पञ्चम सुमन · प्रकरण 52
श्रीगङ्गाजलकी विशेषताका विज्ञान
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487डाक्टर ई ० एच ० हैं किन्सने जो युक्तप्रान्त तथा मध्यप्रान्तकी सरकारोंके ' केमीकल ऐक्जामिनर ' ( रसायन - परीक्षक ) थे - गङ्गाजल की परीक्षा की । उन्होंने गङ्गामें गंदे नालों को गिरते देखा, जिनमें हैज़ेके लाखों कीटाणु होते थे; पर वे गङ्गाजल में मिलनेके कुछ देर बाद नष्ट होजाते थे यह उन्होंने अनुभूत किया । फिर उन्होंने एक बोतल में गङ्गाजल डाला, दूसरीमें कुएँका जल । दोनों में हैज़ेके कीटाणु डाले । गङ्गाजल वाली बोतल में तो वे कीटाणु ६ घण्टेके अन्दर ही मर गये; पर साधारण जलवाली बोतल में वे बढ़ गये - यह देखकर वे अत्यन्त चकित हुए । सोचने लगे कि - हिन्दुलोग जो अनादिकालसे गङ्गाके भक्त बने हुए हैं; क्या उस समय भी उन्हें विज्ञानका ज्ञान था? इस अनुभव से वे इस परिणाम पर पहुँचे कि गङ्गाजलमें वस्तुतः विलक्षण रोगनाशिनी - शक्ति है ।
कितना लिखा जाए; अमेरिकाके सुप्रसिद्ध डाक्टरोंने भी इस सम्वन्धमें बहुत कुछ लिखा है । सारे संसारका प्रसिद्ध यानी ' मार्कटुहन ' अपनी ‘ संसार- यात्रा ' में लिखता है कि - गङ्गाजलकी मैंने स्वयं परीक्षा की है । इसमें रोगाणुओं को नष्ट करनेवाली बड़ी शक्ति है । यह जल अत्यन्त शुद्ध एवं पवित्र है । यही कारण है कि इसके पीने से और स्नानसे मनुष्योंके विविध - रोग नष्ट हो जाते हैं । पाश्चात्य - वैज्ञानिकोंसे अतिरिक्त आयुर्वेद - विद्वानोंका भी यह मत है कि सब प्रकारके रोगों में गंगाजलका सेवन अतिलाभकारी है, क्योंकि गंगाजल में कठिनसे भी कठिन रोगोंके हरण करने में बिलक्षण - क्षमता है । एक रोगी जो क्षय और श्वाससे युक्त था;
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दवाइयोंसे निराश होकर हरिद्वार में आगया । उसने सब दवाइयाँ छोड़ - छाड़कर गङ्गाजलका ही दैनिक पान शुरू किया; तथा समय- समय पर उससे स्नान किया; जिससे वह सवा दो महीने में ही स्वस्थ होगया ।
यह जानकर कई हैरान अवश्य होंगे; परन्तु ऐसा एक नहीं; इसमें बहुतसे उदाहरण मिलते हैं, जिनसे गंगाजलकी कौतूहल- पूर्ण शक्तिका परिचय मिलता है । इससे उसकी पवित्रताका अनुमान भी हो जाता है 1
। जिस वस्तुको शास्त्रीय - संसार में पवित्र माना जाता है, उसके परीक्षणसे पता लगेगा कि - उसपर कीटाणुओंका कोई प्रभाव नहीं पड़ता । गंगाजलके विषय में फ्रान्सके एक वैज्ञानिक डा ० डेरेल वैज्ञानिक प्रयोग द्वारा सिद्ध किया है कि गंगाजल में विसूचिका ( हैजा ), अतिसार, संग्रहणी, क्षय आदि रोगोंके लिए • गंगाजल अत्युत्तम औषधि है । उसने गंगाजल के कीटाणुओं की सहायतासे एक अद्भुत - ओषधि भी तैयार की है, जिसका नाम उसने ' वैक्टीरियो फैज़ ' यह रखा है, जिसका आजकल इन्हीं रोगोंकी चिकित्सामें प्रयोग किया जाता है ।
डाक्टर रिचर्डसनने तो इससे भी अधिक आश्चर्यमयी बात लिखी है कि- ' गंगा - गंगा कहने और दर्शनमात्रसे भी मानव हृदय पर उत्तम प्रभाव पड़ता है । ' यह ठीक भी मालूम होता है; क्योंकि- ‘ श्रद्धया सत्यमाप्यते ' ( यजुः १६।३० ) श्रद्धासे भी तद्भाव प्राप्त हो जाता है । दर्शनसे उसके अणु हमारे अन्दर पहुँचकर भी अपना प्रभाव करेंगे ही । गंगाजलकी पवित्रता वा उपयोगिता केवल 489धार्मिक दृष्टिसे ही नहीं; अपितु आधुनिक चिकित्साशास्त्रकी दृष्टिसे भी उसका मनन अनिवार्य है, जिसके प्रमाणस्वरूप गुड
' हैल्थ ' नामक अंग्रेजी- पत्र में मिस्टर सी ० ई ० नैल्सनका लेख है । अंग्रेजी ' स्टेट्समैन ' नामक प्रसिद्ध पत्रमें तथा ' लीडर ' पत्रमें भी वह प्रकाशित हुआ था कि- गंगाजलकी पवित्रता सर्वमान्य है । इसके जलमें हैजा तथा फोड़े आदिके नाशनमें अपूर्व शक्ति है । श्री- रोशनलाल वैरिस्टरने लिखा था कि हमारे सामने एक अमेरिकाके डाक्टरने काशीकी गन्दी नालीसे दो - तीन बूँद गन्दा पानी निकाला, जिसमें हैजेके सैंकड़ों जर्म्स थे । उस पानीको गंगाजल में डालकर देखा कि वे समस्त जर्म्स मर गये । अर्थात् गंगाजलके एक - एक परमाणुने मलके हजारों परमाणुओं को खाकर तत्काल ही शुद्ध कर दिया । प्रयागके एक डाक्टर करोलीने लिखा था कि- मेरी खाँसी और दमाकी पुरानी व्याधि इसी गङ्गाजलके प्रतापसे नष्ट होगई ।
संसारकी और नदियों को छोड़कर केवल गङ्गा नदीका ही जल सभी रोगों में दवाके तौर पर देनेका उल्लेख आयुर्वेद में क्यों है? इसका उत्तर अविश्वासियोंको पहले ठीक - ठीक प्राप्त नहीं हो सका था । यह देखा गया था कि यदि तांवेके पात्रमें गङ्गा - जल बन्द करके रख दिया जाय; तो वर्षों पड़े रहनेपर भी इसमें कोई विकार नहीं आता; और नहीं सूखता; और किसी जलमें यह गुण नहीं दीख पड़ता । ऐसी गङ्गाजलकी विशेषता अविश्वासियों के अनुभव में भी आई थी; वे सोचते थे- ऐसा क्यों है? पहले वे सोचा करते थे कि सनातनधर्मियोंका गङ्गाजलके गीत गाना अन्ध-
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विश्वासियोंका ठगनामात्र है । पर क्रमशः उन्हें स्वयं तथा दूसरों से भी उसकी विशेषता प्रतीत होती गई; तव उनका उसपर उपहास करना तो वन्द हो गया ।
उन्होंने देखा कि कलकत्तासे इङ्गलैंड जानेवाले जहाज जो जल गङ्गाके एक मुहाने हुगली नदीका लेते हैं; वह लण्डन पहुँचने तक ज्यों का त्यों वना रहकर काम देता है; पर जो जहाज लण्डन से पानी लेकर चलते हैं; वह वम्बई पहुँचनेके समय तक ताज़ा नहीं रहता, पीने योग्य नहीं रहता, बदल देना पड़ता है । विज्ञानको अभी तक इसका कारण मालूम करने में सफलता नहीं मिली; पर इतना उन्हें अनुमान होगया कि - गङ्गा नदी पवित्र है- ऐसा जो प्राचीन हिन्दु मानते हैं; यह बात निर्मूल नहीं है ।
काशीके प्रत्येक यात्रीका यह अनुभव है कि — घाटपरका गंगाजल इतना गन्दा रहता है कि — उसे पवित्र मानना तो दूर, कोई स्वच्छता - पसन्द नई - रोशनीका जीव उसे छूना भी पसन्द नहीं · करेगा । सारे शहरके पनाले तो उसमें गिराये ही जाते हैं; अधजले - मुर्दे भी उसमें बहा दिये जाते हैं; फिर भी वहां कोई अनिष्ट होते नहीं दीख पड़ता; जब कि मद्रास कारपोरेशन में कुछ ही दिन पहले साफ किये हुए जलमें अस्वच्छ जल मिलाकर पीनेके लिए देने पर सारे नगरका स्वास्थ्य खराव हो गया था । वर्षके सभी दिनोंमें गंगा में नहानेपर शरीर में ताज़गी मालूम पड़ती है । पर अन्य नदियों में कुछ खास - खास समय पर, विशेषकर वर्षा - ऋतुका अन्त होनेपर ही यह ताजगी देखने आती है, आखिर 491उसका कारण क्या है?
इसका उत्तर यह है कि- किसी तरल पदार्थ में विजली पहुँचाने पर उसमें कुछ परिवर्तन होते हैं । विजलीकी ऊँचे बोल- टेजवाली स्पार्क जल में पहुँचनेपर जल सारा ही परिवर्तित हो जाता है । वैज्ञानिकों का कथन है कि - जल के अणुओं पर ओषजनका जो आवरण होता है, वह ध्वस्त हो जाता है, और फिर उनमें विद्युत्को ग्रहण करने की शक्ति नहीं रह जाती । अच्छा विद्युद्- वाहक होनेके कारण जलमें विद्युत्को शक्ति प्रति - सैंकेंड लाखों मील हुआ करती है । अणुओं में इसी गति के अनुसार परिवर्तन भी होता है । विद्युत् - स्पार्क पहुँचानेके बाद जलके स्वाद में भी परिवर्तन हो जाता है ।
विद्युत् - संचारके कारण जलमें रहनेवाले संक्रामक रोगोंके कीटाणु भी मर जाते हैं । अगर उस जलके वितरणस्थलपर ही उसका प्रयोग किया जाए; तो जलसे उत्पन्न होनेवाले बहुत से रोगों से नागरिकोंका पिंड छूट जाए । जलको शुद्ध करनेकेलिए किये जानेवाले बहुत से खर्चीले और कटसाध्य उपाय बच जाएं ।
विद्युत् - संचार किया हुआ जल जव शरीर के कोषोंके संपर्क में आता है; तो उन कोषोंकी शक्ति बहुत बढ़ जाती हैं जिससे स्वास्थ्य अत्युत्तम हो जाता है । ऐसे जलको खेतमें सींचने से पैदावार में पर्याप्त वृद्धि हो जाती है । किसी पौधे में कीड़े पड़ गये हों; तो उक्त जलके सींचने से वे तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं । यदि ऐसे जलको नियमतः सेवन किया जाए; तो रुधिर निर्मल हो 492जाता है, और शरीर में नवजीवनका संचार हो जाता है ।
जल में ऊंचे बोल्टेज़वाली स्पार्क पहुँचानेपर उसमेंका विषैला
तो प्रायः दूर हो ही जाता है । उसकी शुद्धता भी बढ़ जाती है, और वह कीटाणुनाशक हो जाता है । न्यूयार्कके डाक्टर हनोका तो लोशन की जगह ज़ख्म आदि पर इसका प्रयोग करते हैं । हैज़े के रोगी इस जलका प्रयोग करनेपर तत्क्षण स्वस्थ हो जाते हैं, क्योंकि — इससे हैज़ेके कीटाणु मर जाते हैं । इसके प्रयोगसे फैले हुए हैजेको शीघ्र ही रोका जा सकता है । गरीव देशकालमें इसका उपयोग करना चाहिए, इसमें कुछ भी खर्च नहीं पड़ता । विदेशी - दवाओंके पीछे जो बड़ी रकम खर्च हुआ करती है, उसमें इससे कमी हो जायगी ।
गङ्गाजल में भी यही बात लागू होती है । गङ्गाका उद्गम संसारके सबसे ऊंचे पहाड़ हिमालय में है, जहाँ सालभर बिजली बनी रहती है; अतः इस जलमें विजलीका संचार बराबर होता . रहता है । गङ्गा गङ्गोत्तरीसे निकलकर मन्दाकिनी, पद्मा, अलक- नन्दा यदि अपनी सहयोगिनी नदियोंको लेकर कई प्रकार की शिलाजीत आदि प्रोपधियों में बहती हुई, और उनके गुणों को लेती हुई केदारनाथ, देवप्रयाग, लक्ष्मणझूला, हृषीकेश आदिके बीचसे जाती हुई हरद्वार की समतल भूमिमें प्रवेश करती है । इस • स्थान तक इसमें बहुत गुण रहते हैं । जो हड्डियां डालने के कारण गङ्गा गुण मानते हैं; वे भ्रान्त हैं; उनका केवल घृणा दिलाने में विचार रहता है, इसके गुण जानकर ही इसकी स्वर्गदातृताका विचार
493श्रीगङ्गाजलकी विशेषताका विज्ञान I करके, इसमें मृतकोंकी सद्गतिका विचार करके उनकी अस्थियां डाली जाने लगीं । इससे उनसे पूर्व भी गङ्गाके यह गुण थे, और हमारे पूर्वजोंको ज्ञात थे । इसी उपयोगिताके कारण ऋषि-. मुनियों, एवं प्राच्य प्रन्थकारोंका इसकी अतिशयित स्तुति करना उचित ही है ।
शरद - ऋतुके दिनोंमें गंगाजल और भी निर्मल एवं विशुद्ध हो जाता है; क्योंकि दिनमें सूर्यकी प्रभासे यह तप्त रहता है और- रात्रि में चाँदनी से शीतल; और इस ऋतुका भी इसपर विशेष प्रभाव पड़ता है । ऐसे ही जलको लोग अमृतके समान मानते हैं, और यही कारण है कि कार्तिक में गंगास्नानका विशेष माहात्म्य माना गया है । पहाड़ोंसे होकर वहनेके कारण चुम्बकीय पदार्थों का इसपर प्रभाव पड़नेसे गंगाजल क्षय, संग्रहणी यादि असाध्य रोगोंको दूर कर सकता है ।
यदि गंगाजल में ऐसी रोगनिवारिणी दिव्य शक्ति न होती; तो कौन इस जलको महत्तापूर्ण मानता १ इसी कारण शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य और ' स्वस्थे चित्ते बुद्धयः संस्फुरन्ति ' सात्त्विकता और बुद्धि - शुद्धि भी करने के कारण इसे यदि स्वर्गदाता कहा गया है; सद् - गतिकारक कहा गया है; तो इसमें आश्चर्यका क्या अवकाश सूर्य - संशोधित आकाशगंगासे भी इसका सम्बंन्ध सम्भव है; क्योंकि वृष्टि करने वाला सूर्य होता है । हिमालय बहुत ऊँचा पर्वत है, ऊँचे पर्वत पर वृष्टि बहुत होती है; सम्भव है कि— वह आकाशगंगा वाली वृष्टि होती हो; और वही हिमालय से गंगा 494रूप में आती हो । फिर यह गंगा पाताल में भी जाती हो । महादेवके सिरसे गंगा के तीन छींटे करके आकाश, पृथिवी, पातालकी तीन गंगा बनना जो पुराणों में वर्णित है - वह इसी रहस्यको संकेतित करता है । अस्तु ।
इतने ऋषि - मुनि, वैद्य, डाक्टर, वैज्ञानिक, देशी - विदेशी, विद्वान् जो कि गंगाजलकी लेखोंद्वारा, पुस्तकोंद्वारा, भाषणोंद्वारा अति- शयित स्तुति कर चुके तथा करते हैं - वह इसकी विशेषताको व्यक्त कर रहा है । धार्मिक दृष्टिमें तो गंगा पापहारिणी, पवित्र, पारलौकिक फल देने वाली है ही । इसी केलिए प्रसिद्ध है - ' गाङ्ग ' वारि ' मनोहारि मुरारिचरणच्युतम् । त्रिपुरारिशिरश्चारि पापहारि पुनातु माम् ' ' शरीरे जर्जरीभूते व्याधिग्रस्ते कलेवरे । औषधं जाह्नवी - तोयं वैद्यो नारायणो हरिः । ' यदि गंगाजल में कोई विशेषता न होती, तो लोग प्रयास करके अपने धन और समयको व्यर्थ न करते । ‘ नह्यमूला जनश्रुतिः ' यह कहावत प्रसिद्ध है । गुरण ही पूजाके स्थान होते हैं । तव यदि सनातनधर्मी - हिन्दु गंगाको पूजते हैं, उसे पवित्र मानते हैं; तो उन पर उपहास करना अपना अज्ञान प्रकाशित करना है
( ४३ ) पीपल वृक्ष की पूजाका विज्ञान ।
देवमन्दिरों में पीपलका वृक्ष भी देखा जाता है; उसकी जल- प्रदानद्वारा पूजा भी की जाती है । अर्वाचीन लोग उस पर पोप- लीलाका कटाक्ष करते हैं । वे कहते हैं कि यह जड़पूजा है । पर यह ठीक नहीं; वृक्ष जीवित हैं - जड़ नहीं; इस विषय पर अग्रिम
495पीपल की पूजाका - विज्ञान
निबन्ध द्रष्टव्य है ।
हमारे धर्मशास्त्रों में पीपलकी महिमा बहुत दिलाई गई है । भगवान् श्रीकृष्ण ‘ प्रश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम् ' ( १०/२६ ) यह कह कर उसे अपनी विभूति मान गये हैं । हमारी नारियाँ भी पीपलपर जल चढ़ाती हैं । यह पोपलीला नहीं । यहाँ भी वैज्ञानिक- रहस्यपूर्णता है । पीपल स्त्रियोंके गर्भके आधान में सहायता देता है । पाश्चात्य शिक्षादीक्षित भारतीय भले ही विश्वास न करें, पर हमारे धर्मकृत्य विज्ञान -पूर्ण हैं ।
पीपलकी छाया भी स्वास्थ्य वर्धक है । शास्त्रों में स्त्रियोंकेलिए पीपलकी सेवा, उसकी परिक्रमा, उस पर जल चढ़ाना, उसके नीचे बैठकर धार्मिक वातोंकी चर्चा यह प्रतारणमात्र नहीं है, किन्तु वैज्ञानिक है । पीपल में सन्तानोत्पादनकी बड़ी शक्ति है । वैशाख- ज्येष्ठ मासमें जब इस पर फल लगता है, तब गोरैया पक्षी ( चिड़ियां ) उस फल को खाते हैं । उन फलोंमें रासायनिक शक्ति होती है । इसलिए आयुर्वेद में उसका चूर्ण पौष्टिक माना गया है । पीपलको जटामें वन्ध्यात्वनाशक विशेष गुण होता है । पीपल- वृक्षके पात्रमें प्रतिदिन दूध पीनेसे गन्धकके पात्रकी भांति बिना ही टानिक दवाई पिये पुष्टि होती है ।
पीपलसे मिले हुए घरमें रहना निषिद्ध है, क्योंकि चूल्हा जलाने से उस वृक्ष की शाखाएँ तप जाती हैं; उससे एक प्रकारका विषाक्त वायु निकलता है, जिससे सैंकड़ों मनुष्योंको हानि होती है । इसलिए हिन्दुधर्म में पीपलको जल देना धर्ममें रखा गया है 496कि वह सदा शीतल रहे । निरन्तर पीपल की पूजा करने से पुत्रोत्पत्ति होती है - यह हिन्दु - महिलाओंका विश्वास है । इसमें सत्यता है, असत्यता नहीं । आयुर्वेदिक दृष्टि द्वारा वेदमन्त्रोंको देखने पर प्रतीत होता है कि पीपलमें वन्ध्यात्व हटाने तथा पुत्रोत्पादनकी दिव्य - शक्ति है । पीपलके फल सेवन करने से वन्ध्याको भी पुत्र होता है । पीपलकी लकड़ी से बने पात्रमें दूध पीने वाली स्त्रीको सन्तान मिलती है । तभी इसे पुत्रदाता कहते हैं । अथर्ववेदसंहिता के ' अश्वत्थो देवसदनः ' ( ५ | ४ | १ ) इस मन्त्र में अश्वत्थ ( पीपल ) को देवमन्दिर कहा गया है; अतः उसकी पूजासे देवपूजा भी सिद्ध हुई । इस प्रकार यजुर्वेदसंहिता में ' अश्वत्थे वो निपदनं पर्णे वो वसतिष्कृता ' ( १२ | ७ ९ ) पीपल और पर्ण ( पलाश ) वृक्ष में सब ओषधियोंकी स्थिति बताने से यह वृक्ष अत्यन्त गुणकारी सिद्ध हुआ । पीपलसे उत्पन्न लाखके सेवन करनेसे टूटी हुई अस्थिका सन्धान होता है । अश्वत्थका उपयोग वमनके लिए भी गुणकारी है । उर - क्षत रोगमें भी यह लाभ पहुँचाता है । पीपलमें जितनी जीवनी शक्ति है; उतनी अन्य वृक्षों में नहीं । इसमें यही उदाहरण पर्याप्त है कि इसके रोपणकी आवश्यकता नहीं पड़ती । उसमें जलकी भी आवश्यकता नहीं पड़ती, न मिट्टी की । प्रत्युत पत्थर और लकड़ी तक में भी यह पैदा हो जाता है । इसीसे इसकी जीवनी शक्तिका अनुमान कर लेना चाहिये । एतदादि विशिष्ट शक्तियों के कारण ही श्रीमद्भागवत तथा भगवद्गीतामें पीपलको भगवान्का स्वरूप कहा है ।
In English
The Medicinal Power and Purity of Ganges Water
This chapter discusses the scientific and medicinal properties of water from the Ganges river. It cites various doctors and observations to argue that the water possesses a unique ability to destroy germs and cure diseases like cholera and asthma.
This chapter answers
- Does ganga water kill bacteria?
- Medicinal benefits of ganga water in ayurveda?
- Why is ganga water considered pure by scientists?
- Can ganga water cure cholera and asthma?
Also written: Shrigangajalaki, Visheshataka, Vigyana, Shrigangajalaki Visheshataka Vigyana, श्रीगङ्गाजलकी विशेषताका विज्ञान