पञ्चम सुमन · प्रकरण 89
श्रीमहीधरका ' गणानां त्वा ' मन्त्रका भाज
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771गोपनिषद् में ५ ममें नन्दीगायत्री प्रसिद्ध है । इस विषय में हम ३३-३४ पृष्ठमें लिख चुके हैं । इस प्रकार यह सारा ही शिव परिवार वैदिक सिद्ध होता है । गणेश वैदिक आर्य देव हैं, वा अवैदिक अनार्य अपदेव — इस विषय में हम आरम्भिक निबन्धमें स्पष्टीकरण कर चुके हैं । गणेशजीका मन्त्र ' गणानां त्वा गर्भधम् ' ( २३।१६ ) यह यजुर्वेदवा ० सं ० का बहुत प्रसिद्ध है; पर प्रतिपक्षी इसके महीधर भाष्यके अर्थको उपहास एवं आक्षेपका विषय बनाते हैं; कुछ इसपर भी लिखना आवश्यक है; अतः ' आलोक ' के विज्ञ पाठकगण अग्रिम निबन्ध देखनेका कष्ट करें ।
( १८ ) श्रीमहीधरका ' गणानां त्वा ' मन्त्रका अर्थ ।
( १ ) गणपतिदेवके ' गणानां त्वा गणपतिं हवामहे, प्रियाणां त्वा प्रियपतिं हवामहे, निधीनां त्वा निधिपतिथं हवामहे । वसो! मम, आहमजानि गर्भधम्, आ त्वमजासि गर्भधम्, ( यजुः वा ० सं ० २३ | ११ ) इस मन्त्रके अन्तिम अंशपर किये हुए श्रीमहीधराचार्यके भाष्यपर प्रतिपक्षी लोग बहुत उछल - कूद मचाते हैं । उन्होंने इस मन्त्रके अर्थसे श्रीमहीधराचार्यको बहुत कलङ्कित कर रखा है । यहां तक कि — स ० प्र ० में महीधरादि- टीकाकारोंको निशाचर ( राक्षस ) वत् लिख दिया है । कितनी कड़ी गाली है यह? चार्वाकने तो ' त्रयो वेदस्य कर्तारो भण्डधूर्तनिशाचराः ' यह आक्षेप वेदके कर्तापर लिखा था, न कि उसके टीकाकारपर; वही आक्षेप वेदके भाष्यकार श्रीमहीधराचार्यपर कर दिया जाता है । क्या श्रीमहीधर वेदके
772गणेशजीका प्रकरण होने से हम यहां संक्षिप्त कुछ लिख देना उचित समझते हैं । ‘ आहमजानि गर्भधम्, श्र त्वमजासि गर्भधस् ' ( यजु ० २३ | ११ ) इस मन्त्रांशका महीधर भाष्य इस प्रकार है- ' महिषी अश्वसमीपे शेते - हे अश्व! गर्भधं - गर्भं दधातीति गर्भधं-
गर्भधारकं रेतः, अहम् आ अजानि - आकृष्य क्षिपामि । तच्च गर्भधं - रेतः, आ अजासि - आकृष्य क्षिपसि ' । एक आर्यसमाजी इसका अर्थ लिखते हैं — ‘ यजमानकी स्त्री घोड़ेके पास सोवे और घोड़ेसे कहे कि हे अश्व! जिससे गर्भधारण होता है, ऐसा जो तेरा वीर्य है, उसको मैं खैंचके उपस्थमें डालू; तूं भी गर्भधारण • करने वाला ' रेत खींच के डाल ' ।
( २ ) ऋ ० भा ० भू ० ( पृ ० ३४६ ) में ' ता उभौ चतुरः चतुरः पदः ' इस मन्त्रका ' अश्वशिश्नमुपस्थे कुरुते - वृषा वाजीति । महिषी स्वयमेव अश्वशिश्नमाकृष्य स्वयोनौ स्थापयति ' यह महीधरकृत अर्थ लिखकर वहां बड़ा उपहास किया गया है । एकने तो यहां यह लिखा है — ' जो स्त्री घोड़ेसे सम्बन्ध करेगी; वह पतिव्रता कैसे रह सकती है? [ पतिव्रता तो वह नियोगसे रह सकती है; वा विधवा होकर पति से भिन्नकी अंकशायिनी बनकर ] क्या कोई स्त्री इस तरह जीवित रह सकती है '? | स्वा ० द ० जीने इसपर लिखा है - ' भला विचारना चाहिये कि - स्त्रीसे अश्व के लिङ्गका ग्रहण कराके उससे समागम कराना ( चार्वाक ने ' अश्वस्यात्र हि शिश्नन्तु पत्नी - प्राह्य ' प्रकीर्तितम् ' केवल पत्नी द्वारा अश्वशिश्नग्रहण करना बताया था । पर स्वामीजीको उसमें समागमका विचार भी आागया ) और
773श्रीमहीधरका अर्थ
यजमानकी कन्यासे हँसी - ठट्ठा आदि कराना सिवाय वाममार्गी- लोगों से अन्य मनुष्यका काम नहीं है ' ( स ० प्र ० १२ पृ ० २५६ ) । एक अन्य महाशयने लिखा है - ' वेदमें कोई मन्त्र अश्लील है ही नहीं तो यहां अश्लीलता कैसे हो सकती है? अतः यह दोष टीका- कार- महीधरका है । '
( ३ ) इसपर हमारा कथन यह है कि - अश्वमेधके मन्त्रोंका जो श्रीमहीधराचार्य कृत
- अर्थ उद्धृत किया जाता है, उसमें श्रीमहीधराचार्यकी अपनी कुछ भी कल्पना नहीं है । जो अर्थ उन मन्त्रोंका सम्भवी है; और शतपथब्राह्मण तथा यजुर्वेद संहिताके कल्प ' कात्यायन - श्रौतसूत्र आदि सूत्रकारोंने जो अर्थ किया है; वही अर्थ श्रीमहीधराचार्यने भी किया है । यदि शतपथ तथा श्रौतसूत्रका अर्थ बदला जावे; तो श्रीमहीधर का अर्थ भी तदनुसारी होनेसे बदला जा • सकता है । केवल श्रीमहीधरने ही नहीं; किन्तु उवटाचार्य तथा श्रीसायणाचार्यं तथा श्रीभवदेव आदिने भी वही अर्थ किये हैं । क्या आक्षेप्ता- लोग शतपथब्राह्मण तथा श्रौतसूत्रकारोंको वाममार्गी मानते हैं? क्या वाममार्गी भी स्त्रियोंका अश्वसे समागम कराया करते हैं? यदि नहीं; तब श्रीमहीधरको ' वाममार्गी ' कैसे कहा जाता है? |
ऋ ० भा ० भू ० के प्रणेता स्वा ० द ० जी अपने यजुर्वेद- भाष्यकी कसौटी ' शतपथ ' को बना गये हैं । अपने वेदभाष्यकी उत्तमतामें उन्होंने यही कारण बताया है कि वह शतपथाद्यनुकूल है । उनके शब्द पाठकगण देखें- ( प्र ० ) किञ्च भोः! नवीनं 774भाष्यं त्वया क्रियते, आहोस्वित् पूर्वाचार्यैः कृतमेव प्रकाश्यते? ( उ ० ) पूर्वाचार्यैः कृतं प्रकाश्यते । तद् यथा- यानि पूर्वैर्देवैर्विद्वद्भिः- ब्रह्माणमारभ्य याज्ञवल्क्य - वात्स्यायन जैमिन्यन्तै ऋषिभिश्च, ऐतरेय- शतपथादीनि भाष्याणि रचितानि आसन्; तथा यानि पाणिनि- पतञ्जलि - यास्कादिमहर्षिभिश्च वेदव्याख्यानानि वेदाङ्गाख्यानि कृतानि ..एतेषां संग्रहमात्रेणैव सत्योर्थः प्रकाश्यते, नचान्न किञ्चिद, अप्रमाणं नवीनं स्वेच्छया रक्ष्यते ' ( पृ ० ३४१-३४२ ) ।
( ४ ) शताब्दी - संस्करण में प्रकाशित दयानन्द - ग्रन्थमालाके प्रथम भागके १८ वें पृष्ठ में श्री हरविलास सारडा लिखते हैं- ' ऋषि ( दयानन्द ) का भाष्य उवट आदि भाष्यों से अर्थोकी दृष्टिसे सर्वथा भिन्न प्रतीत होता है, परन्तु इसका यह अभिप्राय नहीं कि — ऋषि दयानन्द इन आचार्यों [ महीधर ध्यादि ] के उन भाष्योंको सर्वथा गलत समझते थे, क्योंकि -ऋषिने वेदोंके याज्ञिक अर्थोको भी स्वीकार किया है । ( देखो -ऋषिभाष्य यजुर्वेद् तथा ऋ ० भा ० सू ० के वेदविषय- विचार तथा प्रतिज्ञाविषय - प्रकरण ) उन [ याज्ञिक ] अर्थोंकी सत्तासे ऋषिने इनकार नहीं किया । हाँ, जहाँ - जहाँ ये भाष्यकार शतपथ ब्राह्मणके भावोंसे उल्टे चले गये हैं, उन - उन भागोंकी संक्षेपसे ऋषिने आलो- चना भी करदी है । '
इससे यजुर्वेदके याज्ञिक अर्थ भी ठीक सिद्ध हुए; और यजुर्वेद- ' भाष्यकी कसौटी ' शतपथ ' सिद्ध हुआ । इस कारण जहाँ आक्षेप्ता ( स्वा ० द ० ) ने महीधरभाष्यका खण्डन किया है; वहाँ ' सत्यार्थ ' शतपथका देकर स्वयं उसका व्याख्यान लिखा है । सो जब हम 775वही महीधर भाष्यवाले शब्द शतपथसे, वह भी आर्यसमाजी- प्रेस वैदिक- यन्त्रालय अजमेर के छपे हुए शतपथ ब्राह्मण से दिखला दें; तब श्रीमही- धराचार्य अपने उत्तरदायित्वसे मुक्त हो जायेंगे । तब जो अर्थ शतपथके उद्धरणोंका किया जायगा; वही महीधरभाष्यका हो जाएगा । इससे महीधरको बदनाम करनेका उत्तरदायित्व भी उन लोगों पर पड़ जावेगा ।
वस्तुतः यह दुर्नीति है । इसी दुर्नीति पर आर्यसमाजके विद्वान्, गुरुकुल ज्वालापुरके आचार्य, श्रीनरदेवजी शास्त्रीने अपने ' ऋग्वेदा- लोचन ' के पृष्ठ २६८ में आश्चर्यमिश्रित- खेद प्रकाशित किया है । देखिये श्रीनरदेवजीके शब्द—
' स्वामी [ दयानन्दजी ] ने यजुर्वेदभाष्यकार - महीधराचार्य, ऋग्वेद- भाष्यकार - सायणाचार्यादिके भाष्यका खण्डन तो किया; किन्तु जिन शतपथादि - ब्राह्मणोंके आधार और प्रमाणोंसे वे [ महीधरादि ] इस प्रकारका भाष्य करने पर बाध्य हुए; उन ब्राह्मणों [ ब्राह्मणभाग ] के विषयमें मौन साध लिया ' ।
( ५ ) अब हम शतपथब्राह्मणका वह पाठ उद्धृत करते हैं, जिनके अनुसार श्रीमहीधरने लिखा है - ' तस्मिन् एनमधिसंज्ञप- यन्ति । संज्ञप्तेषु पशुषु पत्न्यः पान्नेजनैरुदायन्ति । चतस्रश्च जायाः, कुमारीपञ्चमी, चत्वारि च शतानि अनुचरीणाम् ' ( १३।५।२।१ )
पान्नेजनेषु महिषीम् अश्वाय उपनिषादयन्ति [ यही महीधर के निष्ठितेषु
‘ महिषी अश्वसमीपे शेते ’ इन शब्दोंका मूल है ] । अथ एनौ [ महिषीम् अश्वं च ] अधिवासेन संप्प्रोणुवन्ति ' । [ वस्त्रेण आच्छादयन्ति ] 776निरायत्य अश्वस्य शिश्नं महिषी उपस्थे निधत्ते, [ यही वे शब्द हैं; जो श्रीमहीधरके थे ] ' वृषा वाजी रेतोधा रेतो दधातु ' ( यजुः २३।२० ) इति मिथुनस्यैव सर्वत्वाय ' ( १३/५/२२ ) ' तयोः [ अश्वमहिष्योः ] शयानयोः अश्वं यजमानः अभिमेथति - ' उत्सवध्या अवगुदं धेहि ' इति [ यजुः २३।२१ ] ( शत ० ३ ) ' अथ अध्वर्युः कुमारमभिमेथति— हये कुमारि! ' यकासकौ शकुन्तिका ' [ यजुः २३२२ ] ' ' तं कुमारी • प्रत्यभिमेथति - हयेऽध्वर्यो - ' यकोऽसकौ शकुन्तकः ' इति [ यजुः २३।२३ ] ' ( शत ० ४ ) । ' अथ ब्रह्मा महिषीमभिमेथति - हये महिषि । ' माता च ते पिता च ते ' [ यजुः २२।२४ ] । शतं राजपुत्र्योऽनुचर्यः ब्रह्माणं प्रति अभिमेथन्ति - हये ब्रह्मन्! ' माता च ते पिता च ते ' [ यजुः २३ २५ ] ( शत ० ५ ) ' अथ उद्गाता वावातामभिमेथति " " अनुचर्य उद्गातारं प्रति अभिमेथन्ति ' ( शत ० ६ ) होता परिवृक्तामभिमेथति • अनुचर्यो होतारं प्रति भिमेथन्ति ( शत ० ७ ) ' क्षत्ता पालागलीमभिमेथति । अनुचर्यः क्षत्तारं प्रत्यभिमेथन्ति ' ( शत ० ८ ) । ' सर्वाप्तिर्वा एषा वाचः यद् अभिमेथिकाः । ‘ उत्थापयन्ति महिषीम्, ततस्ता [ महिष्यादयः ] यथेतं [ यथागमनं ] प्रतिपरायन्ति ' ( शत ० १३ । ५ । २ । ६ ) ।
यह शतपथका सारा ही पाठ श्रीमहीधराचार्यका उपजीव्य है, ' तब श्रीमहीधराचार्य पर दोष क्यों?? यह उद्धरण हमने आर्य- समाजके प्रामाणिक - प्रेस ' वैदिक यन्त्रालय अजमेर ' में सं ० १ ९ ५६ वि ० में मुद्रित एवं प्रकाशित ' शतपथ ब्राह्मण ' के ६६१ पृष्ठकी २०-२१-२२-२४ आदि तथा ६६२ पृष्ठकी आरम्भिक - पंक्तियों से दिया है । इसी प्रकार वेदके अङ्ग कल्प ' कात्यायन श्रौतसूत्र ' में भी
777श्रीमहीधरका अ
देख लीजिये - ' अश्वशिश्नमुपस्थे कुरुते - वृषा वाजीति ' [ यजुः २३ | २० ] ( २०१६ १६ )
आक्षेप्ता महाशय देखें । महीधर तथा शतपथके इस प्रकरणके अर्थ — अश्वशिश्नमुपस्थे
' कुरुते - वृषा वाजीति ' आक्षेप्य माना है, वही शब्द भी बराबर हैं । ऋ ० भाष्यभूमिका में ( पृ ० ३४६ ) यही महोधरका शतपथ में अन्य भी स्पष्ट कर दिया गया है- ' अश्वस्य शिश्नं महिषी उपस्थे निधत्ते, वृषा वाजी रेतोधा रेतो दधातु ' ( शत ० १३/५/२/२ ) । तब दोनों स्थान अर्थ बराबर होगा ।
अब आक्षेप्ता बतावें कि — क्या शतपथ भी वाममार्गियोंका ग्रन्थ है? उसमें अब प्रक्षेप बताना अपने पक्ष की दुर्बलताका प्रकाशन होगा । तब प्रतिपक्षी जो इन श्रार्ष - उद्धरणोंका अर्थ करें; वही तदाश्रित- महीधरभाष्यका कर लें । शेष रहा महिषी कुमारी आदिसे ठट्ठा - वह शतपथमें भी ' अभिमेथन ' शब्द से कहा ही है । हम अभी - अभी उनके उद्धरण दे चुके हैं । अभिमेथनके वेद - मन्त्र भी दोनों स्थलों ( शतपथ एवं महीधरभाष्य ) में समान बताये गये हैं । कात्यायन श्रौतसूत्रमें भी वही अर्थ मिलेगा । केवल इसमें ही नहीं; लाट्यायन श्रौतसूत्र में भी वही मिलेगा । उसमें लिखा है- - ' संज्ञप्तेषु पशुषु होत्रामिमेधिते ब्रह्मा वावातामभिमेथेत् ' ( ६।१०।३ ) : उक्त - सूत्रपर अग्निस्वामीका भाष्य भी देखिये- ' अभिमेथनं नाम असंयतया मन्त्रवत्या उक्ति - प्रत्युक्तिः ' । इसी प्रकार वहां ६ १०१७ में भी कहा है । फिर अभिमेथनकी शान्त्यर्थ आचमन करके वामदेव्यगान करना कहा है । यह वचन ' सा याऽसौ फाल्गुनी 778पूर्णमासी भवति ' ( शतपथ ० १३ । ४ । १ । ४ ) । फाल्गुनकी पूर्णिमा में होलिकाके अवसरपर अश्वमेध यज्ञमें कहे जाते थे; इसी परम्पराके फल - स्वरूप होलियों में अश्लील - परिहास की शैली छाव भी मिलती है । इसे हम ' होलिका -विज्ञान ' में स्पष्ट करेंगे । इससे इसकी वैदिकता सिद्ध हो रही है ।
( ६ ) इन आक्षेप्ताओंको जो कि यह ( रानीसे घोड़ेके मैथुनका ) भ्रम हुआ है, उसका कारण यह है कि वे लोग उस समय घोड़ेको जीवित समझते हैं, यद्यपि यह घोड़े के जीवन में भी उपपन्न नहीं हो सकता । क्योंकि घोड़ेका मानुषीसे समागम तथा घोड़ेके वीर्यसे मानुषीमें गर्भं उपपन्न नहीं । अतः आक्षेप्ताओं का यह महामोह है । उस समय श्रश्वमेधका अश्व संज्ञप्त ( मृतक ) है; उसके अङ्ग भी पृथक् - पृथक् संशोधित होकर पड़े होते हैं । हम पहले शतपथका पाठ लिख चुके हैं कि - ' संज्ञप्तेषु पशुषु ' । ' संज्ञप्त ' का अर्थ ' मृतक ' है । देखो - वेदाङ्ग - व्याकरण, श्रीपाणिनिमुनिका धातुपाठ 1 उसमें ' मारण तोषणनिशामनेषु ज्ञा ' ( ८११ ) यहां मित्संज्ञक धातुओंमें ' ज्ञा ' धातुका अर्थ ' मारना ' सबसे पूर्व लिखा है । ‘ वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी ' में भी यही है । इतना अधिक लिखा है — ' ज्ञप मिच्च ' इति चुरादौ । ज्ञापनं मारणादिकं च तस्यार्थः ' । यहां ' तत्त्वबोधिनी ' में लिखा है - ' पशुं संज्ञपयति मारयति इत्यर्थः ' । ' बालमनोरमा ' में भी यही लिखा है- ' पशुं संज्ञपयति - अक्षतं मारयतीत्यर्थः । यही: स्वा ० द ० संगृहीत ' धातुपाठ ' में लिखा है - ' मारतोषण- निशामनेषु ज्ञा ' ( पृ ० १२ ) यहां मित्संज्ञक ' ज्ञा ' 779धातुका पहला अर्थ मारण है । यही बात स्वामी दयानन्दके आख्यातिक भ्वादिगण ( पृ ० ८३ ) में लिखी है । यदि प्रतिपक्षियोंको वेदाङ्गपर विश्वास न हो; तो हम ' संज्ञप्त ' शब्दपर वेदभाग ' ब्राह्मण ' की सम्मति देते हैं; देखिये - घ्नन्ति वै एतत् पशुम्, यद् एनथं संज्ञपयन्ति ' ( शत ० १३ । २ ॥ २ ) । तो जब पशु उस समय संज्ञप्त ( मृतक ) है; तो उस समय प्रतिपक्षियोंका दुरभिप्राय कैसे सङ्गत हो सकता है?
( ७ ) जब घोड़ेके पास महिषीको रखा जाता है; उस समय अश्व मृतक होता है— इस विषयकी ब्राह्मणभागकी साक्षी हम दे चुके | अब इसमें इतिहासकी साक्षी भी पाठकगरण देखें—
( क ) वाल्मीकि - रामायणमें पुत्रेष्टियज्ञ करनेके लिए पूर्वजन्मकृत, कार्य - प्रतिबन्धक पापके क्षयार्थ पहले अश्वमेघ यज्ञ किया गया था । उस समयका वहां वर्णन है— ' कौसल्या तं हयं तत्र परिचर्य ( परिक्रम्य ) समन्ततः । कृपाणैर्विशशासैनं त्रिभिः परमया मुदा ' ( १।१४।३३ ) यहां अश्वकी ' पत्न्यः एनं त्रिः परियन्ति ' ( शत ० १३ | २ | ८ | ४ ) इस कथनसे परिक्रमा और ( शत ० १३।२।८।२ के अनुसार ) कौशल्या- द्वारा अश्वका विशसन ( हनन ) कहा है । फिर आगे लिखा है— ' पतन्त्रिणा तदा सार्धं सुस्थितेन च चेतसा । अवसद् रजनीमेकां कौसल्या धर्मकाम्यया ' ( १४ | ३४ ) यहां पर मृतक घोड़ेके पास रहना धर्मेच्छा से कहा है, सम्भोगेच्छासे नहीं ।
( ख ) इसी प्रकरणके तैत्तिरीय ब्राह्मणके भाष्य में श्रीभट्टभास्करने भी यही भाष्य किया है- ' तप एव सन्तापहेतुत्वात् अस्या ( महिष्या )
780श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )
एतत् तपस्थानीयं यद् मृतेन मिथुनीभवनम् [ सह उपवेशनम् ] ' ( ३ ॥ ६।२६ ) यहां भी अश्वकी मृतकता स्पष्ट है । ( ग ) अब इसकी अन्य साक्षी महाभारत में देखें- ' ततः संज्ञप्य तुरगं विधिवद् याजकस्तदा । उपासंचेशयन् राजन्! ततस्तां द्रुपदात्मजाम् ' ( आश्व- मेधिकपर्व ८ धा २ ) यहां भी मृतक घोड़े के साथ द्रौपदीको बैठाया गया है । जब अश्व मृतक है; तब यहां आताओंके आक्षेप व्यर्थ हैं । जैसे कि - ' वेदोंका सार्वभौम संदेश ' ( पृ ० ३६ ) में उसके व्याख्याताका यह कहना कि - महीधरके अपने - वेदभाष्य में किये अर्थ स्पष्टतया अश्लील ग्राम्यधर्म ( संभोगादि ) - परक हैं; यह निष्पक्ष विद्वानोंको लज्जाके साथ स्वीकार करना पड़ेगा ' इत्यादि निराकृत हो गया ।
यहां बतलाया जा चुका है कि अश्व मृतक है, और उसे गणपतिदेवके रूपमें आहूत किया गया है, जैसा कि हम आरम्भिक- मयूखमें विस्तार से बता चुके हैं । ' हवामहे ' ऐसा आह्वान भो वैदिक - शैली से चेतन - देवताका होता है; उसमें प्राकृत अश्व, उसमें भी मृतकका आह्वान नहीं हुआ करता । सो ' शिश्न ' वा ' रेत ' एवं वीर्य उसी गणपतिदेवका इष्ट है, मृतक अश्वका नहीं । इस बात पर न विचारने से ही प्रतिपक्षी भ्रमकूपमें गिरे हुए हैं । यदि यहां प्रतिपक्षी भी प्राकृत अश्वका वर्णन न समझकर ' गणपति ' देवका वर्णन समझ लें, क्योंकि - ' गणानां त्वा ' मन्त्रका देवता आर्यसमाज
* ' मिथुनीभवनम् ' का अर्थ इकट्ठा होना है । वेदादि - शास्त्रों में भाई- बहिनके जोडेको भी ' मिथुन ' कहा जाता है । जैसे कि - निरुक्त ( ३।४।२ ) में । 781की छपाई हुई यजुर्वेदकी संहितानुसार भी ' गणपति ' है; तब उन्हें यह भ्रम वा दूसरोंपर आक्षेप करने का अवसर ही न रहे । जब जीवित- अश्वसे भी यह प्रार्थना सङ्गत नहीं हो सकती, जोवित अश्व भी न निधिपति, न प्रियपति, और न गणपति वन सकता है, न उसका आह्वान ही उपपन्न हो सकता है; न उसके वीर्यका मानुषीमें गर्भ करने से कोई सम्बन्ध है, न अश्वका मानुषीसे समागममें कोई सम्बन्ध है; तब मृतक घोड़ेसे यह प्रार्थना सङ्गत कैसे हो ' सकती है? तब वादियोंकी यह अपने नियोग आदिकी कल्पनासे विकृत हुए मस्तिष्ककी उपज है, प्राचीन ग्रन्थोंसे इसका कोई भी सम्बन्ध नहीं । अतः वहां अश्वरूपमें प्रजापति - गणपतिकी ही प्रार्थना है, जैसे कि शतपथमें कहा है- ' प्राजापत्यो वै अश्वः ' ( शतपथ ० १३ | ३ | ३ | ४ ) ' प्रजापतिर्देवता अस्य - इति प्राजापत्यः, अश्वः । वही गणपतिदेव आरम्भिक -मयूखमें निदर्शित की हुई सरणिसे विघ्नेश्वर एवं सर्वेश्वर होनेसे प्रजाके पति - रक्षक, हमारी निधिके रक्षक, वसु आदि वा कूष्माण्ड आदि गणों तथा साध्य आदि गणदेवताओंके पति, पद्म महापद्म आदि निधियों के पति, पति - पुत्र, प्राण - धन आदि प्रिय वस्तुओंके भी पति होते हैं । वही सम्पूर्ण- जगत्में व्यापकतासे निवास करनेसे ' वसु ' नामसे सम्बोधित किये जाते हैं, मरा हुआ अश्व सम्बोधित नहीं किया जाता । वह मृतक- अश्व तो केवल मूर्तिपूजाकी मूर्तिकी तरह सम्बोधन वा अर्चना साधन है, मूर्तिपूजामें पत्थरकी मूर्तिका आह्वान न करके मूर्तिस्थित देवताशक्तिको आहूत किया जाता है । इसी प्रकार यज्ञके नायक 782अश्वमें भी गणपति - देवताको ही आहूत किया जाता है कि- - ‘ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे, ( यजुः २३ । १ ९ ) । अब इस मन्त्र का शेष भाग है - ' वसो! मम आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ' ।
यहां पर ‘ गर्भधं ' – गर्भं दधातीति गर्भधं रेतः अहम् आ अजानि -- आकृष्य क्षिपामि, तच्च गर्भधं रेत आ अजासि - आकृष्य क्षिपसि ' इस महीधरकी व्याख्यापर बिना विचारके ही बड़ा होहल्ला मचाया जाता है । यहां ' रेतः ' का अर्थ ' वीर्य ' किया जाता है; सो अश्व के जिस रेतः ( वीर्य ) को प्राप्त करना श्रीमहीधर ने लिखा है, वही वेदने स्वयं कहा है, देखिये - ' वृषा बाजी रेतोधा रेतो दधातु ' ( यजुः २३।२० ) यहां ' रेतः " का अर्थ छिपा लिया जाता है । यदि यतेप्ता ' रेतः ' का ' बल ' अर्थ करते हैं; तो ' वीर्य का भी ' बल'ही अर्थ होता है; वही ' तेज'का आशय निकला | फिर किस मुहसे महीधरको बदनाम किया जाता है? जो ' वाजी रेतो दधातु ' वाले मन्त्रका अर्थ एवं आशय है, वही महीधरके भाष्यका भी है- यह क्यों नहीं सोचा जाता? अब इस विषय में पाठकगण | देखें —
( ८ ) ' गर्भधं ' पर ' शतपथब्राह्मण ' में लिखा है- ' प्रजा वै पशवो गर्भः, प्रजां वै पशून् आत्मन् धत्ते ' ( १३ २ २ ५ ) इस श्रुति से ' गर्भ ' शब्द यहां प्रजा एवं पशु - वाचक है । उस प्रजा- पशुरूप गर्भके धारण करनेवाले दैवी रेतः- गणपतिदेव के तेजके आकर्षणकी प्रार्थना की गई है, प्राकृत - घोड़े के प्राकृत - वीर्य की नहीं; क्योंकि — - अश्वके वीर्यका और फिर उसमें मृतक अश्वके वीर्यका मानुषी - बीमें गर्भसे सम्बन्ध हो 783भला क्या हो सकता है? क्या मृतकका वीर्य भी रह जाता है? वीर्य - की शुष्कता से ही तो मृत्यु होती है ।
( ख ) अक्षेताओंकी कुमारियां वा स्त्रियां प्रार्थना करती हैं- ‘ वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि ' ( यजुः १६६ ) ' अग्निः प्रजां बहुलां मे करोतु, अन्नं पयो रेतो. अस्मासु धत्त ' ( यजुः १६४८ ) इत्यादि मन्त्रोंसे कुमारियाँ वा स्त्रियाँ अपने में रेतः या वीर्यके आधानकी प्रार्थना करती हैं क्या?
( ग ) ' आर्याभिविनय ' ( पृ ० ४६ ) के अनुसार वे प्रार्थना करती हैं - ' हमारे हृदय में रमण कीजिये ' ( ऋ ० १ | ११ | १३ ); तो क्या वे आक्षेप्ताओं की स्त्रियाँ उसी ' प्राकृत वीर्य ' तथा ' रमण ' की प्रार्थना कर रही होती हैं, जिसे प्रतिपक्षी यहाँ बताते हैं?
( घ ) ' इमं ते उपस्थं मधुना ससृजामि ' इस स्वा ० द ० जीकी संस्कारविधिमें लिखे, विवाहकालीन मन्त्र में भी श्रोतागण क्या स्त्रीके उसी उपस्थको मधुसे युक्त कर रहे होते हैं? यदि ऐसा है; तो दूसरों पर आक्षेप क्यों?
( ङ ) ' अथैनं मनुष्याः उपस्थं कृत्वा उपासीदन् ' ( शतपथ २ | ४ | २ | ३ ) यहाँ क्या प्रजापतिके सामने मनुष्योंका गुप्त- अङ्ग निकालना माना जावेगा? जो अर्थ ' वीर्य, उपस्थ ' आदिका प्रतिपक्षी यहाँ करेंगे, वही महीधरभाष्यमें भी हो जायगा?
( च ) परमैश्वर्यकेलिए बैलसे, छेरीसे भोग करें ' [ उपयोग लें ] ( यजुः २१।६० ) यह स्वा ० द ० जीका किया अर्थ है; तब क्या आक्षेप्ताओं- की वेद पढ़नेवाली स्त्रियोंका बैलसे और उनका स्वयं छेरीसे भोग 784वा उपयोग लेना वही तथाकथित अश्व के भोग वा उपयोग जैसा माना जावेगा या नहीं?
( छ ) ' मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ' ( १४३ ) इस गीताके पद्यमें भी योनि में गर्भ धारण करनेका ' तस्य योनिं परि- पश्यन्ति धीराः ' ( यजुः ३१।१६ ) यहां भी क्या योनिका वही अश्लील अर्थ किया जावेगा? ' मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे ' ( ऋ ० १०।१२५ / ७ ) यहाँ वागाम्भृणी - ऋषिकाकी योनि, ' नागं योनि च लिङ्ग ं च बिभ्रती नृप! मूर्धनि ' ( प्राधानिकरहस्य ५ ) क्या यहां भी श्रीदुर्गादेवीकी योनिका वही अश्लील अर्थ किया जावेगा?
( ज ) यदि नहीं; तो याज्ञिक - प्रक्रिया में भी ऐसी बात नहीं; वहां- पर अश्व मृतक है, ' मेढू ' ते शुन्धामि ' ( यजुः ६ १४ ) उसके अंग पृथक् - पृथक् शोधित कर रखे हैं; उससे मैथुन हो ही कैसे सकता है? ' गणानां त्वा ' इस यजुर्वेद के मन्त्रका ऐतरेय ब्राह्मणसे ' ब्राह्मणस्पत्यम् ' यह जो अक्षेताओं द्वारा अर्थ बताया जाता है, उन लोगोंको यह पता नहीं कि - यह याजुष मन्त्रका अर्थ नहीं, किन्तु ऋग्वेदके ' गणानां ' इस ब्रह्मणस्पतिवाले मन्त्रका अर्थ है । उसमें ' गर्भधं ' आदि याजुषमन्त्र के पदोंकी व्याख्या है ही नहीं । जिन्हें यह पता नहीं; वे चले हैं महीधरके अर्थपर आक्षेप करने । यदि दोनों ऋग्वेद एवं यजुर्वेद के गणपति एक हैं, इसलिए याजुष- मन्त्रका ऋग्वेदके ऐतरेय ब्राह्मण से अर्थ किया जाता है; तब भी हमारा ही पक्ष सिद्ध हुआ कि अश्वमें उसी गणपति - देवताका याह्वान किया जा रहा है; उसी गणपतिदेव के तेजके श्राकर्षणार्थ प्रार्थना है; तब 785भी हमारा ही पक्ष सिद्ध हुआ । ' आ अजासि ' में ' अज ' धातुका ' क्षेपण ' ( ' अज गतिक्षेपणयो: ' इस धातुके अनुकूल ) अर्थ प्राकरणिक था; पर आतेताओं द्वारा ' आ समन्ताज्जानासि ' यह अर्थ बदलकर अपनी जान बचा ली जाती है । इस प्रकार श्रीमहीधरके अर्थका आशय भी जान लिया जा सकता है; तब उसपर आक्षेप क्यों?
( १ ) प्रतिपक्षिगण अश्वके... डरते हैं; और उससे स्त्रीके जीवित न रहनेकी शङ्का प्रकट करते हैं; पर उपवेद आयुर्वेद पुरुषको ही ' वाजीकरण ' ओषधि देकर स्त्रीकेलिए ' अश्व ' बनाया चाहता है; और वेद भी पुरुषके अंगको ' अश्वका अङ्ग ' बनाया चाहता है । देखिये — ' यावदंगीनं पारस्वतं हास्तिनं गार्दभं च यत् । यावद् अश्वस्य वाजिनः तावत् ते ( पुरुषस्य ) वर्धतां पसः, ( अथर्व ० ६।७२।३ ) पस ‘ शिश्न ' को कहते हैं; देखिये इसपर स्वा ० द ० जीका यजुर्वेदभाष्य ( २०१६ ) । तो क्या स्त्री उस पुरुषके अश्वके शिश्नसे जीवित रह सकेगी, जिसका वेद विधान कर रहा है? यदि यहां प्रतिपक्षी ' अश्व'का साक्षात् ' अश्व ' अर्थ नहीं लेते; वैसे यहां पर भी वे ' अश्वशिश्न ' खास अर्थ कैसे करते हैं?
( १० ) यह स्पष्ट किया जा चुका है कि जो अर्थ श्रीमहीधराचार्यने किया है; वह शतपथब्राह्मणसे लिया है । सो जो तात्पर्य शतपथ में होगा, महीधरभाष्य में भी वही तात्पर्य होगा । सो ' गर्भधं रेतः स्व- योनौ स्थापयति, अश्वशिश्नमुपस्थे कुरुते ' आदिका अर्थ भी यही जान लेना चाहिये कि - स्त्री प्रजा- पशुरूप गर्भको धारण करनेवाले 786गणपति देवके सोमरूप तेजको — जैसे कि वेदमें कहा है- ' अयं सोमो वृष्णोऽश्वस्य रेतः ' ( यजुः २३६२ ) - प्रार्थित करके उसे अपने भीतर आकर्षित करनेकी भावना करती है । इसी भावनाके फलस्वरूप उसे चक्रवर्ती पुत्र पैदा होता है ।
विवाह - संस्कार में स्वा ० द ० ने संस्कारविधिमें ' इन्द्राग्नी... बृहस्पतिर्मरुतो ब्रह्म सोम इमां नारों प्रजया वर्धयन्तु ' ( पृ ० १५४ - १५५ ) यह मन्त्र लिखा है । उसका अर्थ किया है — बृहस्पतिः - राजा, मरुतः - सभ्य मनुष्य...
. • इस मेरी स्त्रीको प्रजा से बढ़ाया करते हैं ' यह वरकी उक्ति है । तो क्या वरकी स्त्रीमें राजा और सभ्य मनुष्य मैथुन करते हैं? यदि नहीं, यह केवल आशीर्वादमात्र है, वैसे वहां भी गणपतिके तेजके आकर्षणकी भावनामात्र है । सो यहां अर्थ यह है-..
' अश्वस्य– अश्नुते व्याप्नोति सर्वं जगद् - इति अश्वः, गण- पतिदेवः ( नमस्ते गणपतये... त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि ' इति गणपत्युपनिषदुक्तेः ) तस्य गणपतिदेवस्य शिश्नम् - ' शिश्नं श्नथतेः ' ( निरुक्त ४।१६ / ६ ) श्नथयति - ताडयति हिनस्ति वा विघ्नरूपं तम इति शिश्नम्, शेषति – हिनस्ति वा प्रतिबन्धकतामिति वा शिश्नम्, · शश प्लुतगतौ शशति शीघ्र व्याप्नोति इति वा शिश्नम्, शिनोति- तीक्ष्णीभवति इति वा शिश्नम् ' ( सर्वत्र पृषोदरादिः ( ६ | ३ | १०६ ). शिश्नं- तेज इत्यर्थः तद् व्यापकं गणपति - तेज आकृष्य भक्त्या स्वयोनौ — कर्मफलोत्पादके कारणभूतस्वसूक्ष्म शरीरान्तः फलोत्पादन- पर्यन्तं सूक्ष्मरूपेण धारयति । वाजी - वेगवान् बलवान् वृषा- 787फलानां वर्ष कः, प्रजापतिः - गणपतिः, रेतः - स्वकीयं तेजः, मयि.. दधातु - स्थापयतु ' । महिषी यहां गणपतिके तेजकी प्रार्थना करती है, और उसे अपने अन्दर आकर्षण करनेकी भावना करती है । जैसे * कि — ‘ वीर्यमसि वीर्यं मयि घेहि ' ( यजुः १६६ ) ' रेतो अस्मासु धन्त ' ( यजुः १६४८ ) आप्ताओंकी स्त्रियाँ यह वेद - मन्त्र पढ़कर अपने वीर्याधानकी प्रार्थना करती हैं ।
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अथवा — ' मम योनिर्महद् ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहम् ' ( गीता १४ ३ ) के अनुसार प्रकृतिरूप - पत्नी में चिदाभासरूप गर्भका आधान करनेवाले गणपतिदेवका मैं आह्वान करती हूँ, यह अर्थ है, शेष. पूर्ववत् ।
यहां अश्वके मृतक होनेसे उससे मैथुन असम्भव है; जबकि जीवितके.. साथ भी वैसा नहीं हो सकता । तब जिस - यज्ञमें अपने पतिसे भी कामवासना श्रादिका निषेध होता है, उसीमें मृत अश्वके साथ वासनारूप - ग्राम्यधर्म कैसे हो सकता है? तब यहां पूर्व कहा हुआ. अर्थही वास्तविक है । उक्त शब्द परोक्ष - वृत्तिसे कहे गये हैं । क्या कभी आक्षेप्ताओंकी स्त्रियां अपने मृतक पतिसे मैथुन कर सकती हैं? यदि नहीं; तब मृतक अश्वसे ही वैसे कैसे हो सकता है? अतः गणपतिदेवका तेज ही यहां प्रार्थित किया गया है । इस अवसरपर अश्वकी तीन - परिक्रमा शतपथ ( १३ | २ | ८ | ४ ) और. कातीयश्रौतसूत्र ( २०।६।१३ ) के अनुसार की जाती हैं, परिक्रमा देव- पूजामें ही हुआ करती है; सो यह स्पष्ट देवपूजा ही है । इसी दैवी तेजके आकर्षणके फलस्वरूप महिषीका चक्रवर्ती - लड़का उत्पन्न 788७८८. श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )
है ।
कर्मकाण्ड में भी अश्वमहिषी - प्रसङ्ग में कोई सम्भोगका सम्बन्ध नहीं दीखता; क्योंकि अश्व मृतक है; तब केवल मृतक अश्व पृथग्भूत और संशोधित अङ्गका स्पर्शमात्र, उपस्थ ( उत्सङ्ग, गोदमें, अथवा अपने अङ्गपर ) स्थापनमात्र ही इष्ट है, वहाँ विलासिता न होनेसे तथा भावना दूषित न होनेसे पातिव्रत्य भंग की आशङ्का भी नहीं होती, क्योंकि वह भी शास्त्राज्ञानुसार पतिकी आज्ञा से उसके यज्ञको पूर्त्यर्थ किया जाता है । गायके स्तन वा मूत्रस्थानका पुरुष स्पर्श करते हैं; तो क्या वहाँ पुरुषोंको स्त्रीके अङ्गोंके स्पर्शका विचार आ जाता है? वा उन्हें उससे काम - वासना हो जाती है? यदि नहीं; तब स्त्रीको ही घोड़ेके अङ्गके स्पर्शमात्र से काम - वासना कैसे उत्पन्न हो जावेगी? क्या वह मनुष्य है? प्रतिपक्षियोंको जो ऐसी - वासना उत्पन्न हो जाती है; उसका कारण नियोग आदिकी कामुकताके प्रचारसे मस्तिष्क में विकृतिका उत्पन्न हो जाना है । प्रतिपक्षी लोग नियोगसेवा विधवा विवाहसे मृतककी पत्नीके अङ्गमें अन्य पुरुषके अङ्गका स्पर्शमात्र तो क्या; उसमें तो विलास भी करवाते हैं; वहाँ उनको उस पत्नीके पातिव्रत्य भङ्गकी शङ्का ही नहीं होती । यदि वे उसे अपने अभिमत - शास्त्र के अर्थके अनुसार व्यवहार करानेसे उसके पातिव्रत्यके भङ्गकी शङ्का नहीं. करते; तब इस कर्मकाण्डमें शङ्का करना अपने नियोग वा विधवा- विवाहसे आँख मूँद लेना है । जिस प्रकार आप लोग यहाँ उपहास
छउपस्थके उत्सङ्ग - अर्थमें शतपथ ब्राह्मण की साक्षी हम दे चुके हैं ।
789करते हैं; वैसे नियोगमें आप लोगोंका भी उपहास होता है, पर विचार करनेसे यह सब आप कट जाते हैं । प्रसव करनेमें डाक्टर भी खीकी योनिका स्पर्श कर रहे होते हैं । उसमें हाथ भी डाल रहे होते हैं; इससे क्या उस स्त्रीका आप पतिव्रत्यभङ्ग मान लेंगे? विवाहको ही ले लीजिये; इसके अङ्ग- गर्भाधान में ही क्या अश्लीलता नहीं है? पर शास्त्रानुसार व्यवहारसे वहाँ धर्म्यता मान ली जाती है; अश्वमेधमें तो न कोई कामवासना है, न ही विलास वा सम्भोग ही; तब बलात् वहाँ समागम वा सम्भोग बताना प्रतिपक्षियोंका अपने कलुषित - हृदयका ही यह कलुषित - विचार है, प्रकृत में ऐसी कोई बात नहीं ।
यदि वादी ऐसा मानते हैं; और अपनेको वेद - प्रेमी मानते हैं; तो वे जरा अथर्ववेदके कुन्तापसूक्तपर दृष्टि डालें । उसमें मन्त्र है- ' महानग्नी उपब्रूते अश्वस्य आवेशितं पसः ' ( २०।१३६।६ ) इस मन्त्रमें महानग्नी स्त्रीमें ' अश्वस्य पस आवेशितम् ' का अर्थ क्या करेंगे? इन्हीं अश्वमेध मन्त्रों तथा कुन्तापसूक्तोंसे त्रस्त होकर आर्यसमाज के एक अन्वेषक - विद्वान् ने अपने काँगड़ी वेद - सम्मेलन के सभापति- भाषण ( ११ अप्रैल १६५० ) के ४२ पृष्ठमें कहा है- ' प्रतिवर्ष भारतके भिन्न - भिन्न प्रदेशों के वेदोंके विद्वान् एक केन्द्रिय- स्थानपर एकत्रित हों, ' ' अश्वमेधसुक्ल, कुन्तापसूक्त, तथा ' त्रीणि शता त्री सह- स्राणि अग्निं त्रिंशच देवा: ' ' इन्द्रो दधीचो अस्थिभिः ' इत्यादि मन्त्रों में विशेषरूपसे विचार किया जाए, जो वेदोंका अनुशीलन करने वालों के लिए विशेष कठिनाई उपस्थित करते हैं ' । इससे स्पष्ट है कि— 790श्रश्वमेधसूक्लके उक्त मन्त्रोंका जो अर्थ स्वा ० द ० जीने किया है, वह उन्हें भी सन्तोषप्रद प्रतीत नहीं हुआ; उसमें उन्हें भी उनकी प्रसह्यकारिता
।
मालूम होती है
प्रश्न यह रहता है कि - ' वेदमें तथाकथित अश्लील
( ११ ) शेष
होते 1 । ' आहन्ति गभे पसो निगलगलीति धारका ' मन्त्र ही नहीं
आदि मन्त्रोंका महीधरने अश्लील अर्थ किया है ( यजुः २३।२२ )
कि- ' यदा भगे -
योनौ शिश्नमागच्छति, तदा धारका - धरति लिङ्गमिति धारका -योनिः
( बच्चेदानी ) गिलति - वीर्यं क्षरति, गल्गलेति शब्द वा करोति ' ।
इसपर उत्तर यह है कि - इनं अर्थोके करनेसे यदि श्री- महीधराचार्यको अपवादित किया जाता है; तो इसका भाव यह हुआ किं — वेदमें तथाकथित अश्लील वर्णन नहीं हो सकता । पर ऐसा कहना अज्ञान है । वेदमें सर्वाङ्गीणता होती है । सर्वाङ्गतामें सब कुछ होता है । यदि वेद में ऐसे वर्णन अश्लील माने जावें; तो ' रेतो मूत्रं विजहाति योनिं प्रविशदिन्द्रियम् ' ( यजुः १६७६ ) इस मन्त्रका अर्थ आर्यसमाजी - आचार्य अपने पास वेद पढ़नेवाली १७१२४ वर्षकी कुमारियोंको क्या बताते हैं? ' यस्यां 2 बीजं मनुष्या वपन्ति । यस्यामुशन्तः प्रहराम शें ’ ( ऋ ० १० | ८५ | ३७ ) इस मन्त्रका अर्थ कुमारियोंको क्या पढ़ाते हैं? वा विवाहित हो रही हुईको स्पष्ट बताते हैं? ' मेढू ' ते शुन्धामि पायु ' ते शुन्धामि ' ( यजु ० ६ १४ ) इस मन्त्रका अर्थ कुमारियों को क्या, पढ़ाते हैं? क्या यह तथाकथित अश्लीलता है या नहीं?
791श्रीमहीधरका अ
फिर महीधरका अपवाद क्यों किया जाता है? ' त्रिः स्म माऽह्नः श्नथयो चैतसेन ' ( ऋ ० सं ० १०/६५५ ) यहां निरुक्तमें ' वैतसेन ' का ' पु'स्प्रजनेन ' ( ३ । २ ९ । ३ ) अर्थ किया है । इसका भी अर्थ कुमारियों को क्या बताते हैं? यहां कहनेवाली उर्वशी अप्सरा है, क्योंकि वही ऋषिका ( वक्त्री ) है । ' यभ माम् अद्धि ओदनम् ' ( अथर्व ० २० । १३६।११,१३ ) यहांपर ' यभ मैथुने ' धातु है । इसका भी अर्थ बताया जाता है या नहीं? प्रतिपक्षी इन मन्त्रोंमें तथाकथित अश्लीलता मानते हैं या नहीं? यदि मानते हैं वा नहीं मानते; तो दोनों ही पक्षोंमें महीधराचार्यपर ही तथा कथित वेदसम्मत- अर्थ करने पर वाग्वाणोंकी वर्षा क्यों होती है?
शेष रहा ' आहन्ति गभे पसो निगल्गलीति धारका ' का श्रीमहीधराचार्यका अर्थ; सो वह वेदको पूर्व - वचनोंकी साक्षीसे अमान्य नहीं । ' पसः ' का अर्थ ' शिश्न ' तथा ' धारका ' का अर्थ ' योनि ' वेदको अनिष्ट नहीं । ' आनन्दनन्दौ आण्डौ मे भगः सौभाग्यं पसः ' ( यजु ० २०११ ) यहां स्वामी दयानन्दजीने भी ' पसः ' का अर्थ ' शिश्न ' किया है । ' धारका ' का ' योनि ' अर्थ शतपथमें देखिये- ' ते स्त्रियमाविशतः, तस्या उपस्थमेव आहवनीयं कुर्वते, धारका ँ
समिधम् । धारका ह नाम एतया ह वै प्रजापतिः प्रजां धारयाञ्चकार, रेत एव शुक्रामाहुतिम्, ते स्त्रियं तर्पयतः । स य एवं विद्वान् मिथुनमुपैति, अग्निहोत्रमेव आहुतं भवति, यः ततः पुत्रो जायते, स लोकः, एतद् अग्निहोत्रं याज्ञवल्क्य! नातः परमस्ति ' ( ११।६।२।१० ) ।
792केवल यहीं नहीं, तैत्तिरीय संहिता में भी यह प्रसिद्ध है- ' आहतं गर्भे पसो निजल्गुलीति धाणिका ' ( ७ | ४ | १६ | ३ ) यहां ' धारका ' के स्थान पर ' धाणिका ' है । इस ' धाणिका ' को कुन्तापसूक्त में देखिये – ' महानग्नी कृकवाकुं · ' शीष्ण हरति धाणिकाम् ' ( अ ० २० । १३६।१० ) । इस सूक्तमें अश्लील होने से ही आर्यसमाजी विद्वान् श्रीराजारामजी शास्त्रीने इस पर भाष्य ही नहीं किया । ' भगे ' का ' गर्भ ' लिखना अक्षरके वैदिक - आद्यन्तविपर्ययके कारण है, जैसे ' पसः ' का विपरीत ' सप ' का अर्थ ' शिश्न ' होता है, देखो निरुक्त ( ५।१६।२ ) । तब श्रीमहीधरको वैसा अर्थ लिखने में क्यों दोष दिया जाता है?? शेष प्रश्न है कि उसको कुमारीको कहा गया है; सो शतपथमें भी तो कुमारीको कहा गया है- हम उसका उद्धरण दे चुके हैं ।
इसी प्रकार ' आहं तनोमि ते पसो अधिज्यामिव धन्वनि ' ( अ ० ४ | ४ | ७ ) ' मैं धनुष में तनी हुई डोरीके समान तेरे पसः - पु'व्यञ्जनको तानता हूँ ' । यहां भी वादी कुमारियोंको यह अर्थ बताते हैं वा नहीं? यदि हाँ, वा नहीं, तब तादृश व्याख्या करने से महीधरको दोष क्यों दिया जाता है? अतः उस मन्त्रमें ' गर्भ ' और ' पसः ' का अर्थ वही हुआ जो श्रीमहीधरने किया है । इसमें श्रीसायणकी सम्मति भी देखिये –'धनुरिवातानय पसः ' ( अ ० ४ | ४ | ६ ) इस मन्त्रके भाष्यमें उसने लिखा है - ' अस्य पसः - पुंव्यञ्जनं वीर्यप्रदा- तृत्वेन धनुरिव ऊर्ध्वायतं कुरु ' यह लिखकर श्रीसायणने लिखा है- ' पसः शब्दस्य लिङ्गवाचित्वम् ' आहतं गभे पसो निजल्गुलीति धाणिका '
793७३३ ( तै ० सं ० ७ । ४ । १६ । ३ ) इत्यादि मन्त्रान्तर- प्रसिद्धम् ' । यही वह मन्त्र है, जिसका स्वामी दयानन्दजीने महीधरका अर्थ उपस्थित करके उसे फटकार दो । श्रीसायणाचार्यको भी उक्त मन्त्रका श्रीमहीधर- जैसा ही अर्थ ही विवक्षित है, यह स्पष्ट है ।
( १२ ) व इसी तथाकथित - अश्लीलताको यदि परोक्षवृत्ति मान लिया जाय, और उसके स्थानापन्न अन्य वस्तु रख दी जाय; तो फिर भाव उत्तम हो जाता है । जैसे कि शतपथमें कहा है- ‘ विड् वै गभः, राष्ट्र ं वै पसः, राष्ट्रमेव विशि आहन्ति, तस्माद् राष्ट्री विशं घातुकः ( १३ | २ || ६ ) यहां ' गम ' और ' पसः ' का अर्थ नहीं बदला गया; अर्थ वही रखा गया है । ' विड् वै गमः, राष्ट्र ' वै पसः में ‘ वै ’ पदसे पर्यायवाचकता विवक्षित नहीं; नहीं तो ' आयुर्वै घृतम् ' ( तै ० सं ० शशश २ ) में भी ' वै ' शब्दसे ' आयु ' शब्द ‘ घृत ' का वा ' घृत ' आयुका पर्यायवाचक हो जावे; पर वैसा नहीं होता । तो जैसे पसः ( शिश्न ) के गर्भ ( भगमें ) आहनन करनेसे धारका ( बच्चेदानी ) ताडित हो जाती है और शब्द - सा करती है; वैसे ही अन्यायी राजा जब प्रजामें गमन करता है और उसे ताडन करता है; तब प्रजाकी धारिका - व्यवस्था ताड़ित हो जाती है, और प्रजाकी चिल्लाहट का शब्द निकलता है ।
यहां पर अश्वमेधयज्ञका प्रकरण है; जो राजाको करना पड़ता है; तो कर्मके व्याज से राजाको परोक्ष - वृत्तिसे उपदेश भी किया जाता है । जैसे हमसे पूर्वोद्धृत शतपथके वाक्यसे पस - भगं आदिके व्याजसे अग्निहोत्रकी विधि उपदिष्ट कर दी गई है; वैसे
794श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )
ही उपहासके मन्त्रोंमें भी समझ लेना चाहिये । छान्दोग्य में पञ्चम आहुति में ' योषा वाव गौतम! अग्निः, तस्या उपस्थ एव समित, योनिरर्चिः, अभिनिन्दा विस्फुलिङ्गाः । तस्मिन् एतस्मिन् अग्नौ रेतो जुह्वति ' ( ५८ | १-२ ) इस उल्लेख से क्या तथाकथित अश्लीलता मान ली जावेगी?
( १३ ) यह भी याद रख लेना चाहिये कि - वेदमें एक मन्त्र के भी विविध भाव हो जाते हैं । यदि कहीं तथाकथित अश्लीलता है; तो इसमें वेदकी निन्दा नहीं । वेदकी सर्वाङ्गीणताका यह चिह्न है । क्या एक समय दम्पतिको भी वेद के अनुसार तथाकथित - अश्लीलता नहीं करनी पड़ती? यदि न की जावे; तो सृष्टिका ही प्रलय हो जावे? और शङ्काकर्ता वादी ही उत्पन्न न हो सके । उस अश्लीलता का परिणाम उत्तम रहता है, वंश चल निकलता है; तब श्रीमहीधर- प्रोक्त स्वारसिक - अर्थकेलिए हो - हल्ला क्यों मचाया जाता है? कामशास्त्रकी भी तो गृहस्थीकेलिए आवश्यकता पड़ती है; उसका मूल भी तो वेदसे ही निकालना पड़ेगा । श्रीमनोहर विद्यालङ्कार - महाशयका जो गुरुकुल के स्नातक प्रतीत होते हैं, ' वैदिक धर्म ' पत्र ( ३०।५ पृ ० २०१ ) में ' महीधरभाष्य भी उपादेय है ' इस शीर्षकसे एक लेख निकला था । उसमें वे लिखते हैं - उस ( वेद ) के एक - एक शब्दके नाना अर्थ हो सकते हैं, इस प्रकार इन २० हजार मन्त्रों में अनन्त ज्ञान मिल सकते हैं; क्योंकि - वेद में सम्पूर्ण ज्ञान है । इसलिए बहुत सी ऐसी बातें भी वेदमें दिखाई देंगी, जो आदर्श दृष्टिसे हमें अनुचित मालूम पढ़ें इनके द्वारा वेदकी पूर्णता ही समझनी चाहिये ' ।
795श्रीमहीधरका अर्थ
आगे विद्यालङ्कारजी लिखते हैं- ' यजुर्वेद के २३ वें अध्यायका भाष्य करते हुए भाष्यकार - महीधरने जो अर्थ किये हैं, वे विचार- रणीय हैं । कामशास्त्रका बहुत ही अच्छा ज्ञान देते हैं, जो वेदको शैलीके अनुरूप हैं । इस प्रकार के ज्ञानकी वेद में अनावश्यकता है- यह कहकर पिण्ड नहीं छुड़ाया जा सकता ।... • एक समय था जब महीधरके भाष्य को भी अश्लील कहकर त्याज्य ठहराया गया था; किन्तु आज कामशास्त्र ज्ञानकेलिए उसकी वैज्ञानिकताको परखना चाव- श्यक है ।.. ' महीधरका भाष्य भी युक्तियुक्त है, और वह भी एक विज्ञान ( कामशास्त्र ) पर प्रकाश डालता है ' ।
इससे स्पष्ट है कि — इसमें महीधरको बदनाम करना अपने- आपको अल्पश्रुत बनाना है । वेदमें पुरुषके अङ्गकेलिये ' अश्व'का सा वर्णन बहुत आया है; एक - दो मन्त्र इस विषयके दिये जा चुके हैं । एक मन्त्र अन्य देखिये- ' अश्वस्य अश्वतरस्य अजस्य पेत्वस्य च । अथ ऋषभस्य ये वाजाः ( वीर्याणि ) तान् अस्मिन् [ पुरुषे ] घेहि तनूवशिन्! ' ( ० ४ ४ ८ ) ' मृतभ्रजे ओषधिं शेपहर्षणीम् ' ( ४ | ४ | १ ) इस प्रकारके बहुत से मन्त्र हैं; जिनसे वाजीकरण - ष- धियोंका ज्ञान होजाता है; कौन कह सकता है कि अश्वमेध - यज्ञमें भी उक्त - कर्मोंके व्याजसे कोई राजाकेलिए वाजीकरणका रहस्य नहीं भरा है? यह रहस्य अश्लीलता कहकर उससे आँख मूँद लेनेसे, और अर्थ सर्वथा बदल देनेसे नहीं मिलते; यहाँ तो मूलमें ही घुसकर देखनेसे आगे पता चलता है । फलतः श्रीमहीधरको बदनाम करना अपनी ही कलुषित मनोवृत्तिको परिचायित करना 796हे ६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )
है, श्रीमहीधरने कहीं भी महिषीका अश्वसे समागम नहीं बताया; स्वा ० द ० जीने बलात् उसे ठोंसा है; अतः जनताको स्वामीजी की बातों पर न आकर स्वयं भी कुछ देखभाल करनी चाहिये ।
( १४ ) स्वा ० दयानन्दजीने ' मेढ्र ' ते शुन्धामि, पायुं ते शुन्धामि ' ( यजुः ६।१४ ) इस मंन्त्रका अश्वमेध यज्ञसे अपने बचाव के लिए पृ ०५०० में यह अर्थ किया है कि - ' हे शिष्य! मैं तेरे लिङ्गको पवित्र करता हूँ, तेरे ‘ · ‘ गुदेन्द्रियको पवित्र करता हूँ ' क्या यह अर्थ कुमार वा कुमारियों को पढ़ाया जाता है?? यह अर्थ कितना उपहासयोग्य बन गया है? कहते हैं कि इस अश्लीलताका एक गुरुकुल में काण्ड भी बन गया था । आर्यसमाजी लोग इस अर्थकी हिमायतकेलिए बड़ी - बड़ी बातें कहते हैं; पर गुदेन्द्रियकी शुद्धि वे ठीक नहीं बता सकते । यह अर्थको तोड़ - मरोड़ करनेका परिणाम होता है । तो फिर महीधरका ही अपवाद क्यों किया जाता है? उवटने भी वैसे अर्थ किये; श्री- सायणाचार्यने भी । कल्पने भी वैसे अर्थ किये, शतपथब्राह्मणने भो । जहाँ कुमारीको उपहास वचन कहा जा रहा है; वहाँ कुमारी भी उसका उत्तर उपहास में दे रही है; इस प्रकार वावाता आदिके उत्तर- प्रत्युत्तर उपहासके हैं; शतपथब्राह्मणने भी वहाँ वैसा ही लिखा है । शतपथब्राह्मणको अपने भाष्यकी कसौटी मानते हुए भी ' स्वामीजीने क्या शतपथानुकूल अर्थ इन मन्त्रोंका लिखा है कि- जो कुमारी यदि उत्तर- प्रत्युत्तरमें घट जावें? किसीका तोड़ - मरोड़ करके अर्थ करनेमें कठिनाई नहीं होती; कठिनाई यह होती है कि – स्वारसिक- प्राकरणिक अर्थ किया जाए, और उसकी सङ्गति बैठाई जाय । पर 797वैसा स्वयं सामर्थ्य न होनेसे दूसरेका अपवाद कर देना, दूसरेको वाममार्गी तक कह देना बहुत बुरी बात है ।
फलतः ' परोक्षवादा ऋषयः परोक्षं मम च प्रियम् ' ( श्रीमद्भागवत ११।२१।३५ ) इत्यादि - वचनोंके अनुसार कहीं गुप्त बात परोक्षतासे कही जाती है, वहां सर्वसाधारणको ज्ञान न हो सकने से आक्षेप्ताओं को वाममार्गिता वा अश्लीलता प्रतीत होती है । जैसे कोई कहे कि— ' करशनजीके लड़केने अर्वाचीन - जगत् में हलचल मचा दी ' । इस. वाक्यको परोक्षवृत्तिसे कहा जावे; तो ऐसे बनेगा - ' करशनजीके शिश्नके वीर्यने नव- शिक्षित जनताकी योनि में पड़कर खूब विप्लव मचा दिया । उसमें अनुरक्त एक विशेष जनताने उसे अपने उपस्थमें डाल लिया । इससे उसे गर्भ होगया, उससे बहुतसे तादृश - विचारवाले लड़के प्रसूत होगये ' । इस दूसरे वाक्यका परोक्ष पूर्वोक्त - अर्थं न समझकर उसके प्रत्यक्ष - शब्दोंका ही केवल अर्थ समझनेवाला अल्पश्रुत व्यक्ति इस वाक्यसे चिढ़ उठेगा । यही बात स्वामी वा उसके अर्धघट अनुयायियोंकी है, जिन्होंने गणपतिदेव के तेजके ध्याकर्षणकी बात न समझकर मृतक -अश्वसे महिषीका असम्भवी - समागमका अर्थ करके श्रीमहीधराचार्यको वाममार्गी लिख डाला । क्या वाममार्गी स्त्रियोंका मृतक अश्वसे सम्भोग कराया करते हैं?
( १५ ) जिस प्रकार स्वामीजीने भूलसे मृतक अश्वका समागम- अर्थ श्रीमहीधरके भाष्य में समझकर उसे ' वाममार्गी ' शब्दसे बदनाम किया; वैसे ही वाममार्ग के परोक्षवृत्तिसे कहे हुए योग- 798विषयको न समझकर उसके प्रत्यक्ष- शब्दोंका अर्थ करके जनता में उसे भी कलङ्कित कर दिया । प्रकरणवश हम वाममार्गके विषय में भी उसके रहस्यका दिग्दर्शन करा देते हैं, जिससे सर्वसाधारणकी भ्रान्ति दूर हो जावे ।
( क ) रुद्रयामल - तन्त्रका एक पद्य है- ' रजस्वला पुष्करं तीर्थ चाण्डाली तु स्वयं काशी । चर्मकारी प्रयागः स्याद् रजकी मथुरा मता । अयोध्या पुक्कसी प्रोक्ता ' यहाँ भी परोक्षवादके वर्णनको न. समझकर इस तन्त्र - वाक्यके लेखकको घृणित - शब्दों से स्मरण किया जाता है; और कहा जाता है कि- ' शास्त्रोंमें रजस्वला [ चाण्डाली, चर्मकारी, रजकी, पुक्कसी ] आदि स्त्रियोंके स्पर्शका निषेध है, उनको वाममार्गियोंने अतिपवित्र माना है । सुनो इनका. अण्ड- बण्ड श्लोक - ' रजस्वला पुष्करं तीर्थ, चाण्डाली तु स्वयं काशी ' इत्यादि । रजस्वलाके साथ समागम करनेसे जानो पुष्करका स्नान, चाण्डाली से समागम में काशीयात्रा, चमारीसे समागम से मानो प्रयाग स्नान, धोबी- स्त्री से समागम से मथुरा - यात्रा और कञ्जरीके साथ लीला करनेसे मानो अयोध्यातीर्थ कर आये ' । ( स ० प्र ० ११ समु ० वाममार्ग - आलोचनाप्र ० )
खेद है कि - संन्यासीजीको समागमके स्वप्न बहुत आया करते थे । श्रीमहीधरके भाष्यमें घोड़ेसे महिषीके समागमकी कोई गन्ध भी नहीं थी; पर स्वामीजीको बहुत जल्द आगई । इस प्रकार इस श्लोक में भी । यह निन्दा स्वामीकी आपात -दृष्टि के कारण लिखी गई, और वे परोक्षवाद समझ न सके । रजस्वला आदि यहाँ 799पारिभाषिक शब्द हैं कि - जहाँ रजस्वलाके गमनसे स्वर्गप्राप्ति बताई हो, वहाँ पुष्करतीर्थके गमनसे वैसा समझना चाहिए । जहाँ चाण्डाली- गमन लिखा हो; वहाँ काशीयात्रा समझनी चाहिए । इसी भांति.. चर्मकारीगमनसे प्रयागगमन, रजकीगमनसे मथुरागमन तथा पुक्कसीगमनसे अयोध्यागमन समझना चाहिये । पर यह न समझकर उसका उल्टा अर्थ लिख दिया गया । उन्हें गाली भी दे दी गई । वे नहीं जानते थे कि - ' इत्याचक्षते परोक्षेण, परोक्षप्रिया इव हि देवा. भवन्ति प्रत्यक्षविद्विषः ' ( गोपथब्रा ० १ । १ । १ ) । देवकल्प- शास्त्रकार परोक्ष - शब्दों से अपना विवक्षितार्थ सूचित करते थे । तभी तो स्वामीजीने इनके लिए स्वयं भी लिखा है - ' इसलिए ऐसे - ऐसे नाम धरे हैं कि — जिससे दूसरा न समझ सके ' ( स ० प्र ० पू ० १७८ ) यदि ऐसा है; तो उनपर उपालम्भ क्यों?
कोई बड़े - से - बड़ा व्यभिचारी भी रजस्वला आदि गमन की प्रशंसाको कभी भी ग्रन्थ - बद्ध नहीं कर सकता । जब उक्त स्थलमें प्रशंसा की गई है, तो यह स्पष्ट है कि- इन परोक्षवादोंको समझा नहीं गया । वस्तुतः तन्त्रशास्त्रों में परोक्ष- शब्दोंसे योगविषय वर्णित किया गया है । उसकी परिभाषाओंका रहस्य न जाननेवाला वहाँ पर घृणित - वर्णन समझने लग जाया करता है । इस अवसरपर यथाश्रुत - अर्थ करनेपर ' मातुर्दिधिषुमन्त्रवं स्वसुर्जारः शृणोतु नः ( ऋ ० ६।५५।५ ) इस मन्त्रका भी अश्लील अर्थ प्रतीत होगा । अब देखिये — ‘ गोमांसं भक्षयेन्नित्यं पिबेदमरवारुणीम् ' । इस पद्यको देखकर साधारण आपाततोदर्शी - पुरुष भ्रम में पड़ जाते हैं कि- 800यहां गोमांस भक्षण और मद्यपान आदिष्ट किया गया है; पर इसकी परिभाषा देखनेसे भ्रम दूर हो जाता है कि- ' गोशब्दे - नोदिता जिह्वा तत्प्रवेशो हि तालुनि । गोमांसभक्षणं प्रोक्तं महापातक- नाशनम् । जिह्वाप्रवेशसंजात- सुषुम्णाक्षोभसम्भवः । चन्द्रात् स्रवति यः सारः सैवेहामरवारुणी ' ( हठयोगप्रदीपिका ) ।
( १६ ) इस प्रकार तान्त्रिक मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा, मैथुन आदि पञ्च मकारोंकी परिभाषाओंका ज्ञान जब तक ' नित्यतन्त्र, महा- निर्वाणतन्त्र, मेरुतन्त्र ' आदि ग्रन्थोंसे न किया जावे; तब तक आपात- दृष्टि रखनेवालेको बड़ा भ्रम सम्भव हो जाता है । यह न जानने से ही ( स ० प्र ० ११ समु ० पृ ० १७७ में ) कालीतन्त्र के पञ्च मकारों का उपहास उड़ाया गया है । पञ्च - मकारों को तो योगियोंको मुक्तिदायक बताया है — ' मद्यं मांसं च मीनं च मुद्रा मैथुनमेव च । मकारपंचकं प्राहुर्यो- गिनां मुक्तिदायकम् ' । स्वामीजीसे उद्धृत उत्तरार्ध में कहा है- ' एते पंच मकाराः स्युर्मोक्षदा हि युगे युगे ' । कोई व्यभिचारीसे व्यभिचारी भी प्रचलित मद्य - मांस मैथुन आदिको योगियोंके लिए मुक्तिदायक कभी भी नहीं कह सकता । जब कहा है; तो स्पष्ट है कि — इनमें रहस्य हैं । सो इनको परिभाषाओं को जाननेसे ही उनका मुक्तिसे सम्बन्ध सिद्ध होगा । अब देखिये वे परिभाषाएँ -
१ मद्य - ' यदुक्तं परमं ब्रह्म निर्विकारं निरञ्जनम् । तस्मिन् प्रमदनं ज्ञानं तद् मद्य ं परिकीर्तितम् ' ( विजयतन्त्र ) यह ' मद्य'की परिभाषा है कि - निरञ्जन परब्रह्ममें मस्त हो जाना । इसी मद्यके लिए कहा गया है - ' पीत्वा - पीत्वा पुनः पीत्वा यावत् पतति भूतले । 801पुनरुत्थाय वै पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ' ( महानिर्वाणतन्त्र ) । क्या यहाँ साधारण - मद्यके पानसे पुनर्जन्मका दूरीभाव कभी सम्भव हो सकता है? यह तान्त्रिकता सद्गुरु द्वारा ही जानी जा सकती है; और संयमी ही इसका अधिकारी हो सकता है । जो ऐसा नहीं करता; केवल ग्रन्थोंके शब्दोंके ही अर्थ अनुसृत करने बैठता है; वह कुमार्ग में प्राप्त होकर पथभ्रष्ट हो सकता है ।
२ मांस — ' मा - शब्दाद् रसना ज्ञेया तदंशान् रसनाप्रियान् । सदा यो भक्षयेन्नित्यं स भवेन्मांससाधकः ' ( आगमसार ) पुण्यापुण्यपशु हत्वा ज्ञानखड्गेन योगवित् । परे लयं नयेच्चित्तं मांसाशी स निगद्यते ' ( कुलार्णवतन्त्र ) यह मांसभक्षणकी परिभाषा है कि ज्ञानखड्गसे पुण्य - पापरूप पशुको मारकर परब्रह्म में चित्तको लगाना ।
३ मत्स्य ( मीन ) - ' गङ्गा ( शरीरस्थित - इडानाडी ) - यमुनयो: ( पिङ्गलानाडी ) मध्ये मत्स्यौ द्वौ ( श्वासप्रश्वासौ चरतः सदा । तौ मत्स्यौ भक्षयेद्यस्तु ( प्राणायामे ) स भवेद् मत्स्यसाधकः ' ( आगम- सार ) यह मत्स्यभक्षणकी परिभाषा है कि- प्राणायाममें श्वासप्रश्वास को खाना ( रोकना ) । ‘ मनसा चेन्द्रिय - ग्रामं संयोज्यात्मनि योगवित् । मत्स्याशी स भवेद् देवि । शेषा धीवरवृत्तयः ' यह मेरुतन्त्रप्रोक्त मत्स्यकी परिभाषा है ।
४ मुद्रा - ' सत्संगेन भवेन्मुक्तिरसत्संगेन बन्धनम् । असत्सङ्ग- मुद्रणं यत्तु सा मुद्रा परिकीर्तिता ' ( विजयतन्त्र ) आत्मनो जायते मोद- स्ता मुद्राः परिकीर्तिताः । ता ज्ञेया धारणा- ध्यानसमाध्यान्यास्तु मोक्षदाः ' ( मेरुतन्त्र ) यह मुद्राकी परिभाषा है कि - असत्सङ्गका 802मुद्रण करना और धारणा ध्यान आदि से आत्माकी मोक्षप्राप्ति ।
५ मैथुन - ' कुलकुण्डलिनीशक्तिर्देहिनां देहधारिणी । तयोः शिवस्य संयोगो मैथुनं परिकीर्तितम् ' ( विजयतन्त्र ) ' सहस्रारोपरि बिन्दौ कुण्डल्या मैथुनं शिवे! । मैथुनं शयनं दिव्यं यतीनां परिकीर्ति - तम् ' ( योगिनीतन्त्र ) । ' सुषुम्णा शक्तिरुद्दिष्टा जीवोऽयं तु परः शिवः । तयोस्तु सङ्गमो देवाः! मैथुनं परिकीर्तितम् । वीर्यपातस्य समये सुषुम्णासन्नमारुते । उत्पद्यते तु यत् सौख्यं शतकोटिगुणं तु तत् । एतदेव रतं ( मैथुनं ) प्रोक्तम् अन्यद् स्याद् रासभं रतम् ' ( मेरुतन्त्र ) यह मैथुनकी परिभाषा है कि - सुषुम्णारूप - शक्ति और जीवरूप- शिवसे सम्मेलन । इससे सुषुम्णा के साथकी वायुका वेगप्रवाह ही सुखजनक - वीर्यपात हुआ करता है - यह बताया गया है ।
बालरण्डाबलात्कार — अब बालविधवासे बलात्कारकी परिभाषा देखिये – ' गङ्गायमुनयोर्मध्ये बालरण्डां तपस्विनीम् । बलात्कारेण गृह्णीयात् तद् विष्णोः परमं पदम् ' । परिभाषा यह है - ' इडा भागीरथी गङ्गा, पिङ्गला यमुना नदी । तयोर्मध्यगता रण्डा सुषुम्णैव सरस्वती ' ( हठयोग - प्रदीपिका ३३१ ) इडा, पिङ्गलाकी मध्यवर्तिनी सुषुम्णानाडीका ग्रहण ही बालरण्डा- वलात्कार है ।
( १७ ) आक्षेप्ता- वैदिकम्मन्योंका यह प्रश्न होता है कि - ' यदि तन्त्रग्रन्थों में इस प्रकार उत्तम विषय है; तो उसे उद्वेजक - शब्दोंसे क्यों कहा जाता है? ' इसपर उत्तर पूर्व दिया गया है कि- ' इत्या- चक्षते परोक्षेण, परोक्षप्रिया इव हि देवा भवन्ति प्रत्यक्षविद्विषः ' ( गोपथ १।२।२१ ) ' परोक्षवादा ऋषयः ' ( श्रीमद्भागवत ११।२१।३५ ) ' परो- 803' क्षकामा देवाः प्रत्यक्षविद्विषः ' ( शतपथ ०७।५।१।२२ ) परोक्षवाद देवता एवं ऋषि - मुनियोंको बहुत प्रिय होता है । वेद में भी तो यही तरीका है । देखिये –'पिता दुहितुर्गर्भमाधात् ' ( ऋ ० १।१६४ । ३३ ) ' जार आ भगम् ' ( ऋ ० १०।११।६ ) ' वीर्यं मयि घेहि ' ( यजुः १६।६ ) ‘ वृषा वाजी रेतोधा रेतो दधातु ' ( यजुः २३।२० ) ' मातुर्दिधिषुमब्रवं स्वसु- र्जारः शृणोतु नः ' ( ऋ ० ६ ५५ ५ ) दिधिषु - दूसरे पतिको कहते हैं, ( माँका दूसरा पति ) ' सुयभ्या कन्या कल्याणी ' ( अथर्व ० २०।१२८ । ६ ) ' योनिरुलूखलं शिश्नं मुसलम् ' ( शत ० ७१५ | १ | ३८ ) ' यदा स्थूलेन पससाऽणौ मुष्कौ उपावधीत् ' ( अथर्व ० २० । १३६।२ ) इत्यादि । क्या. यह बाहर से उद्वेजक शब्द नहीं?? फिर तन्त्रग्रन्थों वा महीधरभाष्य पर आक्षेप क्यों?
यह वाममार्ग जितेन्द्रियोंके लिए कहा गया है, विषय -लोलुपोंके - लिए नहीं । जैसे कि- ' अयं सर्वोत्तमो मार्गः शिवोक्तः सर्वसिद्धिदः । जितेन्द्रियस्य सुलभो नान्यस्यानन्तजन्मभिः ' ( पुरश्चर्यार्णव ) ' परद्रव्येषु योऽन्धश्च परस्त्रीषु नपुंसकः । परापवादे यो मूकः सर्वदा विजितेन्द्रियः । तस्यैव ब्राह्मणस्यात्र वामे ( वाममार्गे ) स्यादधिकारिता ' । तब बिना सोचे - विचारे वाममार्गकी भी निन्दा फैला देना एक अक्षम्य अपराध है । इसलिए ' भावचूडामणि ' नामक तन्त्रग्रन्थ में लिखा है कि तन्त्र तिगूढ हैं । ' तन्त्राणामतिगूढत्वात् तद्भावोप्यतिगोपितः । ' ब्राह्मणो वेदशास्त्रार्थ - तत्त्वज्ञो बुद्धिमान् वशी । गूढतन्त्रार्थभावस्य निर्मध्योद्धरणे क्षमः ' अर्थात् तन्त्रशास्त्रका ज्ञान वेदशास्त्रार्थज्ञ विद्वान् ब्राह्मण ही कर सकता है, आपाततोदर्शी नहीं ।
804यही आक्षिप्त वाममार्गका श्लोक ही देखिये- ' मातृयोनिं परित्यज्य विहरेत् सर्वयोनिषु ' ( स ० प्र ० ) यहां भाव था कि मातृ- ' वंशकी लड़की से विवाह न करे, अन्य वंशवालीका उतना विचार न करे; पर इस पद्यपर बहुत उपहास किया जाता है, देखिये स ० प्र ० । इस मार्गमें भग - लिङ्गकी पूजा गौरीशङ्करकी पूजा इष्ट है । जो इस मार्ग में कई उद्वेजक बातें चालू हो गई हैं, वह सद्गुरु- द्वारा ज्ञान न प्राप्त करनेके ही कारण हैं । पर विद्वान्का कर्त्तव्य है कि उसके अन्तस्तल में घुसकर उसका तत्त्व जाने । आपाततः देखकर उसपर उपहास न करे ।
( १८ ) यदि आक्षेप्ताकी आपात दृष्टि में यही वाममार्ग है; तो वह • अपने सम्प्रदायको भी ' वाममार्ग ' बना देगा | आक्षेप्ताने लिखा है - ' जिन नीच स्त्रियों को छूना नहीं [ लिखा ]; उनको वासमार्गियोंने अतिपवित्र माना है । जैसे — शास्त्रों में रजस्वला [ चाण्डाली, चर्मकारी, रजकी, पुक्कसी ] आदि स्त्रियोंके स्पर्शका निषेध है; उनको वाममार्गियोंने अतिपवित्र माना है, ( स ० प्र ० ११ पृ ० १७७ ) इस प्रकार आक्षेप्ताका सम्प्रदाय भी चाण्डाल आदि से स्पर्श मानता है । ' चाण्डाल ' का अर्थ क्षेप्ताने अपने ग्रन्थों में ' भंगी ' माना है; तब चाण्डाल आदिका स्पर्श करनेवाले याक्षेप्ता के अनुयायी भी वाममार्गी बन जाएँगे । ( ख ) और कहा है – जब भैरवीचक्र हो; तब उसमें ब्राह्मणसे लेकर चाण्डाल - पर्यन्तका नाम द्विज होता है ' ( पृ ० १७८ ) इस प्रकार जब इनका ' शुद्धिचक्र ' चलता है; तब ' अब्दुलगफूर ' आदि भी ' धर्मपाल शर्मा ' बन जाते हैं; उस चक्रसे
805श्रीमहीधरका अ
पृथक् होनेपर फिर मुसलमान वा भङ्गी वन जाते हैं ।
( ग ) ' अहं भैरवः, त्वं भैरवी, आवयोरस्तु सङ्गमः ' कहकर चाहे कोई पुरुष हो, वा स्त्री हो, समागम करने में दोष नहीं मानते, ( स ० प्र ० ) इस प्रकार वे ' नियोग ' के आवरण में किसी भी स्त्री- पुरुषके समागम में दोष नहीं मानते । ( घ ) वहीं वाममार्गियोंका अभक्ष्य भक्षण माना है । आक्षेप्ताने चाण्डाल आदि तथाकथित - नीचोंका भोजन निषिद्ध कर रखा है । जैसे कि - ' ब्राह्मणादि उत्तम - वर्णोंके हाथका खाना, और चाण्डालादि नीच भङ्गी - चमार आदिका न खाना ' ( स ० प्र ० १० पृ ० १६६ ) पर आक्षेप्ता के सम्प्रदायमें इनका भोजन किया जाता है - यह ' अभक्ष्यभक्षण ' है । ( ङ ) इस प्रकार ' अप्राप्ताम् ' ( ८ ) इस मनुपद्यका ' अप्राप्त- विवाहकालाम्, द्वादशवर्षेभ्योपि न्यूनाम् ' यह अर्थ था; उसका सं ० वि ० में ' माताकी छे पीढ़ीके भीतर भी विवाह ' ( पृ ० १२७ ) अर्थ करके भगिनीसे समागम, और ' इमं ते उपस्थं मधुना स सृजामि प्रजापतेर्मुखमेतद् द्वितीयम् ' इस मन्त्रसे स्त्रीके उपस्थको मन्त्र- द्वारा मधुसंयुक्त अभिप्रेत करके अपनी वाममार्गिता सिद्ध कर दी गई है । पर आक्षेप्ताके भाष्य की कसौटी शतपथ ब्राह्मणके अनुसार अर्थ करनेवाले श्रीमहीधराचार्यपर वाममार्गिताका आक्षेप कैसे हो सकता है? क्या ' शतपथ ब्राह्मण ' वाममार्गियों का ग्रन्थ है?
चाहिये तो यह था कि महीधरभाष्यका वास्तविक अर्थ बताया जाता; जैसे कि हम पूर्व निर्देश दे चुके हैं; परन्तु इससे विपरीत श्रीमहीधरको शतपथसे विरुद्ध अर्थ करनेवाला लिख दिया!!! परन्तु 806श्रीमहीधराचार्यने शतपथके अनुसार जो शब्द लिखे थे; उन शब्दोंको अपने ही प्रकाशित शतपथमें या तो देखा नहीं जाता, या देखकर भी उन्हें छिपा दिया जाता है । हमने शतपथका वह पाठ लिख दिया है, और उसका आशय भी बता दिया है । वहां मृतक - थश्वके साथ समागमका कुछ भी गन्ध नहीं है, घतः अव श्रीमहीधराचार्यका कुछ भी दोष नहीं रहा, और कुछ भी तथाकथित अश्लीलता नहीं रही । अब उस पाठको प्रक्षिप्त वा वेदविरुद्ध बताना अपनी दुर्बलताका प्रकाशन होगा । शेष मन्त्रोंका अर्थ श्री पं ० भीमसेनजी - कृत ' आश्वमेधिकमन्त्रमीमांसा ' वा पं ० ज्वालाप्रसादजीके यजुर्वेदभाष्य में देखा जा सकता है । याज्ञिक- पश्वालम्भपर हम अन्य पुष्प में लिखेंगे, पर अश्वमेधादि कलिवर्जित हैं - यह जान रखना चाहिये ।
विद्वानोंको चाहिये कि इस प्रकार के भ्रमोंको साधारण जनता से ' हटवा दें । यह निबन्ध श्रीगणेशजीके ' गणानां त्वा ' इस प्रसिद्ध- मन्त्रके प्रसङ्गसे हमें आरम्भ में ' श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ' के आगे देना चाहिये था; पर कारणवश वहां इसे न देकर पूर्वप्रतिज्ञानुसार ' गणेशचतुर्थी ' के प्रकरण में दिया है । फलतः श्रीगणेश वैदिक - देवता हैं और उनका उक्त मन्त्र ठीक है, उसके अर्थ में कोई अश्लीलता वा लज्जास्पदता नहीं । श्रागे ' संकट - गणेश चतुर्थी ' पर लिखा जायगा ।
* पृ ० ७६३ पं ० १४ में ' गर्भ ' के स्थान ' गभ ' पढ़ें । पृ ० ६२२ में ' मधे चन्द्रमसा युक्ते सिंहे चाभ्युदिते गुरौ ' ( १।१२२।१८ ) ‘ कल्याण’से प्रकाशित - महाभारत में सिंह राशिका नाम प्रत्यक्ष है । पृ ० ७३४ पं ०२ में ' पापिनि ' के स्थानमें ' पाणिनि ' पढ़ें ।
In English
Defense of Mahidharacharya's Commentary
This text defends the commentator Mahidharacharya against accusations that his interpretation of a Yajurveda mantra is obscene or heretical. The author argues that Mahidharacharya's meaning follows established Vedic traditions like the Shatapatha Brahmana rather than being an original or improper invention.
This chapter answers
- What is the meaning of gananam tva mantra in yajurveda?
- Is mahidharacharya commentary on yajurveda considered obscene?
- How does mahidharacharya explain the verse regarding a mare and a horse?
- Why do critics attack mahidharacharya's interpretation of vedic mantras?
Also written: Shrimahidharaka, Gananan, Tva, Mantraka, Bhaja, Shrimahidharaka Gananan Tva Mantraka Bhaja, श्रीमहीधरका ' गणानां त्वा ' मन्त्रका भाज