पञ्चम सुमन · प्रकरण 2

शिखाकी वैज्ञानिक - रहस्यपूर्णता

मुद्रित पृष्ठ 69–118 50 पृष्ठ

69आज भारतमें अंग्रेजीशिक्षा प्राप्त लोगोंकी एक श्रेणी है, जो विचार और रुचि आदिमें आमूलचूल अंग्रेज है । उस श्रेणीमें भारतके अनेक गण्यमान्य नेताओं की गणना हो सकती है । '

इसी पाश्चात्य शिक्षा में दीक्षित लोग यूरोपकी सभ्यताके दास बन चुके हैं । इन्हें सिर पर चोटी रखनेसे लज्जा आती है । गले में यज्ञोपवीत पहननेसे भार दीखता है । देवदर्शनार्थ देवमन्दिरमें जाना इनके मतमें मूर्खताकी पराकाष्ठा है । चन्दन आदि अन्य हिन्दुचिह्न रखते घबराते हैं । नाम भी अपने जे. पी. चौधरी आदि अंग्रेजी शैलीके रखते हैं । शिखा यज्ञोपवीत आदि धार्मिक चिह्नोंके लिए जो श्रद्धा एक गँवार भारतीय में है; वह बी ० ए ० ग्रैजुएट में नहीं ।

यह लोग पवित्र संस्कृत भाषाको मृतभाषा ( Dead- Language ) कहते हैं । अपने आपको इस देशके आदिम निवासी न मानकर वैदेशिक मानते हैं । भारतीय होते हुए भी भारत से उनका प्रेम नहीं रहा । इस सारे अनर्थका मूल पाश्चात्य शिक्षा है | जिस कामको औरङ्गजेबकी तलवारकी धार न कर पाई, वही इस पाश्चात्य शिक्षासे अनायास होरहा है । लोगोंका अपने धर्मसे विश्वास, अपनी भाषा एवं प्राचीन वेष - भूषामें आस्था दिनों- दिन घटती जा रही है । अंग्रेज चले गये पर अंग्रेजियत सुव्यवस्थित है । इसीलिए आज शिखा तथा यज्ञोपवीत आदिके प्रयोजनोंको पूछने के लिए तरह - तरहके प्रश्नोंकी झड़ी लगा दी जाती है । उस जिज्ञासाकी पूर्त्यर्थ हमारी यह पुस्तक है । इसमें हम प्राचीन- 70अर्वाचीन सब प्रकार के विचारोंका सङ्कलन करेंगे ।

( २ ) हमारे प्राचीन लोग पहले समय से धार्मिक चिह्नोंके प्रयोजनोंको न बताकर उनका अवलम्बन ' धर्म ' कह दिया करते थे । उनका आशय यह था कि - प्रयोजन बता देने पर नवीनता - प्रिय लोगों के दृष्टिकोणमें उस नियम में कोई नवीनता नहीं रह जाती । उन लाभोंको मानकर भी उन नियमोंके अवलम्बनमें उपेक्षा हो जाया करती है । इसका उदाहरण भी देख लीजिये । धार्मिक नियम यह था कि- रजस्वला स्त्रीका स्पर्श नहीं करना चाहिये । धार्मिक दृष्टि स्थापित करनेवालोंने इस नियमका यथावत् पालन किया; परन्तु नवशिक्षितोंने जब इस अस्पृश्यता के प्रयोजन पूछे और उनको उन्हें बतलाया गया; तब वे कहने लगे ये तो ठीक हैं, परन्तु हम उस स्त्रीका स्पर्श क्यों न करें? उसके द्वारा रोटी क्यों न पकवावें? हम उसका अन्य उपयोग न लेंगे; परन्तु यह बात भी कुछ समय चली । फिर उसका विपरीत उपयोग होने लगा । फिर यथापूर्व उपयोग करके हानियोंका विचार हटा दिया गया ।

इस प्रकार सनातनधर्मानुसार हिन्दुजातिके सिर पर शिखा रखना वास्तव में अदृष्टमूलक ही है, उसमें दृष्ट प्रयोजनोंकी आव- श्यकता सर्वथा नहीं; पर आजकलके अविश्वासी लोग बिना प्रयोजन जाने शिखा रखना छोड़कर सनातनधर्मको हानि पहुँचानेवाले न सिद्ध होजावें, यह विचारकर उनकी जिज्ञासापूर्त्यर्थं यथाशक्ति प्रयत्न किया जाता है ।

71शिखा वाह्य चिह्न

( ३ ) शिखा हिन्दुजातिका उपयोगी बाह्यचिह्न है । यद्यपि ' न लिङ्ग ' धर्मकारणम् ' ( मनु ० ६।६६ ) चिह्न धर्मका कारण नहीं होता; तथापि यदि चिह्नमात्र भी न हो, तब लोकलज्जा आदिके न होने से पुरुष सर्वथा कर्तव्यहीन हो जावे । इस चिह्नके होनेसेही हिन्दुओं में आज भी सन्ध्यातर्पण आदि कर्म सुरक्षित हैं । इस कारण उक्तवचन पर कुल्लूकभट्टने कहा है- ' एतच्च धर्मप्राधान्य - बोधनाय उक्तम्, न तु लिङ्ग - परित्यागार्थम् ' अर्थात् धर्मको प्रधानता देनेके लिये उक्त वचन है; धार्मिक चिह्नको छोड़ देनेके लिए यह नहीं । आजकल हिन्दु लोग अपने चिह्न भी छोड़ रहे हैं, साथ ही धर्म भी छोड़ रहे हैं । कैसे जाना जाय कि ये हिन्दु हैं? मस्तकसे तिलक मिटा दिया गया है, यज्ञोपवीत हटा दिया जा रहा है, धोतीसे लांग हटाई जा रही है; अब शेष बचा हुआ शिखा ( चोटी ) का चिह्न भी हटाया जा रहा है । शोक!!! क्या दशा होगी हिन्दुजातिकी? यह हिन्दु है या मुसलमान - यह कैसे जाना जाय?

( ४ ) मुसलमान अपने चिह्नोंको नहीं छोड़ते; पर ये हिन्दु सुधारक तो अपने चिह्नोंको छोड़कर मुसलमान - जैसे बन बैठते हैं । तब तो हिन्दु - मुसलमान - भेद बतलाने के लिए अश्लीलताका अनुसरण क़रना पड़ेगा, जैसेकि एक ग्रामीण हिन्दुने किया था । ' एक ग्रामीण ( गाँवका ) हिन्दु हिन्दु - प्याऊमें जल पीनेके लिए पहुँचा । किसी हिन्दु - चिह्नके न होनेसे जल पिलानेवालेने ' पूछा कि तू कौन है? हिन्दु है वा मुसलमान? ( क्योंकि मुसलमान आदिको सीधा जल 72न देकर नली द्वारा दिया जाता था ) उसने उत्तर दिया कि — हिन्दु । तब जल पिलाने वाले ने कहा कि कैसे जाना जाय कि तुम हिन्दु हो? तुम्हारा हिन्दुत्व- चिह्न कोई भी तो नहीं दीख रहा!

उस निर्लज्जने अपनी इन्द्रियको निकालकर दिखला दिया कि - देखो - यही हिन्दुत्वका चिह्न है । जल पिलाने वालेने जब उसकी ढिठाई पर बहुत डांटा; तब वह गाँवका हिन्दू कहने लगा कि- आजकल इन्द्रिय ही हिन्दुत्वका चिह्न है । हिन्दुओंने चोटी कटवा डाली, जनेऊ को सदा के लिए धोवीको दे दिया, तिलक मिटा दिया, लांगको खोल दिया, हिन्दु - वेषको विदा कर दिया । अब वे चिह्न तो गये । इस अंशमें तो हिन्दु - मुसलमान बराबर होगये । अब भेद रह गया है केवल इन्द्रिय में; ' सुन्नत ' से रहित इन्द्रिय वाला हिन्दु, और ' सुन्नत ' - सहित इन्द्रिय वाला मुसलमान - यह भेद है । आजकल नान - मुसलिम ही हिन्दु है । इसीलिए मैंने अपना हिन्दुत्व का चिह्न अपनी इन्द्रिय दिखलाई है । तुम गुस्सा क्यों करते हो?

उस समय वहाँ दूसरे हिन्दु भी इकट्ठे होगये थे । उस गाँव वालेकी ढिठाई होनेपर भी सवने उसकी बात सच्ची मानी; और समझदारोंने आजकलकी हिन्दुजातिपर खेद प्रकट किया । इस प्रकार सन् १६४५ की होलीमें एक नगर में होली के अवसर पर एक पुरुषने रंग डालने वालोंको कहा कि - ' मैं मुसलमान हूँ, खबरदार! मुझ पर रंग न पड़े ' । उस पुरुषका चोटी जनेऊ नहीं था - यह उसने दिखला भी दिया । वह पुरुष पतलूनधारी था । पर होली में मस्त लोगोंने उसकी पतलून खोल ली । उसका मुसलमानी चिह्न 73' सुन्नत ' न देखकर उन लोगोंने उसे रंगसे सराबोर कर दिया । उसके असत्य - भाषणके दण्डस्वरूप उन्होंने उसे पतलून नहीं दी । तब वह कोटसे अपनी लज्जा ढककर वहांसे भागा । वस्तुतः इन चिह्नोंको दूर करानेवाले पाश्चात्य - शिक्षा से दीक्षित, लार्ड मैकालेके शिष्य सुधारक लोग ही हैं; जिन्होंने पाश्चात्य शिक्षा पाकर हिन्दु- जाती चिह्नोंसे घृणा कर ली ।

परन्तु लार्ड मैकालेकी दूरदर्शिता उसके अपने विचार से भी बढ़ गई । अव तो यह हिन्दु जनश्रेणी अपने चिह्नोंको छोड़ती हुई रूप- रंगमें भी ' भारतीय ' नहीं दीखती । अंग्रेज- मुस्लिम रमणियोंको स्वीकार करती हुई रुधिरसे भी वैदेशिक हो रही हुई दीख रही है । अंग्रेजों के चले जाने पर भी अंग्रेजियत नहीं गई । खेद!!! इन्हीं लार्ड मैकालेके मानसिक शिष्योंको अपने शिखा आदि चिह्न छोड़ता हुआ देखकर अन्य लोगोंने भी उनका अनुसरण किया । आज भी पूरा - पूरा तो उनका प्रभाव नहीं हुआ; यतः चोटी सर्वथा तो नहीं हटी; आज भी बहुतसे शिखा सूत्रधारी हैं ही । थोड़े लोगोंने शिखा छोड़ी है; उससे उनकी कहीं - कहीं हानि भी दिखाई पड़ जाती है । बम्बई में हिन्दु - मुसलमानोंकी लड़ाई में अनेक हिन्दु हिन्दुओं के द्वारा ही मार दिये गये जो चोटी न होने से हिन्दुओंसे मुसलमान समझ लिये गये थे ।

( ५ ) परन्तु कई लोग यह कहते हैं कि - ' शिखा के न होनेसे हम साम्प्रदायिक कलहोंमें मुसलमानों के समूह में निश्चिन्त होकर विचरेंगे; और उनसे हानि न प्राप्त करेंगे । ' पर इस प्रकारके 74पुरुष दूर से ही प्रणाम योग्य हैं । बहुत खेद की बात है कि इसी शिखाके बचावकेलिए महाराणा प्रतापने तथा महाराष्ट्र - राष्ट्रपति शिवाजीने, इस प्रकार दूसरे राजपूतोंने प्राणोंको दाँव पर लगा दिया था, गुरु गोविन्दसिंहके लड़कोंने और बालक हकीकतरायने अपने प्राणों की आहुति देने में भी देरी नहीं लगाई; उसी शिखाको यह लोग बिना ही किसी अत्याचारके स्वयं ही काट रहे हैं!

ऐ अंग्रेजी राज्य! हम तेरी मुक्तकंठसे प्रशंसा करेंगे । यदि आज मुसलमान सम्राट् औरङ्गजेव होता, तो वह हिन्दुओंकी शिखाके काटने के लिए किये गये अपने अत्याचारोंकी स्वयं ही निन्दा करता और कहता कि- मैंने अत्याचार करने पर भी हिन्दुओं की शिखा कटवाने में सफलता प्राप्त नहीं की; और तू ( अंग्रेजी - राज्य ) ने बिना ही अत्याचार एवं बिना ही उसके रुकवानेके प्रचारके, हिन्दुओंसे चोटी छुड़वा दी, बल्कि भारत- वर्ष से तेरे निकल जानेपर भी हिन्दु तथा उनके नेता भी आज भी उस चोटीका सिरपर रखना हास्यास्पद एवं ' जंगलीपन ' समझते हैं । तभी तो ' टुडे स्मृति ' में अपटूडेट ' फैशनाचार्य'ने कहा है- ‘ न शिखां धारयेत् प्राज्ञः टेनिसे हास्यकारिणीम् ' ।

आजकलके शिखाकी उपेक्षा करनेवाले जानते हैं कि - इसी शिखाके ही कारण हिन्दु जाति आज भी जीती है, धार्मिक परतन्त्रताको प्राप्त हुए भी सांस ले रही है । शिखा - विहीन जातियाँ क्रमसे नाम भी विलुप्त करवा बैठी, और करवा लेंगी । यदि आप अपनी शिखा कटवाते हैं; तो शिखा कटवाने वाली अन्य 75जातियोंकी तरह आप भी कट जावेंगे । ' धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ' ( मनु ० ८।१५ ) । इस शिखाके महत्त्वको आप ठगे जाकर शिखाको काट देते हैं, वे अवश्य भारी भूल करते हैं; पीछे उन्हें पछताना पड़ेगा । शिखाके ही एकछत्र राज्यकी छायामें समस्त हिन्दुजातिकी एकता हो सकती है ।

शिखा सर्वव्यापक |

( ६ ) वैसे तो शिखासे कोई किसी भी रूपमें छूटा हुआ नहीं चोटी को प्रकारान्तरसे रखते ही हैं । यूरोपियन फौजियोंके टोपी के ऊपर भी रुपहरी वा पीतलकी चमकदार शिखा हुआ ही करती है । इस प्रकार हैट पर भी शिखासदृशता दीखती है । राजाओं वा सेनानायकों के सिरों पर सुन्दर पक्षियोंके पंखकी बनाई पटके पर रुपहरा वा सुनहरा गुच्छा शिखा ही तो हैं । किन्हीं के पटके ( साफे ) पर दीख रहा हुआ तुर्रा अथवा पटकेके बीच में पड़ा पठानी कुल्ला ऊँची शिखाका ही तो बोध कराते हैं । किन्हीं में बन्द होना न सहती हुई - सी, माथेके अग्रिम केशोंके रूपमें परिणत हो जाती है । परन्तु वैध शिखा न होनेसे वैसे लोग उससे होने वाले लाभको प्राप्त नहीं कर सकते । आजकल के अ ंग्रेजी बाल भी जिसमें पिछले बाल कान तक काटे जाते हैं, 76शेष सब रखे जाते हैं— शिखाका ही तो प्रकार है । दाक्षिणात्य लोग इससे उल्टी शिखा रखते हैं, सिरके अग्रिम बालोंको काट देते हैं; शेष सब बालोंकी उनकी चोटी होती है ।

न केवल मनुष्यों में ही, अपितु पक्षियों में भी शिखा दीखती है । मोर ' शिखी ' नामसे और कुक्कुट ( मुर्गा ) ' ताम्रचूड ' नाम से प्रसिद्ध हैं ही । काष्टकूट पक्षीकी शिखा कैसी सुन्दर होती है । राज - सर्पोंके सिरपर भी प्रकृतिसे दी हुई शिखा सुनी जाती है । पशुओं के सिर पर उभरे हुए सींग उनकी शिखाका बोध कराते हैं । शिखाके कारण ही ये पशु - पक्षी सौन्दर्य एवं कई प्रकारके गुणोंको धारण करते हैं । अग्निदेवता भी शिखा धारण करने से ' शिखी ' कहलाते हैं, जिनका उपासक सारा संसार है । इस विषय में आगे स्पष्टता की जायगी ।

इस प्रकार वृक्षों में प्रत्येक फलके, प्रत्येक शाखा एवं पुष्पके सिर पर भी शिखा दीखती है । शिखरी ( पहाड़ ) का शिखर भी शिखा होने से ही होता है । ' शिखाया ह्रस्वश्च ' ( ५।२।१०७ ) इस पाणिनिसूत्र से शिखा शब्दको हस्व और ' र ' प्रत्यय करने पर ' शिखर ' बनता है, जिसका अर्थ है ' शिखा वाला ' । शिखा सबसे ऊँची होती है, यह उसकी श्रेष्ठताका प्रमाण है । ' चोटीके विद्वान् ' यह हिन्दीमें ' मुहावरा ' रूपसे प्रयुक्त वाक्य भी शिखाको मुख्य बता रहा है । इस तरह स्थावर जङ्गमात्मक जगत् में जहाँ - तहाँ शिखाका साम्राज्य जिस - किसी रूपसे दीखता ही है । परन्तु हिन्दु लोग नियमपूर्वक शिखाको रखते हैं और उसे धार्मिक चिह्न मानते हैं 77और उससे लाभ उठाते हैं । अन्य जातियाँ नियमपूर्वक शिखाको चिह्नके साथ ही साथ जातीय संघटन एवं एकता प्रदर्शित करती हुई विशेष लाभ भी पहुँचाती है ।

संस्कार- महिमा

( ७ ) संस्कारका लाभ जगत्प्रसिद्ध है । जब सुवर्ण खानसे निकलता है, तो मलिन होता है । खानसे निकले हुए सोनेका जब उसे सु - वर्ण किया जाता है । संस्कार के बिना कृत्रिम और अकृत्रिम सोनेका परीक्षण भी नहीं हो सकता । संस्कार - द्वारा ही सभी पदार्थ व्यवहारोपयोगी होते हैं I

। किसी भी वस्तुमें दोषनिराकरणपूर्वक गुणोंका उत्पन्न करना ही उसका संस्कार कहा जाता है । जब तक किसी भी वस्तुका संस्कार नहीं होता; तब तक वह सदोष और गुणहीन रहती है । संस्कार होने पर ही उसके दोष दूर होकर गुणोंका आविर्भाव होजाता है । हीरेको जब तक शानमें नहीं खरादा जाता; तब तक हीरेका न तो मट्टीका आवरण दूर होता है न ही उसमें चमक आती है । इस प्रकार शारणसंस्कारके बिना तलवार की न धार तेज होती है, न ही उसमें काटनेकी शक्ति आती " है । जब ये वस्तुएँ शानपर चढ़ाई जाती हैं, और इनका संस्कार 78किया जाता है; तभी उनके उक्त दोष दूर होकर उक्त गुण प्रकट होते हैं । जड वस्तुकी तरह घोड़ा आदि चेतन पदार्थोंके भी दोष दूर करने और गुणों के उत्पन्न करनेकेलिए संस्कार अपेक्षित होता है ।

फलतः सांसारिक सब पदार्थोंको यदि उपयोगी करना इष्ट हो तो उस समय संस्कारकी अपेक्षा होती है । इस प्रकारकी कोई वस्तु जगत् में नहीं मिलती; जिसका कार्योपयोग के लिए संस्कार न किया जाता हो । इस प्रकार संस्कार से ही मनुष्यका भी दृष्ट- अदृष्ट मल धुलता है । संस्कार से ही मनुष्य के स्वरूपका यथार्थ प्रकाश होता है । संस्कारसे ही मनुष्यता आती है । संस्कारों से ही मनुष्य के पाप दूर होते हैं । ' मनुस्मृति ' में कहा है— ' गाभैं- मैर्जातकर्म - चौडमौलीनिबन्धनैः । वैजिक गार्मिक चैनो द्विजानाम- पमृज्यते ' ( २।२७ ) ' वैदिकैः कर्मभिः पुण्यैर्निषेकादिर्द्विजन्मनाम् । कार्यः शरीर - संस्कारः पावनः प्रेत्य चेह च ( २२६ ) यहां पर चूडा- कर्म आदि संस्कारोंसे बीज वा गर्भ - सम्बन्धी पापका दूर होना तथा शरीरका पवित्र होना कहा है । यह संस्कारकी महिमा है ।

शिखा में प्रमाण

( ८ ) शास्त्रों में संस्कार सोलह कहे गये हैं । इस विषय में ' षोडश - संस्काररहस्य ' आगे देखिये । उनमें आठवां संस्कार " चूडाकर्म " है । इस संस्कार में बालकका सिर भद्र कर अर्थात् उसके गर्भसे आये बालोंका मुण्डन करके चूडा ( शिखा ) रखनी पड़ती है । यह संस्कार भी महत्त्वपूर्ण माना जाता है । यह संस्कार 79हिन्दुत्वका प्रथम सोपान है । श्री मनुने कहा है- ' चूडाकर्म द्विजातीनां सर्वेषामेव धर्मतः । प्रथमेवदे तृतीये वा कर्त्तव्यं श्रुतिचोदनात् ' ( २-३५ ) यहां पर ' श्रुतिचोदना ' से चूडाकरण - शिखास्थापन कहा है । श्रुति मन्त्र - ब्राह्मणात्मक वेदको कहते हैं । इस विषयमें अन्य पुष्पमें कहा जायगा । कुछ चतुर्थ पुष्पमें देखिये । उसमें मन्त्रभागका लिङ्ग हैं — ' यत्र वाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव ' ( यजुर्वेद वा ० सं ० १७ | ४८ ) यहां ' विशिखाः ' का अर्थ है - ' विशिष्टा दीर्घा, गोखुर- ' शिखा ' का मूल दीख रहा है ।

रिक्को वा एषोन पिहितो यन्मुण्डः, तस्य एतद् अपिधानं यत् शिखा- इति ' ( आपस्तम्बधर्मसूत्र १1१०1८ ) यहां शिखारहितको रिक्त - श्री - हीन दिखाया गया है । तब शिखाका स्थापन आयु, बल, तेज शिखा - छेदनमें प्रायश्चित्तार्हता कही है । जैसे कि — कात्यायन-

'

स्मृति ' में कहा है — ' सदोपवीतिना भाव्यं सदा बद्धशिखेन च । 80विशिखो व्युपवीतश्च यत् करोति न तत् कृतम् ' ( ११४ ) यहाँ पर शिखाहीनके कृत्यको अकृत्य वतलाया है । ' लघुहारीतस्मृति ' में कहा है — ' शिखां छिन्दन्ति ये केचिद् वैराग्याद् वैरतोपि वा । पुनः संस्कारमर्हन्ति त्रयो वर्षा द्विजातयः ( १८ ) मोहाच्छिन्दन्ति ये केचिद् द्विजातीनां शिखां नराः । चरेयुस्ते दुरात्मानः प्राजापत्यं विशुद्धये, ( १६ ) इस प्रकार ' स्त्री - शूद्रौ तु शिखां छित्त्वा क्रोधाद् वैराग्यतोपि वा । प्राजापत्यं प्रकुर्यातां निष्कृतिर्नान्यथा भवेत् ' ( लघुहारीतस्मृति २० ) ' खल्वाटत्वादिदोषेण विशिखश्चेन्नरो भवेत् । कौशीं तदा धारयीत ब्रह्म - ग्रन्थियुतां शिखाम् ' ( संस्कार - भास्कर ) इन प्रमाणों से शिखाका रखना आवश्यक सिद्ध होता है । न होने पर कुशाकी शिखा रखना कहा गया है । अन्य शास्त्रों में भी शिखाका वर्णन आता है । इस प्रकार शिखा न केवल हिन्दुत्वका चिह्न है, बल्कि कर्मका अङ्ग भी है । शिखाके बिना मनुष्य वैदिक कर्म में अधिकार प्राप्त नहीं कर सकता । इसी कारण वैदिक यज्ञों में खल्वाट पुरुषको कर्माधिकारी नहीं माना जाता; अथवा वहां पर उस पुरुषकी विवशता विचारकर कुशकी शिखा बनानी पड़ती है । इस प्रकार शिखा केवल हिन्दुत्वका चिह्न नहीं; अन्यथा ज्ञानकाण्डके अधिकारी संन्यासी हिन्दुओंमें न गिने जाते; अतः शिखा हिन्दु- कर्मकाण्डका अङ्ग भी है ।

शिखा रहस्य

( १ ) यजुर्वेदीय ' तैत्तिरीय उपनिषद् की शिक्षावल्ली में कहा गया है— ' अन्तरेण तालुके य एष स्तन इव अवलम्बते, सा इन्द्रयोनिः, 81यत्र असौ केशान्तो विवर्तते व्यपोह्य शीर्षकपाले ' ( ११६१ ) तालुके मध्य में स्तनकी तरह जो केशराजि दीखती है— इसमें केशोंका मूल है | वहां सिरके दोनों कपालोंका भेदन करके इन्द्र- योनि है, इन्द्र अर्थात् परमात्माकी प्राप्तिका भाग सुषुम्णा नाड़ी है ।

आशय यह है कि — जैसे घट दो कपालोंके संयोग से बनता है, वैसे सिर भी दो कपालोंसे वना है । दोनों कपालोंके मूलको भेदकर सुषुम्णा नाम नाड़ी रहती है । दोनों कपालोंका मूलस्थान सुषुम्णा नाडीका घर है । योगी लोग इडा एवं पिङ्गला नाड़ीकी गतिको पार करके सुषुम्णा को जगाया करते हैं, उसीसे आत्माका साक्षात्कार करते हैं । यह नाडी अपने मूल स्थानसे होती हुई मस्तकके मध्यमें विचरती है । योगी लोग जिस स्थानको सुषुम्णा- का मूल - स्थान मानते हैं; वैद्य लोग उसी स्थानको ‘ मस्तुलिङ्ग ’ नामसे बुलाते हैं | मस्तुलिङ्गके निम्न भागको योगी लोग ' ब्रह्मरन्ध्र ' कहते हैं, और वैद्यगण उसके साथके भागको ' मस्तिष्क ' कहते हैं ।

वैद्य लोगोंका यह अभिप्राय है कि — सम्पूर्ण शरीरमें प्रधान अङ्ग है सिर, अथवा यह कहना चाहिये कि - व्यष्टि ब्रह्माण्डरूप शरीरकी शक्तियोंका भाण्डार सिर है । सब शरीरमें व्याप्त नस- नाड़ियोंका सिरसे सम्बन्ध है । मनुष्य जीवनका केन्द्र वा आधार भी सिर ही है । सिरमें दो शक्तियाँ रहती हैं; एक ज्ञान - शक्ति, दूसरी कर्म - शक्ति । इन दोनों शक्तियोंकी परम्परा नाड़ी - द्वारा शरीर में व्याप्त हो जाती है; और कार्यरूपमें परिणत हो जाया करती है । इसी कारण शरीरमें ज्ञान और कर्म दो विभाग हैं । इन दोनों 82विभागोंका मूलस्थान वही सुषुम्णाका मूलस्थान और ब्रह्मरन्ध्र है अर्थात् मस्तु लिङ्ग तथा मस्तिष्क है । मस्तुलिङ्ग कर्मशक्तिका भण्डार है और मस्तिष्क ज्ञानशक्तिका । मस्तिष्क के साथ आंख, कान, नासिका, रसना, त्वचा इन ज्ञानेन्द्रियोंका सम्बन्ध है, और मस्तुलिङ्गके साथ वाणी, हाथ, पैर, गुढ़, उपस्थ इन कर्मेन्द्रियोंका सम्बन्ध है । मस्तिष्क एवं मस्तु लिङ्गका सामर्थ्य वा स्वास्थ्य जितनी अधिकता से होगा, ज्ञानेन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रियोंमें भी उतनी प्रबलता सम्पन्न होगी । उन दोनों स्थलोंके अस्वास्थ्य से इन इन्द्रियों में भी विकृति होती है । इसमें उदाहरणों की कमी नहीं है ।

प्रकृतिकी विलक्षण महिमासे इन दोनों स्थलोंकी प्रकृति भी भिन्न- भिन्न हुआ करती है । मस्तिष्क शैत्यको चाहता है, मस्तुलिङ्ग उष्णताको । मस्तिष्ककी ठंडक के लिए तालु- प्रदेश में क्षौर ( हजामत ) करवानी पड़ती है । उसमें शैत्यार्थ छुरेसे वहांके केश, पानके आकारसे कटवाये जाते हैं; उस पर तेल, साबुन, दही, मलाई आदिका, उपयोग किया जाता है, तालुको जलवायु आदिसे ठण्डा रखना पड़ता है । सिरदर्द होने पर तालुके बाल कटवाने वा मुडवानेसे वेदना शान्त होजाती है । फलतः तालु- प्रदेशस्थ मस्तिष्क तो ठण्डक चाहता है; उससे भिन्न धर्मवाला मस्तुलिङ्ग गर्मी चाहता है ।

अब प्रश्न यह है कि — मस्तुलिङ्गमें कितनी वा कैसी ऊष्मा ( गर्मी ) अपेक्षित है । ऊष्माकी न्यूनाधिकता से नाडियोंमें प्रकोप हो सकता है, और उससे कई हानियाँ हो सकती हैं; इस कारण उसमें मध्यम ऊष्मा चाहिये । ऊष्मासे ही यह हमारा शरीर है, ऊष्मा गई 83तो शरीर भी शान्त हुआ । मर जाने पर कहते हैं कि ठण्डा हो गया । एक अमेरिकन वैज्ञानिक विद्वानने वक्तव्य दिया है कि यदि हमारी ऊष्मा सुरक्षित रहे; तो हमारी ४०० वर्षकी आयु भी हो सकती है । सो उस ऊष्मा के संरक्षण में शिखा भी एक उपाय है । वह ऊष्मा कपड़े आदिसे नहीं हो सकती; क्योंकि कपड़े आदिके गुण अनेक प्रकारके होते हैं । अतः उनसे पूर्ण लाभकी सम्भावना नहीं हो सकती ।

यह भी निश्चित बात है कि जो वस्तु जिससे उत्पन्न होती है, वही उसकी वास्तविक सहायक हुआ करती है । जैसे- घड़ा मिट्टी से बनता है, उसके प्रत्येक अवयवकी पूर्ति भी मिट्टी से ही होती है, जल अग्नि आदिसे नहीं । मस्तुलिङ्ग सिरका एक भाग है, उसकी रक्षा भी सिरसे उत्पन्न पदार्थ द्वारा ही हो सकती है, टोपी - हैट आदि से नहीं । शिरसे उत्पन्न पदार्थ बाल हैं; अतः वहाँ घनीभूत गोखुरपरिमाणके बाल ही मध्यम परिमाणकी गर्मी कर सकते हैं; अन्य वस्तु नहीं । गंजापन जितने अंशमें होता है; उतना ही अश चोटीका होता है । इस स्थानपर लम्बे बाल रखना ही गंजेपनका इलाज है ।

यह पहले कहा जा चुका है कि मस्तिष्कमें ठण्डक अपेक्षित है और मस्तु लिङ्ग में गर्मी । इसलिए मस्तिष्ककी ठण्डकके लिए वहां तालु- प्रदेशमें केश थोड़े अपेक्षित होते हैं; अतः लोग वहां पर अपने बाल . कम करा देते हैं; वा वहां छुरेसे क्षौर करवा लेते हैं, पर स्त्रियों में सौभाग्यके कारण न तो उनका क्षौर होता है; न वहांके बाल कटा 84जाते हैं; तब उनके मस्तिष्कको वायु कैसे लगे; इसके लिए हमारे पूर्वजोंने उनके लिए माँग ( सीमंत ) रखना नियत किया है । दो भागों में वाल होजाने से मध्य में माँगकी रेखा होती है; वह मस्तिष्कका स्थान होने से उस रेखाके द्वारा उनके तालुको वायु लगती रहने से मस्तिष्क में ठण्डक रहती है; पर मस्तुलिङ्गकी गर्मी के लिए उस पर घनीभूत केशों की आवश्यकता होती है । मुनियोंने वहाँ उपयुक्त गर्मी के लिए गोखुरके परिमाणके केश माने हैं । इसलिए मस्तु लिङ्ग में गहरे केश सदा रहें; वे अन्य वालोंसे अधिक रहें, भिन्न रहें, ऊंचे रहें, इसलिए उनका नाम भी विशेष रखा गया है ' शिखा ” और उसका सम्बन्ध कर्म - प्रवर्त्तक धर्मके साथ स्वीकृत किया गया है । इसके अतिरिक्त सन्ध्या आदिके अवसर पर परमात्माकी कृपा भी शिखा के ही द्वारा भीतर प्राप्त होती है; इसी कारण ' तैत्तिरीयोपनिषत् ' ने उस स्थानका नाम ' इन्द्रयोनि ' कहा है यह पहले कहा ही जा चुका है । ' ब्रह्मरन्ध्र ' भी इसे इसीलिए कहते हैं । जैसे ब्राडकास्ट किया हुआ शब्द सारे श्राकाश में व्याप्त होजाता है - पर उसका आकर्षण करता है रेडियो यन्त्र | और रेडियोका तरीका यह है कि मकानकी चोटी पर एक बाँस तारके साथ खड़ी की जाती है; वही चोटीकी तार शब्दको खेंच लेती है; जिसे हमारा रेडियो यन्त्र खैंचकर हमारे आगे उपस्थित कर देता है, इसी प्रकार चोटीके बाल भी परमात्माकी व्यापक कृपाको अपने में आकृष्ट कर लेते हैं ।

यह विषय कृत्रिम भी नहीं है, किन्तु वास्तविक और प्राकृतिक है । आप मस्तु लिङ्ग परके केशोंको कटवानेवाले पुरुषोंको देखें-

85शिखाकी वैज्ञानिकां

वहां पर गोलाकार मण्डल दीख रहा होता है । एक भाग में वालोंकी ऐसी रचना दीखती है, जिससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि यह कपाल की ग्रन्थि है । ग्रन्थिस्थलको मर्मस्थल भी कहा जाता है । प्रत्येक मर्मस्थलकी रक्षा भी आवश्यक हुआ करती है । अन्य मर्मस्थलोंकी अपेक्षा यह सर्मस्थल सम्राट् स्थानीय है, क्योंकि यही सव नस- नाड़ियों का केन्द्र है । इसकी रक्षा अधिकता से हो; अतः यहाँ शिखा अवश्य रखनी चाहिये | इसी घनीभूत शिखासे ही सनस्ट्रोक आदिको आशङ्का भी नहीं रह जाती ।

विज्ञान और आयुर्वेद

( १० ) वर्तमान वैज्ञानिकोंने अन्वेषणके बाद अब यह जाना है कि सिरके पिछले भागमें उन नस - नाड़ियोंका केन्द्र है, जो आंखोंमें प्राप्त होती हैं । उनकी रक्षा यहां ठहरे हुए पर्याप्त - परिमाण के केशोंसे होती है । वर्तमान वैज्ञानिकोंने अभी यह बात जानी है; परन्तु हमारे ऋषि महर्षियोंने प्राचीन काल से ही शिखा रखनेका नियम बना रखा है । शल्यविधाके सभी अग्रेजी पुस्तकों

डाक्टरों ने सिरके उस स्थल में जहां शिखा रक्खी जाती है- एक मर्मस्थल माना है, जिसे अंग्रेजी में Pineal Gland ( पिनियल ग्लेण्ड ) नामसे कहा जाता है । इसके अतिरिक्त जिस स्थलपर शिखा रखी जाती है; उसी स्थलके नीचे एक ग्रन्थि है. जिसे ' पिचुइटी ' नामसे कहा जाता है; जो शरीरकी पुष्टि तथा वृद्धिमें बहुत सहायता करती है । प्रकृतिने सिरमें जो बाल उत्पन्न किये हैं; उनका तात्पर्य शरीरकी भीतरी कोमल वस्तुओंका संरक्षण है । 86कपालशास्त्र के अनुसार भी उक्त स्थल में आत्मोन्नतिका केन्द्र है । एक कपालशास्त्रीने यह सिद्ध किया है कि उस केन्द्र में केशराजि की स्थापना से आत्मोन्नतिकी रक्षा होती है ।

आयुर्वेद के अनुसार मांस, शिरा, स्नायु, अस्थि

, सन्धि इन पांच भेदोंके साधारण मर्म होते हैं; १६ विशेष

मर्म होते हैं; इस प्रकार १०७ मर्म कहे गये हैं । इनमें ११ मांसके,

४१ शिराओं ( नसों ) के, २७ स्नायुओं के, अस्थियों ( हड्डियों ) के

२० सन्धियों के मर्म होते हैं इस प्रकार १०७ मर्म ' सुश्रुत संहिता '

( शारीर - स्थान ६।४ ) में कहे गये हैं । १६ संख्या के विशेष मर्मोमें

एकका नाम ' अधिप ' होता है, जहां केशोंका आवर्त होता है ।

उसके नीचे नाड़ियोंकी संधि होती है । थोड़े आघात से भी

यहांके मर्म - स्थलोंमें हानिकी सम्भावना रहती है; वल्कि कभी तो मृत्यु की सम्भावना भी रहती है । इसी कारण ' सुश्रुत संहिता'के शारीर स्थानमें कहा है – ' मस्तकाभ्यन्तरत उपरिष्टात् शिरासन्धिसन्निपातो रोमावर्तोऽधिपतिः तत्रापि सद्य एव [ मरणम् ] ( ६।२० ) ' आन्तरो मस्तकस्योर्ध्वं शिरासन्धिसमागमः । रोमावतधिपो नाम मर्म सद्यो हरत्यसून् ' ( अष्टाङ्गहृदय, शारीरस्थान ) ।

इस पर श्री अरुणदत्त ने लिखा है -- ' मस्तकस्य अभ्यन्तरतो यः स्थितः, तथा ऊर्ध्वं प्रकृतत्वान्मस्तकस्यैव उपरि शिरासन्धिसमागमः शिरा - सन्धीनां सन्निपातो रोमावर्तलक्षणः; सोधिपो नाम मर्मविशेषः, मर्मणामधिपो यथार्थनामा । तदायत्तानि हि सर्वाणि मर्माणीत्यर्थः । सोऽधिपो विद्धो नरस्य सद्योऽसून हरति, पुरुषं मारयतीत्यर्थः । आशय

87शिखाकी वैज्ञानिकता

यह है कि जैसे स्वामीके दुःखमें सब नौकर दुःखी होते हैं; जैसे सेनानायक के क्षत - विक्षत होकर गिरने पर सब सेनाके पांव उखड़ जाते हैं; इसी प्रकार इस ' अधिपति ' नामक मर्म - सम्राट्में थोड़ा भी आघात होनेपर सारे मर्मस्थानों में शिथिलता होजाती है । उस समय उपचार न करनेपर मृत्यु तक भी हो सकती है । जैसे राजा सैनिकोंकी अपेक्षा सेनानायक के संरक्षणार्थ अधिक अवधान देता है; वैसे ही मनुष्यमात्रको सब मर्मोकी अपेक्षा ' अधिप ' मर्मकी रक्षा तो बहुत सावधानी से करनी चाहिये । उसकी रक्षा होवे इस पर उपाय अपेक्षित है । प्राचीन महर्षियों से उद्भावित वह उपाय ही ' शिखा ' है । शिखाके अतिरिक्त कोई भी सरल शास्त्रीय उपाय नहीं है, जिससे दिन - रात एवं प्रतिक्षण अधिप - मर्म की रक्षा हो सके । इस उपायके आश्रयणसे चाहे गरीब हो वा साहूकार- सभी समान लाभ प्राप्त कर सकते हैं । हमारे पूर्वजोंने जो सुगम एवम् अपूर्व युक्ति बनाई है; वैसी युक्ति कोई भी नहीं बन सकती । इस तात्पर्यको न जानकर आजकी सभ्य ( १ ) मंडली अपनी शिखाको कटवाकर शिखाधारिणी मण्डलीका उपहास करती है, यह उसकी

विद्या दयनीय है । जो इस विषयके अन्य उपाय किये जाते हैं, वे खर्चीले एवं अवैध हैं, पर हमारे प्राचीनोंसे उद्भावित उपायोंमें खर्च न होना, परतन्त्रता न होनी - यह एक भारी विशेषता होती थी । फिर साथ वह जातीय चिह्न भी बन जाता था । इस प्रकार ' एका क्रिया द्वयर्थकरी ' नहीं - नहीं ' त्र्यर्थकरी प्रसिद्धा ' हो जाती है ।

प्राचीन काल में ब्रह्मचर्याश्रममें कुमार यहां पर केशजूटक रख

88श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )

कर सिर पर अधिक विद्युत्को उत्पन्न करते थे । शिखा रखने से आयुकी वृद्धि होती है; सैनिकों को धूप वा सनस्ट्रोकसे बचानेके लिए टोप दिये जाते हैं । यदि वे पूर्ण केशयुक्त शिखा रखें, तो उन्हें टोपियोंकी आवश्यकता ही न रहे । इस शिखाका परिमाण गोखुर - इतना होता है, जिससे शीतकाल में शीतसे, भयानक गर्मी में गर्मी से और वर्षा ऋतुमें जलवर्षण के श्राघात से साधारणतः रक्षा होती है ।

एक विचार

( ११ ) कहा जाता है कि- जो शीत - प्रधान देश हो तो कामचार है चाहे जितने केश रखे और जो अतिउष्ण देश हो तो सब शिखासहित छेदन करा देना चाहिये, क्योंकि शिरमें बाल रहने से उष्णता अधिक होती है और उससे बुद्धि कम होजाती है ' ( स ० प्र ० १० समु ० १६२ पृष्ठ ) यह विचार उक्त अनुसन्धानसे अपूर्ण सिद्ध होता है; क्योंकि - शिखामुण्डनसे ही उस मर्मप्रदेशमें धूप जल्दी प्रभाव कर देती है । गोखुरपरिमाण बालों के वहां रखने पर तो जैसे बाहरी शीतसे रक्षा होती है; वैसे ही बाहरी तापसे भी रक्षा होती है । इसका अनुभव स्वयं भी किया जा सकता है । जो लोग गर्मी में सभी बालोंको कटवाते हैं; दो - तीन दिन उन्हें गर्मी अधिक अनुभूत होती है । जो बाल नहीं कटवाते; उनको वैसी ऊष्मा प्रतीत नहीं होती, बल्कि बाहरी गर्मी से रक्षा ही होती है । नहीं तो फिर उनके अनुयायियोंको गर्मी में बुद्धिमन्दताके डर से अपनी स्त्रियों या पढ़ रही हुई लड़कियोंके बाल भी कटवाने पड़ेंगे ।

89अथवा गर्मी में वा गर्म देशमें बालोंका कटवाना मान भी लिया जाय तो वह मस्तिष्कके तालु - प्रदेशमें तो कुछ लाभकारी होसकता है, पर शिखाके स्थानमें नहीं । इसमें प्राचीन एवं अर्वाचीन विद्वान् प्रमारण हैं । इस बातका आविष्कार करनेवाले तो वैद्यकके विद्वान् थे; उन्होंने ' सालम - मिश्री ' आदिकी ओषधियाँ भी जान रखी थीं तो यहाँ भी उन्हें कोई श्रोषधि लिख देनी चाहिये थी; जिससे गर्मी हट जाती; पर उन्होंने शिखा पर ही आक्रमण कर दिया; खेद!!! प्राचीन ऋषि, मुनि, तपस्वी जो जटाधारी थे; क्या उनकी बुद्धि न्यून थी? उन्होंने बड़े - बड़े ग्रन्थ कैसे बनाए? ' दीक्षितो दीर्घ- श्मश्रुः ' ( अथर्ब ० ११।५।६ ) इससे वेदने ब्रह्मचारी के लिए दीर्घकेश की स्थापना कही है; इससे वेदको उससे ब्रह्मचारीकी बुद्धिकी मन्दता इष्ट नहीं ।

उक्त स्थलमें शिखा छेदन मनुजी के ' केशान्तः षोडशे वर्षे ब्राह्मणस्य विधीयते । राजन्यबन्धोर्द्वाविंशे वैश्यस्य द्वयधिके ततः ' ( २।६५ ) इस पद्य अनुवादके अवसर पर ही ' स ० प्र ० में कहा है; परन्तु मनुजीको वहाँ ऐसा अभिप्राय विवक्षित नहीं । न वहाँ ग्रीष्मका नाम है, न ही केशान्त संस्कार में शिखाके छेदनका गन्ध ही है । यदि यहाँ गर्मीका कारण है तो ब्राह्मणका १६ वें वर्ष में ही मुण्डन कैसे कहा है? क्या पहले वा पीछे उसे गर्मीका अनुभव नहीं होता?

इस प्रकार क्षत्रियको बाईस वर्षसे पहले वा पीछे क्या गर्मी, तंग नहीं करती? वैश्यको चौबीसवें वर्ष से पहले वा पीछे क्या गर्मी

90श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )

नहीं लगती 1? शूद्रकेलिए तो वैसा करने की आज्ञा ही नहीं है; तो क्या उसे सारी आयु गर्मी ही नहीं लगती? इससे यह बात ठीक नहीं । न मालूम मनुजीके उक्त पद्यसे यह बात कैसे निकाली गई? स्वयं उन्होंने स ० प्र ० के ११ वें समु ० २४४ पृष्ठमें लिखा है- ' यज्ञोपवीत और शिखाको छोड़कर मुसलमान - ईसाइयोंके सदृश वन बैठना व्यर्थ है ' ।

शिखा काटनेमें वेदका प्रमाण ( १ )

( १२ ) कई व्यक्ति ऊपर कहे पक्षकी सिद्ध्यर्थ ‘ यत्र बाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव ' ( यजुः १७१४८ ) यहां ' विशिखा इव ' का ' विगतशिखाः- शिखाहीनाः ' अर्थ करके अपने इष्ट पक्षको सिद्ध करना चाहते हैं, यह ठीक नहीं । इस मन्त्र में ग्रीष्ममूलक उष्णता के कारण शिखा कटवाना अथवा शीत होनेसे शिखा रखवाना नहीं कहा गया । यहाँ विशेषण ' कुमार ' है, तो क्या बड़ों को गर्मी नहीं लगती? ' तब उनका यह प्रमाण- प्रदर्शन व्यर्थ है । क्योंकि इससे उस पक्ष की सिद्धि नहीं ।

वस्तुतः उक्त मंत्रमें ' विशिखाः ' का विशेष्य ' कुमाराः ' है, ‘ ग्रीष्मखिन्ना नराः ' नहीं । उसका एक अर्थ है ' विविध शिखावन्तः ' । कुमारावस्थामें कई अपने प्रवरानुसार पाँच शिखा वा तीन शिखा रखते हैं, जैसेकि ' प्रयोग - रत्न ' में कहा है- ' मध्ये शिरसि चूड़ा स्याद् वासिष्ठानां तु दक्षिणे । उभयोः पार्श्वयोरत्रिकश्यपानां शिखा मता ' । ' माधवीय ' में भी ऐसा ही कहा है । आपस्तम्बने भी इसी प्रकार कहा है- ' तूष्णीं केशान् विनीय यथर्षि शिखाः निधाति ' ( आपः गृ. १६-१५ )

91शिखाकी वज्ञानिकता

तथा ऋषिप्रवर - सङ्ख्यया । ' अथैनमेकशिखस्त्रिशिखः पञ्चशिखो वा यथा वा एषां कुलधर्मः स्यात् यथपिं शिखां निदधाति ' ( वोधा ० गृ ० २ | ४ | १७-१८ ) ‘ संस्कारभास्कर ' में भी कहा है – ' दक्षिणतः चूडा वसिष्ठानाम् ' ( ४०।२ ) ' उभयतोऽत्रिकश्यपानाम् ' ( ३ ) ' पञ्चचूडा अङ्गिरसः ' ( ५ ) । स्वा ० दयानन्दजीने भी अपनी ' संस्कारविधि ' में लिखा है— [ चूडाकर्मसें ] पाँचों ओर थोड़ा - थोड़ा केश रखावे ' ( ७६ पृष्ठ ) । अपने यजुर्वेदभाष्यमें भी स्वामीजी ने लिखा है - ‘ यथा विगत- शिखा विविध शिखा वा, विना चोटीके वा बहुत चोटियोंवाले बालकोंके समान वाण आदि शस्त्र - अस्त्रोंके समूह अच्छे प्रकार गिरते हैं ' । इस प्रकार ' विशिखाः ' का ' विविधशिखाः ' भी अर्थ हुआ ।

चूडाकर्म संस्कारमें मध्यवाली शिखाको छोड़कर शेष शिखाओं का मुण्डन करा दिया जाता है । इसीलिए ' यज्ञोपवीतविधि में आता है — ' तासां मध्यशिखावर्जम् उपनयने वपनं कार्यम् ' । ‘ नैमिनिगृह्य- सूत्र ' में भी कहा है – ' सर्वाणि लोमनखानि वापयेत् शिखावर्जम् ' ( ११ ) फलत: उन्हीं विविध शिखाओंको सूचित करनेवाला उक्त मन्त्र है । यदि यहाँ ' विशिखाः ' का ' शिखाहीनाः ' अर्थं किया जाय तो उपमानोपमेयभाव घटित नहीं होता । ' विशिखा वाणाः सम्प- तन्ति ' यह उपमेय वाक्य है, ' विशिखाः कुमाराः सम्पतन्ति ' यह उपमान वाक्य है, बाण शिखाहीन नहीं होते, किन्तु शिखासहित ही होते हैं । ' शिखा ' होती है उनके पंख, तभी तो बारणोंकी गति तेज़ होजाती है । इसी कारण आरो क्रिया है- ' सम्पतन्ति ' सम्यक् पतन्ति ( खूब उड़ते हैं ) शिखा- ( पंख ) हीन बाणोंकी सम्पातक्रिया

92श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )

( उड़ना क्रिया ) नहीं होती । इससे उक्त मन्त्र से शिखाहीनता सिद्ध नहीं होती । एक प्रश्न होता है कि तब तो ' सशिखा इव ' पाठ होता, ' विशिखा इव ' क्यों? इस पर उत्तर है कि ' विशिष्टा - गोखुरपरिमारणा शिखा येषाम् ' यहाँ ' वि'का कार्थ ' विशिष्ट ' अर्थात् गोखुरपरिमाण वाली शिखा है, अथवा ' वि'का अर्थ ' विविधाः शिखाः येषाम् ' यह भी हो सकता है जैसेकि - ' प्रयोगरत्न ' आदिके अनुसार पहले दिखाया जा चुका है । अथवा ' शिखाहीनता ' का भी अर्थ हो तो वहाँ मध्यकी शिखा से भिन्न शिखाओंका राहित्य ही इष्ट है । कौमार्य में उनका मुण्डन हुआ करता है - यह पहले ही कहा जा चुका है । इससे भी उक्त पक्ष ( गर्मदेश में शिखा काटने ) की सिद्धि नहीं होती ।

मीमांसा आदिमें तो इसी ( कुमारा विशिखा इव ) मन्त्रको शिखा - स्थापन में ' मूल कहा है । जैसेकि - ' मीमांसादर्शन ' ( १ । ३ । १ ) सूत्रके भाष्य में शवरस्वामीने स्पष्ट लिखा है - ' गोत्रचिह्न ' शिखाकर्म; दर्शनं च —— यत्र वाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव ' इति । ' चूडाकर्म द्विजातीनां सर्वेषामेव धर्मतः । कर्तव्यं श्रुतिचोदनात् ' ( २/३५ ) इस मनु - पद्यकी टीकामें कुल्लूकभट्टने लिखा है- ' श्रुतिचोदनात्— ' यत्र बाणा: सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव ' इति मन्त्रलिङ्गात् ' । यहाँ पर श्रीकुल्लूकभट्टने भी उक्त मन्त्रको शिखास्थापक ही माना है । उक्त पद्यमें नारायण नामक टीकाकारने भी लिखा है – ' श्रुतेः मन्त्ररूपायाचोदनाया लिङ्गतया प्रवर्तकत्वात् । मन्त्रश्च ‘ यत्र बाणाः सम्पतन्ति कुमाराः विशिखा इव ' । यहाँ भी वही बात हुई । यही राघवानन्दने भी लिखा है- ' श्रुतिचोदनात् यत्र बाणाः सम्पतन्ति

93शिखाकी वैज्ञानिकता

कुमारा विशिखा इव ' इति श्रुतेः ' । इस प्रकार ' काठकगृह्यसूत्र ' के ४०।१६ सूत्रके व्याख्यानमें देवपालने भी कहा है- ' श्रुतिमूलक- मेतत् कर्म - इति प्रदर्शितम्- ' यत्र बारणा निष्पतन्ति कुमारा विशिखा इव ' इत्यादिना ' |

( १५ ) व एक प्रश्न बच जाता है- ' यदि शिखाराहित्य अवैदिक है; तथा ' कुमारा विशिखा इव में ' विशिष्टशिखाः ' वा ' विविध शिखा: ' यह अर्थ है; तो यजुर्वेद वाजसनेयी संहिताके भाष्यकार उवट - महीधर आदिने इसका ' विगत- शिखाः ' वा ' शिखा- हीनाः ' यह अर्थ क्यों लिखा है? इससे तो शिखाछेदन ही सिद्ध होगा- इस पर यह जानना चाहिये कि — उवट -सहीधरके उक्त व्याख्यान से भी उक्त अभिप्रायकी सिद्धि नहीं हो सकती । उनके श्राशय पर भी विचारना चाहिये । वह आशय यह है कि- जैसे शिखाहीन वाण गिर ही जाया करते हैं, लक्ष्यवेध रूप उन्नति नहीं कर सकते; वैसे ही शिखाहीन कुमार भी पतन को प्राप्त करते हैं, उन्नति प्राप्त नहीं कर सकते । तभी तो कषायरसवाले सोमके पानमें प्रवृत्त होते हुए कुमारोंको लोभ भी यही दिया जाता था कि— इसके पीनेसे तुम्हारी शिखा बढ़ जायगी ' शिखा ते वर्धते वत्स! गुडूचीं श्रद्धया पिब ' । इस प्रकार यहाँ ' संपतन्ति ' का ' सम्यक् पतन्ति च्यवनतिं प्राप्नुवन्ति ' ' अवनति प्राप्त करते हैं ' अर्थ होनेसे ' विशिखाः ' का ' शिखाहीनाः ' अर्थ से समन्वय हो जाता है । बात वही हमारी कर निकली कि - शिखाहीन अवनतिको प्राप्त करते हैं । प्रतिपक्षियोंकी इससे इष्ट - सिद्धि न हुई ।

94इस प्रकार शिखाका धारण उन्नति क्रियाका साधक सिद्ध हुआ । इसीलिए ' काठकगृहासूत्र ' ( ४० । ७ ) में देवपालने व्याख्या की है — ' निःशिखत्वं तु अमङ्गलधर्मोऽरिष्टहेतुः । तथा च पठन्ति - ' अमेध्यमेतत् शिरोऽशिखम्, यत्र वाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव ' इति निन्दावादः । ' इससे हमारा अभिप्राय ही पुष्ट हुआ ।

' नमः कपर्दिने च व्युप्तकेशाय च ' ( यजुः १६ २६ ) इस मंत्र को शिखाछेदन में उदाहृत करना भी युक्त नहीं हो सकता । क्योंकि— यहाँ पर शिखाहीनता नहीं कही गई; सामान्य केश वहाँ पर इष्ट हैं । ' केशा न शीर्षन् यशसे, श्रियै शिखा ' ( यजुः १६६२ ) इस मन्त्र में शिखा तथा केश भिन्न - भिन्न शब्द आये हैं । तब केशोंसे ' शिखा'- का ग्रहण नहीं हो सकता । इधर ' श्रियै शिखा ' इस मन्त्र से विरोध भी पड़ेगा । शिखा श्रीप्राप्तिकेलिए कही गई है, फिर उसे क्यों काटा जाय? अथवा रुद्राध्यायके इस मन्त्रमें रुद्रके दो आश्रम बताये गये हैं । कपर्दी - जटाजूटधारी को कहते हैं; सो यह शब्द वानप्रस्थावस्थाका द्योतक है; क्योंकि— वानप्रस्थी को ऐसे ही जटिल रहना पड़ता है और ' व्युप्तकेश ' से संन्यासाश्रम इष्ट है; जैसे कि — महीधराचार्यने भी अपने भाष्य में सकेत दिया है— ' यत्यादिरूपेण मुण्डितत्वम् । '

( १४ ) संन्यासियोंके लिए शिखाका त्याग तो अपवाद है, प्रति- पक्षियोंसे प्रोक्त कारण नहीं । इस कारण उनके लिए ' ताण्ड्य- महात्राह्मणं ' में कहा है-- ' शिखा अनुप्रवपन्ते, पाप्मानमेव तदपन्नते । 95लघीयाथ्र्सः स्वर्गलोकमयामेति ' ( ४।१०।२५ ) । स्वा ० दयानन्दजीने भी ' प्राजापत्येष्टि ( कि - जिसमें यज्ञोपवीत और शिखाका त्याग किया जाता है ) कर ' इस प्रकार मनु ० ( ६३८ ) के प्रमाणसे ( संस्कार - विधि २६२ पृष्ठ ) ' सर्ववेदसम - गृहाश्रमस्थ पदार्थ मोह, यज्ञोपवीत और शिखा आदिको धारण करता है, उनको छोड़, यह अथर्ववेदके प्रमाणसे ( संस्कार विधि पृ ० २७२ ) ' सर्ववेदसम्— शिखा सूत्र यज्ञोपवीत आदि पूर्वाश्रम - चिह्नोंका त्याग करना है, यह सबसे बड़ा यज्ञ है ' इस तैत्तिरीयके प्रमाणसे ( संस्कारविधि पृ ० २७६ ) में संन्यासियोंके लिए शिखा - त्याग स्वीकार किया है ।

७५ वर्षके बाद सामान्यतया संन्यासका विधान है; तब आयुकी वृद्धि हो जाने से शरीरकी पूर्णता हो जानेके कारण ' अधिप ' मर्मस्थलकी त्वचा कठोर हो जाती है, और शिखाजन्य लाभ भी ७५ वर्ष तक प्राप्त होकर सारे शरीरमें व्याप्त हो जाते हैं; तब उस समय शिखा - त्यागमें भी कोई हानि नहीं होती । इसके अतिरिक्त तब कर्मकाण्ड तथा उपासनाकाण्डके समाप्त हो जानेसे तत्सम्बद्ध शिखा- सूत्रका त्याग ठीक भी है । ' विशिखो व्युपवीतश्च यत्करोति न तत् कृतम् ' ( १ | ४ ) यह ' कात्यायनस्मृति ' का वचन कर्म - उपासना- काण्डपरक है, ज्ञानकाण्डपरक नहीं । जो लोग शिखाजन्य सब लाभको प्राप्त करके सिद्धिको प्राप्त हो चुके हों; जिनकी सब वासनाएँ नष्ट हो चुकी हों; संन्यासके अधिकारी भी वही हैं; शिखा- . त्याग में भी उन्हींका अधिकार है, क्योंकि अब उनका किसी भी कर्मफल के साथ कोई भी सम्बन्ध नहीं रहता । शिखा रखी जाती. 96है कर्मकरणार्थ और प्राणोंके रक्षणार्थ 1

। वे ही ज्ञानशाली योग प्राप्त कर कर्माको छोड़कर अपने प्राणोंको ब्रह्मरन्ध्रमें स्थापित कर उन प्राणोंके निकालने में अन्तरायस्वरूप शिखाको हटाकर उस रिक्त स्थानके द्वारा उन ग्राणोंको निकाल देते हैं; जिससे उनकी ऊर्ध्वगति होती है । उक्त वेद - मन्त्र में, तथा संन्यास - विधानमें गर्म ऋतु वा देशके कारण शिखात्याग नहीं कहा गया । इससे प्रतिपक्षियोंका पक्ष कभी भी सिद्ध नहीं होता ।

शिखा रखने में अन्य उपपत्ति

( १५ ) तीन आश्रमों तक शिखा रखने फिर संन्यास में उसका त्याग करनेमें यद्यपि पहले उपपत्तियाँ दी जा चुकी हैं, तथापि अन्य उपपत्तियाँ भी दी जाती हैं । पाठक अवधान से देखें ।

सारी सृष्टिका मूल अग्नि ही है । अग्निका स्वरूप उसकी शिखासे ही व्यक्त होता है । अग्निको संस्कृत में ' शिखी ' कहा जाता है । अग्नि जब शिखारहित हो तो उसमें हवन निषिद्ध माना गया है । जव अग्नि ' शिखी ' हो; तो किसीकी शक्ति नहीं कि - उसका स्पर्श कर सके । उसके उस स्वरूप ( शिखित्व ) के नष्ट होने पर भस्म भी उसे आच्छन्न कर दिया करती है । आज हम भी जो पददलित हो रहे हैं, उसमें भी कारण यह है कि हमने अपना अग्निसे प्राप्त स्वरूप शिखित्व हटा दिया है । हम सब अग्निसे उत्पन्न हैं, अग्निके उपासक हैं । अग्निसे हो हम ' तन्वं मे पाहि, आयुर्मे देहि, वर्चो मे देहि, अग्ने! यन्मे तन्वा ऊनं तन्म आपृरण ' ( पारस्क ० २२४७ ) ' मयि मेधां मयि प्रजां मयि अग्निस्तेजो दधातु ' 97( आश्व ० गृ ० ११२१४ ) ' यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपासते । तया मामद्य मेधयाग्ने! मेधाविनं कुरु स्वाहा ' ( यजुर्वेद वाज ० सं ० ३२।१४ ) इत्यादि प्रार्थना करते हैं ।

हमारे गोत्र- पुरुष भी हमारा अग्निके साथ प्राचीन सम्बन्ध बताते हैं । जमदग्निगोत्र ' जमद् ( ज्वलद् ) अग्नि ' ( निरुक्त ७/२४/८ ) को बताता है, अङ्गिरस् गोत्र अग्निके अंगार ( निरु ० ३।१७११ ) को बताता है । इस प्रकार भृगु, अत्रि, भारद्वाज आदिकी भी वहीं अग्निमूलक उत्पत्तिकी निरुक्ति कही गई है । ब्राह्मणों में तो अग्निका अतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् ' ( कठोपनि ० १।१।७ ) ब्राह्मणो

' ह वा इममग्नि विशिष्ट निवास माना गया है, जैसे कि - ' वैश्वानरः प्रविशति वैश्वानरं बभार ' ( गोपथब्रा ० ११२/२० ), ' अग्निः " " यो ब्राह्मणाँ आविवेश ' ( अथर्व ० १६ ५६।२ ) । तभी निषादोंके खानेके समय विनताने गरुड़को ब्राह्मण खानेकेलिए निषेध कर दिया कि— ब्राह्मणके खानेसे तेरे गलेमें दाह होगा । देखो ' महाभारत ' आदिपर्व २६ अध्याय । अस्तु ।

जो जिसकी उपासना करता है, अन्तमें वह उसके स्वरूपको प्राप्त हो जाता है । उपासक भी यही चाहता है; तभी वह अपने उपास्यके स्वरूपकी प्राप्त्यर्थ उपास्यके ही लिङ्गोंको धारण करता है । जैसे — गणेशभक्त सिन्दूर आदि, शैव भस्म, रुद्राक्षादि - मालाको, वैष्णव लोग गोपीचन्दन - तुलसीमाला आदिको धारण करते हैं । इसीलिए शुक्लयजुर्वेदके ' शतपथब्राह्मण ' में कहा है- ' देवो भूत्वा दे॒वान् एति ' ( १४।६।१०।४ ) ।

98श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )

इस प्रकार हम लोग भी अग्निके उपासक होनेसे उसके लिङ्ग ' शिखा'को धारण करते हैं, और उस चिह्नको धारण करना भी चाहिये । ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ आदि तीन आश्रमों में अग्निकी उपासना कही गई है । अनग्नि ( अग्निरहित ) होकर हम प्रत्यवाय- भाक् माने जाते हैं । संन्यास आश्रम में जब कि अग्निका त्याग कहा है; तब अग्निके चिह्न शिखाका भी त्याग कहा गया है । अग्नि- सेवन ( यज्ञ ) के अधिकारपट्ट ( यज्ञोपवीत - सूत्र ) का भी त्याग कहा गया है । ऐसी स्थिति में पुरुषका अग्निमय संसार से भी कोई सम्बन्ध नहीं रहता । तभी तो मृत्यु के समय भी संन्यासीको अग्निसे नहीं जलाया जाता । इससे स्पष्ट है कि - हमें तीन आश्रम तक शिखाका त्याग ठीक नहीं । अग्निके उपासक शिखाके श्रद्धालु हमारे प्राचीन ऋषि - मुनि जलवायु आदिका सेवन करते हुए भी परम तेजस्वी थे! तेजस्वी होने से ही वर - शाप आदि देने में भी समर्थ हुए । इसीलिए ही शिखा में अधिक बल भी ब्राह्मणादियों में था । आज वे ही शिखाकी उपेक्षासे तेजोहीन होगये हैं । शिखात्याग सर्वथा नहीं करना चाहिये । ऐसा करनेपर यही शिखा आपको तेजस्वी बनायेगी । शिखा त्यागका ही परिणाम देशनिर्वासन वा पाकिस्तान हुआ है |

अन्य उपपत्ति

( १६ ) पुरुष शक्तिके यौवनका विकाश मुख छाती आदि स्थानों में केशनिर्गमके द्वारा होता है, किन्तु स्त्रीके यौवनका विकास इस केशनिर्गम द्वारा न होकर मासिक ऋतुधर्म, स्तनोंमें दूध तथा 99जरायुकी वृद्धि द्वारा होता है । जब यौवन - विकासके साथ केश- निर्गमका सम्बन्ध है तो जिस प्रकार वृक्षकी शाखा काटने से उसमें नवीन शाखा निकलनेका वेग बढ़ता है, उसी प्रकार प्रतिदिन केश काटते रहने से या दाढ़ी - मूंछ मुण्डवाते रहने से यौवनका वेग भीतरी कामशक्ति रूपमें स्नायुओं में अधिक प्रकट होता है और वह शुक्रके बाहर करवाने में सहायक होकर क्रम - क्रम से क्षीणताको प्राप्त करता जाता है । यही कारण है कि — ब्रह्मचारी, एवं वानप्रस्थ के लिए विशेषकर केशधारणकी विधि शास्त्रों में आई है । केश धारण करनेसे काम - सम्बन्धी नसोंका वेग स्वभावतः दबा रहता है और शुक्र के बाहर होनेकी उत्तेजना प्राप्त नहीं होती । संन्यासी तो उस यौवनावस्थाका पार करके ही होता है; पहले भी संन्यासी हो जावे; तो ‘ सोऽहम् ' भावमें अभेदबुद्धिवश कामकी चिन्ता ही नहीं रहती; अतः यतिगरण मुण्डन कराते हैं । गृहस्था- वस्थामें यौवनका कुछ उपयोग अपेक्षित होता ही है; अतः गोखुर- इतने केश सिरके मध्य में रखकर शेष केश समय - समय पर कटाये जाते हैं । गोखुर में सिरके मध्यका अंश, और कुछ पीछे का अंश ढक जाता है; वही शिखाके रूपमें सिरके ऊपर रहता है । योग- शास्त्रके सिद्धान्तानुसार सिरके मध्यके उस अंशके नीचे ब्रह्मरन्ध्र और ब्रह्मरन्ध्रके ठीक ऊपर सहस्रदल कमल में परमात्माका केन्द्र- स्थान है । विज्ञानके अनुसार मस्तिष्क - भागमें कामका केन्द्र स्थान है । इन दोनों अंशोंमें शिखास्थान में केशराशि रखनेसे आत्मिक शक्ति बनी रहती है और काम - चिन्तनशक्ति दबी रहती है । इसी 100कारण हिन्दुजातिमें शिखाके रखनेके कारण ही बल, आयु, तेज, आत्मचिन्तन, कामका संयम भी दीखता रहा है; अन्य जातियों में वैसा न रहने से उच्छृङ्खलता, नास्तिकता, कामुकता, विलासिता, कायरपन आदि स्वाभाविक होते हैं । अव हिन्दुओं में भी शिखाकी स्थापनामें आस्था घटती जानेसे पूर्वोक्त गुण भी घटते चले जा रहे हैं और अन्य दुर्गा बढ़ते चले जा रहे हैं । जो गुण जिसके होनेपर होता है, जिसके नष्ट होने पर नहीं होता; वह उसीका धर्म माना जाता है ।

ध्यानके समय प्रोजः - शक्ति प्रकट होती है । यदि परमात्माका ध्यान किया जाय; तो मस्तकके ऊपर शिखाके रास्ते से योजः शक्ति प्रकट होती है; परमात्माकी शक्ति उसी पथसे अपने भीतर आया करती है । इससे तेज श्रायु आदि की वृद्धि होती है । परमहंस यति लोग सदा ही ब्रह्मसे मिले रहते हैं; इसलिए उन्हें पृथक् -रूपसे शिखा द्वारा शक्ति खींचनेकी आवश्यकता नहीं होती है । ब्रह्मचारी और वानप्रस्थी शिखा और जटा द्वारा, गृहस्थी लोग गोखुर - शिखा द्वारा इस शक्तिका ग्रहण करके अपनी आध्यात्मिक तथा आधिदैविक उन्नति प्राप्त करते हैं । शिखाधारण, शिखास्पर्श, शिखाबन्धन आदि प्रक्रिया- द्वारा सहस्रदलकमलकी ओर झुकाव ' रहने से आत्मदृष्टि मनुष्य में बढ़ा करती है - यही शिखाका रहस्य है ।

बार - बार बाल छंटवाते रहने से, शिखा न रखनेसे, दाढ़ी - मूंछ बार - बार मुण्डाते रहने से कामसम्बन्धी नसों में उत्तेजना फैलती ' है; अतः ऐसे मनुष्य प्रायः विषयी एवं विलासी हुआ करते हैं ।

101शिखाकी वैज्ञानिकतां

स्थूल शरीरके सुन्दर बनाने में लगे रहने से उन्हें शिखा उसमें असुन्दरताका कारण प्रतीत होनेसे उसे वे कटा डालते हैं । ऐसे पुरुष वा जातियाँ आत्मोन्नतिको खोकर विषय - विलासी बने रहते हैं । इसी कारण हमारे शास्त्रों में शेष बाल भी जब चाहे न कटवा- कर किसी तिथि - विशेष वा नक्षत्र - विशेष वा वार- विशेषों में मुण्डित करनेका आदेश दिया है । ऐसा करनेसे उस आदेशके वशंवद होनेसे हममें सुन्दरताका भाव तथा तन्मूलक कामोत्तेजना नहीं रह पाती । इसके अतिरिक्त उस तिथिके देवता वा नक्षत्र के देवता, वा वारके देवतासे संयमशक्ति में सहायता प्राप्त हो जाती है; और उस दिन नखकेशादिमें जीवन नहीं रहता अर्थात् मनुष्य - शरीरके साथ उनका चेतनता - सम्बन्ध नहीं रहता । अतः ऐसे समय में केश- कर्तन मुण्डनादि द्वारा हमारी नसों में उच्छृङ्खल कामोत्तेजना भी नहीं होती । हमारे सूक्ष्मदर्शी प्राचीन महानुभाव सूर्य नक्षत्रादि देवताओं का हमारे शरीर पर भिन्न - भिन्न दिन भिन्न - भिन्न प्रभाव जानते थे- जिसका आभास कभी - कभी श्राजके वैज्ञानिकोंको भी होजाता है । अतः कई तिथि - विशेषोंमें स्त्री गमनादिका भी हमारे पूर्ण वैज्ञानिक महानुभाव निषेध कर गये हैं । तिथि - विशेष में काटे गये हमारे • केशादि यदि किसी जादूगरके हाथमें पड़ भी जायँ; तब भी वह हमारा अनिष्ट करनेमें सक्षम नहीं हो सकता । बिना वार, तिथि, नक्षत्रका विचार किये केवल सुन्दरताका लक्ष्य करके केश आदि · कटवाते रहनेसे, चुर वा रेज़रोंका जब - तब प्रयोग करते रहने से, हमारी कामोत्तेजनाकी वृद्धि, पुस्त्वनाश, यौवनका शीघ्र ही जीर्ण- 102शीर्णताको प्राप्त होजाना- इत्यादि बातें हुआ करती हैं । उसका दुष्परिणाम - प्राचीन मर्यादाओं को तोड़ रहे हुए हम लोग - प्राप्त करते हुए दिनोंदिन ह्रासको प्राप्त होने जा रहे हैं ।

( १७ ) स्त्रियोंके लिए केश काटना नहीं है; क्योंकि उनका स्त्री- शक्तिविकाश ऋतुधर्म, जरायु आदि द्वारा होता है; अतः स्त्रियाँ अपने प्राकृतिक धर्मको छोड़कर यदि पुरुषों की तरह बाल कटवाना प्रारम्भ करेंगी; तो उनमें स्त्रीसुलभ शक्ति घट जायगी; उनके प्राकृतिक विकाशमें बाधा पहुँचेगी; जिससे उनके ऋतुधर्म, स्तनोंसें दूध आदिमें बाधा आकर वे ' मां ' बननेसे रह जायंगी; उनमें प्रोजकी न्यूनता तथा मातृभावका नाश होकर पुरुषभाव आने लग जायगा, और जरायु, प्रसव, मासिकधर्म श्रादिके विषयमें अनेक रोग उत्पन्न होकर उनके शरीरोंको भीतर से खोखला कर डालेंगे । प्रायश्चित्तमें भी उनका केवल चार अंगुल केश काटनेकी विधि है, पूरा शिरोमुण्डन नहीं किया जाता । केश रखनेसे ही उनके उत्पन्न होनेवाले बच्चोंके मस्तिष्कको भी लाभ पहुँचता है । हाँ, निवृत्तिके श्राश्रममें उन्हें ( स्त्रियोंको ) भी मुण्डन आदिष्ट है । वैधव्य स्त्रियोंका संन्यास है; उसमें निवृत्तिवश उत्तेजनाकी आवश्यकता नहीं रहती; अतः वैधव्यमें स्त्रीका केश पूरा काट देनेका विधान वेद - शास्त्रानु- शिष्ट है ।

शिखा ब्रह्मरन्ध्रकी पताका

( १८ ) फलतः द्विजोंकी शिखा बल, वीर्य,. स्वास्थ्य तथा " आध्यात्मिक उन्नतिके साधन होनेके साथ ही साथ उत्तम जातीय - चिह्न 103भी है । यह शिखा ब्रह्मरन्ध्र - स्थलकी पताका है । इस शरीररूप किलेके पाँच तट, सात गर्भगृह, साढ़े तीन लाख छोटी कोठियाँ तथा सात महल हैं । सातवें महल में सम्राट्रूप ज्योतिः- स्वरूप परब्रह्मका निवास है 1 । जैसे दुर्गके राजनिवासस्थल में विशेषता के लिए पताका- ध्वजा - झण्डा आरोपित किया जाता है; वैसे ही इस शरीर रूप दुर्गमें ब्रह्मरन्ध्र - स्थल में जहाँ ब्रह्म गुप्त रहता है; वहीं शिखारूप पताका भी रखी गई है । यह शिखा उस ब्रह्मरन्ध्रको सूचित करती है; इसीलिए सनातनधर्मके आचार्योंने वहाँ शिखा रखवाकर गायत्री- मन्त्र से सन्ध्याके समय शिखाबन्धनकी प्रणाली प्रचलित की है । शिखाबन्धनसे केवल बिखरे हुए बालोंके समेटने में तात्पर्य नहीं; जैसेकि अर्वाचीन सम्प्रदायके व्यक्ति कहते हैं; किन्तु अपनी चित्तवृत्तिको सन्ध्या - समय में ब्रह्मरन्धके पास ब्रह्मध्यानके बन्धनमें बद्ध करनेमें तात्पर्य है ।

उक्त किलेके पाँच तट हैं पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश । सात गर्भगृह हैं रोम, चर्म, रुधिर, मांस, अस्थि, मज्जा, शुक्र । साढ़े तीन लाख नाडियाँ ही छोटी कोठियाँ हैं । सात महल सात पद्म हैं । पहला चतुर्दल- पद्म आधारचक्र है । दूसरा षड्दल - पद्म मणिपूरनामंक चक्र है । तीसरा दशदल- पद्म स्वाधिष्ठान चक्र है । चौथा द्वादशदल - पद्म अनाहत चक्र है । पांचवां षोडशदल - पद्म विशुद्ध नामक चक्र है । छठा द्विदल पद्म आज्ञाचक्र है, इस सन्धि- स्थानमें ही अर्थात् त्रिकुटी महलमें इतर नामक लिङ्ग है, जिसके द्वारा सहस्रदल - पद्म दिखलाई देता है । जिसकी कर्णिका को 104सूर्यके समान प्रभा वाला ब्रह्म रहता है । सातवाँ सहस्रदल पद्म है ।

इस प्रकार वह ब्रह्मरन्ध्र - जिसके ऊपर शिखा है, उनमें सम्राट्- रूप ब्रह्मके निवास होनेसे उसपर पताकारूप शिखाका स्थापन भी आवश्यक सिद्ध हुआ । शिखाका मुख्य स्थापन धर्मरूप एवं कर्माङ्ग- रूपसे स्थापन द्विजोंकेलिए है, गौणता तथा चिह्नादिरूपसे स्थापन हिन्दु- जातिमात्रकेलिए है । शिखा बांधकर कर्म करने से उसके निम्नस्थान में स्थित ब्रह्मके साथ सम्बन्ध होनेसे उस कर्ममें मनकी स्थिरता होजाती है; उस स्थानकी रक्षा भी होजाती है । ग्रन्थिसे बाह्य आघात से रक्षा अवश्य होती है । स्वा ० दयानन्दजीने भी अपनी ' पञ्चमहायज्ञविधि ' ( ५ पृ ० ११ पं ० ) में ' इसके अनन्तर गायत्री मन्त्रसे शिखाको बाँधके रक्षा करे ' इससे शिखाबन्धन से रक्षा मानी है । बालोंके इधर - उधर न फैलनेकेलिए ही शिखा बन्धन मानना तो शुष्कतर्कमात्र है; इस भयसे तो लोग शिखाको ही कटवा देंगे — ' न रही बाँस, न बजी बाँसुरी ' । तब इस प्रकारके तर्क अश्रद्धा के

बढ़ानेवाले होते हैं ।

शिखासे दृष्ट अष्टमें लाभ

( १ ९ ) इस प्रकार शिखाका अदृष्टमें जहाँ लाभ है; वहाँ वह हिन्दुत्वका चिह्न भी है; ३३ करोड़की हिन्दु धर्मशाला में प्रविष्ट होचुके हुएका चिह्न है । उससे शारीरिक लाभ भी है, क्योंकि शरीरके सब मर्मस्थानोंका सम्राट् शिखास्थानमें ही विराजमान है । वहाँ पर शीतोष्ण अत्यन्त शीघ्र प्राप्त होजाता है । अधिकता से प्राप्त शीतोष्ण भीतरी स्नायु, मांस, रुधिर आदिमें अपना प्रभाव पहुँचाकर हानि 105पहुँचा देते हैं । वहाँ पर पड़ा हुआ साधारण आघात भी हानि पहुँचाता है | वहाँका शिखारूप केशसंघात उस हानिसे रक्षा करता है ।

इसके अतिरिक्त ' ऊर्ध्वमूल, अधःशाख ' यह शरीर वृक्षरूप है । इसका मूल सिर है, शिखाके केश मूलशिफा ( जड़ें ) हैं । कन्वेके भागसे कमर तकका भाग शाखाएँ हैं, हाथ - पाँव आदि कर्मेन्द्रियाँ, नेत्र, श्रोत्र आदि ज्ञानेन्द्रियाँ प्रशाखा हैं । भांति - भांति के विषय इसके पत्ते हैं, सुकर्म - कुकर्म इसके फूल हैं, सुख - दुःख आदि इसके फल हैं । किसी वृक्षकी मूलशिफा ( जड़ें ) कभी काटी नहीं जातीं, क्योंकि उनके काटने से वृक्ष आरूढमूल नहीं होता । इसी कारण ही वृक्षारोपण के लिए एक स्थान से अन्य स्थानमें ले जानेके समय जब पौघेको ले जाया जाता है; तब मूलशिफाओंके संरक्षणार्थ विशेष ध्यान दिया जाता है । फलतः वृक्षके अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित, फलित होनेकेलिए जैसे उसकी मूलशिफाओंका काटना ठीक नहीं होता; वैसे ही शरीर वृक्षकी रूढमूलता के लिए भी मूल- शिफाभूत शिखाका रखना आवश्यक ही है, जिसके कारण हिन्दु- जाति अनन्त शताब्दी - सहस्राब्दियोंसे लेकर आजतक भी जीवित है; शिखाके काटने - कटवानेवाली जातियाँ उत्पन्न होकर नष्ट होगईं ।

शिखाकी गाँठ

( २० ) शिखा में गायत्री मन्त्र द्वारा प्रन्थि दी जाती है । इसे सब जानते हैं कि- शिखा मस्तिष्कके केन्द्र - बिन्दुपर स्थापित है । जैसे— रेडिय़ोके ध्वनि - विस्तारक केन्द्रों में ऊंचे खम्भे लगे होते हैं; 106वैसे ही हमारे मस्तिष्कका विद्युत्- भाण्डार शिखास्थान पर है । इस केन्द्रमें हमारे विचार, संकल्प और शक्ति- परमाणु प्रतिक्षण बाहर निकल - निकलकर आकाशमें दौड़ते रहते हैं । इस प्रवाहसे शक्तिका अनावश्यक व्यय होता है, और अपना मानसिक कोष घटता है । इसका प्रतिरोध करनेकेलिए शिखा में ग्रन्थि लगाई जाती है ।

सदा ग्रन्थि लगाये रहने से अपनी मानसिक शक्तियों का बहुत सा अपव्यय बच जाता है । इस ग्रन्थिको सन्ध्याके समय से बांधा जाता है । उस समय अनेक सूक्ष्म तत्त्व आकर्षित होकर अपने अन्दर स्थित होते हैं । वे सब मस्तिष्क- केन्द्र से निकलकर बाहर न उठ जाएँ कि कहीं अपनी साधना के लाभ से वंचित रहना पड़ जाय, इससे शिखामें गाँठ लगाई जाती है ।

फुटबालके भीतरके ब्लेडर में एक हवा भरनेकी नली होती है, उसमें गाँठ लगा देनेसे भीतर भरी हुई वायु बाहर नहीं निकलने पाती । साइकलके पहियों में भरी हुई वायुको रोकने केलिए एक छोटी वालट्य ूब नामक रबड़की नली लगी होती है, जिसमें होकर हवा भीतर तो जा सकती है, पर बाहर नहीं आसकती । गाँठ लगी हुई शिखासे भी यही प्रयोजन पूर्ण होता है । वह बाहर के विचार और शक्तिसमूहको ग्रहण तो करती है, पर भीतरके तत्त्वोंका अनावश्यक व्यय नहीं होने देती । आचमनसे पूर्व शिखाबन्धन इसलिए नहीं होता, क्योंकि उस समय त्रिविध शक्तिका आकर्षण किया जाता है, फिर उसे बांध दिया जाता है । यही शिखाग्रन्थिका रहस्य है ।

107( २१ ) एक तर्क यह किया जाता है कि - मुसलमान, ईसाई आदि चाहिये कि सूक्ष्मरूपसे हानि होती अवश्य है, परन्तु उसके अनुभव न होने से उन्हें उसका पता नहीं लगता । इससे उसकी अनाव- शरीरके स्वास्थ्यके कहे हैं; उनका उल्लङ्घन करने से आपाततः तो हानि प्राप्त होती हुई नहीं दीखती; परन्तु सूक्ष्मरूपसे वह होती अवश्य है । अनुभव न होने से उन नियमों को बतानेवाला आयुर्वेद तथा वे नियम युक्त नहीं हो जाते । वह हानि उत्तरोत्तर नियमों के उल्लङ्घन करते रहने से भीतर सञ्चित होती हुई शारीरिक शक्तिकी दुर्बलता में ज्वरादिरूपमें प्रकट होजाती है; परन्तु हम उसका कारण नहीं जान पाते । वैसे शिखाके भावाभावमें भी जान कारणता मानी जावेगी । क्योंकि — जो बात जिसके होनेपर होती है, जिसके न होनेपर नहीं होती, वह उसीकी मानी जाती है । नैषधचरितके चतुर्थसर्ग में लिखा है- ' तदुदितः स हि यो यद- नन्तरः ' । स्वा ० शङ्कराचार्यने ब्रह्मसूत्र ( ३ । ३ । ५३ सूत्र ) के भवति, स तद्धर्मत्वेन अध्यवसीयते ' । "

भाष्यमें कहा है- ' यो हि यस्मिन् सति भवति, असति च न

108श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )

हमारे प्राचीन महानुभाव जहां लाभ देखते थे; उसको अवश्य नियत करते थे; बल्कि उसमें अर्थवादों का प्रयोग करने में भी संकुचित न होते थे । पहले समय यज्ञों में गुडूची ( सतगिलोय ) या सोमरस ) का उपयोग हुआ करता था; परन्तु उसके कसैले होने से बटु उससे मुह फेर लेते थे । तव प्राच्य लोग कहते थे- ' शिखा ते वर्धते वत्स! गुडूचीं श्रद्धया पिब ' । जैसे आजकल के शिक्षित जनोंको पता लग जावे कि अमुक ओषधि सेवनसे दाढ़ी - मूंछ तथा चोटीके बाल उत्पन्न नहीं होते; तब उस ओषधिके कड़वी होनेपर भी वे उसका सेवन बड़े संरम्भसे करेंगे; वैसे ही प्राचीनकालमें गुडूचीको शिखा बढ़ानेवाला समझकर बटु उसका पानकर जाते थे; इससे स्पष्ट है कि वे बढ़ी हुई शिखाको लाभ- जनक मानते थे ।

सनातन - हिन्दुधर्ममें जिन वस्तुओंकी पूजा प्रचलित है; जैसे कि- तुलसीपूजा, गोपूजा, व्रतानुष्ठान, शिखा आदि; जिनकेलिए वहां अर्थवाद भी उपन्यस्त किये जाते हैं; आपातदर्शी लोग उनमें उपहास करते हैं; पर वैज्ञानिकोंने उनमें उनकी श्रद्धाधिकता पर विचार किया; तब उन्होंने तुलसी, गाय, व्रत आदियोंमें अनुसन्धान करके बड़े लाभ देखे । तब उन्होंने उन लाभका प्रचार किया । अब वर्तमान शिक्षितोंका भी उधर ध्यान पढ़ने लंगा है । खेदकी बात है कि- आजके शिक्षित लोग हमारे पूर्वजोंकी · आज्ञासे तो उनका आदर नहीं करते; पर जब आजके पाश्चात्य वैज्ञानिक उनपर अपनी स्वीकृतिकी मुहर लगाते हैं; तभी उनका 109श्य

उधर ध्यान पड़ता है । वस्तुतः यह ' परप्रत्ययनेयबुद्धिता ' है, जो भी

ठीक नहीं ।

शिखा के अन्य लाभ

ले

( २२ ) गोखुर -परिमित शिखाके रखने से वीर्य की गति ऊपरको

होती है; वह वीर्य परिपाकको प्राप्त हुआ हुआ तेज - रूप होकर

शिखा के नीचे रहता है । इसी तेजको हिन्दु लोग मस्तिष्क मानते से

हैं । मनुष्य में यह तेज जितना गाढ होता है, मनुष्य उतना ही

मस्तिष्कशाली तथा चिरायु होता है I

। इसी तेजको आज भी कहते

हैं; शिखा उसके संरक्षणका मुख्य साधन है; वैसा होने पर बहुत का

पुत्र होते हैं; शिखा त्यागियोंकी तो बहुत कन्याएं उत्पन्न होती हैं भ

अतः शिखास्थापन लाभप्रद ही है ।

ए माना जाता है, वैसे शिखाके केशरूप स्वाङ्गसे रहितको भी

इसके अतिरिक्त बाल स्वाङ्ग ( अपना अङ्ग ) माने जाते हैं,

शिखाके बाल तो विशेष अङ्ग हैं । जैसे श्रङ्गहीन मनुष्य अशुभ ग समझना चाहिये । वह ऐहिक, पारलौकिक शुभकर्म कलापका ता अधिकारी नहीं रहता । जो लोग शिखासे अपने सिरकी शोभाकी में हीनता मानते हैं, सीमन्त ( मांग निकालने ) आदि से अपनी शोभा में का लगे हुए स्त्रीत्वको बढ़ा रहे हैं; इसके परिणामस्वरूप उनकी कन्या- की सन्ध्या आदिके समय आकाश द्वारा शिखाग्रन्थिको द्वारीभूत

सन्तानें बढ़ रही हैं, अथवा सन्तानहीनता हो रही है ।

न्य करके व्यापक दिव्य - शक्तिका आकर्षण होता है और ब्रह्मरन्ध्रमें का प्रवेश होता है । इस विषय में पाश्चात्य विद्वान् विक्टर ई क्रोमरका 110मत पहले दिखलाया जा चुका है । एतदर्थ ध्यानके समय नंगे सिर रहनेका तथा शिखाग्रन्थिबन्धनका नियम है । ' स्नाने दाने जपे होमे सन्ध्यायां देवतार्चने । शिखाग्रन्थिं विना कर्म न कुर्याद् वै कदाचन ' ।

जैसे वस्त्रमें बन्धी गांठ तरह - तरह के कार्य में लगे पुरुषको विशेष कार्य याद करा दिया करती है, वैसे ही शिखाकी गांठ भी सांसारिक कार्य में लगेहुए पुरुषको अपने कर्तव्य वैदिक कर्म - कलापको याद करा देती है शिखाबन्धन मन, वाणी, शरीरकी चंचलता नष्ट कर अपने कर्त्तव्य कर्म में स्थिरता कर दिया करता है । मन, वाक्, शरीरकी स्थिरतापूर्वक किया हुआ ही कर्म शुभफलप्रद हुआ करता है । इस कारण शास्त्रकारोंने शुभ कर्मके प्रारम्भ में शिखाबन्धनका आदेश दिया है । इसीलिये ' आह्निक - तत्त्व ' में भी लिखा है- ' गायत्र्या तु शिखां बद्ध्वा नैऋत्यां ब्रह्मरन्ध्रतः । जूटिकां च ततो बद्ध्वा ततः कर्म समारभेत् । निबद्धशिख श्रासीनो द्विज आचमनं चरेत् । कृत्वोपवीतं सर्व्वेसे वाङ्मनःकायसंयतेः ' । बद्ध शिखा कब छोड़नी चाहिये - इस विषय में भी कहा है- ' शौचेऽथ शयने सङ्ग भोजने दन्तधावने । शिखामुक्तिं सदा कुर्यादित्येतन्मनुरब्रवीत् ' । शौच - शयन आदिके समय उसे खोल देना चाहिये ।

जबकि सब सम्प्रदायों में कई साम्प्रदायिक चिन्ह नियत दिखाई देते हैं; उनका विशेष प्रयोजन न होने पर भी उन्हें वे छोड़ते नहीं; तब शिखाको ही क्यों छोड़ दिया जावे? यह शिखा तो प्रयोजनवती भी है, हिन्दुजातीय विशेष चिन्ह भी है । तब उसका त्याग कैसे 111नर ठीक हो सकता है? स्वामी दयानन्दजीने भी कहा है - जो वै ईसाइयोंके सदृश बन बैठना व्यर्थ है । ( सत्यार्थप्र ० ११ समु ०

विद्या (? ) का चिन्ह यज्ञोपवीत और शिखाको छोड़कर मुसलमान- ष दोप

पृ ० २४४ )

क ( २३ ) कई आक्षेप करते हैं कि मुद्गल नामक ब्राह्मण ने को कार्तिक - माहात्म्यमें ( १५।५५-५६ ) ' इत्युक्तः सोऽपतद् वन्हौ सर्वेषामेव

ल पश्यताम् । मुद्गलस्तु तदा क्रोधात् शिखामुत्पाटयत् स्विकाम् । ६, ततस्त्वद्यापि तद्गोत्रे मौद्गला अशिखाभवन् ' अपनी शिखा उखाड़ का बात ठीक नहीं । रागद्वेषसे किया जानेवाला कार्य प्रमाणभूत नहीं = होता । जब चौल राजा से बहुत यज्ञदान आदि अपने आचार्यत्व में

डाली थी; अतः शिखा रखना - न रखना अपनी इच्छा पर है ' यह नं और उसके प्रतिद्वन्द्वी विष्णुदास ब्राह्मणकी साधारण कार्तिकव्रत

कराने पर भी राजगुरु मुद्गलने उसकी सद्गति - प्राप्ति न देखी,

आदिसे भी विमान प्राप्ति देखी; इस खेदसे राजाका यज्ञकुण्डकी ब

अग्निमें गिर जाना देखा; तो क्रोधसे अपनी शिखा उखाड़ डाली ।

वह उसका क्रोधमूलक विरुद्ध आचार था । उस मुद्गलका ई क्योंकि - ‘ देश - जाति - कुलधर्माश्च आम्नायैरविरुद्धाः प्रमाणम् ' ( गौतम-

अनुकरण मुद्गल - गोत्रवालोंको भी उचित नहीं; अन्योंका तो क्या

कहना? इतिहासवर्णित सभी व्यवहार आचरणीय नहीं हो जाता । ती आम्नायसे विरुद्ध ही है, अतः ग्राह्य नहीं । ' श्रियै शिखा ' ( यजु ०

धर्मसूत्र २ २ २ ० ) शिखात्याग किन्हींका कुलधर्म होनेपर भी 112वा ० सं ० १६। २ ) इस आम्नाय वचन से शिखाका स्वीकार अनिवार्य है । ‘ मङ्गलार्थं शिखिनोऽन्ये ' ( ४०।७ ) इस ' काठक- गृह्यसूत्र ' के सूत्र पर देवपालने लिखा है- ' निः शिखत्वं तु अमङ्गलधर्मोऽरिष्टहेतुः ' । तथा च पठन्ति - ' अमेध्यमेतत् शिरोऽशिखम् ' ' यत्र वाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव ' इति निन्दावादः, यन्मूलं शिखा कर्मस्मरणम् ' । ' खल्वाटत्वादिदोषेण विशिखश्चेन्नरो भवेत् । कौशीं तदा धारयीत ब्रह्मग्रन्थियुतां शिखाम् ' यह ' नागदेव ' का वचन खल्वाटत्वमें अनुसरणीय है । तब कुशाकी शिखा बनावे । शिखाको काटना पहले समय में तब होता था; जब किसीको मृत्युदण्ड - जैसा दण्ड देना हो । तब उसे स्वयं कटवा डालना अपने आपको मृत्युदण्ड देना है ।

( २४ ) कई महोदय उपनयनकाल में ' पारस्करगृह्यसूत्र ' में ' पर्यु प्तशिरसमलङ्कृतमानयन्ति ' इत्यादि वचनों से ' मुण्डो वा ' इस मनु - वचनसे, ' सशिखं वपनं कार्यम् आम्नानाद् ब्रह्मचारिणाम् ' इत्यादि छन्दोगपरिशिष्टके वचनसे चूडाकरणमें लड़केका शिखा- सहित मुण्डन मानते हैं - वह भी ठीक नहीं, क्योंकि गृह्यसूत्रोंमें शिखा छोड़कर ही मुण्डन कहा है, यह हम पूर्व कह ही चुके हैं । इसलिए इस संस्कारका नाम भी ' चूडाकरण ' है, ' चूडायाः - शिखायाः करणम् - स्थापनम् । तब चूड़ाका करण शिखातिरिक्त केश मुण्डनसे ही हो सकता है । ' तं च ( कुमार ) पर्युप्तशिरसम् ' ( २।२२५ ) इस पारस्करके वचनमें ' परितः सर्वतः उप्तम् - मुण्डितम् ' यह देखकर मध्य शिखाका काटना तो ठीक नहीं । ' परिक्रमा ' शब्द में जैसे ' परितः 113क्रमणम् ' अर्थमें मध्यवाले देवप्रतिमास्थानको छोड़कर ही चारों ओर परिक्रमा होती है, ' पर्यु'क्षण ' शब्द में जैसे ' परितः उक्षणम् ' अर्थ में यज्ञकुण्डके मध्यवाले प्रदेशको छोड़कर ही चारों ओर जल- सेचन होता है, ' परितः कृष्णं गोपाः ' इसमें भी गोपोंकी स्थिति मध्यस्थित कृष्ण -अधिष्ठित देशको छोड़कर ही सर्वसम्मत है; वैसे ही सिर के मध्यदेश ( शिखा ) को छोड़कर ही मुण्डन ' पर्यु ' प्रशिरसम् ' शब्दसे उपदिष्ट है, सम्पूर्ण नहीं । इसी कारण ' तासां ( गौणशिखानां ) मध्यशिखावर्जमुपनयने वपनं कार्यम् ' यह ' निर्णयसिन्धु ' में कहा है, ' उपनयनकाले मध्यशिखेतरशिखानां वपनं कृत्वा मध्यभाग एव उपनयनोत्तरं शिखा कार्या ' यह ' धर्मसिन्धु ' में कहा है । तब मध्य- शिखाका मुण्डन कहीं भी विहित नहीं ।

अथवा ' एते लूनशिखास्तत्र दशनैरचिरोद्गतैः । कुशाः काशा विराजन्ते बटवः सामगा इव ' इस ' वीरमित्रोदय ' ( संस्कार - प्रकाश, उपनीत - धर्मप्रकरण ) स्थित ' विष्णु पुराण ' के वचन से कई छन्दोग- शाखावालोंका, अथवा ' मुण्डा भृगवः ' ( ४०।४ ) इस ' काठकगृह्यसूत्र'- के वचनसे भृगुगोत्रियोंका शिखा सहित मुण्डन मान भी लिया जावे; तथापि इनसे भिन्नोंका वैसा व्यवहार कैसे हो सकता है? ऐकदेशिक व्यवहारका सार्वदेशिकता में उपयोग करनेमें कोई प्रमाण नहीं ।

( २५ ) कइयों का यह विचार हो कि - ' चूडाकरणमें मुण्डन इसलिए हुआ करता है कि लड़का माताके गर्भसे जिन बालोंको लाया; उनका मुण्डन कर्तव्य ही है; क्योंकि — उन गर्भज केशों में

114शुद्धता तथा हानिप्रद गैस हुआ करती हैं; तब माता के गर्भ से आये हुए बालोंको शिखाकेलिए ही क्यों रखा जावे? इस कारण उनके सारे सिरका ही मुण्डन इष्ट है ' परन्तु यह बात ' चूडाकरण ' से विरुद्ध ही है; सर्वमुण्डनमें ' चूडा - करण ' किस प्रकार हो सकता है? तथापि उनके भी मत में बालकके अपने वालोंके उत्पन्न होने के बाद शिखाका रखना इष्ट होता है; हमारे मत में तो मातृगर्भस्थ शिखाकेश स्वयं ही क्रमसे गिर जाते हैं; क्रमशः नवीन केश उनके स्थानको लेते जाते हैं । अतः शिखाके केशोंका मुण्डन आवश्यक नहीं । शेष केशोंका ही वहां मुण्डाना सफल है । ' मुण्डो वा, जटिलो वा स्याद्, अथवा स्याच्छिखाजट: ( २।२१६ ) यह मनु - वचन उपकुर्वाण सामग ब्रहाचारियोंके लिए है - जैसा कि पूर्व ' विष्णु- पुराण

' ' का संवाद दे चुके हैं, सर्वसाधारणकेलिए नहीं । अथवा ' मुण्ड ' से नैष्ठिक ब्रह्मचारियोंका बोध होता है; उनका संन्यासियोंकी तरह गेरुआ वस्त्र पहनने आदिका आचार होनेसे मुण्डन भी उनका उन्हीं की तरह शिखा सहित हो जाता है । अस्तु-

इस प्रकार शिखाका स्थापन रहस्यमय होनेसे आवश्यक सिद्ध हुआ । परमुखापेक्षी, परानुकरणप्रवण तथा अकर्मण्य लोग ही दूसरों के अवगुणोंको गुण जानते हुए, अपने गुणों को भी अवगुण जानते हैं; क्योंकि – अकर्मण्यतासे उनकी विवेचना - शक्ति नष्ट हो जाती है; तभी वे अपने पूर्वजोंसे नियमित ' श्रियै शिखा ’ ” ( यजुः १६/६२ ) इस वैदिक शोभाको भी अवहेलित करके शिखा- हीनता को ही श्री जनक मानते हैं; परन्तु इस प्रकारके दूसरोंके

115अनुकरणमें लगे व्यक्ति अपनी जाति एवम् अपने सम्प्रदाय तथा

अपने धर्मके अहित - कारक होनेसे दूरसे ही नमस्करणीय हैं । ना रखने से सिरमें भार समझते हैं, लार्ड मैकालेके मानसिक दास

जो ' हैट ' पहनने से तो सिरमें भार नहीं समझते, परन्तु शिखा थ छोड़ देगी; तो उसके न होने पर निम्न हानियाँ होगी; तब अधि-

परानुकरण - प्रवण वे वस्तुतः दयनीय हैं । यदि हिन्दुजाति शिखाको क आदिसे शीघ्र हानि हो सकती है । अधिपतिकी म्लानिमें उसके

पति - नामक सम्राट्भूत मर्मस्थानकी शीत - उष्ण, जलवर्षण, वायु T, आश्रित समग्र अन्य मर्मस्थानोंकी भी ग्लानि हो सकती है; जिससे न शीत - उष्णकी सहनशक्तिका नाश हो जा सकता है ।

J- ( २६ ) समस्त जातियोंमें हिन्दु जाति ही शीत - उष्णके द्वन्द्वके सहनेमें ना प्रसिद्ध है; शीतकाल में प्रातः स्नान - सन्ध्या आदिसे नहीं डरती, च उसका कारण शिखाका धारण ही है । शिखा छोड़ने पर मर्म- ले स्थानों में दुर्बलता हो जाती है, जिससे वैसा व्यक्ति सर्दी गर्मी नहीं क अग्निहोत्र में नहीं बैठ सकता । इसके अतिरिक्त शिखा छोड़ने पर यह I सामाजिक एवं धार्मिक चिह्नविशेष नष्ट होगा, जिसकी छत्रछाया में संपूर्ण

सह सकता । सर्दीमें भूलकर भी स्नान नहीं करना चाहता । गर्मी में 7 हिन्दु - जातिकी एकता स्थापित है । एकता नष्ट होनेपर जो अनेकता - " - गति होने पर कैसी हानि होगी - यह भी परोक्ष नहीं । पुरुषत्वकी

होगी; उसकी हानि स्पष्ट है । शिखाके त्यागमें शुक्रकी अधोगामिनी

- हानिमें अपनी स्त्रियाँ अपने वशमें नहीं रहतीं, व्यभिचारमें लग

जाती हैं । हिन्दुः स्त्रियाँ पतियोंकी शिखाके कारण पतिव्रता प्रसिद्ध 116हैं । जिन जातियोंमें शिखास्थापन नहीं होता वा हटता जाता है; उस जातिकी ही स्त्रियाँ अधिक व्यभिचार में लग जाती हैं; तलाक यदि वही करती या चाहती हैं । यह एक बड़ी भारी हानि है ।

शिखा शुक्रकी ऊर्ध्वगति में सहायक हुआ करती है । ऊर्ध्वरेताः ही जितेन्द्रिय होता है । जितेन्द्रियों के ही घरमें योगियों का जन्म सम्भव हुआ करता है । उनकी स्त्रियाँ उनके वशमें होती हैं । हिन्दुजाति में ही योगियोंका जन्म अधिकतया हुआ है 1

। शिखा- त्यागमें निकम्मी, निर्धर्मक सन्तानें हुआ करती हैं । इस प्रकार शिखाके छोड़ने में बहुत हानियाँ हैं । आशा है ' आलोक ' पाठकोंने यह शिखा - रहस्य शास्त्रीय दृष्टिकोण तथा वैज्ञानिक एवं लौकिक दृष्टिकोणसे सुपरीक्षित किया होगा । आगे ' उपनयन - रहस्य ' दिया जाता है ।

सूचना - पृ ० ८ पं ० १० में ' याज्ञवल्क्यस्मृति ' उनकी अपनी पृ ० ११-१२ में ( छ ) ( ज ) ( झ ) के स्थान ( च ) ( छ ) पढ़ा जाए ।

अपौरुषेय रचना है ' यहां पर ' पौरुषेय रचना है ' - यह पढ़ना चाहिये ।

117( ४ ) यज्ञोपवीत - रहस्य

' सदोपवीतिना भाव्यं सदा बद्धशिखेन च ।

विशिखो व्युपवीतश्च यत् करोति न तत् कृतम् ॥ '

( कात्यायनस्मृतिः १1४ )

' अमौक्तिकमसौवर्णं ब्राह्मणानां विभूषणम् ।

देवतानां पितॄणां च भागो येन प्रदीयते ॥

( मृच्छकटिक ( १०/१८ )

उपनयन का अर्थ और उसके अधिकारी

संस्कार सोलह प्रसिद्ध हैं, इसे हम अग्रिम निबन्धमें लिखेंगे । उनमें भी उपनयन और विवाह यह दो संस्कार अत्यन्त प्रसिद्ध और प्रचलित हैं । उनमें यहां उपनयन विषय पर कुछ विचार किया जाता हैं । यद्यपि संस्कार सभी हैं; पर ' संस्कार ' यह नाम मुख्यतया उपनयनका ही प्रसिद्ध है । उपनयनका सम्बन्ध वेदाधि- कारियोंसे है । जिनको वेद पढ़नेका अधिकार नहीं है, उनको उपनयनका अधिकार भी नहीं है । उसका अधिकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य पुरुषोंको है । इसीलिए ' गर्भाष्टमेन्दे कुर्वीत ब्राह्मणस्यो- पनायनम् । गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भाच्च द्वादशे विशः ' ( मनु ० २।३६ ) ' अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयेत गर्भाष्टमे वा, एकादशवर्षं राजन्यम्, द्वादशवर्ष वैश्यम् ' ( पारस्क ० २।२।१ - २ - ३ ) इत्यादि वचनोंसे उपनयन स्त्रियोंका ग्रहण है ।

118ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंका वास्तविक संस्कार इसी उपनयन- संस्कारसे होता है । ' उप - समीपे नयनम् ' यह इसका व्युत्पत्त्यर्थ है । परन्तु इसका केवल व्युत्पत्त्यर्थ स्वीकार करने पर जहां - तहां अति- व्याप्ति हो सकती है । तब तो किसी पुरुषको वेश्याके पास ले जाना ( नयन ) भी ' उपनयन ' हो जावेगा । किसी शूद्रका अन्य शूद्रके समीप ले जाना भी ' उपनयन ' माना जा सकेगा; परन्तु यह इष्ट नहीं | तब यह शब्द ' विवाह ' ' श्राद्ध ' आदि शब्दोंकी भान्ति पारिभाषिक या रूढ या योगरूढ इष्ट है, केवल यौगिक नहीं । वेदमें भी इस प्रकारके शब्द देखनेसे, वहां भी यही अर्थ विवक्षित होने से वेदमें भी योगरूढ, रूढ वा पारिभाषिक शब्द सिद्ध हुए, जिन्हें वादी नहीं मानते ।

परिभाषा के अनुसार ' आचार्य के समीप वैध नयन ' ही ' उपनयन ' शब्दवाच्य हुआ करता है । इसीलिए कहा है- ' गृह्येोक्तकर्मणा येन समीपे नीयते गुरोः । बालो वेदाय, तद्योगाद् बालोपनयनं विदुः ' । आचार्यके साथ ही साथ उपनेय वटुको अग्नि तथा गायन्नीके समीप भी लाया जाता है । इसीलिए ही ' अष्टवर्ष ब्राह्मणमुपनयेत ' ( २।२।१ ) इस पारस्करके सूत्रकी व्याख्या करते. हुए गदाधर भट्टने कहा है- ' आचार्यस्य उप - समीपे माणवकस्य नयनम् ' उपनयन ' शब्देन उच्यते । उपनयनं च विधिना श्राचार्य- समीपनयनम्, अग्निसमीपे नयनं वा, सावित्रीवाचनं वा ' ।

आचार्यके पास पहुँचने पर उस वटुको आचार्यकी सेवा करनी पड़ती है जिसके द्वारा वह मानसिक - शक्तिको प्राप्त करता है और

In English

The Importance of the Shikhā

This text argues that Western education has caused many Hindus to abandon their traditional religious marks and customs. It defends the wearing of the shikhā (tuft of hair) as a vital external sign that preserves Hindu identity and unity.

This chapter answers

  • Why is the shikhā important for hindus?
  • How does western education affect hindu traditions?
  • What are the religious signs of a hindu?
  • Does wearing a shikhā help preserve hindu identity?

Also written: Shikhaki, Vaigyanika, Rahasyapurnata, Shikhaki Vaigyanika Rahasyapurnata, शिखाकी वैज्ञानिक - रहस्यपूर्णता

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 69–118 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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