Gherandasamhita4
अथातः संप्रवक्ष्यामि प्रत्याहारकमुत्तमम्। अथातः संप्रवक्ष्यामि प्रत्याहारकमुत्तमम् ॥१॥ अब मैं इसके पश्चात्, उस सर्वोत्तम प्रत्याहार (इन्द्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर अंतर्मुखी करने की क्रिया) का भलीभाँति वर्णन करूँगा। यह मंत्र दोहराया गया है, जिसका अर्थ है कि प्रत्याहार का महत्व बहुत अधिक है और उसका ज्ञान अत्यंत आवश्यक है।
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चमस्थिरम्। ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥२॥ जिस-जिस विषय से यह चंचल और अस्थिर मन निकलता है, उस-उस विषय से उसे रोककर, आत्मा में ही भली प्रकार वश में कर लेना चाहिए।
पुरस्कारं तिरस्कारं सुश्राव्यं वा भयानकम्। मनस्तस्मान्नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥३॥ चाहे वह पुरस्कार हो या तिरस्कार, चाहे वह सुंदर सुनने योग्य हो या भयानक, उस (मन) को इन सब से विचलित न होने देकर, इसलिए उसे नियंत्रित करके, उसे आत्मा में ही वश में कर लेना चाहिए।
सुगन्धे वापि दुर्गन्धे घ्राणेषु जायते मनः। तस्मात्प्रत्याहरेदेतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥४॥ मन सुगंधित या दुर्गंधित, किसी भी प्रकार की गंध के प्रति इंद्रियों (नाक) में आकर्षित हो जाता है। इसलिए, इस मन को (विषयों से) वापस खींच लेना चाहिए और इसे आत्मा में ही वश में कर लेना चाहिए।
मधुराम्लकतिक्तादिरसान्याति यदामनः। तदाप्रत्यारेत्तेभ्य आत्मन्येव वशंनयेत् ॥५॥ जब मन मधुर, खट्टे, कड़वे आदि विभिन्न रसों (भावनात्मक या इंद्रियगत अनुभूतियों) को प्राप्त करता है, तब उन बाह्य अनुभूतियों से पीछे हटकर, अपने मन को आत्मा में ही एकाग्रचित्त कर लेना चाहिए (अर्थात, बाहरी सुख-दुःख से विचलित हुए बिना अपने आंतरिक स्वरूप में स्थित हो जाना चाहिए)।
इति श्रीघेरण्डसंहितायां घेरण्डचण्डसंवादे घटस्थयोगप्रकरणे प्रत्याहराप्रयोगो नाम चतुर्थोपदेशः ॥ इस प्रकार श्री घेरंड संहिता में, घेरंड और चंड के संवाद में, घटस्थ योग प्रकरण के अंतर्गत, प्रत्याहार का प्रयोग नामक यह चौथा उपदेश पूर्ण हुआ।