सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 901–910

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 901–910

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( १० ) ‘ ओम् ' का महत्त्व | ‘ गिराम् अस्म्येकमक्षरम् ' ( भगवद्गीता १०।२५ ) हम ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थके पञ्चम - पुष्पके आरम्भमें श्रीगणेशका मङ्गलाचरण कर चुके हैं; उसके द्वितीय- निबन्धमें हमने यह गणपति गणेशको प्रतीक- मूर्ति सिद्ध की है । ग्रन्थके मध्यमें हम ब्रह्मके प्रतीक ' गायत्री मन्त्र ' का, तथा ब्रह्मकी प्रतिमा ' संवत्सर ' का वर्णन करके उनका भी एक ढंगसे मङ्गलाचरण कर चुके हैं । ग्रन्थके अन्त में भी महाभाष्य - आदिमें मङ्गलाचरणका विधान आया है; तदनुसार अब अन्तमें हम यहां जगत्प्रसिद्ध अक्षरात्मक ' ओम्'का मङ्गलाचरण करते हुए इस निबन्धमें उसके विषयमें ज्ञातव्य -बातोंका उल्लेख करके इस पञ्चम- पुष्पको ( छठे - पुष्पके • प्रकाशनकी सम्भावना लेकर जिसमें हमें सभी पाठकोंका सहयोग अपेक्षित है ), समाप्त करेंगे । ' ओम् ' का वेदोंसे सम्बन्ध । ' ओम् ' की वेदों, स्मृतियों आदि सबने महिमा गाई है । यह ब्रह्मका सर्वश्रेष्ठ नाम ( कात्यायन -कृत सर्वानुक्रमणी ४ | १ ) माना जाता है । वेद हमारे सनातन हिन्दुधर्मके अक्षय निधि हैं । ' मनुस्मृति ' ( २ | ७४ ) में उसी वेदके अध्ययनके आरम्भ और अन्तमें ' ओम् ' का पढ़ना आवश्यक माना गया है । ' नैषधचरित ' महाकाव्य ( ३।७५ ) में दमयन्तीने हंसको भी यही सूचित किया था कि - " यदि तुम मेरा नलसे विवाह न करना

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६७४ श्रीसनातनधर्मालौक ( ५ ) ' वेद ' मानते हो; तो उस वेदसे पूर्व ' रात्रिका भी चन्द्रसे भिन्न पति हो सकता है ' यह ' ओंकार ' भी साथ लगा दो । इससे ' ओम् ' का वेदोंसे सम्बन्ध सिद्ध होता है । ' मनुस्मृति ' ( २७६-७७ ) में परमेष्ठी -द्वारा ' ओम् ' के ' अ, उ, म् ' इन तीन वर्णोंको और गायत्रीकी तीन व्याहृतियों तथा तीन पादोंको तीन वेदोंसे दुहना माना है । इससे यह सूचित किया है कि जैसे हिन्दुधर्ममें वेद सर्वश्रेष्ठ हैं, जैसे द्विजोंके लिए वेदत्रयनिष्पन्न गायत्री सर्वश्रेष्ठ है, वैसे ही वेदत्रय से. निष्पन्न ' ओम् ' भी सर्वश्रेष्ठ है । यह भी ' त्रिवृद् - वेद ' है । ( मनु ० ११।२६५ ) । ' ओम् ' शब्द की सिद्धि । ' ओम् ' शब्द वेदाङ्ग - व्याकरणके अनुसार ' अ ' ( ६०० ) ( भ्वा ० प ० से ० ) धातुसे ' अवतेष्टिलोपश्व ' ( उ ० १११३६ ) इससे मन् - प्रत्यय करनेपर तथा प्रत्ययको टि का लोप होनेपर ' ज्वर - स्वर ' ( पा ० ६।४।२० ) से सारी धातुको ऊठ् आदेश करके उसे गुण करने पर बनता है । ' नित् ' होनेसे यह आयुदात्त स्वरवाला है । इसका विग्रह है- ' अवति इति ओम् ' । अव् धातुके उन्नीस अर्थ होते हैं । इतने अर्थ अन्य किसी धातुके नहीं हैं । वे उन्नीस अर्थं निम्न हैं -१ रक्षण, २ गति, ३ कान्ति ( शोभा ), ४ प्रीति, ५ तृप्ति ( इच्छाकी पूर्ति ), ६ अवगम ( ज्ञान ), ७ दीप्ति ( तेज ), ८. श्रवण, & स्वाम्यर्थ ( स्वामित्व ), १० याचन, ११ क्रिया, १२ इच्छा, १३ प्रवेश, १४ अवाप्ति ( प्राप्ति ), १५ श्रालिङ्गन, १६ हिंसा, .१७ आदान ( लेना ), १८ भाग, १६ वृद्धि । यह सभी सांसारिक

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' ओम् ' का महत्त्व ६७५ अनिवार्य अर्थ हैं । अतः संसारी जीवोंकेलिए इन बहुतसे का एक ही शब्द उस बीजमन्त्रकी भांति बन जाता है कि जिसके एक अक्षरमें बहुत - सा अर्थ सचित किया हुआ होता है । इसमें मुख्य अर्थ ' रक्षण ' है, परमात्मा सबका संरक्षण करता है । सबका प्रीतिका पात्र है । तृप्ति अर्थात् सेवन करनेपर हमारी • इच्छा पूर्ण करता है । हमें ज्ञान देता है, शोभा और तेज देता है । हिंसा— दुष्टों अथवा दुर्गुणोंका हनन करता है । हमारी वृद्धि करता है । गतिका अर्थ सर्वगतत्व सर्वव्यापकत्व है । आलिङ्गनसे प्रेमका अतिशय झलकता है । फलतः यही ' ओम् ' अपनी अनेक सांसारिक - क्रियाओं को हमें स्मरण दिलाता है, तभी तो ' ओम् ' के अर्थस्वरूप - ब्रह्मका चिन्तन करते हुए ' ओम् ' का जप करना पड़ता है । जैसे कि - ' योगदर्शन ' में कहा है- ' तस्य वाचकः प्रणवः, तज्जप-स्तदर्थभावनम् ' ( १।२७-२८ ) । तात्पर्य यह है ब्रह्मका नाम ( वाचक ) प्रणव ( ओम् ) है; उसके अर्थ ( वाच्य ब्रह्म ) का ध्यान करते हुए उसका जप करना चाहिये । उस योगसूत्रके ' वार्तिक ' में श्रीविज्ञानभिक्षुने ' अदृष्टविग्रहो देवो भावग्राह्यो मनोमयः । तस्योङ्कारः स्मृतो नाम तेनाहूतः प्रसीदति ' यह योगी - याज्ञवल्क्यका वचन उद्धृत किया है । इसका आशय यह है कि परमात्मा अद्भुत - शरीर है, भक्तिमात्र ग्राह्य है, और मनोमय हैं, उसे उसके नाम ' ओम् ' से आहूत करनेपर वह प्रसन्न होता है । उक्त - सूत्रके व्यासभाष्य में ईश्वर और ' ओम्'का वाच्य वाचकभाव स्थित - सम्बन्ध माना गया है, प्रदीप प्रकाशकी भांति अस्थित

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६७६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) प्रकाश्यता सम्बन्ध नहीं माना गया । स्मरणकेलिए जप ही एक सर्वोत्तम साधन है । इसी कारण ही तो भगवान् श्रीकृष्णने ' यज्ञानां जपयज्ञोस्मि ' ( भगवद्गीता १०।२५ ) जपको यज्ञ मानते हुए- ' प्रोमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम् ' ( ८ | १३ ), यहां पर ' ओम् ' को ' एकाक्षर - ब्रह्म ' बताकर उसका जप बताया है और अन्तिम कालमें ओंकारको उच्चारण करते और भगवान्‌का स्मरण करते हुए देह - छोड़ने में परम गति ( मुक्ति ) बताई है । ' ओम् ' की महिमा । वेदके उपनिषद् - भागान्तर्गत कृष्णयजुर्वेद ( कठोपनिषद् ) में तो इसी ' ओम् ' अक्षरके जान लेनेपर सब इच्छाओं का पूर्ण हो जाना कहा है । जैसे कि – ' एतद्धि एव अक्षरं ब्रह्म एतद्धि एव अक्षरं परम् । एतद्ध्य ेवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ' ( १।२।१६ ) । ' भगवद्गीता ' में ' प्रणवः सर्ववेदेषु ' ( ७१ ) यह कहकर श्रोङ्कारको समस्त - वेदोंका सारभूत माना है । वही ' वेद्यं पवित्रमोङ्कारः, ऋक्, साम, यजुरेव च ' ( ६।१७ ) इस पद्य में भगवान् ने ' ओम् ' को अपना स्वरूप कहा है । यह ठीक भी है; क्योंकि ' ओम् ' भगवान्‌का नाम है; नाम और नामीका अभेद हुआ करता है । ' भगवद्गीता ' के ( १७१२३ पद्य ) में ' ओम्'को ब्रह्मका नाम और वेद तथा यज्ञ एवं ब्राह्मण जातिका बनानेवाला कहा है । ' ॐ ' इस अक्षरके कई लकड़ीके टुकड़े बने हुए होते हैं, उनको विशिष्ट क्रमसे जोड़ने पर सब भाषाओंकी लिपि बन सकती है;

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' ओम् ' का महत्त्व ८७७ सब प्रकारके जीवोंकी आकृतियां बन सकती हैं । इसी ' ॐ ' से शेषनाग बन जाता है । यही गणेश की मूर्ति, एवं शिवलिङ्ग एवं जलहरीकी मूर्ति है । यह ' ॐ ' एक प्रतीक है । अक्षरात्मक - ब्रह्मकी भी यह प्रतीक हो सकती है, इसकी उपासना की जा सकती है । यह ब्रह्मकी साकार - उपासना होगी । इस प्रकारकी अद्भुत वस्तुको हिन्दुधर्मके ग्रन्थोंने ही ढूंढ पाया है; तभी तो ' ओम् ' कहकर ही यज्ञ, दान तथा तपस्यायें की जाती हैं - ' तस्माद् श्रोम् इत्युदाहृत्य यज्ञ - दान तपः क्रियाः । प्रवर्तन्ते विधानोक्ता सततं ब्रह्मवादिनाम् ' ( गीता १७१२४ ) । जब इस ' ओम् ' के नाम कीर्तनसे सब यज्ञादि- कर्मोंका अङ्ग-वैगुण्य दूर हो जाना सूचित किया है, तब इससे नाम - कीर्तनका महत्त्व भी सिद्ध हुआ । ' ओम ' का सब कर्मोंकी आदि इसलिए भी होता है कि यह माङ्गलिक है । ' गृह्यासंग्रह ' में कहा है— ' ओङ्कारश्चाथ - शब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा । भित्त्वा विनिर्यातौ तस्मान्माङ्गलिकावुभौ ' ( २६ ) । पञ्च कार हिन्दुधर्मके विवाह - संस्कारमें पोङ्कारपूजन पूजन I - मन्त्रमें ‘ श्रोम्’की जो महिमा वर्णित है, उसे भी देवमोङ्कारं परमेश्वरम् । त्रिमात्रं ' आवाहयाम्यहं इसकी त्रिमात्रता प्रश्नोपनिषद् में भी कही गई है कण्ठं ( अण्डं ) हुआ करता है, देखना चाहिये-त्र्यक्षरं दिव्यं । ब्रह्मविद्योपनिषद् , ( १३४।१३६ ) वाराहोपनिषद, ( ४।१ ) में ( ३,८।१ ) तथा योगतत्त्वोपनिषद ३ ॥ मात्रा बताई गई हैं । 4

पृष्ठ 906

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८७८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) त्रिपदं च त्रिदैवतम् ( १ ) अक्षरं त्रिगुणाकारं सर्वाक्षरमयं शुभम् । त्र्यर्णवं प्रणवं हंसं स्रष्टारं परमेश्वरम् । ( २ ) अनादिनिधनं देवमप्रमेयं सनातनम् । परं परतरं बीजं निर्मलं निष्कलं शुभम् । ( ३ ) श्रोङ्कारं बिन्दु - संयुक्त ं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः । कामदं मोक्षदं चैव ओङ्काराय नमो नमः ' ( ४ ) ( कात्यायनी - शान्तिः ) यहां पर प्रकारको प्रणव, तथा वीज कहा गया है । ' प्रणव ' इसलिए इसे कहा जाता है कि ----' प्रकर्षेण नूयते - स्तूयते ' इस ' ओम् ' की बहुत ही स्तुति होती है । बीज इसे इसलिए कहा जाता है - जैसे वीजमें सारा वृक्ष समाया रहता है, वैसे इस ओङ्कार में भी सम्पूर्ण संसार वृक्ष समाया हुआ है । यहां पर ओङ्कारकी संख्या पांच कहनेका कारण विष्णु, शिव, गणेश, शक्ति, सूर्य इस पञ्चातयनपूजा में पांचों देवोंकी योङ्कारात्मक-मूर्तिका होना है । इस प्रकार इस हिन्दुधर्मके साहित्यने ' ओम् ' की महिमाको सूचित किया है । इसका प्रभाव दूसरोंपर भी पड़ा । सिक्ख ( शिष्य ) -सम्प्रदायके ' गुरुग्रन्थसाहब ' में भी ' एक ओंकार सतगुरुप्रसाद ' ऐसा माना गया है । नामकीर्तनको महत्त्व न देनेवाले अन्य आजकलके अर्वाचीन - सम्प्रदायों में भी ' ओम्'को महत्त्व दिया जाता है । वे लोग पत्रव्यवहारमें तथा पुस्तकोंके आरम्भमें भी इसी ' ओम् ' को लिखा करते हैं । छोटा बच्चा भी तो ' ओ ' इस शब्दसे रोता है, यह ' ओम् ' का ही रूप है, प्रकृति उसे भी अवैध-रूपसे ' ओम'का जप करवाती है ।

पृष्ठ 907

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मका महत्व . ८०३ ' ओम् ' में तीन अक्षर । पूर्व. बताया जा चुका है कि — ' ओम् ' में तीन अक्षर हैं—. ' अ, उ, म् ' । आत्मबोधोपनिषद्, योगचूडामणि - उपनिषद् ब्रह्मविद्योपनिषद्, आदिमें भी इसे व्यक्षर बताया गया है । ' तेभ्यस्त्रयो वर्षा अजायन्त, अकार उकारो मकार इति । तान् एकदा - समभरत्, तदेतद् ओम् इति । तस्माद् ओम्, ओम् इति प्रणौति ' ( ऋग्वेद - ऐतरेय ब्राह्मण ५।३२ ) वृद्धहारीतस्मृति ( ७१३५-३७ ) बृहत्पराशरस्मृति ( १२।२६५-२६७ ), बृहद्योगियाज्ञवल्क्यस्मृति ( २।१५-१६ ) में भी इसकी व्यक्षरता बताई गई है । अक्षरोंका भी पृथक् - पृथक् अर्थ शास्त्रोंमें बताया गया है । जैसे किं--अथर्ववेदीय ' माण्डूक्योपनिषद् ' में कहा है-' अकारः प्रथमा मात्रा, आप्ते, आदिमत्त्वाद् वा, आप्नोतिह वै सर्वान् कामान्, आदिश्च भवति ( ६ ) उकारो द्वितीया मात्रा, उत्कर्षाद्, उभयत्वाद् वा, उत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिम्, समानश्च भवति । नास्य अब्रह्मवित् कुले भवति ( १० ) । मकारस्तृतीया मात्रा, मितेरपीतेर्वा, मिनोति ह वा इदं सर्वम् अपीतिश्च भवति ( ११ ) । ओका अर्थ | इसी उपनिषद् में ' सोयमात्मा अध्यक्षरमोङ्कारः ' ( ८ ) यहां पर आत्माको अक्षर - दृष्टिसे ओङ्कार माना गया है । उसकी ' अ ' मात्रा सबमें व्याप्त तथा आत्मा सबके आदिमें होती है । उसको जानने-* ' अकारो वै सर्वा वाक् ' ( ऐत ० आ ० २।३।६ ) ।

पृष्ठ 908

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८५० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) वालेको सब कामनाओं को प्राप्त कर लेनेवाला तथा सबका आदि ( बड़ा ) माना है । ' उ'का अर्थ उत्कृष्ट, उभय अ - मूके मध्य स्थित है; इसे जाननेवालेको ज्ञानमें उत्कृष्ट तथा मित्र - शत्रु उभयपक्ष में सम्मानित हो जाना कहा है । ' म ' का अर्थ सबको नीचे डाल देनेवाला ' डुमिञ् प्रक्षेपणे ' ( स्वा ० अ ० उ ० ) यह किया है । अपीति-जगत्का कारणात्मा अथवा एकरूप होता है । इस ' ओम् ' के ज्ञाताको इन सब बातोंकी प्राप्ति कही है । ' ओम् ' की महिमाको बतानेवाला कृष्ण - यजुर्वेद- ' कठोपनिषद् ' का यह वाक्य भी मननीय है कि - ' सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति, तपार्थंसि सर्वाणि च यद् वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति, तत् ते पदं संग्रहेण ब्रवीमि - ' ओम् ' इत्येतत् ' ( १।२।१५ ) यहाँ पर बताया गया है कि- सब वेद इसी ' ओम् ' पदका व्याख्यान करते हैं, सब तपस्याएँ भी जिस पदको कहती हैं, जिसको प्राप्त करनेकेलिए ब्रह्मचर्य किया जाता है, वह ब्रह्मपद ' ओम् ' है । ' एतदालम्बनं श्रेष्ठम् एतदालम्बनं परम् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ' ( कठ १।२।१७ ) यहाँ पर ओंकाररूप - आलम्बनके जाननेसे ब्रह्मलोक में उसका सम्मान माना है । ( ' महीङ् पूजायाम् ' कण्ड्वादिः आ ० से ० ) । अथर्ववेदीय ‘ माण्डूक्योपनिषद् ' ने तो यहाँ तक कहा है कि-' ओम् इत्येतद् अक्षरम् इदथं सर्वं तस्य उपव्याख्यानं, भूतं, भवद्, भविष्यदिति सर्वम् श्रोङ्कार एव । यच्च अन्यत् त्रिकालातीतम्, तदपि ओङ्कार एव । ' ( १ ) अर्थात् इस संसार में सारे साहित्य

पृष्ठ 909

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' ओम् ' का महत्त्व ६५१ ' ओम् ' की ही व्याख्यायें हैं । भूत, भविष्यत्, वर्तमान तथा त्रिकालातीत सभी ' ओम् ' ही है । पाठकगण, देखिये – ' ओम्'का कितना महत्त्व है? इसी ' ओम् ' के अ, उ, म् ' तीन अक्षर ब्रह्मा, विष्णु, महेश माने जाते हैं । ' ओं खं ब्रह्म ' ( यजुर्वेद - वाजसनेयसंहिता ४०।१७ ) यहाँपर आदित्य - स्थित ब्रह्मको. ' ओम् ' के नामसे कहा गया है । इसीलिए ' छान्दोग्य उपनिषद्'की आदिमें ' ओम् ' की उपासना कही गई है -' ओम ' इत्येतद् अक्षरमुद्गीथमुपासीत, ओम् इति हि उद्गायति ' ( -1१1१ ) अथर्ववेद - ' प्रश्नोपनिषद् ' में कहा है- ' यः पुनरेतत - त्रिमात्रेणां ओम् इत्येतेनैव अक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत, स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः यथा पादो- ( काको ) दरः [ सर्पः ] त्वचा विनिर्मुच्यते; एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः, स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकम् ( ५५ ) यहाँ पर ' ओम् ' अक्षरसे परमात्माका ध्यान करनेसे पापोंका हट जाना कहा है । ' ऋग्भिरेतं, यजुर्भिरन्तरिक्षं, स सामभिर्यत्तत् कवयो वेदयन्ते । तमोङ्कारेणैव आयतनेन अन्वेति '. ( ५७ ) यहाँपर ओङ्कार के द्वारा तीन - वेदों के फलकी प्राप्ति कही है ।. कृष्णयजुर्वेद — तैत्तिरीयोपनिषद् ' में कहा है- ' ओम् ' इति ब्रह्म, ओम् इति इदं सर्वम् ' ( १/८/१ ) यहाँपर भी ' ओम्'को ही सब - कुछ कहा है; तथा ' ओम् ' कहकर ही अग्निहोत्र आदि करना कहा है । ... ' ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवा अघि विश्वे निषेदुः । ५६ स ० ध ०

पृष्ठ 910

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८५२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) यस्तन्न वेद, ऋचा किं करिष्यति, य इत् तद् विदुः, ते इमे समासते ' ( ऋग्वेद - शाकल्यसं ० १।१६४ ३६, अथर्ववेद - शौनकसं ० ६।१०।१८ ) इस मन्त्रके कई अर्थ किये जाते हैं । एक अर्थ ' ओम् ' -परक भी है । जैसा कि – ' निरुक्त ' ( १३।१०।१ ) में लिखा है - ' कतमत् तदेतद् अक्षरम्? ओम् इत्येषा वाग् इति शाकपूणिः ' । यहीं श्रीयास्काचार्यने ब्राह्मणभागका प्रमाण भी दिया है - ' एतद्ध वै एतदक्षरम्, यत् सर्वां त्रयीं विद्यां प्रति - प्रति ' इति । इसपर श्रीदुर्गाचार्यने भी अपनी वृत्ति में ' ओंकार एव इदं सर्वम् ' यह प्रमाण भी उद्धृत किया है । इसी प्रकारका ‘ तैत्तिरीयोपनिषद् ' का प्रमाण पूर्व उद्धृत किया ही जा चुका है । उक्त - अर्थमें ऋगादि - वेदोंके सारस्वरूप ' ओम् ' अक्षरमें ही सब देवताओंका निवास माना गया है । उसके ज्ञान न रखनेसे तो ऋगादि सब वेदोंकी विफलता बताई गई है । उसके ज्ञानसे ही वेदोंकी भी सफलता मानी गई है । ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के अभिज्ञ - पाठकों ने ' ओम् ' का महत्त्व देख लिया । सब शास्त्र इसकी महिमासे ओत - प्रोत हैं । पुराणों का तो नाम लेना ही पुनरुक्त है । वेदके सभी सिद्धान्तोंका जनताके पास पहुँचानेका श्रेय पुराणोंको ही है; क्योंकि — इन्होंने वेदकी कठिन- बातोंको सरल तथा सरस प्रकारोंसे सबके समक्ष प्रस्तुत किया है । ' ओम् ' की महत्ता और भी देखिये-' ओम् ' अविकारी अक्षर । ' ओम् ' का आदि अक्षर ' अ ' है । व्याकरणकी सन्धिकी :