02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1181–1190
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1181–1190
पृष्ठ 1181
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः अर्जुनके मुखसे यात्राका वृत्तान्त सुनकर युधिष्ठिरद्वारा उनका अभिनन्दन और दिव्यास्त्रदर्शनकी इच्छा प्रकट करना अर्जुनउवाच ततो मामतिविश्वस्तं संरूढशरविक्षतम् देवराजो विगृह्येदं काले वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
अर्जुन कहते हैं - राजन्! तदनन्तर मैं देवराजका अत्यन्त विश्वासपात्र बन गया । धीरे- धीरे मेरे शरीरके सब घाव भर गये । तब एक दिन देवराज इन्द्रने मेरा हाथ पकड़कर कहा - ॥ १ ॥
दिव्यान्यस्त्राणि सर्वाणि त्वयि तिष्ठन्ति भारत न त्वाभिभवितुं शक्तो मानुषो भुवि कश्चन ॥ २ ॥
‘ भरतनन्दन! तुममें सब दिव्यास्त्र विद्यमान हैं । भूमण्डलका कोई भी मनुष्य तुम्हें पराजित नहीं कर सकता ॥ २ ॥
भीष्मो द्रोणः कृपः कर्णः शकुनिः सह राजभिः संग्रामस्थस्य ते पुत्र कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ३ ॥
' बेटा! भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण तथा राजाओंसहित शकुनि– ये सब - के - सब संग्राममें खड़े होनेपर तुम्हारी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते ' ॥ ३ ॥
इदं च मे तनुत्राणं प्रायच्छन्मघवान् प्रभुः अभेद्यं कवचं दिव्यं स्रजं चैव हिरण्मयीम् ॥ ४ ॥
महाराज! उन देवेश्वर इन्द्रने स्वयं मेरे शरीरकी रक्षा करनेवाला यह अभेद्य दिव्य कवच और यह सुवर्णमयी माला मुझे दी ॥ ४ ॥
देवदत्तं च मे शङ्खं पुनः प्रादान्महारवम् दिव्यं चेदं किरीटं मे स्वयमिन्द्रो युयोज ह ॥ ५ ॥
फिर उन्होंने बड़े जोरकी आवाज करनेवाला यह देवदत्त नामक शंख प्रदान किया ।
स्वयं देवराज इन्द्रने ही यह दिव्य किरीट मेरे मस्तकपर रखा था ॥ ५ ॥
ततो दिव्यानि वस्त्राणि दिव्यान्याभरणानि च प्रादाच्छक्रो ममैतानि रुचिराणि बृहन्ति च ॥ ६ ॥
तत्पश्चात् देवराजने मुझे ये मनोहर एवं विशाल दिव्य वस्त्र तथा दिव्य आभूषण दिये ॥ ६ ॥
पृष्ठ 1182
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
एवं सम्पूजितस्तत्र सुखमस्म्युषितो नृप इन्द्रस्य भवने पुण्ये गन्धर्वशिशुभिः सह ॥ ७ ॥
महाराज! इस प्रकार सम्मानित होकर मैं उस पवित्र इन्द्रभवनमें गन्धर्वकुमारोंके साथ सुखपूर्वक रहने लगा ॥ ततो मामब्रवीच्छक्रः प्रीतिमानमरैः सह समयोऽर्जुन गन्तुं ते भ्रातरो हि स्मरन्ति ते ॥ ८ ॥
तदनन्तर देवताओंसहित इन्द्रने प्रसन्न होकर मुझसे कहा – ' अर्जुन! अब तुम्हारे जानेका समय आ गया है; क्योंकि तुम्हारे भाई तुम्हें बहुत याद करते हैं ' ॥ ८ ॥
एवमिन्द्रस्य भवने पञ्च वर्षाणि भारत उषितानि मया राजन् स्मरता द्यूतजं कलिम् ॥ ९ ॥
भारत! इस प्रकार द्यूतजनित कलहका स्मरण करते हुए मैंने इन्द्रभवनमें पाँच वर्ष व्यतीत किये हैं ॥ ९ ॥
ततो भवन्तमद्राक्षं भ्रातृभिः परिवारितम् गन्धमादनपादस्य पर्वतस्यास्य मूर्धनि ॥ १० ॥
इसके बाद इस गन्धमादनकी शाखाभूत इस पर्वतके शिखरपर भाइयोंसहित आपका दर्शन किया है ॥ १० ॥
युधिष्ठिर उवाच दिष्ट्या धनंजयास्त्राणि त्वया प्राप्तानि भारत दिष्ट्या चाराधितो राजा देवानामीश्वरः प्रभुः ॥ ११ ॥
दिष्ट्या च भगवान् स्थाणुर्देव्या सह परंतप साक्षाद् दृष्टः स्वयुद्धेन तोषितश्च त्वयानघ ॥ १२ ॥
युधिष्ठिर बोले - धनंजय! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुमने दिव्यास्त्र प्राप्त कर लिये । भारत! यह भी भाग्यकी ही बात है कि तुमने देवताओंके स्वामी राजराजेश्वर इन्द्रको आराधनाद्वारा प्रसन्न कर लिया । निष्पाप परंतप! सबसे बड़ी सौभाग्यकी बात तो यह है कि तुमने देवी पार्वतीके साथ साक्षात् भगवान् शंकरका दर्शन किया और उन्हें अपनी युद्धकलासे संतुष्ट कर लिया ॥ ११-१२ ॥ दिष्ट्या च लोकपालैस्त्वं समेतो भरतर्षभ दिष्ट्या वर्धामहे पार्थ दिष्ट्यासि पुनरागतः ॥ १३ ॥
भरतश्रेष्ठ! समस्त लोकपालोंके साथ तुम्हारी भेंट हुई, यह भी हमारे लिये सौभाग्यका सूचक है । हमारा अहोभाग्य है कि हम उन्नतिके पथपर अग्रसर हो रहे हैं । अर्जुन! हमारे भाग्यसे ही तुम पुनः हमारे पास लौट आये ॥ १३ ॥
अद्य कृत्स्नां महीं देवीं विजितां पुरमालिनीम्
पृष्ठ 1183
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
मन्ये च धृतराष्ट्रस्य पुत्रानपि वशीकृतान् ॥ १४ ॥
आज मुझे यह विश्वास हो गया कि हम नगरोंसे सुशोभित समूची वसुधादेवीको जीत लेंगे । अब हम धृतराष्ट्रके पुत्रोंको भी अपने वशमें पड़ा हुआ ही मानते हैं ॥ १४ ॥
इच्छामि तानि चास्त्राणि द्रष्टुं दिव्यानि भारत यैस्तथा वीर्यवन्तस्ते निवीतकवचा हतः ॥ १५ ॥
भारत! अब मेरी इच्छा उन दिव्यास्त्रोंको देखनेकी हो रही है, जिनके द्वारा तुमने उस प्रकारके उन महापराक्रमी निवातकवचोंका विनाश किया है ॥ १५ ॥
अर्जुनउवाच श्वः प्रभाते भवान् द्रष्टा दिव्यान्यस्त्राणि सर्वशः निवातकवचा घोरा यैर्मया विनिपातिताः ॥ १६ ॥
अर्जुन बोले — महाराज! कल सबेरे आप उन सब दिव्यास्त्रोंको देखियेगा जिनके द्वारा मैंने भयानक निवातकवचोंको मार गिराया है ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच एवमागमनं तत्र कथयित्वा धनंजयः भ्रातृभिः सहितः सर्वै रजनीं तामुवास ह ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार अपने आगमनका वृत्तान्त सुनाकर सब भाइयोंसहित अर्जुनने वहाँ वह रात व्यतीत की ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि अस्त्रदर्शनसंकेते चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें अस्त्रदर्शनके लिये संकेतविषयक एक सौ चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७४ ॥
P
पृष्ठ 1184
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः नारद आदिका अर्जुनको दिव्यास्त्रोंके प्रदर्शनसे रोकना वैशम्पायन उवाच तस्यां रात्र्यां व्यतीतायां धर्मराजो युधिष्ठिरः उत्थायावश्यकार्याणि'कृतवान् भ्रातृभिः सह ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! जब वह रात बीत गयी तब धर्मराज युधिष्ठिरने भाइयोंसहित उठकर आवश्यक नित्यकर्म पूरे किये ॥ १ ॥
ततः संचोदयामास सोऽर्जुनं भ्रातृनन्दनम् दर्शयास्त्राणि कौन्तेय यैर्जिता दानवास्त्वया ॥ २ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने भाइयोंको सुख पहुँचानेवाले अर्जुनको आज्ञा दी -' कुन्तीनन्दन! अब तुम उन दिव्यास्त्रोंका दर्शन कराओ जिनसे तुमने दानवोंपर विजय पायी है ' ॥ २ ॥
ततो धनंजयो राजन् देवैर्दत्तानि पाण्डवः अस्त्राणि तानि दिव्यानि दर्शयामास भारत ॥ ३ ॥
राजन्! तब पाण्डुनन्दन अर्जुनने देवताओंके दिये हुए उन दिव्य अस्त्रोंको दिखानेका आयोजन किया ॥ ३ ॥
यथान्यायं महातेजाः शौचं परममास्थितः ( नमस्कृत्य त्रिनेत्राय वासवाय च पाण्डवः । ) गिरिकूबरपादाक्षं शुभवेणु त्रिवेणुमत् ॥ ४ ॥
पार्थिवं रथमास्थाय शोभमानो धनंजयः दिव्येन संवृतस्तेन कवचेन सुवर्चसा ॥ ५ ॥
धनुरादाय गाण्डीवं देवदत्तं स वारिजम् शोशुभ्यमानः कौन्तेय आनुपूर्व्यान्महाभूजः ॥ ६ ॥
अस्त्राणि तानि दिव्यानि दर्शनायोपचक्रमे अथ प्रयोक्ष्यमाणेषु दिव्येष्वस्त्रेषु तेषु वै ॥ ७ ॥
समाक्रान्ता मही पद्भयां समकम्पत सद्रुमा क्षुभिताः सरितश्चैव तथैव च महोदधिः ॥ ८ ॥
महातेजस्वी अर्जुन पहले तो विधिपूर्वक स्नान करके शुद्ध हुए । फिर त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर और इन्द्रको नमस्कार करके उन्होंने वह अत्यन्त तेजस्वी दिव्य कवच धारण किया । तत्पश्चात् वे पृथ्वीरूपी रथपर आरूढ़ हो बड़ी शोभा पाने लगे । पर्वत ही उस रथका कूबर था, दोनों पैर ही पहिये थे और सुन्दर बाँसोंका वन ही त्रिवेणु (रथके अंगविशेष ) -का काम देता था । तदनन्तर महाबाहु कुन्तीनन्दन अर्जुनने एक हाथमें गाण्डीव धनुष और
पृष्ठ 1185
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दूसरेमें देवदत्त शंख ले लिया । इस प्रकार वीरोचित वेशसे सुशोभित हो उन्होंने क्रमशः उन दिव्यास्त्रोंको दिखाना आरम्भ किया । जिस समय उन दिव्यास्त्रोंका प्रयोग प्रारम्भ होने जा रहा था, उसी समय अर्जुनके पैरोंसे दबी हुई पृथ्वी वृक्षोंसहित काँपने लगी । नदियों और समुद्रोंमें उफान आ गया ॥ ४–८ ॥ शैलाश्चापि व्यदीर्यन्त न ववौ च समीरणः न बभासे सहस्रांशुर्न जज्वाल च पावकः ॥ ९ ॥
पर्वत विदीर्ण होने लगे और हवाकी गति रुक गयी । सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी और आगका जलना बंद हो गया ॥ ९ ॥
न वेदाः प्रतिभान्ति स्म द्विजातीनां कथंचन अन्तर्भूमिगता ये च प्राणिनो जनमेजय ॥ १० ॥
पीड्यमानाः समुत्थाय पाण्डवं पर्यवारयन् वेपमानाः प्राञ्जलयस्ते सर्वे विकृताननाः ॥ ११ ॥
दह्यमानास्तदास्त्रैस्ते याचन्ति स्म धनंजयम् ततो ब्रह्मर्षयश्चैव सिद्धा ये च महर्षयः ॥ १२ ॥
जङ्गमानि च भूतानि सर्वाण्येवावतस्थिरे देवर्षयश्च प्रवरास्तथैव च दिवौकसः ॥ १३ ॥
यक्षराक्षसगन्धर्वास्तथैव च पतत्त्रिणः खेचराणि च भूतानि सर्वाण्येवावतस्थिरे ॥ १४ ॥
द्विजातियोंको किसी प्रकार भी वेदोंका भान नहीं हो पाता था । जनमेजय! भूमिके भीतर जो प्राणी निवास करते थे, वे भी पीड़ित हो उठे और अर्जुनको सब ओरसे घेरकर खड़े हो गये । उन सबके मुखपर विकृति आ गयी थी । वे हाथ जोड़े हुए थर- थर काँप रहे थे और अस्त्रोंके तेजसे संतप्त हो धनंजयसे प्राणोंकी भिक्षा माँग रहे थे । इसी समय ब्रह्मर्षि, सिद्ध महर्षि, समस्त जंगम प्राणी, श्रेष्ठ देवर्षि, देवता, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, पक्षी तथा आकाशचारी प्राणी सभी वहाँ आकर उपस्थित हो गये ॥ १०–१४ ॥ ततः पितामहश्चैव लोकपालाश्च सर्वशः भगवांश्च महादेवः सगणोऽभ्याययौ तदा ॥ १५ ॥
इसके बाद ब्रह्माजी, समस्त लोकपाल तथा भगवान् महादेव अपने गणोंसहित वहाँ आये ॥ १५ ॥
ततो वायुर्महाराज दिव्यैर्माल्यैः सुगन्धिभिः अभितः पाण्डवं चित्रैरवचक्रे समन्ततः ॥ १६ ॥
महाराज! तदनन्तर वायुदेव पाण्डुनन्दन अर्जुनपर सब ओरसे विचित्र सुगन्धित दिव्य मालाओंकी वृष्टि करने लगे ॥ १६ ॥
जगुश्च गाथा विविधा गन्धर्वाः सुरचोदिताः
पृष्ठ 1186
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ननृतुः सङ्घशश्चैव राजन्नप्सरसां गणाः ॥ १७ ॥
राजन्! देवप्रेरित गन्धर्व नाना प्रकारकी गाथाएँ गाने लगे और झुंड-की - झुंड अप्सराएँ नृत्य करने लगीं ॥ १७ ॥
तस्मिंश्च तादृशे काले नारदश्चोदितः सुरैः आगम्याह वचः पार्थं श्रवणीयमिदं नृप ॥ १८ ॥
अर्जुनार्जुन मा युङ्क्ष्व दिव्यान्यस्त्राणि भारत नैतानि निरधिष्ठाने प्रयुज्यन्ते कथंचन ॥ १ ९ ॥ नराधिप! उस समय देवताओंके कहनेसे देवर्षि नारद अर्जुनके पास आये और उनसे यह सुननेयोग्य बात कहने लगे- ' अर्जुन! अर्जुन! इस समय दिव्यास्त्रोंका प्रयोग न करो । भारत! ये दिव्य अस्त्र किसी लक्ष्यके बिना कदापि नहीं छोड़े जाते ॥ १८-१९ ॥ अधिष्ठाने न वाऽनार्तः प्रयुञ्जीत कदाचन प्रयोगेषु महान् दोषो ह्यस्त्राणां कुरुनन्दन ॥ २० ॥
‘ कोई लक्ष्य मिल जाय तो भी ऐसा मनुष्य कभी इनका प्रयोग न करे, जो स्वयं संकटमें न पड़ा हो । कुरुनन्दन! इन दिव्यास्त्रोंका अनुचितरूपमें प्रयोग करनेपर महान् दोष प्राप्त होता है ॥ २० ॥
एतानि रक्ष्यमाणानि धनंजय यथागमम्
पृष्ठ 1187
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
बलवन्ति सुखार्हाणि भविष्यन्ति न संशयः ॥ २१ ॥
‘ धनंजय! शास्त्रके अनुसार सुरक्षित रखे जानेपर ही ये अस्त्र सबल और सुखदायक होते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ २१ ॥
अरक्ष्यमाणान्येतानि त्रैलोक्यस्यापि पाण्डव भवन्ति स्म विनाशाय मैवं भूयः कृथाः क्वचित् ॥ २२ ॥
अजातशत्रो त्वं चैव द्रक्ष्यसे तानि संयुगे योज्यमानानि पार्थेन द्विषतामवमर्दने ॥ २३ ॥
' पाण्डुपुत्र! इनकी समुचित रक्षा न होनेपर ये दिव्यास्त्र तीनों लोकोंके विनाशके कारण बन जाते हैं । अतः फिर कभी इस तरह इनके प्रदर्शनका साहस न करना । अजातशत्रु युधिष्ठिर! ( आप भी इस समय इन्हें देखनेका आग्रह छोड़ दें । ) जब रणक्षेत्रमें शत्रुओंके संहारका अवसर आयगा, उस समय अर्जुनके द्वारा प्रयोगमें लाये जानेपर इन दिव्यास्त्रोंका दर्शन कीजियेगा ' ॥ २२-२३ ॥ वैशम्पायन उवाच निवार्याथ ततः पार्थं सर्वे देवा यथागतम् जग्मुरन्ये च ये तत्र समाजग्मुर्नरर्षभ ॥ २४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - नरश्रेष्ठ! इस प्रकार अर्जुनको दिव्यास्त्रोंके प्रदर्शनसे रोककर सम्पूर्ण देवता तथा अन्य सभी प्राणी जैसे आये थे वैसे लौट गये ॥ तेषु सर्वेषु कौरव्य प्रतियातेषु पाण्डवाः तस्मिन्नेव वने हृकास्त ऊषुः सह कृष्णया ॥ २५ ॥
कुरुनन्दन! उन सबके चले जानेपर सब पाण्डव द्रौपदीके साथ बड़े हर्षपूर्वक उसी वनमें रहने लगे ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि निवातकवचयुद्धपर्वणि अस्त्रदर्शने पञ्चसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत निवातकवचयुद्धपर्वमें अस्त्रदर्शनविषयक एक सौ पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७५ ॥
पृष्ठ 1188
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
(आजगरपर्व) षट्सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः भीमसेनकी युधिष्ठिरसे बातचीत और पाण्डवोंका गन्धमादनसे प्रस्थान जनमेजय उवाच तस्मिन् कृतास्त्रे रथिनां प्रवीरे प्रत्यागते भवनाद् वृत्रहन्तुः अतः परं किमकुर्वन्त पार्थाः समेत्य शूरेण धनंजयेन ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा– भगवन्! रथियोंमें श्रेष्ठ महावीर अर्जुन जब इन्द्रभवनसे दिव्यास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करके लौट आये, तब उनसे मिलकर कुन्तीकुमारोंने पुनः कौन - सा कार्य किया? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच वनेषु तेष्वेव तु ते नरेन्द्राः सहार्जुनेनेन्द्रसमेन वीराः तस्मिंश्च शैलप्रवरे सुरम्ये धनेश्वराक्रीडगता विजहुः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी बोले – राजन्! वे नरश्रेष्ठ वीर पाण्डव इन्द्रतुल्य पराक्रमी अर्जुनके साथ उस परम रमणीय शैलशिखरपर कुबेरकी क्रीड़ाभूमिके अन्तर्गत उन्हीं वनोंमें सुखसे विहार करने लगे ॥ २ ॥
वेश्मानि तान्यप्रतिमानि पश्चन् क्रीडाश्च नानाद्रुमसंनिबद्धाः चचार धन्वी'बहुधा नरेन्द्रः सोऽस्त्रेषु यत्तः सततं किरीटी ॥ ३ ॥
वहाँ कुबेरके अनुपम भवन बने हुए थे । नाना प्रकारके वृक्षोंके निकट अनेक प्रकारके खेल होते रहते थे । उन सबको देखते हुए किरीटधारी अर्जुन बहुधा वहाँ विचरा करते और हाथमें धनुष लेकर सदा अस्त्रोंके अभ्यासमें संलग्न रहते थे ॥ ३ ॥
पृष्ठ 1189
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अवाप्य वासं नरदेवपुत्राः प्रसादजं वैश्रवणस्य राज्ञः न प्राणिनां ते स्पृहयन्ति राजन् शिवश्च कालः स बभूव तेषाम् ॥ ४ ॥
राजन्! राजकुमार पाण्डवोंको राजाधिराज कुबेरकी कृपासे वहाँका निवास प्राप्त हुआ
था । वे वहाँ रहकर भूतलके अन्य प्राणियोंके ऐश्वर्य- सुखकी अभिलाषा नहीं रखते थे ।
उनका वह समय बड़े सुखसे बीत रहा था ॥
समेत्य पार्थेन यथैकरात्र- मूषुः समास्तत्र तदा चतस्रः पूर्वाश्च षट् ता दश पाण्डवानां शिवा बभूवुर्वसतां वनेषु ॥ ५ ॥
वे अर्जुनके साथ वहाँ चार वर्षोंतक रहे, परंतु उनको वह समय एक रातके समान ही प्रतीत हुआ। पहलेके छः वर्ष तथा वहाँके चार वर्ष इस प्रकार सब मिलाकर पाण्डवोंके वनवासके दस वर्ष आनन्दपूर्वक बीत गये ॥ ५ ॥
ततोऽब्रवीद् वायुसुतस्तरस्वी जिष्णुश्च राजानमुपोपविश्य यमौ च वीरौ सुरराजकल्पा- वेकान्तमास्थाय हितं प्रियं च ॥ ६ ॥
तदनन्तर एक दिन अर्जुन तथा वीरवर नकुल सहदेव, जो देवराजके समान पराक्रमी थे, एकान्तमें राजा युधिष्ठिरके पास बैठे थे । उस समय वेगशाली वायुपुत्र भीमसेन यह हितकर एवं प्रिय वचन बोले-I ॥ ६ ॥
तव प्रतिज्ञां कुरुराज सत्यां चिकीर्षमाणास्तदनु प्रियं च ततो न गच्छाम वनान्यपास्य सुयोधनं सानुचरं निहन्तुम् ॥ ७ ॥
'कुरुराज! आपकी प्रतिज्ञाको सत्य करनेकी इच्छासे और आपका प्रिय करनेकी अभिलाषा रखनेके कारण हमलोग यह वनवास छोड़कर दुर्योधनका अनुचरोंसहित वध करने नहीं जा रहे हैं ॥ ७ ॥
एकादशं वर्षमिदं वसामः सुयोधनेनात्तसुखाः सुखार्हाः तं वञ्चयित्वाधमबुद्धिशील- मज्ञातवासं सुखमाप्नुयाम ॥ ८ ॥
पृष्ठ 1190
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
' अब हमारे निवासका यह ग्यारहवाँ वर्ष चल रहा है । हमलोग सुख भोगनेके अधिकारी थे, परन्तु दुर्योधनने हमारा सुख छीन लिया । उसकी बुद्धि तथा स्वभाव अत्यन्त अधम है । उस दुष्टको धोखा देकर हम अपने अज्ञातवासका समय भी सुखपूर्वक बिता लेंगे ॥ ८ ॥
तवाज्ञया पार्थिव निर्विशङ्का विहाय मानं विचरन् वनानि समीपवासेन विलोभितास्ते ज्ञास्यन्ति नास्मानपकृष्टदेशान् ॥ ९ ॥
‘ भूपशिरोमणे! आपकी आज्ञासे हम मानापमानका विचार छोड़कर निःशंक हो वनमें विचरते रहेंगे । पहले किसी निकटवर्ती स्थानमें रहकर दुर्योधन आदिके मनमें वहीं खोज करनेका लोभ उत्पन्न करेंगे और फिर वहाँसे दूर देशमें चले जायँगे, जिससे उन्हें हमारा पता न लग सकेगा ॥ ९ ॥
संवत्सरं तत्र विहृत्य गूढं नराधमं तं सुखमुद्धरेम निर्यात्य वैरं सफलं सपुष्पं तस्मै नरेन्द्राधमपूरुषाय ॥ १० ॥
सुयोधनायानुचरैर्वृताय ततो महीमावस धर्मराज स्वर्गोपमं देशमिमं चरद्भिः शक्यो विहन्तुं नरदेव शोकः ॥ ११ ॥
‘ वहाँ एक वर्षतक गुप्तरूपसे निवास करके जब हम लौटेंगे, तब अनायास ही उस नराधम दुर्योधनकी जड़ उखाड़ देंगे। नरेन्द्र! नीच दुर्योधन आज अपने अनुचरोंसे घिरकर सुखी हो रहा है । उसने जो वैरका वृक्ष लगा रखा है, उसे हम फल- फूलसहित उखाड़ फेकेंगे और उससे वैरका बदला लेंगे । अतः धर्मराज! आप यहाँसे चलकर पृथ्वीपर निवास करें । नरदेव! इसमें संदेह नहीं कि हमलोग इस स्वर्गतुल्य प्रदेशमें विचरते रहनेपर भी अपना सारा शोक अनायास ही निवृत्त कर सकते हैं ॥ १०-११ ॥ कीर्तिस्तु ते भारत पुण्यगन्धा नश्येद्धि लोकेषु चराचरेषु तत् प्राप्य राज्यं कुरुपुङ्गवानां शक्यं महत् प्राप्तुमथ क्रियाश्च ॥ १२ ॥
इदं तु शक्यं सततं नरेन्द्र प्राप्तुं त्वया यल्लभसे कुबेरात् कुरुष्व बुद्धिं द्विषतां वधाय कृतागसां भारत निग्रहे च ॥ १३ ॥