सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 721–730
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 721–730
पृष्ठ 721
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विजयदशमीका महत्त्व एवं विजयका रहस्य ६६३ ( ८ ) विजयदशमीका महत्त्व एवं विजयका रहस्य । यह विजय दशमीका दिन है । इसीदिन भारतके हृदयके सम्राट् भगवान् - श्रीरामचन्द्रने राक्षसराज देशमुख - रावणको विजयार्थ यात्रा शुरू की थी, और विजय प्राप्त की थी । यही दिन भारत में अत्याचारी वैदेशिक - राजाका दमनकारी होनेसे भारतकेलिए महत्त्वपूर्ण है । यह दिन आर्योंका अनार्यो पर आक्रमणका कहा जाता है; अथवा पुण्यका पापपर आक्रमणका दिन है यह । यह भारतके महोत्सवका दिन है । यही दिन हमें स्मरण कराता है कि भारतीय एक भी स्त्रीको यदि कोई विदेशी राजा कुविचारके संकल्पसे ले जाता है; जब तक उसे ससम्मान तथा अखण्डित रूपसे वापिस नहीं लौटाया जाता; तब तक विश्राम नहीं करना चाहिये । वैसे अत्या-चारीको इस प्रकार मूलसे उखाड़ दो कि भविष्य में फिर किसी मी वैदेशिकको भारतीय महिलापर कुदृष्टि करने का संकल्प ही न हो । इसके अतिरिक्त जो वैदेशिक, ऋषि - मुनि वा तपस्वियों पर अत्याचार करता है, अथवा जो भारतीय - धनको इकट्ठा करके समुद्र-पार विदेशमें ले जाता है; वह भारतका अहितकारक है । उसे इस प्रकार दण्डसे ठीक करो कि आगे कोई विदेशी भारतके प्रति कुदृष्टि कर ही न सके- यह भारतीय क्षत्रियोंका कर्तव्य है - यह आजका दिन सिखला रहा है । वह यह भी समझाता है - ' न्याय-मार्ग में चलने पर पशु - पक्षी भी आपके सहायक होंगे । जैसे कि कहा गया है — ' यान्ति न्याय प्रवृत्तस्य तिर्यखोपि सहायताम् । अपन्थानं तुं गच्छन्तं सोदरोपि विमुञ्चति ' ।
पृष्ठ 722
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६६४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) यह विजयाका दिन भी है; सब देवोंने मिलकर शक्तिदेवीको उत्पन्न किया था; जिसका दूसरा नाम विजया था; उसने भारतीय नारियोंके अपमानकर्ता महिषासुर, शुम्भ, निशुम्भ आदिका वध करके दिखला दिया कि - भारतमाता के अहितकारकोंकी यही दशा हुआ करती है । इन्हीं दिनों सरस्वती विसर्जन वा सरस्वती-अवकाश करके दिखलाया जाता है कि यह विजय - यात्राका समय है । इस समय में सभीको विद्या - पठन - पाठनको भी स्थगित करके शक्तिका सञ्चय करना चाहिये, और स्वदेश के विजयार्थ विचार करना चाहिये । दुर्दान्त, भारत - देशको ग्रस्त किये हुए, युद्धोन्मत्त, जातियोंके विषमय - दाँत तोड़ देने चाहियें; उनकी विषैली - पूछको काट लेना चाहिये । यह समय होता है वृष्टिकी समाप्तिका । ऐसा ही समय छः मासके बाद चैत्रमासके शुक्लपक्ष में आता है । वह हिमपातकी समाप्तिका सूचक होता है । उसमें रामका जन्म होता है, और इसमें रामकी विजययात्रा होती है । यह नवरात्र शक्तिकी उपासना के होते हैं । शक्तिको उपासना से ही युद्धमें दुर्मद महिषासुर आदिकी शक्तिका विनाश होता है । दैवी शक्ति आसुरी शक्तिको शान्त करती है । इस समय न तो हिमकी प्रतिबन्धकता होती है, न ही गर्मी वा वर्षाका प्रतिरोध ही होता है । तो शत्रु अनायास ही जीता जाता है । इसमें विजयनायक घह हो सकता है, जो माता ( भारत - माताकी प्रतीक ) पिता ( विष्णुदेवके प्रतीक ) का आज्ञापालक होवे, जिसका
पृष्ठ 723
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विजयदशमीका महत्त्वं एवं विजयका रहस्य भाइयों ( भारतभूमिके नाते अपने बन्धुओं ) से सौहार्द हो, जहाँ पति - पत्नीकी पारस्परिक- सहानुभूति हो, पत्नीका पतिके बिरहमें भी पातिव्रत्य में अवधान हो, राजा प्रजाका परस्पर विश्वास हो । कहीं स्वजनों, बन्धु आदिमें ईर्ष्या वा छल अथवा भेदनीतिका लेश भी न हो । जो ज्ञान एवं कर्मका सामञ्जस्य विधाता हो; विजय - श्री उसीके गले में विजयमाला डालती है । यही विचारा था वा अनुकृत किया था, बल्कि आदर्शरूप से दिखलाया था— भगवान् रामचन्द्रने । उनमें पहली बातें तो विश्व-विश्रुत ही हैं । अन्तिम - विजयसोपान उन्होंने दिखलाया कर्म और ज्ञानके सामञ्जस्य करनेका । ' कातर्य केवला नीतिः, शौर्य श्वापद-चेष्टितम् । अतः सिद्धिं समेताभ्यामुभाभ्यामन्वियेष सः ' यहाँ नीतिको ज्ञान और शूरताको कर्म बताया गया है । केवल नीति ( पालिसी ) का अवलम्बन कायरता बताई गई है, केवल शूरताका अवलम्बन क्रूरता- पशुपन, खूँखार - जीवोंकी दहाड़ माना गया है । एकके आश्रयणसे असिद्धि और दोनों के आश्रयणसे सिद्धि कही गई है । ' येषां दोर्बलमेव, दुर्बलतया ते सम्मतास्तैरपि, प्रायः केवलनीतिरीतिशरणैः कार्यं किमुर्वीश्वरैः । ये क्ष्माशक्र! पुनः पराक्रमनय - स्वीकारकान्तक्रमाः ते स्युर्नैव भवादृशास्त्रिजगति द्वित्राः पवित्राः परम् ॥ ' इस पद्यमें केवल भुज - बल वालेको भी दुर्बल माना गया है, केवल नीति करने वालोंको भी कुछ नहीं माना गया । पराक्रम और नीति दोनोंका जिन्होंने ठीक क्रम अवलम्बित किया है; " वे ही
पृष्ठ 724
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६६६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) सफल माने गये हैं । इसमें श्रीराम स्वयं ज्ञानके सजीव - प्रतिनिधि थे; और लक्ष्मण - हनुमान् आदि कर्मके प्रतिनिधि थे । इनके सामञ्जस्यसे ही इस पक्षकी विजय हुई 1 | कर्म चाहिये अधिक; ज्ञान चाहिये थोड़ा । इसलिए उक्त - पद्य में कर्मस्थानीय पराक्रमको ' अभ्यर्हितं पूर्वम् ' इस नियम से पूर्व रखा गया है; और ज्ञानस्थानीय-नय ( नीति ) को पीछे । युद्धमें सेना कर्मस्थानीय होती है, और सेनापति ज्ञानस्थानीय | सेनापति थोड़े अपेक्षित होते हैं; और सेना अपेक्षित होती है वहुत । यदि अधिक सेनापति हों; उनके अनुपात से सेना थोड़ी हो; तब पराजय निश्चित हुआ करती है । इसी कारण शतवर्षके हमारे जीवनमें ७५ वर्ष तक कर्मकाण्ड आदिष्ट किया गया है, और २५ वर्ष ज्ञानकाण्ड | तभी अभ्युद्य-निःश्रेयस - लक्षण साफल्य मिलता है । : इस प्रकार श्रीराम एक ज्ञानस्थानीय थे, लक्ष्मण- हनूमान् आदि तथा वानर सेना यह कर्मस्थानीय थे । ऐसे सामञ्जस्य में ही विजय हुआ । जिस पक्षका विजय नहीं होता, उसमें कारण कर्म एवं ज्ञान दोनोंका असामञ्जस्य ही होता है । तब जो पुरुष, अथवा जो संघ, अथवा जो जाति, या जो देश, कर्म - ज्ञानरूप शूरता एवं नीति, सैनिक बल और प्रणिधि ( जासूस ) - बल, शस्त्र बल एवं प्रचार - बल ( प्रोपेगण्डा ), दोनोंका ठीक - ठीक सामञ्जस्य करेगा; वही पुरुष, वही संघ, वही जाति, वही देश, वही राजा, वही सम्प्रदाय विजयको प्राप्त होगा । विजयका महत्त्व सर्वजन - विदित ही है । तब विजयकी
पृष्ठ 725
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विजयदशमीका महत्त्व एवं विजयका रहस्य ६६७ विचारणा तथा विजययात्राको दिनस्वरूप - विजयदशमीका महत्त्व भी स्वतः- सिद्ध है; क्योंकि वर्षा ऋतु विजययात्राकी प्रतिबन्धक हुआ करती है; उसकी समाप्ति होनेपर विजययान्त्रा अवसर प्राप्त ही होती है | पाकिस्तान - हिन्दुस्थान दोनोंकी प्रतिद्वन्द्विता स्वतः- सिद्ध है; अब सोचना पड़ेगा कि इन दोनोंमें किसके पक्षमें कर्म और ज्ञानका यथावत् सामञ्जस्य है? हमें हिन्दुस्थानकी विजय एष्टव्य है । इसमें उक्त दोनों बलोंमें यदि कुछ त्रुटि दीखती है; तो उसके शुभचिन्तकोंको चाहिये कि वह इसके नेताओं को सावधान करें । यह विशेष रूप से ध्यान देने योग्य बात है कि पाकिस्तान देश - विदेश में अपने पक्षको दूधका धुला और हिन्दुस्थानके पक्षको छलमल - युक्त सिद्ध किया करता है । इधर अवधान देना चाहिये । क्योंकि आजकल प्रचारका युग है । इसी प्रचारसे छली भी सरल और सरल भी छली सिद्ध किये जा सकते हैं । तब विजयेच्छुकों-को केवल सत्यका भी आश्रय मायावियोंके साथ नहीं करना चाहिये; क्योंकि कहा है-' व्रजन्ति ते मूढधियः पराभवं भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः । प्रविश्य हि घ्नन्ति शठास्तथाविधान, असंवृताङ्गान् निशिता इवेषवः ' ( किरातार्जुनीय १।३० ) अर्थात् मायावीसे सरलताका व्यवहार किया जावे; तो पराजय प्राप्त होता है । यही बात नैषधचरितमें भी कही है कि- ' आर्जवं हि कुटिलेषु न नीतिः ' ( ५/१०३ ) अर्थात् कुटिलोंके साथ सरलताका आश्रयण नीति नहीं होती । तब इस प्रचारके युगमें हिन्दुस्थानके धौरेयोंको भी पश्चात्पद.
पृष्ठ 726
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
६६८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) न होना चाहिये, और कर्म एवं ज्ञानके सामञ्जस्यको यथावत् रखना चाहिये - इस प्रकारके रहस्योंको अपने आपमें रखती हुई इस विजयदशमीका महत्त्व स्पष्ट है । वह यही विजयदशमी प्रतिवर्ष आती हुई भारतको यह विजय - मन्त्र प्रतिवर्ष बोधित करती और स्मरण कराती रहती है । पुनः पुनः आवृत्ति ही तो स्मरण करानेका • साधन हुआ करती है । भारतके उन्नायकों तथा नायकोंको उचित है कि- वे विजय दशमीके इस सन्देश - विजयरहस्य को याद रखें और इस भारतदेशको विजयी बनावें । विजयदशमीके ही दिन भगवान् रामने रावणके प्रति विजययात्रा प्रारम्भ की थी और विजय प्राप्त किया था, विजयके बीज कर्म एवं ज्ञानका सामञ्जस्य यथावत् रखा । पूर्वही संकेत किया जा चुका है कि - कर्मकी अधिकता और ज्ञानकी अल्पता परन्तु उत्तमता अपेक्षित होती है, तभी विजय होता है, हमने जन्म से लेकर मरण तक सांसारिक युद्ध करके विजयको प्राप्त करना है, उसमें ऋषि - मुनियोंने भी हमारे लिए ७५ वर्षतक कर्मकाण्डका पट्टा यज्ञोपवीत हमें पहिरनेको कहा, उसके बाद २५ वर्ष तक ज्ञानकाण्डको आश्रयणीय बताया, इसीसे हम विजयरूप अमृतको प्राप्त करते हैं । जिसका संकेत वेदने ईशोपनिषद् में किया है - जिसे हम आगे गीता जयन्ती में बतावेंगे ।
पृष्ठ 727
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दीपावलीका वैज्ञानिक- रहस्य ६६६ ( ६ ) दीपावलीका वैज्ञानिक - रहस्य जैसे सनातन - हिन्दुधर्मके सिद्धान्त तथा विषय विज्ञान - परिपूर्ण है; जैसे हिन्दुधर्मके नियत किये गये चिह्न विज्ञानमय हैं; वैसे ही सनातन - मानवधर्मसे नियत किये हुए पवें भी वैज्ञानिक - रहस्यों वा तथ्यों से परिपूर्ण हैं । जहां उनसे आध्यात्मिक, आधिदैविक शक्तियों का प्रादुर्भाव होता है, वहां व्यावहारिक तथा पारमार्थिक उन्नति भी अनायास हो जाती है । हमारा प्रत्येक - पर्व ( त्योहार ) आर्यसंस्कृति और भारत के उज्ज्वल इतिहासको जीवित रखनेका प्रधान - साधन, अथवा यों कहना चाहिये कि — आर्यसंस्कृति और भारतीय उज्ज्वल - इतिहासका प्रतीक होता है । त्रिकालदर्शी महर्षियोंने प्रत्येक पर्वकी रचना लोक-कल्याणार्थ और भारतवर्षके अभ्युदयार्थ वैज्ञानिक आधारपर की थी । यदि इन त्योहारोंके वास्तविक स्वरूपको समझकर उनपर आचरण किया जाय, तो संसारका बहुत कुछ कल्याण हो सकता है । चिरकाल तक पारतन्त्र्य में रहने के कारण जनताने सनातन-धर्मके प्रत्येक - नियमके रहस्यको भुला दिया था; और उन्हें अंग्रेजों के पिछलगुआ सुधारकगणके दुष्प्रचार से शङ्कितदृष्टि से देखने भी लग गये थे; पर अब स्वातन्त्र्य - युग में हमें वह अंग्रेजोंकी मानस-दासता छोड़नी पड़ेगी । अब स्वतन्त्र भारतके प्रत्येक नागरिकका कर्तव्य है कि वह अपने पुण्यपर्वोके वैज्ञानिक - रहस्योंको भली-भांति समझकर भारतके अतीत - गौरवको पुनः प्रतिष्ठापित करे । दीपमाला एवं लक्ष्मीपूजनका यह पर्व हमें आधिभौतिक एवं
पृष्ठ 728
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
७०० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) आध्यात्मिक सभी दृष्टियों से उत्कर्ष और प्रकाशकी ओर लेजाने वाला है । वैसे तो संसारके अनेकों भागों में दीपमाला या प्रकाश करनेके उत्सव भिन्न - भिन्न रूपों में प्रचलित हैं, किन्तु जिस वैज्ञानिक वा आध्यात्मिक गूढ़ - तत्त्वको लिये हुए हमारा यह दीपावली - उत्सव अनादिकाल से चला आरहा है, वैसा संसार में अन्यत्र कहीं नहीं मिलेगा । सब पर्वोंमें श्रावणी, विजयदशमी, दीपावली तथा होली यह चार पर्व तो विशेष हैं । उनमें श्रावणी मुख्यतया ब्राह्मणोंके लिए है; वहां उन्हें वेदाध्ययनाध्यापन तथा ऋषि तर्पण आदि करना पड़ता है, इस विषय में हम पूर्व लिख चुके हैं । फिर विजय दशमी पर्व मुख्यतया क्षत्रियोंकेलिए नियमित किया गया है । चातुर्मास्य में वर्षा आदिके कारण मार्गों में कठिनाइयों के कारण विजय यात्रा में अनेक बाधाएं उपस्थित होती हैं । वर्षाके अन्त तथा शरद् ऋतुमें विजयं - दशमीसे प्रजारक्षार्थ यह विजय यात्रा क्षत्रिय राजाओं की प्रारम्भ हुआ करती है, जिससे शत्रुओं को दबाकर रखा जावे । उसमें वे शक्तिकी उपासना करते हैं । अन्य वर्ण भी साथ शामिल होते हैं । दीपमालाका पर्व मुख्यतया वैश्योंकेलिए है । वर्षा ऋतु व्यापार शिथिल हो जाता है । शरद् ऋतुसे वह उत्तरोत्तर उन्नत होता है । व्यापारकी स्वामिनी लक्ष्मीदेवी है । व्यापार की निर्विघ्नताकेलिए उस लक्ष्मीदेवीकी आराधना की जाती है । लक्ष्मी सबकेलिए अनिवार्य होनेसे अन्य वर्ण भी इसमें
पृष्ठ 729
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दीपावलीका वैज्ञानिक - रहस्य ७०१ योगदान करते हैं । चतुर्थ - उत्सव होली मुख्यतया शूद्रोंकेलिए है । उसमें हास्यादि विविध क्रीडाएँ तथा उच्छृङ्खलताएं हुआ करती हैं । अन्य भी वर्ण उसमें अन्योन्य प्रेम - सम्बन्धके लिए योगदान हैं | यद्यपि यह चारों पर्व एक - एक वर्णकेलिए विशेष रूप से नियत किये गये हैं; तथापि सभी वर्ण एक - सूत्र से सम्बद्धं हुए - हुए इन पर्वोको बड़े उत्साहसे मनाया करते हैं । इस प्रकार चारों वर्णोंके द्वारा उनको मनाना एक - दूसरे के प्रति अलौकिक प्रेम तथा परस्पर-संघटनको परिचायित करता है । इसीलिए ही तो कहा है-' संघे शक्तिः कलौ युगे ' । अतः सबका इस समय सम्मेलन उचित भी है । दीपमालामें लक्ष्मी - पूजा उद्दिष्ट होती है । लक्ष्मीका आसन है दिव्य - निर्मल कमल । वह भला पङ्किल - कमल पर केसे बैठ वा रह सकती है? तब जब हमने लक्ष्मीदेवीको अपना गृहरूप - आसन देकर उसकी अर्चना करनी है; तब उसकेलिए मलिन घर भला उपयुक्त कैसे हो सकता है? इसीलिए दीपमाला वाले दिन प्रत्येक . व्यक्ति झाड़ने- बुहारने, लीपने, और चूना लगानेसे अपने - अपने घरको स्वच्छ और सुसज्जित करता है; जिससे हमें लक्ष्मीकी दैवी शक्ति प्राप्त हो, क्योंकि -'न च दैवात् परं बलम् ' । इस कारण हमारे जितने नित्य वा नैमित्तिक संस्कार, उत्सव, व्रत वा पर्व आदि होते हैं; उनमें सर्वत्र दैवी शक्तिको प्राप्त करनेका प्रयत्न किया जाता है । वे कृत्य दैवी शक्ति के आश्रय से पूर्ण हो भी जाते हैं ।
पृष्ठ 730
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
७०२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ऐसा करने से एक बाह्य लक्ष्मीदेवी ( शोभा ) तो प्रत्यक्ष प्रसन्न हो ही जाती हैं; तब शेष साक्षात् - लक्ष्मीदेवीकी प्रसन्नतार्थ हमें उनकी भी वैध अर्चना करनी पड़ती है । सांसारिक शक्तियों में धन-शक्ति भी मुख्य है I । राजासे लेकर रंक तक सभी उसकी इच्छा किया करते हैं । उसके बिना कार्य कुछ चलता भी तो नहीं है । उस शक्तिकी प्राप्त्यर्थ ' दैवी सहायता अपेक्षित होती है; पर हमने उसे ' भुला दिया है, जिससे भारतीय गौरव भी दिनोंदिन ह्रासको प्राप्त हो रहा है । प्राचीन - भारत जितने गौरवास्पद - पदको धारण किये हुए था; आजका भारत वैसा नहीं । उसी पूर्व- पदको प्राप्त करनेकेलिए हमारा कर्त्तव्य है कि हम संघटन - प्रेमादिपूर्वक प्राचीन आदर्शका अनुसरण करके भारतको पूर्वकी भांति उन्नत करें । उसे सारे देशोंका शिरोमणि बनावें; जिससे पूर्वकी भांति हमारे देश में विद्या, बल, धनादिकी शक्तियों का प्रचुरतासे विकास हो । इस प्रकार उन्नतिके साधनोंका पर्वोंसे घनिष्ठ सम्बन्ध हुआ करता है । उन्हीं परमोज्ज्वल - पर्वों में महान् गौरवशाली, आर्थिक शक्तिका जन्मदाता दीपावली पर्व है । इसे कार्तिककी अमावस्या में महान् • उल्लास से घर - घर में मनाया जाता है । महालक्ष्मीका प्रसवकारक होने से यह एक मुख्य पर्व माना जाता है । बात यह है कि वर्षा ऋतु जब आती है; तो घरोंकी बहुत दुर्दशा हो जाती है । कहीं नदियोंकी बाढ़ कृपा करती है; तो कहीं पानी वा कीचड़ । मेघाच्छन्नतावश घरों में सूर्यका प्रकाश पूर्ण रूपसे न पड़नेसे नमी वा सील हो जाती है, जिससे दीमक -महारानीके