पञ्चम सुमन · प्रकरण 53

वृक्षोंकी चेतनता

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497( ४४ ) वृक्षोंकी चेतनता ।

पुरुषका ज्ञान कितना अधूरा है, फिर भी अपने पूर्वज ऋषि- मुनियोंसे बनाये शास्त्रोंपर वह अविश्वास करता है, और उनके खण्डनार्थ अनर्गल चेष्टा करता रहता है - वह विचार कर हमें 4 अपने समाजपर बहुत हँसी आती है । हम सैंकड़ों वस्तुओं का प्रयोग करते हैं, दिन - रात उनके साथ रहते हैं; परन्तु हमें उनके जीवन के अस्तित्व के विषय में ज्ञान न स्वयं होता हैं, और न प्राचीन अपने. पूर्वजोंसे की हुई गवेषणा को ही हम स्वीकृत करते हैं । शतशः: चञ्चल युवक - युवतियाँ किसी विकसित पुष्पको देखकर उसके तोड़नेका उद्योग करते हैं । वह उन्हें सुन्दर दीखता है । उसे वे अपने पास रखना चाहते हैं; किन्तु वे नहीं जानते कि - वह पुष्प भी अपनी माँका एकमात्र अपत्य है । उसके वियोगसे उस लताको भी वैसा दुःख होगा जैसा आपकी माताको आपके वियोग में । हां, उन्हें विकसित करनेके सहायक देवताको उसे उपहृत किया जा · सकता है; उसका प्रसाद हम भी ले सकते हैं ।

सनातनधर्मियों द्वारा की जाती हुई वृक्षोंकी पूजा देखकर यूरोप के विचारोंके दास कई भारतीय उनपर हँसते थे कि - ऐं! यह जड़ - पूजक हैं? क्योंकि — यूरोप भी पहले वृक्षोंको जीवित नहीं मानता था । आज भी अधिक समय नहीं बीता कि - यूरोपनिवासी विचारते रहते थे कि — वृक्षों में भी सुख - दुःखके अनुभवकी शक्ति है या नहीं? हम प्रतिदिन देखते हैं, सुनते हैं कि -सूर्यके उदयमें कमल विकसित होता है, और सूर्यास्त होनेपर बन्द होता 498है । कुमुद चन्द्रमाके उदयमें खिलता है; अस्त होनेपर मुद्रित होता है । सूर्यमुखी - फूल सूर्य के सामने रहता है । अधिक गर्मी में शीतल- देशके वृक्ष म्लान हो जाते हैं, बहुत सर्दी में उष्णदेशके वनस्पति जड़ हो जाते हैं । प्रायः नीमका वृक्ष रोता हुआ दीखता है । लाजवन्ती वूटी अंगुलि लगाने से ही सकुचती हुई देखी गई है । शिरीषका सोना महाभाष्यकारने ( ३ । १ । ७ ) सूत्रके भाष्य में लिखा है । फिर भी लोगोंको विश्वास नहीं होता था कि वृक्ष चेतन हैं । बल्कि आर्यसमाजके श्रीकृपाराम शर्मा ( स्वा ० दर्शनानन्द ) वृक्षोंको अचेतन ही सिद्ध किया करते थे ।

एक आर्यसमाजीने हमें एक अपनी कविता सुनाई थी जिसका आशय यह था कि ' जब इतना अज्ञान और पाप - पाखण्ड फैला था किं - लोग जड़ वृक्षों पर भी खोया- रबड़ी आदि चढ़ाया करते थे, तब स्वा ० दयानन्दजीका जन्म हुआ; उन्होंने यह अज्ञान हटवा दिया । ' हमने कहा कि - ' वृक्ष तो चेतन माने जाते हैं; उन पर तो कुछ ग्रास आदि चढ़ाया जाया करे - यह ठीक ही है पर स्वा ० दयानन्दजी तो जड़ ऊखल - मूसलको भी भोग लगवा गये; उस पर ग्रास रखवाते थे, और ' वनस्पतिभ्यो नमः ' कहकर उन्हें वृक्षोंका प्रतिनिधि मानते थे, पटेले पर भी घी, दूध, शक्कर चढ़वाते थे कि यह पटेला हमें अन्न देने वाला है । तब वे वृक्षोंकी पूजा तो स्वयं प्रचलित करवा गये; तो उन्होंने भी क्या वही अज्ञान फैलाया? यह सुनकर वह नव - कवि चुप्पी लगा गया ।

शास्त्रों में वृक्षों की चेतनताका शतशः - स्थानों में स्पष्ट वर्णन आया

499वृक्षोंकी चेतनता ४88. है । जैसे कि – महाभारत शान्तिपर्व में - ' जीवं पश्यामि वृक्षाणाम- चैतन्यं न विद्यते ' ( १८४ | १७ ) यहाँ वृक्षोंकी चेतनता स्पष्ट कही गई है । तव विशेष वृक्षोंकी पूजा जड़पूजा कहाँ हुई? मनुस्मृतिमें तो इससे भी स्पष्ट कहा है- ' तमसा बहुरूपेण वेष्टिताः कर्महेतुना । अन्तःसंज्ञा भवन्त्येते सुख - दुःखसमन्विताः ' ( १ | ४६ ) ' शरीरजै: कर्म- दोषैर्याति स्थावरतां नरः ' ( मनु ० १२२६ ) इन दो पद्योंमें वृक्षों की योनि पूर्वजन्मके कर्मोंके कारण मानी गई है, और इन्हें जीवित, एवं सुख - दुःखका अनुभव करने वाला माना गया है ।

इस विषय में मनुस्मृतिके अन्य पद्य भी हैं । देखिये- ' स्थावराः. कृमिकीटाश्च ' ' जघन्या तामसी गतिः ' ( १२।४२ ) ' तृणगुल्मलतानां च शतशो गुरुतल्पगः [ योनिं प्राप्नोति ] ( १२।५८ ) ' स्थावराणि च भूतानि दिवं यान्ति तपोबलात् ' ( ११।२४० ) यहाँ सर्वत्र स्थावरोंको भी एक योनि माना गया है । एक प्रश्न यह है कि - यह तामस योनि बताई गई है; इनकी पूजा कैसी? इस पर यह जानना चाहिए कि- मनुस्मृतिके १२।४२ पद्यके अनुसार सर्प भी तामस - योनि माने गये हैं; फिर भी उनकी वेदमें ' ये वाऽवटेषु शेरते, तेभ्यः सर्पेभ्यो- नमः ' ( यजुः १३।७ ) इस मन्त्रमें पूजा बताई गई है । नागपञ्चमी तो प्रसिद्ध है ही । ' रक्षांसि च पिशाचाश्च तामसीषूत्तमा गतिः ' ( १२।४४ ) यहाँ मनुजीके कथनानुसार राक्षस - पिशाच आदियोंको तामस माना गया है । फिर भी उनकी पूजा आयुर्वेद में सुश्रुतसंहिताके उत्तरतन्त्र ६० अध्यायमें कही गई है । अस्तु । यह भिन्न विषय है ।

अब प्रकरण पर आइये । सांख्यदर्शन विज्ञानभिक्षुके भाष्य में

500श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )

कहा है - न वाह्यज्ञानं यन्त्रास्ति, तदेव शरीरम् इति नियमः, किन्तु वृक्षादीनाम् अन्तःसंज्ञानामपि भोक्तृभोगायतनत्वं शरीरं मन्तव्यम् । यतः पूर्ववद् यो भोक्त्राधिष्ठानं विना मनुष्यादि शरीरस्य पूतीभावः, . तद्वदेव वृक्षादिशरीरेष्वपि शुष्कतादिकमित्यर्थः । तथा च श्रुतिः --- ' अस्य यदेकाभ्रंशाखां जीवो जहाति, अथ सा शुष्यतिः सर्वं जहाति, सर्वः शुष्यति ' इति छान्दो ० [ ६।११।२ ], ( ५१२२ ) ' स्मृतेश्व'- ' शरीरजैः कर्मदोषैर्याति स्थावरतां नरः ' मनु ० ( १२/६ ) इत्यादि - स्मृतेरपि वृक्षादिषु भोक्तृभोगायतनत्वमिति ' ( ५।१२४ ) यहाँ श्री- विज्ञानभिक्षु छान्दोग्यकी श्रुति तथा मनुस्मृतिका वचन देकर समयपर वृक्षादिका सुखना दिखलाकर वृक्षमें भी जीव दिखलाकर उसका भी शरीर माना है । उक्त छान्दोग्य- श्रुतिपर श्रीशङ्कराचार्य- स्वामीने भाष्य किया है- ' वृक्षस्य रस स्रवणशोषणादिलिंगाद् जीवत्वम् । दृष्टान्तं श्रुतेश्च चेतनावन्तः स्थावरा इति ' यहाँ भी वृक्षोंकी चेतनता मानी है ।,

श्रीमद्भागवतपुराण में भी यही कहा है- ' वनस्पत्योषधिलताः त्वकूसाराः वीरुधो द्रुमाः । उत्स्रोतसः तमः प्राया अन्तःस्पर्शा विशेषिणः ' ( ३।१०।१६ ) यहाँ ' तमः प्रायाः ' का अर्थ श्रीधरस्वामी किया है - ' अव्यक्त चैतन्याः ' अर्थात् वृक्ष आदिकी चेतनता है तो सही; पर बाहर प्रकट है । इस प्रकार वैशेषिकदर्शनके उपस्कारमें भी कहा है- ' वृक्षादयोपि शरीरभेदा एव; भोगाधिष्ठानत्वात् । न खलु भोगाधिष्ठानत्वमन्तरेण जीवन - मरण - प्रजागरणभेषजप्रयोग- बीजसजातीयानुबन्धानुकूलोपगमप्रतिकूलापगमादयः सम्भवन्ति ।

501२०१ वृद्धि - क्षतभग्नसंरोहणे च भोगोपपादके स्फुटे एव । आगमोष्यस्मिन्- ' नर्मदातीरसम्भूताः सरलार्जु नपादपाः । नर्मदातोय - संस्पर्शात् ते यान्ति परमां गतिम् ' इत्यादि । ' श्मशाने जायते वृक्षः कङ्कगृध्रोप- सेवितः ’ ं इत्यादिश्च ( ४ | २ | ५ ) यहाँ पर वृक्षोंका बढ़ना, सूखना, क्षतवृक्षके अंगोंकी पूर्ति, वृक्षोंकी दवाई आदि यह प्रत्यक्ष बात, और विशेष - नदीके जलसे वृक्षोंकी परमगति, तथा अमुक - कर्मसे वृक्ष बनना दिखलाकर वृक्षको चेतन तथा कर्मबन्धनसे युक्त माना गया है ।

इस प्रकार ‘ वैयाकरण - सिद्धान्तकौमुदी ' में ' भत्तेरहिंसार्थस्य न ' ( १ | ४ | ५२ ) इस वार्तिकके ' भक्षयति बलीवर्दान् सस्यम् ' इस, प्रत्युदा- हरणमें खेतमें बढ़ रहे हुए सस्य ( धान्य ) का खिलाना हिंसा माना है । हिंसा माननेसे उनकी चेतनता स्पष्ट बता दी गई । इससे पक चुके हुए अन्नका खाना अहिंसा सूचित की गई है; उसका चिह्न यह है कि आगे वह नहीं बढ़ते; और सूख जाते हैं । टीकाओं में ' आपोमयः प्राणः ' इससे शस्यमें जलमय प्राण भी दिखलाया गया है । इस पर तत्त्वबोधिनीमें लिखा है- ' क्षेत्रस्थानां यवानां भक्ष्य- मारणानां हिंसा ज्ञेया, तस्यामवस्थायां तेषां चेतनत्वात् ' । यही बात ' बालमनोरमा ' में कही है- ' सस्यस्य तदानीम् अन्तःप्रज्ञत्वात् तद्भक्षणं हिंसैव ' । भाष्यकारने भी अहिंसार्थके प्रत्युदाहरणमें ' भक्षयति, बलीवर्दान् यवान् ' ( १ । ४ । ३ । ५२ ) यह प्रत्युदाहरण दिया है । इस पर कैयटने स्पष्ट किया है- ' क्षेत्रस्थानाम् अंकुराद्यवस्थायां यवानां. भक्षणाद् हिंसा भवति । तदवस्थायां कैश्चित् चैतन्याभ्युपगमात् ’

502श्रीसनातनधर्मालौक ( ५ )

५०२

यहाँपर कैश्चित्

' ' शब्द चिन्तनीय है, अर्थात् खेतके अंकुर रूपमें ठहरे हुओं को कई चेतन मानते हैं । फिर कैयटने दूसरोंके खेत खिलाने से भी हिंसा दिखाई है; पर भाष्यकारको ऐसा इष्ट नहीं, अन्यथा वे ' परकीयान् ' यह शब्द देते । इसीलिए श्रीनागेश भट्टने लिखा है – ' अत्र श्राद्यमेव युक्तं, भाष्यस्वरसादित्याहु: ' अर्थात् भाष्यकार खेतकी अवस्था वाले जीवोंको सर्वथा चेतन मानते हैं । ३७ कारिकाकी न्यायसिद्धान्तमुक्तावली में भी वृत्तोंका शरीर मानकर उन्हें चेतन माना है, वहाँ आध्यात्मिक प्राणवायुका भग्नक्षत- संरोहणके अनुमानसे अस्तित्व माना है । अस्तु ।

इस प्रकार हमारे आचार्योंने अनेक वैज्ञानिक ग्रन्थियाँ पूर्वसे ही सुलझा रखी हैं, किन्तु परप्रत्ययनेय - बुद्धि लोग हमारे शास्त्रोंको पोप - पाखण्डियोंसे वने हुए मानकर उनका अपमान करते हैं । यह समयकी गति है । गाँवोंमें आज भी प्राचीन स्त्रियाँ कच्चे फलोंका काटना और उन्हें भूनना हिंसा मानती हैं । रातके समय वृक्षका पत्ता तोड़ने में भी वे पापकी शंका करती हैं । इन बातों में कितना तथ्य है - यह बात विज्ञानाचार्य श्रीजगदीशचन्द्र बोसने विज्ञान द्वारा प्रत्यक्ष भी सिद्ध कर दी है ।

जगदीशचन्द्र वसु - महोदय कैम्ब्रिज युनिवर्सिटीमें चार वर्ष पढ़कर विज्ञानकी सर्वोच्च परीक्षा पास करके भारत वापिस आये । इन्होंने बहुतसे वैज्ञानिक लेख लिखे, जिनका रायलसोसायटी - द्वारा खूब सम्मान हुआ । इंगलैण्डके वैज्ञानिक - संसार पर भी उसका प्रभाव पड़ा ।. बहुत परिश्रमके बाद इन्होंने एक यन्त्र बनाया, 503जिनसे वृक्षोंके सुख - दुःखका अनुभव प्रत्यक्ष होता था । पर यूरोपके वैज्ञानिकोंने इस पर विश्वास न किया; क्योंकि वे वृक्षोंको जड़ मानते थे । पर वसु - महोदयने सिद्ध किया कि जैसे प्रिय और अप्रिय बातोंका मनुष्यके हृदयपर प्रभाव पड़ता है; वैसे वृक्षोंपर भी । जैसे विष मनुष्यों केलिए घातक है; वैसे ही वृक्षोंकेलिए भी । इस यन्त्रका नाम ' रसोनेण्ट रिकार्डर ' उन्होंने रखा । विदेशी वैज्ञानिक हैरान होते थे कि — ऐसा यन्त्र भारतमें कैसे बन सका?

१ ९ २१ में उन्होंने ' क्रसकोग्राफ ' यन्त्र बनाया । यह अत्यन्त सूक्ष्म वस्तुओंको दिखलाता था । १६२६ में एक यन्त्र बनाया, जिससे स्पष्ट दीखता था कि — वृक्ष प्रतिक्षण कैसे बढ़ रहे हैं? इस यन्त्रसे पता चलता था कि — कोई पुरुष वृक्षपर अपनी सांस भी डाले; तो वृक्ष की कितनी हानि होती है । फिर वसु - महोदयने वृक्ष तथा अन्य जीवोंकी स्नायुकक्रिया दिखलाई । एक मेंडकको पकड़कर उसकी कमरमें बिजलीकी तरङ्ग डाली, इससे उसका दाहना पांव हिल उठा; विपरीत - तरंग देनेमें बायां पाँव । यही क्रिया उन्होंने लाजवन्ती ( शर्मं- बूटी ) के दो पत्तोंपर दिखलाई । इससे उन्होंने यह सिद्ध किया कि - जीवों और वृक्षोंका स्नायु- संघटन समान है ।

वृक्षोंमें खादका रस कैसे पहुँचता है— इस सम्बन्धमें लोगोंका विचार था कि — पत्तोंका रस भाफ बनता है; और पत्ते उसे चूस लेते हैं; पर वसु- महाशयने उसे गलत बताया । मरे हुए - से पत्तेपर उन्होंने एक गहरा लेप किया, जिससे रस भाफ बनकर उड़ न 504· सके । उसमें एक उत्तेजक - रस डालकर उन्होंने पत्तोंको हरा कर दिया । इसप्रकार सजीव पत्तेपर विष डालकर उसे मृत कर दिया । फिर जब उसपर उत्तेजक रस डाला; तो वह पत्ता फिर हरा हो गया ।

फिर उन्होंने एक और क्रिया दिखलाई कि- जैसे प्राणियोंका • हृदय स्पन्दित होता है, वैसे वृक्षोंका भी । इतना ही नहीं; वल्कि यह भी दिखलाया कि - जैसे दवाई देने से मनुष्यका लाभ होता है; वैसे वृक्षोंका भी । यह भी उन्होंने दिखलाया कि कई वृक्ष संजीवनी - शक्तिका संचार भी करते हैं । एक मेंडककी हृदयकी गति रुक गई । उसमें उक्त वृक्षके रसके इन्जैक्शन से वह फिर जी उठा ।

उनमें अपने इस आविष्कारपर पूर्ण विश्वास भी था । एक बार वे पैरिसमें विज्ञान परिषद् के आगे अपना प्रयोग दिखा रहे थे कि — भयंकर ‘ पोटेशियम सायनाड् ' नामक विष वृक्षको भी वैसे मार डालेगा, जैसे मनुष्योंको । उक्त विष वहांके एक रासायनिक- द्रव्य - विक्रेतासे मंगाया गया । उसने एक भारतीय के अपमान के लिए वैसे रंग वाली खाँड दे दी । जब उन्होंने वह श्वेत चूर्ण पौधे पर डाला, तब उसपर कोई प्रभाव नहीं पड़ा । वैज्ञानिक लोग व्यंग्यपूर्ण - हँसी - हँसने लगे । पर इससे श्रीवसु विचलित नहीं हुए । उन्होंने उस कल्पित - विषको खाते हुए कहा कि यदि इस ' विष'का प्रभाव इस पौधेपर नहीं पड़ा; तो मुझपर भी नहीं पड़ेगा । उन्होंने उसे बिना सोचे - विचारे फाँक लिया । उन्हें कुछ भी नहीं हुआ । तब उन्होंने

505वृक्षोंकी चेतनता

५०५ कहा कि- — एक भारतीयके अपमानकेलिए ऐसा किया गया है । तब असली विष मंगाकर उन्होंने उसके इन्जैक्शनसे वृक्षको ' मृत ' कर दिया, फिर संजीवन - रसके इन्जैक्शनसे उसे फिरसे ' जीवित ' कर दिया ।

आज लोग पूछते हैं कि - वसु - महोदय के इतने जटिल परिश्रम से प्रसूत इस आविष्कारका क्या लाभ मिला? इस पर जानना चाहिये कि जो लोग पहले वृक्षोंको जड़ मानते थे, उनके मुंह पर थप्पड़ लगा — एक तो इसका यह लाभ हुआ । हमारे पूर्वजोंकी भी विज्ञान में अबाध गति थी - यह जतलाना - यह दूसरा लाभ हुआ । जो वृक्षोंको जड़ मानकर उनके पूजकों पर उपहास करते थे; उनकी चुप्पी - यह तीसरा लाभ है । शेष लाभ आगे होंगे । माताके गर्भसे पैदा हुआ बच्चा पण्डित नहीं बन जाता । जब पहले - पहले रेलवे- इञ्जन बना था; तो लोग कहते थे कि यह पटरी परसे . गिरेगा - बहुत सी हानियाँ पहुँचावेगा; पर अब उस रेलगाड़ीके लाभ प्रत्यक्ष हैं ।

कई लोग यह मानते हैं कि इस आविष्कार से भविष्य में कृषिमें बहुत बड़ी सहायता मिलनेकी आशा है । जो लोग यज्ञों में पशु - हिंसा देखकर उससे घृणा करते थे, उसमें बलात् वृक्षों वा ओषधियोंका अर्थ करते थे, उन्हें उचित है कि वृक्षके पत्ते एवं पुष्प आदिका उपयोग करके भी हिंसक न बनें । इसलिए महाभारत में कहा है- ' नहि पश्यामि जीवन्तं लोके कञ्चिद् अहिंसया । . सत्त्वैः सत्त्वा हि जीवन्ति दुर्बलैर्बलवत्तराः । विना वधं न कुर्वन्ति 506तापसाः प्राणयापनम् ' ( १५/२४ ) उदके वहवः प्राणाः पृथिव्यां च फलेषु च । न च कश्चिन्न तान् हन्ति किमन्यत् प्राणयापनात् ' ( २५ ) भूमिं भित्त्वौषधीश्छित्त्वा वृक्षादीन् अण्डजान् पशून् । मनुष्यास्तन्वते यज्ञान् ते स्वर्गं प्राप्नुवन्ति च । ( १५।२८ ) ।

पर देवकार्य - हवन एवं देव - मूर्तिपूजाकेलिए वृक्षादियोंका उपयोग तथा जन्मान्तरसें उनकी सद्गति शास्त्रकार भी मानते हैं । जैसे कि मनुजीने कहा है — ' प्रोषध्यः पशवो वृक्षाः • यज्ञार्थं निधनं प्राप्ताः प्राप्नुवन्त्युत्स्मृतीः ( जात्युत्कर्षं ) पुनः ' ( ५४० ) यहाँ ओषधि तथा वृक्षोंका यज्ञार्थ निधन ( मारना ) कहकर, उनका अन्य जन्म उत्तम बताकर वृक्षोंको चेतन सिद्ध कर दिया है; तब उनकी पूजा जड़पूजा सिद्ध न होकर चेतन - पूजा सिद्ध हुई; और देव - पूजनके लिए उनका उपयोग करके फिर उनके भागोंका अपने उपयोग में लाना भी पाप सिद्ध न हुआ । हाँ, बाहरी दृष्टिसे यह मी हिंसा ही है; पर मनुष्य स्वार्थी है । यह जैसे अपनी रक्षार्थ कीटाणुओं की हिंसा करता है, मनुष्य - भक्षक शेर - बाघ आदिको मरवाता है; खेत में हानि पहुँचानेवाले जीवोंको मरवाता है । घरमें तकलीफ देनेवाले दीमक, जू आदिकी हिंसा करके भी अपने - आप को पापी नहीं समझता; वैसे इधर भी समझ लेना चाहिये । पर इससे हम हिंसावाले यज्ञोंका समर्थन नहीं कर रहे, वे तो कलियुग में वर्जित हैं; हम क्यों उन्हें करनेकेलिए प्रोत्साहन देंगे? पर यह कहते हैं कि - शास्त्रोंमें जो ऐसे वर्णन आते हैं, उसमें ऋषि- मुनियोंका अपमान नहीं करना चाहिये; वस्तुस्थिति समझनी

In English

The Consciousness of Trees

This chapter argues that trees and plants possess consciousness and the ability to experience pleasure and pain. It uses various scriptures, including the Manusmriti and Bhagavata Purana, to prove that vegetation is a living state resulting from past karma.

This chapter answers

  • Are trees conscious in hinduism?
  • Do plants feel pain according to scriptures?
  • Why do hindus worship trees?
  • Is eating growing crops considered violence in vedic texts?

Also written: Vrikshonki, Chetanata, Vrikshonki Chetanata, वृक्षोंकी चेतनता

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 497–506 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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