सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 791–800
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 791–800
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गीताका गूढ उद्देश्य वा विषय ७६३ अर्जुनने भी स्वीकार कर लिया कि - ' करिष्ये वचनं तव ( १८/७३ ), तब उसमें यही रहस्य है कि – कामोपभोग छुड़ानेवाले भगवान्, अर्जुनको उस युद्ध से नहीं हटवाना चाहते थे, किन्तु ‘ उसके फलको न चाह कर तू युद्ध कर ' यह भगवान्का अभिप्राय था कि-फलकी कामनासे रहित केवल युद्धरूप - कर्मसे न तो तुम्हें गुरुओं की हिंसाका फल मिलेगा; न पारलौकिक - स्वर्गफल मिलेगा; इसी प्रकार युद्धकी भांति वैदिक - देवयज्ञका फल भी परलोकमें स्वर्ग है— ( गीता १२० ), और इस लोक में इष्टभोगोंकी प्राप्तिका फल है-( गीता ३ | १८ ); तथापि भगवान्का उसे हटवाना इष्ट नहीं; किन्तु युद्ध करवानेकी भांति देवपूजाका करवाना ही इष्ट है, और उसमें पूर्वकी भांति रहस्य यह है कि - फलकी आकांक्षाको मनमें न रखो, अथवा उस देवपूजाका जो फल है; उसे भी मुझमें अर्पण कर दो; उस फलसे अपना सम्बन्ध विच्छिन्न करके देवपूजन करो — इस प्रकार करने से सीमित इष्टफल स्वर्गादिफल वा अनिष्ट - फल बन्धन न मिलेगा, किन्तु असीमित - मुक्तिरूप फल मिलेगा । यही भगवान्ने कहा है – ' अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् । भवत्य-त्यागिनां प्रेत्य, न तु ( कर्मफल ) संन्यासिनां क्वचित् ' ( १८ | १२ ) यहां कर्मफलके त्यागियोंको इष्टानिष्ट दोनों प्रकारके फलकी अप्राप्ति कहकर बन्धनसे मुक्ति ( छुटकारा ) बताई है । तब स्पष्ट है कि - गीता बिच्छूको नहीं मरवाना चाहती, किन्तु बिच्छूके दंशकण्टकं ( डंक ) को ही निकलवाना — दूर करवाना चाहती है । क्षत्रियकेलिए युद्ध भी वैदिक कर्मकाण्डकी भांति सकाम होनेसे स्वर्गादिभोगरूप तथा
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ७६४ गतागतकी बन्धनकी पीड़ा देनेवाले होनेसे बिच्छूके समान है । गीता उस बिच्छूरूप युद्धको, इस प्रकार संसार यात्रारूप युद्धको नहीं हटवाना चाहती; किन्तु उसके डंकके समान उसके फलको ही हटवाना चाहती है । वैसा होनेपर युद्ध - युद्ध नहीं रह जाता; इसलिए उसका फल स्वर्ग भी नहीं मिलता । अकर्स हो जानेसे उससे बन्धनसे मुक्ति ही प्राप्त हो जाती है । इस प्रकार वैदिकयज्ञ, वैदिक - देवपूजादि कर्मके विषय में भी भगवान्का आशय स्वयं समझ लेना चाहिये । पहले कालमें वैदिक कर्मोंसे स्वर्गकी प्राप्ति मानी जाती थी, कर्मसंन्यासरूप अकर्म वा ज्ञानसे मुक्ति मानी जाती थी, परन्तु भगवान्ने उसमें यह सुधार किया कि - वैदिक - कर्मसे भी मुक्ति मिल जाती है; केवल उसमें फलभोगकी आसक्ति छोड़ देनी चाहिये; ऐसा होनेपर अकर्म ( कर्माभाव ) हो जाता है, यही कर्म-संन्यास होता है इसीसे मुक्ति हो जाती है । तभी तो भगवान् ने जहां - तहां कहा है कि - कर्म तो करो; पर उसका फल मत चाहो । इसी बातको यही पद्य बनाता है कि - ' कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ' ( २ | ४७ ) । इसका यह आशय है कि पुरुषोंका कर्म में ही अधिकार है; क्योंकि वह कर्म करने में सक्षम होते हैं । उसके फल में उनका अधिकार नहीं; क्योंकि वह उनके बसकी बात नहीं । किस कर्म का क्या फल होगा और कब होगा, यह वे नहीं जान सकते । वे उसे स्वेच्छानुसार क्रम वा अक्रमसे प्राप्त नहीं कर सकते;
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गीताका गूढ उद्देश्य वा विषय ७६२ क्योंकि - ' यच्चिन्तितं तदिह दूरतरं प्रयाति यच्चेतसा न निहितं तदिहा-भ्युपैति ' अपना सोचा हुआ दूर चला जाता है; न सोचा हुआ आ उपस्थित होता है । पुरुष पुत्रेष्टि यज्ञ कर सकता है; तथापि उसके फलकी प्राप्ति उसके अधीन नहीं होती, किन्तु दैवके अधीन होती है । कोई भी पुरुष कर्मफलका हेतु न बने । कर्मफलासक्त - पुरुष अपनेको इष्ट, अनिष्ट फलका हेतु बना डालता है; अनासक्त तो नहीं ( गीता १८।१२ ) । किसी भी पुरुषकी अकर्म में भी सक्ति न हो; क्योंकि विहित कर्मके त्यागमें सिद्धि नहीं होती । जैसे कि-' न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ' ( 1 ) । और फिर मोहपूर्वक कर्मत्याग तामस होता है - ( १८७ ) । कायक्लेशके भयसे कर्मत्याग राजस होता है ( १८८ ) । और जो स्वरूप से कर्मत्याग चाहे, वह वैसा नहीं कर सकता ( ३५ ) । स्वभाव पुरुषको कर्ममें प्रवृत्त करता ही है ( ३ | ३३, १८५६-६० ) तब हे अर्जुन! तू भी फलासक्ति छोड़कर कर्म कर, यह तात्पर्य निकलता है । लौकिक - दृष्टिसे भी यह पद्य उपयोगी है । हम कर्मकर्ता हैं, उसका फल परमात्मा ही देता है; उसमें जीवका अधिकार नहीं । यदि हम उसमें फलदृष्टि रखेंगे, तब कर्म में विगुणताकी भी आशा हो सकती है । यदि हमें हमारा इष्टफल न मिला; तो हम निरुत्साह होकर अकर्मण्य भी हो सकते हैं । परन्तु भगवान् ने हमारे सामने ऐसा सुन्दर प्रकार रखा है, जिससे हमें अन्तः सन्तोष वा शान्ति होती है । जो परीक्षादित्सु छात्र उत्तीर्णतारूप - फल उद्दिष्ट करके परिश्रम-
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७६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) रूप कर्म करते हैं; उसके फल न मिलने पर वे इस प्रकार निराश हो जाते हैं कि उनमें कई चलती - रेलगाड़ीके नीचे आ गिरते हैं । दूसरे उस परीक्षासे ही विरक्त होकर सर्वथा अकर्मण्य हो जाते हैं । अथवा जो दूसरे केवल उत्तीर्णता की दृष्टि रखनेवाले उत्तीर्णता प्राप्त करके भी जो कि योग्यता प्राप्त नहीं करते; उसका कारण यही होता है कि वहां वे केवल उत्तीर्णताका ही उद्देश्य रख लेते हैं । तब उस फलकी दृष्टिमें उनकी कर्म में विगुणता भी हो जाती है, जिससे उनकी परम - पुरुषार्थरूप योग्यता नहीं होती, किन्तु उन्हें सीमित फल - सर्टिफिकेटमात्र प्राप्त हो जाता है, असीमित फल योग्यता नहीं मिलती; जो सर्वत्र लाभ करनेवाली होती है । इस प्रकार जगत्के कर्ममात्रमें जान लेना चाहिये । भगवान् कर्मके फलको अनुद्देश्य कहकर कर्मकी सर्वथा निष्फलता नहीं बता रहे, किन्तु सीमित फलसे दृष्टि हटवाकर, कर्मको पूर्णरूपसे करवाकर लोगोंको असीमित फलकी प्राप्तिका अवसर देते हैं । यह वस्तुतः ठीक भी है कि - ' कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ' । इससे असफलोंको निराशा वा अनुत्साह नहीं होता, उनका धैर्य विगलित नहीं होता, और सफलोंको भी अभिमान नहीं होता । अथवा असफलताका अनुमान करके पुरुषोंमें अकर्मण्यता भी प्रवृत्त नहीं होती । वह कर्म पूर्ण हो जाता है, विगुण नहीं होता । इसी पद्यसे उपक्रममें उपक्षिप्त विषय में भी यह सिद्धान्त सिद्ध हुआ कि गीता वेदविरोधिनी नहीं है, और वैदिक यज्ञ तथा देव-
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श्रीगणेश - चतुर्थी ७६ पूजादि कर्मकी विरोधिनी नहीं है । उसका परम पुरुषार्थ मुक्ति ही है, स्वर्ग नहीं । उसका ज्ञानयुक्त कर्म अर्थात् फलाशा - रहित कर्म ही विषय है । ऐसा होनेपर वह कर्म अकर्म ही होकर ज्ञानको प्राप्त कराकर मुक्ति दिलवाता है, फलयुक्त कर्म तो स्वर्गपद प्राप्त कराकर फिर वहांसे गिरा देता है । ' संयमाग्निषु जुह्वति ' इत्यादि यज्ञ वैदिक - देवयज्ञोंकी फलाशात्याग में ही चरितार्थ हैं, कोई नवीनयज्ञ-प्रदर्शन में नहीं | ऐसा अद्भुत ज्ञान देनेवाली, हमें गृहस्थ में ही संन्यासका फल देनेवाली, उसी भगवद्गीताकी यह मार्गशीर्ष शुक्ला - एकादशी जयन्ती है । इसमें गीताका उपदेश अनुसृत करके हमें परम-पुरुषार्थं मुक्ति पानेका प्रयत्न करना चाहिये । ( १७ ) श्री गणेश - चतुर्थी श्रीगणेशके चार व्रत माने गये हैं । १ म दूर्वागणेश, २ य कपर्दी विनायक, ३ सिद्ध - विनायक, ४ संकट चतुर्थी । इनमें दूर्वागणेश श्रावरण वा कार्तिककी शुक्ला चतुर्थीको होता है । कपर्दीविनायक - व्रत श्रावणकी चतुर्थीसे शुरू होकर भाद्रपद शुक्ला - चतुर्थी तक होता है । सिद्धविनायक - व्रत भाद्रपद शुक्ला चतुर्थीको होता है । ४ संकट - चतुर्थी व्रत माघकृष्ण चतुर्थीको होता है । इनमें संकट-चतुर्थीका वर्णन तो हम अग्रिम निबन्ध में करेंगे; अब यहाँ सिद्ध-विनायक व्रतके विषय में निरूपण करते हैं । यह व्रत भाद्रशुक्ला चतुर्थीको होता है । इस दिन चन्द्र - दर्शनका निषेध होता है । इसे वैज्ञानिक रूपमें इस प्रकार वर्णित किया जा
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श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 ) ७६८ है । यह तिथि चौमासेमें आती है । चौमासे में सबकी सकता उदराग्नि मन्द होती है; जिससे खाया - पीया हजम नहीं होता । लोग रोगी हो जाते हैं; उनके कल्याणार्थ चतुर्थी के मध्याह्नमें श्रीगणेश प्रादुर्भूत होते हैं । चौमासे में अग्निमन्दताका कारण होता है सोमकी अधिकता । उस सोमको मन्द करने के लिए श्रीगणेश अवतीर्ण होते हैं । जो उस देवकी पूजा करता है, वह नीरोग हो जाता है । उसमें रहस्य यह है कि - गणेश अग्निस्वरूप हैं । उनका पूजन अग्नि- सन्दीपन है । गणेशजीका बीजमन्त्र ' गं ' है । इसमें ग्, अ, और अनुस्वार यह तीन वर्ण हैं । अग्नि सत्यलोकमें रहता है । वह नीचे पृथ्वीलोक में आकर अपने उत्पत्तिस्थानमें फिर वापिस लौटता है । ' ग ' अग्निस्वरूप है । क, ख, ग, घ, ङ यह पाँच अक्षर पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश इन पञ्चमहाभूतोंके प्रतीक हैं । भूतों में अग्निरूप तेज तीसरा है । ककारादि पाँचोंमें तीसरा ' ग ' है । श्रीगजानन गणेशकी सूंड भी गकारकी आकृति की है, अतः अग्निस्वरूप है । अग्नि पञ्चमहाभूतोंके मध्यस्थान में होने से. अग्निस्वरूप - गणेशजीको भी मध्यस्थानमें प्रतिष्ठापित किया जाता है । अग्निका वर्ण रक्त होता है, गणेशजीका भी सिन्दूर - वर्ण है । अतः गणेश पार्थिवाग्नि ही है । रुद्रको वेदमें अग्निरूप माना गयो है— ' रुद्राय नमो अस्तु अग्नये ' ( अ ० ७७६२।१ ) । पार्वतीको पृथिवी माना गया है । दोंनोंका लड़का होनेसे ' आत्मा वै पुत्र नामासि '
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श्रीगणेश - चतुर्थी ७६६ ( निरुक्त ० ३।४।२ ) गणेश पार्थिवाग्नि संगत ही हैं । उक्त मन्त्रका ' ग ' आ चुका । शेष ' अ ' मध्याह्नकी सप्त व्याहृतिरूप समरेखाको, और अनुस्वार प्रत्यगात्म - स्वरूपको बताता है । पार्थिवाग्निस्वरूप होने से इस देवका आकार भी स्थूल कहा जाता है । पर उसका वाहन - मूषक ह्रस्वाकार है । पृथिवीके विकार प्लेग आदि बीमारियाँ सबसे पूर्व मूषकपर आक्रमण करती हैं, और मूषक उसका प्रसार करनेवाला सिद्ध हो सकता है । तब लोक - कल्याणार्थ उन विकारों . को दूर करने के लिए उन विकारोंके मूल मुषकको उन पार्थिवाग्निरूप गणेशने अपने नीचे दबा रखा है; अर्थात् उनका वाहन मूषक है । वही पार्थिवाग्निस्वरूप - श्रीगणेश चौमासेमें बढ़ी हुई सोमवृद्धि - रूप अग्निमन्दताको कम करने केलिए जगत् में अवतीर्ण होते हैं; अर्थात् अग्निको तीव्र करते हैं; इससे सोमकी मन्दता. हो जाने से अग्नि और सोमकी समता हो जाती है । समतामें ही नीरोगताका साम्राज्य होता है । इसीलिए कहा जाता है- ' अग्नीषोमात्मकं जगत् ' । सोमकी वृद्धि और अग्निकी मन्दता अस्वास्थ्यका, तथा दोनोंकी समता स्वास्थ्यका कारण होती है । भगवान् गणेशके माथेपर सोम होता है; अतः उसे ' भालचन्द्र ' कहा जाता है । जो लोग सोमको मध्याह्नमें गणेशके जन्मकाल में देखते हैं; वे यदि भौतिक सोम अर्थात् चन्द्रमाका रात्रिको दर्शन करते हैं; तो उन्हें कलंक लगता है, अर्थात् दो सोमोंको देखनेसे सोमकी अधिकता तथा अग्निकी मन्दता होती है । ऐसा होनेपर खाये पीये हुए पदार्थकी अजीर्णता ( बदहज़मी ) हो जाती है । ४६ स ० ध ०
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७७० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) अजीर्ण ही रोगोत्पत्तिका मूल होता है । इसलिए भाद्रशुक्ला ४ र्थीकी रात्रिमें सोमदर्शनका निषेध किया गया है, यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण है । प्राध्यात्मिक - हृटिकोण इससे कुछ भिन्न है । उसमें गणेश ब्रह्म हैं । चन्द्रमा मनका देवता है, और मन चञ्चल होता है, और कुतर्क चूहा होता है । जब तक कुतर्क - आदिके कारण मनकी चञ्चलता रहेगी; तब तक ब्रह्म - दर्शन किसी भी प्रकार नहीं हो सकता है । इसी कारण जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओंमें भी ब्रह्मकी तन्मयता नहीं होती; क्योंकि - वहाँ भी किसी न किसी रूपमें मन अवश्य ही विद्यमान रहता है । चतुर्थावस्था - तुरीयामें मनका लय हो जाता है; उसी दशामें ब्रह्मका तादात्म्य होता है । यही कारण है कि सिद्धिदायक - गणेशरूप- ब्रह्मके पूजनमें मनोदेवता चन्द्रमाका न देखना ही विधान प्रोक्त है । गणेशजीका वाहन जोकि—- चूहा बताया गया है, सो चूहा कुतर्कका प्रतीक है | चूहा पदार्थको काट - काटकर खंड - खंड कर देता है । कुतर्क भी प्रत्येक आस्तिक भावको खण्ड - खण्डकर नास्तिकता फैलाता है । सो जहाँ शुष्क - तर्क, दलीलबाजीकी प्रधानता होती है, वहाँ ब्रह्मभाव ( आस्तिकत्व ) भी नहीं रहता । जहाँ ब्रह्मभाव की प्रधानता रहती है, वहाँ शुष्क तर्क दबा रहता है, इसीलिए गणेशरूप - ब्रह्म कुतर्क रूप - चूहे पर सवार हुए - हुए उसे दबाये रहते हैं । रुद्र एवं गणेश वैदिक देवता हैं । कृष्णयजुर्वेद - मैत्रायणी संहिता-· के श्य काण्ड, हम प्रपाठकमें, ३ य मन्त्र में रुद्रकी गायत्री, ४ र्थ में गौरीकी, ५ ममें कार्तिकेयकी, ६ ठेमें गणेशकी गायत्री तथा नाराय-
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' श्रीमहीधरा अर्थ ७७१ गोपनिषद् में ५ ममें नन्दीगायत्री प्रसिद्ध है । इस विषय में हम ३३-३४ पृष्ठमें लिख चुके हैं । इस प्रकार यह सारा ही शिव परिवार वैदिक सिद्ध होता है । गणेश वैदिक आर्य देव हैं, वा अवैदिक अनार्य अपदेव — इस विषय में हम आरम्भिक निबन्धमें स्पष्टीकरण कर चुके हैं । गणेशजीका मन्त्र ' गणानां त्वा गर्भधम् ' ( २३।१६ ) यह यजुर्वेदवा ० सं ० का बहुत प्रसिद्ध है; पर प्रतिपक्षी इसके महीधर भाष्यके अर्थको उपहास एवं आक्षेपका विषय बनाते हैं; कुछ इसपर भी लिखना आवश्यक है; अतः ' आलोक ' के विज्ञ पाठकगण अग्रिम निबन्ध देखनेका कष्ट करें । ( १८ ) श्रीमहीधरका ' गणानां त्वा ' मन्त्रका अर्थ । ( १ ) गणपतिदेवके ' गणानां त्वा गणपतिं हवामहे, प्रियाणां त्वा प्रियपतिं हवामहे, निधीनां त्वा निधिपतिथं हवामहे । वसो! मम, आहमजानि गर्भधम्, आ त्वमजासि गर्भधम्, ( यजुः वा ० सं ० २३ | ११ ) इस मन्त्रके अन्तिम अंशपर किये हुए श्रीमहीधराचार्यके भाष्यपर प्रतिपक्षी लोग बहुत उछल - कूद मचाते हैं । उन्होंने इस मन्त्रके अर्थसे श्रीमहीधराचार्यको बहुत कलङ्कित कर रखा है । यहां तक कि — स ० प्र ० में महीधरादि- टीकाकारोंको निशाचर ( राक्षस ) वत् लिख दिया है । कितनी कड़ी गाली है यह? चार्वाकने तो ' त्रयो वेदस्य कर्तारो भण्डधूर्तनिशाचराः ' यह आक्षेप वेदके कर्तापर लिखा था, न कि उसके टीकाकारपर; वही आक्षेप वेदके भाष्यकार श्रीमहीधराचार्यपर कर दिया जाता है । क्या श्रीमहीधर वेदके
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७७२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) गणेशजीका प्रकरण होने से हम यहां संक्षिप्त कुछ लिख देना उचित समझते हैं । ‘ आहमजानि गर्भधम्, श्र त्वमजासि गर्भधस् ' ( यजु ० २३ | ११ ) इस मन्त्रांशका महीधर भाष्य इस प्रकार है-' महिषी अश्वसमीपे शेते - हे अश्व! गर्भधं - गर्भं दधातीति गर्भधं-गर्भधारकं रेतः, अहम् आ अजानि - आकृष्य क्षिपामि । तच्च गर्भधं - रेतः, आ अजासि - आकृष्य क्षिपसि ' । एक आर्यसमाजी इसका अर्थ लिखते हैं — ‘ यजमानकी स्त्री घोड़ेके पास सोवे और घोड़ेसे कहे कि हे अश्व! जिससे गर्भधारण होता है, ऐसा जो तेरा वीर्य है, उसको मैं खैंचके उपस्थमें डालू; तूं भी गर्भधारण • करने वाला ' रेत खींच के डाल ' । ( २ ) ऋ ० भा ० भू ० ( पृ ० ३४६ ) में ' ता उभौ चतुरः चतुरः पदः ' इस मन्त्रका ' अश्वशिश्नमुपस्थे कुरुते - वृषा वाजीति । महिषी स्वयमेव अश्वशिश्नमाकृष्य स्वयोनौ स्थापयति ' यह महीधरकृत अर्थ लिखकर वहां बड़ा उपहास किया गया है । एकने तो यहां यह लिखा है — ' जो स्त्री घोड़ेसे सम्बन्ध करेगी; वह पतिव्रता कैसे रह सकती है? [ पतिव्रता तो वह नियोगसे रह सकती है; वा विधवा होकर पति से भिन्नकी अंकशायिनी बनकर ] क्या कोई स्त्री इस तरह जीवित रह सकती है '? | स्वा ० द ० जीने इसपर लिखा है - ' भला विचारना चाहिये कि - स्त्रीसे अश्व के लिङ्गका ग्रहण कराके उससे समागम कराना ( चार्वाक ने ' अश्वस्यात्र हि शिश्नन्तु पत्नी - प्राह्य ' प्रकीर्तितम् ' केवल पत्नी द्वारा अश्वशिश्नग्रहण करना बताया था । पर स्वामीजीको उसमें समागमका विचार भी आागया ) और