पञ्चम सुमन · प्रकरण 80

विजयदशमीका महत्त्व एवं विजयका रहस्य

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693( ८ ) विजयदशमीका महत्त्व एवं विजयका रहस्य ।

यह विजय दशमीका दिन है । इसीदिन भारतके हृदयके सम्राट् भगवान् - श्रीरामचन्द्रने राक्षसराज देशमुख - रावणको विजयार्थ यात्रा शुरू की थी, और विजय प्राप्त की थी । यही दिन भारत में अत्याचारी वैदेशिक - राजाका दमनकारी होनेसे भारतकेलिए महत्त्वपूर्ण है । यह दिन आर्योंका अनार्यो पर आक्रमणका कहा जाता है; अथवा पुण्यका पापपर आक्रमणका दिन है यह । यह भारतके महोत्सवका दिन है । यही दिन हमें स्मरण कराता है कि भारतीय एक भी स्त्रीको यदि कोई विदेशी राजा कुविचारके संकल्पसे ले जाता है; जब तक उसे ससम्मान तथा अखण्डित रूपसे वापिस नहीं लौटाया जाता; तब तक विश्राम नहीं करना चाहिये । वैसे अत्या- चारीको इस प्रकार मूलसे उखाड़ दो कि भविष्य में फिर किसी मी वैदेशिकको भारतीय महिलापर कुदृष्टि करने का संकल्प ही न हो ।

इसके अतिरिक्त जो वैदेशिक, ऋषि - मुनि वा तपस्वियों पर अत्याचार करता है, अथवा जो भारतीय - धनको इकट्ठा करके समुद्र- पार विदेशमें ले जाता है; वह भारतका अहितकारक है । उसे इस प्रकार दण्डसे ठीक करो कि आगे कोई विदेशी भारतके प्रति कुदृष्टि कर ही न सके- यह भारतीय क्षत्रियोंका कर्तव्य है - यह आजका दिन सिखला रहा है । वह यह भी समझाता है - ' न्याय- मार्ग में चलने पर पशु - पक्षी भी आपके सहायक होंगे । जैसे कि कहा गया है — ' यान्ति न्याय प्रवृत्तस्य तिर्यखोपि सहायताम् । अपन्थानं तुं गच्छन्तं सोदरोपि विमुञ्चति ' ।

694यह विजयाका दिन भी है; सब देवोंने मिलकर शक्तिदेवीको उत्पन्न किया था; जिसका दूसरा नाम विजया था; उसने भारतीय नारियोंके अपमानकर्ता महिषासुर, शुम्भ, निशुम्भ आदिका वध करके दिखला दिया कि - भारतमाता के अहितकारकोंकी यही दशा हुआ करती है । इन्हीं दिनों सरस्वती विसर्जन वा सरस्वती- अवकाश करके दिखलाया जाता है कि यह विजय - यात्राका समय है । इस समय में सभीको विद्या - पठन - पाठनको भी स्थगित करके शक्तिका सञ्चय करना चाहिये, और स्वदेश के विजयार्थ विचार करना चाहिये । दुर्दान्त, भारत - देशको ग्रस्त किये हुए, युद्धोन्मत्त, जातियोंके विषमय - दाँत तोड़ देने चाहियें; उनकी विषैली - पूछको काट लेना चाहिये ।

यह समय होता है वृष्टिकी समाप्तिका । ऐसा ही समय छः मासके बाद चैत्रमासके शुक्लपक्ष में आता है । वह हिमपातकी समाप्तिका सूचक होता है । उसमें रामका जन्म होता है, और इसमें रामकी विजययात्रा होती है । यह नवरात्र शक्तिकी उपासना के होते हैं । शक्तिको उपासना से ही युद्धमें दुर्मद महिषासुर आदिकी शक्तिका विनाश होता है । दैवी शक्ति आसुरी शक्तिको शान्त करती है । इस समय न तो हिमकी प्रतिबन्धकता होती है, न ही गर्मी वा वर्षाका प्रतिरोध ही होता है । तो शत्रु अनायास ही जीता जाता है ।

इसमें विजयनायक घह हो सकता है, जो माता ( भारत - माताकी प्रतीक ) पिता ( विष्णुदेवके प्रतीक ) का आज्ञापालक होवे, जिसका

695विजयदशमीका महत्त्वं एवं विजयका रहस्य

भाइयों ( भारतभूमिके नाते अपने बन्धुओं ) से सौहार्द हो, जहाँ पति - पत्नीकी पारस्परिक- सहानुभूति हो, पत्नीका पतिके बिरहमें भी पातिव्रत्य में अवधान हो, राजा प्रजाका परस्पर विश्वास हो । कहीं स्वजनों, बन्धु आदिमें ईर्ष्या वा छल अथवा भेदनीतिका लेश भी न हो । जो ज्ञान एवं कर्मका सामञ्जस्य विधाता हो; विजय - श्री उसीके गले में विजयमाला डालती है ।

यही विचारा था वा अनुकृत किया था, बल्कि आदर्शरूप से दिखलाया था— भगवान् रामचन्द्रने । उनमें पहली बातें तो विश्व- विश्रुत ही हैं । अन्तिम - विजयसोपान उन्होंने दिखलाया कर्म और ज्ञानके सामञ्जस्य करनेका । ' कातर्य केवला नीतिः, शौर्य श्वापद- चेष्टितम् । अतः सिद्धिं समेताभ्यामुभाभ्यामन्वियेष सः ' यहाँ नीतिको ज्ञान और शूरताको कर्म बताया गया है । केवल नीति ( पालिसी ) का अवलम्बन कायरता बताई गई है, केवल शूरताका अवलम्बन क्रूरता- पशुपन, खूँखार - जीवोंकी दहाड़ माना गया है । एकके आश्रयणसे असिद्धि और दोनों के आश्रयणसे सिद्धि कही गई है ।

' येषां दोर्बलमेव, दुर्बलतया ते सम्मतास्तैरपि,

प्रायः केवलनीतिरीतिशरणैः कार्यं किमुर्वीश्वरैः ।

ये क्ष्माशक्र! पुनः पराक्रमनय - स्वीकारकान्तक्रमाः

ते स्युर्नैव भवादृशास्त्रिजगति द्वित्राः पवित्राः परम् ॥ '

इस पद्यमें केवल भुज - बल वालेको भी दुर्बल माना गया है, केवल नीति करने वालोंको भी कुछ नहीं माना गया । पराक्रम और नीति दोनोंका जिन्होंने ठीक क्रम अवलम्बित किया है; " वे ही 696सफल माने गये हैं । इसमें श्रीराम स्वयं ज्ञानके सजीव - प्रतिनिधि थे; और लक्ष्मण - हनुमान् आदि कर्मके प्रतिनिधि थे । इनके सामञ्जस्यसे ही इस पक्षकी विजय हुई 1 | कर्म चाहिये अधिक; ज्ञान चाहिये थोड़ा । इसलिए उक्त - पद्य में कर्मस्थानीय पराक्रमको ' अभ्यर्हितं पूर्वम् ' इस नियम से पूर्व रखा गया है; और ज्ञानस्थानीय- नय ( नीति ) को पीछे । युद्धमें सेना कर्मस्थानीय होती है, और सेनापति ज्ञानस्थानीय | सेनापति थोड़े अपेक्षित होते हैं; और सेना अपेक्षित होती है वहुत । यदि अधिक सेनापति हों; उनके अनुपात से सेना थोड़ी हो; तब पराजय निश्चित हुआ करती है । इसी कारण शतवर्षके हमारे जीवनमें ७५ वर्ष तक कर्मकाण्ड आदिष्ट किया गया है, और २५ वर्ष ज्ञानकाण्ड | तभी अभ्युद्य- निःश्रेयस - लक्षण साफल्य मिलता है ।

: इस प्रकार श्रीराम एक ज्ञानस्थानीय थे, लक्ष्मण- हनूमान् आदि तथा वानर सेना यह कर्मस्थानीय थे । ऐसे सामञ्जस्य में ही विजय हुआ । जिस पक्षका विजय नहीं होता, उसमें कारण कर्म एवं ज्ञान दोनोंका असामञ्जस्य ही होता है । तब जो पुरुष, अथवा जो संघ, अथवा जो जाति, या जो देश, कर्म - ज्ञानरूप शूरता एवं नीति, सैनिक बल और प्रणिधि ( जासूस ) - बल, शस्त्र बल एवं प्रचार - बल ( प्रोपेगण्डा ), दोनोंका ठीक - ठीक सामञ्जस्य करेगा; वही पुरुष, वही संघ, वही जाति, वही देश, वही राजा, वही सम्प्रदाय विजयको प्राप्त होगा ।

विजयका महत्त्व सर्वजन - विदित ही है । तब विजयकी 697विचारणा तथा विजययात्राको दिनस्वरूप - विजयदशमीका महत्त्व भी स्वतः- सिद्ध है; क्योंकि वर्षा ऋतु विजययात्राकी प्रतिबन्धक हुआ करती है; उसकी समाप्ति होनेपर विजययान्त्रा अवसर प्राप्त ही होती है | पाकिस्तान - हिन्दुस्थान दोनोंकी प्रतिद्वन्द्विता स्वतः- सिद्ध है; अब सोचना पड़ेगा कि इन दोनोंमें किसके पक्षमें कर्म और ज्ञानका यथावत् सामञ्जस्य है? हमें हिन्दुस्थानकी विजय एष्टव्य है । इसमें उक्त दोनों बलोंमें यदि कुछ त्रुटि दीखती है; तो उसके शुभचिन्तकोंको चाहिये कि वह इसके नेताओं को सावधान करें । यह विशेष रूप से ध्यान देने योग्य बात है कि पाकिस्तान देश - विदेश में अपने पक्षको दूधका धुला और हिन्दुस्थानके पक्षको छलमल - युक्त सिद्ध किया करता है । इधर अवधान देना चाहिये । क्योंकि आजकल प्रचारका युग है । इसी प्रचारसे छली भी सरल और सरल भी छली सिद्ध किये जा सकते हैं । तब विजयेच्छुकों- को केवल सत्यका भी आश्रय मायावियोंके साथ नहीं करना चाहिये; क्योंकि कहा है-

' व्रजन्ति ते मूढधियः पराभवं भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः । प्रविश्य हि घ्नन्ति शठास्तथाविधान, असंवृताङ्गान् निशिता इवेषवः ' ( किरातार्जुनीय १।३० ) अर्थात् मायावीसे सरलताका व्यवहार किया जावे; तो पराजय प्राप्त होता है । यही बात नैषधचरितमें भी कही है कि- ' आर्जवं हि कुटिलेषु न नीतिः ' ( ५/१०३ ) अर्थात् कुटिलोंके साथ सरलताका आश्रयण नीति नहीं होती ।

तब इस प्रचारके युगमें हिन्दुस्थानके धौरेयोंको भी पश्चात्पद. 698न होना चाहिये, और कर्म एवं ज्ञानके सामञ्जस्यको यथावत् रखना चाहिये - इस प्रकारके रहस्योंको अपने आपमें रखती हुई इस विजयदशमीका महत्त्व स्पष्ट है । वह यही विजयदशमी प्रतिवर्ष आती हुई भारतको यह विजय - मन्त्र प्रतिवर्ष बोधित करती और स्मरण कराती रहती है । पुनः पुनः आवृत्ति ही तो स्मरण करानेका • साधन हुआ करती है । भारतके उन्नायकों तथा नायकोंको उचित है कि- वे विजय दशमीके इस सन्देश - विजयरहस्य को याद रखें और इस भारतदेशको विजयी बनावें । विजयदशमीके ही दिन भगवान् रामने रावणके प्रति विजययात्रा प्रारम्भ की थी और विजय प्राप्त किया था, विजयके बीज कर्म एवं ज्ञानका सामञ्जस्य यथावत् रखा ।

पूर्वही संकेत किया जा चुका है कि - कर्मकी अधिकता और ज्ञानकी अल्पता परन्तु उत्तमता अपेक्षित होती है, तभी विजय होता है, हमने जन्म से लेकर मरण तक सांसारिक युद्ध करके विजयको प्राप्त करना है, उसमें ऋषि - मुनियोंने भी हमारे लिए ७५ वर्षतक कर्मकाण्डका पट्टा यज्ञोपवीत हमें पहिरनेको कहा, उसके बाद २५ वर्ष तक ज्ञानकाण्डको आश्रयणीय बताया, इसीसे हम विजयरूप अमृतको प्राप्त करते हैं । जिसका संकेत वेदने ईशोपनिषद् में किया है - जिसे हम आगे गीता जयन्ती में बतावेंगे ।

In English

The Importance of Vijayadashami and the Secret of Victory

This chapter explains the spiritual and political significance of Vijayadashami, using the victory of Lord Rama over Ravana and Goddess Shakti over demons as examples. It argues that true success requires a balance between knowledge (policy) and action (bravery), rather than relying on one alone.

This chapter answers

  • What is the significance of vijayadashami?
  • Why did lord rama fight ravana?
  • How to balance knowledge and action for victory?
  • Importance of goddess shakti in defeating demons?

Also written: Vijayadashamika, Mahattva, Evan, Vijayaka, Rahasya, Vijayadashamika Mahattva Evan Vijayaka Rahasya, विजयदशमीका महत्त्व एवं विजयका रहस्य

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 693–698 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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