पञ्चम सुमन · प्रकरण 1

श्रीगणेशका मङ्गलाचरण

मुद्रित पृष्ठ 11–68 58 पृष्ठ

11स्मृतिके आचाराध्यायमें ' विनायकः कर्मविघ्नसिद्ध्यर्थं विनियो- जितः । गणानामाधिपत्ये च रुद्रेण ब्रह्मणा तथा, ( २७१ ) में विनायकको विघ्नकारक कहा है; तब यदि उस गणपतिकी पूजा न की जावे; तो कर्मों के विघ्न कैसे हटें?

( ग ) प्राचीन पुस्तक ' मानवगृह्यसूत्र ' में इन विनायकोंको विघ्न- कारक बताया है । ‘ अध्येतॄणामध्ययने महाविघ्ना भवन्ति ' ( २।१४ । १-२-३ ) २१ सूत्र तक वहाँ इनका वर्णन है, इनकी शान्त्यर्थ विनायक - स्वामी गणपतिका पूजन किया जाता है । जैसे कि — श्रीयाज्ञवल्क्यने कहा - ' एवं विनायकं पूज्य ग्रहाँश्चैव विधानतः । कर्मणां फलमाप्नोति श्रियं चाप्नोत्यनुत्तमाम् । ( २६३ ) । श्रीभोजराजासे बने हुए ' समराङ्गणसूत्रधार ' ( ५८ ।१३-१४ ) में ' विनायक ' प्रासादके ' कुञ्जर, मोदक ' आदि चिह्न रखे हैं - वह चिह्न गणेशजीके ही हैं ।

( घ ) शातातप - स्मृति में भी लिखा है- ' सर्वकार्येष्वसिद्धार्थो... गणेशप्रतिमां न्यसेत्, ( २।५२ ) यहाँपर कार्यों के विघ्नमें गणेशमूर्ति- की प्रतिष्ठा अथवा उसका जप तथा पूजन भी कहा है- ' अथवा गणनाथस्य मन्त्रं लक्षमितं जपेत् ' ( २२५३ ) । ' तत्र संस्थापयेद् दे॒वं विघ्नराजं सुपूजितम् ( ३।२२ ) । इन याज्ञवल्क्य, कात्यायन, शातातप आदिको अनार्य वेदानभिज्ञ नहीं कहा जा सकता; जिन्होंने गणेशपूजा बड़े स्पष्ट रूपसे कही है ।

( छ ) अब बृहत्पराशर स्मृति भी देख लीजिये । इसमें ( ६।६-७-८ ) - पद्योंमें विविध विघ्न दिखलाये हैं, फिर उनकी 12शान्त्यर्थं गणेशपूजा एवं ग्रहपूजा बताई है । ' तस्मात् तदुपशान्त्यर्थं समभ्यर्च्य गणेश्वरम् ' । ( ६ ) ग्रहेभ्यो वा गणेशस्तु तस्य शान्तिरिहोच्यते ' ( ६।१ ) ' एतेन संपूज्य गणाधिदेवं विघ्नोपशान्त्यै ' ( ३१ ) । पराशरजीने २/४३४ में त्र्यम्बक ( महादेव ) की, फिर ‘ गणानां त्वा ' मन्त्रसे त्र्यम्बकके पुत्र गणेशको पूजा कही है - ' विनायकाय होतव्या तथा घृतस्य चाहुतिः 1 । सर्वविघ्नोपशान्त्यर्थं पूजयेद् यस्तु तत्- ( त्र्यम्बक ) सुतम् ( गणेशम् ) । गणानांस्येति मन्त्रेण स्वाहाकारान्त- पादतः । चतस्रो जुहुयात् तस्मै गणेशाय तथाहुतीः ' ( २।४३४-४३५ ) क्या पराशर जी इतने वेदानभिज्ञ थे कि घोड़ेवाला मन्त्र उन्होंने गणेशजीके मत्थे मढ़ा! याज्ञवल्क्य स्मृतिकी मिताक्षरा में ( २८६ ) ‘ तत्पुरुषाय विद्महे ' यह मङ्गलाचरणोद्धृत मन्त्र लिखा है । क्या यह सब वेदानभिज्ञ थे?

( ज ) भविष्यपुराण में भी गणेशका मन्त्र ' गणानां त्वा ' कहा है— ' गणेशं तु चतुर्बाहुं व्यालयज्ञोपवीतिनम् । ' गजेन्द्रवदनं दे॒व॑ ' श्वेतवस्त्र ' चतुर्भुजम् । परशु ं लगुडं वामे, दक्षिणे दण्डमुत्पलम् ' ' मूषकस्यं महाकायं शङ्खकुन्देन्दुसप्रभम् । ' गणानां त्वेति मन्त्रेण विन्यसेदुत्तरे ध्र ुवम्, ( मध्यमपर्व, २ य भाग २०।१४१ - १४२ )

( झ ) अब ' बोधायनगृह्यशेषसूत्र ' में विनायककल्प देखिये – ' मासि मासि चतुर्थ्यां शुक्लपक्षस्य पञ्चम्यां वा, अभ्युदयादौ सिद्धि- काम ऋद्धिकामः पशुकामो वा भगवतो विनायकस्य बलिं हरेत् ' ( ३।१०।१ ) ' पूर्वेद्यः कृतैकमुक्तः, शुचिरप आचम्य... दक्षिणामुखं हस्तिमुखं --- उपवेश्य दैवतमावाहयति - ' विघ्न! विघ्नेश्वरागच्छ 13विघ्नेत्येव नमस्कृत! अविघ्नाय भवान् सम्यक् सदास्माकं भव प्रभो । ( २ ) इस प्रकार विनायकका पूजन जब सूत्र सम्मत भी है; तब इसे अवैदिक वा अनार्यदेव कैसे कहा जा सकता है? सूत्र ' कल्प ' होने से ' वेदाङ्ग ' है ।

( ६ ) इसीलिए यजुर्वेद में ' नमो गणेभ्यो गणपतिभ्यश्च वो नमो नमो व्रातेभ्यो व्रातपतिभ्यश्च वो नमः ' ( वा ० सं ० १६।२५ ) इस मन्त्र में गणपतिको नमस्कार भी किया गया है । यहां गणपति को बहुवचन सम्मानार्थ दिया गया है । जैसे कि — ' यूयं हि सोम! पितरो मम स्थन, दिवो मूर्धानः ' ( ऋ ० ६६६८ ) यहां एक सोमको बहुवचन पूजार्थ है । ' गणपति - उपनिषद् ' में ' नमो व्रातपतये नमो गणपतये नमः प्रमथपतये ' में एक वचन भी आया है । जैसे वहाँ बहुवचन गणपतिको आया है, वैसे ' विनायकानां ' • ( वाराह पु ० ३३।२५ ) तथा मानवगृह्यादि में ' विनायकों ' को बहुवचन भी आया है । मत्स्यपुराण में ' गणेश्वरगण ' ( १५४ । ५४५ ) शब्द आया है । अतः गणपति अनेक भी हो सकते हैं, पर उनका एक अधिपति होकर महागणपति भी हो सकता है; बहुतों में एक होता ही है ।

यद्यपि यजुर्वेद के उक्त सूक्तमें रुद्र देवता हैं; तथापि ' आत्मा वै पुत्रनामासि ' ( पारस्करगृ १११८ ( २ ) के अनुसार पिता - पुत्रका अभेद प्रसिद्ध होनेसे रुद्रका गणपति रूपसे वर्णन आया है । गणपति महादेवके पुत्र माने गये है । यही बात एक गाणपत्यने स्वा ० शङ्कराचार्यको कही थी— ' अंशाशिनोरभेदस्तु वेदे सम्यक् प्रकीर्तितः 1. गणेभ्यो गणपेभ्यश्च नम इत्यादिना यते! ' ( ३८४ ) रुद्रस्तु 14गणपात्मैव नत्वन्यो मुनिपुङ्गव! ( शंकरदिग्विजय १५ सर्ग ) । इस लिए ही महाभारत ( वनपर्व ) में ' महादेवप्रसादाच्च गाणपत्यं च विन्दति ' ( ८२।५० ) यहां महादेवकी कृपासे गणपतिभावकी प्राप्ति भी कही गई है । यहां भी पूर्वोक्त ही कारण है । गणपति के रुद्ररूप होनेसे ही ' गणपति - उपनिषद् में गणेशजीको ' वं रुद्रः, लम्बोदराय शिवसुताय नमो नमः ' यहां रुद्र एवं शिवका सुत कहा गया है । स्वा ० शङ्कराचार्यने भी गाणपत्यको कहा था -- - ' ' अस्त्वेवं परमात्मैव जगत्कर्ता त्वयेरितः । गणाधिपतिशब्देन सर्वनामा महेश्वरः ( ३६६ ) अंशाशिनोरभेदेन रुद्र - पुत्रोपि च स्वयम् । सम्भवत्येव सर्वात्मा सर्वविघ्ननिवारकः ' ( ३६७ ) ( शङ्करदिग्विजय १५ सर्ग ) ।

केवल यहीं नहीं, बल्कि रुद्रको ' गणपति ' कहना ' रुद्रस्य गाणपत्यं मयोभूरेहि ' ( यजु ० वा ० सं ० ११ १५ ) इस अन्य मन्त्र में भी प्रसिद्ध है । इस मन्त्रका देवता आर्यसमाजी प्रेस ' वैदिक यन्त्रालय अजमेर में प्रकाशित यजुर्वेद सं ० में ' गणपति ' लिखा गया है । जब इस प्रकार गणपति वैदिक देवता रुद्रके अन्य रूप, अथवा अंशावतार वा पुत्र सिद्ध हुए; तब गणपतिको ' अवैदिक देव ' कहना एक अक्षम्य अपराध है ।

( ७ ) इसीलिए यजुर्वेदसंहिता में अन्यत्र ' गणानां त्वा गणपति १ ९ हवामहे, प्रियाणां त्वा प्रियपतिहवामहे, निधीनां त्वा निधिपति १ हवामहे, वसो मम ' ( २३/१६ ) यहांपर अश्वमेध अश्वकी स्तुति के लिए भी उसे गणपतिदेव रूपसे आहूत किया गया है । इसलिए ' गणेशपुराण ' के उपासनाखण्ड में भी गणेशसहस्रनामों में ' ज्येष्ठ- 15राजो निधिपतिर्निधिः प्रियपतिः प्रियः ' ( ४६ । १५ ) यही गजानन गणेश के नाम आये हैं । तब दोनोंकी अभिन्नता सिद्ध होगई ।

इसलिए वैदिक प्रेस अजमेर में मुद्रित यजुर्वेदसं में भी इस मन्त्रका देवता ' गणपति ' लिखा गया है । आनन्दगिरिके ' शंकर- दिग्विजय में भी एक गाणपत्यने आचार्य शंकर के आगे गणपतिका यही मन्त्र रखा, उन्होंने इसका खण्डन न कर अनुमोदन ही किया । पहले हम यजुर्वेदके ही मन्त्र द्वारा रुद्रका गणपति यह रूप - विशेष लिख चुके हैं, सो यह ' आत्मा त्वं पुत्रनामासि ' ( मं ० त्रा ० १५ १७ ) के अनुसार ठीक है; तो गणपति अवैदिक देवता कैसे हो सकते हैं? देवता यद्यपि बहुत होते हैं; तथापि वेदने उन देवताओंका किन्हीं अन्य देवताओंमें अन्तर्भाव करके संक्षिप्त वर्णन कर डाला है । तभी निरुक्तकार श्रीयास्क इन्द्र, अग्नि, सूर्य इन तीन देवताओं में शेष देवताओंका अन्तर्भाव मानकर कहते हैं कि- ' एकस्य श्रात्मनोऽन्ये देवाः प्रत्यङ्गानि भवन्ति ' ( ७ | ४ | १ )

इसीलिए ही इस गणपतिको वेद में कहीं नैघण्टुक रीति ( अन्य देवताके मन्त्र में अन्य देवताका वर्णन करना ) से अश्वमेध अश्वमें वर्णित किया गया है; तो कहीं रुद्रमें, कहीं इन्द्र में, तो कहीं बृहस्पति वा ब्रह्मणस्पति में । अब हम वेद द्वारा ही गणपतिका ब्रह्मणस्पति तथा इन्द्रके रूपमें वर्णन दिखलाते हैं ।

( ८ ) ‘ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे, कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् । ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पते! आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम् ' ( ऋसं ० २।२३।१ ) । यही नाम ' गणेशपुराण ' के सहस्रनामों में 16गजानन गणेश के भी आये हैं- देखिये - ' कविं कवीनामृषभो ब्रह्मण्यो ब्रह्मणस्पतिः । ज्येष्ठराजो निधिपतिः ' ( ४६।१४ ) तब दोनों का ऐक्य भी सिद्ध होगया ।

( क ) कहा जाता है कि उक्त मन्त्र ब्रह्मणस्पतिका है । ब्रह्मण- स्पतिसे ' ब्रह्मणां पतिः ' बृहस्पतिका बोध होता है, गणेशका नहीं । इसपर यह जानना चाहिये कि — देवताओंके बहुत से नाम तथा रूप हुआ करते हैं — यह प्रसिद्ध है । गणपति ' स्वस्तिक ' रूपमें भी हुआ करते हैं - यह प्रसिद्ध बात है । उसी स्वस्तिक में चारों ओर गणपतिका बीजमन्त्र ' गं ' विराजमान है - यह ध्यान से देख लीजिये 45 | यही ' गम् ' बीजमन्त्र उक्त ब्रह्मणस्पतिके मन्त्रके आदि तथा अन्तके अक्षरसे निष्पन्न है - यह आगे ' त्रिपुरातापिनी उपनिषद् ' के प्रमाणसे कहा जायगा ।

( ख ) आकाश में भी ' खस्वस्तिक ' प्रसिद्ध है । ' स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ' ( सामवेद के अन्त में ) यहां पर इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य, बृहस्पति ये चार देवता आकाशमें तारों के रूप में इस प्रकार विराजमान हैं कि — उन चारोंके ऊपरसे नीचेको, तथा दाहिने पार्श्वसे बाएँको रेखा कर दी जावे; तो स्वस्तिक बन जाता है । उक्त मन्त्रमें चार बार ' स्वस्ति ' शब्द आनेसे ' स्वस्तिक ' बना है । श्रीपाणिनिने भी ( ६।३।११५ सूत्र में ) ' स्वस्तिक ' को स्मरण किया है ।

तब वेदमें जहां इन्द्रका कोई मन्त्र हो; वा पूषा, वा तार्क्ष्य ( गरुड़ ) वा बृहस्पतिका मन्त्र हो; उससे स्वस्तिक ( गणेश ) का बोध 17होगा । उक्त मन्त्र में पहले गणपतिका इन्द्र - रूपसे स्तवन है, सबसे पीछे बृहस्पतिरूपसे । इसका भाव यह हुआ कि - वेदमें इन्द्र भी गणपतिरूपसे स्तुत होता है, तथा बृहस्पति भी । तब इससे वेदमें ' गणपति ' की असिद्धि न हुई, किन्तु सिद्धि ही हुई; क्योंकि निरुक्तकार कहते हैं— ' एकस्य आत्मनोऽन्ये देवाः प्रत्यङ्गानि भवन्ति ' ( ७ | ४ | १ ) | श्रीसायणाचार्यने भी अपने ब्रह्मणस्पतिमन्त्र के भाष्य में ' देवादिगणानां सम्बन्धी गणपतिः ' यह अर्थ भी किया है । तब इसका देवपतित्व वा गणपतित्व भी सिद्ध हुआ । पहले हम गणेशपुराणसे गणेशका नाम ' ब्रह्मणस्पति ' भी दिखला ही चुके हैं । ' गणेशगीता ' में भी गणपतिको ब्रह्मणस्पति कहा है । इसलिए गणपतिको देव - देव, महादेवका आत्मा ( पुत्र ) माना गया है । इसलिए ' वाल्मीकि रामायण ' के एक स्थलमें महादेवको भी ' गणेश ' कहा गया है; वेदसे तो हम पूर्व दिखला ही चुके हैं ।

( ग ) इसके अतिरिक्त ' गणेश ' बुद्धि के अधिष्ठाता भी प्रसिद्ध हैं । इसीलिए ब्रह्मणस्पतिवाले मन्त्र में गणपतिको ' कवि ' भी कहा गया है 1

। ' कवि'का अर्थ क्रान्तदर्शी एवं बुद्धिमान् है । महाभारतके लिखनेके अवसरमें गणपतिका कवित्व प्रसिद्ध है ही । अथवा ' ब्रह्मणस्पति ' में ' ब्रह्म ' वेदका नाम है । वेदमाता ' स्तुता मया वरदा वेदमाता ' ( १६।७१।१ ) इस अथर्ववेद ( शौ ० सं ० ) के मन्त्रमें गायत्री प्रसिद्ध है । वह गायत्री ' धियो यो नः प्रचोदयात ' ( यजु ० ३।३५ ) इस प्रकार बुद्धिरूपा है । गायत्री चारों वेदोंकी सारस्वरूपा है- - इस पर आगे ' गायत्री मन्त्रकी महत्ता ' निबन्ध देखिये । अथवा 18मनुस्मृति ( २७७ ) देखिये । तब बुद्धिका अधिष्टाता गणपति भी वेदका स्वामी होनेसे यौगिक ब्रह्मणस्पति है । इसलिए इसे बृहस्पति भी कहा जाता है— ' बृहतीनां - वेदवाचां पतिः बृहस्पतिः ’ । तब बृहस्पति - रूपसे वर्णन भी गणेशका ठीक ही हुआ ।

( घ ) इसलिए गणेशपुराण में भी गणेशको ' ब्रह्म ब्रह्मार्चितपदो ब्रह्मचारी बृहस्पतिः ( ४६।१०२ ) बृहस्पति शब्दसे भी कहा है । ' कविः कवीनामृषभो ब्रह्मण्यो ब्रह्मणस्पतिः । ज्येष्ठराजो निधिपतिर्निधिः प्रियपतिः प्रियः ( ४६।१५ ) यहां ब्रह्मणस्पति तथा ज्येष्ठराज भी कहा है । तब यह ' ब्रह्मणस्पति ' वाला ' गणानां त्वा ' मन्त्र गणेशजीका ही सिद्ध हुआ । इस वेदमन्त्रका इतिहास गणेशपुराण में इस प्रकार आया है— ( ङ ) ‘ कंदाचित् स मुहूर्ते तु पिता वाचक्कविः सुतम् ( गृत्समदनामानम् ) । गणानां त्वेति ऋङ्मन्त्रम् महान्तमुपदिष्टवान् । उवाच च महामन्त्रो वैदिकोऽखिलसिद्धिदः । आगमोक्तेषु सर्वेषु मन्त्रेषु श्रेष्ठ एव च । ध्यात्वा गजाननं देवं जपैनं स्थिरमानसः । परां सिद्धिं समाप्यैव लोके ख्यातिं गमिष्यसाततो गृत्समदो विप्रो मन्त्रं प्राप्य पितुर्मुखात् । अनुष्ठानरतो भूत्वा जपध्यानपरोऽभवत् । ( १६।१८-२२ )

( च ) यहां पर ' गणानां त्वा ' यह ऋग्वेदका मन्त्र गृत्समदको मिला - यह कहा गया है, इसी ' गणानां त्वा ' मन्त्रका ऋषि भी वैदिक - यन्त्रालय ( स्वा ० द ० के प्रेस ) अजमेर - मुद्रित ऋग्वेद संहितामें ' गृत्समद ' दिया गया है । यही ऋकुमन्त्र ' तैत्तिरीय यजुर्वेदसं ० ( २।३।१४।३ ) में तथा ' यजुर्वेद काठक -संहिता ', ( १०1४० ) में भी आया 19है | इस प्रकार इस विषयमें जहां वेद और पुराणकी एकवाक्यता सिद्ध हुई, वहां ' गणानां त्वा ' यह ऋक्मन्त्र गजानंन - गणेशके लिए भी सिद्ध होगया ।

( ६ ) यह गणपतिका बृहस्पति रूपसे वर्णन हमने वेदसे दिखला दिया; अब वेदमें गणपतिका इन्द्ररूपमें वर्णन देखिये- ' निपुसीद गणपते । गणेषु त्वामाहुर्विप्रतमं कवीनाम् । न ऋते त्वत् क्रियते किञ्चनारे महामर्क मघवचित्रमर्च ' ( ऋ ० १०।११२।६ ) यह वही मन्त्र है, जिसे हमने मङ्गलाचरण में दिया है । इस वेदके मूल से तथा गृह्यसूत्र, स्मृति, एवं पुराण आदिकी साक्षीसे गणपति- पूजा अनादि पूजा है । इसलिए गणपति - उपनिषद् में कहा है— ' सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते ' । हां, इसके अवतार भिन्न - भिन्न कालमें होते रहते हैं । '

त्वामाहुर्विप्रतमं कवीनाम् ' इस ऋचाके अंश ' विप्र'का निघण्टु ( ३।१५ ) के अनुसार ' मेधावी ' और ' विद्यया याति विप्रत्वं, ( अत्रिस्मृति १३६ ) के अनुसार ' ब्राह्मणयोनिग विद्वान् ' यह यौगिक वा योगरूढ अर्थ है । देवताओं में भी वर्ण- विभाग है, इसलिए ' ब्राह्मण वर्णके विद्वान् ' यह अर्थ भी सङ्गत है । गणपतिकी विद्वत्ता ' महाभारत ' के लेखकत्व में स्फुट है । उसे आदिपर्व ( ११७५-८३ ) में देखा जा सकता है । उसमें गणेशके हेरम्ब, गणेशान, गणनायक, विघ्नेश, और गणेश यह नाम आये हैं । ' गजानन ' शब्द यदि नहीं भी आया, तो इससे महाभारत तथा पुराणोंके प्रवक्ता श्रीव्यास वा सूतको वह अनभीष्ट नहीं; क्योंकि वे अन्यत्र उसे गजानन शतशः लिख चुके हैं । गणेशजीने 20महाभारतका लेखक होना स्वीकार किया कि - ' मेरी लेखनी न रुके ' । व्यासजी ने कहा कि - ' आप भी श्लोकका अर्थ विना जाने

लेखनी न चलाइये । ' परस्पर स्वीकृति होगई । व्यासजीने महाभारत में ८८०० कूटश्लोक ( बहुत कठिन पद्य ) रखे । गणेशजी क्षणभर में ही ( लिखते - लिखते ही उनका अर्थ जान लेते थे, छातः उनकी लेखनी रुकती नहीं थी । अव देखिये - हो न गई सिद्ध वेदप्रोक्त गणपतिकी विद्वत्ता? अस्तु ।

( ख ) इन्द्र उक्त मन्त्र में गणपतिदेवरूप में स्तुत किये गये हैं- ' गणपते! मघवन्! इसलिए ' गणपत्युपनिषद् ' में गणेशको ‘ त्वमिन्द्रः ’ ( १ ) भी कहा है । ' स्वस्ति न इन्द्रो ' इस स्वस्तिक के मन्त्रमें इन्द्र ही पूर्व हैं, यह हम पहले लिख चुके हैं । इसका ' एकस्यात्मनोऽन्ये देवाः प्रत्यङ्गानि भवन्ति ' ( ७ | ४ | १ ) ' इतरेतरजन्मानो भवन्ति इतरेतरप्रकृतयः ' ( ७ | ४ | १२ ) ' माहाभाग्याद् देवताया एक आत्मा वहुधा स्तूयते ' ( ७ | ४ | ८ ) यह निरुक्त - प्रोक्त कारण भी पहले संकेतित किया जा चुका है । इसे नैघण्टुक भी कह सकते हैं कि एक मुख्य देवतामें अन्य देवताका वर्णन आजावे । सो इन्द्रदेवता में गणपतिदेवका वर्णन आजानेसे नैघण्टुकता भी हो सकती है ।

( ग ) इधर अन्य एक कारण यह भी है कि - ' शतपथब्राह्मण ' में कहा गया है- ' इन्द्रः सर्वा देवता: ' ( ३ | ४ | २२२ ) ' इन्द्रो वै सर्वे देवाः ' ( १३।२ । ७ । ४ ) ‘ इन्द्राग्नी वै सर्वे देवाः ' ( ६।३।३।२१ ) इससे स्पष्ट है कि इन्द्र हो चाहे अग्नि; उसकी सब देवताओं के रूप से स्तुति हो सकती है । इसीलिए ' त्वमग्ने! इन्द्रो, त्वं विष्णु... त्वं ब्रह्मा ' 21' त्वमग्ने! रुद्रो... त्वं पूषा ' ( ऋ. २ | १ | ६ ) इत्यादि मन्त्रोंमें अग्निको वहुत देवताओंके रूपोंवाला कहा है; वैसे यहाँ इन्द्रको गणपतिदेव कि — यह उस इन्द्र का अपना ही नाम हो, गजानन — गणेशवाला यह ' गणपति ' शब्द न हो । सो जब तक इन्द्रका कहीं गजाननत्व, इस पर जानना चाहिये कि – जब ' गणेशपुराण तथा गणपति- उपनिषद्में वर्णित गणेशको ' गजानन ' माना जाता है, और उसका जो वहां बृहस्पतित्व, अथवा इन्द्रत्व वा रुद्रत्व कहा है; वह वेदमें मिलता है, और स्वस्तिकको भी गणेश ही माना जाता है, वेदानुसार उसमें इन्द्र तथा बृहस्पति आदिका अंश भी आ जाता है — यह हम पूर्व बता चुके हैं; तब इन्द्र वा बृहस्पति के मन्त्र में जब गणपतिका नाम आजाय; तो समझना पड़ेगा कि यह वही गजानन - गणेश का बोधक ' गणपति ' शब्द है । तो वेदमें ' गजानन ' आदि चिह्न न मिलनेपर भी स्वयं विचार लेना पड़ता है कि - यह वही गणपति हैं, जिन्हें गणपति - उपनिषद् तथा गणेशपुराण आदिने कहा ।

( ङ ) फिर भी यदि प्रतिपक्षियोंका इससे सन्तोष न हो तो फिर हम इन्द्रदेवताका ऐसा मन्त्र दिखलाते हैं; जिसमें उसे ' हस्ती ' कहा 22गया है । वह मन्त्र यह है- ' आ तू न इन्द्र! ' महाहस्ती दक्षिणेन ' ( ऋ ०८८११ ) इस इन्द्रके मन्त्र में उसे महाहस्ती – महाहस्तधारी कहा है । महाहस्तकी विशेषता ' हस्ती ' में होती है । यही गणेशजीका स्वरूप है । ' सामविधान ' ब्राह्मणसें ' आ तू न ' ( सामवेद पू ० २।३।३ ) इति ' सुहस्त्या ' ( साम ० पू ० ६।३।७ ) इति प्रथमषष्ठे च एषा वैनायकी नाम संहिता, एतां प्रयुञ्जन् विनायकं प्रीणाति ' यह कहकर एतदादिक मन्त्रोंको गणेशार्थक माना गया है । बौद्धग्रन्थोंमेंभी विनायकी - शक्ति का स्वरूप ' हस्ताकार - समायुक्ता ' मिलता है । अतः वेदको गणपतिभी ' गजानन ' इष्ट हैं, क्योंकि किसी भी जीवका स्वरूप उसके आनन

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( मुख ) से जाना जाता है, अतः ' हस्ती ' से भी ' हस्तिमुख ' का बोध हुआ । इसलिए कृष्णयजुर्वेद - मैत्रायणी संहिता में तो गणेशजीके लिए ' तत्कराटाय ' ·· हस्तिमुखाय धीमहि ' ( २६१२६ ) कहा है । करं हस्तं, शुण्डादण्डमिति यावत्, आटयति - भ्रमयतीति कराटः । इससे गजानन - गणपतिदेवका पूजन वैदिक सिद्ध हुआ ।

( १० ) ' गणपति ' कोई देवविशेष वेदमें है ही नहीं ' यह कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि - यजुर्वेदसं ० ( २३ | १ ९ ) मन्त्रका वैदिकप्रेस अजमेरकी छपी हुई यजुर्वेदसं ० में ' गणपति देवता ' लिखा है, इस प्रकार ११।१५ मन्त्रकाभी ' गणपति ' देवता लिखा है । तब गणपति देवताकी वेदमें सिद्धि होजाने से हमारे पक्षकी सिद्धि होगई ।

( ११ ) ' गणेशाथर्वशीर्ष ' उपनिषदों में है । उसमें भी ' गणेश ' जीका वर्णन है । देखिये- ' ॐ नमस्ते गणपतये, त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि । गकारः पूर्वरूपम्, अकारो मध्यमरूपम्, अनुस्वारश्च 23अन्त्यरूपम्, बिन्दुरुत्तररूपम् । ( यह गणेशके वीजमन्त्र ' गं ' के लिए कहा गया है । )... एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ' । एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमङ्कुशधारिणम् । अभयं वरदं हस्तैर्विभ्राणं मूषकध्वजम् । रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम् । रक्तगन्धानुलिप्ताङ्ग रक्तपुष्पैः सुपूजितम् ।... नमो गणपतये, नमः प्रमथपतये, नमस्तेस्तु लम्बोदराय, एकदन्ताय, विघ्न- नाशिने, शिवसुताय, श्रीवरदमूर्तये नमः ' इसमें गणपति - विषयक सव सिद्धान्त स्पष्ट आगये हैं । यह उपनिषद् है । उपनिषद् ब्राह्मण- भागके अन्तर्गत हुआ करती है । ब्राह्मणभाग भी वेद होता है- यह हम अग्रिम पुष्पमें बतानेवाले हैं । यह गणेशको अनार्यदेव प्रसिद्ध करनेवाले डाक्टर श्रीसम्पूर्णानन्द जी भी मानते हैं । यह उनके शब्द हैं- ' कुछ लोग केवल संहिता - भागको वेद मानते हैं; परन्तु हम ' मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ' की पुरानी पद्धतिको स्वीकार करते हैं, जिसके अनुसार ब्राह्मण अर्थात् आरण्यक और उपनिषद् भी वेदके अन्तर्गत हैं ' ( गणेश पृ ० १ )

जब ऐसी बात है; तब गणपतिदेव स्वयं वैदिक देवता सिद्ध हो गये; क्योंकि मन्त्रभागकी संहिता ११३१ हैं, उतने ही ब्राह्मण- भागके ग्रन्थ हैं । प्रायः उतने ही आरण्यक तथा उतनी ही उपनिषदें

हैं । इसलिए ' मुक्तिकोपनिषद् ' में लिखा है — ' एकैकस्या हि होती

शाखाया एकैकोपनिषन्मता ' । ( १ । १४ ) । उपनिषदें १०८ वा २५० नहीं होती; किन्तु ६०८ तो उपलब्ध हैं । सारी उपनिषदे तो ११३१ होती हैं,, ११३१ मन्त्रोपनिषत्, ११३१ ब्राह्मणोपनिषत् । आरण्यक

24श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )

भी इतने ही होते हैं । वादिप्रतिवादिमान्य श्रीयास्कने भी ' यस्मात्परं नापरमस्ति ' ( निरु ० २ | ३ | १ ) यहां ' श्वेताश्वतरोपनिषत् ' ( ३६ ) की इस कण्डिकाको निगम कहा है । श्रीयास्क ' निगम ' शब्द वेद- प्रमाणके लिए देते हैं-- यह बात विज्ञ - समाज में प्रसिद्ध है । तब उपनिषत्प्रोक्त गणपति - पूजा भी वैदिक सिद्ध होगई । मन्त्रभागके संकेत तो पहले हम दे ही चुके हैं ।

( ख ) भाषाभेदके आधार से उक्त उपनिषद्को अर्वाचीन बताना ठीक न होगा, यह पाश्चात्य दृष्टिकोण है । इस दृष्टि से तो ऋग्वेद के १ म तथा १० म मण्डल भाषाभेदवश अन्य मण्डलोंकी अपेक्षा अर्वाचीन सिद्ध हो जाते हैं । अथर्ववेद तो उससे भी अर्वाचीन हो जावेगा । श्रीसम्पूर्णानन्दजी उसमें भी कहीं कहीं आधुनिकताका सन्देह करते हैं; पर निश्चय नहीं करते; तव उक्त उपनिषद्की आधुनिकताका भी निश्चय नहीं कर लेना चाहिये । मेरे सं ० १ ९८१-८२ आदिकी तथा आजकलकी मेरी संस्कृत भाषा के शैलीभेदसे भी दो दीनानाथ - ' शर्मा सिद्ध किये जा सकते हैं; पर जैसे यह असंगत होगा; वैसे वह दृष्टि भी विषम है । एक ही लेखकका भी एक काल में भी भाषा- भेद हो जाना अस्वाभाविक नहीं ।

( ग ) ' अथर्वशिराः ' को महाभारत ( शान्तिपर्व ३३८ | ३ ) तथा . ' शंखस्मृति ' ( ११।४ ) आदिमें स्मरण किया गया है । श्रीशंकराचार्य के भाष्य होनेसे ही यदि १० उपनिषदोंको प्रमाण माना जावे; तो उनसे अव्याख्यात मन्त्रसंहिता तथा ब्राह्मण एवं अन्य उपनिषद् अमुख्य वा अप्रमाण हो जाएंगे । फिर उन्होंने अपनेसे ' अव्याख्यात 25जावाल, कैवल्य, मुक्तिका, श्वेताश्वतर ' आदि उपनिषदोंके प्रसारण अपने ब्रह्मसूत्रके भाष्य में क्यों दिये? यदि आचार्य शंकर गणेशको न मानते तो शास्त्रार्थ में गाणपत्यों से कह देते किं - गणेश हैं ही नहीं, वा वेद नहीं; पर उन्होंने तो उसे माना है और कहा है - ' प्रतिपादितं ब्रह्मैव गणपतिरिति... रुद्रपुत्रो गणपतिरिति चाप्य- विरोधः; अंशाशिनोरभेदात् । अतो देवकार्यार्थं जगन्निर्मारणादिषु

विघ्नकर्ता, ( आनंद गिरिंकृत शंकर दिग्विजय में देखिये ) । प्रतिपक्षियों से मान्य उन्हीं श्रीशंकराचार्य स्वामीने भी जब अपने सुब्रह्मण्यभुजङ्ग- स्तोत्र के आरम्भ में ' सदा बालरूपापि विघ्नादिहन्त्री महादन्ति - वक्त्रापि पंचास्यमान्या । विधीन्द्रादिमृग्या गणेशाभिधा मे विधत्तां श्रियं कापि कारुण्यमूर्तिः ' इस प्रकार गणेशजीसे प्रार्थना की है, इस प्रकार उनके ‘ गणेशपंचरत्न ' ' गणेशाष्टक और वरदगणेशस्तोत्र प्रसिद्ध हैं । तव आचार्यशङ्करकी दृष्टिमें ' गणपत्युपनिषद् ' उनसे अव्याख्यात होनेपर भी अप्रमाण नहीं हो सकती । १ ९ ३१ संहिताओं तथा इतने ही ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषदोंको बिना देखे ही गणपति- देवको अवैदिक कह देना साहसमात्र है । वेदमन्त्रोंमें तथा अनुक्रमणि- काओं में जो देवता कहे हैं; वे सब वैदिक देवता हैं । निरुक्तमें कहा गया है — ' यत्काम ऋषिर्यस्यां देवतायामार्थपत्यमिच्छन् स्तुतिं प्रयुङ्क्त

, तद्दैवतः स मन्त्रो भवति ' ( ७११।४ ) इसी कारण ‘ निरुक्त ' में तीन देवता बताकर शेष देवता इन्हीं तीनमें अन्तभूत कर दिये हैं । यदि ऐसा है, तो देखना चाहिये कि किसी मन्त्रका देवता ' गणपति ' लिखा गया है या नहीं?

26( १२ ) ‘ रुद्रस्य गाणपत्यं ' ( यजु ० वा ० सं ० ११।१५ ) इस मन्त्रका देवता ' गणपति ' है । ' गणानां त्वा गणपतिहवामहे ' ( यजुः २३।११ ) यहां भी ' गणपति ' देवता है; यह अजमेरके वैदिक यन्त्रालयकी यजुर्वेद - संहितामें देखा जा सकता है । '

अश्वपत्यादिभ्यश्च ' ( ४ | ११८४ ) इस प्रकार वेदाङ्ग पारिणनिव्याकरण से सिद्ध ' गाणपतो ( गणपतिर्देवता अस्य मन्त्रस्य इति ) मन्त्रः ' यह उदाहरण भी गणपतिको किसी वेदके मन्त्रका देवता बताकर उन्हें वैदिक देवता बता रहा है । शेष प्रश्न यह है कि वे तो मेधके लिए उपस्थित अवको ' गणपति ' कहा है; इसपर जानना चाहिए कि उस समय अश्व आलब्ध ( मृत ) है; तब मृतकको गणपति, प्रियपति निधिपति एवं वसुरूप कैसे कहा जा सकता है? क्या मरे घोड़ेकी पुरुष प्रार्थना कर सकता है और वह उन कामनाओं को पूर्ण कर सकता है? उस अश्वको वहां यज्ञियदेव गणपति के रूपमें आहूत किया जाता है, और पूजा जाता है उसीसे ही प्रार्थना की जाती है I

। इसे हम अन्यत्र स्पष्ट करेंगे । अन्य देवताके मन्त्रमें अन्य देवताके वर्णनको श्रीयास्क ( निरुक्त १/२०१३ ) ' नैघण्टुक ' कहते हैं; सो इसी रीति से इस मन्त्र में अश्वमें गणपतिको आहूत किया जाता है । तभी श्रीकात्यायन मुनिने अश्वमेधमें विनियुक्त इस मन्त्रका अपने ' यजुर्विधान ' में ‘ गणानांत्वा ’ •. • वक्रतुण्डस्य एतानि ' ( ४ ) यह कहकर इसे गणपति देवत्य माना है । तब गणपति वैदिक - देव सिद्ध होगये ।

( ख ) इसी कारण ऋ ० सं ० में ' गणपतिं हवामहे ' ( २।२३।१ ) गणपतिको ब्रह्मणस्पति रूपमें स्तुत किया गया है; अवको नहीं । 27' नमो गणेभ्यो गणपतिभ्यश्च ' ( यजु ० १६ २५ ) यहाँ गणपतिदेवका रुद्ररूपमें वर्णन है, अश्वका नहीं । बहुवचन यहांपर पूजार्थक है ।

( ग ) वेदमें केवल ' गणपति का वर्णन ही नहीं; बल्कि उसके लिए हवि देना भी कहा है- जैसे कि ' वसुभ्यः स्वाहा, रुद्रेभ्यः स्वाहा, आदित्येभ्यः स्वाहा, ( यजु ० वा ० सं ० २२/२८ ) यहां पर रुद्र यदि देवताओंको हवि दी गई है । फिर ' गणश्रिये स्वाहा, गणपतये स्वाहा, ( यजुः २२/३० ) यहां गणपति आदि देवताओंको हवि दी गई है । वैदिक यन्त्रालय अजमेरकी यजुर्वेद - संहितामें इस मन्त्रके देवता ' वस्वादयः ' लिखे हैं । इसका भाव वह हुआ कि — इस मन्त्रके देवता वसु, विवस्वान्, गणश्री और गणपति आदि पृथक् - पृथक् हैं । श्री पं ० ज्वालाप्रसादजीकी व्याख्यात यजुर्वेदसं ० में तो ' गणपत्यादयो देवता: ' यह स्पष्ट लिखा है । उवट -महीधर आदिकी यजुः सं ० में अस्वादयः असु आदि पृथक् - पृथक् देवता माने गये हैं; इन्हीं में स्थित ' गणपति ' भी एक भिन्न देवता सिद्ध होगये | ' सर्वानुक्रमसूत्र ' में यहाँ ' लिङ्गोक्ता देवताः ' बतलाया है, सो गणपति देवता पृथक् सिद्ध होगये । यहाँपर पृथक गिने ग । इस प्रकार यजुर्वेदकाण्वासंहितामें भी ' गणपतये गणपति, इन्द्र ( २२ | ६ ), बृहस्पति ( २२।६ ) और रुद्र ( २२/२८ ) से स्वाहा ' ( २४ । ४२ ) गणपति देवताको हविः आई है । इसी प्रकार यजुर्वेद - मैत्रायणीसंहिता ( ३।१२।१३ ) में भी ' गणपतये स्वाहा ' आया है । तब “ वैदिक यज्ञोंमें गणपति के नाम से आहुति देनेकी प्रथा नहीं है ". ऐसा व्याज कट गया । श्रक्षेप्ता श्रीसम्पूर्णानन्दजीने भी 28' विघ्नाय विघ्ननाशाय संख्यातीताय मायिने । रुद्राय भद्ररूपाय गरणा- धिपतये नमः ' लिखकर इसी गणपतिके आगे सिर झुका दिया; उसीके लिए ' गणानां त्वा ' ( ऋ ० ) मन्त्र भी लिख दिया; तब तो हमारा पक्ष उनसे भी सिद्ध होगया ।

( १३ ) गणपति अनादि देव हैं । देवोंके जब - तब अवतार भी होते हैं । तब रुद्रके विवाह में पूजित होकर भी गणपति रुद्रके पुत्र भी बन सकते हैं । इसीलिए यजुः ( ११।१५ ) में रुद्रका गणपतित्व भी दिखलाया है । इसमें कोई आश्चर्य नहीं; क्योंकि ' इतरेतर- जन्मानो भवन्ति इतरेतर - प्रकृतयः ' ( ७ | ४ | १२ ) निरुक्तके इस कथनके अनुसार देवता एक - दूसरेको भी उत्पन्न करते हैं; और एक - दूसरे की प्रकृतिको भी धारण करते हैं । ' आत्मा वै पुत्रनामासि ' ( बोधा- यनगृ ( २।१।४ ) इस कथनसे रुद्र -पिता, गणपति- पुत्र होने से दोनोंकी बातें एक - दूसरे में घट सकती हैं ।

वेदमें दक्षसे अदिति, और अदिति से दक्षकी उत्पत्ति बताई गई है- ' अदितेर्दक्षो अजायत, दक्षाद्वदितिः परि ' ( ऋ ० १०।७२।४ ) इसपर ' अदितेर्दक्षो अजायत, दक्षाद् अदितिः परि ' तत् कथमुप- ' पद्येत समानजन्मानौ स्याताम् ' इस शङ्काका कि एक - दूसरेसे उत्पत्ति कैसे— श्रीयास्क मुनिने निरुक्त में समाधान कर दिया है- ' अपि वा देवधर्मेण इतरेतरजन्मानौ स्याताम्, इतरेतरप्रकृती ' ( ११ । २३।३-४ ) कि एक - दूसरे से उत्पन्न ( प्रकट ) होना - यह देवधर्म है । " यही बात गणेश और महेशदेवके विषय में भी जान लेनी चाहिये ।

( ख ) यजुर्वेदकी १०१ संहिताएँ हैं । इनमें ८६ कृष्णयजुर्वेदकी 29और १५ शुक्लकी होती हैं । इसीलिए ( ३१७ ) पाणिनिसूत्रके महा- भाष्य में श्रीपतञ्जलिने लिखा है- ' ऋषिः ( वेदः ) पठति शृणोत ग्रावाणः ' । यहां कृष्णयजुः के मन्त्रको ऋपि ( वेद ) कहा गया है । श्रीपाणिनिने भी ‘ तप्तनप् ' ( ७११४५ ) इस वैदिकसूत्र में ' कृष्णयजुः के प्रयोग ' शृणोत ' को वैदिकरूप माना है । सो यह मन्त्र ' कृष्णयजुर्वेद ' ( तै ० सं ० १ । ३ । १ । १३ । १ ) का है । इसप्रकार जब कृष्णयजुर्वेद वेद है, उसका ब्राह्मण तथा आरण्यक एवं उपनिषद् वेद हैं, तब उसमें वर्णित गणपतिदेव भी वैदिकदेवता सिद्ध होगये । कृष्णयजुर्वेदके आरण्यक एवं उपनिषद्का मन्त्र हम गणेशजीकी सिद्धिमें दे चुके । अब हम कृष्णयजुर्वेद की संहिताका मन्त्र इसपर देते हैं । वह मन्त्र यह है-

' तत्कराटाय विद्महे हस्तिमुखाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ' ( २।६।१।६ ) यह कृष्णयजुर्वेद - मैत्रायणी - संहिताका मन्त्र है । करं- शुण्डाद्ण्डम् आटयति - भ्रमयतीति कराटः । यहाँ गजानन - गणेशका संहितात्मक वेदमें स्पष्ट वर्णन होने से वे वैदिकदेवता सिद्ध होगये । अब इस वेदमन्त्रको देखकर क्या किसीका साहस हो सकता है किं गणेशजीको अनार्यदेव, वा अपदेव वा अवैदिकदेव कह सके? वा उसे देव माननेवालेको वेदार्थानभिज्ञ कह सके?

( १४ ) अब वादिप्रतिवादिमान्य कृष्णयजुर्वेद तैत्तिरीयारण्यकमें भी गणेशजीका वर्णन देखें- ' तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । ' तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ' ( १०११ ) यहाँ भी हस्तिमुख और एकदन्त गणेशजीका वर्णन स्पष्ट है । जो इसे प्रक्षिप्त मानते हैं; उनके पास 30अपने असत्याग्रहको पूर्ण करने के लिए इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय भी तो नहीं है ।

( ख ) जो कि ऋग्वेदीय गणपति के मन्त्रको सायणाचार्य के कथन के अनुसार प्रतिपक्षिगण ब्रह्मणस्पतिवाचक मानते हैं; यदि उनका श्रीसायणपर इतना विश्वास है, तो प्रत्येक वेद भाष्य के आरम्भ में देखें, उसने ' वागीशाद्याः सुमनसः सर्वार्थानामुपक्रमे । यं नत्वा कृतकृत्याः स्युस्तं नमामि गजाननम्, मङ्गलाचरणभी गजाननका ही किया है | यदि वैदिक गवेषक श्रीसायण गजानन गणेशको अवैदिक देवता मानते; तो आरम्भमें उस गजाननकी स्तुति न करते । शेष रही ब्रह्मणस्पतिकी बात, सो ब्रह्मणस्पतिको ही यहाँ गणपति के रूप में स्तुत किया गया है । इसीलिए ' त्रिपुरातापिनी उपनिषत् की तृतीय कण्डिकामें ब्रह्मणस्पतिके ' गणानां त्वा ' ' सीद सादनम् ' इस मन्त्रको देकर इस मन्त्रके आदिम तथा अन्तिम अक्षरका बीजमन्त्र ' गं गणपतये नमः ' बताकर गणेशको नमस्कार कराया है । वहीं चतुर्थ कण्डिकामें फल लिखा है - ' गणानां त्वा - इति त्रैष्टुभेन पूर्वेण अध्वना गणाधिपमभ्यर्च्य गणेशत्वं प्राप्नोति ' इससे इस गणपति तथा गणेशमें स्पष्टही अभेद सिद्ध होजाता है । उपनिषत्के वेद होनेसे ( जैसेकि - अग्रिम पुष्प में हम कहनेवाले हैं ) उपनिषत्प्रोक्त संहिता- मन्त्रका विनियोगभी वैदिक सिद्ध होगया । इससे यहभी सिद्ध हुआ कि एक स्थल में विनियुक्त मन्त्रका अन्यत्र विनियोग बाधित नहीं होजाता । तब ब्रह्मणस्पतिका मन्त्र गणेशमें भी विनियुक्त होजाता है । ' एतमु एवं बृहस्पतिं मन्यन्ते, वागू हि बृहती, तस्या एष 31पति: ( १ २ ।११ ) । इस छान्दोग्य उपनिषद्वचनके अनुसार वाणीरूप बुद्धिके पति होने से गणपतिही यौगिक बृहस्पति बने । । इसीही मन्त्र से ' गं गणपतये नमः ' यह वीजमन्त्र बनता है, ब्रह्मणस्पतिका वीज- मन्त्र ' गं ' कहीं नहीं देखा गया ।

( ग ) एक देवताका नानारूपों तथा नाना नामोंसे भी वर्णन आता है, जिसमें ' माहाभाग्याद् देवताया एक आत्मा बहुधा स्तूयते ' ( निरु ० ७१४८ ) तथा ' विश्वा हि वो नमस्यानि वन्द्या नामानि देवा! उत यज्ञियानि वः ' ( ऋ ० १०६३/२ ) ' देवो देवानां गुह्यानि नामा- ऽऽविष्कृणोति ' ( ऋ ० ६६५२ ) एतदादिक प्रमाण साक्षी हैं । गणेश के ब्रह्मणस्पति होनेसेही ' गणपत्युपनिषद् ' में गणेशकेलिए ' वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि, त्वं ब्रह्मा त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्म असि, त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ' इत्यादि कहा है । गणेशपुराण के सहस्रनामों में तो उसे ' कविं कवीनामृषभो ब्रह्मण्यो ब्रह्मणस्पतिः ' ( ४६।१४ ) स्पष्ट ही ज्येष्ठराज, ' ब्रह्मणस्पतिः ' नामसे कहा है ।

( घ ) अन्य वैदिक शैली यह भी है कि - समान स्थान, समान गुण तथा समानकार्यता एवं इतरेतरप्रकृतिवश तत्तद्देवको एक - दूसरे के नामसेभी बुलाया जाता है, जैसाकि निरुक्तमें भी कहागया है- ' अपि सत्त्वानां प्रकृतिभूमभिऋषयः स्तुवन्ति ' ( ७ | ४ | १० ) ' तत्र सस्थानैकत्वं सम्भोगैकत्वं च उपेक्षितव्यम् ' ( ७१५८ ) ' सम्भोगैकत्वं ' के दुर्गाचार्यके शब्दों में ' लोकेपि समानकार्यता येषां भवति, तेषा- मैक्यमित्युच्यते ' दोनों देवोंकी सम्मानकार्यताभी याद रख लेनी चाहिये, जिसमें दोनोंका एकत्व सिद्ध होता है । देवताओं में इतरेतर 32प्रकृतिभी निरुक्तमें मानी गई है, तभी तो निरुक्लकारका कई करोड़ वा कई हज़ार देवताओंका तीन संख्या में गिन लेना सङ्गत होजाता है । तब बृहस्पतिकेभी देवगुरु तथा बुद्ध्यधिष्ठाता प्रसिद्ध होने से तथा गणपतिकेभी देवगणोंके पति तथा उपनिषद्के शब्दों में ज्ञानमय अर्थात् बुद्ध्यधिष्ठाता होनेसे बृहस्पतिको गणपति रूपमेंभी स्तुत किया जा सकता है, अश्वमेध अश्व भी उसे स्तुत किया जा सकता है । ' यहाँ गणपतिका काम भी है ' । गणपतिको विघ्नदूरी - करणार्थ यज्ञस्थलमें प्रतिष्ठित न किया जावेगा, तो अन्य किसे प्रतिष्ठित किया जाएगा? एक ही गणने दक्षका यज्ञ विध्वस्त कर दिया था; तव यज्ञकी निर्विघ्नतार्थ अश्वमेध अश्वमें गणपतिभी आहूत किये जाते हैं । वे इसमें अन्यथासिद्ध नहीं, यज्ञके क्षेत्रमें हैं । ' यज्ञ ' यज धातुका रूप है । ' यज ' धातु देवताओंके पूजनमें आता है, तब इतने बड़े यज्ञ अश्वमेध में विघ्नदूरीकरणार्थ देवाधि- पति गणपतिका पूजन वा स्तुति अनिवार्य है । जैसे ' ब्रह्मणस्पति ' के मन्त्रके आदि - अन्तसे ' गम् ' यह गणेशका वीजमन्त्र निकला है, वैसे अश्वमेधाध्यायवाले ' गणानां ' ' ' गर्भधम् ' मन्त्रके आदि अन्त से भी । तब दोनों, गणेशके ही मन्त्र सिद्ध होगये, और गणपति वैदिक देव सिद्ध होगये । तब इसमें अपने प्राच्य ग्रन्थोंको न मानना और निकल्स तथा एलिसगेटी आदि पाश्चात्योंका मत मान लेना यह उनका मानसिक दास बनना है । गणपतिके पुराणोंमें विभिन्ननाम वेदमें ‘ इन्द्राय वृन्नध्ने, इन्द्राय वृत्रतुरे, इन्द्राय अंहोमुचे ' इस निरुक्त ( ७११३६ ) के कहे प्रकारसे आये हैं; उन भिन्न - भिन्न नामोंसे भिन्न- 33ना भिन्न आहुति भी दी जाती है; पर इससे इन्द्र अनार्य नहीं हो जाते; य इस प्रकार इन्द्रान्तर्गंत गणेशभी पुराणों में वर्णित भिन्न नामोंसे वा I भिन्न जन्मकर्मके निरूपण से अनार्यदेव नहीं होजाते ।

य ( १५ ) तैत्तिरीयारण्यकमें जैसे गरुङगायत्री है, वैसे ही ' तत्पुरुषाय न विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ( १०।१ ) यह T गणेशगायत्री भी आई है । उसीमें गरुडगायत्री भी है, दुर्गागायत्री ते सहस्रों मन्त्रोंमें दन्ति या वक्रतुण्डके नामसे एक भी मन्त्र नहीं है,

भी है, नारायणगायत्री भी । उसमें यह कहना कि ( संहिता भाग में 7 वैसे ही मन्त्र होने चाहियें, जैसे संहितामें, क्योंकि ब्राह्मणमें संहिताकी ही

और आरण्यक में जो मन्त्र आये हैं, वे कहीं नहीं जिलते, ब्राह्मणोंमें i व्याख्या - सी होती है, यह प्रतिपक्षियोंका वचन भी व्यर्थ है । यदि

इसका तात्पर्य यह है कि जैसे ' तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय क विद्महे, कन्याकुमारि धीमहि, ' नारायणाय विद्महे वासुदेवाय

धीमहि, वक्रतुण्डाय धीमहि, सुवर्णपक्षाय धीमहि, कात्यायनाय

धीमहि ' इन कृष्णयजुर्वेद - तैत्तिरीयारण्यकके मन्त्रोंका कृष्णयजुर्वेद

की किसी संहितामें मिलना आवश्यक है, पर यह मन्त्र अन्य किसी 1

भी संहितामें नहीं मिलते ' ऐसा कहना अपनी दृष्टिको असर्वतोमुखी २

बनाना है । कृष्णयजुर्वेदको ' मैत्रायणी - संहिता ' के दूसरे काण्ड,

नवम प्रपाठक, प्रथम अनुवाकमें यही मन्त्र मिलते हैं; बल्कि वहाँ

कई विशेष मन्त्र भी मिलते हैं । पाठकगण भी देखें — ' तत्पुरुषाय न

विद्महे महादेवाय धीमहि । तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ' ( २ । ६ । १ । ३ ) यह क

.

रुद्रगायत्री ‘ तद् गाङ्गौच्याय विद्महे गिरिसुताय धीमहि, तन्नो गौरी 34प्रचोदयात् ' ( ४ ) यह गौरीगायत्री ' तत्कुमाराय विद्महे कार्तिकेयाय धीमहि । तन्नः स्कन्दः प्रचोदयात् ' ( ५ ) यह कार्तिकेय - गायत्री मिली है । स्कन्द रुद्र के बड़े लड़के माने जाते हैं, गणेश छोटे, और गौरी पत्नी । अब यह सारा परिवार ही वैदिक सिद्ध होगया । अब उसी संहिता में दन्तीका मन्त्र भी देख लीजिये -

' तत्कराटाय विद्महे हस्तिमुखाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ' ( २ | ६ | १ | ६ ) अब भी क्या सन्देहकी गुञ्जायश रह गई १ इस प्रकार आगे रुद्रकी अन्य विभूतियाँ भी देखिये- ' तच्चतुर्मुखाय विद्महे पद्मासनाय धीमहि । तन्नो ब्रह्मा प्रचोदयात् ' ( ५ ) यहाँ चतुर्मुख ब्रह्मा की ' तत् केशवाय विद्महे नारायणाय धीमहि । तन्नो विष्णुः प्रचो- दयात् ' ( ८ ) यह नारायणकी, ' तन्नो भानुः प्रचोदयात् ' ( ६ ) यह सूर्यकी ' तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात् ' ( १० ) ' तन्नो वह्निः प्रचोदयात् ' ( ११ ) इत्यादि बहुत - से गायत्रीमन्त्र हैं । तब आरण्यकके मन्त्रोंके मूल संहितामें मिल जानेसे कई व्यक्तियोंका पूर्वोक्त व्याज कट गया । वही दन्तीका मन्त्र नारायणोपनिषत् तथा गणपत्युपनिषत् वा गणपत्यथर्वशीर्ष आदिमें भी आया है, मिताक्षरा आदि टीकाग्रन्थों में भी उद्धृत है; तब प्रतिपक्षियोंसे आविष्कृत प्रक्षिप्तता कट गई । अभी तो ११३१ संहिताओं में कठिनता से १२-१३ ही संहिता मिलती हैं, उनमें भी जब गणेशका वर्णन स्पष्ट मिल रहा है; तब अलभ्य संहिता में पता नहीं कि गणेश विषयक सामग्री कितनी मिल सकेगी? तो बिना सारी संहिताओं के देखे ' गणपति अवैदिक देव हैं ' यह फतवा दे देना साहसमात्र है । यहाँ संहिताने स्पष्ट

35श्रीगणेशका मङ्गलाचरण?? गणेशको हस्तिमुख बताया है ।

( ख ) जोकि तैत्तिरीयारण्यकके उक्त दन्तीके मन्त्रके लिए कहा जाता है कि ' सायरणने इनको खिलमन्त्र माना है, और कहा है- ' इत ऊर्ध्वं तेषु - तेषु देशेषु श्रुतिपाठा अत्यन्तविलक्षणा: ' इन बातों से अनुमान होता है यह अंश प्रक्षिप्त है, इस पर जानना चाहिये कि ' खिल ' न तो अप्रमाण ही होते हैं, और न उनका कर्ता भिन्न होता है; किन्तु ' खिल ' उसी ग्रन्थकर्ताका अनियमित संग्रह होता है । प्राजकल भी ग्रन्थकर्ता अपने ग्रन्थके अन्त में ' परिशिष्ट ' रखते हैं, वह अन्यकृत वा अप्रमाण नहीं होजाता । ऋग्वेदका परिशिष्ट भी ' ऋकू-. परिशिष्ट ' प्रसिद्ध है; इसे अप्रमाण नहीं माना जाता । ' नेज्जिह्मा- यन्तो नरकं पताम ' यह ' ऋक्परिशिष्ट ' ( ८ अष्ट ०, ६ अध्या. २ वर्ग ) का मन्त्र निरुक्तकारके द्वारा निपातप्रकरण ( १ | ११ | १ ) में तथा ' उपसंवादाशङ्कयोश्च ' ( ३ | ४ | ८ ) इस पाणिनिके छान्दस सूत्रके उदाहरणमें दिया गया है । इस प्रकार ' भद्रं वद दक्षिणतः ' इस ऋपरिशिष्ट ( २।१३।१ ) के मन्त्रको श्रीयास्कने ' तदभिवादिनी एषा ऋग् भवति ' ( ६ । ५ । १ ) कहकर इसे ऋग्वेद माना है । इससे स्पष्ट है कि - ' खिल ' प्रक्षिप्त वा अप्रमाण नहीं हुआ करते ।

( ग ) जिस सायणाचार्यकी ' खिल ' कहनेके लिए दुहाई दी जाती है; उसने लिखा है- ' यथा बृहदारण्यके सप्तमाष्टमाध्यायौ ‘ खिल ' काण्डत्वेन आचार्यैरुदाहृतौ, तथा इयं नारायणीयाख्या याज्ञि- की उपनिषदपि खिलकाण्डरूपा, तल्लक्षणाक्रान्तत्वात् ' । तब क्या बृहदारण्यकत्रे ७ म ' खिल ' में आये ' पूर्णमदः पूर्णमिदम्, तथा म 36में ये ' यो ह ज्येष्ठ श्रेष्ठं च वेद ' इत्यादि नाना उपासनाओं तथा ' स यः कामयेत महत् प्राप्नुयाम्, इत्यादि मन्थ नामक कर्मको, ' अथ य इच्छेत् पुत्रो मे पण्डितो जायेत सर्वान् वेदाननुश्रुवीत ' इत्यादि कर्मोंको प्रक्षिप्त वा अन्यकृत मान लेंगे? यजुर्वेद संहिता में ' अग्निश्च पृथिवी ' ( २६।१ ) यह अध्याय ' खिल ' माना गया है; तब क्या यह प्रक्षिप्त है? ऋ ० सं ० में १६ के लगभग तथा अथर्व ० सं ० के २० वें काण्डमें ३ खिल सूक्त हैं । श्रीसायणने आरण्यकके उस सारे ही प्रपाठकको ' खिल ' माना है; तब प्रतिपक्षी उसकी ' रुद्रगायत्री ' " को ही क्यों प्रमाण मानते हैं? उसमें स्थित ' इमं मे गंगे, ऋतं च ` सत्यं ' मन्त्रों को भी क्या प्रक्षिप्त मान लिया जायगा? यदि उन्हें अन्य संहिताओं में मिलने से प्रक्षिप्त न माना जाए; तो गणेशगायत्री आदि भी ' तत् कराटाय विद्महे हस्तिमुखाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ' इत्यादि रूपमें कृष्णयजुर्वेद मैत्रायणी -संहितामें मिलती है; तब वे अप्रमारण क्यों होंगे?

( घ ) प्रतिपक्षी, निष्पक्ष विचारक श्रीसायणकी कही ' खिल ' की परिभाषाको भी याद रखें - ' कर्मोपासनब्रह्मकाण्डेषु त्रिष्वपि यद् - चंद् वक्तव्यमवशिष्टम् ' तस्य सर्वस्य अभिधानेन प्रकीर्णरूपत्वं खिलत्वं ' यहाँ कर्म, उपासना, ज्ञानकाण्डसे अवशिष्टके संग्रह कर देनेका नाम ' खिल ' है; तब संग्रह प्रक्षिप्त कैसे होगा?

( ङ ) ' खिल ' की परिभाषा श्रीनीलकण्ठने ' हरिवंश ' की अव तरणिकामें यह लिखी है — ' यच्च शाखान्तरस्थं शाखान्तरे प्रयोजन- वशात् पठ्यते, यथा - बाहूवृचे श्रीसूक्तमेधासूक्तादि तत् खित्त्रमुच्यते ' । 37अन्य शाखाके निगमको अन्य शाखा में रखना ' खिल ' होता है । महाभारत शान्तिपर्वके ' प्रतिष्ठास्यति ते वेदः सखिलः ' ( ३१८ | १० ) इस पद्यकी टीकामें श्रीनीलकण्ठने ' खिल ' का यही अर्थ दिया है- ‘ परशाखीयं स्वशाखायामपेक्षावशात् पठ्यते, तत् खिलमित्युच्यते । यथा बह ्मवृचानां ‘ हिरण्यवर्णां हरिणीम् ' इतिसूक्तम् । सो ' खिल ' निर्मूल न हुए, किन्तु समूल ही हुए, दूसरी संहिताओंके ही हुए । सभी संहिता वेद ही तो होती हैं ।

( च ) खिलोंके प्रमाण होनेसे ही पितृकर्म में मनुजीने ' स्वाध्याय श्रावयेत् पित्र्ये ' ' ' पुराणानि खिलानि च ' ( ३।२३२ ) यहाँ खिलोंका सुनाना आदिष्ट किया है । ( छ ) श्रीकुल्लूक भट्टने लिखा है- ' खिलानि श्रीसूक्तशिवसंकल्पादीनि ' ।

( ज ) यही प्रतिपक्षी लोग ' निरुक्त ' के ' खिल ' से ' एतं तर्कमृषिं प्रायच्छन् ' ( १३ | १२ | १ ) इसे ' निरुक्त ' के नामसे उद्धृत करके प्रमाणित कर लेते हैं, पर दूसरे के लिए ऐसा करने पर रोड़ा अटका देते हैं- यह क्यों? यामलाष्टकतन्त्र में ' खिल ' का लक्षण यह आया है - ' पुरा व्यासेन वेदेषु संक्षिप्तेषु चतुर्ष्वपि । अनुवाकाष्टकाध्यायसूक्त- वाक्य - पदात्मसु । तत्र तत्र तु शिष्टानि यानि वाक्यानि सन्ति हि । खिलानि तानि प्रोच्यन्ते ' । अतः स्पष्ट है कि ' खिल ' अप्रमाण नहीं होते ।

( झ ) श्री सायणाचार्यके ' इत ऊर्ध्वं तेषु तेषु देशेषु श्रुतिपाठा अत्यन्तविलक्षणाः ' इन शब्दों से ' वक्रतुण्डाय ' आदि मन्त्रोंकी प्रक्षिप्तताका अनुमान भी ठीक नहीं । श्रीसायण इसमें शाखाभेदको 38कारण बताते हैं और सभी पाठोंको उपादेय मानते हैं - ' तदीयपाठसम्प्र- दायस्तु देशविदेशेषु वहुविध उपलभ्यते । तत्र यद्यपि शाखाभेदः कारणम्, तथापि तैत्तिरीय शाखाध्यापकैः तत्तद्देशनिवासिभिः शिष्ट- राहतत्वात् सर्वोपि पाठ उपादेय एव ' । और फिर श्री सायणाचार्य पूर्वोक्त पाठके आगे ' तत्र विज्ञानात्मप्रभृतिभिः पूर्वैर्निबन्धकारैद्रविड- पाठस्य आहतत्वाद् वयमपि तमेव आहत्य व्याख्यास्यामः ' यह लिखकर उन मन्त्रोंका आदर करके उनके भाष्य में प्रवृत्त हैं, इससे स्पष्ट है कि उनकी प्रक्षिप्तता एवं निर्मूलता वा श्रप्रमाणता नहीं । पाठभेद भी अनुवाकक्रमसे है । द्रविड ६४ अनुवाकों का, आन्ध्र ८० अनुवाकका, कई कर्णाटक ७४ अनुवाकोंका, कई ८ का मानते हैं । पर गणेशगायत्री आदि सभी पाठों में है । पूजाके छपे तै ० आ ० में १० म प्रपाठक ६४ अनुवाकोंका छपा है, ८० का भी । दोनों में ही गणेशगायनी उपलब्ध है । इस प्रकार कर्णाटक पाठ में भी समझ लेना चाहिये । पाठभेद भी यह होगा कि कहीं गरुड का मन्त्र होगा, स्कन्दका नहीं । नन्दीका होगा, ब्रह्माका नहीं । तब गणेशकी अवैदिकता कैसी?

( ञ ) बल्कि श्रीसायणाचार्यने उक्त गणेशगायत्रीकी व्याख्या करते हुए अवतरणिका लिखी है- ' वीजापूरगदेकार्मुक ' इति आगमप्रसिद्धमूर्तिधरं विनायक प्रार्थयते ' । इस प्रकार गणेशको आगम- प्रसिद्ध मानकर ‘ वक्रतुण्ड ' की व्याख्या की है— ' गजसमानवक्त्रत्वेन तुण्डस्य रत्नकलशादि - धारणार्थं वक्रत्वम्, दन्तिर्महादन्तः ' । यहाँ श्रीगणेशको रत्न धारण करनेवाला माना है । इसलिए ही. ' आतू 39न इन्द्रः क्षुमन्तं चित्रं ग्राभं संगृभाय । महाहस्ती दक्षिणेन ' ( ११ ) ऋग्वेदसंहिताके इस इन्द्र के मन्त्रमें उसे गणपतिके रूप होनेसे ( जैसेकि हम पहले बता चुके हैं ) ' महाहस्ती ' कहा है, और उस हस्तसे धन देना प्रार्थित किया है ।

( ट ) बृहत्पराशरस्मृतिमें ' श्रा तू न इन्द्र वृत्रहं सुरेन्द्रः स गणेश्वरः ' ( ११।३२ ९ ) इस मन्त्रको गणेश्वरपरक माना है । इस प्रकार गणेश वैदिकदेवता सिद्ध होगये । तभी वेदभाष्यकार श्री सायणने प्रत्येक स्थानमें ' वागीशाद्याः तं नमामि गजाननम् ' गणेश को नमस्कार किया है ।

. ( १६ ) गणेशके बारह नामों में ' धूमकेतुर्गणाध्यक्षो ' ' धूमकेतु ' नाम भी आया है; उस नाम से भी वेदमें गणेशका वर्णन देखिये- ' शं नो ग्रहाश्चान्द्रमसाः शमादित्यश्च राहुणा । शं नो मृत्युधूमकेतुः शं रुद्रास्तिग्मतेजसः ' ( अथर्व ० सं ० १६६ १० ) यहाँ पर सूर्य - चन्द्र आदि सात ग्रहोंसे तथा राहु - ग्रहसे कल्याणकी प्रार्थना की गई है । ‘ राहोश्छाया स्मृतः केतुः ' ज्यौतिष शास्त्र के इस वचनसे राहुसे केतु, धूमकेतु आदिका ग्रहण भी हो जाता है, इसलिए पञ्चांगोंमें राहुके राशि अंश आदि लिखकर केतुके नहीं लिखे जाते, क्योंकि केवल ६ राशिका उन दोनोंमें अन्तर होता है; शेष अंश, कला, विकला, गति - विगति उन दोनोंकी बिल्कुल बराबर होती हैं । सो राहु - केतु दोनोंसे ग्रस्त सूर्य - चन्द्रमाके ग्रहणोंसे इसमें कल्याण प्रार्थित कर दिया गया । उत्तरार्धके चौथे पादमें तीच्ण रुद्रसे कल्याणकी प्रार्थना की गई है, उस रुद्रके साहचर्यसे ' धूमकेतु ' यहाँ गणेशका नाम ही है । 40क्योंकि गणेश रुद्रके पुत्र माने जाते हैं । पहले गणेशका नाम रखना पुत्रके पिता से बढ़ जाने के कारण है । ' गुणाः सर्वत्र पूज्यन्ते पितृवंशो निरर्थकः । वासुदेवं नमस्यन्ति वसुदेवं न मानवाः । पर रुद्र भी उनके पीछे पूजनीय होते हैं । इसलिए रुद्रके विवाह में भी गणेश - पूजन हुआ । उस धूमकेतु ( गणेश ) का विशेषण यहाँ पर ' मृत्यु ' माना गया है, इसका कारण यह है कि श्रीगणेश ' विघ्न- स्वरूप होने से जैसे कि - बौधायन गृहाशेपसूत्र में लिखा है- ' विघ्न! विघ्नेश्वरागच्छ विग्नेत्येव नमस्कृत! अविघ्नाय भवान् सम्यक् सदा- ऽस्माकं भव प्रभो! ' ( ३ | १०१२ ) जैसेकि मानव - गृह्यसूत्र में कहा है- ' एतैः खलु विन्नायकैराविष्टाः... स्त्रीणामाचारवतीनामपत्यानि न्नियन्ते ' ( २।१४।१-२-३-२१ ) जैसाकि ' बृहत्पराशरस्मृति ' में भी कहा है- ‘ विघ्नार्थमसृजद् ब्रह्माशङ्करश्च विनायकम् ' ( ६३ ) उसी, विघ्नकारक होनेसे मृत्युस्वरूप श्रीगणेश से ' शं ' की प्रार्थना उक्त मन्त्रमें की गई है । विवाहादिमें गणेश महादिपूजन हुआ ही करता है; वह इस मन्त्रके मूलसे है । मनुस्मृति में ' मङ्गलार्थं स्वस्त्ययनं प्रयुज्यते विवाहेषु ' ( ५।१५२ ) विवाहादि में ' स्वस्त्ययन ' करना बताया गया है । इससे मनुजीको गणेशपूजन इष्ट है । यह हम पहले बता चुके हैं कि श्रीगणेशका ‘ स्वस्तिक ' से बोध होता है; सो स्वस्तिवाचनमें गणेश - पूजा भी अन्तर्भूत होजाती है । अस्तु ।

उक्त मन्त्रमें गणेशजीका नाम ' धूमकेतु ' है, संहिताओंके अन्य स्थलों में गणपति, दन्ती, हस्तिमुख, वक्रतुण्ड, महाहस्ती, बृहस्पति आये हैं; तब गणेशजी वैदिक ही सिद्ध हुए । वेदसे ही वे पुराण में 41गये हैं; जैसेकि काशी केदारनाथ - माहात्म्य में उनके लिए कहा है- 1 ( ख ) ' विघ्नध्वान्तनिवारणैकतरणिविघ्नाट बीहव्यवाट्

विघ्नव्यालकुलोपमर्दगरुडो विघ्नेभपञ्चाननः ।

विघ्नोत्तङ्गगिरीशमर्दनपविर्विघ्नाधिकुम्भोद्भवो ' विघ्नायुध वाढव

विघ्नाभ्रौघघनप्रचण्डपवनो विघ्नेश्वरः पातु नः ' ।

वाराह - पुराण में ' नमस्ते गजवक्त्राय नमस्ते गणनायक । विनायक! नमस्तेस्तु नमस्ते चण्डविक्रम! नमस्ते रुद्रवक्त्रोत्थ! प्रलम्ब- जठराश्रित! सर्वदेव! नमस्काराद्विघ्नं कुरु सर्वदा ' । ' रुद्र- वक्त्रोत्थ'से वे रुद्रके लड़के सिद्ध हो रहे हैं । तैत्तिरीयारण्यकके एकदन्तका मन्त्र जो किन्हींको रुद्रका मालूम होता है; उसमें पिताके पुत्रके लिए ' आत्मा त्वं पुत्रनामासि ' ( मीमांसादर्शन ४ | ३ | ३८ ) यह न जानना ही उनकी भूलका कारण होता है । पुराणोंसे फिर गणेशजी बौद्ध - साहित्य में गये हैं । वहाँ विनायकी शक्तिका स्वरूप ' हस्ताकारसमायुक्ता ' मिलता है । महायान बौद्धधर्ममें भी गणेशका पूरा वर्णन मिलता है- ' भगवन्तं गणपतिं रक्तवर्णं ' ' " लम्बोदरैक वदनं ' · ‘ त्रिनेत्रमेकदन्तं, सव्यभुजेषु कुठारशराङ्कुश - वज्रखड्गशूलं च, वामभुजेषु मुसलचापखट्वाङ्ग, रक्तपद्मे मूषिकोपरि स्थितम् ' ।

( ग ) अपने देशमें तो गणेशजी हैं ही, वे विदेशों में भी पहुँचे हुए हैं । क्योंकि भारतीय लोगोंने विदेशों में अनेक उपनिवेश स्थापित किये थे उसीके कारण हैं; अनायके देवोंके कारण नहीं । भारतीय संस्कृतिका दूर - दूर तक प्रचार हो चुका था । तुर्किस्तानसे लेकर मलयद्वीपपुरंज, बालि, जावा, बोर्नियो, स्याम, कम्बोडिया 42तक भारतीय लोग जाकर बसे थे । वहाँ आज भी हिन्दुओं के अनेक स्मारक मिलते हैं । इन्हीं हिन्दुओं द्वारा इन देशों में गणेश- पूजाका प्रचार हुआ । ये मूर्तियाँ हैं तो भारतीय मूर्तियों के सदृश ही, परन्तु उनमें कुछ विशेषताएँ भी हैं । जर्मनीमें स्वस्तिक रूपमें उन्हें राष्ट्रियपताकामें स्थान मिला । मेसोपोटामिया, बेबीलोनिया, ट्राय, इटली आदि देशों में जब भूगर्भकी खुदाई हुई; वहाँ पर स्वस्तिक मिला । दक्षिण यूरोप में भी इसका प्रचार पाया गया है । सिसली और क्रीट में स्वस्तिकका प्रचार प्राचीनकाल से चला आ रहा है, स्पेन और इटलीके इतिहास में स्वस्तिकका अस्तित्व बहुत काल से रहा है । अमेरिका में भी उसका प्रचार पाया जाता है । भारतमें तो प्रचार है ही । हिन्दुराजाओं के सिक्कों में भी स्वस्तिक प्रयुक्त किया जाता था । स्वस्तिकाकृति भूषण भी बनते थे ।

( घ ) हिन्दुओंके विवाहादि - कार्यों में, पूजा - स्थलोंमें, व्यापारकी बहियोंमें, विशेष उत्सवोंमें, कुत्र आदिमें, द्रव्यकी पेटियों में, मन्दिरों वा घरोंके द्वारोंमें भी इसका प्रयोग होता है । लामाओंके दार्जिलिङ्गके महाकाल मन्दिरमें अभी तक स्वस्तिक उत्कीर्ण है । ' गीतारहस्य ' ५६० पृष्ठमें श्री तिलकजीने ' ईसाके सैकड़ों वर्ष पहले से ही इस स्वस्तिकको वैदिकों द्वारा शुभदायक माना जाना ' कहा है, कोलम्बससे भी कई शतक पूर्व पेरू तथा मैक्सिको आदिमें भी यह प्रचलित था । इतना यह गणेशजीका प्रचार हिन्दुधर्मकी एक महान् विजय है । आश्चर्य है कि हमारे ही देशके कई महाशय? उसके विरोध में लगे हैं । लेकिन भिन्नरूप में वे भी इसे प्रार्थित करते हैं-

43( ङ ) ' हे सर्व विद्यामय! सर्वार्थवित्! मदुपरि कृपां विधेहि, यया निर्विघ्नेन वेदार्थभाष्यं सत्यार्थं वयं पूर्णं कुर्वीमहि ' ( ऋग्वेदादि- आष्यभूमिका पृ ० ७ ) ' अस्मिन् वेदभाष्यकरणानुष्ठाने ये दुष्टा विघ्नाः, तान् प्राप्तेः पूर्वमेव परासुव - दूरं गमय ' ( पृ ० ३ ) यहाँ पर स्वा ० द ० जीने एक प्रकार से गणेशको मान लिया है । सत्यार्थप्रकाशमें- ' गरण संख्याने ' इस धातुसे ' गण ' शब्द सिद्ध होता है, और इसके आगे ' ईश ' वा ' पति ' शब्द रखनेसे ' गणेश ' और ' गणपति ' शब्द सिद्ध होते हैं । ' ये प्रकृत्यादयो जडा जीवाश्च गण्यन्ते, तेषामीश: ' - स्वामी, पतिः - पालको वा ' यह लिखा है; तो थोड़ा ही भेद रहा है । गणपत्युपनिषद् में भी गणेशको ब्रह्म ही माना गया है । इससे विघ्न हटानेके लिए विघ्नाधिपति अनादि गणपतिदेवकी प्रार्थनात्मक पूजा स्वामीके मतमें भी सिद्ध हुई । यदि वे श्रद्धासे वैध गणपति की अर्चना करते; तो उनके वेदभाष्य अवश्य पूर्ण होजाते । अद्वैत में अवश्य एक तत्त्व है, पर जैसे उत्पत्ति, स्थिति, और लयमें हिन्दुधर्म के ब्रह्मा, विष्णु, महेश यह हिन्दुधर्म में भिन्न नाम रूपकी त्रिमूर्ति मानी गई है; वैसे ही विघ्नविभाग के भी अनिवार्य होनेसे उनसे भी भिन्न नाम रूपवाले देवकी सत्ता भी अनिवार्य है, अतः वह देव भी है; और वह गणपति है ।

( १७ ) गणेशके जन्मके सम्बन्धमें विभिन्न कथाओं के पाये जानेसे इन्हें अपदेव वा अनार्यों का देव मानना और यह कहना कि- ' राम - कृष्णादि शुद्ध आर्य देवकल्प पुरुषोंके जन्मादिसम्बन्धमें इस प्रकारका कथा - वैषम्य नहीं है ' यह भी ठीक नहीं । एक के 44विषय में कथाओं की विभिन्नताका अनार्यो से कुछ भी सम्बन्ध नहीं होता । श्रीकृष्णादिकी कथा ही श्रीमद्भागवत, ' हरिवंश, गर्गसंहिता, ब्रह्मवैवर्तपुराण आदिमें देखने से उसमें कुछ - कुछ वैषम्य मिलेगा ही । श्रीरामकी कथाके लिए महाभारत, वाल्मीकि रामायण, पद्म- पुराण, उत्तररामचरित आदिको देखिये- कुछ वैषम्य मिलेगा ही । इससे वे अनार्य नहीं होजाते । ऐसे विरोध कल्पभेद द्वारा समाहित होजाते हैं । कल्पभेदसे सृष्टिमें कुछ परिवर्तन होते रहते हैं; जैसेकि स्वा ० द ० जीने भी ऋ ० सा ० भू ० में इसका संकेत दिया है ' मन्वन्तरपर्यावृत्तौ सृष्टेर्नैमित्तिकगुणानामपि पर्यावर्तनं किञ्चित्- किञ्चिद्भवति ' ( पृ ० २२ ) सृष्टिका स्वभाव नया- पुराना प्रतिमन्वन्तरमें बदल जाता है ( पृ ० २४ ) जब वे प्रतिमन्वन्तर में कुछ भेद मानते हैं, तब भिन्न कल्पों में कुछ - कुछ भेद होजाय; तो वहाँ क्या कहना? वेद - उपनिषदादिमें भी सृष्ट्युत्पत्ति में वैषम्य मिलेगा । कहीं आदि में सत्की उत्पत्ति, कहीं असत्की, कहीं आकाशादि - पूर्विका, कहीं अग्न्यादिपूर्विका, कहीं जलादिपूर्विका सृष्टि बताई गई है । तब क्या यह अनार्योका संग्रह होगा? अनादिदेव होने पर भी गणेश जीके भिन्न - भिन्न अवतार भी हुए हैं । अतः कहीं उनका अनादि रूपसे वर्णन आता है, कहीं उनके भिन्न - भिन्न अवतारों के रूपमें । कहीं - कहीं उनके भिन्न - भिन्न भावों पर बल देदिया गया है । कहीं विघ्नाभिमानी देवके रूपमें उनका वर्णन किया गया है । कहीं तात्पर्य - समानतामें भी उसी एकका वर्णन पूर्वसे विलक्षणतार्थ कुछ भिन्न करना ही पड़ता है, जिससे पाठकको वैरस्य प्रतीत न हो । 45उससे भी कुछ भेद होजाना स्वाभाविक है ।

( ख ) जोकि ' गरणानां त्वा ' मन्त्रको महीधर के अनुसार अश्वदैवत माना जाता है, तथा वैसाही अर्थ किया जाता है; तो इससे गणपति- देवका अभाव नहीं होजाता । कल्पके अनुसार एक मन्त्रके अनेक देवता वा अनेक विनियोग भी होते हैं । श्री महीधरके अर्थमें भी अश्वकी गणपतिदेव रूपसे स्तुति की गई है । यदि वेदभाष्यकार महीधरपर पूरा विश्वास किया जाता है; तो उसने भी वाजस ० संहिताके भाष्यके आरम्भ में ' प्रणम्य लक्ष्मीं नृहरिं गणेशं ' इस प्रकार गणेशजीको प्रणाम किया है । तब श्रीगणेश अनार्यदेव कैसे १ रुद्र वैदिक देवता हैं: तव ' आत्मा वै पुत्र नामासि ' ( निरुक्क ३।४।२ ) रुद्रके विग्रहविशेष - अंशावतार - पुत्र गणेश अवैदिकदेव कैसे हो सकते हैं?

( ग ) यदि अमङ्गलकारक होनेसे गणेश अपदेव माने जाएँ, तो ' ये अन्नेषु विविध्यन्ति पात्रेषु पिवतो जनान् ' ( यजु ० १८/६२ ) ( रुद्र अन्न- दूध खाने - पीनेवाले पुरुषोंको बींधा करते हैं ) मृत्युकारक होने से, तमोगुणी होने से ' मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र! रीरिषः ' ( यजुः १६।१५-१६ ) इत्यादि प्रार्थित होनेवाले रुद्रको भी क्या अनार्यदेव मान लिया जायगा?

( घ ) ' या ते रुद्र! शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी ' ( यजुः २।४६ ) इससे शिवजी के भी घोर, तथा अघोररूप दिखलाने से क्या घोर- ^ • रूपधारी रुद्र भी अपदेव हो जावेंगे? यदि नहीं, तो शिवसुत गणेशके भी; पिताके प्रभेदवश घोर अघोररूप मान लेनेसे व्यवस्था 46लग जाती है कि- घोररूप विघ्नकारक है और अघोर विघ्ननाशक । जो तत्त्व आध्यात्मिक उन्नतिमें स्वतः बाधक होता है, वही उपासना के द्वारा सहायक बन जाता है । अनिष्टकर भी इष्टकारी बन जाता है | विघ्नदेवताका स्वरूप साधना के बल से सिद्धिका देवता होजाता है, क्योंकि परमार्थतः विघ्न और सिद्धि, अविद्या और विद्या एक ही परा देवताके दो अविच्छेद्य रूप हुआ करते हैं ।

( ङ ) यह कहना भी कि - वैदिककालमें जब आर्य सप्तसिन्धु प्रदेशमें रहते थे, गणेशकी पूजा नहीं होती थी- ठीक नहीं । इसमें प्रष्टव्य है कि वैदिककालमें अनार्य थे या नहीं?? यदि नहीं थे; तो पूर्व में आयका अनायसे सम्पर्क कैसे बढ़ा? यदि वैदिककालमें भी अनार्य थे, और गणेशपूजा आर्योने अनायसे सीखी; तो इससे स्पष्ट हुआ कि वैदिककालमें भी गणेशपूजा थी, केवल आर्यों ने उसे अनायसे सीखा; परन्तु अनार्यो से गणेशपूजन सीखना निष्प्रमाण है । जब वेदमें गणेशका वर्णन है; तब वे वैदिकदेव हुए । जब सभी वेदसंहिताएं तथा तदन्तर्गत आरण्यक उपनिषदादि वेद हैं; यह हम चतुर्थ पुष्पमें सिद्ध कर चुके हैं, कुछ अग्रिम पुष्पमें करेंगे, प्रतिपक्षीको भी यह सम्मत है, तब कृष्णयजुर्वेद - मैत्रायणी संहितामें, कृष्णयजुर्वेद - तैत्तिरीयारण्यकमें, अथर्ववेद - गणपत्युपनिषद् में, अथर्ववेदीय ' शान्तिकल्प ' ( जिसके लिए श्रीसायणाचार्यने अथर्व- वेदभाष्यके अपने उपोद्घात में ' शान्तिकल्पेपि प्रथमं वैनायकग्रह- गृहीतलक्षणानि, वैनायकहोमाः, तत्पूजाविधानम् ' इत्यादि लिखा है ) तथा स्मृतियोंमें और वेदोंसे स्मृत किये हुए अनादिज्ञान पुराणों में 47जव स्पष्टतया गणेशजीका वर्णन आया है, तब उन वैदिकदेव गणेशको अवैदिक कहना परम साहस है । जो हिन्दु लोग मुसलमानी किसी पीर वा कवको पूजते भी हैं; तो दूसरेका देव समझकर; पर गणेशजीको कहीं दूसरों ( अनार्यों ) का देव नहीं कहा गया; वा समझा जाता । यदि गणेशजी अनार्योके देव होते; की! मुख्य पूजा ही नहीं । जो है वह से गई है । रुद्रपूजा, तो वे अब तक उन्हींके मुख्य देव होते; पर अनार्यों में तो गणेशजी विष्णुपूजा आदि उनमें भी यहाँ से गई है ।

( च ) बात यह है कि आर्यसमाजादिके संस्कारवश पहले प्रति- पक्षिगण इन प्रचलित चार संहिताओं को वेद मानते रहे; तब इनमें भी बीजरूपसे उन्हें गणेश यद्यपि वर्णित तो प्रतीत हुए, तथापि उन्होंने उनसे सहज ही जान छुड़ाली । पर उन्हें जब अनुसन्धान से आरण्यक एवं उपनिषद् भी वेद मालूम पड़े; तब उनमें भी ' गणेशजी ' को वर्णित देखकर प्रतिपक्षियोंने अपनी भूल तो नहीं मानी, किन्तु उन वचनोंको ही उल्टी - सीधी युक्तियों द्वारा ' प्रक्षिप्त ' कहकर जान छुड़ा ली । जब उन्हें लुप्त संहिताएँ उपलब्ध हुई, तब मैत्रायणी - संहिता ने भी प्रतिपक्षियोंका पीछा न छोड़ा, उसमें भी गणेश मिल गये I । अभी अन्य भी संहिताएं मिलेंगी, उनमें भी मिलेगा । पुराणादि वेदके भाष्य ही तो हैं; वे भला अपनी निर्मूल कल्पनाएं कैसे कर सकते थे? उनके समय वेदोंकी प्रायः सम्पूर्ण संहिताएं थीं; उनमें गणेशका वर्णन देखकर ही तो पुराणोंने उसका विशकलन किया ।

48वस्तुतः एक बात यह भी है कि कई ऐसे देवविशेष हैं, जिनका

' कालक्रमसे घटता - बढ़ता रहता है । थाजसे पहिले महादेव - पूजन

पूजन बहुत प्रचलित था; पर कालक्रमसे अव घट गया । कलिसें चण्डी एवं विनायकका प्रचार बहुत होता है; पर इससे उस देवका पूर्व अभाव वा नवीनोपास्यता नहीं हो जाती । अभी प्रतिपक्षियोंको अन्य संहिताएं नहीं मिलीं । यदि मिल जाएं; तब फिर प्रतिपक्षियों को उनसे आक्षिप्त देवोंका पूजन भी स्पष्ट मिल जाए । फिर वे पूर्व संस्कारवश उन्हें प्रक्षिप्त मान लेंगे । वास्तव में उनके पास उनसे जान छुड़ानेका इसके अतिरिक्त उपाय है भी क्या? शेष परिवर्तन मतिवैचित्र्यसे, अथवा अधिकारिभेदसे अथवा कल्पादिभेदसे अथवा कुछ नवीनतार्थ होजाते हैं ।

( छ ) प्रतिपक्षियों का यह कहना कि ' अनार्योंसे आर्योने गणेश- पूजा सीखी ' यह ठीक नहीं । यह भी वे मानते हैं कि आने अनार्यों पर विजय पाकर इस देश पर अधिकार किया । तो विजित जाति पर विजेताका ही अधिक प्रभाव पड़ता है, विजेता पर विजितका नहीं । हम लोग तो विजेताके हैट - बूट आदि पहनने लग गये । अपना शिखा - यज्ञोपवीत तिलक आदि खो बैठे, अपनी मूर्तिपूजा हटा बैठे, ईसाइयों वा अंग्रेजोंका संक्षिप्त संस्करण बन चुके, पर विजेता अंग्रेजोंने हमारी धोती, पगड़ी, चोटी, जनेऊ, तिलक हमसे नहीं सीखे 1

। अभी तक भी पराजित दास्यमनोवृत्तिवाले हमारे बन्धु अंग्रेजियत नहीं छोड़ सके; बल्कि उनसे प्रभावित होकर अपने G प्राचीन साहित्यको ही दूषित करने लगे; और नवीन एवं विषैले, 49अपने प्राचीन साहित्य में शङ्कित दृष्टि रखनेवाले साहित्यकी सृष्टि करने लगे ।

( ज ) ' गणपतिके नामसे एक ' उपनिषद् ' की रचना पीछेसे कर दी गई ' यह आरोप भी असत्य है । यह केवल प्रतिपक्षियोंके अपने पक्ष के रक्षणार्थ है । प्रतिपक्षी जब अपना एक विचार स्थिर कर लेते हैं; तब उन्हें उससे विरुद्ध विचार जहाँ मिलता जावे; उसे या तो प्रक्षिप्त कह देते हैं; या उसे अर्वाचीन रचना, वा मध्यकाल का मूढाग्रह कह देते हैं । जब वह भी न बन सके; तो उसे आलङ्कारिक कहकर उससे अपनी जान छुड़ा लेते हैं । वस्तुतः इस पर यह जान रखना चाहिये कि जितनी मन्त्र - संहिताएं होती हैं; उतने ही ब्राह्मण, उतने ही आरण्यक एवम् उपनिषद् भी होते हैं । इनका काल भी भिन्न नहीं । समाधि - द्वारा उसका दर्शन और ग्रन्थ- रूपमें संग्रहणका काल भले ही भिन्न हो; पर अपौरुषेय वेद होने से यह सब एक ही कालमें विद्यमान थे । जैसेकि - व्रात्यकाण्डकी भूमिकामें उत्तरप्रदेशके मुख्यमन्त्री, गणेशको अनार्यदेव प्रसिद्ध करनेवाले, डा ० श्रीसम्पूर्णानन्दजीने लिखा है- ' ईश्वर नित्य है, अतः उसका ज्ञान नित्य है, इसलिए वेद नित्य है । परन्तु सारे मन्त्र एक ही साथ मनुष्य के सामने नहीं आये, भिन्न - भिन्न ऋषियोंको भिन्न - भिन्न अवसरों पर पृथक् मन्त्रोंका समाधि की अवस्थामें दर्शन हुआ । इस दृष्टिसे पौर्वापर्यका व्यपदेश हो सकता है ' यही बात उपनिषदादिके सम्बन्धमें भी समझनी चाहिये - क्योंकि वह भी वेद हैं । तत्र उपनिषत्काल भी संहिता काल से पीछे नहीं हो सकता ।

50श्रीसनातनधर्मालोक ( )

५०

जब विघ्नेश्वरका व्यापार भी जगत् में अपेक्षित है, वह अर्वाचीन नहीं; तब विघ्नेश्वर गणपतिकी उपनिषद् भी अर्वाचीन क्यों हो? अभी तक न तो सारी संहिताएं ही मिली हैं; न सारे ब्राह्मण और न आरण्यक उपनिषद् आदि, न सूत्रमन्थ । तव वर्तमान शास्त्रों में प्राप्त ' गणेशजी ' को एकदम ' अपदेव ' कह देना साहसमान है - जैसाकि - अप्रयुक्त शब्दोंके विषय में भाष्यकारने कहा है- ' महान् हि शब्दस्य प्रयोगविषयः, सप्तद्वीपा वसुमती, त्रयो लोकाः, चत्वारो वेदाः, साङ्गाः सरहस्याः बहुधा भिन्नाः, एकशतमध्वर्यु शाखाः, सहस्रवर्त्मा सामवेदः, एकविंशतिधा बाह्र, च्यम्, नवधा आथर्वणो वेदः, वाको- वाक्यम्, इतिहासः, पुराणम्, वैद्यकम् 1

। एतावन्तं शब्दस्य प्रयोगविषय- मननुनिशम्य ' सन्ति प्रयुक्ताः ' इति कथनं साहसमात्रमेव ' ।

( झ ) भाषाभेद देखकर इस गणपति - उपनिषद्को अर्वाचीन बताना भी ठीक नहीं । यह लटका अंग्रेजोंकी देन है, और दास्य- मनोवृत्तिका परिचायक है । रघुवंश में सब सर्गों में सरलता होने पर भी नवम - सर्गकी यमककी कठोरता देखकर भिन्न - कालीनता वा भिन्नकर्तृ कता नहीं होजाती । भाषा तो विषयानुसार बदलती रहती है । वेदमें भी ' भाषायां ' वाले सूत्रोंको छोड़कर शेष सारी लौकिक संस्कृत आ सकती है, जिसके प्रमाण संहिताओं में प्रत्यक्ष हैं । उपनिषद् भी वेद हैं । संहिताओं में प्रायः देवताओंकी उपासना है; उनके लिए भाषा भी वैसी चाहिये; पर उपनिषदें जनताके हितार्थ हैं; अतः भाषा भी उनके लिए सुगम अपेक्षित है । उसमें भिन्न- कालीनता वा भिन्नकर्तृकता नहीं होजाती । एक ही लेखककी रचना 51में एक ही कालमें ( इसमें १५-२० वर्षोका अन्तर नगण्य है ) बड़ा भेद मिलता है । इस पाश्चात्य दृष्टिकोण से तो ऋग्वेदसं ० के प्रथम और दशममण्डल शेष मण्डलोंसे अर्वाचीन सिद्ध होजाते हैं । डा ० सम्पूर्णानन्दजी स्वयं ब्रात्यकाण्डकी भूमिका में अथर्ववेदकी भाषा को देखकर कहते हैं- " कहीं - कहीं भाषा इतनी आधुनिक - सी है कि प्रक्षेपका सन्देह होता है । " यह अंग्रेजी दास्यमनोवृत्ति है । संस्कृत- भाषाके विषय में ऐसी बात वन भी नहीं सकती । एक ही कर्ता मधुर, वैदर्भी रीतिका प्रयोग भी कर सकता है, और कठोर, गौड़ी रीतिका भी । एक ही वारणभट्ट कठिनतर ' हर्षचरित ' को भी वना सकता है, मधुर ' कादम्बरी ' को भी । इससे उपनिषत्काल संहिता- कालसे पीछेका नहीं हो सकता । समाधिसे वह पीछे मिला हो- यह भिन्न बात है, वहाँ प्रतिपक्षियोंके अनुसार पौर्वापर्यका व्यपदेश- मात्र है । कहीं भाषा परोक्षवृत्ति हुई हो; तो वह कठिन होजाती है; कहीं प्रत्यक्षवृत्ति हुई हो, तो वह सरल होजाती है ।

कोई नद - नदी वा समुद्र कहीं कुटिल वा कहीं सरल, और कहीं अतलस्पर्श गम्भीर और दुष्प्रतर वा तलस्पर्श एवं सुखतरणीय हो; कहीं पृथिवी दुर्गम और कहीं सुगम; कहीं संसार दुर्बोध और कहीं सुबोध सम्भव है; इससे भिन्नकालीनता वा भिन्नकर्तृ कता नहीं होजाती । अपौरुषेयतामें ऐसी प्राकृतिकता वा विभिन्नता

पिक है । सृष्टिके एककालमें बने हुए भी पुरुषोंकी आकृति पोरों, कुत्ते में मिलती इसी तरह अपौरुषेय रचना मन्त्रभाग वा ठीक नहीं । विभाषा में एकरूपताका नियम अनिवार्य नहीं ।

52( १८ ) गणेशजीके वाहन मूषकको देखकर भी असम्भवकी आशङ्का करके गणेशको उडाना वा उसे अनार्यदेवता बताना अन्याय है । गणेशजीके देवता होने से उनका वाहन सूषक भी दिव्य समझना चाहिये, लौकिक नहीं । सूर्य कितना बड़ा है, १३ लाख पृथिवी - इतना, पर वह वृश्चिक, मकर, मीन आदि राशियों पर आरोहण करता है । वे वृश्चिक आदि लौकिक विच्छू आदि नहीं होते; किन्तु दिव्य राशि होती है । कुछ लौकिक आकृति वा गुणके सादृश्यसे वही वृश्चिक, मूषक आदि नाम रख दिये जाते हैं । वस्तुतः उस मूषकको भी देवावतार तथा दिव्य समझना चाहिये, लौकिक नहीं । उससे गणेशजीका कोई उपहास नहीं ।

श्रीयास्कने निरुक्तमें देवताओंके वाहनोंकी अनित्यता की चर्चा उठाकर पूर्वपक्षीके अनुसार उन्हें अनित्य वा अप्रमाण ( देवता ) माननेकी शङ्का उपस्थापित की है- ' अपि हि देवता देवतावत् स्तूयन्ते । यथा - अश्वप्रभृतीनि ओषधिपर्यन्तानि, अथापि अष्टौ द्वन्द्वानि ' ( ७१४७ ) । इस शङ्काका समाधान श्रीयास्कने यह किया है - ' माहाभाग्याद् देवताया एक आत्मा बहुधा स्तूयते ' ( ७४ ) ' आत्मैव एषां रथो भवति, आत्मा अश्वः आत्मा आयुधम, आत्मा इषवः, आत्मा सर्वं देवस्य देवस्य ' ( ७ | ४ | १५ ) अर्थात् देवताके १ वाहन एवं आयुध बाण आदि सब उसीका अपना दूसरा रूप है । " यही बात मूषकवाहनके सम्बन्धमें भी समझनी चाहिये - इस मूषकवाहन होनेसे भी गणेशजी अनार्य देवता ि

सकते ॥ वेदमें भी अश्वियोंका वाहन रासभ बताय लेखककी रचके ।

53श्रीगणेशका मङ्गलाचरण

घोड़े, अग्निका रोहित ( मृग ), पूषाका अजा, इस प्रकार मूषक, मयूर आदि वाहनोंसे भी अश्वी आदि की भांति गणेशजी भी अनार्यदेव नहीं होजाते ।

( ख ) यजुर्वेद संहिता में ' आस्ते पशु: ' ( ३।५७ ) चूहेको गणपति का वाहन माना गया है । उणादिकोष ( १।३३ ) में स्वा ० दयानन्द जीने भी ' खु ' ' चूहेका नाम माना है । यद्यपि इस मन्त्रका देवता रुद्र है; तथापि रुद्रसूक्तमें ही ' नमो गणेभ्यो गणपतिभ्यश्च ' ( १६।२५ ) इस मन्त्रमें रुद्रको गणपतिरूपमें वर्णित किया है । यजु ० ११।१५ में रुद्रका गणपतित्व कहा गया है, सो यह ' आत्मा वै जायते पुनः ' ( महाभारत ३।३१३।७२ ) के अनुसार है । इसमें वैदिकता है, अनार्यता नहीं । वैदिक यज्ञकी क्रियामें चूहेके विलकी मिट्टी आव- श्यक होती है ( देखो शतपथ २।१।७ ) । सो उसके अध्यक्ष गणपति की भी यज्ञमें पूजा होती है । ' गणानां त्वा ' ( यजु ० २३।१६ ) मन्त्र से अश्वमेध यज्ञमें उसके नायक अश्वमें गणपतिका आह्वान किया जाता है; अतः गणपति याज्ञिक क्षेत्रमें ही हैं । प्राकृतिक गणपति- प्राणके च्युत होने पर उसका प्रथम प्लेगरूप आघात चूहे पर होता है; उस प्लेग के उपशमनके लिए गणपति - याग ही शास्त्रोक्त उपाय है । अतः गणपति चूहे पर चढ़े रहते हैं कि वह आक्रान्त रहे ।

( ग ) “ रुद्रके रूप गणपतिके प्रणाम करनेसे गणपतिकी महत्ता इसलिए न मानना कि- जबकि यजुर्वेदके उसी सूक्तमें रुद्रके रूप • चोरों, कुत्ते आदिको भी नमस्कार किया गया है " यह कहना भी ठीक नहीं । विष्णुपादोत्पन्न गङ्गाको पूजा तो होती है; पर पादोत्पन्न 54शूद्रकी नहीं । शूद्रकी महत्ता नहीं मानी जाती, पर गङ्गाकी मानी जाती है । वहाँ किरात- रूपधारी रुद्रके गणों को नमस्कार अवश्य आई है, आजकल के चोर आदि को नहीं । न चोर यादिकी पूजा कहीं मिली है, पर गणपतिकी पूजा तो मिली है; तब उनकी महत्ता भी सिद्ध होती है । पर जैसे प्रतिपक्षी रुद्रके वेद - वर्णित विचित्र आकृतिवाले गणों को अनार्य नहीं मानते, वैसे गणपति के लिए भी जान लेना चाहिये |

( घ ) यह भी प्रष्टव्य है कि प्रतिपक्षी लोग सप्तसिन्धु - प्रदेशको आयका आदि देश मानते हैं; वा अनायका? यदि नायका, और बाहर से ही इसमें वैदिककाल में आये; और उनसे आर्यों ने गणपति - पूजा सीखी; तब अनार्य सभ्यता आर्य सभ्यता से प्राचीन सिद्ध होजायगी; और गणेशपूजा वेदकालसे भी प्राचीन सिद्ध हो जाएगी । यदि सप्तसिन्धु - प्रदेश आर्योंका ही आदिदेश था; तो आर्यों के साथ अनार्य भी वैदिककाल में थे या नहीं? यदि थे; तो गणेशपूजा वेदसमकालीन सिद्ध हुई ।

यदि पहले आर्य ही थे; सम्पूर्ण भूमण्डलमें आर्योंकी ही सभ्यता थी, पीछे अनार्य सभ्यता फैली; तो सभी देशों वा स्थानों में किसी न किसी रूपमें गणेशपूजाको फैला हुआ जानकर प्रतिपक्षी को अनुमान करना पड़ेगा कि यह आर्योंकी ही देन है । ' एतद्देश- प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः । स्वं स्वं चरित्र शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्व- मानवाः ' ( मनु ० २।२० ) सब देशों वा जातियोंको सिखलानेवाली जगदगुरु आर्य हिन्दु जाति अनायसे नये अपदेवकी. पूजा सीखे

55श्रीगणेशका मङ्गलाचरण

यह अश्रद्धेय है । वैसा मानना उसका अपमान करना है ।

वस्तुतः अनार्यों में भी यह आर्योंसे ही गई, और वहाँ कुछ भिन्न - रूपमें होगई । जैसेकि - स्त्रियोंकी अवगुण्ठन प्रथा ( पर्दा ) वेद पुराण एवं इतिहास - सम्मत है; यह हम अन्य पुष्प में लिखेंगे । पीछे हुए मुसलमानोंने यह प्रथा हमींसे सीखी; और उसे कठोररूप दे दिया; पर आजकलके नवशिक्षित यह न जानकर उसे मुसल- मानी प्रथा मानने लगे जोकि एक अक्षम्य अपराध है । यह संस्कार उनके चित्तमें पड़ा होनेसे जब इन्हें ब्राह्मणभाग तथा रामायण एवं महाभारत में पर्दा प्रथा मिलती है; तब वे उसे उसमें प्रक्षिप्त मान लेते हैं । पुराणों में मिलने पर वे पुराणों को मुसलमानी कालके मान लेते हैं । यही प्रकार प्रतिपक्षी गणेशपूजामें अपनाते हैं । पर यदि वे अस्तकी दिशावाला ' पश्चिमी ' ( अंग्रेज़ी ) काला चश्मा उतार लें; और अपनी श्रद्धासे संस्कृतकी हुई ' पूर्व ' की आँखों से काम लें; तो उनका भ्रम स्वतः दूर होजावेगा; तब उन्हें कुछका अन्य कुछ न दीख पड़ेगा ।

( १ ९ ) ' विघ्नेश्वर ' गणेशका नाम देखकर " वह गणेश ' विघ्न- विनाशक ' कैसे हो सकते हैं; तब अच्छे कार्यों में विघ्न डालने वाले होनेसे वे अपदेव अतः अनार्योंके देव हुए " यह प्रतिपक्षियों का कहना भी अज्ञानातिशयके कारण है । ' मृगेन्द्र ' सिंह मृगोंका

'

स्वामी ' होता हुआ ' मृगोंका विनाशक ' भी होता है । ' जगदीश्वर ' जहाँ ' जगत्का स्वामी ' है वहाँ ' जगत्संहारक ' भी है । एक ही देवको जब कर्ता, भर्ता और हर्ता भी माना जाता है; तो ' विघ्नेश्वर ' में 56' विघ्नविनाशकता ' की शङ्काका अवकाश ही क्या? क्योंकि — ईश्वर में अनुग्रहके समान निग्रहकी शक्ति भी हुआ करती है । उपक्रमके समान उपसंहारकी शक्ति भी हुआ करती है । ' महेश्वर ' क्या ' संहारकारी ' नहीं?

गणपतिको उपनिषद्रों ' ' सर्वेश्वर ' भी माना गया है । जो सर्वेश्वर है, वह ' विघ्नेश्वर ' भी है | जब कोई ' विघ्नेश्वर का अस्तित्व नहीं जानता, तो ' सर्वेश्वर ' को भी नहीं जानता । विघ्नेश्वर के व्यापारकी आवश्यकता भी पड़ती है । जिस व्यक्तिको सतत दस्त आरहे हों; उसमें विघ्नेश्वर यदि प्रतिबन्ध - स्वरूप विघ्न न डालें; तो वह व्यक्ति मर जाय ।

राजाकी अंगुली कट गई; मन्त्रीने कहा- जो विघ्नेश्वर करता है, ठीक करता है । राजा ने क्रुद्ध होकर मन्त्रीको निकाल दिया । मन्त्री ने उस विघ्नको भी अच्छा समझा । एकवार राजा सेनासे छूट गया । जंगलमें वह अकेला कापालिक लोगोंसे देवीके आगे बलि देनेके लिए पकड़ लिया गया । वलि देनेके समय उसका अङ्ग भङ्ग देखकर उन लोगोंने उसकी बलि नहीं दी । तब राजाको मन्त्रीकी बात ठीक ज्ञात हुई । उसने मन्त्रीको फिरसे बुला लिया । राजाने मन्त्रीको कहा कि तुम्हारा निकालना तो तुम्हारे हकमें ठीक सिद्ध न हुआ । पर उसने उत्तर दिया कि आप तो अङ्गभङ्ग होनेसे बलिदानसे बच गये; मैं आपके साथ ही होता; और पूर्णाङ्ग होने से बलि दे दिया जाता; अतः आप द्वारा मेरा निकालना मेरे लिए विघ्नस्वरूप भी ठीक ही हुआ ' । यह विघ्नेश्वर के विघ्नोंका भी 57लाभ हुआ ।

यदि ' विघ्नेश्वर ' के विघ्न न हों; तो पुरुष अशुभ व्यवहारोंस निवृत्त कैसे हो? उनमें विघ्न ही तो उनसे पुरुपको बचाते हैं । प्रतिबन्धस्वरूप विघ्न होने से ही हमें सुख तथा दुःख भी क्रमशः मिलते हैं । अप्रतिबन्धवश निरन्तर सुख मिले तो हम अभिमत्त होकर मर जाएँ; निरन्तर दुःख मिले; तो हम निराश होकर मर जाएँ । संसारकी गाड़ी एक सुव्यवस्थासे चले; उसमें प्रतिबन्धत्ररूप विघ्न न हो; तो गाड़ी किसी स्टेशन पर रुके ही नहीं, यात्री कैसे चढ़ें वा उतरें । वही विना लाइनक्लियर के कहीं जा टकराये -बड़ी हानि करे ।

राजा बलि के बढ़े हुए वैभवमें वामनावतारका याचनावृत्ति करके उसमें विघ्न डालना वैष्णववृत्ति थी, आर्यवृत्ति थी; वामन अनार्यदेव नहीं थे | हम लोग भी कई कार्य ऐसी शीघ्रता से करने लग जाते हैं; जो हमारी प्राणहानि भी कर सकते हैं । यदि विघ्नेश्वर उसमें विघ्न न डालें; तो हम मर जाएँ । यदि विघ्नेश्वर न हों; और पापकर्मोंमें विघ्न न हों, तो पापकर्म कैसे रुकेँ? हमारा मरण भी बड़ा विघ्न है; पर वह भी हमारा नया संस्करण करके हमारा नवजीवनदाता होता है ।

अतः जगत्की सृष्टि, स्थिति और प्रलयके देव त्रिमूर्ति की तरह विघ्न व्यापारके देवकी भी अवश्य आवश्यकता होती है । अद्वैत एक तत्त्व होने पर भी व्यवहार में सब नामरूप भिन्न हैं; वही गणेश हैं । विघ्न होनेसे कई लाभ भी हो जाते हैं!

58श्रीसनातनधर्मालोक ( १ )

जिस कार्यके शीघ्र कर देनेसे हमें वह लाभ न होता, जो हमारे कार्यमें विघ्न पड़नेसे देरी हो गई, और वह देरी लाभका कारण सिद्ध हुई । अतः विघ्नकारक होनेसे भी विघ्नेश्वर गणेश ' ' अपदेव ' कभी नहीं बन सकते, जैसा कि प्रतिपक्षी कहा करते हैं ।

ईश्वर तभी हो सकता है; जब उसमें अनुग्रह के समान निग्रह - शक्ति भी हो । अतः विघ्नेश्वर विघ्नविनाशक भी हो सकते हैं । असत्कर्मों में विघ्न करनेपर वे शुभसंस्कारोत्पादक भी हुए । शुभ संस्कार विद्या एवं बुद्धिसे होता है; अतः विघ्नेश्वर विद्या एवं बुद्धि के अधिष्ठाता भी सिद्ध हुए । विद्या एवं बुद्धि बाकूसे ही प्राप्त होती है; अतः विघ्नेश्वर वाकूपति भी हुए । वाकूपति होनेसे ही उन्हें वेद एवं गणेश आदि पुराण में ' बृहस्पति ' कहा जाता है, क्योंकि ' वागू हि बृहती, तस्या एष पतिः, एतमु एव बृहस्पतिं मन्यते ' ( छान्दोग्य उ ० १२।११ ) । इसीलिए गणपतिको बृहस्पति भी कहा जाता है— ' वाग् वै बृहती तस्या एष पतिः, तस्मादु बृहस्पतिः ' ( बृहदारण्यक १।३।२० ) ' एष उ एव ब्रह्मणस्पतिः, वाग् वै ब्रह्म, तस्या एष पतिः, तस्माद् ब्रह्मणस्पतिः ' ( १।३।२१ ) । ' वागर्थाविव संपृक्तौ ... पार्वती - परमेश्वरौ ' ( रघुवंश १११ ) बृहती वाकू पार्वतीरूपा है; अतः गणपति भी बाग्रूप होने से पार्वती पुत्र हैं ।

इस प्रकार जब विघ्नेश्वर विद्या एवं बुद्धिके अधिष्ठाता भी सिद्ध हुए; तो ऋद्धि, सिद्धि एवं निधिके दाता होने से निधिपति एवं प्रिय बातोंके अधिष्ठाता होनेसे ' प्रियपति ' भी हुए । अच्छे कार्यों में विघ्नोंके भी विघ्न करनेसे विघ्नविनाशक भी हुए ।

59श्रीगणेशका मङ्गलाचरण

इस कारण ही वे अभीप्सितार्थसिद्धिदायक होनेसे सुरासुर -पूजित भी हुए । तभी तो उनके लिए कहा जाता है- ' अभीप्सितार्थसिद्- ध्यर्थं पूजितो यः सुरासुरैः 1 । सर्वविघ्नच्छिदे तस्मै गणाधिपतय नमः ।

इन्द्रदेवता भी ‘ गणपति ' हैं - यह पहले कहा जा चुका है; वे भी देवताओंके पति हैं । उनको भी मर्यादा - रक्षारणार्थं कई तपस्वियोंकी तपस्या में, वा यज्ञकर्ताओंके यज्ञोंमें भी विघ्न डालना पड़ता है; अतः उन्हें शाप आदि भी प्राप्त हुए । इसी प्रकार समान - कार्यतावश विघ्नेशको भी गणपति होनेसे विघ्नकारकतावश प्रतिपक्षियों से ' अनार्योके देवता ' वा ' गणेश हैं ही नहीं ' इत्यादि गालियाँ सुननी पड़ती हैं; पर जिस प्रकार इन्द्र अपदेव नहीं मान लिये जाते; वैसे विघ्नेश्वर गणपति भी ' अपदेव ' नहीं हो सकते ।

यदि कोई देव सौम्य नियमोंका सञ्चालक है; विघ्नादि कठोर नियमोंका नहीं; तब वह किसी गणका पति वा सर्वेश्वर भी नहीं हो सकता । गणेशजी में विघ्न सञ्चालनकी शक्ति होने से ही वे गणपति तथा सर्वेश्वर भी बने । ' अकृतोपद्रवः कश्चिन्महानपि न पूज्यते ' इसीसे आक्षेप्ता श्रीसम्पूर्णानन्दजीको भी उनके आगे सिर झुकाना पड़ा ।

जोकि — रुद्रकी भान्ति गणपतिको कहीं ' चोर गणपति ' कहा जाता है; वहां ' सब विघ्नोंका चोर ' यह भाव है । जैसेकि— ' नारायणो नाम नरो नराणां, प्रसिद्ध चौरः कथितः पृथिव्याम् । अनेकजन्मार्जितपापचौरं चौराग्रगण्यं पुरुषं नमामि ' । इस प्रकार श्रीकृष्णको ' चोर ' कहा जाता है । गणेशजीको ' उच्छिष्ट गणपति ' 60भी कहा जाता है । वहां वही भाव है जो अथर्ववेदसं ० में ' उच्छिष्टसूक्त ' ( १११७ ) का है कि - ' सर्वान्तेऽवशिष्टः ' । उसी ' उच्छिष्ट ' से सब वेदादिकी उत्पत्ति बताई गई है । सो गणपति ब्रह्म होने से - जैसाकि ' गणपति - उपनिषद् ' में कहा है - वे ' उच्छिष्ट ' भी हैं । जहां गणेशजीको ' पिचण्डिल ' लिखा है, वहां भाव है कि-

( २० ) ' लम्बोदर ' शब्द से डरकर गणपतिको देव ' लम्बोदर ' । इससे गणपति अनार्य देव नहीं हो सकते ।

बताना भी ' भारी भूल ' होगी । जब गरगपतिको परब्रह्म कहा गया है; तब उसमें ' लम्बोदर ' का भाव यह है कि — ' जगन्ति यस्यां सविकासमासत ' अर्थात् सारा जगत् उनके पेट में समाया हुआ है; अतः उनका पेट बहुत बड़ा है । यही भाव इस शब्दमें ओत - प्रोत है । तब डरनेकी आवश्यकता नहीं ।

( २१ ) ' गजमुख ' से डर जाना भी ठीक नहीं । कदाचित् यह डर इसलिए हो कि वे गजमुखसे बोल कैसे सके, और सिर कटने पर गजमुखका सन्धान कैसे हुआ, और उनकी मृत्यु क्यों न होगई '? यह सन्देह भी दूर हो सकते हैं; पर चाहिये श्रद्धा । ब्राह्मणभागात्मक वेदको उठा लीजिये; उस ( शतपथ ब्रा ० ) में १४ | १ | १ | १६,२०,२१,२२, २३, २४ यह स्थल देखना चाहिये । अथव के लड़के दध्यङ्का अश्वियोंने सिर काटकर उसपर घोड़ेका सिर जोड़ दिया । उस दध्यङ के घोड़ेके सिरसे यज्ञपूर्तिकी विद्या अश्वियोंने सीखी । सिर काटने से दध्यङ् मरे भी नहीं, घोड़ेके सिर का वैद्यों द्वारा सन्धानभी होगया, उससे बोलचाल वा विद्या भी 61प्राप्त होगई । कहीं यह बात ब्राह्मणभागकी होनेसे प्रतिपक्षियोंको खटक न जाए; अतः उन्हें संहिता भी देख लेनी चाहिये- ' आथर्वणाय अश्विनौ दधीचे अश्व्यं शिरः प्रत्यैरयताम् ' ( ऋ ० सं ० १।११७१२२ ) ' ध्र वं दधीचो मन आविवासथो अथा शिरः प्रति वाम् ( अश्विनौ ) अश्व्यं वदत् ' ( १।११६ । ε )

फलतः उक्त वैदिक कथाकी भान्ति गज - मुखका सन्धान तथा उससे भाषणशक्तिभी असम्भव नहीं । यह भी स्मर्तव्य है कि— देवता स्वभावसे अमृताशी होते हैं । इसीलिए अथर्ववेदसं ० में कहा है- ' देवाश्च सर्वे अमृतेन साकम् ' ( ११।७१ ( ५ ) । २३ ) ' यत्र देवा अमृतमानशानाः ' ( अथ ० २।१५ ) । ' येनामृतमपां मध्याद् उद्धृतं पूर्वजन्मनि । यतोऽमरत्वं संप्राप्ताः त्रिदिवाः त्रिदिवेश्वरात् ' ( सुश्रुत सं ० उत्तरतन्त्र ३६।३ ) यह उपवेदका वचन है । स्वा ० द ० जीकी संस्कारविधि ( पृ ० ५८ ) में उद्धृत ' देवा आयुष्मन्तः, ते अमृतेन आयुष्मन्तः । ( १।१६।६ ) इस पारस्करगृ ० के वचनसे अमृताशी होने पर सिर कटनेपर भी शरीर मृतक नहीं होता; इसपर राहुको नहीं भूलना चाहिये । इस प्रकार गणपतिके भी देव होनेसे अमृताशी होनेके कारण उनकी प्राणवायु भी निकल नहीं गई । वेदान्तदर्शन ( १ | ३ | ३३ ) के शांकरभाष्यमें कहा हुआ ' ऋषीणामपि [ एवं देवादीनामपि ] सामर्थ्यं न अस्मदीयेन सामर्थ्येन उपमातु युक्तम् ' यह वचन याद रख लेनेसे इस विषय में कोई सन्देह अवशिष्ट नहीं रहता । तब गजके शिरके सन्धानसे यथापूर्व भाषण शक्ति होगई । जैसे जरासन्धकी दोनों सन्धियोंके जरा - राक्षसी द्वारा 62जोड़नेपर उसकी अव्यक्त प्रारण वायु फिर व्यक्त होगई; वैसे गजके शिरके सन्धानसे भी अन्तर्हित प्राणवायु प्रकटरूपमें होगई ।

यह प्रश्न तो व्यर्थ है कि - ' हाथीका सिर बहुत बड़ा, वह छोटे पुरुषकी प्रीवा पर कैसे समा सका । ' गणपतिको मनुष्य- शरीर समझना भूल है । गणपति मनुष्य नहीं, किन्तु देव हैं । देवताओंके शरीर मनुष्य - इतने नहीं होते, किन्तु बहुत बड़े होते हैं । चाहे आप चित्रों में गणेशको हस्व श्राकारवाला देखें, वहां वास्तविकता नहीं होती । १३ लाख पृथिवी — इतना बड़ा सूर्यदेवता भी चित्रमें कितना छोटा होता है । हाथी भी वहांपर दिव्य समझना चाहिये; इस लोकका प्राणी नहीं । तब ' गजेन्द्रवदनं देवं ' ( भविष्य पुराण प्रतिसर्गपर्व द्वितीयभाग २०।१४० ) ' मूषकस्थं महाकार्यं ' ( २०।१४१ ) इत्यादि वचनों में कोई विप्रतिपत्ति नहीं रह जाती ।

तब क्या अश्वशिरकी आकृतिसे वैदिक ऋषि दध्यङ 7 को भी ' अनार्य ऋषि ' मान लिया जाएगा? नर सिंहकी संकीर्ण आकृति वाले नृसिंहावतारको भी, मत्स्य, कूर्म, वराह तथा हयग्रीवकी आकृतिवाले विष्णुको भी ' अनार्यदेव ' मान लिया जायगा? तुरंग- वदन किन्नरोंको भी क्या अनार्ययोनि मान लिया जायगा? ऋव्शा ० सं ० ( ८ । ८५।७ ) के अनुसार रासभवाहनवाले अश्वियोंको, तथा कृष्ण - रंग वाले श्रीकृष्ण तथा श्रीजगन्नाथमूर्तिको भी अनार्यदेव मान लिया जायगा? वस्तुतः गणनायकका गजमुख होना स्वाभाविक हो होता है — यह हम ' गणेशचतुर्थी ' पर्वमें लिखेंगे ।

अतः ‘ गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्ग न च वयः ' के 63अनुसार गणेशजीकी पूजा भी उनके ईश्वरत्वके कारण है, आकृति के कारण नहीं । बाहर से नारियलकी भी आकृति कठोर और कुत्सित है, पर भीतर सुन्दर है । बेरकी बाहिरसे तो आकृति अच्छी है, पर भीतरसे कठोर है । इस आकृतिसे आर्यानार्यता नहीं हो जाती, जैसाकि प्रतिपक्षी कहते हैं । ' पश्य मे पार्थ! रूपाणि ... नानावर्णाकृतीनि च ' ( गीता १११५ ) इसमें भगवान्ने अपना नाना आकृतियोंवाला विराट् रूप दिखलाया था उसमें ' गजानन ' मूर्ति भी है ।

( २२ ) ३३ देवताओं में ' गणेश ' के न आनेसे भी गणेशजी अवैदिक नहीं होजाते । नहीं तो उनमें सरस्वती, ब्रह्मणस्पति आदि देवताओंके भी न होनेसे वे भी अवैदिक देवता होजाएँ; पर यह बात वादियोंको भी अनिष्ट है । गणेशजीका जब सर्वत्र प्रचार है; तब स्पष्ट है कि — भूमण्डलभर में फैले हुए आर्योंके मान्य वेदादि शास्त्रोंकी ही यह देन है । ' गजानन ' शब्द भी चारों वेदोंके अन्तिम अक्षरोंको संकेतित करता है— ' ऋग ' से ' ग ', ' यजुः ' से ' जा ', ' सामन् ' से ' न ', और ' अथर्वन् ' से ' न ' । तब यह वेदसे प्रकट हुआ ' गजानन ' देव अवैदिक वा अनार्य कैसे होसकता है? हां, अनार्यो ने हमसे सीखकर उसे कुछ विकृतरूपमें कर दिया हो; तो आश्चर्य नहीं । प्रतिपक्षियोंके एतद्विषयक अनुमान प्रायः बेसिर - पैरके एवं निर्मूल हैं ।

' विघ्नराज! क्षमस्व ' यह गणपतिपूजाके अन्तमें कहना ' आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् । ' पूजां चैव न जानामि 64क्षमस्व परमेश्वर! ' की भान्ति पहले आवाहन करके फिर विसर्जनार्थ है, गणेशकी अनावश्यकतार्थ नहीं । यदि प्रतिपक्षिगण अंग्रेजी दृष्टिकोण छोड़ दें; और पौरस्त्य श्रद्धा ले लें; तो ' श्रद्धया सत्यमाध्यते ' ( यजुः १६।३० ) उन्हें सत्य मिल जायगा । फिर वे भ्रम में न पड़ सकेंगे ।

( २३ ) सर्वत्र मङ्गलाचरणमें गणेशको न देखकर गणेशपूजन अर्वाचीन वा अवैदिक नहीं होजाता । स्वस्तिवाचनको प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि वह वैदिक है । ' स्वस्ति न इन्द्रो ' यह स्वस्तिवाचन का आदिम मन्त्र है; इसीसे स्वस्तिकरूपमें गणेशजीकी उत्पत्ति हुई- यह हम पूर्व दता चुके हैं । सो जहां स्वस्तिवाचन हो रहा हो; वहां समझना चाहिये कि — वह गुप्त वा संक्षिप्त गणेश - पूजा होरही है 1

दूसरी गणेशकी मूर्ति है ' ॐ ' । ' ओम् ' जो वर्णसमुदाय है, उसमें सामने हल् प्रत्याहार न होनेपर वा अच् पड़े होनेपर ‘ म् ' को अनुस्वार नहीं हो सकता । और किसी समय में उसकी आकृति भिन्न भी हो सकती है । पर ' ॐ ' वस्तुतः गणेशजीकी मूर्ति है । आरम्भिक हिस्सा गजका शुण्डादण्ड है, ऊपरका अनुनासिक बालचन्द्र है I

। दाहिनेमें गोलाकार मोदक है । किन्होंके मतानुसार प्लुतचिह्न ' ३ ' मूषक है । इसे हम पूर्व संकेतित कर चुके हैं; कुछ अन्तमें सम्भवतः ‘ ॐकारका महत्त्व ' निबन्ध में लिखेंगे । सो जो लोग सामने कुछ न होनेपर वा सामने अच् होनेपर अनुस्वारवाला ' ओं ' वा ' ॐ ' लिखते हैं; यदि वर्णसमुदाय ' ओम् ' उन्हें इष्ट है; तो वे व्याकरणकी दृष्टिले अशुद्धि करते हैं; क्योंकि जब तक सामने हल् 65प्रत्याहार न हो; तब तक अनुस्वार नहीं हो सकता; ॐ इस प्रकार अनु- नासिक तो हो ही नहीं सकता | ' ॐॐ ' इस आकृति में तो ' ओ ' की मात्रा भी नहीं; अतः स्पष्ट है कि यह ' ॐ

' ' ओम् ' नहीं; किन्तु गजानन - गणेशकी प्ररणवाकार संक्षिप्त मूर्ति है, जैसाकि ' गणेश- तापिनी उपनिषद् में संकेतित किया है- ' ततश्च ॐ इति ध्वनिरभूत्, स वै गजाकारः ’ । ‘ ॐकाररूपी भगवान् यो वेदादौ प्रतिष्ठितः ' ( गणेशपुराण ) । अतः ' ॐ ' वा ' ग्रों ' लिखनेवाले महाशय गुप्तरूपसे गजानन - गणेशका मङ्गलाचरण वा उसकी मूर्तिपूजा कर रहे हैं; क्योंकि मूर्तिपूजा भी वैदिककालसे ही आ रही है । यह हम ' श्रीसनातनधर्मा- लोक ' के चतुर्थ पुष्पमें स्पष्ट कर चुके हैं । गणपति अथर्वशीर्षमें भी लिखा है- ' अनेन गणपतिमभिषिञ्चति, स वाग्ग्मी भवति ' यहांपर गणपतिकी मूर्तिपर अभिषेक करनेका उल्लेख है ।

इसपर ‘ वैदिकधर्म'के सम्पादक ' श्रीपाददामोदर सातवलेकर ' महाशय ' पुरुषार्थ ' के गणेशाङ्कके दूसरे भागके पृष्ठ ७ पर लिखते हैं - ‘ गणपति - अथर्वशीर्षका काल । इसमें गणपति की मूर्तिपर अभिषेक करनेका उल्लेख है, अर्थात् मूर्तिपूजा शुरू होनेपर यह ( अथर्वशीर्ष ) बना है - ऐसा कह सकते हैं, किन्तु कई वर्ष पूर्व तक ‘ वैदिककालमें मूर्तिपूजा नहीं थी, वह बादमें शुरू हुई, ऐसा कई विद्वानोंका रूढ ज्ञान था; परन्तु जैसा - जैसा वेदोंका अनुसन्धान विशेष होने लगा; वैसा - पैसा उपरोक्त विद्वानोंके ज्ञानमें अन्तर पड़ने लगा है । अब अनेक यूरोपियनों को भी ऐसा जँच रहा है कि ऋग्वेदकालमें भी मूर्ति बनाकर, उस मूर्ति की रथमें सवारी निकालनेकी और पुष्पों एवं वस्त्रालङ्कारोंसे उस मूर्तिकी 66तथा रथकी पूजा करनेकी प्रथा थी । ' इन्द्रकी मूर्ति इतना मूल्य लेकर दूरंगा और इतना मूल्य मिला; तो भी नहीं दूंगा ' ऐसे मन्त्र मिल जाने से इन्द्रादि देवों की मूर्तियाँ बनाई जाती थीं, यह मत बहुधा सर्व विद्वानों को मान्य होने लगा है । तदनुसार वेद में सर्व देवोंके वर्णन हैं, वे देवता विग्रहवान् होने जैसे ही हैं । उन वर्णनोंकी उपपत्ति उनकी मूर्तियाँ माने बिना नहीं लगती । ऐसे अनेक कारणों से ' वैदिक काल में मूर्तिपूजा नहीं थी ' यह मत अब उतना मान्य नहीं रहा । इसलिए गणपति पर अभिषेक करनेका उल्लेख होनेसे ' यह अथर्वशीर्ष अर्वाचीन है ' ऐसा नहीं कह सकते । "

फलतः यह गणेशजी की प्रणवाकार मूर्ति है । तदनुसार हमने भी वैदिक मङ्गलाचरणमें सबसे पूर्व श्रीगणेशजीकी संक्षिप्त मूर्ति ' ॐ ' देकर श्रीगणेशजीका मन्त्र - त्राह्मणात्मक वेदोंके मन्त्रोंसे मङ्गलाचरण किया है । इस निबन्धमें श्रीपं ० दुर्गादत्तजी त्रिपाठी तथा श्रीकृष्णजीके निबन्धसे भी कई निर्देश प्राप्त किये गये हैं । गणेशजीके १२ पौराणिक एवं वैदिक नामों का रहस्य हम ' गणेश- चतुर्थी

' ' पर्व में कहेंगे ।

हिन्दुधर्म का आचार होनेसे हमने श्रीगणेशजीका मङ्गलाचरण किया । उस पर जो प्रतिपक्षियोंने उनकी अवैदिकता फैला रखी है, उसका समाधान कर दिया । ' गणानां त्वा ' इस यजुर्वेदसं ० ( २३ | १ ९ ) के गणपतिके मन्त्रके महीधरभाष्य - प्रोक्त अर्थसे आज की जनतामें बहुत बड़ा भ्रम फैला हुआ है, यहाँपर स्थान न होने से हम उसका विशदीकरण सम्भवतः ' गणेशचतुर्थी ' में करेंगे 1 । अब पहले हिन्दुधर्मके प्रसिद्ध आचारोंका निरूपण तथा उनका वैज्ञानिक रहस्य विवृत किया जावेगा, फिर हिन्दु - पर्वोका निरूपण होगा ।

67हिन्दुधर्मके प्रसिद्ध आचार

( ३ ) शिखा की वैज्ञानिक - रहस्यपूर्णता ।

' सदोपवीतिना भाव्यं सदा बद्धशिखेन च ।

विशिखो व्युपवीतश्च यत् करोति न तत्कृतम् ' ॥

( कात्यायन स्मृति १४ )

श्रीगणेशके मङ्गलाचरण तथा उनका वैदिक देव होना वेदादि से सिद्ध करके हम हिन्दुधर्मके प्रसिद्ध श्राचार ' शिखा ' पर पहले लिखना उचित समझते हैं, क्योंकि - हिन्दुजातिका बाह्य मुख्य चिह्न शिखा है | आजकलके हिन्दु नवयुवक शिखाके रखनेसे बहुत घबराते हैं, और उसके रखनेके वैज्ञानिक प्रयोजन पूछा करते हैं ।

लार्ड मैकाले अनुयायी ।

( १ ) सन् १८३५ में लार्ड मैकाले हिन्दुस्थानमें अंग्रेजी शिक्षाकी योजना बना रहे थे I

। उस समय उनके ये शब्द थे—

" हमें अपनी सब शक्ति लगाकर अवश्य ही ऐसा उद्योग करना चाहिये-- जिससे इस देशमें एक ऐसी जनश्रेणी पैदा होजाय, जो हमारे और उन करोड़ों व्यक्तियोंके बीच मध्यस्थका काम करे, जिनपर हम शासन कर रहे हैं । अंग्रेजी शिक्षा - द्वारा एक ऐसा मनुष्यदल तैयार होगा, जो हाड़, मांस और लहूमें भले ही हिन्दुस्तानी रहे, किन्तु आचार - विचार, खान - पान, रुचियों, रहन- सहन तथा दिल - दिमाग और बुद्धिमें बिल्कुल अंग्रेज होगा ' ।

( Quoted in C, H. I, Vol VIP, 111 )

68यह सोचकर लार्डने भारतवर्ष में अंग्रेजी शिक्षा प्रारम्भ की । उसका फल उसने अपने पिताको लिखा था कि वह शिक्षापद्धति जिसका आरम्भ भारतीयोंको दोगले अंग्रेज बनाने के लिए किया गया था, कितनी सफल होरही है । लार्डने लिखा- ' जो भी हिन्दु अंग्रेजी - शिक्षा ग्रहण कर लेता है, वह अपने धर्म में सम्बी श्रद्धा खो बैठता है । कुछ लोग केवल दिखावे के लिए उसे मानते हैं, अधिक- तर एकेश्वरवादी और कुछ ईसाई होजाते हैं । यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि — यदि हमारी शिक्षाकी योजनाका पूरी तरह अनुसरण किया गया; तो अबसे तीस वर्ष बाद हिन्दुस्तान में अच्छे - अच्छे घरानों में एक भी हिन्दु मूर्तिपूजक नहीं रहेगा । '

' भारतवर्षका बृहद् इतिहास ' ( प्रथम भाग ) पृष्ठ ६३ में आर्य- समाजके अनुसन्धाता श्रीभगवद्दत्तजी ने लिखा है- ' लार्ड वेण्टिङ्क उन दिनों भारतका गवर्नर जनरल था । उसने मैकाले के प्रस्तावके साथ पूर्ण सहानुभूति प्रकट की । अन्ततः मैकालेकी नीतिके अनुसार भारतमें शिक्षाका प्रकार चलने लगा । अंग्रेज और जर्मन अध्यापक और महोपाध्याय भारत में आने लगे । उन्होंकी बताई विद्या • वास्तविक विद्या मानी जाने लगी । जो कोई सज्जन, भारतीय ढंगकी बात करता था; उसे तर्क - विरुद्ध, विद्या- विरुद्ध, इतिहास - विरुद्ध, बुद्धिविरुद्ध, प्रमाण- शून्य कहानी, अथवा मिथ्या कथा कहा जाने लगा । ये शब्द विदेशीय लेखकों और अध्यापकोंने अधिकाधिक प्रयुक्त किये ।.... इसमें सन्देह नहीं- मैकालेने भारतीयताको नष्ट करनेकी जो कूटनीति बर्ती थी, वह प्रभावशालिनी सिद्ध हुई ।

In English

The Vedic Origins and Authority of Ganesha

This text argues that the worship of Ganesha (Vinayaka) is a legitimate Vedic practice rather than an un-Vedic one. It cites various ancient scriptures, including the Yajurveda and various Smritis, to demonstrate that Ganesha is closely linked to deities like Rudra and Brihaspati.

This chapter answers

  • Is ganesha worship mentioned in the vedas?
  • Relationship between rudra and ganapati?
  • Why is vinayaka worshipped to remove obstacles?
  • Is ganesha considered a vedic deity?

Also written: Shriganeshaka, Mangalacharana, Shriganeshaka Mangalacharana, श्रीगणेशका मङ्गलाचरण

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 11–68 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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