सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 591–600
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 591–600
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उपवास एवं एकादशी - विज्ञान २६३ अवलम्बन करनेपर न तो आपको डाक्टरोंकी आवश्यकता रहेगी, न अस्पतालों में रहने की, न दवाइयोंकी, न जुलावकी, न किसी अन्य साधनकी! इसमें कुछ खर्च भी नहीं होता, अपितु कुछ बचत ही होती है । पर इतना ध्यान रहे कि उपवासके समाप्त हो जानेपर फिर भोजन पर टूट न पड़ो, कलकी कसर न निकालो; किन्तु प्रतिदिनसे पर्याप्त कम भोजन करो; फिर रात्रिको उस प्रातःके भोजनसे कुछ अधिक । फिर दूसरे दिन स्वाभाविक - भोजन करो । यदि ऐसा नहीं किया जावेगा, तो इससे शारीरिक बहुत भारी हानि हो सकती है । इस व्रत आदिमें स्नान, दान, भजन - पूजन तथा ध्यान आदि भी आवश्यक अङ्ग हैं, यह कभी न भूलना चाहिये । जैसाकि हम पहले कार्तिक माहात्म्य के पद्यसे पूर्व सूचित कर चुके हैं । इनका लाभ बच्चेसे लेकर बूढ़े तक समानभावसे होता है । इस प्रकारका व्रतकर्ता ही प्राणियों में सद्भावना रखता है, विश्वके कल्याणमें एवं उपकार - वृत्ति में रहता है । वह दूसरोंका धन हड़पने में नये - नये आविष्कारोंकी खोज में नहीं रहता । वह सदा सत्य - व्यवहारमें निरत रहता है । जो बात धर्मनिरपेक्ष राजकीय - कानूनोंसे लाख सिर पटकनेपर भी नहीं होती; वह शुक्तवृत्ति, सात्त्विकता इसी धार्मिक नियमके अवलम्बन से अनायास सम्पन्न हो जाती है । इस प्रकारके महान् लाभदायक, नवजीवन- सचारक, व्रतोप-वासका एकादशी तिथिमें नियमतः अवलम्बन करना हम सबके लिए आवश्यक है । जो पहिले इसमें कठिनता अनुभव करें; वे
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ५६४ उस दिन अन्न तथा ओदन ( चावल ) तो अवश्य छोड़ दें । ' एका-दश्यामन्ने पापानि वसन्ति ' यह बात सूर्य - चन्द्रके आकर्षण - विकर्षण आदिके प्रभावके कारण सर्वथा सत्य है; इस पर उपहास करना अपने अल्पश्रुतत्वको प्रकट करना है— इन्हीं दिनोंके अन्नवैषम्यके कारण मृत्युएँ भी प्रायः इन्हीं तिथियों में होती हैं । इस दिन मुनि -धान्य श्यामाक ( सांवक, समांके चावल ), कूटू का आटा, अथवा फल आदिका उपयोग करना चाहिये । फिर क्रमशः उपवासका अभ्यास भी करना चाहिये । दूसरे दिन लघु तथा मित भोजन करना चाहिये । इस प्रकार करनेसे पूर्व कहे हुए लाभ अनायास प्राप्त हो सकेंगे । हमें ' आलोक ' के पाठकों से आशा है कि वे एकादशीव्रतका नियमतः अवलम्वन करके अपने तथा दूसरोंका लाभ करने में सक्षम हो सकेंगे । इसमें आपके भीतरी अवयव-प्रत्यवयव अवकाश पाकर फिर नवीन हो जाएंगे; नवीन शक्तिको पा कर भावी रोगों से मुकाबला करके उन्हें हरा देंगे । तब विशिष्ट रोगोंकी उत्पत्ति न होने से निर्वलता, चित्तकी उद्विग्नता आदि हटकर चित्त सात्त्विक रहेगा । सत्त्वगुणकी वृद्धि होनेपर भगवान् के ध्यानमें मग्नताकी शक्ति होनेसे हमें सद्गति मिलेगी । यही एकादशीव्रतका विज्ञान है - यही ' श्रीसनातनधर्मालोक का सन्देश है । कार्तिक - माहात्म्यमें ठीक ही कहा है – ' तपो नाऽनशनात् परम् ' ( १७।२५ ) ' व्रतं नैकादशीसमम् ' ( १७१२७ ) । यह भोजनका प्रकरण होने से हमने एकादशीव्रत के विषय में कहा है ।
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विशेष- विशेष तिथियोंमें उपवासका विज्ञान ५६२ ६५. विशेष - विशेष तिथियों में उपवासका विज्ञान । एकादशी तिथिमें उपवासार्थ हम लिख चुके; शास्त्रों में अष्टमी, चतुर्दशी, पूर्णिमा, अमावस्या आदि में भी व्रत - उपवास कहे गये हैं । उनमें सूर्य - चन्द्र आदिके आकर्षण - विकर्षणका तारतम्य ही कारण है । अष्टमी, एकादशी, पूर्णिमा आदि में पृथिवीपर चन्द्रके आकर्षण का बहुत प्रभाव पड़ता है । जल तरल पदार्थ है; इसलिए इन तिथियों में समुद्र के जलमें उद्वेलन हुआ करता है । शरीर में भी कफ, रक्त, मस्तिष्क आदि जो जलीय पदार्थ हैं, उक्त - तिथियोंमें इनमें भी उछाल आना स्वाभाविक है । चन्द्रमाके इस प्रकारके आकर्षण से ही एकादशी, पूर्णिमा, अमावास्या आदि तिथियोंमें वातरोग और कफ आदिकी वृद्धि होती है । अतः इन तिथियोंमें कम खाना चाहिये । अथवा सूखी वस्तुएँ खानी चाहियें; अथवा रात्रिमें नहीं. खाना चाहिये । ठीक तो यह है कि - दिन - रात उपवास किया जाय । उपवाससे देहके रसका शोष होने से शरीर में चन्द्रके आकर्षण का प्रभाव नहीं पड़ता । तब उसकी अधिकता से आशङ्कित रोग भी नहीं होते । चन्द्रमा मनका देवता होता है; अतः इन तिथियों में उसके आकर्षणका प्रभाव मनपर होता है, जिससे मन चञ्चल हो जाता है । उन दिनों उपवास एवं भगवान् के ध्यानसे, दुर्बल हुआ मन शान्त हो जाता है और विषय - वासनाएँ न्यून हो जाती हैं । ( ६६ ) गायका दूध । ' आलोक'के पाठक प्रातःकालकी चर्चा पूरी कर चुके । फिर
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५६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) मध्याह्नको भोजनादि भी कर चुके । अपने कार्योंका निर्वाह करके सायं - सन्ध्या से निवृत्त होकर रातको भोजन कर चुके । अब वह आपके आमाशयमें पहुँचने वाला है । अब उसके बाद आपके दूध पीनेका क्रम है । गायका दूध प्राणप्रद, रक्तपित्तनाशक, पौष्टिक रसायन है । उसमें भी काली- गायका दूध त्रिदोषनाशक, परम-शक्तिवर्धक और सर्वोत्तम होता है । गाय अन्य पशुओं की अपेक्षा सत्त्व - गुणयुक्त है, दैवी शक्तिका केन्द्रस्थान है । दैवी शक्तिके सम्बन्धसे गोदुग्धमें सात्त्विक बल है । इससे जहाँ पुष्टि होती है, वहाँ भोजनका परिपाक भी होता है । कभी रोग नहीं लगता । भैंस आदिका दूध स्थूलताकारक एवं तामस तथा शीघ्र नींद लाने वाला होता है । ( ६७ ) काली गाय दूधकी विशेषता । किसी भी पदार्थका अपना रंग नहीं होता । सूर्यकी शुभ्र किरणोंमें कई किरणें पदार्थोंको हजम कर लेती है, शेष किरणें रंगको प्रकाशित करती हैं । जो रंग प्रकाशित करता है; वही उस पदार्थका रंग होता है । जो पदार्थ सब रंगोंको प्रकाशित करता है, वह सुफेद रंगका होता है । और जो सब रंगों को हज़म कर लेता है; वह काले रंगका होता है । इससे काले रंगमें सब रंग छिपे हुए होते हैं - यह बात सिद्ध होगई । इसीलिए काली गाय अपने शरीर में सूर्य की सातों किरणोंको पचा लेती है; रंगके साथ सूर्यकी आकर्षण शक्तिको भी खींच लेती है । इसी कारण काली गायके दूधमें भी बहुत शक्ति होती है । इसीलिए मूर्तिपूजामें भी
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बखसे छाने बिना गायका दूध न पीना १६७ श्रीकृष्णकी मूर्ति काली होती है । उसे काली गायके स्थानपर समझना चाहिये । उसके साथकी राधाकी मूर्ति सफेद होती है, उसे दुग्ध - स्थानीय समझना चाहिये । शालग्राम, राम, जगन्नाथकी मूर्ति इसीलिए काली होती है; वह सूर्यशक्तिकी आकर्षक होनेसे पूजनेपर हमें भी सूर्यशक्तिके लाभों को देती है । यद्यपि भैंस भी काली होती है; परन्तु वह तामसिक - पशु होनेसे सूर्यशक्तिको प्राप्त करके अत्युष्ण वलवाले और तमोगुण-वर्धक दूधको देती है - इसीलिए वह पहले नियमका अपवाद है । इसलिए जिसे अनिद्रा - रोग हो, उसे भैंसके दूधका उपयोग करनेकेलिए आयुर्वेद में कहा जाता है । अर्थात् भैंसके दूध से व्यक्ति-को नींद बहुत आती है । वह व्यक्ति ऊँघता रहता है; आलसी बना रहता है । इसीलिए भैंसका दूध तामस होनेसे बुद्धिको कम करने-वाला भी होता है । जो सात्त्विकता चाहते हैं; वे भैंस के दूधको छोड़कर गाय के दूधका प्रयोग करें । बकरीका दूध भी यद्यपि बहुत गुणकारी होता है, विशेष रोगों में लाभप्रद भी होता है, तथापि शास्त्रीय - संसार में उसे भी सात्त्विक नहीं माना जाता । गायमें देवनिवास आदि अन्य भी विशेषताएं हैं; अतः काली गायका दूध तो सर्वोत्तम होता है । ( ६८ ) वस्त्रसे छाने बिना गायका दूध न पीना । गायके स्तनसे जब दूध दुहा जाता है; तो उसके स्तनोंपर रोम होने से घर्षणवश दूध दुहने के समय वे दूधमें गिर सकते हैं । गायके लोमके पेटमें जानेपर बड़ा पाप होता है - ऐसा हिन्दुओंका
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२६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) विश्वास है । यह ठीक भी है । किसी भी पशुका बाल यदि पेट में चला जाए, तो हानि होती है । गोलोमसे तो राजयक्ष्मा आदि रोग भी सम्भव हो सकता है । अतः गायका दूध छानकर पीना ही श्रेयस्कर होता है । ( ६ ) घृतका दीपक जलानेका विज्ञान । रातका प्रकरण चला हुआ है । रात्रिके आरम्भ में कुवै आदि पर घृतका दीपक जलाना यह सनातन प्रथा है । केवल रात तो क्या, दिनको भी । इसी प्रकार देवमन्दिरों में भी दिन - रात घृतके दीपक जलानेकी प्रथा है । कहीं - कहीं तो अखण्ड - घृत का दीपक भी जला करता है । जब पहिले कुए बनाये जाते थे, वहाँ एक ऐसा स्थान बनाया जाता था; जहाँ हिन्दुलोग श्रद्धासे घृतका दीपक जलाया करते थे । एक तो उसमें वरुणदेवका पूजन भी लक्ष्य होता था । दैनिक -देवपूजन हवनमें ' इति वरुणाय, न मम ' कहकर हम वरुणको घृतकी आहुति देते हैं; तो कूपपर दीपक जलाना यह भी हमारी जलके स्वामी वरुणदेवको घृतकी आहुति - सी हो जाती थी । • इसमें लौकिक लाभ भी बहुत से हैं । रातको कू एसे जल लेना है; पुरुषोंने भी आना है, स्त्रियोंने भी आना है । कुए पर छत रहनेसे प्रायः रात - दिन उसमें अन्धकार रहा करता है । दीपकसे वहां प्रकाश रहेगा । एक यह प्रत्यक्ष लाभ है कि किसीको जलादि निकालने में असुविधा नहीं होगी । स्त्री - पुरुषोंके इकट्ठे होनेसे प्रकाशवश कोई कुत्सित - काण्ड न होंगे - यह दूसरा लाभ है । तीसरा लाभ यह है कि कुएं की वायु घृताग्निके योगसे शुद्ध रहा
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घृतका दीपक जलानेका विज्ञान ५६६ करेगी । घृतमें कीटाणुनाशिनी शक्ति प्रसिद्ध है ही । कभी - कभी कु'एसे विषाक्त वायु ( गैस ) निकलती है; जो प्राणघातक तक सिद्ध हो जाती है । कभी कभी - समाचारपत्रों में वृत्त देखा जाता है कि-कोई कुए में सफाईकेलिए घुसा, वह वापिस न आ सका, वहीं मर गया; क्योंकि विषाक्त गैससे प्रारणका नाश हो जाता है । तो घृतके दीपक से वहां की अशुद्ध गैस दूर होती रहेगी - यह लाभ हुआ । अन्य लाभ यह है कि यदि उस दिन भीतरी कारणों से सचमुच ही प्राणघातक विषाक्त गैस कुए से अधिक मात्रा में निकल रही होती है - वहां प्रयत्न करनेपर भी वह घृतका दिया जल नहीं सकता, जलानेपर भी बार - बार उस गैसके प्रभाव से बुझ जाता है । इस चिह्नसे कुएं में उतरनेवाले, वा कुएं पर आनेवालोंको सावधानता प्राप्त हो जाएगी । इससे सर्वसाधारणकी आशङ्कित हानि बच जावेगी । इस प्रकार अखण्ड - घृतदीपक जहां भी होगा, चाहे देवमन्दिर में, चाहे घरमें; उसका भी बड़ा लाभ है । घृत शुद्ध होना चाहिये । शुद्ध - घीसे अखण्ड दीपक जलता रखने से एक प्रकारका घृत - हवन निरन्तर अपने आप होता रहता है । ऐसा दीपक जिस स्थानपर प्रकाश करता रहता है, वह स्थान एक नित्य - अदृश्य ज्योतिसे प्रदीप्त रहता है । उस घृतके परमाणु दीपककी ज्योतिकी अग्नि से सूक्ष्म होकर वायुकी सहायतासे हमारे अन्दर प्राप्त होंगे । स्थूल घृत खानेकी अपेक्षा यह सूक्ष्म - घृत हमारे रोम कूपोंके द्वारा घुसकर इन्जेक्शन की भांति बहुत और शीघ्र लाभ देगा । उस दीपक के
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३७० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) निकट वैठकर की हुई उपासना विशेष फलवती होती है । मन्दिर में या घर में बहुत ' लोगोंका आना जाना - या निवास रहता है । उन पुरुषोंके भीतर से श्वास आदि निकलते रहते हैं । वे शुद्ध होते हैं; क्योंकि - भोजन - परिपाकादिके समय उसका विषाक्त अंश हमारे रोम कूपों वा मुखादिसे कारखाने की चिमनी से धुएँकी तरह निकलता रहता है । तब वही एक - दूसरेकी श्वास- वायु कुछ विषाक्त अंशयुक्त होनेसे एक - दूसरेको सूक्ष्म - हानि पहुँचा सकती है, पर अखण्ड - घृतका दीपक रखने से वह विषाक्त प्रभाव धीरे - धीरे मिटता रहता है । इसलिए जप श्रादिमें भी दीपक जलाया जाया करता है, धूप भी । अतः अखण्ड घृत जलते रहना - यह भी एक अखण्ड - यज्ञाग्नि रखनेका संक्षिप्त - संस्करण है । वल्कि उससे भी विशेष है; क्योंकि अखण्ड - अग्नि यद्यपि पहले संधुक्षित होती रहती है; तथापि हवनके समयसे ही उसे प्रज्वलित करके उसमें घृताक्त हवि डाली जाती है; पर घृत - दीपक तो निरन्तर प्रकाशमान होने से उस वातावरणमें दिव्य - ज्योति तथा पूर्वोक्त लाभोंको करता रहता है । अखण्ड अग्निमें प्रातः सायं दो ही वार घृतका हवन होता है - इसमें तो अहर्निश हवन होता रहता है । सूतकके समय प्रसूतिगृह में १० दिन तक अखण्ड - दीपक रखने से सुरक्षा होती है । मृत्युके समय उस मृत्युस्थल पर अखण्ड दीपक जलाना पड़ता है । क्योंकि मृत्युके समय मृतक - शरीरसे निकले हुए रोग - परमाणु, मनकी वेदना, मोह, शोक आदिके
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शयन के समय विशेष दिशाका विचार ५७ प्रभावको नष्ट करनेमें अखण्ड दीपक प्रभावशाली सिद्ध होता है । जिस घरमें दीपक कभी नहीं जलता; अग्नि कभी नहीं जलती; वहाँ इसीलिए ही तो भूतप्रेतोंका श्रावास माना जाता है । वहाँ रोग - कीटाणु वहुत फैले रहते हैं; जो बहुत हानिकारक सिद्ध होते हैं । उससे शारीरिक - रोग और मानसिक उद्वेग याक्रमण करते रहते हैं । इसी कारण पितृ - कर्म में दीपक अनिवार्य हुआ करता है, क्योंकि – ' अग्निर्हि रक्षसामपहन्ता ' ( शत ० १ | २ | १ | ६ ) अग्नि सूक्ष्म- राक्षसोंको दूर करने वाला होता है । ' ये रूपाणि प्रतिमुञ्च-मानाः, असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति । परापुरो निपुरो ये भरन्ति, अग्निः तान् लोकात् प्रणुदाति श्रस्मात् ' ( यजु ० वा ० सं ० २।३० ) इस मन्त्रमें अग्निको असुरोंके दूर करनेवाला माना है; इसीसे सपिण्डनादि - कर्म में इस मन्त्रको पढ़कर अग्नि वा दीपक आदिको जलाया जाया करता है । यज्ञ, आरती आदिमें घृतके दीपक जलाये जाते हैं; गङ्गा आदि नदियोंके तटपर भी दीपक जलाया जाया करता है । दिवाली तो दीपकों का त्योहार है ही । व्यापक रूपसे दीपकोंका त्योहार मनाकर दरिद्रताकी व्यापक - शक्तिको घटाने और लक्ष्मी - शक्तिका बल बढ़ानेका आयोजन वहाँ किया जाता है । तिलके तेल के दीपकमें भी विशेष शक्ति मानी जाती है । फलतः घृत - दीपक कूप आदि पर जलाना ऐहिकामुष्मिक-लाभप्रद है । ( ७० ) शयनके समय विशेष दिशाका विचार । अब पाठकोंके शयनका समय होगया है । किस दिशा की ओर
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ५७२ सिर करके सोया जावे— - अब यह विचार अपेक्षित है; उस पर विचार रखा जाता है । शास्त्रों में शयन के समय पश्चिम और उत्तर में सिर करनेका निषेध आता है; अतः सिर पूर्व दिशा वा दक्षिण दिशामें किया जाय । ' यथा स्वकीयान्यजिनानि सर्वे, संस्तीर्य वीराः सुषुपुर्धरण्याम् । अगस्त्यशास्ताम् ( दक्षिण दिशाम् ) अभितो दिशं तु शिरांसि तेषां कुरुसत्तमानाम् ' ( महाभारत ११६४ / ८-६ ) यहाँ पर युधिष्ठिर आदिका सोते समय दक्षिण दिशा की ओर सिर करना दिखलाया है । ' प्रत्यगुत्तरशिराश्च न स्वपिति ' ( ३ | १ | ४ ) ' वैखानसगृह्यसूत्र ' के इस वचनमें पश्चिम तथा उत्तरमें सिर करके सोनेका निषेध किया गया है । इसका कारण विज्ञान यह बताता है कि- उत्तरीय - ध्रुवसे दक्षिणी - वकी घोर इस प्रकारकी लहरें चलती हैं, जो मस्तिष्कको हानि पहुँचाती हैं । इसलिए उत्तर दिशा की ओर शवका सिर किया जाता है । पश्चिम दिशा में सिर करनेके लिए शतपथ ब्राह्मण में निषेध किया है - ' तस्मादु ह न प्रतीचीन - शिराः शयीत ' ( ३ । १ । १ । ७ ) । उसका कारण यह है कि- ' प्राची हि देवानां दिकू ' ( शत ० २८ | ३ | १८ ) पूर्व - दिशा देवताओंकी दिशा है । उधर पैर करनेसे देवताओंका अपमान होता है । पूर्व दिशाकी ओर सिर रखने से देवताओंके सम्मानकी बात आयुर्वेद भी बताता है - ' प्राच्यां दिशि स्थिता देवाः, तत्पूजार्थं च तच्छिरः ' ( सुश्रुतसंहिता -सूत्रस्थान १६।६ ) । प्रहनक्षत्रादि सभी पश्चिमसे पूर्व की ओर जाते हैं; अतः पूर्व - दिशा