पञ्चम सुमन · प्रकरण 88

श्रीगणेश - चतुर्थी

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767पूजादि कर्मकी विरोधिनी नहीं है । उसका परम पुरुषार्थ मुक्ति ही है, स्वर्ग नहीं । उसका ज्ञानयुक्त कर्म अर्थात् फलाशा - रहित कर्म ही विषय है । ऐसा होनेपर वह कर्म अकर्म ही होकर ज्ञानको प्राप्त कराकर मुक्ति दिलवाता है, फलयुक्त कर्म तो स्वर्गपद प्राप्त कराकर फिर वहांसे गिरा देता है । ' संयमाग्निषु जुह्वति ' इत्यादि यज्ञ वैदिक - देवयज्ञोंकी फलाशात्याग में ही चरितार्थ हैं, कोई नवीनयज्ञ- प्रदर्शन में नहीं ।

ऐसा अद्भुत ज्ञान देनेवाली, हमें गृहस्थ में ही संन्यासका फल देनेवाली, उसी भगवद्गीताकी यह मार्गशीर्ष शुक्ला - एकादशी जयन्ती है । इसमें गीताका उपदेश अनुसृत करके हमें परम- पुरुषार्थं मुक्ति पानेका प्रयत्न करना चाहिये ।

( १७ ) श्री गणेश - चतुर्थी

श्रीगणेशके चार व्रत माने गये हैं । १ म दूर्वागणेश, २ य कपर्दी विनायक, ३ सिद्ध - विनायक, ४ संकट चतुर्थी । इनमें दूर्वागणेश श्रावरण वा कार्तिककी शुक्ला चतुर्थीको होता है । कपर्दीविनायक - व्रत श्रावणकी चतुर्थीसे शुरू होकर भाद्रपद शुक्ला - चतुर्थी तक होता है । सिद्धविनायक - व्रत भाद्रपद शुक्ला चतुर्थीको होता है । ४ संकट - चतुर्थी व्रत माघकृष्ण चतुर्थीको होता है । इनमें संकट- चतुर्थीका वर्णन तो हम अग्रिम निबन्ध में करेंगे; अब यहाँ सिद्ध- विनायक व्रतके विषय में निरूपण करते हैं ।

यह व्रत भाद्रशुक्ला चतुर्थीको होता है । इस दिन चन्द्र - दर्शनका निषेध होता है । इसे वैज्ञानिक रूपमें इस प्रकार वर्णित किया जा

768श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 )

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है । यह तिथि चौमासेमें आती है । चौमासे में सबकी सकता

उदराग्नि मन्द होती है; जिससे खाया - पीया हजम नहीं होता । लोग रोगी हो जाते हैं; उनके कल्याणार्थ चतुर्थी के मध्याह्नमें श्रीगणेश प्रादुर्भूत होते हैं । चौमासे में अग्निमन्दताका कारण होता है सोमकी अधिकता । उस सोमको मन्द करने के लिए श्रीगणेश अवतीर्ण होते हैं । जो उस देवकी पूजा करता है, वह नीरोग हो जाता है ।

उसमें रहस्य यह है कि - गणेश अग्निस्वरूप हैं । उनका पूजन अग्नि- सन्दीपन है । गणेशजीका बीजमन्त्र ' गं ' है । इसमें ग्, अ, और अनुस्वार यह तीन वर्ण हैं । अग्नि सत्यलोकमें रहता है । वह नीचे पृथ्वीलोक में आकर अपने उत्पत्तिस्थानमें फिर वापिस लौटता है । ' ग ' अग्निस्वरूप है । क, ख, ग, घ, ङ यह पाँच अक्षर पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश इन पञ्चमहाभूतोंके प्रतीक हैं । भूतों में अग्निरूप तेज तीसरा है । ककारादि पाँचोंमें तीसरा ' ग ' है । श्रीगजानन गणेशकी सूंड भी गकारकी आकृति की है, अतः अग्निस्वरूप है । अग्नि पञ्चमहाभूतोंके मध्यस्थान में होने से. अग्निस्वरूप - गणेशजीको भी मध्यस्थानमें प्रतिष्ठापित किया जाता है ।

अग्निका वर्ण रक्त होता है, गणेशजीका भी सिन्दूर - वर्ण है । अतः गणेश पार्थिवाग्नि ही है । रुद्रको वेदमें अग्निरूप माना गयो है— ' रुद्राय नमो अस्तु अग्नये ' ( अ ० ७७६२।१ ) । पार्वतीको पृथिवी माना गया है । दोंनोंका लड़का होनेसे ' आत्मा वै पुत्र नामासि ' 769( निरुक्त ० ३।४।२ ) गणेश पार्थिवाग्नि संगत ही हैं । उक्त मन्त्रका ' ग ' आ चुका । शेष ' अ ' मध्याह्नकी सप्त व्याहृतिरूप समरेखाको, और अनुस्वार प्रत्यगात्म - स्वरूपको बताता है । पार्थिवाग्निस्वरूप होने से इस देवका आकार भी स्थूल कहा जाता है । पर उसका वाहन - मूषक ह्रस्वाकार है । पृथिवीके विकार प्लेग आदि बीमारियाँ सबसे पूर्व मूषकपर आक्रमण करती हैं, और मूषक उसका प्रसार करनेवाला सिद्ध हो सकता है । तब लोक - कल्याणार्थ उन विकारों . को दूर करने के लिए उन विकारोंके मूल मुषकको उन पार्थिवाग्निरूप गणेशने अपने नीचे दबा रखा है; अर्थात् उनका वाहन मूषक है । वही पार्थिवाग्निस्वरूप - श्रीगणेश चौमासेमें बढ़ी हुई सोमवृद्धि - रूप अग्निमन्दताको कम करने केलिए जगत् में अवतीर्ण होते हैं; अर्थात् अग्निको तीव्र करते हैं; इससे सोमकी मन्दता. हो जाने से अग्नि और सोमकी समता हो जाती है । समतामें ही नीरोगताका साम्राज्य होता है । इसीलिए कहा जाता है- ' अग्नीषोमात्मकं जगत् ' । सोमकी वृद्धि और अग्निकी मन्दता अस्वास्थ्यका, तथा दोनोंकी समता स्वास्थ्यका कारण होती है ।

भगवान् गणेशके माथेपर सोम होता है; अतः उसे ' भालचन्द्र ' कहा जाता है । जो लोग सोमको मध्याह्नमें गणेशके जन्मकाल में देखते हैं; वे यदि भौतिक सोम अर्थात् चन्द्रमाका रात्रिको दर्शन करते हैं; तो उन्हें कलंक लगता है, अर्थात् दो सोमोंको देखनेसे सोमकी अधिकता तथा अग्निकी मन्दता होती है । ऐसा होनेपर खाये पीये हुए पदार्थकी अजीर्णता ( बदहज़मी ) हो जाती है । 770अजीर्ण ही रोगोत्पत्तिका मूल होता है । इसलिए भाद्रशुक्ला ४ र्थीकी रात्रिमें सोमदर्शनका निषेध किया गया है, यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण है ।

प्राध्यात्मिक - हृटिकोण इससे कुछ भिन्न है । उसमें गणेश ब्रह्म हैं । चन्द्रमा मनका देवता है, और मन चञ्चल होता है, और कुतर्क चूहा होता है । जब तक कुतर्क - आदिके कारण मनकी चञ्चलता रहेगी; तब तक ब्रह्म - दर्शन किसी भी प्रकार नहीं हो सकता है । इसी कारण जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओंमें भी ब्रह्मकी तन्मयता नहीं होती; क्योंकि - वहाँ भी किसी न किसी रूपमें मन अवश्य ही विद्यमान रहता है । चतुर्थावस्था - तुरीयामें मनका लय हो जाता है; उसी दशामें ब्रह्मका तादात्म्य होता है । यही कारण है कि सिद्धिदायक - गणेशरूप- ब्रह्मके पूजनमें मनोदेवता चन्द्रमाका न देखना ही विधान प्रोक्त है ।

गणेशजीका वाहन जोकि—- चूहा बताया गया है, सो चूहा कुतर्कका प्रतीक है | चूहा पदार्थको काट - काटकर खंड - खंड कर देता है । कुतर्क भी प्रत्येक आस्तिक भावको खण्ड - खण्डकर नास्तिकता फैलाता है । सो जहाँ शुष्क - तर्क, दलीलबाजीकी प्रधानता होती है, वहाँ ब्रह्मभाव ( आस्तिकत्व ) भी नहीं रहता । जहाँ ब्रह्मभाव की प्रधानता रहती है, वहाँ शुष्क तर्क दबा रहता है, इसीलिए गणेशरूप - ब्रह्म कुतर्क रूप - चूहे पर सवार हुए - हुए उसे दबाये रहते हैं ।

रुद्र एवं गणेश वैदिक देवता हैं । कृष्णयजुर्वेद - मैत्रायणी संहिता- · के श्य काण्ड, हम प्रपाठकमें, ३ य मन्त्र में रुद्रकी गायत्री, ४ र्थ में गौरीकी, ५ ममें कार्तिकेयकी, ६ ठेमें गणेशकी गायत्री तथा नाराय-

In English

Shri Ganesh Chaturthi

This chapter explains the significance of the Siddha-Vinayaka fast observed on the fourth day of the bright half of Bhadrapada. It argues that Ganesha represents fire (Agni) and is worshipped to balance the excess of moisture (Soma) in the body during the monsoon season. The text also provides a spiritual interpretation where Ganesha represents Brahman and his mouse vahana represents the suppression of irrational logic.

This chapter answers

  • What are the four types of ganesh vrata?
  • Why is moon gazing prohibited on bhadrapada shukla chaturthi?
  • How does ganesha relate to fire and digestion?
  • What is the spiritual meaning of ganesha's mouse vahana?

Also written: Shriganesha, Chaturthi, Shriganesha Chaturthi, श्रीगणेश - चतुर्थी

मूल ग्रन्थ

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