पञ्चम सुमन · प्रकरण 94

होली विज्ञानकी कसौटीपर

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861हुए अन्नको ' होलका ' कहते हैं । उसे अब भी होली के समय प्रयुक्त किया जाता है | वह नया अन्न जो कि सस्य - रूप में हुआ करता है- उसे होलीकी अग्निमें आधा पकाकर कुछ अग्निमें देवताओंको दिया जाता है, क्योंकि अग्निको देवताओंका मुख माना गया है- ' अग्निर्वै देवानां मुखम् ' । ( शतपथ ० ३ । ७ । ४ । १० ) ' मुखत एव तद् देवान् प्रीणयति ' ( शाङ्खायनत्रा ० ३।६ ) ' अग्ने! वह हविरद्याय देवान् ' ( ऋ ० सं ० ७१११।५ ) । इस प्रकार देवताओंको देकर पीछे आप खाया जाता है । शूद्र बिना मन्त्रके तथा द्विज मन्त्र- सहित ऐसा किया करते थे । इस कारण वैदिक - सम्प्रदाय में भी यज्ञ के समय जौ - चावल आदिका उपयोग किया जाता है । इस प्रकार यह होलीका पर्व वेदकालीन एवं समूल सिद्ध हुआ ।

( ३ ) इसके अतिरिक्त होली ऋतुराज वसन्तका एक उत्सव भी है । वसन्त ऋतुका महत्त्व तो विश्व - विश्रुत है । छः ऋतुओं में वसन्त ही ऋतुराजकी उपाधि से विभूषित है । मनुष्य के स्वास्थ्यका सम्बन्ध देशीय - प्रकृतिके स्वास्थ्य के साथ विशेषतः हुआ करता है । यों तो प्रकृति बारहों महीने विशेष नियमोंको लेकर जगत्के कार्यको प्रवृत्त कर रही होती है; परन्तु अन्य ऋतुओं में इधर - उधरको परिस्थिति- वश वह अपने स्वरूपको प्रकाशित करने में कुछ कुण्ठित - सी रहती है; परन्तु उसके सुखमय स्वरूपके विकासका सुन्दर साधन वसन्त ऋतु ही है ।

वसन्त - ऋतु एकमात्र मनुष्योंके लिए ही आनन्दप्रद हो ऐसी बात नहीं है; प्रत्युत वह तो मनुष्योंके साथ ही साथ पशु, पक्षी, 862कीट, पतङ्गा आदि सभीका उत्साहवर्धक - काल है । इन्हींका ही क्या, अपितु स्थावर वनस्पतियोंका भी यही उल्लास- काल है | कविकुल- गुरु श्रीकालिदासने वसन्तका प्राकृतिक चित्र अङ्कित करते हुए स्वग, मृग, वृक्ष, लता आदियोंकी भी इसी ऋतु में प्रेमपाश - वद्धता चित्रित की है । भारतीय प्राचीन पद्धति वसन्त के आगमन में देवताओं के लिए प्राचीनकाल में होनेवाले एक बड़े वार्षिक सामष्टिक - यज्ञको परि- चायित करती है, जिसका अनुमान होलिका - दहन से होता है ।

( ४ ) इसके अतिरिक यह उत्सव अन्य भी कई इतिहासको अपने गर्भ में धारण करता है । ' भविष्यपुराण ' ( उत्तर पर्व १३३ अध्याय ) के अनुसार पहले समय में दुण्ढानामकी राक्षसी शिवप्राप्त- वरके प्रभावसे अवध्य होकर छोटे बच्चोंको पीड़ा दिया करती थी । तब बीभत्स - गाली देनेके साथ - ' ये रूपाणि प्रतिमुञ्चमाना असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति । परापुरो निपुरो ये भरन्ति, अग्निः तान् लोकात् प्रणुदाति अस्मात् ' ( यजुर्वेद - वानसं ० २।३० ) ' अग्निर्हि रक्षसामपहन्ता ' ( शतपथ ० २।४।२।१५ ) -

इस प्रकार सूखी लकड़ियों वा उपलोंसे अग्नि जलाने के साथ उसको वहां से हटा दिया गया । उस बातको स्मरण दिलानेवाली यह होली है । उस समय सायं घरको लीपना ही पड़ता है और • गुड़ - पकवान आदि बाँटना पड़ता है ।

( ५ ) होलीका सम्बन्ध प्रह्लादके साथ भी माना जाता है । भगवद्भक्तिमें संलग्न प्रह्लाद जब पिता द्वारा समझाने से भी न समझा; तब उसको उस मार्ग से हटाने के लिए पिताने उसे पर्वतसे 863गिराया, हाथीके पैरों तले दबवाया, तलवारसे उसकी गर्दन काटने का प्रयत्न किया; परन्तु वह हिरण्यकशिपु उसमें सफल न हुआ ।

अन्तिम उपाय उस दानवने उसके नाशका यह सोचा कि प्रह्लादको अग्निमें जलाया जाय । हिरण्यकशिपु की बहिन थी ' होलिका ' । उसे ब्रह्माका वर था कि वह अग्निमें भी नज

थी । हिरण्यकशिपुने उसे प्रह्लादको गोदमें लेकर अग्निमें प्रवेश करनेकी आज्ञा दी, जिससे प्रह्लाद जल जाय । परन्तु — ' श्रीकृष्णस्य कृपालवो यदि भवेत् कः कं निहन्तु ं

क्षमः ' वहांपर उल्टा ही हुआ । होली तो अग्निमें जल गई, पर वह परमात्माका भक्त प्रह्लाद बच गया । इस उल्लासको प्रकट करनेकेलिए लोगोंने उसकी भस्मको इधर - उधर विकीर्ण करके आमोद - प्रमोद किया और होलीको गालियां दीं । उस अभिनयकेलिए अब भी होलीमें जलती हुई अग्निसे प्रह्लादके प्रतिनिधि वृक्ष - खण्डको निकाल कर उसे जलाशय में ठंडा करते हैं । उस समयकी भस्मको इधर - उधर फेंकते हैं । यह होलिकोत्सव उसकी स्मृति रूपमें भी है । इस प्रकार होलीके स्वरूपमें दीख रहे हुए इस वैषम्यको कल्पभेदसे समाहित करना चाहिये ।

होली में अन्त्यजोंके स्पर्शका रहस्य

( ६ ) इस उत्सव में यह महत्त्वको बात है कि छोटेसे - छोटा बच्चा भी बूढ़ेसे बूढ़े पुरुषपर भी रंग डालता है । इस उत्सवमें छोटे बड़े, धनी - निर्धन, ऊंच - नीच सारे वर्षके भेद - भाव वा शत्रुता को हटाकर एकता उत्पन्न करते हैं । प्रधानतासे शूद्रोंका उत्सव 864माने जाते हुए भी इसमें ब्राह्मण आदि सारे वर्ण एक दूसरे के साथ मिलते हैं । प्रत्युत इसमें श्वपचस्पर्श भी किया जाता है । जैसे कि ' हेमाद्रि ' ' निर्णय सिंधु ' ( ६-३४५ ) तथा ' भविष्य पुराण में भी

है ।

“ चैत्रे मसि महाबाहो! पुण्ये तु [ कृष्ण ० ] प्रतिपद्द्ने । यस्तन्न श्वपचं स्पृष्ट्वा स्नानं कुर्यान्नरोत्तमः । न तस्य दुरितं किञ्चिद् नाधयो व्याधयों नृप! कृत्वा चावश्यकार्याणि संतर्प्य पितृ - देवताः । वन्दयेद् होलिकाग्नि सर्वदुःखोपशान्तये । ”

यहां पर श्वपचस्पर्शका रहस्य यह है कि अपना पाप, रोग, दुःख आदि निकृष्ट अंश उस श्वपचको दिया जाय, उससे उसके पहले से ही वैसे होनेसे उसकी अपूर्व हानि नहीं होती । विषके कृमिको विष खिलानेसे उसकी पूर्व हानि नहीं होती; पर उससे हमारा लाभ हो जाता है । हममें रहनेवाले तत्सदृश कीटाणु

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अपनी सजातीयतावश श्वपच - शरीर में शीघ्र प्रवेश कर जाते हैं । उसकी इससे हानि नहीं होती और हमारी सम्भावित हानि हट जाती है । फिर श्वपचस्पर्श - जन्य दोषके दूरीभावार्थं स्वयं स्नान कर लेना चाहिये । यह इस प्रकारकी चिकित्सा है कि जैसे श्वास पी जानेवाले सर्पविशेषके विष - दूरीकरणार्थ आकके पत्ते खा लेने पड़ते हैं; इससे उक्त सर्पका विष दूर होकर आकका विष उस पुरुषको चढ़ जाता है । फिर आकके विषके दूरीकरणार्थ तो बहुत सी ओषधियां प्राप्त हो जाती हैं ।

इसी लक्ष्यसे कि हमारे दिये हुए निकृष्टांशसे शूद्रको कुछ भी 865हानि नहीं होती - वेदमें अपने रोगका शूद्रा में जाना मांगा गया है । जैसे कि - ' तक्मन्! ( रोग! ) ' दासीं ' निष्टक्वरीमिच्छ ' ( अथर्व- वेद ( शौ ० ) सं ० ५'११।६ ) यहां ' दासी'का अर्थ ' शूद्रा ' है । इसी कारण अग्रिम - मन्त्रमें कहा है- ' शुद्रामिच्छ प्रफर्यं ' ( ५।२२।७ ) यहां पर ' शुद्रा ' शब्द त्रैवर्णिकेतरपरक हैं । ' भविष्य पुराण'ने इसी वेदाशयको प्रकट किया है ।

यह आशय है भी ठीक ही । हम द्विज लोग सदा पवित्र- वायुमण्डलके रहनेके अभ्यासी होनेसे साधारण अपवित्र - वायु- मण्डलके निवासी कीटाणुओंसे दृष्ट होकर रोगी हो जाते हैं । गन्दी - नालियोंके कीटाणु हमारे स्वास्थ्यको बिगाड़ देते हैं । पक- रहे हुए मांसकी दुर्गन्ध हमारे मस्तिष्क में चक्कर ला देती है; परन्तु अन्त्यजोंका तो नालीके पानीमें हर समय ही हाथ रहता है । बल्कि वे नालीके कूपमें घुसकर उसके कीचड़को निकाल रहे होते हैं ।. टट्टीको साफ कर रहे होते हैं, टट्टीके पात्रको उठा रहे होते हैं । इससे उनका अस्वास्थ्य नहीं हो जाता । इसलिए वे उनसे प्रबल - कीटाणुओंसे दृष्ट होकर ही बीमार होते हैं, साधारण- कीटाणुओं से नहीं ।

परन्तु हम लोगोंके रोग - कीटाणु वैसे प्रबल नहीं हुआ करते । इसलिए श्वपचके स्पर्शसे हमारे वे रोग वा पापके कीटाणु अपने सजातीय- कीटाणुओं को पाकर उसमें प्रविष्ट हो जाते हैं । इससे उनकी कोई नई हानि नहीं होती । पर हमें उसके स्पर्शसे सम्भावित दोषोंका कीटाणुओं के निरासार्थ स्नान करना पड़ता है । इसलिए 866हमारे देशके पुरुषोंमें प्रसिद्ध है कि - जिसे वारेका ( एक दिन छोड़कर आनेवाला ) बुखार हो, वह यदि भंगीसे आलिंगन कर ले, तब उसका वह ज्वर नष्ट हो जाता है । फलत: होली के श्वपच स्पर्श में भी यही रहस्य है । इससे पुरुष एक वर्ष स्वस्थ रहता है, ऐसा माना गया है । इसमें न तो सनातनधर्मका कोई सद्भाव है, न ही श्वपच - स्पर्शसे आजके सुधारकोंकी कोई अछूतोद्धार सम्बन्धी पक्षकी सिद्धि है; क्योंकि श्वपचके स्पर्शके बाद फिर स्नान भी तो लिखा है - यह सनातनधर्मका ही पक्ष है, सुधारकोंका नहीं । अस्तु! इस होलोत्सव में सम्पूर्ण वर्ष के चिन्ता - शोक आदि दग्ध हो जाते हैं ।

( ७ ) जो पाश्चात्य शिक्षा - दीक्षा दीक्षित अर्वाचीन लोग होलीके नामसे भी घृणा करते हैं, और इस उत्सवको असभ्यता एवं अश्लीलताकी पराकाष्ठा मानते हैं, वे महापुरुष अपने प्रभुके ' एप्रिल फूल ' इस उत्सवको क्यों भूल जाते हैं? ' फूल ' का अर्थ ही उस भाषा में ' मूर्ख ' है । जहांके पाश्चात्य अपने उस उत्सव में मूर्खता कर रहे हैं, वहां तो सुधारकगरण सभ्यता देखते हैं; पर अपने उत्सवमें उन्हें असभ्यता वा अश्लीलता दीखती है । अब उन्हीं पाश्चात्योंकी अनुन्मत्तता ( सावधानता ) ऽवस्थाकी सभ्यता भी देखें । वे लोग उत्सवविशेषों में ' वाल ' नृत्य करते हैं । इस प्रकारकी चिकनी भूमि उस समय बनवाते हैं; जहां नाचते हुए स्त्री - पुरुषोंके फिसलने तथा एक - दूसरे पर गिर पड़नेको आशङ्का रहती है । वहां सभ्य कहे जाते हुए वे पाश्चात्य पुरुष दूसरोंकी पत्नी के साथ स - मद् होकर एक - दूसरेका हाथ पकड़कर नाचते हैं । चिकनी भूमिकी

867होली विज्ञानकी कसौटीपर ८६७. कृपासे फिसलकर एक - दूसरे पर जा गिरते हैं । यह उनकी सभ्यता मानी जाती है ।

इस प्रकार किसी यान ( सवारी ) आदिसे उतारनेके समय दूसरोंकी स्त्रियोंका हाथ पकड़ा जाता है, जिसमें लिखित - पत्र दे देना कठिन नहीं होता, जिसमें कोई अपनी वाञ्छा भी लिख दी गई हो 1 । मित्रके साथ एकान्त में बैठकर बातचीत करती हुई अपनी पत्नीके कमरेकी खिड़की में झांकना भी वहां असभ्यता मानी जाती है । वहां पर पतिका चला जाना तो असभ्यताकी पराकाष्ठा मानी जाती है । गुप्त धात्री - भवनोंका खोलना भी वहां सभ्यता मानी जाती है । यह तो अर्वाचीनों के दृष्टिकोण में सभ्यता है, पर होली में वैसे व्यवहार न होने पर भी अपने भारतीयोंको वह असभ्यता दीखती है! यह पाश्चात्योंका भाग्य समझना चाहिये ।

( ८ ) पाठक - महोदयोंको यह भी जान लेना चाहिये कि जैसे कोई वेहोशी की दवाई सुघानेसे बेहोश हो जाए, फिर प्रयत्न - विशेष से उसकी बेहोशी हटा दी जाय, और उसका वहांसे शीघ्र भगाना इष्ट हो; तो नसोंमें शिथिलता होने से वह वहांसे दौड़ना तो दूर रहा — शीघ्र उठ भी नहीं सकता । उस समय उसकी नसोंमें स्फूर्ति संचारार्थ उत्तेजनाकी आवश्यकता पड़ा करती है । तब उस समय यदि उसे कोई गालियां देनेको तैयार हो जाय; अथवा उस पर कोई रंग डाल दे तब वह झट उत्तेजित होकर धमनियों में शक्ति प्राप्त कर उसी क्षण मुकाबला करनेको तैयार हो जायगा ।

इसी प्रकार वसन्त ऋतुके आने पर कार्य - प्रतिबन्धक तन्द्रा- 868आलस्य आदि विघ्न पुरुषके ऊपर आक्रमण कर देते हैं, तब पुरुषोंकी नस - नाड़ियों में शिथिलता निर्वलता आ जाती है । उससे पुरुषोंके संरक्षणार्थ हमारे पूर्वजोंने यह प्रणाली बनाई है कि लोग एक दूसरे पर रंग डालें । इस प्रकार दौड़ने, कूढ़ने, उछलने आदि से एक दूसरेकी नसों में स्फूर्ति उत्पन्न होगी । कई नाचेंगे, कई गायेंगे, दूसरे कूदेंगे, दौड़ेंगे, उपहास वा गाली देनेसे एक - दूसरे को उत्तेजित करेंगे, कई रंग डालनेसे बिगड़ कर उत्तेजित होंगे । ऐसा होने पर पुरुषोंके इस ऋतुके स्वाभाविक तन्द्रा - आलस्य आदि हट जावेंगे; और वे फुर्ती पाकर अपने - अपने कार्य में लग जाएंगे । इसमें सब देश - कालोंके परीक्षक हमारे पूर्वजोंकी किस प्रकार वैज्ञानिकता है?

( e ) इसके अतिरिक्त सर्दीका हटना और गर्मीका प्रवेश इस प्रकार वसन्त ऋतु गर्मी- सर्दीका सन्धिकाल है । इस सन्धिकालमें जलवायुके खराब होने की ऐसी आशङ्का रहती है कि वे जनताको ज्वर, हैजा, शीतला, मलेरिया, प्लेग आदि रोगोंके पाशमें फंसा लें । वहां उस प्रकारके दूषित - गैसकी दूरी हो जाय, उत्तेजनासे स्फूर्ति उत्पन्न हो जाय; दुर्बलता हट जाय; इस से हमारे पूर्वजोंने होलीकी मर्यादा रखी, इसमें उनका विज्ञान - ज्ञान स्पष्ट अनुभूत हो रहा है ।

इसमें यह भी विज्ञान है कि शीत - कालका संचित कफ वासन्तिक - ऊष्माको प्राप्त करके पिघलता है । इसके कीटाणु सारे शरीरमें फैलकर अनेक प्रकारके खांसी, दमा, जुकाम आदि रोगों

869होली विज्ञानकी कसौटीपर ८६ है को उत्पन्न करते हैं । यह ऋतु कफ आदि रोगोंकेलिए आयुर्वेद तथा लोकमें सुप्रसिद्ध है, विशेष करके बालकोंको विविध - रोग इसी ऋतु में होते हैं । घरों में भी शीतकाल में पूर्ण - ऊष्माके अप्रवेश से भांति - भांति के कीटाणु अपना स्थान बना लेते हैं; जो कई- प्रकारकी हानि पहुँचाने वाले होते हैं । जो क्रीड़ाएं वा क्रियायें होलियों में होती हैं; वे ही इनके लिए प्राकृतिक चिकित्सायें हैं ।

शरीरमें उत्साह लाना, कूदना, उछलना, अग्निको जलाकर उसके पास ठहरना, ऊंचे स्वरसे गाना, हंसी - मखौल आदि कार्य कफ - निवर्तक हैं । उस समयके अन्नमें गुड़ मिलाना कफके निवर्तनार्थ है- ' गुडेन वर्द्धितः श्लेष्मा सुखं वृद्धया निपात्यते । ' घरोंकी स्वच्छता, गोबरका लेप, अग्निकी ऊंची ज्वाला, यह विधियां कीटाणुओं की विनाशक हैं । इन वैज्ञानिक अनुष्ठानोंसे कफ़ - रोगों की निवृत्ति स्पष्ट है । हास्य - प्रधान गाना, यथेष्ट - भाषण होलीके अवसर पर इसी आधार से व्यवस्थापित किया है कि मनुष्य स्वभावसे यह सब ऊंचे स्वरसे करता है; तब उत्साहजनित उच्च स्वर कफको हटाकर फेफड़ेको शुद्ध करता है, इस प्रकार यहां प्राचीनोंका विज्ञान - ज्ञान स्पष्ट है ।

इस अवसरपर रंग डालने में वैज्ञानिक कारण यह है कि लाल - पीला आदि रंग ‘ कारबोलिक एसिडगैस ' आदि दूषित - गैसको नष्ट करके स्वास्थ्य - संचारमें समर्थ हुआ करते हैं 1 । वैज्ञानिकों ने

अन्दर भी रंगोंकी सत्ता स्वीकार की है, किसी रंग - विशेषकी हमारे ज्वर - विशेषका हो जाना भी बताया है । उस रंगकी पूर्ति 870कर देने पर उस रंगकी न्यूनता - मूलक ज्वर आदिकी शान्ति भी मानी है । सुगन्धित रसके फेंकनेसे दुर्गन्धित विषाक्त- परमाणु एवं कीटाणु नष्ट हो जाया करते हैं । यह वात पौरस्त्य एवं पाश्चात्य दोनों प्रकार के भिषक लोग मानते हैं । इस प्रकार होलीकी क्रियाएँ विज्ञान - मूलक हैं, असभ्यता मूलक नहीं ।

( १० ) कई विद्वानोंका यह विचार है कि होलीके अवसर पर गाना, बजाना, नाचना, कूदना आदि अज्ञानमूलक नहीं । शरद्, हेमन्त, शिशिर ऋतुओं में सभी लोग नवीन बलवीर्यशाली बनते हैं । शक्ति - संचय हो जाने पर वासन्तिक वायुके प्रभावसे विलास कर रही हुई प्रकृतिकी छटा देखनेसे प्रेमरूपमें कामकी उत्पत्ति भी स्वाभाविक हुआ करती है । इस कारण प्राचीन समय में इस अवसरपर कामदेवकी पूजाका प्रचार भी था । इस कारण वसन्त ऋतुको भी ' कामदेवका सखा ' कहा जाता है । वृद्धोंमें भी इस अवसर पर स्फूर्ति हो जाया करती है ।

किसी भी प्रवृत्तिके रोकने से कई रोगोंकी उत्पत्ति हो जाया करती है । यह बात ' चरक संहिता ' के वेगनिग्रहण - हानिनिरूपणा- ध्यायमें स्पष्ट है । कोप - शोक आदिके वेगको रोकने से बहुत से लोग पागल या बीमार हो जाते हुए देखे गये हैं । चिन्तासे वे व्यक्ति मानसिक - रोगोंसे पीड़ित होकर क्रमसे बड़े - बड़े रोगोंको प्राप्त हो जाते हैं । शोक एवं हर्षके वेग रोकने से तो क्षण में ही ' हार्टफेल ' हो जाने की सम्भावना भी रहती है । इस प्रकार मूत्रपुरीष - वेगों को रोकनेपर भी रोग हो जाया करते हैं । इस तरह कामके

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वेगको रोकनेपर भी रोगके वेगकी आशंका सम्भव हुआ करती है । तब गाना, नाचना आदि - साधनों तथा यथेच्छ भाषण एवं. हास - उपहासोंसे उन दिनों उस वेगको चरितार्थ कर दिया जाता है; नहीं तो पथरी आदि रोगोंका उपद्रव, वीर्य हानि तथा क्लीवताके उदयका प्रसंग उपस्थित हो सकता है । तब वैसी वासन्तिक - वायुसे मस्त अपनी प्रमदाओं को वैसे पुरुष प्रसन्न कैसे कर सकते हैं?

जो व्यक्ति सारा वर्ष गम्भीर - विचार में लगे रहते हैं; थोड़ा भी हास्य आदिमें प्रवृत्त नहीं होते, ' अति सर्वत्र वर्जयेत् ' ‘ नाति कुत्रापि शोभते ' इस न्यायसे उनके लाभार्थ सप्ताह में रविवारकी तरह वर्ष में यह होली स्थिर की गई है । इस कारण सभी इस अवसरमें राज - यक्ष्मा आदिके मूलभूत सतत परिश्रमकी प्रकृतिको छोड़कर नाचने - कूदने - आदिमें लगे हुए अपनी जीवन - यात्राको सुपरिणाम वाली बनाया करते हैं । इस प्रकार अलौकिक स्फूर्ति एवम् अदम्य उत्साहके उदय होने और नवीन - रक्तके संचारसे सम्पूर्ण वर्ष आनन्दसे बीत जाता है । गृहस्थ में शान्ति रहती है । ' सन्तानोंके मनोविनोद के साथ उनका स्वास्थ्य भी बढ़ता है । इसके अतिरिक्त सब हिन्दुओं का इन अवसरोंपर सम्मेलन तथा संगठन विधर्मियों तथा राष्ट्रके शत्रुओंके चित्तमें कंपकपी उपस्थित कर दिया करता है । जिससे इस भारतपर कुदृष्टि करनेमें उनका उत्साह शेष नहीं रहता ।

इस प्रकार शास्त्रीय - मर्यादाओंका प्रसारक, सुस्वास्थ्यका उत्पादक, देशरक्षाका सम्पादक, मनोमालिन्य वा उदासीनताको 872-८७२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )

दूर भगाने वाला, शत्रुओं के चित्तपर चोट करने वाला, धर्म, अर्थ, कामकी मर्यादा फैलाने वाला, दूरदर्शीजनों के मनमें विहरण करने वाला होलीका यह महोत्सव पूर्ण - वैज्ञानिक एवं रहस्यमय है । यह विचार करनेसे स्वयं स्पष्ट हो जाता है । अन्तमें हम यह कहे विना नहीं रह सकते कि इस हास - परिहास में भी ' नाति कुत्रापि शोभते ' इस न्यायसे इतनी ' अति ' नहीं कर देनी चाहिये, जिससे शिष्टताका उल्लंघन हो जाय; और धर्म - मर्यादा कहीं अतिक्रांत हो जाय । हाँ, जो पाश्चात्य - चमत्कृति से चौंधियाई हुई आँखों वाले आपको इस उत्सव में सहयोग नहीं देना चाहते, आप उनको उनकी दयापर छोड़ कर उनसे कोई भी छेड़ - छाड़ न करते हुए अपने मित्र मण्डल में ही शिष्टजनोचित मनोविनोद करें, यही सामयिक मर्यादा है, जिनका पालन सामयिक - कर्तव्य है ।

सूचना - गत पृष्ठों में कई प्रूफकी भूलें रह गई हैं; वे ठीक कर ली जावें । पृ ० ६६ ‘ इन्द्रकी मूर्ति ( ऋ ० ४ | २४ | १० ) । पृ ० २८८ श्रघस्तम्ब- आपस्तम्ब । पृ ० ३४७ तीर्थस्थान- तीर्थस्नान । पृ ० ३५६ मेघा आपः- मेध्या आपः । पृ ० ३६१ ' गायत्रेण त्वा ' ( ५१२ ) । पृ ० ५४४ पं ० ६ संकुचित - संधुक्षित | पृ ० ६०४ पं ० १२, १, ३८, ३४, ००० यहां १, ३८, २४, ००० पाठ है । पृ ० ६४२ सीतया सह सचमानः- सज्जीभवन् । सु - असा स्वसा - सुन्दरी । पृ ० ८१० में ' गणानां त्वा ' यह मन्त्र और उसके ५ प्रियपति, ६ निधिपति, ७ वसु यह नाम देख लें । पृ ० ८५६ ( श्र. सा. ) - ( अ. स. ) । पृ ० ८५६ श्रवमेधयज्ञ - अश्वमेधयज्ञ । इत्यादि ।

873( १० ) ‘ ओम् ' का महत्त्व |

‘ गिराम् अस्म्येकमक्षरम् ' ( भगवद्गीता १०।२५ )

हम ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थके पञ्चम - पुष्पके आरम्भमें श्रीगणेशका मङ्गलाचरण कर चुके हैं; उसके द्वितीय- निबन्धमें हमने

यह गणपति गणेशको प्रतीक- मूर्ति सिद्ध की है । ग्रन्थके मध्यमें हम ब्रह्मके प्रतीक ' गायत्री मन्त्र ' का, तथा ब्रह्मकी प्रतिमा ' संवत्सर ' का वर्णन करके उनका भी एक ढंगसे मङ्गलाचरण कर चुके हैं । ग्रन्थके अन्त में भी महाभाष्य - आदिमें मङ्गलाचरणका विधान आया है; तदनुसार अब अन्तमें हम यहां जगत्प्रसिद्ध अक्षरात्मक ' ओम्'का मङ्गलाचरण करते हुए इस निबन्धमें उसके विषयमें ज्ञातव्य -बातोंका उल्लेख करके इस पञ्चम- पुष्पको ( छठे - पुष्पके • प्रकाशनकी सम्भावना लेकर जिसमें हमें सभी पाठकोंका सहयोग अपेक्षित है ), समाप्त करेंगे ।

' ओम् ' का वेदोंसे सम्बन्ध ।

' ओम् ' की वेदों, स्मृतियों आदि सबने महिमा गाई है । यह ब्रह्मका सर्वश्रेष्ठ नाम ( कात्यायन -कृत सर्वानुक्रमणी ४ | १ ) माना जाता है । वेद हमारे सनातन हिन्दुधर्मके अक्षय निधि हैं । ' मनुस्मृति ' ( २ | ७४ ) में उसी वेदके अध्ययनके आरम्भ और अन्तमें ' ओम् ' का पढ़ना आवश्यक माना गया है ।

' नैषधचरित ' महाकाव्य ( ३।७५ ) में दमयन्तीने हंसको भी यही सूचित किया था कि - " यदि तुम मेरा नलसे विवाह न करना 874' वेद ' मानते हो; तो उस वेदसे पूर्व ' रात्रिका भी चन्द्रसे भिन्न पति हो सकता है ' यह ' ओंकार ' भी साथ लगा दो । इससे ' ओम् ' का वेदोंसे सम्बन्ध सिद्ध होता है । ' मनुस्मृति ' ( २७६-७७ ) में परमेष्ठी - द्वारा ' ओम् ' के ' अ, उ, म् ' इन तीन वर्णोंको और गायत्रीकी तीन व्याहृतियों तथा तीन पादोंको तीन वेदोंसे दुहना माना है । इससे यह सूचित किया है कि जैसे हिन्दुधर्ममें वेद सर्वश्रेष्ठ हैं, जैसे द्विजोंके लिए वेदत्रयनिष्पन्न गायत्री सर्वश्रेष्ठ है, वैसे ही वेदत्रय से. निष्पन्न ' ओम् ' भी सर्वश्रेष्ठ है । यह भी ' त्रिवृद् - वेद ' है । ( मनु ० ११।२६५ ) ।

' ओम् ' शब्द की सिद्धि ।

' ओम् ' शब्द वेदाङ्ग - व्याकरणके अनुसार ' अ ' ( ६०० ) ( भ्वा ० प ० से ० ) धातुसे ' अवतेष्टिलोपश्व ' ( उ ० १११३६ ) इससे मन् - प्रत्यय करनेपर तथा प्रत्ययको टि का लोप होनेपर ' ज्वर - स्वर ' ( पा ० ६।४।२० ) से सारी धातुको ऊठ् आदेश करके उसे गुण करने पर बनता है । ' नित् ' होनेसे यह आयुदात्त स्वरवाला है । इसका विग्रह है- ' अवति इति ओम् ' । अव् धातुके उन्नीस अर्थ होते हैं । इतने अर्थ अन्य किसी धातुके नहीं हैं । वे उन्नीस अर्थं निम्न हैं -१ रक्षण, २ गति, ३ कान्ति ( शोभा ), ४ प्रीति, ५ तृप्ति ( इच्छाकी पूर्ति ), ६ अवगम ( ज्ञान ), ७ दीप्ति ( तेज ), ८. श्रवण, & स्वाम्यर्थ ( स्वामित्व ), १० याचन, ११ क्रिया, १२ इच्छा, १३ प्रवेश, १४ अवाप्ति ( प्राप्ति ), १५ श्रालिङ्गन, १६ हिंसा, .१७ आदान ( लेना ), १८ भाग, १६ वृद्धि । यह सभी सांसारिक

In English

The Origins and Significance of Holi

This text explains the Vedic roots of Holi through the ritual of offering new grain to fire. It also describes the mythological stories of the demoness Dundha and the devotee Prahlada, as well as the seasonal importance of spring.

This chapter answers

  • Why is grain offered to fire during holi?
  • What is the story of prahlada and holika?
  • How does spring relate to the holi festival?
  • What is the meaning of touching different castes during holi?

Also written: Holi, Vigyanaki, Kasautipara, Holi Vigyanaki Kasautipara, होली विज्ञानकी कसौटीपर

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 861–874 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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