पञ्चम सुमन · प्रकरण 18

परिव्रज्या वा संन्यासका रहस्य

मुद्रित पृष्ठ 299–302 4 पृष्ठ

299परलोक - लाभार्थ धर्म - कर्म में संलग्न रहे । घरकी चिन्ता तथा गृहस्थके धन्धोंसे मुक्त हो जाय । इसमें मुख्यतया आरण्यकोंका स्वाध्याय करना पड़ता है, तपस्या तथा विविध व्रत आदि करने पड़ते हैं । संसारसे सम्बन्ध धीरे - धीरे हटाकर मुनिवृत्ति अवलम्बन करनी पड़ती है । यज्ञ यहाँ भी करने चाहिएँ । यहाँ मुख्यतया निष्काम कर्म करने पड़ते हैं । पचास वर्ष तक पूर्ण अनुभव हो जाने से मुनि लोग धर्म - प्रचारार्थ इन पच्चीस वर्षों में ५१ से ७५ तक वेदार्थ - व्याख्यानरूप ग्रन्थरचना भी करते थे, समाधि से · प्राप्त ज्ञान उनका सहायक होता था । उनको अन्नादिसे उदर - पूर्तिकी चिन्ता नहीं करनी पड़ती थी; देश उनको इस चिन्तासे मुक्त कर देता था । तब वे नये - नये अनुसंधान तथा आविष्कार करके लोक- हिताधायक नियमोंका प्रचार करके उनको ग्रन्थ - बद्ध करते थे । नास्तिक वा सनातनधर्म - द्वेषी लोगोंके तर्कोंका प्रत्युत्तर दार्शनिक- ग्रन्थ रूपमें निबद्ध कर देते थे । यही वानप्रस्थाश्रमका रहस्य है ।

( १५ ) परिव्रज्या वा संन्यासका रहस्य ।

इसमें पूर्व सर्व कर्मोंका संन्यास ( त्याग ) करना पड़ता है । इसमें अग्निका भी त्याग करना पड़ता है, अग्नि लिवानेवाली स्त्रीको भी छोड़ना पड़ता है; क्योंकि स्त्री धर्म, अर्थ, काम इस त्रिवर्गका साधन है, चतुर्थ मोक्षका नहीं । मोक्ष - पथमें तो वह— ' एषा कण्ठतटे कृता खलु शिला संसारवारां निधौ ' - ( ' संसार- सागर में डूबनेवालों के लिए यह स्त्री गले में बाँधी हुई शिलाके समान है । रोड़ा रूप है । ) उसे अपने पुत्रोंके सहारे छोड़ 300दिया जाता है । इसमें पुत्रादि - सबसे अपना सम्बन्ध सर्वथा छोड़कर सदाचारी, दम्भरहित, निश्चल होकर मुमुक्षुत्वका अवलम्बन करना पड़ता है । साथ ही ग्रामग्राम में घूमकर उपदेश श्रादिसे जनोपकार भी किया जाता है; वह सांसारिक अव्यवस्था तथा अज्ञानको दूर करता है । संन्यासी पुरुष चलता - फिरता पुस्तकालय, चलता - फिरता ज्ञान होता है । सब सन्देहों का निराकर्ता होता है । तब उसका भोजन- निर्वाह भी देशको ही करना पड़ता है । यह सदा देशमें शान्ति - व्यवस्था भी करता है, जनहिताधायक सब कार्य करता है ।

इस आश्रम में ज्ञानका संचय करना पड़ता है । इसमें वित्तैषणा, लोकैषणा ( यश ), पुत्रैषणा आदि सभी एषणाओंका त्याग करना पड़ता है । इसमें तन, मन, धन अपने नहीं रहते । धनका तो वानप्रस्थके आश्रयण करते ही त्याग कर दिया जाता है; अब तन तथा मनको भी जनताकी भलाई में लगा दिया जाता है । इसमें गेरुए रंगके वस्त्र पहनने पड़ते हैं । गेरू रंग नेत्रहितकारी; दाह, पित्त, कफ, रुधिरविकार, ज्वर, विष, विस्फोटक, अर्श, रक्त, पित्तको हरनेवाला होता है । रक्तसंशोधक होनेसे त्वग् - रोग नहीं होते ।

इसमें कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड तक सीमित शिखा तथा यज्ञोपवीत - सूत्र तथा यज्ञोंका भी त्याग करना पड़ता है । ७६ वर्षसे लेकर शेष जीवन तक इस संन्यासाश्रमको ही अवलम्बन करना पड़ता है । वानप्रस्थाश्रम तक पुरुषका स्त्री तथा परिवारसे कुछ 301सम्वन्ध बना रहता है । ' यह मेरा है ' ' यह तेरा है ' ऐसा व्यवहार कुछ रहा करता है; परन्तु संन्यास में ' तेरा मेरा ' - भाव तनिक भी शेष नहीं रहता । यहाँ तो संसारसे पूर्ण वैराग्य करना पड़ता है । किसीकेलिए मोह, शोक नहीं करना पड़ता । निःस्वार्थता, निष्कामता रखनी पड़ती है । इसमें तो न कोई लड़का है न लड़की; न स्त्री; न भाई; न जमाई, न वहिन; न मित्र, न शत्रु, न अपना, न पराया । यहाँ तो ' वसुधैव कुटुम्बकम् ' करके उदारभाव अवलम्बन करना पड़ता है । संकुचितभाव न रहने से उसे मृत्यु- समय कोई चिन्ता नहीं होती । क्रमप्राप्त संहिताओंके ज्ञानकाण्डीय चार- सहस्र मन्त्रों एवं उपनिषदोंका इसमें मनन करके ज्ञानसंचय करना पड़ता है । इसमें भिक्षासे अपना निर्वाह किया जाता है । अधिक दिनों तक एक स्थान में स्थिति नहीं की जाती ।

मृत्यु हो जाने पर - अग्नि - त्याग हो जाने पर संन्यासीका दाह भी नहीं होता, किन्तु भूमिखनन वा जलप्रवाह ही हुआ करता है । कई विद्वान् ऐसा व्यवहार परमहंसकोटिवाले संन्यासियोंका ही मानते हैं; आदिम कोटिवाले संन्यासियोंका वे यज्ञ - त्याग वा अनग्नित्व स्वीकार नहीं करते; किन्तु उनका निष्काम - यज्ञ स्वीकार करते हैं और उसी यज्ञाग्निसे उसका दाह मानते हैं । संन्यास में ब्राह्मणोंका अधिकार होता है, कइयोंके मतमें समस्त द्विजोंका; पर शूद्र इसका सर्वथा अधिकारी नहीं । स्त्री भी नहीं । पर स्त्री- शूद्रोंका त्यागवृत्ति रूप अवैध संन्यास कहीं - कहीं ' संन्यास ' शब्द से वर्णित मिल जाता है ।

302यद्यपि ' कलौ पञ्च विवर्जयेत् ' इत्यादि वचनोंसे कई हानियों का विचार करके संन्यासको कलिवर्जित किया गया है तथापि - ' यावद् वर्णविभागोऽस्ति यावद् वेद: प्रवर्तते । संन्यासं चाग्निहोत्रं च तावत् कुर्यात् कलौ युगे । ' ( कलिमें जब तक वर्णोंका विभाग है और जब तक वेदी प्रवृत्ति है, तब तक कलियुग में अग्निहोत्र और संन्यास अपने अधिकार के अनुसार करे । इस पूर्ववचन के अपवादभूत देवल - वचनसे वह भी अपवाद रूप से कर्तव्य है ।

( १६ ) पितृमेध वा अन्त्यकर्म

यह संस्कार पितृमेध, अन्त्यकर्म, अन्त्येष्टि वा श्मशान आदि नामसे प्रसिद्ध है । आश्वलायन गृह्यसूत्रादि में इसका वर्णन है । कई गृह्यसूत्रों में इसका वर्णन नहीं मिलता, उसका कारण यह है कि- पहले गृह्यसूत्रोंके ' पितृमेधसूत्र ' पृथक् बने होते थे । जिनको संन्यास का अधिकार नहीं होता अथवा जिन्होंने कलियुगमें संन्यासका निषेध होनेसे वा अब्राह्मणता के कारण संन्यासमें अधिकार न होने सेवा ब्राह्मण होने पर भी अपनी वैसी योग्यता न देखकर संन्यासको स्वीकार नहीं किया, उनकी मृत्युमें अपनी गृह्याग्नि दाह होता है । उस पुरुषके पुत्र, सम्बन्धी आदि उसकी गृह्याग्निको उसके यज्ञपात्रसहित श्मशान में लाकर उसमें गृह्यसूत्रोक्त विधि

अन्त्येष्टिकी आहुतियां देकर उसके उन सभी यज्ञपात्रों को श्राश्वलायन आदिके अनुसार मृतकके अङ्गपर रखकर फिर उस अग्निसे मृतकका दाहमात्र कर देते हैं ।

फिर उसकी उदकक्रिया - तर्पण आदि करके यथासमय

In English

The Stages of Vanaprastha, Sannyasa, and Antyakarma

This text explains the transition from the forest-dweller stage to full renunciation and the rituals for death. It describes how a practitioner moves from family life to detachment through study and asceticism, eventually renouncing all social ties and sacred threads. Finally, it details the funeral rites used for those who did not enter formal monkhood.

This chapter answers

  • What is the purpose of vanaprastha ashrama?
  • Why do sannyasis renounce family and sacred threads?
  • What are the benefits of wearing saffron clothes?
  • How is a sannyasi buried or cremated?
  • What is pitryamedha or antyakarma?

Also written: Parivrajya, Va, Sannyasaka, Rahasya, Parivrajya Va Sannyasaka Rahasya, परिव्रज्या वा संन्यासका रहस्य

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 299–302 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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