पञ्चम सुमन · प्रकरण 19
पितृमेध वा अन्त्यकर्म
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303शास्त्रानुसार अस्थिसंचयन, नित्यक्रिया, दशगात्रादि - कर्म, एकोद्दिष्ट, सपिण्डन, धर्मशान्ति तथा श्राद्धादि पितृकर्म मृतकके आत्माकी सद्गतिकेलिए करने पड़ते हैं । ब्राह्मणोंको यह क्रिया ११ वें १२ वें दिन तथा शुद्धि बारहवें दिन करनी चाहिये । स्त्रीकेलिए यज्ञोपवीत विधान न होनेपर भी - ' नाभिव्याहारयेद् ब्रह्म स्वधानिनयनाद् ऋते ' ( मनु ० २ १७१ ) इस वचनके अनुसार मृतक - कर्म- सम्बन्धी मन्त्रोंका उच्चारण निषिद्ध नहीं है, अतः पुत्रादि न होने पर स्त्री भी पतिकी अन्त्येष्टि कर सकती है । उक्त पद्यका अर्थ आर्यसमाजके विद्वान् श्रीतुलसीराम - स्वामीजीने यही किया है - ' उसकी मौञ्जीबन्धनसे पूर्व कोई श्रौतस्मार्त आदि क्रिया ठीक नहीं है । मौञ्जीबन्धन ( उपनयन ) से पूर्व वेदका उच्चारण न करावे, परन्तु मृतक - संस्कारमें वेदमन्त्रोंका उच्चारण वर्जित नहीं है । ' इधर विवाहिता होनेसे तथा द्विज- वंशीया होने से द्विजा होनेके कारण पतिसद्गतिकारक स्वनियमित कर्मविशेष वह पुरोहितादिकी सहायतासे कर सकती है । अस्तु ।
क्षत्रियोंको पितृसंस्कारसम्बन्धी सपिण्डनादि कर्म १२ वें १३ वें दिन तथा शुद्धि १३ वें दिन करनी चाहिये । वैश्यको उक्त कर्म १४ वें १५ वें दिन और शुद्धि भी १५ वें दिन करनी चाहिये । कहीं - कहीं सभी द्विजोंके लिए १२ वै दिनकी प्रथा है ।
यह पितृमेध संस्कार भी आवश्यक है । पुरुषका आदिम संस्कार होता है ' जातकर्म '; यह उसके जन्मके समय किया जाता है । जन्मकी समाप्ति मरणमें होती है; तब मृतक - संस्कार भी 304आवश्यक है । जैसे प्रस्ताव में उपक्रम, फिर मध्य, अन्तमें उपसंहार भी अनिवार्य हुआ करता है; तभी उसकी पूर्णता मानी जाती है; वैसे ही संस्कारोंमें यदि आदिम ' जातकर्म ' है, तब संस्कारों में अन्तिम ' मृतककर्म ' वा ' अन्त्यकर्स ' ही स्वाभाविक है । अतः यह संस्कार प्रयोजनीय है, पर मृतक के अङ्गों पर हवन कर्तव्य नहीं । किन्तु उस मृतककी वैवाहिक अग्निमें अन्त्येष्टि करके उसी अग्नि से मृतकका दाह कर लेना चाहिये । ' दाहयेदग्निहोत्रेण यज्ञपात्रैश्च धर्मवित् ' ( ५।१६७ ) ।
इस मनुपद्यसे मृतकपरं ' अग्निहोत्र शब्द से ' हवन ' इष्ट नहीं, यहां पर ' अग्निहोत्र ' का अर्थ ' अग्निहोत्र ' की अग्नि ही है, हवन करना नहीं; जैसे किं श्रीकुल्लूकभट्टादिने भी लिखा है- ' अग्निहो- त्रेण श्रौतस्मार्ताऽग्निभिः । ' इसी कारण अग्रिम पद्यमें – ' भार्यायै पूर्वमारिण्यै दत्त्वाग्नीनन्त्यकर्मणि ' ( ५।१६८ ) । यहां मृतकको अन्त्य- कर्ममें अग्नि देना कहा है, हवन करना नहीं । ' अग्निहोत्र ' शब्द यहां ' अग्निवाचक ' है, इसमें प्रमाण - ' अग्निहोत्रं समादाय गृह्य चाग्निपरिच्छदम् ' ( मनु ० ६ । ४ ) यह पद्य है । यहां पर वानप्रस्था- श्रममें अग्निहोत्र अर्थात् अग्निहोत्रकी अग्नि ही ले जाना इष्ट है, हवन नहीं । हवन कैसे ले जाया जा सकता है? अतः इसका श्रीकुल्लूकभट्टादिने ‘ श्रौताग्निम् आवसथ्याग्निम् ' यही अर्थ किया है । यही मृतकका जीवनावस्थामें रक्खी हुई यज्ञाग्नि से दाह ही पितृ- ( मृत ) मेध हुआ करता है । यहाँ पर वह मृतक ही उस अग्निको आहुति बनता है; मृतक पर आहुति नहीं करनी पड़ती । 305इस प्रकार वैध संस्कारसे मृतक के श्रात्माकी परलोकमें सद्गति
करती है ।
संन्यासीकी वैवाहिक अग्नि तो होती नहीं; अतः उसका उससे संस्कार भी नहीं होता; तब उसकी भूमिमें समाधि वा जलसमाधि ही उसका पितृमेध हुआ करता है । पहले से ही उसके जीवन्मुक्त होनेसे उसका सद्गतिदायक पितृकर्म कर्तव्य नहीं रहता; पितृकोटि से ऊँची गति प्राप्त करनेके कारण उसके सपिण्डनादि भी नहीं करने पड़ते । शेष रही विधवा स्त्री, यद्यपि उसकी स्वतन्त्र अग्नि तो होती नहीं, पर मृतक पतिका पतित्व तो उसमें — ' प्राणैस्ते प्राणान्त्संदधामि, अस्थिभिरस्थीनि, मांसैर्मांसानि त्वचा त्वचम् ' ( पारस्करगृह्य ० १ । ११ । ५ ) - अस्थि त्वचाकी स्थिति तक रहता ही है । इसीसे वह द्विज भी रहती है; अतः मृत्यु होनेपर उसका भी अग्निसंस्कार कर्तव्य हो जाता है । उसके पतिकी अन्तर्हित अग्निको पुनः प्रकट करके उसका दाह - संस्कार ठीक ही है ।
शेष रहे शूद्र, उनके कई श्रमन्त्रक संस्कार माने जाते हैं; अतः यहाँ उनका अमन्त्रक दाहमात्र हो जाना चाहिए । शेष रहे चातुर्वर्ण्यसे भिन्न अन्त्यज तथा अवर्ण आदि; तथा दो वर्ष से कम के बच्चे आदि; सो उनके असंस्कृत वा संस्कारानई होनेसे भूमिखनन वा जलप्रवाह ही शास्त्रसम्मत तथा युक्तिसङ्गत है- ' नास्य कार्यो- ऽग्निसंस्कारो न च कार्योदकक्रिया । ' ( मनु ० ५/६६ ) इनका अग्निदाह - संस्कार या जलाञ्जलिदान न करे ।
परन्तु आजकल हिन्दु - मुसलमानका प्रश्न सामने होने से अब 306हिन्दुत्वका चिह्न शिखा और दाह मान लिया गया है; अतः अन्त्यजों आदिका भी असंस्कृत अग्निसे दाहमात्र ही कर देना पड़ता है, अन्य कोई क्रिया नहीं । एक तो अग्निदाहसे रोगोंके फैलने का डर नहीं रहता, दूसरा पृथिवी नहीं रुकती; हजारों मुर्दे एक स्थान पर जल जाते हैं, कृषि - कर्म तथा नगरोंकी आबादीको कोई बाधा नहीं पड़ती । श्मशानको शहर से बाहर ही होना चाहिए, जिससे कि मुर्देके परमाणु हानि न पहुँचायें ।
' भस्मान्तथं शरीरम् ' ( यजुः ४०।१५ ) शरीर की भस्मान्त गति कही गई है । आश्वलायन गृह्यसूत्र में शवके बाल काट देना भी लिखा है । इसका यह भाव हो सकता है कि बालोंके जलने से अशुद्ध वायु फैलती है । उन वालोंको काटकर श्मशानमें वहीं दबा देना पड़ता है । मृतक के पुत्रादिका मुण्डन क्रियामें अधिकारार्थ है, क्योंकि क्रियामें वाल अशुद्ध ( अमेध्य ) माने जाते हैं; इसके अतिरिक्त उस समय ब्रह्मचर्य रखना पड़ता है । अतः उस समय बालोंका मुण्डन ठीक ही है, इसीलिए यज्ञोपवीतके समय भी ब्रह्मचर्यके आश्रयणीय होनेसे उसमें भी मुण्डन कराना पड़ता है । तीर्थ में भी इसीलिए मुण्डन कराना पड़ता है । विधवाको भी एतदर्थ ही मुण्डित - सिर रहना पड़ता है । आर्यसमाजके म ० म ० पं ० आर्यमुनिजीने यागमें सिरके बाल मुडानेका समर्थन करनेकेलिए अपने मीमांसार्यभाष्य ( ३/८/४ ) में - ' मृता वा एषा त्वग् अमेध्या यत् केशश्मश्रु, मृतामेव त्वचममेध्यामपहत्य यज्ञियो भूत्वा मेधमुपैति । ' ( ' निश्चय ही यह मरी हुई और अपवित्र त्वचा है 307जोकि सिर और दाढ़ी - मूंछके वालोंके रूपमें है । उस मरी हुई एवं पवित्र त्वचाको काटकर यज्ञानुष्ठान के योग्य होकर मनुष्य यज्ञको प्राप्त होता है । ' ) ' यह श्रुति उद्धृत की है - जिससे उक्त बातकी पुष्टि होती है | इस प्रकार ( ४ | ३ | १ ) मीमांसासूत्रमें—
' केशश्मश्रू वपते, दतो धावते ' मृता वै एषा त्वग्, अमेध्यं वा अस्य एतद् आत्मनि शमलम्, तदेव उपहते । मेध्य एव मेधमेव- मुपैति । ' ( ' केश और दाढ़ी - मूंछ के बाल कटाता है, दाँत घोता है, यह मरी हुई त्वचा है । यह बाल अपने शरीर में अपवित्र मल है । उसके कट जाने पर पवित्र होकर ही मनुष्य यज्ञको प्राप्त होता है । ' ) इस शावर भाष्य में भी यह स्पष्ट किया है । उक्त श्रुति तैत्तिरीयसंहिता ( १।१।२ ) में आती है । यह और्ध्वदैहिक क्रियाके समय में मेध्यतार्थ मृतकके उत्तराधिकारीके शिरोमुण्डनका रहस्य है । यह मुण्डन निर्मूल भी नहीं है । बोधायनीय पितृमेधसूत्र में है कहा-
' एतस्मिन् काले अस्य [ प्रेतस्य ] अमात्याः [ सहचारिणः पुत्रादयः ] केशश्मश्रुणि वापयन्ते ( मुण्डयन्ति ), ये संनिधाने भवन्ति । ' ( १ | १२ | ७ ) ( ' इस समय इस मृतकके अमात्य सहचारी पुत्र आदि, जो उसके निकट होते हैं, सिरके बाल और दाढ़ी - मूंछ
हैं । '
इसी प्रकार ' आग्निवेश्यगृह्यसूत्र ' ( ३ | ६ | २ ) में भी कहा है- ' श्रुतवता तु वप्तव्यमेव असंनिधानेऽपि ' ( बोधा ० पितृ ० १।१२।८ ) ( ' जिसने पितादिकी मृत्युका समाचार सुन लिया हो, उसे दूर होने 308पर भी मुण्डन करवाना ही चाहिए । ) पितृमेधशेषसूत्र में भी कहा है - ' पुत्रस्तु अकृतचौलोऽपि मातरं पितरं वा दग्ध्वा चौलवत् तूष्णीं वपनम् ' ( १।१० ) ( ' पुत्रका चूड़ाकरण - संस्कार न हुआ हो तो भी माता अथवा पिताका दाह करके चूडाकरण- संस्कारकी ही भांति विना मन्त्रके सिरका बाल मुंडा दे । ' ) ' नास्य केशान् प्रवपन्ति ( मुण्डयन्ति ) नोरसि ताडमाघ्नते । ' ( १६ । ३२ । १ ) ( ' उसके लिए केश नहीं कटवाते और छाती भी नहीं पीटते । ) अथर्ववेदसंहिताके इस मन्त्रके अनुसार पिता आदिकी मृत्यु होने पर छाती पीटना और केशोंका मुण्डन कराना सूचित होता है । आपस्तम्बधर्मसूत्र के ' घ ' पुस्तकमें भी कहा है-
' ब्राह्मणश्च एतस्मिन् काले [ मरणे ] श्रमात्यान् केशश्मश्रूणि वा वापयते । ' ( २।१५।११ ) ( ' ब्राह्मण इस अवसर पर मृतकके पुत्र आदिका मुण्डन करवाता है । ) ' प्रयागे तीर्थयात्रायां मातापितृ- वियोगतः । कचानां वपनं कुर्यात् । ' ( ' तीर्थयात्रा के प्रसंग से यदि माता - पिताकी प्रयाग में मृत्यु हो जाय तो पुत्र अपने केशोंका मुण्डन करवा दे । ) इस भविष्यपुराण के वचन से भी माता - पिताके मरण में मुण्डन सूचित होता है ।
जीवितको सोनेके समय सिर दक्षिण में और पैर उत्तरमें करने पड़ते हैं । पर मृतकके सिरको उत्तर में और पैरोंको दक्षिण में करना पड़ता है । इसका भाव यह है कि उत्तरी ध्रुव विद्युत् - पुञ्ज रहता है; उत्तरकी ओर सिर रखनेसे वह विद्युत्- पुञ्ज शरीरकी विद्युत्को खींच लेता है, तब मृतकके शरीरका भी विद्युत् पुख 309उधर खिंच जाता है । पर यदि जीवितका विद्युत्- पुञ्ज उत्तरमें सिर रखने से खिंचता जावे, तो वह निर्बलताको प्राप्त होकर वृद्धावस्था में विकृत - मस्तिष्क होकर पागल हो जाता है ।
इस प्रकार यह सोलह संस्कार विवृत कर दिये गये हैं । जो महोदय अन्त्येष्टिको संस्कारों में परिगणित नहीं करते, वे उपनयन और वेदारम्भको पृथक् - पृथक् संस्कार गिन लेते हैं । तब भी संस्कारोंकी १६ संख्या पूर्ण हो जाती है । जो केशान्तको भी पृथक् संस्कार नहीं गिनते, वे विवाह और श्रौतस्मार्ताग्निपरिग्रहको पृथक् - पृथक् संस्कार गिन लेते हैं, तब भी संस्कारोंकी १६ संख्या पूर्ण हो जाती है । हमने उपनयन और वेदारम्भके परस्पर अनिवार्य सम्बन्ध होनेसे इसी प्रकार विवाह और अग्निपरिग्रहके भी अनिवार्य सम्बन्ध होने से इनको भिन्न - भिन्न संस्कार न मानकर एक - एक ही संस्कार माना है । श्रीमनुजीके आशय से हमने वानप्रस्थ, संन्यास तथा पितृकर्म - इनको भी संस्कारों में रक्खा है । इस विषय में उपपत्तियाँ भी दी हैं ।
यह संस्कार जहाँ शास्त्रीय हैं, वहाँ रहस्यपूर्ण भी हैं । सनातनधर्मके स्तम्भ हैं । हिंदुके हिन्दुत्वको स्थिर कर देनेवाले हैं । खेद है— आजकल विवाहके अतिरिक्त कोई संस्कार भी यथाविधि सम्पन्न नहीं होता, तब हिन्दुओं में हिन्दुत्वकी निष्ठा भी भला कैसे रहे? प्रसिद्ध है- ' नवे हि भाजने लग्नः संस्कारो नान्यथा भवेत् । ' नये पात्रपर ( नूतन बालकके मनपर ) पड़ा हुआ संस्कार कभी बदल नहीं सकता ।
310जब नये पात्रपर लगा संस्कार भी अन्यथाभावको प्राप्त नहीं करता, तव विधिपूर्वक मन्त्रोच्चारणादिक्रिया द्वारा हुआ गर्भका एवं नवीन पात्र बालकका संस्कार भला अन्यथाभावको कैसे प्राप्त हो सकता है? वेदमन्त्रोंका शब्द में ही विशेष गौरव माना जाता है । अर्थमें लौकिक गौरव भले ही हो; पर अलौकिक गौरव शब्द में ही होता है । इसलिए वेदमन्त्रोंके अनुवादद्वारा संस्कार - कार्य न कराकर अधिकारियोंके वेदमन्त्रोंके शब्दोच्चारणद्वारा ही संस्कार- कर्म होते हैं । इन सस्वर पठित मन्त्रोंका संस्कार उस नवपान पर पड़ता है, इससे वह अपने धर्ममें स्थिर रहता है, विधर्मियों में सम्मिलित होकर उनकी संख्या बढ़ानेवाला नहीं होता । अपने धर्म में निष्ठावान् रहता है, उसे कुतर्क उससे च्युत नहीं कर सकते । अतः हिंदुओंका कर्तव्य है कि वे यथाधिकार इन संस्कारोंको सम्पन्न करें और उनके रहस्योंका प्रचार एवं प्रसार करके ऐहिक - यश तथा पारलौकिक - पुण्य के भागी बनें ।
सोलह संस्कारोंके विज्ञानका संक्षिप्त वर्णन हम कर चुके; अब हिन्दुधर्मके आचार - विचारोंका जो प्रातः से लेकर रात्रि तक प्रतिदिन अवलम्बित किये जाते हैं, वा कहे जाते हैं; - उनका संक्षिप्त वर्णन एवं उनका वैज्ञानिक रहस्य ' आलोक ' पाठकोंकी सेवामें उपहृत किया जाता है; आशा है — वे मनोयोग से इधर दृकूपात करेंगे ।
311( ८ ) हिन्दुधर्मके आचार - विचारोंका वैज्ञानिक रहस्य ।
' मनुस्मृति ' में असामयिक मृत्युके कारणों में ' आचारस्य च वर्जनात् ' ( ५।४ ) आचारका छोड़ना भी एक कारण गिना गया है; तब हम लोगोंके अल्पायुष्ट्रमें एक कारण अपने आचार - विचारोंका छोड़ देना भी है । इस अर्थापत्तिसे सिद्ध होता है कि अचारका पालन एवम् आचार - शुद्धि रखने से पुरुषकी पूर्णायु होती है । जैसे कि — आयुर्वेदके कई नियमों के अतिक्रमणसे पुरुष उसी दिन मर नहीं जाता; किन्तु उससे होनेवाली वह हानि उसके अन्दर संचित हो जाती है, क्रमशः निर्बलता बढ़ने पर वह सब हानियाँ संचित होकर रोगको प्रकट करके नियमातिक्रमणकर्ताको खाट पर सुला देती हैं; वैसे ही धार्मिक नियमोंका अतिक्रमण करने से भी पूर्ण आयुमें उतनी न्यूनता पड़ जाती है, पुरुष उससे अल्पायु हो जाता है । इससे आचारोंका अदृष्टमें जहाँ पारलौकिक फल - लाभ है, वहाँ दृष्टमें ऐहिक फलका लाभ भी हुआ करता है । अदृष्टफलका प्रति- पादन अध्यात्मविद्याके अधीन है । अध्यात्मविद्या हीं प्राकृतिक अथवा शास्त्रीय नियमोंका निदान बताती है कि - ऐसा ' क्यों ' है? फिर विज्ञान उन प्राकृतिक वा शास्त्रीय नियमोंका यह ' कैसे ' है— यह प्रयोजन बताता है ।
आचारोंका आयु जनक
- होनेसे शरीर के साथ सम्बन्ध स्वतः- सिद्ध है ' । ' शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ' के अनुसार धर्मके आदिम साधन शरीर के रक्षक होनेसे मनुस्मृति में ' आचारः परमो धर्मः ' 312( १।१०८ ) आचारको - परम धर्म कहा है । ' आचाराद् विच्युतो विप्रो न वेद - फलमश्नुते । श्राचारेण तु संयुक्तः सम्पूर्णफलभाग् भवेत् ' ( १।१०६ ) यहाँ पर आचार से होनके वेद -ज्ञानकी भी निष्फलता बताकर आचारका माहात्म्य कहा गया है । हिन्दुधर्म सनातनधर्मने जो आचार नियमित किये हैं, आजकी जनता उसमें ' क्यों ' और ' कैसे ' जानना चाहती है । हम इसमें प्राचीन एवम् अर्वाचीन विद्वानों के विचारोंको आधारीभूत करके उन आचारोंके रहस्य बतायेंगे । इन पर चलने से जनता को ठोकरें न लगेंगी और लक्ष्य अनायास प्राप्त हो जाएगा । इतना याद रखना चाहिये कि — इन आचारोंका भी अदृष्टमें ही लाभ है; अतः यह नित्यकर्म हैं; हाँ, इनके दृष्टफल भी दीखते हैं; अतः हम उनका निरूपण करते हैं; पर मुख्य उद्देश्य इनका भी अदृष्टमें धर्मसंचय करना ही है । अतः जो उन दृष्ट प्रयोजनोंको न भी चाहता हो; उसे भी इन आचारोंको छोड़ नहीं देना चाहिए, किन्तु यह हमारे आभ्युदयिक तथा निःश्रेयसधर्मके मूलभूत होनेसे इन आचारोंका पालन नित्यकर्मरूपसे अवश्य ही करना चाहिए ।
आज सनातनधर्मके प्रत्येक आचारपर समालोचनाका कोलाहल सुन पड़ता है । आज शिखा रखना शिरमें भार रखना माना जाता है । यज्ञोपवीतका प्रयोजन पूछा जाता है । लंगोट वा लांगका बांधना क्यों? विवाह अपने निकट सम्बन्धियोंमें ही क्यों न हो? शूद्र ब्राह्मणोंके साथ और ब्राह्मण शूद्रोंके साथ विवाह क्यों न करें; दोनोंके ही दो हाथ और एक सिर हैं । प्रातः उठने में
In English
Funeral Rites and Ancestral Observances
This text details the specific timing and procedures for funeral rites according to different social classes. It explains how cremation should be performed using existing family fires and discusses the ritual necessity of shaving one's head during mourning.
This chapter answers
- When should funeral rites be performed for brahmins vs kshatriyas?
- Can a woman perform funeral rites for her husband?
- How is cremation performed according to shastra?
- Why do people shave their heads after a death in the family?
- What are the burial customs for those outside the varna system?
Also written: Pitrimedha, Va, Antyakarma, Pitrimedha Va Antyakarma, पितृमेध वा अन्त्यकर्म