पञ्चम सुमन · प्रकरण 41
प्राणायाम वा समाधिका विज्ञान
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379वैज्ञानिकोंका कथन है कि - जो कि हम नींद प्राप्त करते हैं; उसका कारण यह है कि हमारी भीतरी वायु दूषित हो जाती है । उस समय हमारी जम्भाइयाँ शुरू हो जाती हैं, जिससे बाहरी शुद्ध वायु - आक्सिजन हमारे भीतर आवे, परन्तु रात्रि आदिके कारण तमोगुणकी बहुलतासे प्रचुर -परिमाण में शुद्ध वायु प्राप्त न होने से भीतरी वायु बहुत दूषित हो जाती है, जिससे हम मूच्छितसे हो जाते हैं, इसीकी परिभाषा ' निद्रा ' कही जाती है । यही मूर्च्छा वढ़कर महानिद्रा हो जाती है, जिसकी परिभाषा ' मृत्यु ' हुआ करती है ।
प्रातःकाल प्राप्त होनेपर सत्त्वगुणकी प्रवृद्धि होनेसे क्रमशः शुद्ध वायुके नासिका - द्वारा भीतर प्राप्त होनेपर वह मूर्च्छा क्रम - क्रमसे हट जाती हैं, जिसकी परिभाषा ' जागरण ' कहा जाता है । आक्सिजन गैसके टोप वैज्ञानिक लोग बना चुके हैं; इन्हें सिरपर, मुँह पर निरन्तर पहरनेसे युद्धों में विषाक्त गैसोंसे रक्षा होती है; क्योंकि उन टोपियोंमें आक्सिजन गैस भरी रहती है; जिससे भीतर शुद्ध वायुका प्रवेश रहनेसे उन विषाक्त गैसोंसे होनेवाली मूर्च्छा नहीं होती ।
अब वैज्ञानिकोंका विचार है कि इन आक्सिन टोपियों में हम और उन्नति करें । इनके निरन्तर पहिनने से हमारे अन्दर भी निरन्तर शुद्ध वायु रहेगी, जिससे हम न तन्द्राको प्राप्त करेंगे; न जम्भाइयाँ आवेंगी, न हमें मूर्च्छारूप नींद आवेगी । इसी प्रकार हमें महानिद्रा ( मृत्यु ) भी नहीं आवेगी । हम थकेंगे भी नहीं; हम 380अमर बन जायेंगे ।
परन्तु यन्त्रोंकी परतन्त्रता भी ठीक नहीं होती । एक तो उनमें परतन्त्रता है, और उन यन्त्रों में बहुत भारी मूल्य लगेगा; और वह रुपया विदेशों में जाएगा । और वे यन्त्र प्रचुर मात्रा में मिल भी न सकेंगे; जिससे सर्वसाधारण उन्हें खरीद सकें । इसी कारण हमारे प्राचीन महानुभावोंकी आधिभौतिक यन्त्रों में कभी भी आस्था नहीं रही । वे ' पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं ' ' पारतन्त्र्यं महद् दुःखं स्वातन्त्र्यं परमं सुखम् ' इत्यादि बातोंको विचार कर आध्यात्मिक तथा स्वतन्त्र - यन्त्र बनाते थे । उसमें कुछ खर्च भी नहीं होता था, नास्तिकता भी नहीं बढ़ती थी; पारस्परिक होड़ भी नहीं बढ़ती थी- जिससे महायुद्ध शुरू हो जाते हैं । वे स्वतन्त्र यन्त्र हैं- प्राणायाम एवं समाधि । पवित्र देश - काल में प्राणायाम एवं समाधि जोड़ने से और क्रम - क्रम से समाधिके कालकी वृद्धि करनेसे बाहरसे भीतर प्रचुर मात्रा में आक्सिजन गैस भरती रहती है; और भीतरकी खराब गैस बाहर निकलती रहती है । फिर साथ हो ब्रह्मचर्य और - योगका अवलम्बन, इससे पुरुषकी आयु बढ़ती है और अमरता भी प्राप्त हो जाती है । तभी तो श्रीमनुजीने कहा है- ' ऋषयो दीर्घ- सन्ध्यत्वाद् दीर्घमायुरवाप्नुयुः ' ( ४।६४ ) अर्थात् लम्बी सन्ध्या करने से जिसमें प्राणायाम आदि अङ्ग जाते हैं — ऋषियोंने बड़ी लम्बी आयु प्राप्त की ।
अब इस विषय में भी वैज्ञानिक सहमत होगये हैं । वे कहते हैं कि मनुष्य - शरीर के कार्य कुछ शताब्दियों तक रोककर वे फिर 381चलाये जा सकते हैं । इस प्रकार जब तक पुरुष समाधिकेलिए अपना उपराम करेगा, उस समयकी गणना उसकी शारीरिक आयु के साथ नहीं होगी । यदि कोई शतवर्षजीवी पुरुष व युवक है, पच्चीस वर्षकी आयु में उसने प्राणायाम वा समाधि शुरू की; पाँच वर्ष वा दस वर्षके बाद वह समाधि से उठा; तब उसके अङ्ग २५ वर्षकी अवस्थावाले ही रहेंगे । वे समाधिके दस वर्ष तो सूदकी तरह उसे स्वयं मिलेंगे । तब समाधिसे उठकर वह अवशिष्ट ७५ वर्ष जीवित रहेगा ।
इसका उदाहरण भी लीजिये - घड़ी बनानेवाले घड़ीकी
( गारण्टी ) पाँच वा दस साल आदिकी देते हैं । उसकी वह गारण्टी चलाने के समय से ही प्रारम्भ होगी । जितने समय तक वह घड़ी, घड़ीके कार्यालय में विना चले रहेगी, वे वर्ष उसकी आयु में नहीं गिने जाते । उस घड़ीको चलाकर उसे फिर तीन वर्ष तक स्थगित कर दिया जावे; तब फिर उसके चलानेपर अवशिष्ट दश वर्ष तक वह जीवन प्राप्त करेगी । परन्तु उस स्थानमें यदि उस घड़ीमें मैल घुसेगी; तभी उसकी अपेक्षित आयु होगी । यदि उसमें मैल प्रवेश कर जाए; तब उसकी आयु उतनी न हो सकेगी ।
इस प्रकार शरीरके कार्य त्याग करनेपर भी उसमें मलसंक्रम हो सकता है; जिससे उसकी आयुमें कमी पड़ सकती है । इसलिए शास्त्रकारोंने उसमें प्राणायाम वा समाधिरूप उपाय कहा है, जिससे शरीरकी शुद्धि होती रहे । इसी प्राणायाम एवं समाधि से योगी लोग अपनी आयु लम्बी कर लेते थे । इसके अतिरिक्त ब्रह्ममें अवस्थान 382होनेसे उसके सम्बन्धसे ब्रह्मकी शक्ति भी शरीरके अन्दर प्राप्त होती रहती है ।
प्राणायाम करनेपर शारीरिक भीतरी अवयवों में वायुके पर्याप्त भर जाने से वक्षःस्थल विशाल और कठोर हो जाता है । प्रो ० राममूर्ति अपनी छाती पर हाथी चढ़वा लिया करते थे । यह प्राणायामकी महिमा है 1 । मोटर वा वाई- साइकल के पहियों में वायुके भरनेसे उस पर बहुत पुरुष बैठ सकते हैं, और मोटर वा साइकल शीघ्र चल पड़ता है । इस प्रकार प्रारणायाम करनेपर छाती में अद्भुत शक्ति हो जाती है; तब उसपर हाथीका चढ़ाना भी कठिन नहीं रहता । प्राणायामसे आयुके बढ़नेका प्रकार कहा ही जा चुका है; क्योंकि - प्रत्येक पुरुषका श्वास - परिमाण नियत हुआ करता है । जब श्वासोंकी समाप्ति हो जाती है; तो मृत्यु हो जाती है । इस कारण योगी लोग न्यून श्वास लेते हैं, प्राणोंको रोकते हैं, और उनकी आयु उनकी इच्छानुकूल बढ़ती है ।
मैथुन और कुश्ती आदि में लोगोंके श्वास साधारणतः अधिक खर्च होते हैं; इसलिए बहुत सांस लेनेवाले थोड़ी आयु पाते हैं । व्यायाममें भी यद्यपि श्वासोंका बहुत खर्च होता है, तथापि वह व्यायाम हमारे शरीरको सम - विभक्तावयव कर देता है । इसलिए लाभदायक होनेसे उसे छोड़ना नहीं पड़ता । परन्तु व्यायाम भी अल्पमात्रामें करना चाहिये । उसमें श्वासोंको मुखसे न निकालकर - धीरे - धीरे नाक द्वारा निकालना चाहिये । ऐसा होनेपर उसमें भी प्राणायाम - सदृश लाभ हुआ करता है ।
In English
Sleep, Longevity, and the Power of Pranayama
This text explains sleep as a state caused by impure air and argues that spiritual practices like pranayama and samadhi can regulate oxygen intake to extend life. It compares the body to a clock that stops aging during meditation and suggests that controlled breathing builds physical strength.
This chapter answers
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