श्रीगणेशाय नमः।

सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 41–50

सनातन धर्मालोक ५ · पृष्ठ 41–50

पृष्ठ 41

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ११ स्मृतिके आचाराध्यायमें ' विनायकः कर्मविघ्नसिद्ध्यर्थं विनियो-जितः । गणानामाधिपत्ये च रुद्रेण ब्रह्मणा तथा, ( २७१ ) में विनायकको विघ्नकारक कहा है; तब यदि उस गणपतिकी पूजा न की जावे; तो कर्मों के विघ्न कैसे हटें? ( ग ) प्राचीन पुस्तक ' मानवगृह्यसूत्र ' में इन विनायकोंको विघ्न-कारक बताया है । ‘ अध्येतॄणामध्ययने महाविघ्ना भवन्ति ' ( २।१४ । १-२-३ ) २१ सूत्र तक वहाँ इनका वर्णन है, इनकी शान्त्यर्थ विनायक - स्वामी गणपतिका पूजन किया जाता है । जैसे कि — श्रीयाज्ञवल्क्यने कहा - ' एवं विनायकं पूज्य ग्रहाँश्चैव विधानतः । कर्मणां फलमाप्नोति श्रियं चाप्नोत्यनुत्तमाम् । ( २६३ ) । श्रीभोजराजासे बने हुए ' समराङ्गणसूत्रधार ' ( ५८ ।१३-१४ ) में ' विनायक ' प्रासादके ' कुञ्जर, मोदक ' आदि चिह्न रखे हैं - वह चिह्न गणेशजीके ही हैं । ( घ ) शातातप - स्मृति में भी लिखा है- ' सर्वकार्येष्वसिद्धार्थो... गणेशप्रतिमां न्यसेत्, ( २।५२ ) यहाँपर कार्यों के विघ्नमें गणेशमूर्ति-की प्रतिष्ठा अथवा उसका जप तथा पूजन भी कहा है- ' अथवा गणनाथस्य मन्त्रं लक्षमितं जपेत् ' ( २२५३ ) । ' तत्र संस्थापयेद् दे॒वं विघ्नराजं सुपूजितम् ( ३।२२ ) । इन याज्ञवल्क्य, कात्यायन, शातातप आदिको अनार्य वेदानभिज्ञ नहीं कहा जा सकता; जिन्होंने गणेशपूजा बड़े स्पष्ट रूपसे कही है । ( छ ) अब बृहत्पराशर स्मृति भी देख लीजिये । इसमें ( ६।६-७-८ ) - पद्योंमें विविध विघ्न दिखलाये हैं, फिर उनकी

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१२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) शान्त्यर्थं गणेशपूजा एवं ग्रहपूजा बताई है । ' तस्मात् तदुपशान्त्यर्थं समभ्यर्च्य गणेश्वरम् ' । ( ६ ) ग्रहेभ्यो वा गणेशस्तु तस्य शान्तिरिहोच्यते ' ( ६।१ ) ' एतेन संपूज्य गणाधिदेवं विघ्नोपशान्त्यै ' ( ३१ ) । पराशरजीने २/४३४ में त्र्यम्बक ( महादेव ) की, फिर ‘ गणानां त्वा ' मन्त्रसे त्र्यम्बकके पुत्र गणेशको पूजा कही है - ' विनायकाय होतव्या तथा घृतस्य चाहुतिः 1 । सर्वविघ्नोपशान्त्यर्थं पूजयेद् यस्तु तत्-( त्र्यम्बक ) सुतम् ( गणेशम् ) । गणानांस्येति मन्त्रेण स्वाहाकारान्त-पादतः । चतस्रो जुहुयात् तस्मै गणेशाय तथाहुतीः ' ( २।४३४-४३५ ) क्या पराशर जी इतने वेदानभिज्ञ थे कि घोड़ेवाला मन्त्र उन्होंने गणेशजीके मत्थे मढ़ा! याज्ञवल्क्य स्मृतिकी मिताक्षरा में ( २८६ ) ‘ तत्पुरुषाय विद्महे ' यह मङ्गलाचरणोद्धृत मन्त्र लिखा है । क्या यह सब वेदानभिज्ञ थे? ( ज ) भविष्यपुराण में भी गणेशका मन्त्र ' गणानां त्वा ' कहा है— ' गणेशं तु चतुर्बाहुं व्यालयज्ञोपवीतिनम् । ' गजेन्द्रवदनं दे॒व॑ ' श्वेतवस्त्र ' चतुर्भुजम् । परशु ं लगुडं वामे, दक्षिणे दण्डमुत्पलम् ' ' मूषकस्यं महाकायं शङ्खकुन्देन्दुसप्रभम् । ' गणानां त्वेति मन्त्रेण विन्यसेदुत्तरे ध्र ुवम्, ( मध्यमपर्व, २ य भाग २०।१४१ - १४२ ) ( झ ) अब ' बोधायनगृह्यशेषसूत्र ' में विनायककल्प देखिये – ' मासि मासि चतुर्थ्यां शुक्लपक्षस्य पञ्चम्यां वा, अभ्युदयादौ सिद्धि-काम ऋद्धिकामः पशुकामो वा भगवतो विनायकस्य बलिं हरेत् ' ( ३।१०।१ ) ' पूर्वेद्यः कृतैकमुक्तः, शुचिरप आचम्य... दक्षिणामुखं हस्तिमुखं --- उपवेश्य दैवतमावाहयति - ' विघ्न! विघ्नेश्वरागच्छ

पृष्ठ 43

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण १३ विघ्नेत्येव नमस्कृत! अविघ्नाय भवान् सम्यक् सदास्माकं भव प्रभो । ( २ ) इस प्रकार विनायकका पूजन जब सूत्र सम्मत भी है; तब इसे अवैदिक वा अनार्यदेव कैसे कहा जा सकता है? सूत्र ' कल्प ' होने से ' वेदाङ्ग ' है । ( ६ ) इसीलिए यजुर्वेद में ' नमो गणेभ्यो गणपतिभ्यश्च वो नमो नमो व्रातेभ्यो व्रातपतिभ्यश्च वो नमः ' ( वा ० सं ० १६।२५ ) इस मन्त्र में गणपतिको नमस्कार भी किया गया है । यहां गणपति को बहुवचन सम्मानार्थ दिया गया है । जैसे कि — ' यूयं हि सोम! पितरो मम स्थन, दिवो मूर्धानः ' ( ऋ ० ६६६८ ) यहां एक सोमको बहुवचन पूजार्थ है । ' गणपति - उपनिषद् ' में ' नमो व्रातपतये नमो गणपतये नमः प्रमथपतये ' में एक वचन भी आया है । जैसे वहाँ बहुवचन गणपतिको आया है, वैसे ' विनायकानां ' • ( वाराह पु ० ३३।२५ ) तथा मानवगृह्यादि में ' विनायकों ' को बहुवचन भी आया है । मत्स्यपुराण में ' गणेश्वरगण ' ( १५४ । ५४५ ) शब्द आया है । अतः गणपति अनेक भी हो सकते हैं, पर उनका एक अधिपति होकर महागणपति भी हो सकता है; बहुतों में एक होता ही है । यद्यपि यजुर्वेद के उक्त सूक्तमें रुद्र देवता हैं; तथापि ' आत्मा वै पुत्रनामासि ' ( पारस्करगृ १११८ ( २ ) के अनुसार पिता - पुत्रका अभेद प्रसिद्ध होनेसे रुद्रका गणपति रूपसे वर्णन आया है । गणपति महादेवके पुत्र माने गये है । यही बात एक गाणपत्यने स्वा ० शङ्कराचार्यको कही थी— ' अंशाशिनोरभेदस्तु वेदे सम्यक् प्रकीर्तितः 1. गणेभ्यो गणपेभ्यश्च नम इत्यादिना यते! ' ( ३८४ ) रुद्रस्तु

पृष्ठ 44

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१४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) गणपात्मैव नत्वन्यो मुनिपुङ्गव! ( शंकरदिग्विजय १५ सर्ग ) । इस लिए ही महाभारत ( वनपर्व ) में ' महादेवप्रसादाच्च गाणपत्यं च विन्दति ' ( ८२।५० ) यहां महादेवकी कृपासे गणपतिभावकी प्राप्ति भी कही गई है । यहां भी पूर्वोक्त ही कारण है । गणपति के रुद्ररूप होनेसे ही ' गणपति - उपनिषद् में गणेशजीको ' वं रुद्रः, लम्बोदराय शिवसुताय नमो नमः ' यहां रुद्र एवं शिवका सुत कहा गया है । स्वा ० शङ्कराचार्यने भी गाणपत्यको कहा था -- - ' ' अस्त्वेवं परमात्मैव जगत्कर्ता त्वयेरितः । गणाधिपतिशब्देन सर्वनामा महेश्वरः ( ३६६ ) अंशाशिनोरभेदेन रुद्र - पुत्रोपि च स्वयम् । सम्भवत्येव सर्वात्मा सर्वविघ्ननिवारकः ' ( ३६७ ) ( शङ्करदिग्विजय १५ सर्ग ) । केवल यहीं नहीं, बल्कि रुद्रको ' गणपति ' कहना ' रुद्रस्य गाणपत्यं मयोभूरेहि ' ( यजु ० वा ० सं ० ११ १५ ) इस अन्य मन्त्र में भी प्रसिद्ध है । इस मन्त्रका देवता आर्यसमाजी प्रेस ' वैदिक यन्त्रालय अजमेर में प्रकाशित यजुर्वेद सं ० में ' गणपति ' लिखा गया है । जब इस प्रकार गणपति वैदिक देवता रुद्रके अन्य रूप, अथवा अंशावतार वा पुत्र सिद्ध हुए; तब गणपतिको ' अवैदिक देव ' कहना एक अक्षम्य अपराध है । ( ७ ) इसीलिए यजुर्वेदसंहिता में अन्यत्र ' गणानां त्वा गणपति १ ९ हवामहे, प्रियाणां त्वा प्रियपतिहवामहे, निधीनां त्वा निधिपति १ हवामहे, वसो मम ' ( २३/१६ ) यहांपर अश्वमेध अश्वकी स्तुति के लिए भी उसे गणपतिदेव रूपसे आहूत किया गया है । इसलिए ' गणेशपुराण ' के उपासनाखण्ड में भी गणेशसहस्रनामों में ' ज्येष्ठ-

पृष्ठ 45

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण ११ राजो निधिपतिर्निधिः प्रियपतिः प्रियः ' ( ४६ । १५ ) यही गजानन गणेश के नाम आये हैं । तब दोनोंकी अभिन्नता सिद्ध होगई । इसलिए वैदिक प्रेस अजमेर में मुद्रित यजुर्वेदसं में भी इस मन्त्रका देवता ' गणपति ' लिखा गया है । आनन्दगिरिके ' शंकर-दिग्विजय में भी एक गाणपत्यने आचार्य शंकर के आगे गणपतिका यही मन्त्र रखा, उन्होंने इसका खण्डन न कर अनुमोदन ही किया । पहले हम यजुर्वेदके ही मन्त्र द्वारा रुद्रका गणपति यह रूप - विशेष लिख चुके हैं, सो यह ' आत्मा त्वं पुत्रनामासि ' ( मं ० त्रा ० १५ १७ ) के अनुसार ठीक है; तो गणपति अवैदिक देवता कैसे हो सकते हैं? देवता यद्यपि बहुत होते हैं; तथापि वेदने उन देवताओंका किन्हीं अन्य देवताओंमें अन्तर्भाव करके संक्षिप्त वर्णन कर डाला है । तभी निरुक्तकार श्रीयास्क इन्द्र, अग्नि, सूर्य इन तीन देवताओं में शेष देवताओंका अन्तर्भाव मानकर कहते हैं कि-' एकस्य श्रात्मनोऽन्ये देवाः प्रत्यङ्गानि भवन्ति ' ( ७ | ४ | १ ) इसीलिए ही इस गणपतिको वेद में कहीं नैघण्टुक रीति ( अन्य देवताके मन्त्र में अन्य देवताका वर्णन करना ) से अश्वमेध अश्वमें वर्णित किया गया है; तो कहीं रुद्रमें, कहीं इन्द्र में, तो कहीं बृहस्पति वा ब्रह्मणस्पति में । अब हम वेद द्वारा ही गणपतिका ब्रह्मणस्पति तथा इन्द्रके रूपमें वर्णन दिखलाते हैं । ( ८ ) ‘ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे, कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् । ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पते! आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम् ' ( ऋसं ० २।२३।१ ) । यही नाम ' गणेशपुराण ' के सहस्रनामों में

पृष्ठ 46

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१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) गजानन गणेश के भी आये हैं- देखिये - ' कविं कवीनामृषभो ब्रह्मण्यो ब्रह्मणस्पतिः । ज्येष्ठराजो निधिपतिः ' ( ४६।१४ ) तब दोनों का ऐक्य भी सिद्ध होगया । ( क ) कहा जाता है कि उक्त मन्त्र ब्रह्मणस्पतिका है । ब्रह्मण-स्पतिसे ' ब्रह्मणां पतिः ' बृहस्पतिका बोध होता है, गणेशका नहीं । इसपर यह जानना चाहिये कि — देवताओंके बहुत से नाम तथा रूप हुआ करते हैं — यह प्रसिद्ध है । गणपति ' स्वस्तिक ' रूपमें भी हुआ करते हैं - यह प्रसिद्ध बात है । उसी स्वस्तिक में चारों ओर गणपतिका बीजमन्त्र ' गं ' विराजमान है - यह ध्यान से देख लीजिये 45 | यही ' गम् ' बीजमन्त्र उक्त ब्रह्मणस्पतिके मन्त्रके आदि तथा अन्तके अक्षरसे निष्पन्न है - यह आगे ' त्रिपुरातापिनी उपनिषद् ' के प्रमाणसे कहा जायगा । ( ख ) आकाश में भी ' खस्वस्तिक ' प्रसिद्ध है । ' स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ' ( सामवेद के अन्त में ) यहां पर इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य, बृहस्पति ये चार देवता आकाशमें तारों के रूप में इस प्रकार विराजमान हैं कि — उन चारोंके ऊपरसे नीचेको, तथा दाहिने पार्श्वसे बाएँको रेखा कर दी जावे; तो स्वस्तिक बन जाता है । उक्त मन्त्रमें चार बार ' स्वस्ति ' शब्द आनेसे ' स्वस्तिक ' बना है । श्रीपाणिनिने भी ( ६।३।११५ सूत्र में ) ' स्वस्तिक ' को स्मरण किया है । तब वेदमें जहां इन्द्रका कोई मन्त्र हो; वा पूषा, वा तार्क्ष्य ( गरुड़ ) वा बृहस्पतिका मन्त्र हो; उससे स्वस्तिक ( गणेश ) का बोध

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण १७ होगा । उक्त मन्त्र में पहले गणपतिका इन्द्र - रूपसे स्तवन है, सबसे पीछे बृहस्पतिरूपसे । इसका भाव यह हुआ कि - वेदमें इन्द्र भी गणपतिरूपसे स्तुत होता है, तथा बृहस्पति भी । तब इससे वेदमें ' गणपति ' की असिद्धि न हुई, किन्तु सिद्धि ही हुई; क्योंकि निरुक्तकार कहते हैं— ' एकस्य आत्मनोऽन्ये देवाः प्रत्यङ्गानि भवन्ति ' ( ७ | ४ | १ ) | श्रीसायणाचार्यने भी अपने ब्रह्मणस्पतिमन्त्र के भाष्य में ' देवादिगणानां सम्बन्धी गणपतिः ' यह अर्थ भी किया है । तब इसका देवपतित्व वा गणपतित्व भी सिद्ध हुआ । पहले हम गणेशपुराणसे गणेशका नाम ' ब्रह्मणस्पति ' भी दिखला ही चुके हैं । ' गणेशगीता ' में भी गणपतिको ब्रह्मणस्पति कहा है । इसलिए गणपतिको देव - देव, महादेवका आत्मा ( पुत्र ) माना गया है । इसलिए ' वाल्मीकि रामायण ' के एक स्थलमें महादेवको भी ' गणेश ' कहा गया है; वेदसे तो हम पूर्व दिखला ही चुके हैं । ( ग ) इसके अतिरिक्त ' गणेश ' बुद्धि के अधिष्ठाता भी प्रसिद्ध हैं । इसीलिए ब्रह्मणस्पतिवाले मन्त्र में गणपतिको ' कवि ' भी कहा गया है 1 । ' कवि'का अर्थ क्रान्तदर्शी एवं बुद्धिमान् है । महाभारतके लिखनेके अवसरमें गणपतिका कवित्व प्रसिद्ध है ही । अथवा ' ब्रह्मणस्पति ' में ' ब्रह्म ' वेदका नाम है । वेदमाता ' स्तुता मया वरदा वेदमाता ' ( १६।७१।१ ) इस अथर्ववेद ( शौ ० सं ० ) के मन्त्रमें गायत्री प्रसिद्ध है । वह गायत्री ' धियो यो नः प्रचोदयात ' ( यजु ० ३।३५ ) इस प्रकार बुद्धिरूपा है । गायत्री चारों वेदोंकी सारस्वरूपा है- -इस पर आगे ' गायत्री मन्त्रकी महत्ता ' निबन्ध देखिये । अथवा २ स.ध.

पृष्ठ 48

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१८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) मनुस्मृति ( २७७ ) देखिये । तब बुद्धिका अधिष्टाता गणपति भी वेदका स्वामी होनेसे यौगिक ब्रह्मणस्पति है । इसलिए इसे बृहस्पति भी कहा जाता है— ' बृहतीनां - वेदवाचां पतिः बृहस्पतिः ’ । तब बृहस्पति - रूपसे वर्णन भी गणेशका ठीक ही हुआ । ( घ ) इसलिए गणेशपुराण में भी गणेशको ' ब्रह्म ब्रह्मार्चितपदो ब्रह्मचारी बृहस्पतिः ( ४६।१०२ ) बृहस्पति शब्दसे भी कहा है । ' कविः कवीनामृषभो ब्रह्मण्यो ब्रह्मणस्पतिः । ज्येष्ठराजो निधिपतिर्निधिः प्रियपतिः प्रियः ( ४६।१५ ) यहां ब्रह्मणस्पति तथा ज्येष्ठराज भी कहा है । तब यह ' ब्रह्मणस्पति ' वाला ' गणानां त्वा ' मन्त्र गणेशजीका ही सिद्ध हुआ । इस वेदमन्त्रका इतिहास गणेशपुराण में इस प्रकार आया है— ( ङ ) ‘ कंदाचित् स मुहूर्ते तु पिता वाचक्कविः सुतम् ( गृत्समदनामानम् ) । गणानां त्वेति ऋङ्मन्त्रम् महान्तमुपदिष्टवान् । उवाच च महामन्त्रो वैदिकोऽखिलसिद्धिदः । आगमोक्तेषु सर्वेषु मन्त्रेषु श्रेष्ठ एव च । ध्यात्वा गजाननं देवं जपैनं स्थिरमानसः । परां सिद्धिं समाप्यैव लोके ख्यातिं गमिष्यसाततो गृत्समदो विप्रो मन्त्रं प्राप्य पितुर्मुखात् । अनुष्ठानरतो भूत्वा जपध्यानपरोऽभवत् । ( १६।१८-२२ ) ( च ) यहां पर ' गणानां त्वा ' यह ऋग्वेदका मन्त्र गृत्समदको मिला - यह कहा गया है, इसी ' गणानां त्वा ' मन्त्रका ऋषि भी वैदिक - यन्त्रालय ( स्वा ० द ० के प्रेस ) अजमेर - मुद्रित ऋग्वेद संहितामें ' गृत्समद ' दिया गया है । यही ऋकुमन्त्र ' तैत्तिरीय यजुर्वेदसं ० ( २।३।१४।३ ) में तथा ' यजुर्वेद काठक -संहिता ', ( १०1४० ) में भी आया

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श्रीगणेशका मङ्गलाचरण १६ है | इस प्रकार इस विषयमें जहां वेद और पुराणकी एकवाक्यता सिद्ध हुई, वहां ' गणानां त्वा ' यह ऋक्मन्त्र गजानंन - गणेशके लिए भी सिद्ध होगया । ( ६ ) यह गणपतिका बृहस्पति रूपसे वर्णन हमने वेदसे दिखला दिया; अब वेदमें गणपतिका इन्द्ररूपमें वर्णन देखिये-' निपुसीद गणपते । गणेषु त्वामाहुर्विप्रतमं कवीनाम् । न ऋते त्वत् क्रियते किञ्चनारे महामर्क मघवचित्रमर्च ' ( ऋ ० १०।११२।६ ) यह वही मन्त्र है, जिसे हमने मङ्गलाचरण में दिया है । इस वेदके मूल से तथा गृह्यसूत्र, स्मृति, एवं पुराण आदिकी साक्षीसे गणपति-पूजा अनादि पूजा है । इसलिए गणपति - उपनिषद् में कहा है— ' सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते ' । हां, इसके अवतार भिन्न - भिन्न कालमें होते रहते हैं । ' त्वामाहुर्विप्रतमं कवीनाम् ' इस ऋचाके अंश ' विप्र'का निघण्टु ( ३।१५ ) के अनुसार ' मेधावी ' और ' विद्यया याति विप्रत्वं, ( अत्रिस्मृति १३६ ) के अनुसार ' ब्राह्मणयोनिग विद्वान् ' यह यौगिक वा योगरूढ अर्थ है । देवताओं में भी वर्ण-विभाग है, इसलिए ' ब्राह्मण वर्णके विद्वान् ' यह अर्थ भी सङ्गत है । गणपतिकी विद्वत्ता ' महाभारत ' के लेखकत्व में स्फुट है । उसे आदिपर्व ( ११७५-८३ ) में देखा जा सकता है । उसमें गणेशके हेरम्ब, गणेशान, गणनायक, विघ्नेश, और गणेश यह नाम आये हैं । ' गजानन ' शब्द यदि नहीं भी आया, तो इससे महाभारत तथा पुराणोंके प्रवक्ता श्रीव्यास वा सूतको वह अनभीष्ट नहीं; क्योंकि वे अन्यत्र उसे गजानन शतशः लिख चुके हैं । गणेशजीने

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२० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) महाभारतका लेखक होना स्वीकार किया कि - ' मेरी लेखनी न रुके ' । व्यासजी ने कहा कि - ' आप भी श्लोकका अर्थ विना जाने ७ लेखनी न चलाइये । ' परस्पर स्वीकृति होगई । व्यासजीने महाभारत में ८८०० कूटश्लोक ( बहुत कठिन पद्य ) रखे । गणेशजी क्षणभर में ही ( लिखते - लिखते ही उनका अर्थ जान लेते थे, छातः उनकी लेखनी रुकती नहीं थी । अव देखिये - हो न गई सिद्ध वेदप्रोक्त गणपतिकी विद्वत्ता? अस्तु । ( ख ) इन्द्र उक्त मन्त्र में गणपतिदेवरूप में स्तुत किये गये हैं-' गणपते! मघवन्! इसलिए ' गणपत्युपनिषद् ' में गणेशको ‘ त्वमिन्द्रः ’ ( १ ) भी कहा है । ' स्वस्ति न इन्द्रो ' इस स्वस्तिक के मन्त्रमें इन्द्र ही पूर्व हैं, यह हम पहले लिख चुके हैं । इसका ' एकस्यात्मनोऽन्ये देवाः प्रत्यङ्गानि भवन्ति ' ( ७ | ४ | १ ) ' इतरेतरजन्मानो भवन्ति इतरेतरप्रकृतयः ' ( ७ | ४ | १२ ) ' माहाभाग्याद् देवताया एक आत्मा वहुधा स्तूयते ' ( ७ | ४ | ८ ) यह निरुक्त - प्रोक्त कारण भी पहले संकेतित किया जा चुका है । इसे नैघण्टुक भी कह सकते हैं कि एक मुख्य देवतामें अन्य देवताका वर्णन आजावे । सो इन्द्रदेवता में गणपतिदेवका वर्णन आजानेसे नैघण्टुकता भी हो सकती है । ( ग ) इधर अन्य एक कारण यह भी है कि - ' शतपथब्राह्मण ' में कहा गया है- ' इन्द्रः सर्वा देवता: ' ( ३ | ४ | २२२ ) ' इन्द्रो वै सर्वे देवाः ' ( १३।२ । ७ । ४ ) ‘ इन्द्राग्नी वै सर्वे देवाः ' ( ६।३।३।२१ ) इससे स्पष्ट है कि इन्द्र हो चाहे अग्नि; उसकी सब देवताओं के रूप से स्तुति हो सकती है । इसीलिए ' त्वमग्ने! इन्द्रो, त्वं विष्णु... त्वं ब्रह्मा '