ) में ' ओम्'को ब्रह्मका नाम और वेद तथा यज्ञ एवं ब्राह्मण जातिका बनानेवाला कहा है ।
' ॐ ' इस अक्षरके कई लकड़ीके टुकड़े बने हुए होते हैं, उनको विशिष्ट क्रमसे जोड़ने पर सब भाषाओंकी लिपि बन सकती है; 877सब प्रकारके जीवोंकी आकृतियां बन सकती हैं । इसी ' ॐ ' से शेषनाग बन जाता है । यही गणेश की मूर्ति, एवं शिवलिङ्ग एवं जलहरीकी मूर्ति है । यह ' ॐ ' एक प्रतीक है । अक्षरात्मक - ब्रह्मकी भी यह प्रतीक हो सकती है, इसकी उपासना की जा सकती है । यह ब्रह्मकी साकार - उपासना होगी । इस प्रकारकी अद्भुत वस्तुको हिन्दुधर्मके ग्रन्थोंने ही ढूंढ पाया है; तभी तो ' ओम् ' कहकर ही यज्ञ, दान तथा तपस्यायें की जाती हैं - ' तस्माद् श्रोम् इत्युदाहृत्य यज्ञ - दान तपः क्रियाः । प्रवर्तन्ते विधानोक्ता सततं ब्रह्मवादिनाम् ' ( गीता १७१२४ ) ।
जब इस ' ओम् ' के नाम कीर्तनसे सब यज्ञादि- कर्मोंका अङ्ग- वैगुण्य दूर हो जाना सूचित किया है, तब इससे नाम - कीर्तनका महत्त्व भी सिद्ध हुआ । ' ओम ' का सब कर्मोंकी आदि
इसलिए भी होता है कि यह माङ्गलिक है । ' गृह्यासंग्रह ' में कहा
कण्ठं ( अण्डं ) है— ' ओङ्कारश्चाथ - शब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा ।
भित्त्वा विनिर्यातौ तस्मान्माङ्गलिकावुभौ ' ( २६ ) ।
पञ्च कार
हुआ करता है,
हिन्दुधर्मके विवाह - संस्कारमें पोङ्कारपूजन
देखना चाहिये- पूजन
I - मन्त्रमें ‘ श्रोम्’की जो महिमा वर्णित है, उसे भी
त्र्यक्षरं दिव्यं
देवमोङ्कारं परमेश्वरम् । त्रिमात्रं
' आवाहयाम्यहं
। ब्रह्मविद्योपनिषद्
इसकी त्रिमात्रता प्रश्नोपनिषद् में भी कही गई है
, ( १३४।१३६ ) वाराहोपनिषद, ( ४।१ ) में ( ३,८।१ ) तथा योगतत्त्वोपनिषद
३ ॥ मात्रा बताई गई हैं ।
878त्रिपदं च त्रिदैवतम् ( १ ) अक्षरं त्रिगुणाकारं सर्वाक्षरमयं शुभम् । त्र्यर्णवं प्रणवं हंसं स्रष्टारं परमेश्वरम् । ( २ ) अनादिनिधनं देवमप्रमेयं सनातनम् । परं परतरं बीजं निर्मलं निष्कलं शुभम् । ( ३ ) श्रोङ्कारं बिन्दु - संयुक्त ं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः । कामदं मोक्षदं चैव ओङ्काराय नमो नमः ' ( ४ ) ( कात्यायनी - शान्तिः ) यहां पर प्रकारको प्रणव, तथा वीज कहा गया है । ' प्रणव ' इसलिए इसे कहा जाता है कि ---- ' प्रकर्षेण नूयते - स्तूयते ' इस ' ओम् ' की बहुत ही स्तुति होती है । बीज इसे इसलिए कहा जाता है - जैसे वीजमें सारा वृक्ष समाया रहता है, वैसे इस ओङ्कार में भी सम्पूर्ण संसार वृक्ष समाया हुआ है । यहां पर ओङ्कारकी संख्या पांच कहनेका कारण विष्णु, शिव, गणेश, शक्ति, सूर्य इस पञ्चातयनपूजा में पांचों देवोंकी योङ्कारात्मक- मूर्तिका होना है ।
इस प्रकार इस हिन्दुधर्मके साहित्यने ' ओम् ' की महिमाको सूचित किया है । इसका प्रभाव दूसरोंपर भी पड़ा । सिक्ख ( शिष्य ) - सम्प्रदायके ' गुरुग्रन्थसाहब ' में भी ' एक ओंकार सतगुरुप्रसाद ' ऐसा माना गया है । नामकीर्तनको महत्त्व न देनेवाले अन्य आजकलके अर्वाचीन - सम्प्रदायों में भी ' ओम्'को महत्त्व दिया जाता है । वे लोग पत्रव्यवहारमें तथा पुस्तकोंके आरम्भमें भी इसी ' ओम् ' को लिखा करते हैं । छोटा बच्चा भी तो ' ओ ' इस शब्दसे रोता है, यह ' ओम् ' का ही रूप है, प्रकृति उसे भी अवैध- रूपसे ' ओम'का जप करवाती है ।
879मका महत्व
८०३
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' ओम् ' में तीन अक्षर ।
पूर्व. बताया जा चुका है कि — ' ओम् ' में तीन अक्षर हैं—. ' अ, उ, म् ' । आत्मबोधोपनिषद्, योगचूडामणि - उपनिषद् ब्रह्मविद्योपनिषद्, आदिमें भी इसे व्यक्षर बताया गया है । ' तेभ्यस्त्रयो वर्षा अजायन्त, अकार उकारो मकार इति । तान् एकदा - समभरत्, तदेतद् ओम् इति । तस्माद् ओम्, ओम् इति प्रणौति ' ( ऋग्वेद - ऐतरेय ब्राह्मण ५।३२ ) वृद्धहारीतस्मृति ( ७१३५-३७ ) बृहत्पराशरस्मृति ( १२।२६५-२६७ ), बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति ( २।१५-१६ ) में भी इसकी व्यक्षरता बताई गई है ।
अक्षरोंका भी पृथक् - पृथक् अर्थ शास्त्रोंमें बताया गया है । जैसे किं-- अथर्ववेदीय ' माण्डूक्योपनिषद् ' में कहा है-
' अकारः प्रथमा मात्रा, आप्ते, आदिमत्त्वाद् वा, आप्नोतिह वै सर्वान् कामान्, आदिश्च भवति ( ६ ) उकारो द्वितीया मात्रा, उत्कर्षाद्, उभयत्वाद् वा, उत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिम्, समानश्च भवति । नास्य अब्रह्मवित् कुले भवति ( १० ) । मकारस्तृतीया मात्रा, मितेरपीतेर्वा, मिनोति ह वा इदं सर्वम् अपीतिश्च भवति ( ११ ) ।
ओका अर्थ |
इसी उपनिषद् में ' सोयमात्मा अध्यक्षरमोङ्कारः ' ( ८ ) यहां पर आत्माको अक्षर - दृष्टिसे ओङ्कार माना गया है । उसकी ' अ ' मात्रा सबमें व्याप्त तथा आत्मा सबके आदिमें होती है । उसको जानने-
* ' अकारो वै सर्वा वाक् ' ( ऐत ० आ ० २।३।६ ) ।
880वालेको सब कामनाओं को प्राप्त कर लेनेवाला तथा सबका आदि ( बड़ा ) माना है । ' उ'का अर्थ उत्कृष्ट, उभय अ - मूके मध्य स्थित है; इसे जाननेवालेको ज्ञानमें उत्कृष्ट तथा मित्र - शत्रु उभयपक्ष में सम्मानित हो जाना कहा है । ' म ' का अर्थ सबको नीचे डाल देनेवाला ' डुमिञ् प्रक्षेपणे ' ( स्वा ० अ ० उ ० ) यह किया है । अपीति- जगत्का कारणात्मा अथवा एकरूप होता है । इस ' ओम् ' के ज्ञाताको इन सब बातोंकी प्राप्ति कही है ।
' ओम् ' की महिमाको बतानेवाला कृष्ण - यजुर्वेद- ' कठोपनिषद् ' का यह वाक्य भी मननीय है कि - ' सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति, तपार्थंसि सर्वाणि च यद् वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति, तत् ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि - ' ओम् ' इत्येतत् ' ( १।२।१५ ) यहाँ पर बताया गया है कि- सब वेद इसी ' ओम् ' पदका व्याख्यान करते हैं, सब तपस्याएँ भी जिस पदको कहती हैं, जिसको प्राप्त करनेकेलिए ब्रह्मचर्य किया जाता है, वह ब्रह्मपद ' ओम् ' है । ' एतदालम्बनं श्रेष्ठम् एतदालम्बनं परम् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ' ( कठ १।२।१७ ) यहाँ पर ओंकाररूप - आलम्बनके जाननेसे ब्रह्मलोक में उसका सम्मान माना है । ( ' महीङ् पूजायाम् ' कण्ड्वादिः आ ० से ० ) ।
अथर्ववेदीय ‘ माण्डूक्योपनिषद् ' ने तो यहाँ तक कहा है कि- ' ओम् इत्येतद् अक्षरम् इदथं सर्वं तस्य उपव्याख्यानं, भूतं, भवद्, भविष्यदिति सर्वम् श्रोङ्कार एव । यच्च अन्यत् त्रिकालातीतम्, तदपि ओङ्कार एव । ' ( १ ) अर्थात् इस संसार में सारे साहित्य 881' ओम् ' की ही व्याख्यायें हैं । भूत, भविष्यत्, वर्तमान तथा त्रिकालातीत सभी ' ओम् ' ही है । पाठकगण, देखिये – ' ओम्'का कितना महत्त्व है? इसी ' ओम् ' के अ, उ, म् ' तीन अक्षर ब्रह्मा, विष्णु, महेश माने जाते हैं ।
' ओं खं ब्रह्म ' ( यजुर्वेद - वाजसनेयसंहिता ४०।१७ ) यहाँपर आदित्य - स्थित ब्रह्मको. ' ओम् ' के नामसे कहा गया है । इसीलिए ' छान्दोग्य उपनिषद्'की आदिमें ' ओम् ' की उपासना कही गई है - ' ओम ' इत्येतद् अक्षरमुद्गीथमुपासीत, ओम् इति हि उद्गायति ' ( -1१1१ )
अथर्ववेद - ' प्रश्नोपनिषद् ' में कहा है- ' यः पुनरेतत - त्रिमात्रेणां ओम् इत्येतेनैव अक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत, स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः यथा पादो- ( काको ) दरः [ सर्पः ] त्वचा विनिर्मुच्यते; एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः, स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकम् ( ५५ ) यहाँ पर ' ओम् ' अक्षरसे परमात्माका ध्यान करनेसे पापोंका हट जाना कहा है । ' ऋग्भिरेतं, यजुर्भिरन्तरिक्षं, स सामभिर्यत्तत् कवयो वेदयन्ते । तमोङ्कारेणैव आयतनेन अन्वेति '. ( ५७ ) यहाँपर ओङ्कार के द्वारा तीन - वेदों के फलकी प्राप्ति कही है ।.
कृष्णयजुर्वेद — तैत्तिरीयोपनिषद् ' में कहा है- ' ओम् ' इति ब्रह्म, ओम् इति इदं सर्वम् ' ( १/८/१ ) यहाँपर भी ' ओम्'को ही सब - कुछ कहा है; तथा ' ओम् ' कहकर ही अग्निहोत्र आदि करना कहा है ।
... ' ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवा अघि विश्वे निषेदुः । 882यस्तन्न वेद, ऋचा किं करिष्यति, य इत् तद् विदुः, ते इमे समासते ' ( ऋग्वेद - शाकल्यसं ० १।१६४ ३६, अथर्ववेद - शौनकसं ० ६।१०।१८ ) इस मन्त्रके कई अर्थ किये जाते हैं । एक अर्थ ' ओम् ' -परक भी है । जैसा कि – ' निरुक्त ' ( १३।१०।१ ) में लिखा है - ' कतमत् तदेतद् अक्षरम्? ओम् इत्येषा वाग् इति शाकपूणिः ' । यहीं श्रीयास्काचार्यने ब्राह्मणभागका प्रमाण भी दिया है - ' एतद्ध वै एतदक्षरम्, यत् सर्वां त्रयीं विद्यां प्रति - प्रति ' इति । इसपर श्रीदुर्गाचार्यने भी अपनी वृत्ति में ' ओंकार एव इदं सर्वम् ' यह प्रमाण भी उद्धृत किया है । इसी प्रकारका ‘ तैत्तिरीयोपनिषद् ' का प्रमाण पूर्व उद्धृत किया ही जा चुका है ।
उक्त - अर्थमें ऋगादि - वेदोंके सारस्वरूप ' ओम् ' अक्षरमें ही सब देवताओंका निवास माना गया है । उसके ज्ञान न रखनेसे तो ऋगादि सब वेदोंकी विफलता बताई गई है । उसके ज्ञानसे ही वेदोंकी भी सफलता मानी गई है ।
' श्रीसनातनधर्मालोक ' के अभिज्ञ - पाठकों ने ' ओम् ' का महत्त्व देख लिया । सब शास्त्र इसकी महिमासे ओत - प्रोत हैं । पुराणों का तो नाम लेना ही पुनरुक्त है । वेदके सभी सिद्धान्तोंका जनताके पास पहुँचानेका श्रेय पुराणोंको ही है; क्योंकि — इन्होंने वेदकी कठिन- बातोंको सरल तथा सरस प्रकारोंसे सबके समक्ष प्रस्तुत किया है । ' ओम् ' की महत्ता और भी देखिये-
' ओम् ' अविकारी अक्षर ।
' ओम् ' का आदि अक्षर ' अ ' है । व्याकरणकी सन्धिकी
883' प्रोम् ' का महत्त्व
चक्कीके पाटमें पड़कर ‘ अचू ' पिस जाते हैं, दीखते ही नहीं; अथवा विकृत हो जाते हैं; पर ' ओम् ' यह ब्रह्मका नाम है, यह भला व्याकरणमें भी क्यों न अविकृत रहे? अचूके सामने ' यो ' पड़ा हुआ हो तो वह ' औ ' इस वृद्धिरूपमें विकृत हो जाता है । वृद्धि भीतो विकृति होती है । खींचकर कानोंकी वृद्धि कर दी जाय; तो वे भी तो विकृत लगते हैं । पर यदि ' ओम् ' रूपमें वही ' ओ ' अचूके सामने आ जाए; तो उसीका रूप रह जाता है । जैसे कि - ' शिव + ओम् = शिवोम् ' । अर्थात् वृद्धि सन्धि ' औ ' न होकर पररूप ' ओ ' ही रहेगा । इस प्रकार अन्य अक्षरोंकी सन्निधि में भी ' ओम् ' अपनी मात्रारूप में ही रहता है ।
' ओम् ' अव्यय - ब्रह्म ।
अन्य बात यह है कि — ' ओम् ' यह अव्यय - शब्द है,. अव्यय- ब्रह्म है । अव्ययका लक्षण प्रसिद्ध है - ' सदृशं त्रिषु लिंगेषु सर्वासु च विभक्तिषु । वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ' । यह ‘ अथर्ववेद - गोपथब्राह्मण ' ( १ । १ । २६ ) की श्रुति है । यह वहाँपर आई भी ' ओम् ' केलिए ही है । पहले वहाँ अवतरणिका दी गई है- ' निपातेषु चैनं वैयाकरणा उदात्तं समामनन्ति, तद् अव्ययीभूतम् । अन्वर्थवाची शब्दः, न व्येति कदाचन ' यह कहकर उक्त श्रुति दी गई है । सो यह शाब्दिक - अव्यय भी है, वास्तविक अव्यय भी । पुंलिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग, नपुंसकलिङ्ग तीनों लिङ्गोंमें यह समान है । पुरुष, स्त्रियों तथा नपुसकोंमें भी वही ' ओम् ' - ब्रह्म समानरूपसे व्यापक है । प्रथमासे सप्तमी तककी सब विभक्तियों में भी यह 884शब्द समान है, और ' ओम् ' - ब्रह्म भी संसारके सब विभागों- ( विभक्तियों ) में समानरूपसे व्यापक है । एकवचन, द्विवचन, बहुवचन तीनों वचनोंमें यह शब्दरूपमें समान है, ब्रह्मरूपमें ' ओम् ' वाच्य, तात्पर्य, लक्ष्य, व्यङ्ग्य इन वचनों में भी समान- रूपसे व्यापक है । यह ' ओम् ' शब्द भी ' न व्येति ' भिन्नतारूप- विकारको प्राप्त नहीं होता; ' ओम् ' - ब्रह्म भी विकारको प्राप्त नहीं होता ।
ब्राह्मणभागात्मक- अथर्ववेद ( गोपथ ब्राह्मण ) में. भी ' ओम् ' की बहुत महिमा कही गई है । हम उसे अंशतः उद्धृत करते हैं । जब ब्रह्माजी की उत्पत्ति कमलसे हुई, तो ब्रह्माजीने सोचा- ब्रह्म ' ह वै ब्रह्माणं पुष्करे ससृजे । स खलु ब्रह्मा सृष्टः चिन्तामापेदे – केन · अहम् एकेन अक्षरेण सर्वांश्च कामान्, सर्वांश्च लोकान्, सर्वांश्च देवान्, सर्वांश्च वेदान्, सर्वांश्च यज्ञान्, सर्वांश्च शब्दान्, सर्वाश्च व्युष्टीः, सर्वाणि च भूतानि स्थावर - जङ्गमानि अनुभवेयम् इति । ( मैं किस प्रकार एक अक्षर से सब कामनाओं, सब देवताओं, वेदों, यज्ञों तथा सब प्राणियोंका अनुभव करू ) स ब्रह्मचर्यमचरत् ७.,. स ओम् - इत्येतद् अक्षरमपश्यत् ' ( १ | १ | १६ ) ' ब्रह्मचर्य कर के ब्रह्माजीने इसी ' ओम् ' अक्षर को देखा, जो सर्वव्यापी, सर्वविभु, चतुर्मात्र, अयातयाम- ब्रह्मरूप था ।
उसकी प्रथम मात्रामें ब्रह्माजीने ऋग्वेद, पृथिवीलोक ( १७ ), द्वितीय- मात्रा में यजुर्वेद और अन्तरिक्ष लोक ( १८ ), तृतीय- मात्रा में सामवेद और द्युलोक ( १६ ), चतुर्थ- मात्रा से अथर्ववेद ( २० ) 885मकार की मात्रा से इतिहास - पुराणका अनुभव किया ( २१ ) । अबं इस ' ओम् ' का माहात्म्य देखिये - ' तदेतद् अक्षरं ब्राह्मणो यं काममिच्छेत्, त्रिरात्रोपोषितः, प्राङ्मुखो, वाग्यतो, बर्हिषि उपविश्य सहस्रकृत्व आवर्तयेत्, सिध्यन्ति अस्य अर्थाः, सर्व- कर्माणि च ' ( गोपथ १११।२२ ) ( जो इस ओङ्कारका एक सहस्रवार जप करे, मुख पूर्व में हो, बोले - चाले नहीं, तीन रातका उपवास किये हो, कुशा पर बैठा हो; उसके मनोरथ सिद्ध होते हैं । ) यहाँ- परं प्रसक्तानुप्रसक्त पूर्वदिशाकी ओर मुख करनेका तथा कुशका महत्त्व भी सिद्ध हो गया । तभी श्रीपाणिनि - द्वारा. अष्टाध्यायी- निर्माणके समय महाभाष्यकारने पूर्वदिशाकी ओर मुख करके तथा हाथ में कुश पहिनकर बैठना कहा है- ' प्रमाणभूत आचार्यो दर्भ- पवित्रपाणिः, शुचौ अवकाशे, प्राङ्मुख उपविश्य सूत्राणि प्ररणयति स्म । ` तत्र अशक्यं वर्णेनापि अनर्थकेन भवितुम् ' ( १ | १ | ३ | १ )
' ओम् ' का सर्वसाधारणस्थलमें अप्रयोग ।
इस प्रकार जब कि सनातनधर्मके ग्रन्थ ' ओम् ' की महिमासे भरे पड़े हैं; फिर सनातनधर्मियोंकी पत्रव्यवहार में, वा ग्रन्थकी आदिमें ' ओम् ' लिखनेसे उदासीनता देखकर, उनके द्वारा ' श्रीःका -प्रयोग देखकर बहुत से धर्मप्रेमियोंको आश्चर्य मिश्रित खेद: होता है । पर सनातनधर्मी जो इसका सर्वसाधारण - स्थल में प्रयोग नहीं करते; इसका कारण उनकी इसमें अश्रद्धा हो - यह बात नहीं; किन्तु वे उसको परम - पवित्र मानते हैं । परम पवित्रको सर्वसाधारण- स्थलमें, सर्वसाधारण - रूपसे प्रयोग में नहीं लाया जाता । सर्वस्मृतिमूर्धन्य,
886श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )
६८६
वेदानुगत, सृष्ट्यादि - प्रणीत ' मनुस्मृति ' में कहा है- ' प्राक्कूलान्
पवित्रैश्चैव पावितः । प्राणायामैस्त्रिभिः पूतः, तत पर्युपासीनः ' ( २।७५ ) ' पूर्वाग्र - कुशों को बिछाकर उनपर बैठे, और पवित्रों हो जावे, तब ओंकार के प्रयोगके योग्य होता है । ओंकारमर्हति
( कुशों ) से अपनेको मार्जन कर पवित्र होवे, तीन - प्राणायामों से जब पवित्र ) के पीछे दिये प्रमाण में भी यही बात ‘ गोपथब्राह्मण ' ( अथर्ववेद
प्रत्यक्ष ही है ।
इस कारण सनातनधर्मियोंका यह हार्दिक आशय है कि जब कि वेदपर भी अधिकार- अनधिकारका प्रतिबन्ध है; तो यह अक्षर तो सब वेदोंका नवनीत एवं सर्वश्रेष्ठ माना जाता है; तब इसकी सर्वसाधारणता कैसे की जाय? उसे अनधिकारी ग्रहण न करें, उसे सर्वसाधारण पर न गिरा दिया जाय; अन्यथा ' अतिपरिचयादवज्ञा ' इस न्याय से उसका निर्दिष्ट - फल भी नहीं मिला करता; अतः वे इसका सर्व- साधारण - स्थल पर तथा सर्वसाधारण अवस्था में वैधरूपेण प्रयोग में लाना प्रतिसमय उसका लिखना कहना उचित नहीं समझते ।
किसी वस्तुको सर्वसाधारण से छिपाना ( जैसे अपनी धर्मपत्नी आदिका ), इससे उनका उसमें प्रेम नहीं झलकता, किन्तु अत्यन्त - गाढ अनुराग सूचित होता है । तभी तो विशिष्ट- मन्त्रोंकेलिए सनातनधर्मी कहते हैं- ' गोपनीयं, गोपनीयं, गोपनीयं प्रयत्नतः ' । गुप्त करने से तो उस वस्तुपर प्रेम बढ़ता ही है, घटता नहीं । ' मन्त्र ' शब्द भी ' मन्त्रिं गुप्तपरिभाषणे ' ( चु.आ.से. ) धातुसे बना है, जिसका अर्थ ही ' गुप्तरूपसे बोलना, विचारना ' है;
887‘ ओम् ' का महत्त्व
तब यह ' ओम् ' तो मन्त्रराज है । यही उनका श्रोङ्कारको सर्व- साधारण - स्थलमें प्रयुक्त न करनेका वास्तविक दृष्टिकोण है, अन्य उसके प्रति उदासीनता आदि कारण नहीं । सब शास्त्रीय - कर्म- विशेषों के आरम्भ में तो वे उसका प्रयोग मानते ही हैं । तभी तो सनातनधर्मकी सन्ध्यामें लिखा है- ' ओंकारस्य ब्रह्मा ऋषिर्गायत्री छन्दोऽग्निर्देवता, शुक्लो वर्णः, सर्वकर्मारम्भे विनियोगः ' ।
' ओम् ' की वास्तविक आकृति ।
' ओम् ' को एक अक्षर माननेपर तो ' वर्णात् कार: ' इससे ‘ कार ’ प्रत्यय हो जाता है; पर वर्णसमुदाय माननेपर ' उच्चैस्तरां वा वषट्कारः ' ( १।२।३५ ) इस पाणिनिके निर्देशसे समुदायको भी ' कार ' प्रत्यय होकर ' ओङ्कार ' शब्द बन जाता है । इसकी वास्तविक एवं विशुद्ध आकृति तो ' ओम् ' यह है । इसके समक्ष कोई भो अक्षर न पड़ा हुआ हो; तो ' ओम् ' ही लिखना वेदाङ्ग - सम्मत है । सामने अच् अक्षर पड़ा हो; तब भी ' ओम् ' ही लिखना व्याकरणानुशिष्ट है 1
। जैसे कि ‘ ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ( गीता ८।१३ ) ' तस्माद् श्रोमित्युदा- हृत्य ' ( १७ | २४ ) यदि सामने व्यञ्जन वर्ण ( हल्प्रत्याहार ) पड़ा हो, तो ' म्'को अनुस्वार कर देना चाहिये, अर्थात् वहां ' च ' लिखा जाना व्याकरणानुगृहीत है | पर सामने अच् अक्षर होनेपर अथवा कोई भी अक्षर सामने न होनेपर ' त्र ' लिखना व्याकरण - विरुद्ध है ।
मूल ' म् ' ही होता है, अतः गोपथ ( १।१।२५ ) में लिखा है—
अनुस्वारका
' मकारं व्यञ्जनमित्याहुः ' पर ' ॐ ' यह तो शिवलिङ्गकी अथवा
प्रणवात्मक प्रतीक प्राकृति - विशेष भी है, गणेश आदि पांच - देवोंकी
888श्रीसनातनधर्मालोक ' ( १ )
' अर्थात् यह एक चित्र ( मूर्तिविशेष ) है । अत ' ॐ ' इस प्रकार . लिखनेवाले, वेदाङ्गके अनुसार अशुद्धि जानकर भी जानबूझकर -यदि इस आकृतिको लिख रहे हैं; तो समझना पड़ेगा कि – वे ' ॐ ' • इस रूप में गणेश की मूर्ति लिख रहे हैं; इस विषय में ' श्रीगणेशका ' मङ्गलाचरण ' आरम्भिक निबन्ध देखें । उसमें तो अक्षरात्मकता न होने से व्याकरणका प्रतिबन्ध हो ही नहीं सकता ।
श्री पं ० दुर्गादत्तजी त्रिपाठी- महोदय ( काशी ) ने लिखा है कि - ' प्र ` ते इन्द्रं! पूर्व्याणि ' ( ऋ ० १०१११२८ ) में कहा गया है - शिव - पार्वती एक बार प्रणव - चित्रकी ओर एकाग्रता से ध्यान कर रहे थे । उनके संकल्पके बलसे उस चित्रसे परब्रह्मतत्त्व गणपति रूप से प्रादुर्भूत हुआ, जिसमें गजका गण्डस्थल, शूर्पकर्ण, शुण्डा - दण्ड, चन्द्रकला की आकृति थी 1 । श्रीगणपति ही परब्रह्म हैं । जैसा कि - गणपत्युप- निषद् में लिखा है । श्रीगणेशके परब्रह्म होने से ' तस्य वाचकः प्रणवः ' ( योगदर्शन १।२६-२८ ) उसका वाचक कारको बताया गया है । वाच्य वाचकका अभेद हुआ करता है । तब सर्वकर्मा - रम्भमें ॐकारका उच्चारण गणपतिका पूजन है । सो ' तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः । प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः ' ( गीता १७१२४ ) ' दानयज्ञतपः - स्वाध्यायजप - ध्यानसन्ध्योपासना- प्राणायाम- होमदेवपित्र्यमन्त्रोच्चारण, ब्रह्मारम्भादीनि प्रणवमुच्चार्य प्रवर्तयेत् ' ( शांठ्यायन ) इत्यादि तथा ' गणेशः सर्वदेवानामादौ पूज्यः ' सदैव हि ' ( रुद्रकल्पद्रुम ) ' आदौ विनायकः पूज्यो ह्यन्ते च कुलदेवता ' - ( बहु चपरिशिष्ट ) ' सर्वकर्म - समृद्ध्यर्थमादौ पूज्यो विनायकः '
889" ओम् ' का महत्त्व मद
( लिङ्गपुराण ) इत्यादि शास्त्र - वचनोंकी इसीसे एकवाक्यता हो जाती है । अतः सर्व कर्मोंके आरम्भमें ' ॐ का उच्चारण तथा स्मरण गणपतिका ही संक्षिप्त - पूजन है । अतः उक्त ऋग्वेदके अग्रिम- ( १०।११२ / ९ ) मन्त्रमें गणपतिका वर्णन किया है ।
कई लोग कहते हैं- " गणेशकी उत्पत्ति ' ३ ' से हुई है; क्योंकि प्रारम्भमें वही मंगलाचरण - रूप में लिखा जाता है, उसमें ' अ ' शिर और शरीर है, आरम्भिक भाग सूड है, ऊपरकी मात्रा गणेशका एकदन्त है, और अनुस्वारका भाग उसका मोदक है । प्लुत ( ३ ) का चिन्ह उसका मूषक वाहन है । इस प्रकार ' ३ ' से ही मोदकभोजी, मूषकारोही और एकदन्तधारी - गजाननकी उत्पत्ति हुई है । ' ३ ' लिखते - लिखते और उसकी वास्तविक - आकृतिको भुलानेसे गजानन बन गया है " - - पर इस कल्पनामें कुछ थोड़ा - सा • भेद कर दिया जाता है । वस्तुतः गणेशकी ही एक आकृति ' ॐ ' भी है, जैसे कि गणेशपुराण में लिखा हैं - ' ॐकाररूपी भगवान् यो वेदादौ प्रतिष्ठितः । यं सदा मुनयो देवाः स्मरन्तीन्द्रादयो हृदि । ‘ ओंकाररूपी भगवानुक्तस्तु गणनायकः । यथा सर्वेषु कार्येषु पूज्यतेऽ- सौ विनायकः ' । सो ' गणपति ' तो एक देव सिद्ध हो ही गये । ॐकार उन्हींका एक संक्षिप्त - संस्करण वा संक्षिप्त प्रतीक वा मूर्ति सिद्ध हुआ ।
तो नहीं बताई गई किन्तु उसकी मूर्ति बताई गई है । . यहां भूल
वेदका ‘ यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः ' ( ऋ. १।१६४ / ३६ )
* इसमें है । अर्थात् इस ' ओम् ' में सब देवता विराजते हैं । तब यह मन्त्रांश साक्षी भूल नहीं; किन्तु इसमें वैदिकता है ।
890श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 )
इसका संकेत हम ' श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ' निबन्ध में भी कर चुके हैं । यजुर्वेद वा ० सं ० ( ४०।१५-१७ ) मन्त्रके भाष्य में उवट - महीधरने इसे आदित्य - स्थित ब्रह्मकी ' प्रतिमा ' माना है । उसपर भला व्याकरणका नियन्त्रण कैसे हो सकता है? इसपर बृहद्योगियाज्ञवल्क्य - स्मृतिका यह वचन विचारणीय FRACKING ' अनुस्वारो मकारस्तु ओङ्कारस्य शिरो यदा । प्रकृतिः साधनं कृत्वा व्यञ्जनादौ तु लुप्यते ' ( २८१ )
' ओ ३ म् ' लिखने में तीन पक्ष ।
अब ' ओम् ' की एक आकृति ' ओ ३ म् ' इस प्रकार प्लुत - सहित भी है । पर इस प्लुत - सहितका भी सर्वत्र प्रयोग उचित नहीं । यहाँ पर ' श्रमभ्यादाने ' ( ८ | २ | ८७ ) इस पाणिनिसूत्र से अभ्यादानमें प्लुत होता है । जैसा कि — गोपथब्राह्मण में भी कहा है- ' तिस्रो मात्राः अभ्यादाने हि सवते ' ( १।२७ ) अभ्यादान सबसे पूर्वके आरम्भको कहते हैं । वह सबसे पूर्वका आरम्भ भी वेदका ही इष्ट है; क्योंकि- ' ओम् ' वेदका ही सारस्वरूप है । तभी ' सिद्धान्तकौमुदी ' में इसका लोकमें उपयोग न होनेसे इस सूत्रको वैदिक - प्रक्रियामें रखा गया है ।
इसी कारण हो श्रीभट्टोजिदीक्षितने इसका उदाहरण ‘ ओ ३ म्- अग्निमीले पुरोहित - ' यह वेदका ही रखा है । काशिकाकार श्रीवामन - जयादित्यने भी यही उदाहरण लिखा है । इससे सिद्ध हो रहा है कि — इस ' ओ ३ म् ' का प्रयोग वेदसंहिताका सबसे पूर्वका आरम्भ करनेके समय किया जाना चाहिये, सर्वत्र इसे नहीं
891' ओम् ' का महत्त्व
लिखना चाहिये । ' अग्निमीले ' यह मन्त्र ' ऋग्वेदसंहिता'का सर्वा- दिम है । अतः उसके पूर्व ' ओ ३ म् ' का प्रयोग ठीक ही है ।
बीसवीं शताब्दी के वेदानुरागी रूपसे प्रसिद्ध, आर्यसमाज - प्रवर्तक स्वा ० दयानन्दजीने भी अपने ' वेदाङ्गप्रकाश ' के ' सन्धिविषय ' के ' संज्ञाप्रकरण ' ४ र्थ पृष्ठमें उक्त सूत्र के उदाहरण ' ओ ३ म् इषे त्वा ऊर्जे ` त्वा ' ‘ ओ ३ म् अग्निमीले पुरोहितम् ' यह दो दिये हैं । यह दोनों ही वेदसंहिताओंके आरम्भके हैं । पहला उदाहरण यजुर्वेदवाजसनेयी- संहिताका सर्वादिम है, दूसरा ऋग्वेदशाकलसंहिताका सर्वादिम है । स्वामीजीने उक्त सूत्रके ‘ अभ्यादान ' पदका अर्थ भी ' आरम्भ ' ही किया है । इससे दो बातें सिद्ध हो रही हैं, एक यह कि — इस ' ओ ३ म् ' का प्रयोग केवल वेदके आरम्भमें किया जावे, सर्वसाधारण- स्थलपर नहीं । दूसरा यह कि - वेदके प्रत्येक मन्त्रके साथ जो ' ओम् ' बोला जाता है, न तो वहाँ प्लुत - सहित ' ओ ३ म् ' लिखना चाहिये, न ही वेद - संहिताओंके मण्डल, अष्टक, अध्याय, आर्चिक, पर्व, काण्डोंके आरम्भिक मन्त्रोंमें; क्योंकि वह आरम्भ होनेपर भी सर्वादिम - आरम्भ नहीं । तभी तो अभ्यादानके प्रत्युदाहरणमें ' सिद्धान्तकौमुदी यह उदाहरण दिया गया है । यहाँ आरम्भ
' में ' ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ' तथा काशिकामें ' ओमित्ये- तदक्षरमुद्गीथमुपासीत '
होने पर भी सर्वादिम - आरम्भ नहीं ।
प्रारम्भ किया में इसे लम्बे स्वर में बहुत
इसका तत्त्व यह है कि - जब यज्ञों में वेद संहिताओंका उच्चारण
जाता था; तब उससे पूर्व ' ओ ३ म् ' इस प्रकार प्लुत निमान्त्रता से बोला जाता था । त्रिमात्रता
892A श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )
देर तक बोलना पड़ता है । इससे आस - पास बैठे हुए यज्ञसम्बद्ध सब अधिकारियोंको पता लग जाता था कि अब वेदसंहिताका आरम्भ होगया है । इसी कारण उस प्रारम्भमें वहाँ ' ओ ३ म् ' लिखा जाता है । वह लिखनेकेलिए नहीं है, किन्तु वहाँ वैसा बोलने के लिए है । अतः आजकल जो वेदसे इतर स्थल लोकमें, तथा सर्वादिम आरम्भ न होनेपर भी जो कि ' ओ ३ म् ' लिखा जाता है, यह अनार्ष व्यवहार है । प्लुत तो लिखना भी व्यर्थ है, वह बोलनेका द्योतक है; पर आजकल जो कि लिखने में प्रयुक्त किया • जाता है, वहाँ बोलने की कोई बात ही नहीं होती । अतः प्लुत - सहित उसे सर्वसाधारण - स्थलपर बोलना वा लिखना शास्त्रीय नहीं ।
दूसरा पक्ष |
यह एक पक्ष है, अब दूसरा पक्ष दिया जाता है । वह यह है कि — यह आवश्यक नहीं कि - प्लुत- सहित ' ओ ३ म्'को आरम्भ में ही लिखा जावे, और वह भी वेदमें ' | ' श्रमभ्यादाने ' ( पा ० ८२८० ) के ' अभ्यादान'का आरम्भ यह अर्थ ' वृत्ति ' में ही लिखा है, यह अर्थ सर्वसम्मत नहीं । श्रीनागेशभट्टने उक्त सूत्रपर ' शब्देन्दुशेखर ' वैदिक - प्रक्रिया में लिखा है कि- ' न सुब्रह्मण्याख्यायां ' ( १।२।३७ ) इस सूत्रमें कैयटने ' सुब्रह्मण्य़ोम् ' इसमें ' ओमभ्यादाने ' से प्लुतोदात्त नहीं माना । उसका आशय यह है कि - ' इस सूत्रके ' अभ्यादान ' पदका अर्थ ' यज्ञकर्म ' है, ' प्रारम्भ ' नहीं । यदि उसका अर्थ ' प्रारम्भ ' ही होता; तो ' सुब्रह्मण्योम् ' में प्रारम्भ न होने से प्लुतोदात्त ..की प्राप्ति ही नहीं थी; तब उस प्लुतोदात्तकी अप्राप्त्यर्थ श्रीकैयटको 893' ' अभ्यादान ' का ' अयज्ञकर्म ' अर्थ करनेकी क्या आवश्यकता थी? इससे श्रीनागेशने यह सिद्ध किया हैं कि उक्त सूत्र से ' ओम्'को प्लुतोदात्त ' अयज्ञकर्म ' में होता है, यज्ञ - कर्म में नहीं; और प्रारम्भ में ही प्लुत देना आवश्यक भी नहीं । मध्य वा अन्तमें कहीं भी ' ओम् ' आ जावे; तो उसमें प्लुत दिया जा सकता है । इसपर श्रीनागेशने उपपत्ति भी दी है कि - इसीलिए ही जपमें भी शुद्ध- प्रणवको प्लुत ही जपते हैं, पर ' सुब्रह्मण्योम् ' में यज्ञकर्म होनेसे ‘ ओमभ्यादाने ' वाला अयज्ञकर्मपरक - प्लुतोदात्त न हुआ ।
इति सूत्रे कैयटस्तु सुब्रह्मण्योम्
यहाँपर श्रीनागेशभट्टके यह शब्द हैं- ' अभ्यादानम् - आरम्भः,
' ' इत्यत्र ' श्रमभ्यादाने ' इति प्लुतों- ` तत्र वर्तमानस्य इत्यर्थ इति वृत्ति: । ' न सुब्रह्मण्याख्यायाम् ' ( १।२।३७ ) दात्तत्वं
' न भवति, तस्य अयज्ञकर्मविषयत्वात् ' इति वदन् अप्रारम्भेपि अनेन प्लुतमाह । अत एव [ तस्य सूत्रस्य यज्ञकर्मविषयत्वादेव इति भैरवः ] शुद्ध - प्रणवजपेपि तं प्लुतमेव जपन्ति । ' अभ्यादानं'- पदेन ' अयज्ञकर्म ' उच्यते - इति तदाशयं वर्णयन्ति ' ।
' अयज्ञकर्मणि । न च वृत्ति-
इसपर भैरवमिश्रने ' चन्द्रकला ' में यह समर्थन लिखा है—
विधीयमानः '
श्रमभ्यादाने ' इति प्लुतः प्रारम्भेपि भवति, नतु ' अभ्यादान ' पदस्य आरम्भार्थकत्वमिति
सम्मतमेव ' अभ्यादान ' पद्स्य आरम्भार्थकत्वमस्तु — इति वाच्यम,
प्रारम्भे प्लुतोदात्तस्य ' ओ ३ म् ' इत्यत्र सिद्धावपि जपे
894तृतीय पक्ष ।
पर हमें वृत्तिकारका ही मत ठीक जँचता है; श्रीनागेश भट्टका
। इसमें कारण यह है कि - एक तो श्रीकैयटने ' तस्य ( ' ओम - नहीं
भ्यादाने ' इत्यस्य ) अयज्ञकर्मविषयत्वाद् ' इत्याहुः ' यहाँ पर ' इति आहु: ' इस शब्दसे अपनी इस पक्ष में रुचि सूचित की है । यह किन्हीं अन्योंका मत उसने दिखलाया है, अपना नहीं । दूसरा श्रीकैयट ने उन दूसरोंके मतानुसार ‘ ओमभ्यादाने ' इस सूत्र को ही अयज्ञकर्मविषयक बताया है, किन्तु ' अभ्यादानका ' ' अयज्ञकर्म ' अर्थ नहीं दिखाया । तब श्रीनागेशका ' अभ्यादान ' पदेन -'अयज्ञकर्म उच्यते ' यह आशय दिखलाना निर्मूल हुआ, क्योंकि – ' श्रमभ्यादाने ' ( ८२/८७ ) इस सूत्रसे अग्रिम सूत्र ' ये यज्ञकर्मणि ' ( ८२८८ ) है ।
यदि ‘ अभ्यादान ' पदका अर्थ ही ' अयज्ञकर्म ' होता; तो अग्रिम सूत्रमें ' यज्ञकर्म ' शब्द साक्षात् होने से पूर्व - सूत्र में ' अभ्यादाने ' पद न होनेपर भी स्वतः यज्ञकर्मकी व्यावृत्ति हो जाती; तब ' अभ्यादान ' पद रखना ही व्यर्थ हो जाता । पर यदि वृत्तिके अनुसार ' अभ्यादान ' का अर्थ प्रारम्भ माना जावे, जैसा कि — ' अमरकोष के ' स्याद् अभ्यादान मुद्धात आरम्भ: ' ( ३।२।२६ ) इस प्रमाण में भी ' लिखा है, ' आभिमुख्येन प्रादानं ' यह व्युत्पत्ति भी इसकी इसी अर्थको संकेतित करती है, ' अयज्ञकर्म ' अर्थ में यह सम्बन्ध नहीं बैठता । काशिका - आदिमें भी ' अभ्यादानम् - प्रारम्भः ' इत्यादि उल्लेखसे इसी अर्थकी स्वीकृति प्रत्यक्षदृष्ट है; तो अग्रिम सूत्रमें ' यज्ञकर्मणि ' होने से यह सूत्र ' अयज्ञकर्म ' विषयक भी सिद्ध हो 895जाता है, और प्रारम्भार्थक ' अभ्यादान ' पद भी सार्थक हो जाता है; और फिर श्रीनागेशभट्टके अनुसार ' ओम् ' के अयज्ञकर्म- विषयक जपनमें भी उसके प्लुतत्वमें कोई बाधा नहीं रह पाती । अतः वृत्तिकारके अनुसार ' अभ्यादान ' का प्रारम्भ अर्थ ही ठीक है । इस प्रकार ‘ सुब्रह्मण्योम्’में प्रारम्भ न होनेसे प्लुतोदात्तकी प्राप्ति ही नहीं है । उसे हटानेकेलिए बलात् ' अयज्ञकर्म ' अर्थ करनेकी आवश्यकता भी नहीं पड़ती ।
शेष बात यह है कि यदि यह सूत्र अयज्ञकर्म - विषयक माना जावे; तो इससे यज्ञकर्मके आरम्भमें प्लुत नहीं हो सकेगा; पर यज्ञोंमें वेदका जब आरम्भ होता है; तो ' ओ ३ म् ' प्लुत ही बोला जाता है; वेदका विषय भी यज्ञ ही सर्वसम्मत है, अतः ' ओमभ्या- दाने ' इस सूत्रको यज्ञकर्म अथवा यज्ञकर्म दोनोंसे स्वतन्त्र वा दोनों में सामान्य ही समझना चाहिये । हाँ, प्रारम्भ तो अवश्य अपेक्षित होना चाहिये ।
श्रीनागेशका जपको अयज्ञकर्म बताना भी ठीक नहीं; अन्यथा ' यज्ञानां जपयज्ञोस्मि ' ( गी ० १०।२५ ) इस भगवदुक्ति से विरोध पड़ेगा । जोकि — श्रीनागेशभट्टने प्रणवका जप प्लुतयुक्त माना है; यह भी कोई पूर्व बात नहीं, ' प्रणव ' कहते ही त्रिमात्र ( प्लुतसहित ) ' ओ ३ म्'को हैं । जैसेकि महाभाष्यकारने कहा है- ' पादस्य वा, अर्धर्चस्य वा अन्त्यमक्षरमुपसंहृत्य तदाद्यक्षरशेषस्य स्थाने त्रिमात्र- मोंकारं, त्रिमात्रमोकारं वा विदधति, तं प्रणवमाचक्षते ' ( ८२८८ ) ।
फलतः इस पक्षमें ' ओम्'को अयज्ञकर्म में प्लुत प्रसक्त तो हो
896श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )
८६६
सकता में लिखा है - ' त्रिमान्नश्च प्रयोक्तव्यः
है, पर वह प्रारम्भ में ही होगा; अन्य - स्थल में नहीं । जैसे कि — बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति
कर्मारम्भेषु सर्वदा ' ( २।५ ), मदनरत्नमें श्रीव्यासका वचन भी कहा - ' त्रिमात्रस्तु प्रयोक्तव्यः कर्मारम्भेषु सर्वदा ' । और फिर प्लुत करना वैकल्पिक भी है । ' ओमभ्यादाने ' ( २८७ ) से. पूर्वके
प्राचाम् ' ( २६ ) इस सूत्र में ' गुरोरनृतोऽनन्त्यस्याप्येकैकस्य
श्रीभट्टोजिदीक्षितने लिखा है - " इह ' प्राचाम् ' इति योगो विभज्यते, तेन सर्वः प्लुतो विकल्प्यते ' अर्थात्- ' प्राचाम् ' सूत्रको पृथक कर देने से सभी प्लुत वैकल्पिक हो जाते हैं । ' प्राचीनोंके मतमें प्लुत होगा, अर्वाचीनों के मत में नहीं । इस प्रकारका एक वार्तिकभी है - ' सर्व एव प्लुतः साहसमनिच्छता विभाषा वक्तव्यः ' ( महाभाष्य ८२२६२ ) । अतः सर्वत्र ' ओ ३ म् ' इस प्रकार लिखना भी आवश्यक नहीं । यह तृतीय पक्ष है । गोपथ ब्राह्मण ( १।१।२५ ) के अनुसार. ऋग्वेदमें इस स्वरितोदात्त, यजुर्वेद में त्रैस्वर्योदात्त, सामवेद में दीर्घ- प्लुतोदात्त और अथर्ववेद में ह्रस्वोदात्त स्वर वाला माना है । यही बात बृहयोगियाज्ञवल्क्य स्मृति ( २७८-८१ ) में बताई गई है ।
वेद आदिका ' ओम् ' शब्द ।
एक अन्य बात विचारणीय यह है कि - यह ' ओम् ' जो इन वर्तमान चार - वेदसंहिताओंकी आदि में लिखा मिलता है; यह शब्द ' इन वेदसंहिताओं का अपना है; या इनमें प्रक्षिप्त अर्थात् साम्प्रदा- यिक है?? इस पर एक विचार यह है कि - वर्तमान चारों वेदोंकी ' संहिताएं परमात्मासे प्रोक्त मानी जाती हैं, पर चारों. संहिताओंकी 897ध्यादिमें ठहरा हुआ ' घोम् ' शब्द संहिता -मन्त्र के अन्तर्गत नहीं । पहले ऋग्वेद ( शाक ) संहिता को ही लीजिये । ' अग्निम् ' से लेकर ' धातमम् ' तकके मन्त्रमें गायत्री छन्द है; और २४ अक्षर हैं, कोई न्यूनता नहीं है; अतः स्पष्ट है कि - ' ओम् ' से संहिताका आरम्भ नहीं; किन्तु ' अग्निम् ' से है । इस कारण श्रीसायणाचार्यने भी ' सच ' [ संहिता - प्रन्थः ] ' अग्निमीले ' इत्यारभ्य ' यथा वः सुसहासति ' इत्यन्तः ' ' अग्नि ' शब्दसे संहिताका आरम्भ माना है । श्रीयास्कमुनि ने भी ' निरुक्त ' के सप्तमाध्यायमें उक्त मन्त्र ' ओम्'- रहित ही व्याख्यात किया है । आर्यसमाज प्रवर्तक स्वा ० दयानन्दजीने भी अपने ' ऋग्वेदसंहिता ' भाष्यके प्रारम्भ में ' अग्निमीले ' यहां से लेके ' यथा वः सुसहासति ' इस पर्यन्त ॠग्वेद ' ( पृ ० १ ) यह लिखकर ' ओम् ' को वेदसंहिताके अन्तर्गत नहीं माना ।
इसी प्रकार ' इषे त्वा ' यह यजुर्वेद ( वाज ० ) संहिताका आरम्भिक- मन्त्र है । इस मन्त्रकी आदिमें दीख रहा हुआ ' ओम् ' भी मन्त्रा- न्तर्गत नहीं । तभी महाभाष्यकारने आरम्भ में इन आरम्भिक वेद- ' मन्त्रोंकी आदिमें ' ओम् ' नहीं लिखा । इसी प्रकार ' सामवेद ( कौ ० ) संहिता ' के आरम्भिक मन्त्र ' अग्न आयाहि वीतये ' इस मन्त्रमें भी गायत्री छन्द है । अक्षर भी २४ पूरे हैं; तब स्पष्ट है कि- इसका ' ओम्'भी संहिता - मन्त्रसे पृथक् है । इसी प्रकार ' ये त्रिषप्ताः ' इस अथर्ववेद ( शौ ० ) संहिताके मन्त्रमें सबसे पूर्वं ठहरा ' ओम् ' भी
नहीं । इसमें अनुष्टुप् छन्द है । अक्षर भी ३२ पूरे हैं संहिताका
स्पष्ट है कि - यहाँ का ' ओम् ' भी संहितासे पृथक् है ।
898दह श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )
इस विषय में साक्षियां भी हैं । आर्यसमाजके प्रसिद्ध स्वा ० विश्वेश्वरानन्दजी तथा स्वा ० नित्यानन्दजीने इन वर्तमान चारों संहिताओंकी पदसूची बनाई है । इनसे संहिताके पद जाने जा सकते हैं; पर इन चारों पदसूचियों में ' ओम् ' शब्द ऐसा नहीं आया, जिसकी आरम्भिक सूची १।१।१ यह लिखी गई हो । प्रत्युत ' ऋग्वेदसंहिता ' की सारी सूची में ' ओम् ' शब्द ही नहीं । इसी प्रकार यास्कीय - निरुक्त तथा निघण्टुकी शब्दसूचीमें भी ' ओम् ' शब्द ही नहीं । इस प्रकार उक्त स्वामियोंकी ' सामवेदसं ० तथा अथर्ववेद - संहिताकी सूचीमें भी कहीं ' ओम् ' शब्द है ही नहीं ।
हाँ, यजुर्वेद - संहिताकी उक्ल - सूची में ' ओम'का स्थल संकेत २।१३, ४०।१५-१७ दिया है । इसमें पहला मन्त्र ' मनोजूतिर.. ओ ३ म्प्रतिष्ट ' है । इसमें हमारा प्रकृत ' ओम् ' नहीं है, यह स्वीकार- वाचक है, और यह मन्त्रकी आदिमें भी नहीं है । दूसरा मन्त्र ' तो स्मर ' ( ४०/१५ ) है, इसमें मन्त्रार्गत ' ओम ' अवश्य है, पर मन्त्रकी आदिमें नहीं । इस मन्त्रका आरम्भ तो ' वायुरनिल ' से होता है; हां, उत्तरार्ध की आदिमें तो है । तीसरा मन्त्र ' ओं खं ब्रह्म ' ( ४०/१७ ) है । यहां भी ' ओम् ' मन्त्रान्तर्गत ही है, पर मन्त्रके आरम्भ में नहीं! इस मन्त्रका आरम्भ ' हिरण्मयेन पात्रेण ' से है । इस ' ओं खं ब्रह्म ' को स्वतन्त्र मन्त्र माना जावे; तो अन्य बात है । पर इसकी संख्या ' हिरण्मयेन ' मन्त्रसे पृथक् नहीं; क्योंकि उक्त मन्त्र में आदित्य- मण्डलान्तर्गत - पुरुषको ही ' ओम् ' कहा गया है । अतः ' ओं खं ब्रह्म ' यह उक्त मन्त्रका शेष ही है ।
899' ओम् ' का महत्त्व
तथापि वह बात पूर्ण न हुई, अर्थात् वर्तमान वेदकी चार संहिताओंके आरम्भ में ' ओ ३ म् अग्निमीले ' ' ओ ३ म् इपे त्वा, ओ ३ म् अग्न आयाहि ', ' ओ ३ म् ये त्रिषप्ताः ' इनमें ठहरे हुए ' ओ ३ म् ' संहिताके नहीं - अर्थात् इन चारों - संहिताओंके आदिम - पद ' अग्निम्, इषे, अग्ने,. ये ' ही हैं, ' ओम् ' नहीं; यह पूर्व कहे प्रकारसे: सिद्ध हो चुका है
केवल हम ही यह नहीं कहते, किन्तु ' ओम् ' का महत्त्व मानने वाले आर्यसमाजके प्रवर्तक स्वामी दयानन्दजी भी इससे सहमत हैं । वे अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ' सत्यार्थप्रकाश ' में लिखते हैं- " ऐसे ही अन्य ऋषि - मुनियोंके ग्रन्थोंमें ' ओ ३ म् ' और अथ
' ' शब्द लिखे हैं, वैसे ही — ' अग्नि, इट्, अग्नि, ये त्रिषप्ताः ' ये शब्द चारों वेदोंकी आदिमें लिखे हैं, ( प्रथम - समुल्लास पृ ० १३ ) स्पष्ट है कि यहां वे इन शब्दोंको ही वेदसंहिताका आदिम - पद मानते हैं, ' ओम् ' को नहीं ।:
अब फिर प्रश्न है कि — ' सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति... ओमित्येतत् ’ ( १।२।१५ ) यह कृष्णयजुर्वेदीय ' कठोपनिषद् ' ' ओम्'की सत्ताकोः सभी वेदोंमें कहती है । स्वामी दयानन्दजीने ' सत्यार्थप्रकाश ' के द्वितीय पृष्ठ में लिखा है- ' देखिये वेदों में ऐसे प्रकरणोंमें ' ओम्'- आदि परमात्माके नाम हैं । यहांपर स्वामीजीने ' वेदों ' यह बहुवचन देकर चारों वेदोंमें ' ओम् ' की सत्ता मानी है । पर अब तो ' ओम् ' पद कहनेवाली केवल यजुर्वेद - वाजसनेयीसंहिता ही हुई; क्योंकि न हुईं; क्योंकि उनमें ' ओम् ' मिलता नहीं; और
केवल उसीमें ' ओम् ' मिलता है; चारों वेदसंहिताएँ तो
900श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )
६००
' ऋचो अक्षरे ' ( ऋ ० १ | १६४३६, अथर्व ० ६।१०।१८ ) इस मन्त्रका ' ओम् ' अर्थ करने में सबका ऐकमत्य नहीं । स्वामी दयानन्दजीने भी स ० प्र ० में ( पृ ० ४१ तृतीय समु ० ) तथा संस्कारविधि के ( २८४ पृष्ठ ) संन्यास - प्रकरण में उक्त - मन्त्रका ' ओम ' परक अर्थ नहीं किया । इधर कठोपनिषदुका उक्त वचन वादि - प्रतिवादि - सम्मत है; तब उस वचनकी सङ्गति कैसे हो?
इसपर यह जानना चाहिये कि - यहां पर ' सर्वे वेदाः ' कहा है, ' सर्वा वेदसंहिताः ' नहीं कहा । ' सर्वे वेदाः ' का अर्थ है ' सब वेद ' । सब वेद कितने हैं? चार हैं, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद । पर क्या ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद कहीं मिलते भी हैं? कहीं भी नहीं । आप आर्यसमाजके वैदिक यन्त्रालय अजमेरकी छपी वेद - पुस्तकें भी देख लीजिये, अथवा निर्णयसागर प्रेस, श्रीवेङ्कटेश्वर प्रेस बम्बई, विद्याविलास प्रेस काशी, भारतमुद्रणालय पारडी ( सूरत ) आदि प्रामाणिक यन्त्रालयोंकी मुद्रित वेद- पुस्तकें भी देख लीजिये- आपको ' ऋग्वेदसंहिता, यजुर्वेदसंहिता, सामवेदसंहिता, अथर्ववेद- संहिता ' छपी हुई मिलेंगी, ऋग्वेद - यजुर्वेद आदि छपे नहीं मिलेंगे । जहाँ ऋग्वेद, अथर्ववेद ये नाम छपे हैं उनके सम्पादक - प्रकाशकोंको वस्तुस्थितिका ज्ञान नहीं है ।
अथवा यदि वे ' समुदायेषु हि शब्दाः प्रवृत्ता अवयवेष्वपि वर्तन्ते ' इस पस्पशाह्निकस्थ - महाभाष्यके वचनानुसार शाकल्यसंहिता, वाजसनेयी - संहिता, कौथुमी - संहिता तथा शौनकी - संहिताको ' ऋग्वेद- यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद लिखते हैं, तो उन्हें बाष्कल संहिता 901आदिको भी ऋग्वेद, काण्व, तैत्तिरीय, मैत्रायणी, काठक, कठ- कपिष्ठल आदि संहिताओं को भी यजुर्वेद, जैमिनि, राणायनीय आदि संहिताओंको भी सामवेद, पैप्पलाद आदि संहिताओं को भी ' अथर्व- वेद ' लिखना चाहिये । अवयवरूपमें सब समान हैं ।
वास्तविक बात यह है कि — ऋग्वेद यदि स्वतन्त्र नहीं मिलते । वेद संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद् इन चार भागों में मिलते हैं । इनमें मुख्य भाग दो हैं, - मन्त्रभाग और ब्राह्मणभाग । मन्त्र- भागमें ११३१ संहिताएं आ जाती हैं । ब्राह्मणभागमें पुराण आदि अष्टविध ११३१ ब्राह्मण, तथा इतनी ही उपनिषदें, और इतने ही आरण्यक आजाते हैं । यह सारा साहित्य मिलकर ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद ये चार अथवा सब वेद बनते हैं । तो इन्हीं चारोंकी ११३१ संहिताओंके मध्यमें किसी भी संहिता, किसी भी ब्राह्मण, वा किसी भी उपनिषद् वा किसी भी आरण्यकमें आया हुआ ' ओम्'का वर्णन, आम्नान वा व्याख्यान मिल जावे; वह चारों वेदोंका माना जावेगा ।
तब ' सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ' इसकी संगति लग गई । हम तत्तद् - वेदोंके संहिता, ब्राह्मण, उपनिषद् आदिके ' ओम् ' - विषयक- प्रमाण दे ही चुके हैं । जो नहीं लिखे, वे उद्धृत किये जा सकते हैं । तब उक्त उपनिषत् - कण्डिकाएं जो स्वयं वेद हैं — ठीक ही है । प्रत्युत इस वचन से ' वेदोंकी कसौटी ' भी निकल आई कि यह सारा साहित्य वेद है 1
। जैसे ' यस्मिन् वेदा निहिता विश्वरूपाः ( अथर्व ० ४७१६ ) ' वेदेन रूपे व्यपिबत् ( यजुः १६७८ ) इनमें परोक्षरूपसे
902श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )
६०२
- वर्णित ' वेद ' शब्दसे इन वेदका वर्णन करनेवाले मन्त्रोंकी वेदसे भिन्नता नहीं हो जाती; वैसे ही ' त्रयो वेदा अजायन्त ' ( ऐत ० ब्रा ० २५/७ ) . ' वेदा वा एते, अनन्ता वै वेदाः ' ( तै ० ना ० ३।१०।११।४ ) ' सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ' ( कठोपनि ० १ २ ।१५ ) इत्यादि ब्राह्मण - उपनिषदादिके वचनोंमें परोक्षरूपसे कहे हुए ' वेद ' शब्द से ब्राह्मण, आरण्यक- उपनिषदादिकी वेद - भिन्नता भी नहीं हो जाती । बल्कि — यह - सभी साहित्य ' चार - वेद ' सिद्ध हो जाता है ।
इसी सम्पूर्ण वेद - साहित्यको अवलम्बित करके फिर पुराण, इतिहास, श्रीमद्भगवद्गीता आदिने भी- जो पंचम वेद हैं- . ' ओम् ' की महिमा गाई । इस प्रकार के ' ओम् ' का महत्त्व स्पष्ट ही है । तब इन सब संहिताओंके आरम्भ में भी प्रोक्त ' ओम् ' शब्द संहिताके आविष्कारकसे ही आया । ' गायत्री, अनुष्टुपू ' आदि छन्दोंके अक्षरसे वह बढ़ा हुआ है ' - यह कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि - छन्दोंके अक्षर न्यूनाधिक भी हुआ करते हैं । यदि गायत्री २४ अक्षर, उष्णिकू २८, अनुष्टुप् ३२, बृहती ३६, पंक्ति · ४०, त्रिष्टुप् ४४, जगती ४८ अक्षरवाले हों; तो ' शुद्ध ' कहलाते - हैं । यदि एक अक्षर इनमें कम हो, तो ' निचृत ', दो अक्षर कम हों, तो ' विराट् ', एक अक्षर अधिक हो तो ' भुरिक ' दो अक्षर अधिक हों, तो ' स्वराट् ' कहलाते हैं । छन्द भी वही माना जाता है । कोई त्रुटि नहीं आती ।
अथवा वेदमन्त्रसे उस ' ओम् ' का पृथक् रखना उसके . वशिष्ट्यर्थ है; अन्यथा वेदमन्त्रान्तर्गत होनेपर वह वैसा हो 903साधारण रहता; पर अब अलग होकर उन मन्त्रोंसे भी श्रेष्ठ होकर सर्वश्रेष्ठ सिद्ध हुआ । और ' ॐ ' होनेपर वह गजानन- गणेशका प्रतीक सिद्ध हुआ ।
' हरि'ओम् ' का प्रयोग |
साहित्य में ' अविमृष्टविधेयांश ' एक दोष है, उसका निष्कर्ष यह है कि विधेय – जिसे मुख्य रखना पड़ता है - उसकी मुख्यता के दो प्रकार हैं । उसे अन्य अनुवाद्यके, समान - आसनपर न बैठाया जाय - यह पहला प्रकार है । उसके पूर्व अनुवाद्य शब्द रखा जावे — यह दूसरा प्रकार है । वैसे ही ' ओम् ' को · मन्त्रमें न डालकर उससे पृथक् आदिम उच्च श्रासन पर बैठाया गया — यह पहला प्रकार उसकी मुख्यताका है । दूसरे प्रकार के अनुसार ' हरिः ' शब्द उससे पूर्व रखा जाता है 1 । जैसे कि — मुख्य नेता पहले से ही आकर उच्च - आसनपर नहीं बैठ जाता, किन्तु कुछ जनताके पहले • आजाने पर ही वह नेता आकर अपने आसन पर बैठता है ।
' न्यक्कारो ह्ययमेव मे ' इस पद्यमें ' न्यक्कार ' शब्द विधेय है, उसका पहले रखना अविसृष्टविधेयांशदोषदूषित माना गया है । इसी लक्ष्यसे वेदके आरम्भ में ' हरिः ओम् ' कहनेकी परिपाटी भी प्राचीनकाल से प्रचलित है कि - सर्वोच्च ' ओम् स्वतः ही पहले न आ बैठे, उसका दूसरा रूप उससे पूर्व आवे, पीछे वह स्वयं आवे । वेदमें इस ‘ ओम् ' के सर्वसाधारण होनेसे ही वेदकी पदानुक्रम- णिकाओं वा मन्त्रसूचियोंमें न ' ओम् ' ही रखा गया है, न ' हरि: - ओम् ', यह अवश्य जान लेना चाहिये ।
904इसके अतिरिक्त वेदका विषय यज्ञ है । इसमें ' ब्राह्मणभाग भी वेद है ' यह निबन्ध सम्भवतः हम अग्रिम पुष्पमें देंगे । कुछ यहाँ भी लिखते हैं — ' चत्वारो वै वेदाः, तैर्यज्ञस्तायते ' ( अथर्ववेद गोपथब्राह्मण १।४।२४ ) इत्यादि । यज्ञों में सोमका बहुत उपयोग हुआ करता था, यह बात वेदज्ञ - विद्वानोंसे छिपी हुई नहीं । वेद में ' हरि ' शब्द सोमकेलिए आया है, यह सामवेद ( कौ ० ) संहिताके ‘ पवमानपर्व ' तथा ऋग्वेद ( शा ० ) संहिताके नवममण्डलमें पवमान- सोमके सूक्तोंमें द्रष्टव्य है । उनमें एक मन्त्र यह है - ' हरिं... गोभिरावृतं ' ( ऋ ० सं ० ६६।२७ ) यहाँ ' सोम ' को ' हरि ' कहा गया है । तो ' ओम् ' से अभिमन्त्रित सोम जैसे - ' प्रोङ्काराभिष्टुतं सोमसलिलं पावनं पिबेत् ' ( याज्ञवल्क्यस्मृति ३ | ५ | ३०६ ) इस स्मार्तपद्यके कथनानुसार पीनेपर पवित्र करनेवाला माना गया है, वैसे सोमके पर्याय ' हरि ' शब्द से कवचित ' ओम् ' भी उच्चारण करनेपर पवित्र करनेवाला होनेसे ही वेदारम्भमें ' हरिः ओम्'- रूप में गाया जाया करता था ।
एक प्रश्न है ' हरिः ओम् ' में सामने खर् - प्रत्याहार वा अवसान न होनेसे विसर्ग की प्राप्ति ही नहीं; तब या तो ' हरिरोम् ' कहा जावे; या ' हरिःओम् ' को व्याकरणानुसार अशुद्ध माना जावे ', इस पर उत्तर यह है कि – व्याकरण में दो पक्ष होते हैं; एक वाक्य- संस्कारपक्ष दूसरा पद - संस्कारपक्ष । ' हरिः ओम् ' में पद - संस्कारपक्ष है । ' हरि ' ' यह पद विसर्गान्त आनेपर फिर सामने ' ओम् ' आनेपर ' जातः - संस्कारो न निवर्तते ' इस न्याय से अथवा ' अकृत - व्यूह'-
905' प्रोम् ' का महव
- परिभाषा से फिर विसर्गों को कुछ नहीं होता- अतः इसमें अशुद्धता नहीं ।
' हरिं – गोभिरावृतम् ' उक्त इस मन्त्रमें सोमस्थानापन्न ' हरि ' शब्द से गौसे आवृत हरि ( कृष्ण ) का भी बोध होता है, क्योंकि – भगवानने ' भगवद्गीता ' में ' अधियज्ञोऽहमेवात्र ' ( ८४ ) अपने आपको ' अधियज्ञ ' कहा है । स्वा ० शंकराचार्यने इसपर . दिखा है - ' अधियज्ञः - सर्वयज्ञाभिमानिनी देवता विष्ण्वाख्या ' यज्ञो वै विष्णुः ' इति श्रुतेः, स हि विष्णुरहमेव ' । • इस प्रकार भगवान् यज्ञाधिष्ठाता देव कहे गये हैं । ' अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ' ( ६२४ ) यहांपर भी भगवान् ने वही कहा है । ' सोमो भूत्वा रसात्मकः ' ( १५।१३ ) यहां · पर भगवान्ने रसस्वरूप - सोम भी अपनेको कहा है । तब गौओंसे श्रवृत भगवान् श्रीकृष्णका भी ' हरि ' इस वैदिक - शब्दसे कथन हो सकता है । ' वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः ' ( १५।१५ ) भगवान् - श्रीकृष्ण -ने यहां सभी वैदिक - शब्दों से अपनी ही वेद्यता- वर्ण्यता मानी है । " ब्रह्मसूत्रके माध्वभाष्य में ' एकशब्दैर्द्विशब्दैश्च बहुशब्दैश्च केशवः । एक एवोच्यते वेदैस्तावता. नास्य भिन्नता ' ( २।३।२२ ) यह भविष्य- पुराणका वचन उद्धृत किया है । इसमें भी वेदके शब्दोंसे भगवान् कृष्णका ही प्रवचन होना कहा है । तब ' हरि ' यह श्रीकृष्णका वैदिक - नाम सिद्ध हुआ । ' श्रीहरिः ' का अर्थ होता है- श्रिया लक्ष्म्या सहितो हरिः- श्रीहरिः ' ।
इसमें अन्य भी एक ज्ञापक मन्त्र है- ' ता वां वास्तूनि उमसि त्रामध्ये यत्र गावो भूरिशृङ्गा अयासः । अत्राह तदुरुगायस्य वृष्णः 906परमं पद्मवभाति भूरि ' ( ऋ ० सं ० १ । १५४।६ ) यहां पर यद्यपि श्रीयास्कने ' निरुक्त ' में सूर्यका अर्थ किया है; क्योंकि वे अपने - माने तीन देवताओं - अग्नि, इन्द्र अथवा वायु तथा सूर्य में सबका अन्तर्भाव मानते हैं; तथापि इन तीनोंका भक्तिसाहचर्य दिखलाने के लिए श्रीयास्कंने विष्णु, रुद्र आदि देवता पृथक् भी बताये हैं । सूर्यके विषय में श्रीकात्यायनने ' ऋग्वेदसर्वानुक्रमणिका ' में भी कहा है- ' एकैव वा महानात्मा देवता, स सूर्य इति श्रचक्षते । स हि सर्वभूतात्मा । तदुक्तमृषिरणा — ' सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ' इति । तद्विभूतयोऽ न्या देवताः । तदपि एतद् ऋचा उक्तम्- ' इन्द्रं मित्रं वरुणमग्नि- माहुरिति ' ( २।१४-२० ) । जब सब देवोंको सूर्यकी विभूति माना गया है; तव ' प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ( गीता १८ ) ' आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योत्तिषां रविरंशुमान् ' ( गीता १०।२१ ) के अनुसार सूर्य- देवतावाले मन्त्रमें श्रीकृष्ण भगवान् का वर्णन भी मौलिक है । इस मन्त्रका देवता भी तो ' विष्णु ' है; तब तो उक्त अर्थ करने में कोई निर्मूलता रहती भी नहीं है ।
तब उक्त मन्त्र में श्रीकृष्णके गोलोकका वर्णन भी सङ्गरा है । उक्त मन्त्रमें ' वृष्णः ' का अर्थ है ' वृष्णिवंशीयस्य ' । ' वृष्णेः ' के स्थानमें ' वृष्णः ' कहना छान्दस इकारलोपके कारण है । उस उरुगाय सर्वस्तूयमान वृष्णिवंशीय श्रीकृष्णका परमपद- गोलोक शोभित होरहा है, जिसमें भूरिशृङ्गा प्रयासः गावः – बड़ी सींगपक्ष वाली गमनशील गौएँ हैं । उसी गोलोकको यजमान तथा उसकी : पत्नीके निवासलोकरूपमें हम चाहते हैं । यही अर्थ महामहोपाध्यास 907पं ० शिवदत्तजीने निरुक्तकी अपनी टिप्पणी में दिया है । हम उसे भी उद्धृत करते हैं—.
" उरुगायस्य - बहुभिर्गीयमानस्य स्तुत्यस्य, वृष्णः - इत्यन्न ' वृष्णि'- शब्दस्य अन्त्यस्य इकारस्य छान्दसे लोपे अङ्गीकृते वृष्णिकुलोत्पन्नस्य [ वृष्णिवंशे अवतीर्णस्य ] श्रीकृष्णाख्यस्य विष्णोः परमं पदं स्थानं ' व्रज ' नामकं — इत्यपि गूढोभिप्रायः । निरुक्तरीत्या गोलोकस्य प्रतीतिर्भवत्येव — इति गोलोक एव व्रजमण्डलम् - इति सर्वेषामास्ति- कानां सिद्धान्तः । ‘ मथुरा भगवान् यन्त्र नित्यं संनिहितो हरिः ' इत्युक्तेः । ”
इस प्रकार हमारा किया हुआ अर्थ निर्मूल वा वेदप्रतिकूल भी नहीं । वेदमें अन्यत्र भी ' व्रजं च विष्णुः सखिवान् अपोर्णु तै ' ( ऋ ० सं ० १ | १५६ | ४ ) यहां पर विष्णु ( वृष्णिवंशीय ) का सखाओं- गोपोंसे मिलकर ब्रज ( गोकुल वा ब्रह्मवैवर्तके गोलोक ) में रहना संकेतित किया गया है ।
यह हमने प्रसक्तानुप्रसक्त लिखा है । फलतः उक्त ' हरिं गोभिरावृतं ’ वेदमन्त्रमें ‘ हरि ' से ' विष्णु ' श्रीकृष्णका ग्रहण भी हो जाता है । भगवान् श्रीकृष्णने अपने आपको ' ओम्'का रूप भी माना है । जैसे कि ७८, ६ १७, १०।२५ आदि गीताके पद्य पूर्व दिये जा चुके हैं । अपनेको ' अहं क्रतुरहं यज्ञः ' ( ६।१६ ) यहां ' यज्ञ ' मी माना है । सो ' सततं कीर्तयन्तो मामू ' ( गीता ६/१४ ) इस प्रकार यज्ञविषयवाले वेदके आरम्भ में ' हरिः ओम् ' कहना अनुपपन्न नहीं ।
कहा जा चुका है — ' ओम ' के तीन अक्षरोंको तीन वेदों से 908दुहा गया । इससे स्पष्ट है कि- भगवान्ने भी उसे तीनों वेदों में गुप्त रखकर उसे गुप्त रखनेका ही संकेत दिया है । फिर उसे केवल वेदके आरम्भमें बोलनेकेलिए उसे वहीं निर्दिष्ट भी कर दिया । पर अजमेर वैदिक - यन्त्रालयकी वेदसंहिताओं में तो ' ओम् ' को उस चेदारम्भमें भी यदिममन्त्र के साथ प्रकाशित नहीं कराया गया । कदाचित् वे इसे वहां ' साम्प्रदायिक प्रक्षिप्त ' समझते हो; वा उसे गुप्त - मन्त्ररूप में रखना चाहते हों । पर वह ' ओम् ' वेदारम्भसे पूर्व बोला जाता था । इसमें ‘ ब्रह्मणः प्रणवं कुर्याद् आदौ अन्ते च सर्वदा । स्रवत्य- नोङ्कृतं पूर्वं, पुरस्ताच्च [ अनोङ्कृतं ] विशीर्यति ' ( २ | ७४ ) यह मनु- वचन तो प्रसिद्ध है ही । स्वयं इसमें वेदकी साक्षी भी है । ब्राह्मण- भागात्मक- अथर्ववेद में कहा गया है कि-
एक बार असुरोंने इन्द्रपुरीको घेर लिया । देवता डरे और सोचने लगे कि -असुर कैसे मारे जावें? उन्हें ' ओम् ' मिला । कहा कि - हम आपको प्रमुख बनाकर असुरोंको जीतना चाहते हैं । ' ओम् ' ने कहा कि- मैं इस नियम से आपकी बात पूर्ण करूगा कि- स्यादिति ' ( गोपथब्रा ० १ | १ | २३ ) अर्थात् मुझ ओम्'को
' पूर्व पढ़े ' न मामनीरयित्वा ब्राह्मणा ब्रह्म वदेयुः । यदि वदेयुः - अब्रह्म तत् बिना ब्राह्मण वेदोच्चारण न करें । यदि करें; तो वह वेदपाठ न माना जाय । देवताओंने यह स्वीकार किया । ' ओम् ' की सहायता से असुर हार गये ।
इस प्रकार वेदने ही अपने आरम्भ में ' ओम् ' लगाया । गोपथ- ब्राह्मण भी वेद ही है - यह कुछ ४ र्थ पुष्पमें बताया जा चुका है; 909शेष छठे पुष्पमें बताया जायगा । इसे वेद - वचन न माना जावे; तो फिर सन्धि - विषय में ' ओमभ्यादाने ' सूत्रका ' ओ ३ म् अग्निमीले पुरोहितं ' ' ओ ३ म् इषे त्वा ' इस उदाहरणको देने से वेदभक्त कहे जानेवाले स्वा ० द ० जी भी ' साम्प्रदायिक ' तथा ' प्रक्षेपको आदर देनेवाले ' वन जाएंगे; और स्वा ० द ० जी के स ० प्र ० ( पृ ० २ ) में लिखे हुए ' वेदोंमें ऐसे - ऐसे प्रकरणों में ' ओम् ' आदि परमेश्वरके नाम लिखे हैं ' इस वचन में ' वेदों में ' यह बहुवचनान्त - शब्द भी ' निर्विषय ' हो जाएगा । अतः यहाँ सभी संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, तथा उपनिषदों को वेद मानना, तथा उनके आरम्भ में ' ओम्'का होना मानना अनिवार्य है । जैसे कि – कात्यायनकी ' ऋग्वेद ' ( शाकलक ) सर्वानुक्रमणिका ' में लिखा है - ' ओंकारो वेदेषु ' ( १ | १८ )
' ओम् ' में सर्वत्र ' ओ ३ म् ' इस प्रकार प्लुत देना चाहिये या नहीं, इस विषय में हम तीन पक्ष दिखला चुके हैं । प्लुत भी उसमें लिखना आवश्यक नहीं; केवल वेदारम्भमें उसका प्लुत - स्वरमें बोलना ही अपेक्षित होता है । ' ओम्'को ' ओ ' वा ' ॐ ' तब तक लिखना ठीक नहीं, जब तक कि उसके आगे ' श्री ' वा अन्य कोई व्यञ्जन न पड़ा हो । सामने कुछ भी न हो; वा अच् अक्षर हो, तो ' अ ' लिखना वेदाङ्ग ( व्याकरण ) से विरुद्ध है । हाँ, ' यों, वा ॐ को यदि गणेशको संक्षिप्त - मूर्ति मान लिया जाये; जैसा कि हम ' श्रीगणेशका
' निबन्धमें आरम्भमें लिख चुके हैं; तो वहाँ ' ॐ ' मङ्गलाचरण
अक्षरात्मक न होनेसे, किन्तु एक मूर्तिविशेष होनेसे वहाँ व्याकरणका
910श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )
बन्धन नहीं हो सकता; अतः उसे निर्विघ्नतार्थं मङ्गलकेलिए लिखा जा सकता है । अस्तु ।
जिस - किसी भी प्रकार से हो; यह ' ओम् ' बहुत पवित्र तथा अतिशयित - महत्त्वपूर्ण एवं वेदका सार सिद्ध है जैसा कि मनुजीने इसके जाननेसे ही वेदका जानना कहा है- ' आद्यं यत् त्र्यक्षरं ब्रह्म, त्रयी यस्मिन् प्रतिष्ठिता । स गुह्योऽन्यस्त्रिवृद् वेदो यस्तं वेद स वेदवित् ( ११।२६५ ) यही अन्तिम बात ' ध्यान विन्दूपनिषद् ( १८ ) में भी कही है । अतः उदात्तस्वरयुक्त इसका अधिकार भी द्विजोंकेलिए है । इसका जो बहुत प्रचार दीखता है, इसका कारण सनातनधर्मका पुराण - साहित्य ही है 1 | अधिकारियोंको इसका वैध - स्थल में वैध प्रयोग करना चाहिये । वेदके उपनिषद् - भागमें ठीक ही कहा है- ' ओमिति श्रात्मानं युञ्जीत ' ( मैत्र्युपनि ० ६।३ ) ' ओमिति ब्रह्म ' ( तैत्ति ० ड ० १।८।१ ) ' ओङ्कार एव इदथं सर्वम् ' ( छान्दोग्य २।२३।३ ) यही ' ओम ' की महत्ता है । इसीके अपेक्षित स्थल पर वैध - नादसे हमारी सर्वाङ्गीण- पवित्रता हो सकती है । शम् ।
इति श्रीगौरीदेवीगर्भजेन, श्रीपं ० शीतललालशमं सेतुपालतनुजनुषा, विद्याभूषण श्रीपण्डितही रानन्दशास्त्रि- पं ० श्रीजगन्नाथशास्त्रि- महाभागाभ्याम- धीतविद्यन, मुलतानस्थ- स ० ध ० संस्कृतकालेजस्य भूतपूर्वाध्यक्षेण, इदानीं देहली - रामदल- ( दरीबाकलां ) स्थ - सं ० हिं ० महाविद्यालयाध्यक्षेण, विद्या- वागीश - विद्याभूषण - विद्यानिधिपदभाजा श्रीदीनानाथशर्मशास्त्रिसारस्वतेन प्रणीते ' श्रीसनातनधर्मालोके ' तद्ग्रन्थमालाया हिन्दुधर्माचारविचार- पर्वादिनिरूपक - पञ्चम- सुमनोविकासः पूर्तिमगात् ।
सूचना - पृ ० ६४ हमें ' गोवध करना ' के स्थान. ' गोवध बन्द करना? तथा पृ ० ८७४ में ' ज्वरस्वर ' के स्थान ' ज्वरत्वर ' पढ़ें ।
911श्रीसनातनधर्मालोक - ग्रन्थमालाका परिचय.
इस ग्रन्थमालाको १००० ) देनेवाले इसके संरक्षक माने जाते हैं, उनका चित्र छपता है, प्रत्येक प्रकाशनमें उनका नाम छपता है । ५०० ) प्रदाता सम्मान्य - सहायक, २५० ) दाता मान्यसहायक, और १०० ) देने वाले सहायक माने जाते हैं । इसके प्रकाशित पुष्पोंका परिचय दिया जा रहा है । पाठकगण इनका जनतामें प्रचार करें ।
चित किया गया है । मूल्य = )
प्रथम पुष्प - इसमें ' नमस्ते'को एक पद बताने वालोंका मत चलो-
द्वितीय पुष्प - इसमें ' नमस्ते'को निपात बताने वालोंका मत आलोचित किया गया है । इसमें ' श्रीसनातनधर्मालोक ' महाग्रन्थकी गई हैं । मूल्य ४ ). सम्पूर्ण विषय - सूची, तथा उसपर प्रसिद्ध विद्वानोंकी सम्मतियाँ भी दी
तृतीय पुष्प — इसमें स्त्री - शूद्धोंके वेदाधिकारपर विचार किया गया है । ' यथेमां वाचं कल्याणीम् ' मन्त्रका वास्तविक अर्थ, हारीतकी ब्रह्मवादिनी, गोभिलसूत्रस्थ ' यज्ञोपवीतिनी ' शब्दका रहस्य, ' दुहिता मे पण्डिता जायेत ', ' वेदं पत्न्यै प्रदाय ' ' ब्रह्मचर्येण कन्या ' इत्यादि बहुत
"
प्रमाणोंके वास्तविक अर्थ बताकर, ऐतरेय - महिदास, कवष - ऐलूष, कक्षीवान्, सूत, शबरी आदि शूद थे, या अशूद्र, इसपर विचार किया गया है । इसके लेने पर प्रथम - द्वितीय पुष्प अमुल्य दिये जाते हैं । सजिल्द मु ० ३। ) समाप्त
चतुर्थ पुष्प — इसमें हिन्दु - शब्दकी वैदिकता, वेदविषय में भारी भूल, वर्ण - व्यवस्था जन्मसे है वा गुणकर्मसे, मृतकश्राद्ध वैदिक है वा अवैदिक, मूर्तिपूजा एवं अवतारवादका रहस्य, क्या विद्वान्. मनुष्य ही देव हैं, नवग्रहोंके प्रचलित - मन्त्र ग्रहोंके कैसे हैं, ग्रहण और उसका सूतक, • इत्यादि अनेकों विषयोंपर बड़ा सुन्दर विचार किया गया है । ५०० पृ ० की सजिल्द सुन्दर - पुस्तकका मूल्य ( )
912( ख )
पंचम पुष्प —यह ६०० पृ ० की पुस्तक २८ पौंडके कागज़ पर बहुत सुन्दर छरी है । इसमें हिन्दुधर्मके चोटी - जनेऊ, १६ संस्कार, सन्ध्याके सभी अङ्गों पर विचार, मालाकी मणियोंकी १०८ संख्या क्यों? यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व क्या है — इनपर विचार करके प्रातःसे रात्रि - शयन तक आचारोंको वैज्ञानिकता बताई गई है । इसमें दीपमाला, होली आदि सभी वर्ष के पर्वोके वैज्ञानिक रहस्य बताकर श्रीगणेशका वैदिकदेवत्व तथा श्रीमहीधरके ‘ गणानां त्वा ' मन्त्रके भाप्यपर तथा ' ओम् ' के महत्त्व आदि १२५ विषयोंपर बड़े सुन्दर विचार दिये गये हैं । सजिल्दका मूल्य ॥ )
इन ग्रन्थोंकी विक्री में शीघ्र सहायता कीजिये; जिससे छठा पुष्प शीघ्र प्रकाशित किया जा सके । पुस्तक मंगानेका संक्षिप्त पता-
पं ० दीनानाथ शास्त्री सारस्वत C / o- रामदल, दरीवाकलां, देहली- ६
अथवा - श्रीनारायणशास्त्री सारस्वत प्रभाकर ' राजीव '
फर्स्ट वी ० १३ लाजपतनगर, ( नई देहली - १४ )
914वेद वेदांगविद्यालय मन्त्रालय t1............... 000 000 000 000. 916' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमाला के सहयोगी
श्री पं ० सुरारी मेहता, कलकः ।
संरक्षक
F
१. जगद्गुरु - शत्रू. शचार्य, ज्योतिष्पीठाधीश्वर श्री १००८ स्वामी कृष्ण- बोधाश्रमजी महाराज १०० ) । २. दंडी स्वामी श्री १०८ भूमानन्दज: महाराज हरद्वार १०० ) । ३. दानवीर श्री पं ० कृष्णचन्द्रजी बैंकर्स, देहली १०१ ) । ४. ' पण्डितभूप्रण ' स्वामी श्रीरामदासजी शास्त्री ग्रायुर्वेदाचार्य, रेहली १०१ ) । ५. स्वामी श्री १०८ वासुदेवानन्दजी महाराज, शिमला १०० ) । ६. श्री पं ० ब्रह्मदत्तजी शर्मा ' सांकरिया निवासी ' अध्यापक माध्यमिक विद्यापीठ कादेडा ( अजमेर ) १०० ) । ७. श्री पं ० हरिमादजी शास्त्री पाराशर प्रो. टी. संस्कृत- टीचर स ० ध ० हाईस्कूल, पठानकोट १०० ) । ८. रायबहार गोस्वामी श्री व्रजनाथजी शर्मा सारस्वत, अध्यक्ष कारोनेशन प्रेस आगरा.०० ) । ६. सेठ श्रीगोपीलालजी काबरा, रवाड़ मूँडवा १०१ ) । १०. सेट श्रीझांगीरामजी श्रीछबीलदासजी ब नई ३; १११ ) ।
अर्थसाहाय्यदाता
१. सेट श्रीकुम्भनदास किशनदासजी बम्बई ५१ ), २. सेठ श्री भगवानदासजी डी ० गा बम्बई ११ ) श्रादिकी सूची भूमिका में है ।
कृपया आप भी आज हैं । १००० ) देकर संरक्षक, और कमले कम १०० ) देकर सहायक बनिये ।
सहायता भेजने का संक्षिप्त पता--
श्रीदीनानाथ शर्मा शास्त्री मारम्नत
In English
The Glory of Om
This chapter explains the multifaceted meanings of the syllable Om and its connection to Brahman. It describes how chanting Om serves as a method of meditation and a way to achieve spiritual liberation.
This chapter answers
- What are the meanings of om?
- How to chant om for meditation?
- Significance of om in bhagavad gita?
- Is om used in hindu rituals?
- Relationship between om and brahman?
Also written: Om, Ka, Mahattva, Om Ka Mahattva, ' ओम् ' का महत्त्व