सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 511–520

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 511–520

पृष्ठ 511

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श्रीतुलसीपूजन - विज्ञान ४८३ ऋषि - मुनियोंने एतदादिक गुण जानकर उससे आध्यात्मिकतामें भी लाभ जानकर इसका धर्मसे भी सम्बन्ध देखा था । उससे ऐहिक-जीवनकी रक्षा होती है, पारलौकिक जीवन भी प्राप्त होता है । इस प्रकारकी हितकारिका तुलसीका पूजन तथा प्रत्येक गृहमें रोपण आवश्यक है । प्रत्येक प्राचीनताके उपहासी व्यक्तियोंको उचित है कि वह घोर निद्राको छोड़कर, प्राचीन ऋषि - मुनियोंके वचनों में अविश्वास हटाकर, प्राणरक्षक, पावन तुलसीका प्रचार घर - घरमें करावें; जिससे दिनों - दिन विकृत हो रहा हुआ भारतीयोंका स्वास्थ्य ठीकं होवे । भगवान्के चरणामृतमें इसका उपयोग इसीलिए होता है कि यह ' अकालमृत्यु - हरण ' और ' सर्वव्याधि - विनाशन ' है । भगवान् को भी तुलसी इसीसे तो प्रिय है कि उसके भक्तोंकी सर्व व्याधियाँ नष्ट करके उनकी अकाल मृत्युको दूर करती है । तब यदि यह ऐहिक नवजीवन प्रदात्री तथा पारलौकिक - फलकी प्रदात्री मानी गई हो, तो इसमें अविश्वासकी कोई बात नहीं । आरोग्य ही सर्वविध धर्मोका साधक होता है ' शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ' ' धर्मार्थ-काममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम् ' यह दृष्टशास्त्र - आयुर्वेदकी उक्तियाँ भला कैसे असत्य हो सकती हैं? इस प्रकार आर्य सभ्यताकी गौरव-प्रदर्शिका सनातन - हिन्दु धर्मकी प्राण तुलसीको जो वैदिकम्मन्य वैसा नहीं मानते; केवल पाश्चात्य चिकित्साओं में लगे रहते हैं, धौर प्राचीन सभ्यताकी वृद्धिसे अपना लाघव समझते हैं, ऐसे महाशय तो सचमुच धीवर (? ) हैं वे दूरसे ही तिलाञ्जलिके योग्य हैं । यही

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858 श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) विज्ञानका ज्ञानही कारण है कि - हिन्दु लोग ' एका क्रिया द्वयर्थकरी प्रसिद्धा ' – न्यायसे अनेकविध रोगों में भी उसका उपयोग करते हैं, और इसकी परिक्रमा पूजा आदिसे उसके अभिमानी देवताका पूजन भी हो जाता है । तुलसीपत्रको चवानेका निषेध । ( ख ) तुलसी- दलको दान्त - द्वारा चबाने से दान्तकी त्वचा रोग हो जाते. हैं, जिनसे दान्तोंको निकलवाना पड़ जाता है । अतः उसके पत्तेको विना चबाये ही पेट में पहुँचाना चाहिये, तभी यथोक्त- फल प्राप्त होता है । इसके अतिरिक्त दान्तोंसे चबाने से उसका लाभजनक रस भीतर पहुँच भी नहीं पाता । उस पत्ते को निगल जाने पर अन्तड़ियाँ उसका रस स्वयं खींच लिया करती हैं; जिससे अपेक्षित लाभ भी प्राप्त हो जाता है । ( ४२ ) श्रीगङ्गाजलकी विशेषताका विज्ञान । चरणामृतमें गङ्गाजलका उपयोग भी होता है; अव उसपर विचार करना भी प्राकरणिक है । गङ्गाजलका वर्णन वेदसे लेकर लौकिक - साहित्य तक आता है । ' इमं मे गङ्ग े ! यमुने! सरस्वति! शुतुद्रि! ' ( ऋ ० सं ० १० | ७५/५ ) इस वेदमन्त्र में सबसे पूर्व गङ्गाका नाम आया है । उसकी स्तुति की गई है । ' सितासिते सरिते यत्र सङ्गते तत्राप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति । ये वै तन्वं विसृजन्ति धीराः, ते जनासो अमृतत्वं भजन्ते ' इस पूर्वमन्त्रके परिशिष्ट - मन्त्रमें सिता ( गङ्गा ) असिता ( यमुना ) के सङ्गममें मृत्युको प्राप्त होनेवालेको स्वर्गकी प्राप्ति कही गई है । ' स्रोतसामस्मि जाह्नवी ' ( गीता १०।३१ ) इस वचनमें

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श्रीगङ्गाजलकी विशेषताका विज्ञान भगवान्ने गङ्गाको अपना रूप माना है । वाल्मीकि रामायणमें भी श्रीसीता - द्वारा गङ्गाकी पूजा तथा उससे प्रार्थना आई है । पुराणों में भी ' गङ्गागङ्गति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि । मुच्यते स हि पापेन विष्णुलोकं स गच्छति ' इत्यादि - रूपसे गङ्गाका बहुत माहात्म्य आया है । इसीलिए हिन्दुजातिका विशेष पर्वों में गङ्गा-स्नान के लिए जाना, कुम्भोंके भीड़ - भड़क्केमें मरनेसे भी न डरना प्रत्यक्ष है । लोग गङ्गाजल बड़ी श्रद्धासे लाते हैं, उसकी एक - बू ँद डालकर भी अपने जलको शुद्ध करते हैं । कुएँसे मुसलमानादि - द्वारा कीचड़ निकलवाकर फिर गङ्गाजलसे उसकी शुद्धि की जाती है । इन बातोंको देखकर स्वतः ही यह प्रश्न उठता है कि — इस गंगा-नदीके लिए अत्यन्त श्रद्धा तथा माहात्म्यका कारण क्या है? इसके जलमें क्या विशेषता है? हम गत - विषयों में निरूपण कर चुके हैं कि जो वस्तु पार-लौकिक फलवाली, अथवा अदृष्टमें लाभप्रद मानी गई है, वह दृष्टमें भी लाभप्रद होती है; ऐहलौकिक फल भी देनेवाली होती है । यदि हम थोड़ी देरकेलिए इसपर शास्त्रीय दृष्टिकोण छोड़ भी दें; केवल दृष्ट - शास्त्र उपवेद आयुर्वेदके वा वैज्ञानिक दृष्टिकोणसे भी गङ्गाजलका निरीक्षण किया जावे; तो पता लगता है कि-उसमें वा उसकी मट्टीमें शरीरके पोषण वा स्वस्थीकरणकी पूर्व शक्ति विद्यमान है । चरकसंहितामें गङ्गाजलको पश्य माना है । बड़े - बड़े वैज्ञानिकोंका कथन है कि — गङ्गाजलमें शारीरिक - शक्ति बढ़ानेकी अद्भुत क्षमता है । रोगियों तथा दुर्बल पुरुषोंको ' टानिक '

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४६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) दवाइयां पीनेकी आवश्यकता नहीं । केवल गङ्गा - जल पीने तथा स्नानसे शरीर में पूर्णबल प्राप्त हो जाता है । गंगाजलके पीनेसे अजीर्णरोग, अजीर्णज्वर तथा संग्रहणी, ' राजयक्ष्मा, पुराना श्वास-. रोग ( दमा ), यह सब रोग नष्ट हो जाते हैं । गंगास्नान करनेसे मस्तक के समस्त रोगों तथा चर्मरोगोंका नाश होता है । उक्त - कथनकी सत्यता महाविद्वान, सुप्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्यो तथा ख्यातनामा डाक्टरों तथा हैल्थ - आफिसरोंके रासायनिक परीक्षणोंसे सिद्ध है । जो लोग आज भी गङ्गाके जलको विश्वासकी दृष्टिसे देखते थे; उनकी भी आंखें व खुल गई हैं । वे भी अब गंगाजल की विलक्षण - शक्तिके आगे नतमस्तक होगये हैं । प्लेग, हैजा, मलेरिया आदि कठिन संक्रामक रोग खराब - स्थानके खराब - जलके सेवनसे हो जाते हैं; पर गंगाजल के सेवनसे यह सब रोग थोड़े ही कालमें अदृश्य हो जाते हैं; क्योंकि गङ्गाजल कभी दूषित नहीं होता; न ही उसमें कभी कीटाणु पैदा होते हैं । वल्कि गङ्गाजल में रोगके कीटाणुओंको डालनेसे वे सव नष्ट हो जाते हैं, यह गङ्गाजल में अद्भुत शक्ति है । इसीलिए ही महर्षियोंने एवं आयुर्वेद-विद्वानोंने गङ्गाजलकी स्तुति की थी । गङ्गाजलमें मधुरता तथा मनोहरता है । रोग - कीटाणुओंके नाशनकी शक्ति, स्वच्छता, मेध्यता- पवित्रता आदि अनेक गुण हैं, जिससे वैज्ञानिक विद्वान् गङ्गाजलके चमत्कारको देखकर मुग्ध हो जाते हैं । पाश्चात्य - वैज्ञानिकोंने भी आधुनिक चिकित्सा- शास्त्रकी कसौटी पर कसकर गङ्गाजलकी उपयोगिता और महत्ता सिद्ध की है ।

पृष्ठ 515

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श्रीगङ्गाजलकी विशेषताका विज्ञान ४६७ डाक्टर ई ० एच ० हैं किन्सने जो युक्तप्रान्त तथा मध्यप्रान्तकी सरकारोंके ' केमीकल ऐक्जामिनर ' ( रसायन - परीक्षक ) थे - गङ्गाजल की परीक्षा की । उन्होंने गङ्गामें गंदे नालों को गिरते देखा, जिनमें हैज़ेके लाखों कीटाणु होते थे; पर वे गङ्गाजल में मिलनेके कुछ देर बाद नष्ट होजाते थे यह उन्होंने अनुभूत किया । फिर उन्होंने एक बोतल में गङ्गाजल डाला, दूसरीमें कुएँका जल । दोनों में हैज़ेके कीटाणु डाले । गङ्गाजल वाली बोतल में तो वे कीटाणु ६ घण्टेके अन्दर ही मर गये; पर साधारण जलवाली बोतल में वे बढ़ गये - यह देखकर वे अत्यन्त चकित हुए । सोचने लगे कि - हिन्दुलोग जो अनादिकालसे गङ्गाके भक्त बने हुए हैं; क्या उस समय भी उन्हें विज्ञानका ज्ञान था? इस अनुभव से वे इस परिणाम पर पहुँचे कि गङ्गाजलमें वस्तुतः विलक्षण रोगनाशिनी - शक्ति है । कितना लिखा जाए; अमेरिकाके सुप्रसिद्ध डाक्टरोंने भी इस सम्वन्धमें बहुत कुछ लिखा है । सारे संसारका प्रसिद्ध यानी ' मार्कटुहन ' अपनी ‘ संसार- यात्रा ' में लिखता है कि - गङ्गाजलकी मैंने स्वयं परीक्षा की है । इसमें रोगाणुओं को नष्ट करनेवाली बड़ी शक्ति है । यह जल अत्यन्त शुद्ध एवं पवित्र है । यही कारण है कि इसके पीने से और स्नानसे मनुष्योंके विविध - रोग नष्ट हो जाते हैं । पाश्चात्य - वैज्ञानिकोंसे अतिरिक्त आयुर्वेद - विद्वानोंका भी यह मत है कि सब प्रकारके रोगों में गंगाजलका सेवन अतिलाभकारी है, क्योंकि गंगाजल में कठिनसे भी कठिन रोगोंके हरण करने में बिलक्षण - क्षमता है । एक रोगी जो क्षय और श्वाससे युक्त था;

पृष्ठ 516

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श्रीसनातनधर्मालौक ( ५ ) दवाइयोंसे निराश होकर हरिद्वार में आगया । उसने सब दवाइयाँ छोड़ - छाड़कर गङ्गाजलका ही दैनिक पान शुरू किया; तथा समय-समय पर उससे स्नान किया; जिससे वह सवा दो महीने में ही स्वस्थ होगया । यह जानकर कई हैरान अवश्य होंगे; परन्तु ऐसा एक नहीं; इसमें बहुतसे उदाहरण मिलते हैं, जिनसे गंगाजलकी कौतूहल- पूर्ण शक्तिका परिचय मिलता है । इससे उसकी पवित्रताका अनुमान भी हो जाता है 1 । जिस वस्तुको शास्त्रीय - संसार में पवित्र माना जाता है, उसके परीक्षणसे पता लगेगा कि - उसपर कीटाणुओंका कोई प्रभाव नहीं पड़ता । गंगाजलके विषय में फ्रान्सके एक वैज्ञानिक डा ० डेरेल वैज्ञानिक प्रयोग द्वारा सिद्ध किया है कि गंगाजल में विसूचिका ( हैजा ), अतिसार, संग्रहणी, क्षय आदि रोगोंके लिए • गंगाजल अत्युत्तम औषधि है । उसने गंगाजल के कीटाणुओं की सहायतासे एक अद्भुत - ओषधि भी तैयार की है, जिसका नाम उसने ' वैक्टीरियो फैज़ ' यह रखा है, जिसका आजकल इन्हीं रोगोंकी चिकित्सामें प्रयोग किया जाता है । डाक्टर रिचर्डसनने तो इससे भी अधिक आश्चर्यमयी बात लिखी है कि- ' गंगा - गंगा कहने और दर्शनमात्रसे भी मानव हृदय पर उत्तम प्रभाव पड़ता है । ' यह ठीक भी मालूम होता है; क्योंकि-‘ श्रद्धया सत्यमाप्यते ' ( यजुः १६।३० ) श्रद्धासे भी तद्भाव प्राप्त हो जाता है । दर्शनसे उसके अणु हमारे अन्दर पहुँचकर भी अपना प्रभाव करेंगे ही । गंगाजलकी पवित्रता वा उपयोगिता केवल

पृष्ठ 517

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श्रीगङ्गाजलकी विशेषताका विज्ञान ४८8 धार्मिक दृष्टिसे ही नहीं; अपितु आधुनिक चिकित्साशास्त्रकी दृष्टिसे भी उसका मनन अनिवार्य है, जिसके प्रमाणस्वरूप गुड ' हैल्थ ' नामक अंग्रेजी- पत्र में मिस्टर सी ० ई ० नैल्सनका लेख है । अंग्रेजी ' स्टेट्समैन ' नामक प्रसिद्ध पत्रमें तथा ' लीडर ' पत्रमें भी वह प्रकाशित हुआ था कि- गंगाजलकी पवित्रता सर्वमान्य है । इसके जलमें हैजा तथा फोड़े आदिके नाशनमें अपूर्व शक्ति है । श्री-रोशनलाल वैरिस्टरने लिखा था कि हमारे सामने एक अमेरिकाके डाक्टरने काशीकी गन्दी नालीसे दो - तीन बूँद गन्दा पानी निकाला, जिसमें हैजेके सैंकड़ों जर्म्स थे । उस पानीको गंगाजल में डालकर देखा कि वे समस्त जर्म्स मर गये । अर्थात् गंगाजलके एक - एक परमाणुने मलके हजारों परमाणुओं को खाकर तत्काल ही शुद्ध कर दिया । प्रयागके एक डाक्टर करोलीने लिखा था कि- मेरी खाँसी और दमाकी पुरानी व्याधि इसी गङ्गाजलके प्रतापसे नष्ट होगई । संसारकी और नदियों को छोड़कर केवल गङ्गा नदीका ही जल सभी रोगों में दवाके तौर पर देनेका उल्लेख आयुर्वेद में क्यों है? इसका उत्तर अविश्वासियोंको पहले ठीक - ठीक प्राप्त नहीं हो सका था । यह देखा गया था कि यदि तांवेके पात्रमें गङ्गा - जल बन्द करके रख दिया जाय; तो वर्षों पड़े रहनेपर भी इसमें कोई विकार नहीं आता; और नहीं सूखता; और किसी जलमें यह गुण नहीं दीख पड़ता । ऐसी गङ्गाजलकी विशेषता अविश्वासियों के अनुभव में भी आई थी; वे सोचते थे- ऐसा क्यों है? पहले वे सोचा करते थे कि सनातनधर्मियोंका गङ्गाजलके गीत गाना अन्ध-

पृष्ठ 518

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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) विश्वासियोंका ठगनामात्र है । पर क्रमशः उन्हें स्वयं तथा दूसरों से भी उसकी विशेषता प्रतीत होती गई; तव उनका उसपर उपहास करना तो वन्द हो गया । उन्होंने देखा कि कलकत्तासे इङ्गलैंड जानेवाले जहाज जो जल गङ्गाके एक मुहाने हुगली नदीका लेते हैं; वह लण्डन पहुँचने तक ज्यों का त्यों वना रहकर काम देता है; पर जो जहाज लण्डन से पानी लेकर चलते हैं; वह वम्बई पहुँचनेके समय तक ताज़ा नहीं रहता, पीने योग्य नहीं रहता, बदल देना पड़ता है । विज्ञानको अभी तक इसका कारण मालूम करने में सफलता नहीं मिली; पर इतना उन्हें अनुमान होगया कि - गङ्गा नदी पवित्र है-ऐसा जो प्राचीन हिन्दु मानते हैं; यह बात निर्मूल नहीं है । काशीके प्रत्येक यात्रीका यह अनुभव है कि — घाटपरका गंगाजल इतना गन्दा रहता है कि — उसे पवित्र मानना तो दूर, कोई स्वच्छता - पसन्द नई - रोशनीका जीव उसे छूना भी पसन्द नहीं · करेगा । सारे शहरके पनाले तो उसमें गिराये ही जाते हैं; अधजले - मुर्दे भी उसमें बहा दिये जाते हैं; फिर भी वहां कोई अनिष्ट होते नहीं दीख पड़ता; जब कि मद्रास कारपोरेशन में कुछ ही दिन पहले साफ किये हुए जलमें अस्वच्छ जल मिलाकर पीनेके लिए देने पर सारे नगरका स्वास्थ्य खराव हो गया था । वर्षके सभी दिनोंमें गंगा में नहानेपर शरीर में ताज़गी मालूम पड़ती है । पर अन्य नदियों में कुछ खास - खास समय पर, विशेषकर वर्षा -ऋतुका अन्त होनेपर ही यह ताजगी देखने आती है, आखिर

पृष्ठ 519

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श्रीगङ्गाजलकी विशेषताका विज्ञान 281 उसका कारण क्या है? इसका उत्तर यह है कि- किसी तरल पदार्थ में विजली पहुँचाने पर उसमें कुछ परिवर्तन होते हैं । विजलीकी ऊँचे बोल-टेजवाली स्पार्क जल में पहुँचनेपर जल सारा ही परिवर्तित हो जाता है । वैज्ञानिकों का कथन है कि - जल के अणुओं पर ओषजनका जो आवरण होता है, वह ध्वस्त हो जाता है, और फिर उनमें विद्युत्को ग्रहण करने की शक्ति नहीं रह जाती । अच्छा विद्युद्-वाहक होनेके कारण जलमें विद्युत्को शक्ति प्रति - सैंकेंड लाखों मील हुआ करती है । अणुओं में इसी गति के अनुसार परिवर्तन भी होता है । विद्युत् - स्पार्क पहुँचानेके बाद जलके स्वाद में भी परिवर्तन हो जाता है । विद्युत् - संचारके कारण जलमें रहनेवाले संक्रामक रोगोंके कीटाणु भी मर जाते हैं । अगर उस जलके वितरणस्थलपर ही उसका प्रयोग किया जाए; तो जलसे उत्पन्न होनेवाले बहुत से रोगों से नागरिकोंका पिंड छूट जाए । जलको शुद्ध करनेकेलिए किये जानेवाले बहुत से खर्चीले और कटसाध्य उपाय बच जाएं । विद्युत् - संचार किया हुआ जल जव शरीर के कोषोंके संपर्क में आता है; तो उन कोषोंकी शक्ति बहुत बढ़ जाती हैं जिससे स्वास्थ्य अत्युत्तम हो जाता है । ऐसे जलको खेतमें सींचने से पैदावार में पर्याप्त वृद्धि हो जाती है । किसी पौधे में कीड़े पड़ गये हों; तो उक्त जलके सींचने से वे तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं । यदि ऐसे जलको नियमतः सेवन किया जाए; तो रुधिर निर्मल हो

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४६२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) जाता है, और शरीर में नवजीवनका संचार हो जाता है । जल में ऊंचे बोल्टेज़वाली स्पार्क पहुँचानेपर उसमेंका विषैला तो प्रायः दूर हो ही जाता है । उसकी शुद्धता भी बढ़ जाती है, और वह कीटाणुनाशक हो जाता है । न्यूयार्कके डाक्टर हनोका तो लोशन की जगह ज़ख्म आदि पर इसका प्रयोग करते हैं । हैज़े के रोगी इस जलका प्रयोग करनेपर तत्क्षण स्वस्थ हो जाते हैं, क्योंकि — इससे हैज़ेके कीटाणु मर जाते हैं । इसके प्रयोगसे फैले हुए हैजेको शीघ्र ही रोका जा सकता है । गरीव देशकालमें इसका उपयोग करना चाहिए, इसमें कुछ भी खर्च नहीं पड़ता । विदेशी - दवाओंके पीछे जो बड़ी रकम खर्च हुआ करती है, उसमें इससे कमी हो जायगी । गङ्गाजल में भी यही बात लागू होती है । गङ्गाका उद्गम संसारके सबसे ऊंचे पहाड़ हिमालय में है, जहाँ सालभर बिजली बनी रहती है; अतः इस जलमें विजलीका संचार बराबर होता . रहता है । गङ्गा गङ्गोत्तरीसे निकलकर मन्दाकिनी, पद्मा, अलक-नन्दा यदि अपनी सहयोगिनी नदियोंको लेकर कई प्रकार की शिलाजीत आदि प्रोपधियों में बहती हुई, और उनके गुणों को लेती हुई केदारनाथ, देवप्रयाग, लक्ष्मणझूला, हृषीकेश आदिके बीचसे जाती हुई हरद्वार की समतल भूमिमें प्रवेश करती है । इस • स्थान तक इसमें बहुत गुण रहते हैं । जो हड्डियां डालने के कारण गङ्गा गुण मानते हैं; वे भ्रान्त हैं; उनका केवल घृणा दिलाने में विचार रहता है, इसके गुण जानकर ही इसकी स्वर्गदातृताका विचार