पञ्चम सुमन · प्रकरण 68
शयनके समय विशेष दिशाका विचार
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571प्रभावको नष्ट करनेमें अखण्ड दीपक प्रभावशाली सिद्ध होता है । जिस घरमें दीपक कभी नहीं जलता; अग्नि कभी नहीं जलती; वहाँ इसीलिए ही तो भूतप्रेतोंका श्रावास माना जाता है । वहाँ रोग - कीटाणु वहुत फैले रहते हैं; जो बहुत हानिकारक सिद्ध होते हैं । उससे शारीरिक - रोग और मानसिक उद्वेग याक्रमण करते रहते हैं । इसी कारण पितृ - कर्म में दीपक अनिवार्य हुआ करता है, क्योंकि – ' अग्निर्हि रक्षसामपहन्ता ' ( शत ० १ | २ | १ | ६ ) अग्नि सूक्ष्म- राक्षसोंको दूर करने वाला होता है । ' ये रूपाणि प्रतिमुञ्च- मानाः, असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति । परापुरो निपुरो ये भरन्ति, अग्निः तान् लोकात् प्रणुदाति श्रस्मात् ' ( यजु ० वा ० सं ० २।३० ) इस मन्त्रमें अग्निको असुरोंके दूर करनेवाला माना है; इसीसे सपिण्डनादि - कर्म में इस मन्त्रको पढ़कर अग्नि वा दीपक आदिको जलाया जाया करता है । यज्ञ, आरती आदिमें घृतके दीपक जलाये जाते हैं; गङ्गा आदि नदियोंके तटपर भी दीपक जलाया जाया करता है । दिवाली तो दीपकों का त्योहार है ही । व्यापक रूपसे दीपकोंका त्योहार मनाकर दरिद्रताकी व्यापक - शक्तिको घटाने और लक्ष्मी - शक्तिका बल बढ़ानेका आयोजन वहाँ किया जाता है । तिलके तेल के दीपकमें भी विशेष शक्ति मानी जाती है । फलतः घृत - दीपक कूप आदि पर जलाना ऐहिकामुष्मिक- लाभप्रद है ।
( ७० ) शयनके समय विशेष दिशाका विचार ।
अब पाठकोंके शयनका समय होगया है । किस दिशा की ओर
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सिर करके सोया जावे— - अब यह विचार अपेक्षित है; उस पर विचार रखा जाता है । शास्त्रों में शयन के समय पश्चिम और उत्तर में सिर करनेका निषेध आता है; अतः सिर पूर्व दिशा वा दक्षिण दिशामें किया जाय । ' यथा स्वकीयान्यजिनानि सर्वे, संस्तीर्य वीराः सुषुपुर्धरण्याम् । अगस्त्यशास्ताम् ( दक्षिण दिशाम् ) अभितो दिशं तु शिरांसि तेषां कुरुसत्तमानाम् ' ( महाभारत ११६४ / ८-६ ) यहाँ पर युधिष्ठिर आदिका सोते समय दक्षिण दिशा की ओर सिर करना दिखलाया है ।
' प्रत्यगुत्तरशिराश्च न स्वपिति ' ( ३ | १ | ४ ) ' वैखानसगृह्यसूत्र ' के इस वचनमें पश्चिम तथा उत्तरमें सिर करके सोनेका निषेध किया गया है । इसका कारण विज्ञान यह बताता है कि- उत्तरीय - ध्रुवसे दक्षिणी - वकी घोर इस प्रकारकी लहरें चलती हैं, जो मस्तिष्कको हानि पहुँचाती हैं । इसलिए उत्तर दिशा की ओर शवका सिर किया जाता है ।
पश्चिम दिशा में सिर करनेके लिए शतपथ ब्राह्मण में निषेध किया है - ' तस्मादु ह न प्रतीचीन - शिराः शयीत ' ( ३ । १ । १ । ७ ) । उसका कारण यह है कि- ' प्राची हि देवानां दिकू ' ( शत ० २८ | ३ | १८ ) पूर्व - दिशा देवताओंकी दिशा है । उधर पैर करनेसे देवताओंका अपमान होता है । पूर्व दिशाकी ओर सिर रखने से देवताओंके सम्मानकी बात आयुर्वेद भी बताता है - ' प्राच्यां दिशि स्थिता देवाः, तत्पूजार्थं च तच्छिरः ' ( सुश्रुतसंहिता -सूत्रस्थान १६।६ ) । प्रहनक्षत्रादि सभी पश्चिमसे पूर्व की ओर जाते हैं; अतः पूर्व - दिशा 573स्पष्ट देवदिशा है । पूर्वं वा दक्षिण दिशामें सिर करके सोना प्रशस्त है - यह संकेत हम पूर्व दे ही चुके हैं; उसमें विज्ञान यह है कि समस्त ब्रह्माण्डकी गति ध्रुवकी ओर होती है, और ध्रुबकी स्थिति उत्तर - दिशामें होती है । इस कारण ब्रह्माण्डके अन्तर्गत पृथिवी के भीतरकी विद्य दुधारा भी दक्षिण दिशासे उत्तराभिमुख प्रवाहित होती है । इसलिए जहाजके कुतुबनुमाकी चुम्बककी सुई भी सदा उत्तराभिमुख ही रहती है । समुद्र में दिशा- ज्ञानका उक्त यन्त्र ही एकमात्र साधन होता है ।
यदि हम उत्तराभिमुख सिर करके सोर्वे, तो वह पार्थिव - विद्युत् हमारे पाओं से होकर हमारे सिरकी ओर प्रवाहित होगी, जिससे शिर में कई रोग हो जाएँगे, जिससे मस्तिष्क में रोग हो जायगा । और स्नायुपुञ्जमें अस्वाभाविक उत्तेजनाकी वृद्धि होनेसे प्रकृति अस्वस्थ रहा करेगी । सारा दिन परिश्रम करने से मस्तिष्क और हमारे स्नायु स्वयं ही दुर्बल हो जाते हैं; तब नींदमें भी यदि विपरीत विद्युत् - पुञ्ज लिया जायगा; तो शरीर में अस्वास्थ्य बढ़ेगा । दक्षिण दिशाको ओर सिर करके सोने से वह विद्युत् सिरसे पांचोंकी ओर जाती है । इससे अस्वास्थ्यकी सम्भावना नहीं रह जाती ।
पश्चिम की ओर सिर करके सोने पर भी वही हानि है; जो उत्तरकी ओर सिर करके सोनेसे होती है; क्योंकि — जैसे पार्थिव विद्युत् दक्षिणसे उत्तराभिमुख प्रवाहित होती है; वैसे ही सूर्यदेव की प्रारणसयी विद्युत - शक्ति भी पूर्व से पश्चिमाभिमुख प्रवाहित होती है । उक्त विज्ञानके अनुसार पश्चिमकी ओर सिर करके सोने से 574मस्तिष्क तथा स्नायुमण्डलमें वैसे ही पीड़ा होगी । तभी तो वैखानसधर्मसूत्रमें कहा है- ' आर्द्रपाद:, प्रत्यग् ( पश्चिम ) उत्तर- शिराश्च न स्वपिति ' ( ३ | १ | ४ ) यहां पर गीले पांच तथा पश्चिम एवं उत्तरकी ओर सिर करके सोनेका निषेध किया है । तब पूर्व वा दक्षिणकी ओर सिर करके ही सोना ठीक है ।
शास्त्रों में उत्तराभिमुख वा पूर्वाभिमुख होकर पूजा - पाठादि दैवकार्य करने का आदेश अवश्य है; उसमें कारण यह है कि सौर एवं पार्थिव विद्युत् शक्तियों का सम्बन्ध उस समय शरीर के साथ रहेगा; जिससे वह शक्ति - सम्पन्न रहेगा ।
( ७१ ) ब्रह्मचारीका भूमिपर वा तख्त पर सोना ।
ब्रह्मचारीको खाटपर सोनेका निषेध किया है, उसे या तो भूमिपर सोना पड़ता है, या लकड़ी के तख्तपर । लेकिन यदि वह गृहस्थाश्रम से पहले ही खाट पर सोवे; तो उसकी निन्दार्थ उसे ' खट्वारूढो जाल्मः ' यह कहते हैं । यहां पर ' खट्वा क्षेपे ' ( पा ० २।१।२६ ) इस पाणिनिसूत्र से निन्दा अर्थ में समास होता है ।
एक तो खट्वा स्त्रीको कहते हैं; उसपर आरोहणका आशय यह हुआ कि - इसने समयसे पूर्व ही ब्रह्मचर्य व्रत तोड़ दिया । ऐसेको अवकीर्णी कहा जाता है । दूसरा - खट्वा खाटको भी कहते हैं । गृहस्थाश्रम से पूर्व उसे खाटपर नहीं सोना चाहिये । इस बात में भी विज्ञान है । वह यह कि - ब्रह्मचारीको २५ वर्ष तक ब्रह्मचर्य रखना चाहिये । ८ वर्षसे २५ वर्ष तक पुरुषकी वृद्धिका काल है । खाटपर सोनेपर उसमें वानके होनेसे खाट स्वाभाविक
In English
The Importance of Lamps and Directions for Sleep
This text explains the spiritual and physical benefits of keeping lamps lit to ward off negative influences and disease. It also details which directions are appropriate for sleeping to avoid harm from magnetic and solar currents, while noting specific sleeping rules for brahmacharis.
This chapter answers
- Why is lighting a lamp important in a house?
- Which direction should i sleep with my head facing?
- Why is sleeping with head towards the north bad for health?
- Can i sleep on a bed if i am a brahmachari?
- What are the benefits of sleeping facing east or south?
Also written: Shayanake, Samaya, Vishesha, Dishaka, Vichara, Shayanake Samaya Vishesha Dishaka Vichara, शयनके समय विशेष दिशाका विचार