पञ्चम सुमन · प्रकरण 79
पितृश्राद्धपक्ष ( मृतक श्राद्ध - विज्ञान २-५ )
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667इसी वैज्ञानिक - रहस्यको लक्ष्य करके पिता आदिकी मृत्युमें प्रतिदिन निर्वापित किये पिण्डसे दस दिन तक दशगात्र किया जाता है; इससे मृतकके दश अङ्गों में अपेक्षित - अङ्ग वाली शक्ति हो जाती है; इसीका पारिभाषिक - नाम मृतकके अङ्गोंकी उत्पत्ति होना श्राद्ध - पद्धतियोंमें प्रसिद्ध है ।
इसलिए मृतक श्राद्ध अवैज्ञानिक न होकर वैज्ञानिक ही सिद्ध है ।
फिर अपने - अपने वर्णानुसार नियत ११-१२-१५ आदि दिनों तक
पितृक्रिया करके फिर सपिण्डन, एकोद्दिष्ट आदि शुद्ध -
क्रिया करके
मृतकको पूर्व - पितरोंसे सम्बद्ध करके, फिर श्राद्धमें ब्राह्मण भोजन
करके उस मृतक पितृको पुत्रके
। परन्तु जीवित - श्राद्धमें कोई द्वारा सहायता पहुँचाई जाती है
उपपत्ति न होनेसे वह निर्मूल ही
सिद्ध होता है ।
जो कि श्विन मास के कृष्णपक्षकी मृतककी तिथिमें सभी मृतक - पितरोंके श्राद्ध किये जाते हैं; उसमें विज्ञान यह है कि इन दिनोंमें चन्द्रमा अन्य मासोंकी अपेक्षा पृथिवीके निकटतर हो जाता है । इस कारण उसकी आकर्षण शक्तिका प्रभाव पृथिवी तथा उसमें अधिष्ठित प्राणियों पर विशेष रूप से पड़ता है । तब जितने सूक्ष्म शरीर चन्द्रलोकके ऊपरी भाग में स्थित पितृलोकमें जानेके लिए बहुत समय से भी चल रहे होते हैं; वा चल पड़े होते हैं, उनका उद्देश करके उनके सम्बन्धियोंसे निर्वापित - पिण्ड अपने अन्तर्गत सोमके अंशसे उन सूक्ष्म - शरीरोंको आप्यायित करके उनमें विशिष्ट अतिशय उत्पन्न करके उन्हें शीघ्र और अनायास ही, अर्थात् बिना अपनी सहायताके ही पितृलोकमें प्राप्त कर दिया 668करते हैं । तब वे पितर भी उनकी ऐसी सहायता पाकर उन्हें हृदयसे समृद्धि तथा वंशवृद्धिका आशीर्वाद देते हैं ।
जो सूक्ष्म शरीर पितृलोकमें प्राप्त हो जाते हैं; उसमें निर्वापित किये हुए पिण्डों वा ब्राह्मण भोजनके सूक्ष्मांश उनके पास प्राप्त होकर उनको आप्यायित करते हैं, जिनसे वे सूक्ष्म शरीर रूप पितर मस्त ( प्रसन्न ) हो जाते हैं, और पुत्रोंको आशीर्वाद देते हैं । जो कि प्रतिवर्ष क्षयाह के मास एवं तिथिमें श्राद्ध किया जाता है; उसमें कारण यह है कि — तिथि होती है चान्द्रमासके तथा चन्द्र- गतिके अनुसार; उसमें चन्द्रलोक में वे पितर उसी मार्ग वा स्थान में स्थित होते हैं; जब वे मरकर उसी तिथिमें उस मार्ग वा स्थानको प्राप्त हुए थे । तब वे सूक्ष्माग्निसे प्राप्त कराये हुए उस श्राद्धकें सूक्ष्मांशको अनायास प्राप्त कर लेते हैं । इसीलिए याज्ञवल्क्य - स्मृति में कहा है- ' मृतेऽहनि तु कर्तव्यं प्रतिमासं तु वत्सरम् । प्रतिसंवत्सरं चैवमाद्य एकादशेऽहनि ' ( आचाराध्याय - श्राद्धप्रकरण २५६ पद्य ) । ' वर्षे वर्षे मृततिथौ श्राद्धं कुर्यात् ' ( बोधायनीय- पितृ- मेधशेषसूत्रके ३ य खण्डमें ) ।
( ३ ) मृतक श्राद्ध - विज्ञान
[ इस निबन्धमें श्राद्धमें किये जानेवाले कर्त्त व्यकी विज्ञान- पूर्णता सिद्ध होगी । ]
श्राद्धके समय पृथिवी पर कुश रखे जाते हैं; और कुशों पर यव - अक्षत आदिके पिण्ड रखे जाते हैं । पिण्डों में जौ, तिल, दूध, मधु और तुलसीपत्र डाले जाते हैं । तब श्राद्धकर्ता वसु, रुद्र, और 669आदित्य इन तीन नित्य - पितरोंका, यम और परमेश्वरका ध्यान करता है, और आचार्य वेदमन्त्रोंका गम्भीर - खरसे उच्चारण करता है । इस पर यह जानना चाहिये कि - चावलों में ठण्डी विजली, और जवोंमें भी ठंडी - विजली होती है । तिलोंमें गर्म - बिजली, दूध में भी गर्म - विजली होती है । तुलसीपत्रमें दोनों प्रकारकी विद्युत् होती है । साधारण मनुष्य जब साधारण वचन बोलता है; तो उसके शरीर में न्यून - विद्युत् उत्पन्न होती है; पर जब कोई वेदवित् - कर्मकाण्डी तथा ज्ञानी - विद्वान् नियतपद - प्रयोगपरिपाटी वाले तथा नियत श्रानुपूर्वीवाले पितृगणोंसे सम्बद्ध वेदमन्त्रोंको पढ़ता है, तब नाभिचक्र से उठी हुई वायु पुरुषके शरीर में उष्ण - विद्युत्को उत्पन्न करके उसे शरीरसे बाहर करता है । इधर वेदके शब्दोंके द्वारा विद्वान् ब्राह्मणके शरीरसे अलौकिक वैदिकक्रिया - सिद्ध विद्युत् भी पिण्डों में प्रवेश करती है । '.
इस प्रकार बिजलियोंके समूह हो जानेपर मधुकी विद्युत् उनका मिश्रण करनेवाली बनती है । मधुकी विद्युत् चावल, जौ, दूध, तिल, तुलसीपत्र, तथा वेदमन्त्रोंकी विद्युतोंको मिला देती है । नीचे कुश इस कारण रखे जाते हैं कि - पिण्डोंसे उत्पन्न विद्य त् पृथिवीमें संक्कान्त न हो जावे । कुशाएं पिण्डोंकी विद्य तोंको पृथिवी में नहीं जाने देतीं । इसलिए भगवान् कृष्णने ध्यानके समय ध्यानकर्ता की विद्युत्की रक्षाकेलिए ' चैलाजिनकुशोत्तरम् ' ( ६।११ ) कुशाका आसन ऊपर रखवाया है । मधुने मिलाकर जो अलौकिक - विद्युत् पैदा की थी; वह श्राद्धकर्ताकी मानसिक - शक्ति 670द्वारा उधर ही जाती है, जिधर उसका मन जाता है । और मन नित्य- पितरों वा, अपने पितरों तथा यम एवं परमेश्वरके ध्यानसें लगा होता है । तब वह बिजली भी इनके पास चमकती है; तब यम वा नित्य - पितर सर्वज्ञ होनेसे श्राद्धकर्ताके पुत्रके किये हुए श्राद्धके – त्राह्मणकी वैश्वानर - अग्नि से सूक्ष्मीकृत अन्नको मृत- पितरोंके पास तदनुकूल करके भेज देते हैं, चाहे वे पितृलोकसें हों; वा अन्य लोक में, वा किसी अन्य योनिमें हों ।
( ४ ) मृतक - श्राद्ध - विज्ञान ।
[ इस निबन्धमें भी श्राद्धीय - पदार्थोंकी वैज्ञानिकता सिद्ध होगी, जिससे श्राद्ध - विषय अशङ्कनीय सिद्ध होगा । ]
सबसे पहले अखंड दीपक जलाना चाहिए; जो पितृ- मृत्युके दिन से लेकर दस दिन तक जलता रहना चाहिए । कुशास्तरण बिछाकर ' इदं पितृभ्यः प्रभरामि बर्हिः ' ( अथर्व ० १८ | ४ | ५१ ) ' एदं बर्हिरसदो मेध्योऽभूः ' ( १८ | ४ | ५२ ) ' येऽस्माकं ' पितरस्तेषां बर्हिरसि ' ( १८ | ४ | ६८ ) इन मन्त्रोंके आधार से उन कुशासनों पर तीन पिण्ड रखने चाहियें । तिल, चावल, कुश यह तीन वैद्य त पदार्थ होते हैं । इनकी सहायता के लिए अखण्ड दीपक रहता है । अन्नके उष्ण पिण्ड, अथवा दुग्धमय मेवेके पिण्ड देशकालानुसार क्रिया- द्वारा निर्वापित करके उन्हें जलमें डालते हैं, जिससे वाष्प ( भाप ) निकले । भाप ही विद्युत - शक्ति से सूक्ष्म होकर सूर्य किरणके द्वारा चन्द्रमंडलके ऊपरके भागमें पितृलोकमें ठहरे हुए पितरोंको तृप्त करती है । यह विशेष -विधि है । दूसरी विधि है हवन; तीसरी 671विधि है ब्राह्मण भोजन । हवनमें अग्नि उस कव्यको सूक्ष्म करके स्वयं भी सूक्ष्म होकर महाऽग्निके साथ मिलकर सूर्यलोकमें पहुँचा देती है, और सूर्य अपनी सुषुम्णा - किरणके द्वारा उसे पितृ ( चन्द्र ) - लोकमें इष्ट - पितृके पास पहुंचा देता है । ब्राह्मण भोजनमें ब्राह्मणकी ` वैश्वानराग्नि उस कव्यको सूक्ष्म कर महाग्निके साथ मिल जाती है । उसका मित्र वायु उसे आकाशाभिमुख ले जाता है । वह अग्नि उस अन्नको पूर्वकी भांति पितृलोकमें पहुँचाती है । इस प्रकार तीन प्रकारोंके द्वारा पितृगण स्वधाको प्राप्त कर लेते हैं ।
( ५ ) मृतक - श्राद्ध - विज्ञान ।
[ इस निबन्धमें श्राद्धका शास्त्रीय तथा रहस्यपूर्ण विज्ञान दिया जायगा, पाठक इसका सावधानता से मनन करें, तो उन्हें श्राद्धकी यौक्तिकता तथा सोपपत्तिकता प्रतीत होगी । ]
छान्दोग्य उपनिषद् में पञ्चमाध्यायमें पञ्चाग्नि - विद्या नामक एक प्रकरण आया है उसमें लिखा है- ' इति तु पञ्चम्यामाहुतौ आपः पुरुषवचसो भवन्ति ' अर्थात् पांचवीं आहुतिमें जल पुरुषके शरीरको धारण करते हैं । इससे पूर्व उसमें पचाग्नियोंका विस्तृत वर्णन है । यह भी वहां बताया गया है कि — यथाक्रम प्रत्येक अग्निमें व्याप्त होकर अन्तमें जल कैसे पुरुषत्वको प्राप्त करता है?
इन पञ्चाग्नियों वा आहुतियोंका परिचय इस प्रकार है- सबसे पहली अग्नि द्युलोक है, सूर्य उसकी समिधा ( अग्नि दीप्त करनेका साधन ) है । इस अग्निमें देवतागण श्रद्धाकी आहुति देते हैं । इससे सोम उत्पन्न होता है । ब्रह्मसूत्र ( ३ । १ । ५ ) के भाष्य में 672स्वामी शंकराचार्यने लिखा है- ' श्रद्धाशब्दश्च अप्सु उपपद्यते, वैदिक - प्रयोगदर्शनात् — ‘ श्रद्धा वा श्रपः ' इति । इससे श्रद्धाका अर्थ जलांश |
जो गृहस्थी यज्ञादि नित्य - नैमित्तिक कर्म के अनुष्ठान में लगे होते. हैं, उनके अग्निहोत्र आदि कमोंमें घी, दूध, दही यादि द्रव्यों में जो जलांश होता है, वह आहुति देनेपर पूर्व नामक संस्कार बनकर जीवके साथ स्वर्गादि - लोकमें जाता है; इस प्रकार पुत्रादि द्वारा पितरोंके उद्देश्यसे दिये जाते हुए खीर - पूड़ी आदिका जलांश भी वेदमें ' श्रद्धा ' नामसे कहा जाता है; शरीर त्याग हो जाने पर परलोकमें जाता हुआ जीव सूक्ष्म शरीरकी भांति इन सूक्ष्म जलीय- अंशोंसे भी परिवेष्टित होता है । वही सूक्ष्म जलीय - अंश उस मृतक जीवकी तृप्तिका साधन होता है । देवता लोग जिस श्रद्धाकी आहुति देते हैं, बस यही अपने से किये हुए यज्ञादि, तथा पुत्रादिसे किये हुए श्राद्धादिमें उपयुक्त किये जाते हुए घी, दूध, दही आदि द्रव्योंका जलीय अंश ही होता है । इसीकी अग्नि में आहुति देने पर वह सूक्ष्म रूपसे सूर्यकिरणोंके द्वारा अन्तरिक्षको प्राप्त होकर हमारे लिए वर्षा आदिका कारण बनता है; और पुत्र द्वारा पितृके उद्देश्य से ब्राह्मणरूप वैश्वानर - अग्नि में आहुत होकर वही सूक्ष्म जलांश सूक्ष्म शरीरवाले पितरोंकी तृप्ति तथा मुक्तिमें सहायक बनता है । उसी स्निग्ध वस्तुओं के जलांशको वेदमें ' श्रद्धा ' शब्द से कहा जाता है - जैसे हम पूर्व कह चुके हैं ।
पूर्वोक्त ब्रह्मसूत्रके प्रकरण ( ३।१।२-३-४ ) में छान्दोग्य उपनिषद् 673के अनुसार जीवको दो गतियां बताई गई हैं - एक उत्तरगति; दूसरी दक्षिण- गति । जो नैष्ठिक ब्रह्मचारी आदि बनमें श्रद्धासे तपस्या किया करते हैं; वे उत्तरगतिको प्राप्त होते हैं । वे सूर्य- किरणोंके द्वारा सूर्यलोकमें प्राप्त होकर वहांसे ब्रह्मलोकमें जाते हैं, फिर वे इस लोक में नहीं आते, अर्थात् उनका पुनर्जन्म नहीं होता इसी उत्तरगतिको भगवद्गीता में ' शुक्लगति ' कहा है, जैसे कि- ' अग्निर्ज्योतिरहः शुक्तः, षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ' ( ८।२४ ) ।
जो नैष्ठिक ब्रह्मचारी न रहकर विवाह करके यज्ञादियोंको किया करते हैं; वे यज्ञके धूमाभिमानी- देवताके द्वारा पितृलोकमें प्राप्त होकर वहांसे चन्द्रलोक में जाते हैं । वहां अपने शुभ कर्मोका फल प्राप्त करके वहांसे नीचे इस लोक में आते हैं, अर्थात् उनका पुनर्जन्म होता है । यही दक्षिण- गति है । इसीको भगवद्गीता में ' कृष्णगति ' कहा है । जैसे कि - ' धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् । तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी ( कर्मयोगी ) प्राप्य निवर्तते ( २५ ) ।
देवता तथा पितरोंको सूक्ष्म होने से स्थूल - भोजनकी आवश्यकता नहीं होती; किन्तु सूक्ष्म - भोजनकी आवश्यकता होती है । इसलिए वे यज्ञ तथा श्राद्धादिकी हविको देखकर ही तृप्त हो जाते हैं, जैसे कि कहा है — ' न वै देवाः अश्नन्ति न पिबन्ति, एतदेव अमृतं दृष्ट्वा तृप्यन्ति ' ( छान्दोग्य ३।६।१ ) । तात्पर्य यह है कि वे उस स्थूल - हविसे सूक्ष्म अंशको आकृष्ट कर लिया करते हैं । पितर भी देवविशेष 674हैं । जैसे कि सांख्यकारिकामें लिखा है- ' अष्ट विकल्पो दैवः ' ( ५३ ) । इन आठ विकल्पवाली देवसृष्टिमें पितृसर्ग भी अन्तर्भूत
है ।
उनके सूक्ष्म होनेसे उनको तृप्त करनेवाला भी सूक्ष्मांश ही हुआ करता है | जैसे हमारा सूक्ष्म - आत्मा हमसे खाये हुए स्थूल भोजनके हमारे उदराग्नि द्वारा किये हुए सूक्ष्म अंशको आकृष्ट करके उससे तृप्त होता है ।
यह हम उत्तरगति तथा दक्षिणगतिका निरूपण कर चुके! इनमें दक्षिणगति जानेवाले पहले वसु, रुद्र, आदित्य इन तीन नित्य- पितरोंकी श्रेणीको समाप्त किया करते हैं, फिर मरुत् और साध्य इन दो श्रेणियोंके पार करनेके बाद ब्रह्मरूप हो जाते हैं । उत्तरगति से जाने वालोंकी भांति यह प्रवृत्ति - ( पुनर्जन्म - ) रहित नहीं होते; बीच - बीचमें इनकी आवृत्ति - पुनर्जन्म भी हुआ करता है । कभी द्युलोकमें, कभी अन्तरिक्ष- लोकमें, कभी पृथिवी - लोकमें । इसलिए वेदमें इन पितरोंकेलिए स्वधा ( श्राद्ध ) देनेका विधान आया है; जैसे- ' स्वधा ( मृतकश्राद्धं ) पितृभ्यः पृथिविषद्द्भ्यः, स्वधा पितृभ्यो अन्तरिक्षसद्भ्यः, स्वधा पितृभ्यो दिविषद्भयः ' ( अथर्व ० १८४७८- ७ ९ -८० ) । सो वसु, रुद्र, आदित्य इन तीन श्रेणियों वाले पितरोंको पुत्रादिसे किये हुए श्राद्ध ( पितृयज्ञ ) की अपेक्षा हुआ करती है । इसलिए श्राद्धके समय के संकल्प में ' वसुरूपाय पित्रे, रुद्ररूपाय पितामहाय, आदित्यरूपाय प्रपितामहाय स्वधा ' ऐसा कहा जाता है । इसी प्रकार मातारह आदि तीन पुरुषोंके लिए भी कहा जाता है । 675स्त्रियोंकेलिए गायत्रीस्वरूपिण्यै मात्रे, सावित्रीस्वरूपिण्यै पितामह्यं, सरस्वतीस्वरूपिण्यै प्रपितामह्यै स्वधा नमः ' यह तीन पद आते हैं । पर जब यही पितर उक्त पाँच श्रेणियोंको उत्तीर्ण कर लिया करते हैं; तब पुत्र द्वारा किये हुए श्राद्धकी आवश्यकता नहीं रहती । इसलिए श्राद्ध भी तीन पीढ़ी तक होता है; उसके बलसे उन्हें तीन श्रेणियोंको पार करने में सहायता मिल जाती है, आगे उन्हें सहायताकी आवश्यकता नहीं रह जाती ।
वैदिक - साहित्यमें मनुष्य - शरीरको पाट्कौशिक - छः कोष वाला माना गया है । पिता, पितामह, प्रपितामह यह तीन पितृपक्षीय, और माता, पितामही, प्रपितामही - यह तीन मातृपक्षीय इन छहों कोषोंका ऋण मनुष्यके शरीर में विद्यमान होता है । इस कारण मनुष्यको श्राद्ध एवं पिण्डदानादि भी इन्हीं छःकेलिए अपेक्षित होता है ।
इस प्रकरण से पाठकोंने यह स्पष्ट समझ लिया होगा कि
उत्तरगति तथा दक्षिणगतिसे परलोकमें जाता है । उनमें नैष्ठिक ब्रह्मचारी तथा परमहंस - संन्यासी तो उत्तरगतिको प्राप्त होते हैं, उनकी मुक्ति हो जाती है, उनकेलिए तो श्राद्धादि करने की आवश्यकता नहीं रहती । परन्तु गृहस्थी लोग दक्षिणगतिको प्राप्त करके पितरोंकी तीन श्रेणियों ( वसु, रुद्र, आदित्य ) को प्राप्त करते हैं । मृतकश्राद्ध- की आवश्यकता इन्हीं केलिए होती है । इनका आत्मा श्रद्धा नामक सूक्ष्म जलीयांशोंके साथ ( जिसका निरूपण हम पूर्व कर चुके हैं ) पितृलोक में प्राप्त होता है । स्निग्ध पदार्थोंके इसी जलीय - अंशको 676वैदिक - साहित्यमें ' श्रद्धा ' शब्द से कहा जाता है - जैसा कि हम पूर्व लिख चुके हैं । इसी ‘ श्रद्धा ' शब्दसे अण् प्रत्यय करने पर ' श्राद्ध ' शब्द बनता है; उसका परलोक - गतों से सम्बन्ध है; इसलिए ' पितरः शुन्धध्वम् ' कहकर स्वा ० दयानन्दादि भी जो कि पृथिवीपर जल डलवाते हैं, और ' पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः ' कहकर जो दक्षिण - दिशाकी ओर पितरोंके नामसे अन्नभाग रखवाते हैं - यह सब परलोकगतों के लिए ही है; अतः श्राद्ध भी मृतकोंका ही सिद्ध है, जीवितों से इनका कुछ भी सम्बन्ध नहीं । पर वेदादि - शास्त्रों के पूर्णतया ज्ञान न होनेसे आज के सम्प्रदाय जीवित- श्राद्धका हल्ला मचाया करते हैं । इतना नहीं सोचते कि हमारी एक जलकी बूंद पृथिवीपर डालनेपर तथा अन्नका एक मास रखनेपर जीवित पितर क्या तृप्त होंगे? अथवा यदि ने वेदादिको कुछ जानते भी हैं; तो अपने एकदेशी- पक्षका दुराग्रह होने से वेद - मन्त्रोंका अर्दन- विमर्दन करके उन्हें जीवित पितृपरक लगाते हैं । मृतकों में श्राद्धकी असंगति दिखाकर साधारण- बुद्धिवालोंको अपनी ओर खींच लिया करते हैं । वह समझते हैं कि हमारा पिता आदि मरा; तो. नेस्तनाबूद हुआ; अर्थात् फिर उसकी सत्ता न रही । कोई परलोक आदि नहीं, जिसमें मृतककी फिर सत्ता रहे । पर वस्तुतः यह नास्तिकता याद है; सूक्ष्मदृष्टि वाले ही इन बातोंको समझ सकते हैं; स्थूलष्ट नहीं TM
पञ्चाग्निविद्या के पहले कहे प्रकरण में हमने छान्दोग्य उपनिषत की कण्डिकाको लिखा था- ' तस्मिन्नेतस्मिन् नौ देवाः श्रद्धां 677जुह्वति ' सो यहाँ ' श्रद्धा ' शब्दसे जलका तात्पर्य है । नैष्ठिक ब्रह्मचारी एवं परमहंस - संन्यासी तो सर्वेथा मुक्त - स्वतन्त्र हो जाते हैं; उनको पुत्रादिके बन्धन वा सहायता की आवश्यकता नहीं रहती । पर जिन्होंने नैष्ठिक ब्रह्मचर्यको नहीं लिया, वा परमहंस -संन्यासको अपनी असमर्थता आदिवश स्वीकृत नहीं किया; वे स्वयं मुक्ति नहीं पा सकते; तव अपने नैष्ठिक- त्रह्मचर्यके भङ्ग करने से उत्पन्न हुआ हुआ पुत्र ही उनकी मृत्यु हो जाने पर उनकी मुक्त्यर्थ श्राद्धमें दिये हुए पायसादि द्रव्यों के जलीय अंशसे उन पितरोंको उक्त तीन श्रेणियों में उत्तीर्ण करने में सहायता दिया करता है - यही मृतक - श्राद्धका विज्ञान है, जिसे न जानकर प्रतिपक्षि - गरण उसका विरोध करते हैं । वह समझते हैं कि एक दिनके श्राद्ध से ब्राह्मण हमारी सम्पूर्ण सम्पत्तिको हड़प कर लेते हैं; और वे कहते हैं कि उनको श्राद्ध मत खिलाओ; क्या उनका पेट लैटरबक्स है, जो कि उनका खाया पितरोंको पहुँचता है - इत्यादि; यह सब वेदादि - शास्त्रों के अज्ञानका फल है । अस्तु ।
अब उसी छान्दोग्योपनिषत् - प्रोक्क पञ्चाग्नि - विद्यापर आइये । पुत्रादि से दिये हुए श्राद्धीय - पदार्थोंके सूक्ष्म- जलांशसे राजा सोम बनाया जाता है । इसका तात्पर्य यह है कि सूर्यकिरणोंसे आकृष्ट श्राद्धीय - पदार्थोंके जलांशसे चन्द्रमाकी किरणें जलप्रधान हो जाती हैं । यह है प्रथम अग्निकी बात । फिर छान्दोग्योपनिषद् ( ५५ ) के अनुसार दूसरी अग्नि पर्जन्याभिमानिनी - देवता होती है । इस अग्निमें देवता पहले उत्पन्न हो चुके हुए सोसकी आहुति देते हैं । इससे वृष्टि होती है । तीसरी अग्नि है पृथिवी । उसमें पहले हुई दृष्टिकी 678आहुति दी जाती है, इससे अन्न उत्पन्न होता है । चतुर्थ अग्नि है पुरुष, उसमें पूर्व उत्पन्न हुए अन्नकी आहुति दी जाती है; उससे वोर्य उत्पन्न होता है । पञ्चम अग्नि होती है स्त्री; उसमें पूर्व उत्पन्न हो चुके हुए वीर्य की आहुति दी जाती है । उससे पुरुष उत्पन्न होता है । इस प्रकार सूर्य किरणों से श्रकृष्ट, और देवगण - द्वारा हुत जलके यथाक्रम - परिवर्तनमें पांचवीं आहुतिसे पुरुष उत्पन्न होता है । यही छान्दोग्यमें कहा है- ' इति तु पंचम्यामाहुतौ श्रापः पुरुष- वचसो भवन्ति ' ( ५ | ६ | १ ) ।
इससे स्पष्ट है कि — जलीय अंशसे सूक्ष्म - आत्मा उस - उस स्थानमें प्राप्त हो जाता है । पूर्व - अग्निमें आहुति देने से जो वस्तु उत्पन्न होती है; वही अगली अग्निमें हुत की जाती है । इस प्रकार पंचम आहुतिका परिणाम पुरुष होता है । अर्थात् पहले द्युलोकाग्नि ( सूर्य ) में श्रद्धा- जलकी आहुति से सोमकी उत्पत्ति हुई, उसकी आहुति पर्जन्याग्नि ( विद्युत ) में देनेसे वृष्टि हुई । वृष्टिकी पृथिव्यग्निमें आहुति होनेसे अन्न उत्पन्न हुआ । अन्नकी आहुतिके पुरुषाग्नि ( उदर ) में हुत होनेसे वीर्य उत्पन्न हुआ । वीर्यकी स्त्री- अग्नि ( गर्भाशय ) में आहुतिसे पुत्रोत्पत्ति हुई । यही जीवकी जन्मान्तरकी कथा है ।
ब्रह्मसूत्रके पूर्व कहे हुए इस वर्णन से स्पष्ट है कि- एक शरीरको छोड़कर परलोकमें जाते हुए जीवके सूक्ष्म - शरीरके साथ वही श्रद्धारूप- जल सूक्ष्मता से जाता है । श्राद्ध में दिये हुए जल, पिण्ड, खीर, घी आदिका श्रद्धारूप - जल परलोकमें गये हुए वा जा रहे हुए 679जीवका उपकार करता है, उसके सूक्ष्म शरीरको आप्यायित करता है, जिससे उसकी सद्गति होती है । इसीके साथ वह मृतकका सूक्ष्म - शरीर सूर्य किरणोंके साथ द्युलोकमें जाता है । फिर उस द्युलोकसे चन्द्रलोकमें, फिर चन्द्रलोकसे अन्तरिक्ष - लोकमें मेघोंमें, फिर मेघोंसे पृथिवीलोक में अन्नमें; फिर अन्नसे वीर्य में; फिर वीर्यसे वह सूक्ष्मशरीर सहित जीव गर्भ में आता है । दक्षिण- गतिवाले गृहस्थोंका यही गतिक्रम होता है । अन्नमें प्राप्त होनेके बाद वह जीव अपने पूर्व कर्मोंके अनुसार स्थावर, जङ्गम आदि उत्तम, मध्यम, अधम योनियों में जाता है ।
यह पूर्व कहा जा चुका है कि- श्राद्ध या पिण्डदान आदिकी अपेक्षा इन्हीं दक्षिणगतिवाले जीवों को होती है । श्राद्धादू
नाम पितृयज्ञ होता है । देवताओंके लिए देय - वस्तुका नाम हव्य, और पितरोंके लिए देय - वस्तुका नाम ' कव्य ' होता है । देवयज्ञके कार्य प्रातः- कालसे मध्याह्न तक पूर्व वा उत्तरकी ओर मुख करके किये जाते हैं; पर पितृयज्ञके कर्म मध्याह्नके बाद अपराह्न में दक्षिणकी ओर मुख- करके किये जाते हैं । देवकृत्यमें यज्ञोपवीतको बाएं कन्वेपर रखना पड़ता है, और पितृयज्ञ - श्राद्धादिमें उपवीतको दक्षिण कन्घेपर रखा जाता है । प्रातःकालसे मध्याह्न तक सूर्य पूर्वोत्तर दिशामें रहता है, और उसकी किरणें दक्षिण एवं पश्चिमकी ओर नत होती हैं; और पूर्वोत्तराभिमुख उन्नत । मध्याह्नके बाद यह क्रम बदल जाता है । तब सूर्य दक्षिण दिशा में प्राप्त होता है, और उसकी किरणें उत्तराभिमुख नत होती हैं, और दक्षिणाभिमुख 680उन्नत ।
पृथिवी से सूर्य किरणोंसे आकृष्ट हुआ द्रवद्रव्य – ( रस, श्रद्धारूप जल ) उसी दिशा में जाता है । यही कारण है कि- जो हमारे पूर्वज उत्तरगति से देवत्वको प्राप्त हुए; उनके यज्ञ पूर्वाह्न में करने पड़ते हैं, जब सूर्यकी किरणें भी उत्तराभिमुख उन्नत हों; अर्थात् उनकी आकर्षण - शक्ति से खिंची हुई वस्तु उत्तर - पूर्व दिशाकी ओर जा सके; तव जनेऊ को भी उत्तर ( बाएं ) कन्धेमें रखा जाता है । इसप्रकार पितृलोक - जिसकी स्थिति दक्षिण दिशा की ओर है— उससे सम्बद्ध श्राद्धादि कर्म भी मध्याह्न के बाद होते हैं; जब सूर्यकी किरणें दक्षिणाभिमुख उन्नत हों । पितृलोककी स्थिति दक्षिण में होने से पहले कही हुई दक्षिण- गति से परलोक जानेवाले इधरसे ही जाते हैं; इसीलिए श्राद्ध आदि भी तभी होते हैं; जब पृथिवीसे सूक्ष्म श्रद्धाजलकी आकर्षक सूर्य किरणें भी दक्षिणाभिमुख. उन्नत हों । तब यज्ञोपवीतको भी दाहिने कन्धेपर एवं दक्षिणाभिमुख उन्नत किया जाता है । शारीरिक एवं मानसिक शक्तियोंको दक्षिणाभिमुख उन्मुख करनेकेलिए, उन्हें सूर्य- किरणोंके साथः एक - दिशामें प्रेरित करनेकेलिए वैदिकविधि अनुसार विगुण कर्म द्वारा पितृयज्ञके विशुद्ध अपूर्व संस्कारको उत्पन्न करनेकेलिए, और उसे दक्षिण - दिशामें स्थित पितृलोकके पितरों तक अविकल रूपसे पहुँचानेकेलिए पितृकर्मके समय यज्ञोपवीतका दाहिने कन्धेपर करना आवश्यक है ।
जैसे ' बेतारका तार ' भेजने के समय एक स्थानमें ठहरी 681हुई विद्युदु - धाराको स्थानान्तर पर ठीक पहुँचानेकेलिए बिजली के खम्भोंका एक - दूसरेकी सीधपर रखना आवश्यक होता है, वैसे ही देवलोक एवं पितृलोकके कार्यों में भी सूर्य किरणोंके साथ ही शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों का एक सीध में होना आवश्यक है । जैसे ' वेतारका तार ' भेजने में प्रत्यक्ष रूपसे ' बिजली नहीं दीखती, न कोई विकार ही मालूम होता है; तथापि उसका प्रभाव उस स्थान में ही होता है, जहांके खम्भे से उसका एकमुखीभाव है; इस प्रकार विशुद्ध स्वर वर्ण द्वारा उच्चारण किये. हुए वैदिक मन्त्रोंसे उत्पन्न हुई शक्ति हव्य ( देवनिमित्तक - पदार्थ ) कव्य ( मृतपितृनिमित्तक - पदार्थ ) के सूक्ष्म जलीय - अंशोंको सूर्य- किरण - द्वारा, अप्रत्यक्षता में भी इष्ट देवताओं तथा पितरोंके पास पहुँचा दिया करती है । जनेऊ का दक्षिण वा उत्तर - दिशाके कन्धे पर उन्नत करना उस कर्मका सहायक अङ्ग होता है ।
पितृकार्य अमावास्या आदि नियत समयपर किया जाता है; इस कारण यज्ञोपवीतको दक्षिण – दाहिने कन्धे पर भी तभी करना पड़ता है । परन्तु दैवी - सम्पत्तिका समय हमें सदा ही ' अपेक्षित होता है; अतः उत्तर - वाम कन्धे पर यज्ञोपवीत भी हमें सदा ही रखना पड़ता है - यही श्राद्ध आदिमें यज्ञोपवीत आदि परिवर्तनका रहस्य हुआ करता है ।
( ६ ) मृतक श्राद्ध - विज्ञान
[ रात निबन्ध वेदादि - शास्त्रोंके ज्ञाता तथा विज्ञानका ज्ञान रखनेवालोंके लिए उपयोगी था; अब हम ' आलोक ' - पाठकोंके समक्ष 682इस विषयमें एक आर्यसमाजी विद्वान्का विचार रखते हैं । यह श्रीरघुनन्दनशर्माकी अपनी वनाई हुई विशालकाय ' वैदिक - सम्पत्ति ' के ३७१-३७२ पृष्ठसे उद्धृत किया जाता है । इससे श्राद्ध पर शङ्कित - दृष्टि डालनेवाले आर्यसमाजियोंको मृतक श्राद्धकी सोप- पत्तिकता वा समूलता प्रतीत हो जावेगी । यह विवेचना सुगम होगी ]
मनुष्य पुत्र उत्पन्न करके ही पितृ ऋण से उऋण होता है, इसलिए पुत्रकाम मनुष्य पितृपिण्डयज्ञके द्वारा अपने पितरोंको हविष्यान्न में आकर्षित करके वह हविं स्त्रीको खानेकेलिए देवे । किन्तु प्रश्न यह है कि चान्द्रलोकोंसे जीवोंको किस प्रकार खींचा जावे? जीवोंके खींचनेका यही तरीका है - जो सूर्यकान्तमणिके द्वारा सूर्यतापके खींचनेमें और चन्द्रकान्तमणिके द्वारा चान्द्रजलके खींचनेमें प्रयुक्त किया जाता है ।
जिस प्रकार चन्द्रकान्तके प्रयोगसे चान्द्रजलकी प्राप्ति होती है, उसी प्रकार चान्द्र- पदार्थोंको एकत्रित करनेसे चान्द्रवीर्य भी आकर्षित होता है । चान्द्रवीर्य में ही जीव रहते हैं, इसलिए उन पदार्थों में खिंच आते हैं, जो चन्द्राकर्षणकेलिये विधिसे एकत्रित किये जाते हैं । वे पदार्थ दूध, घृत, चावल, मधु, तिल, रजतपात्र, कुश और जल हैं । यह प्रक्रिया शरत्पूर्णिमाके दिन लोग करते हैं; परन्तु विधिपूर्वक क्रिया तो पितृश्राद्ध के ही समय होती है । पितृश्राद्ध अपराह्न के समय होता है । उसमें घृत, दूध, मधु, कुश आदि सभी पदार्थ रखे जाते हैं । पितरोंका प्रतिनिधि पुत्र अथवा पौत्र भी उन 683पदार्थोंको छूता हुआ वहीं पर बैठता है । इसलिए यह सब हवि आदि सामग्री उसी प्रकारका यन्त्र बन जाती है, जिस प्रकार चन्द्रमरिण । इसी में पितर खिंचकर आते हैं । ' परायात पितरः सोम्यासः ' ( अथर्व ० १८ | ४ | ६३ ) और हविः पिण्ड सूघने अथवा खाने से वीर्य और गर्भ में आते हैं ।
शतपथ - ब्राह्मण ( १४ | ४ | २/२६ ) में लिखा है - जो प्रजाकी है - आधत्त
इच्छा रखता हो, वह पितृयज्ञ करे । यजुर्वेद ( २।२३ ) में लिखा
' पितरो गर्भं कुमारं पुष्करस्रजम् ' इस पुरुषकी तरहके आकाशस्थ कुमार - पितर गर्भ धारण करते हैं । गृह्यसूत्रमें इसी मन्त्रकेलिए लिखा है - इस ' आधत्त ' मन्त्रको कहकर बीचके पिण्डको पत्नी खा लेवे । यही बात मनुस्मृतिमें भी लिखी है- ' पतिव्रता धर्मपत्नी पितृपूजनतत्परा । मध्यमं तु ततः पिण्डमद्यात् सम्यक् सुतार्थिनी । आयुष्मन्तं सुतं सूते यशोमेधासमन्वितम् । धनवन्तं प्रजावन्तं सात्त्विकं धार्मिकं तथा ' ( ३।२६२-२६३ ) अर्थात् पितृपूजनमें रत, पुत्रकी इच्छा रखनेवाली, पतिव्रता स्त्री बीचका पिण्ड खावे - – इस प्रकार पुत्रेष्टियज्ञकी क्रिया पितृपिण्ड - श्राद्धके अन्दर घुसी हुई पाई जाती है । '
[ यह सब मृतक श्राद्ध में ही घटता है, नहीं तो ( यजु ० २।२३ ) मन्त्रसे पुत्र क्या जीवित - पिता से प्रार्थना करेगा कि मेरा पुत्र उत्पन्न करो; तब क्या जीवित पिता ही पुत्रकी खीमें गर्भ धारण करेगा? तब क्या वह नहीं कहेगा कि तुम यदि नपुंसक थे तो विवाह ही क्यों किया था? पर मृतपितृश्राद्धमें तो ऐसी कोई अनुपपत्ति नहीं
684श्री सनातनधर्मालोक ( ५ )
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होती 1 । जो कि हमारी पत्नीको प्रजा होती है, उसमें पितरों चौर देवोंकी सहायता ही होती है । इसलिए स्वामी दयानन्दजी भी विवाह - संस्कारमें यह मन्त्र स्त्रीकी मजाकी प्राप्तिकेलिए पढ़वाते हैं- ' इन्द्राग्नी द्यावापृथिवी सातरिश्वा मित्रावरुणा भगो अश्विनो • भा । बृहस्पतिर्मरुतो ब्रह्म सोम इमां नारीं प्रजया वर्धयन्तु ' ( अथर्व ० १४ | १ | ५४ ) यहां सोमसे चन्द्रमा तथा चन्द्रलोकसे चन्द्रलोकस्थ पितर भी गृहीत हो जाते हैं । शेष देवता हैं । यदि आर्यसमाजी इस विषयपर निष्पक्ष होकर विचार करें, तो वे भी मृतक श्राद्धको सिद्धान्तित कर लें । वैसे तो वे भी मृतक- श्राद्ध कर ही रहे हैं; जितने डी ० ए ० वी ० कालेज, गुरुकुल, आदि दयानन्दके नामकी संस्थायें हैं, वे सब मृतकश्राद्ध हैं । मृतकके नामसे जो कुछ भी विद्या, वा अन्न आदि दान दिया जाय; वह सब मृतक- श्राद्ध हैं । आर्यसमाजके उत्सवों में ' ऋषिलंगर ' भी हुआ करता है, ऋषिसे ' स्वामी दयानन्द ' आर्यसमाजों को इष्ट हैं; तब उनके नाम से उत्सवों में आये विद्वानों वा अभ्यागतों को खीर आदि न खिलाना मृतक - श्राद्ध ही तो है । इससे मृतक दयानन्दकी आत्मा तृप्त होगी, प्रसन्न होगी । दीपमाला यादिके दिन स्वा ० दयानन्दकेलिए हवन आदि करना, स्वा ० दयानन्दके नाम अपनी पुस्तकोंको समर्पण वारना, ( जैसे देखो – चन्द्रमणि पालीरत्नकी टीकावाले ' निरुक्त ' का ' समर्पण ' ) गुरुकुल आदिमें अपने मरे हुए पिताके नामसे कमरा बनवाना —यह सब मृतक श्राद्धके ही प्रकार हैं । वैध - मृतकश्राद्ध मान लेनेसे सब अनुपपत्तियाँ दूर होंगी ] ।
685( ७ ) मृतक श्राद्ध - विज्ञान ।
[ अव मृतक श्राद्ध - विषयमें सुगम तथा प्रमाणित विज्ञान ' आलोक ' पाठकोंके समक्ष उपस्थित किया जाता है; पाठकगण इसका भी मनन करें; इससे भी उन्हें मृतक श्राद्धकी विज्ञानपूर्णता प्रतीत होगी ] |
हमारे शास्त्रों में लिखा है- ' वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पि- तस्य च । तावान् जीवः स विज्ञेयः सूक्ष्मात् सूक्ष्मतरो हि सः । ' अर्थात् एक वालके अग्रभागके सौ टुकड़े किये जावें; उसका भी सौवाँ भाग जितना सूक्ष्म हो सकता है, आत्मा भी उतना सूक्ष्म है । इस प्रकार सूक्ष्म - परमाणुस्वरूप आत्मा शरीर त्यागके बाद सूर्य- किरणोंकी आकर्षण - शक्ति के द्वारा सूर्यमण्डलकी ओर जाता है । उसमें दो मार्ग हैं । एक अनावृत्तिमार्ग, दूसरा पुनरावृत्तिमार्ग । जो प्राणी ज्ञान, भक्तियोग एवं अनासक्ति - कर्मयोग के द्वारा कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है, वह मुक्तात्मा तो मुक्तिलोक में जाता है, जिसका मार्ग सूर्यलोकके भीतर से है । वह वहाँ पुनरावृत्ति ( पुनर्जन्म ) से छूट जाता है । उससे नीचे नहीं गिरता । पुनरावृत्ति उन प्राणियों की होती है; जिन्होंने सत् - काम्ययज्ञ आदि कर्म द्वारा पुण्य वा निषिद्ध असत् - कर्म आदि द्वारा अहम्भाव आश्रित करके पापका सवय किया है । तब सुकर्मफल- भोगके लिए उनका आत्मा रश्मियों द्वारा बिना रोक - टोक चन्द्रलोक में जाता है । चन्द्रमण्डलमें जाकर सभी आत्मा पितृलोकके पितर कहते हैं । चन्द्रलोकके एक विशेष द्वीपका नाम ' पितृलोक ' है ।
686ज्योतिष - द्वारा यह सिद्ध ही है कि चन्द्रलोक अन्य उपग्रहों की अपेक्षा पृथिवीके अधिक समीप है । जैसे पृथिवीमें महासागरके मध्यमें रहने वाले किसी महाद्वीपके पासका उपद्वीप महाद्वीप के स्वभावको प्रायः धारण करता है । जैसेकि - एशिया महाद्वीप के पासकी लङ्का उपद्वीप है, वैसे ही आकाशकक्षाके मध्यवर्ती भूमण्डलके सम्बन्धसे चन्द्रमण्डल भी इस भूगोलके स्वभावको धारण करता है । जैसे इस भूगोलमें जल आदि होने पर भी मिट्टीका भाग अधिक होनेसे पृथिवी मट्टीकी कही जाती है; वैसे ही चन्द्रमण्डलमें भी जलभाग अधिक और मृत्तिका आदिके न्यून - मात्रामें होनेसे चन्द्रमण्डलको भी जलमय कहा जाता है । चन्द्रमण्डलका ऊपरी भाग ही पितृलोक होता है 1
। जैसेकि — ‘ सिद्धान्त- शिरोमणि ' गोलाध्याय त्रिप्रश्नवासनाके १३ वें पद्यमें कहा है- ‘ विधूर्ध्वभागे पितरो वसन्ति ' ।
चन्द्रमण्डलका आगेका भाग इस भूगोलके निवासियोंको दीखता है, पर उसका पृष्ठभाग नहीं दीखता । इसी अदृश्य - भागका नाम ' पितृलोक ' है । जैसे पृथिवीमें सूर्य - दर्शन ही दिनका कारण होता है, वैसे ही चन्द्रलोकमें भी सूर्य ही दिन - रातका कारण होता है । इस कारण ' सिद्धान्तशिरोमणि में कहा है- ' कुपृष्ठगानां द्युनिशं यथा नृणां तथा पितॄणां शशिपृष्ठगानाम् ' ( ' गोलाध्याय त्रिप्र- इनवासना १० वां श्लोक ) । इस पृथिवीमें जैसे २४ घंटोंका दिन - रात होता है, वैसे चन्द्रलोकके पितृलोकमें भी हमारे एक महीने में ही पितृलोक वालोंका दिन - रातका चक्र पूर्ण होता है । यह हम 687' आलोक ' के चतुर्थ - पुष्प में ' पितरोंका समय - विभाग ' में लिख चुके हैं । कृष्णपक्ष की अष्टमी से शुक्लपक्षको अष्टमी तक पितरोंका दिन होता है, और शुक्लाष्टमी से कृष्णाष्टमी तक पितरोंकी रात्रि होती है । अमावास्या में पितरोंका मध्याह्न, और पूर्णिमामें उनकी आधी रात होती है । यह भी हम ' पितरोंकी घड़ी में टाईम ' लेख में गत चतुर्थ - पुष्पमें दिखला चुके हैं ।
पितर दो प्रकारके होते हैं । एक स्थायी और दूसरे अस्थायी । स्थायी पितर वसु, रुद्र, आदित्य, अर्यमा, विश्वेदेव, अग्निष्वात्त आदि होते हैं । यह श्राद्धदेव कहे जाते हैं । इन्हींके द्वारा यहांसे मरे हुए जीवोंकी प्रत्येक व्यवस्था हुआ करती है । परमात्म - रूप गवर्नमेण्टके उक्त - विभाग का प्रबन्ध इन्हींके हाथों सौंपा गया है । श्राद्धसे तृप्त हुए यही श्राद्धकर्ताको आयु, प्रजा, धन, स्वर्ग आदि देते हैं । इस प्रकार मृतकोंका जीव जहाँ भी होता है, चाहे स्वकर्मानुसार द्युलोकमें, अथवा अन्तरिक्ष में, अथवा पृथिवी लोकमें; वहीं स्थायी पितर अपनी दिव्य शक्तिके बलसे उनको फल प्राप्त
जैसे सूर्य अपनी दिव्य - शक्तिके बलसे जल बरसाकर मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष, आदि सभी पृथिवीलोकके प्राणियोंको जहाँ - तहाँ सुखी करता है, वैसे ही अपनी अदृष्ट - दिव्यशक्तिके द्वारा वसु, रुद्र, आदित्य आदि नित्य पितर हमारे यहां से मरकर गये हुए पिता, पितामह, प्रपितामह आदियोंके पास हमसे ब्राह्मणादिको दिये वा खिलाये श्राद्धके सूक्ष्मान्नको भिजवाकर उन्हें यत्र - तत्र सुखी करते हैं । 688पृथिवीलोक में, अथवा अन्तरिक्ष वा स्वर्गलोक में मृत- पितर स्वकर्मा- नुसार जहाँ भी जन्म लिये होते हैं, वहाँ पर ' स्वधा पितृभ्यः पृथिविषद्भयः, स्वधा पितृभ्यो अन्तरिक्षसद्भ्यः स्वधा पितृभ्यो दिविषद्भयः ' ( अथर्व ० १८६७८-७९ -८० ) इन मन्त्रों द्वारा श्राद्ध के पढ़ार्थोंका सूक्ष्म अन्न वे स्थायी पितर उन्हें वहाँ पहुँचा देते हैं ।
अस्थायी पितर वे कहे जाते हैं, जो सूक्ष्म परमाणुस्वरूप यहां से मर कर गये हुए आत्मा नियत कालकेलिए पितृलोक में प्राप्त हुआ करते हैं 1
। जैसे देवता पुण्य समाप्त हो जाने पर ' क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ' ( गीता ६।२१ ) मनुष्यलोकमें जन्म लेते हैं, वैसे ही अस्थायी पितर भी पुण्य - समाप्तिवश फिर भूलोक में क्रमसे जन्म लेते हैं । नियत समय के बाद सूक्ष्म - जीव पितृलोक - चन्द्रमण्डलसे वायुमण्डलमें, फिर मेघमण्डलमें प्राप्त होकर ओससे मिलता है । फिर पृथिवीके अन्न - शाक आदि पदार्थों में प्राप्त होकर उस भोजनके द्वारा पुरुषके वीर्य में आता है, और वीर्य - द्वारा स्त्रीके गर्भाशय में प्रवेश करता है । तव कर्मानुसार पशु, पक्षी, वृक्ष आदि योनियोंके शरीरोंको धारण करता है । उसको वह नित्य- पितरों द्वारा प्राप्त सूक्ष्म अन्न भी अपनी - अपनी योनि के अनुसार ही मिलता है; यह नहीं कि - यदि उसके निमित्त खीर दी गई है; तो आगे भी खीर मिले । यदि वह कारणवश किसी पशु आदि योनिमें गया है; उसे उसके अनुसार यह अन्न तृण आदि रूपमें प्राप्त होता है । जैसे कि मनीचार्डर द्वारा भेजा हुआ रुपया वह तो इसी पोस्ट आफिसमें जमा होता है; दूसरे पोस्ट- 689आफिसमें उसका आर्डर भेजा जाता है; वहीं यदि वह भारतमें है; तो उसे रुपये आदिमें मिलता है । यदि अमेरिकामें है; तो सेंट आदि रूपमें; इङ्गलैंड आदि में है, तो उसे पौण्ड - शिलिंग आदिरूपमें मिलता है ।
जैसे मनुष्योंका भोजनकाल मुख्यता से मध्याह्न होता है, वैसे ही पितरोंका भी मुख्य भोजनकाल अमावस्या हुआ करता है; क्योंकि — अमावस्या वाले दिन चन्द्रमण्डल सूर्यमण्डलके. नीचे होनेसे उसमें मध्याह्न हुआ करता है । इसलिए प्रत्येक अमावास्यामै श्राद्ध - विधान शास्त्रीय है । और पार्वण श्राद्ध के लिए आश्विन- मासका कृष्णपक्ष जबकि सूर्य कन्या राशिमें होता है - श्रेष्ठ माना गया है । क्योंकि- -तब सूर्य दक्षिणायन में होता है; और उसकी किरणें. पृथिवीलोकमें निकटतावश सरल रेखासे पड़ती हैं । पृथिवीके पितरोंके उद्देश्यवाले पदार्थ सूर्य किरणें दक्षिणा- भिमुख ऊपर आकर्षित कर लेती हैं । जैसे बैट्री यदि उत्तम हो, तो तारका कार्य प्रबलतासे होता है । वैसे ही सूर्य - किरणों की आकर्षण - शक्तिकी सहायता से पितृलोकके अधिकारी पितृगण भी अपने कार्यको उत्तमता से कर सकते हैं । इसीलिए ' सूर्यसिद्धान्त ' में कहा है - – ' ततः शेषाणि कन्याया यान्येहानि तु षोडश । क्रतुभिस्तानि तुल्यानि पितॄणां दत्तमक्षयम् ' ( १४।६ ) यहां सूर्यके कन्याराशिमें होनेपर सोलह दिन ( माद्रकी पूर्णिमा, और आश्विन कृष्णपक्षकी
* इस विषय में पितरोंका टाइमटेबल देखनेकेलिए ' श्रीसनातन- धर्मालोक'का चतुर्थ - पुष्प मंगाइये । मूल्य ४ । )
690अमावास्या तक पन्द्रह दिन ) पितरोंको दिये हुए श्राद्धका उत्तम फल कहा गया है ।
जैसे मातासे खाये हुए अन्नको गर्भका बालक प्राप्त कर लेता है; वैसे ही तर्पण, निवाप आदि द्वारा दिये हुए जल, तिल, यव आदियोंका सारभाग विश्वगर्भ भगवान् सूर्यके किरणोंके द्वारा वैदिक दिव्यशक्ति के बलसे पितृलोकमें सोमरूप होकर प्राप्त होता है । इसी रूप से ब्राह्मण - भुक्त अन्न भी मन्त्र शक्ति से उनमें प्रविष्ट पितरोंको प्राप्त हो जाता है । इसमें यह शंका नहीं करनी चाहिये कि ' यदि ब्राह्मणने पहले खाया, पितरोंने उसका अन्न पीछे खाया, तो ब्राह्मणका जूठा खाया; अथवा यदि पितरोंने पहले खायाः ब्राह्मणने पीछे खाया; तो ब्राह्मरणने पितरोंका जूठा खाया ' । वह अन्न जब सूक्ष्म हो जाता है; तो सूक्ष्मतामें जूठापन वा अशुद्धि नहीं मानी जाती । फिर इस वैदिक - कर्म में मन्त्र - शक्तिसे उच्छिष्टता नहीं मानी जाती । मधुमक्षिकाएं पुष्पकी सूक्ष्म - रस पीकर अपने छत्त में उगल देती हैं, बछड़ा पहले गायके स्तन में मुह मारता है, पहले दूध पीता है, पीछे हम पीते हैं । जैसे एतदादि - स्थल में उच्छिष्टता नहीं मानी जाती; वैसे ही श्राद्ध - विषय में भी समझना चाहिये ।
कथञ्चित् यहां उच्छिष्टता मानी भी जावे; तो पितरोंका जूठन ब्राह्मणने खाया हो, इसमें ब्राह्मरणको दोष नहीं लग सकता, क्योंकि पितर सूक्ष्म होते हैं; और मनुष्यसे उच्चयोनि वाले होते हैं । शेष रही ब्राह्मणके खाये हुएकी पितरोंके लिए उच्छिष्टता; उसपर भी 691सूक्ष्मता उसकी उच्छिष्टता नहीं रहने देती; क्योंकि जैसे भोजन हमारी इन्द्रियां पहले खा लेती हैं; हमारी जठराग्नि उसे सूक्ष्म करके शुद्ध कर लेती है; वही सूक्ष्मभाग हमारे आत्माको मिलता है, जिससे वह तृप्त होता है । इसमें यह नहीं कहा जाता कि- इन्द्रियोंका जूठा आत्माने खाया; वैसे पितरोंके विषयमें भी जान लेना चाहिये । ब्राह्मणने खाया तो वह एक श्रेष्ठ योनिका माना जाता है, ' गुरोरुच्छिष्ट भोजनम्'का व्यवहार स्मृतियों में भी इसी ब्राह्मणकी उच्च - योनिके कारण रखा गया हैं । दूसरा फिर उसमें रहनेवाली अग्नि उसे सूक्ष्म करके फिल्टरके तरीके से उसे शुद्ध करती है; फिर वह सूक्ष्म होकर महाग्निके साथ मिलती है; महाग्नि उसे और भी शुद्ध करती है । फिर उस महाग्निका आकर्षण करता है सूर्य, वह उसको और भी शुद्ध करता है; फिर उसको चन्द्र आकृष्ट करता है, फिर उसकी और भी शुद्धि और अमृतमयता हो जाती है; अब बताइये कि जूठनकी अशुद्धि कहां रही? इसका प्रबल प्रमाण भी देख लीजिये । सूर्य पृथिवीके सब पदार्थोंका आकर्षण करता है । पृथिवीमें मल भी पड़ता है, मूत्र भी पड़ता है, बलगम भी पड़ता है । सूर्य इनके रसका भी तो आकर्षण करता है । सूर्यमें ऐसी शक्ति है कि वह इन रसोंको भी फिल्टर कर दिया करता है, वही रस फिर आकाशमें जमा करके हमपर वर्षा - कालमें बरसाता है । आप उसे सहर्ष ग्रहण करते हैं; आप क्या यह मानते हैं कि — सूर्य हम पर मल - मूत्र - बलगमका रस भी डालकर हमें अशुद्ध कर रहा है? गाय चारा खाती है; उसीका अन्दर रस 692बनता है, और रससे दूध; उस दूधको आप पीते हैं; क्या यह गायका आप जूठन पीते हैं? वस्तुतः अग्नि, महाग्नि, सूर्याग्नि इनमें यही विशेषता है कि यह सर्वथा अशुद्ध वस्तुओंको भी - शुद्ध कर दिया करते हैं; तो उच्छिष्टका तो भला क्या कहना; अतः यहां इस विषय में उच्छिष्टता- जूठनका दोष नहीं दिया जा सकता । अस्तु ।
यह श्राद्धीय - शक्ति ऋषियोंने हजारों वर्ष साधे हुए तपस्या, योग आदि के बलके द्वारा प्राप्त की है । इसका कोई भी शास्त्रज्ञ विद्वान् खण्डन नहीं कर सकता । जो पितर पितृलोक में न होनेसे वैसी शक्ति नहीं रखते कि — सूक्ष्मरूप बनकर श्राद्ध खाते · हुए ब्राह्मणों के शरीर में प्रवेश कर सकें; किन्तु वे किसी मनुष्यादिके • स्थूल शरीर की योनिको प्राप्त कर चुके हों; तब हमसे दिये हुए • श्राद्धके अन्नको स्थायी सूक्ष्म - पितर वसु, रुद्र, आदित्य ही आकृष्ट करके उन स्थूल - योनिवाले पितरोंको सौंप दिया करते हैं । - इस प्रकार मृतक श्राद्ध रहस्यपूर्ण तथा सोपपत्तिक, और विज्ञानपूर्ण · सिद्ध हुआ ।
पितृपक्ष - पर्वके प्रवृत होनेसे हमने इसमें श्राद्ध - विज्ञानके छः प्रकार बताये हैं- पाठक इनका ठीक - ठीक मनन करके इंस श्राद्ध- • विषयकी समूलता जान लेंगे — यह हमारा दृढ विश्वास है । श्राद्ध- विषयपर वेदादि - शास्त्रों को साक्षी, तथा श्राद्धपर किये जानेवाले • शङ्का प्रवाहका उत्तर हम भिन्न- पुष्पों में देंगे ।
In English
The Science of Shradh for the Deceased
This text explains the ritual purpose of offering pindas (food balls) to deceased ancestors during specific lunar periods. It argues that these offerings provide energy to subtle bodies, helping them reach the realm of the ancestors and receive blessings for their descendants.
This chapter answers
- Why is shradh performed for ten days?
- How do pindas help ancestors reach pitruloka?
- What is the significance of performing shradh during the lunar month of shravan?
- Why are offerings made on the death anniversary of a person?
Also written: Pitrishraddhapaksha, Mritaka, Shraddha, Vigyana, 2, 5, Pitrishraddhapaksha Mritaka Shraddha Vigyana 2 5, पितृश्राद्धपक्ष ( मृतक श्राद्ध - विज्ञान २-५ )