पञ्चम सुमन · प्रकरण 20

हिन्दुधर्मके याचार - विचारोंका वैज्ञानिक- रहस्य

मुद्रित पृष्ठ 313–316 4 पृष्ठ

313नींदके हटने से स्वास्थ्य बिगड़ने की आशंका रहती है । सर्दी में प्रातः स्नान करना निमोनियाको न्योता देना है । सन्ध्या करना परमात्माकी चापलूसी करना है; क्या परमात्मा टोडी बच्चा है? जप करने से क्या लाभ है?? ऊँचे स्वर से मन्त्रोच्चारण से मेंडकोंकी तरह टर्र - टर्र क्यों किया जाता है? बाहर अपनी भक्तिका परिचय देना एक पाखण्ड है । क्या ईश्वरकी भक्ति मनमें नहीं हो सकती? व्यर्थं कण्ठको दुखाना क्यों? सूर्य - चन्द्रके ग्रहणमें अनशन क्यों किया जाता है? उत्तरकी ओर वा पश्चिम की ओर मुख करके क्यों न सोया जावे?? घरमें तुलसी - वृक्षका पूजन जडकी पूजा है । पीपलकी पूजा क्यों? शंखकी ध्वनि क्या हड्डीको छूना नहीं? खड़ाऊँ पहनने से क्या लाभ? गायका दूध छानकर क्यों पीया जाता है? कुशासन वा मृगचर्म एवं व्याघ्रचर्मका आसन क्यों? रात में सिरहाने जल क्यों रखा जाता है E?? बच्चोंके गलेमें रक्षा पहराने से क्या लाभ है? कुत्रोंपर घीके दीपकको क्यों जलाना? यज्ञ - हवन करके मनुष्यका अन्न तथा घृत क्यों आग में झोंका जाता है? पृथिवीपर लात मारनेका क्यों निषेध है? भोजनसे पहले ग्रास रखना वा अग्निमें डालना, वा काकबलि क्यों? शास्त्रोक्त दिनचर्या तथा रात्रिचर्यां किस तात्पर्यको रखती है - एतदादि बहुतसे प्रश्न ' आज पूछे जाते हैं । प्रष्टा लोग इनके ऐहिक लाभ भी पूछना चाहते हैं । यद्यपि सनातनधर्म में एतदादि नियम, व्रत एवं पर्व साक्षात् अदृष्ट फलक तथा धर्मार्थ ही माने जाते हैं; तथापि उनके अवान्वर प्रयोजन रूप ऐहिक लाभ भी होते हैं; उनसे आत्मिक शक्ति तथा 314मानसिक - शक्ति एवं शारीरिक शक्ति भी प्राप्त होती है ।

संसारमें जैसे - जैसे विज्ञान - शक्तिकी वृद्धि होगी; वैसे - वैसे ही सनातनधर्मके सिद्धान्तों, नियमों, तथा व्रत पर्वो आदिका महत्त्व भी बढ़ता चला जावेगा । वर्तमान शङ्काकर्ताओं का भी इनके विज्ञानके जाननेमें तात्पर्य हुया करता है; अतः हम भी एतद्विषयक विज्ञानको इतस्ततः संकलित करके अपनी शैलीसे लिखेंगे ।

पहले यह जानना चाहिए कि- प्राचीनकाल में भी विद्यद्- विज्ञान तथा योग - विज्ञानकी विशिष्ट उन्नति थी । महावली रावणने दुर्जयशक्तिके द्वारा लक्ष्मणको निस्पन्द कर दिया था । यह प्राचीन- कालमें तडिद् - विज्ञानकी उन्नतिका प्रमाण है । बाणोंमें विद्युत्शक्ति डालने की क्रियाको आजके पाश्चात्य आविष्कारक भी अभी आविष्कृत नहीं कर सके । नागपाशशक्ति, सम्मोहनात्र आदि अद्भुतशक्तिसे मिले हुए अस्त्र भी जो पुराकालमें थे; उनमें तडिद्- विज्ञानको उन्नति स्पष्ट अनुमित हो रही है । देवमन्दिरके ऊपर अष्टधातुके चक्रकी, अथवा त्रिशूल आदिके जोड़ने की जो विधि आज भी प्रचलित है; यह भी विद्यदु - विज्ञानकी उन्नतिका चिह्न है; क्योंकि आजके विज्ञानकी दृष्टिसे भी यह प्रमाणित हो गया है कि – अष्टधातुका चक्र बिजलीके पतनको हटाता है । इसलिए देवमन्दिरके ऊपर उसे स्थापित किया जाता है ।

फलकी ओर अंगुलि तक न उठाना, न ' छुए हुए अन्नको

इस प्रकार उत्तराभिमुख सिर न करके सोना, नये कच्चे न खाना, चैलाजिन- कुश - कम्बलके आसनपर बैठकर उपासना 315करना; सौभाग्यवती स्त्रियोंको सुवर्णके भूषणोंकी आज्ञा देना, विधवाको न देना - एतदादिक प्राचीन नियम प्राचीन युगमें विज्ञानकी उन्नतिको परिचायित करते हैं । श्राजके विज्ञानने भी प्रमाणित कर दिया है; कि- उत्तरकी ओर सिरकरके सोनेसे दुःस्वप्नोंकी सम्भावना होती है; क्योंकि — पृथिवीका स्वाभाविक विद्युत् - प्रवाह दक्षिण से उत्तराभिमुख चलता है, इस कारण वैसे सोनेसे रक्तकी गति पांवसे मस्तककी ओर अधिक रूप से हो सकती है । इस प्रकार कच्चे फलकी ओर अंगुलि उठाने से वह हमारी शारीरिक विद्युत् द्वारा दूषित हो जाता है । इस प्रकार शूद्र में तमोगुणकी अधिकतासे उससे छुआ हुआ अन्न भी उसकी दूषित विद्युत् द्वारा दुष्ट होने से, श्रेष्ठ विद्य त् वाले ब्राह्मणके शरीर में

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अहितकारक सिद्ध होता है । पृथिवी सदा जीव - शरीरान्तर्गत विद्य त्को आकर्षित करती रहती है ।

उपासनाके समय मनुष्यके शरीर में सात्त्विक विद्युद - वृद्धि होती है, पर पृथिवी पर बैठकर उपासना करनेसे उस विद्युत्संग्रह की पृथिवी द्वारा नष्ट होनेकी आशंका रहती है; किन्तु चैलाजिन कुश - कम्बल तथा लकड़ीके फट्टे के व्यवधानसे पुरुषकी विद्य 3 त्- शक्तिको पृथिवी नहीं ले सकती, अतः वैसे आसन पर बैठकर सात्त्विक विद्युत् क्षीण नहीं होती ।

सुवर्ण आदि धातुएँ विद्युत बढ़ानेवाली होती हैं । विद्युत - शक्ति के बढ़नेसे शारीरिक - इन्द्रियोंमें विशिष्ट स्फूर्ति हो जाती है । इन्द्रियोंमें विशिष्ट - स्फूर्ति होनेसे; तथा सुवर्ण में कीटाणुनाशिनी 316शक्ति होनेसे स्त्रियाँ सुख - प्रसव करके सुसन्ततियोंको उत्पन्न कर सकती हैं । इसीलिए प्राचीन ऋषि - मुनियोंने स्त्रियोंको धातुरत्नादि - मय अलङ्कारोंको धारण करनेका आदेश दिया था । पर विधवा स्त्रियोंको उन्होंने वैसी आज्ञा नहीं दी । विद्युद् - विज्ञानपूर्ण इन आचारोंको सुनकर साधारण बुद्धिवाले भी व्यक्ति जान सकते हैं कि — प्राचीन ऋषि - मुनियोंने इस सूक्ष्म विज्ञानको कितनी उन्नत अवस्था तक पहुँचाया था । तब उन्हीं मुनियोंके बनाये प्राचीन सिद्धान्तों में उन मुनियोंने विविध विज्ञानोंको नहीं रखा था - ऐसा कहनेका कौन साहस कर सकता है? इस कारण इस विषय में ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के इस पञ्चम- पुष्पमें उन रहस्योंका वर्णन अनुचित नहीं होगा — यह सोचकर उसमें विज्ञानका यथाशक्ति विवरण किया जायगा ।

तथापि यह याद रखने की बात है कि पहले समय में प्रायः इनके प्रयोजन वा लाभ नहीं बताये जाते थे; उसमें यह कारण है कि- पहले इन नियमों में धर्म जानकर इनका आचरण किया जाता था; तब वे उन लाभों को भी प्राप्त कर लेते थे; पर आजकल पहले उनके लाभोंको पूछते हैं । फिर उन लाभोंको सुनते वा जानते हुए भी लोग उन नियमोंका उपयोग नहीं करते । जैसे— शंख आदि, तथा शिखा आदिके लाभोंको जानते हुए भी, सुनते हुए भी वे उनका उपयोग नहीं करते । उसमें धार्मिक अनिवार्यता न देखकर उसमें उपेक्षा कर जाते हैं । परिणामस्वरूप वे उन लाभोंसे भी वचित रह जाते हैं । तब हमारे पूर्वजोंका इन

In English

The Science Behind Sanatana Dharma

This text argues that Hindu rituals and daily observances are based on advanced ancient sciences rather than just religious duty. It claims that practices like sleeping direction, using specific seating, and wearing gold have practical benefits related to electrical and bodily energies.

This chapter answers

  • Why should i not sleep with my head facing north?
  • What is the scientific reason for sitting on grass or wood during worship?
  • Why do hindu traditions suggest women wear gold jewelry?
  • How does electricity relate to ancient hindu rituals?
  • Why is it important to use specific mats for meditation?

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मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 313–316 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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