महाभारत — खण्ड २
Mahabharata - 2 · Gita Press, Gorakhpur · 2580 पृष्ठ · 258 खण्ड
विषय सूची
- । श्रीहरिः । 33 श्रीमन्महर्षि वेदव्यासप्रणीत महाभारत ( द्वितीय खण्ड ) वनपर्व और विराटपर्व, सचित्र, सरल हिन्दी अनुवादसहित गीताप्रेसगोरखपुरGITA PRESS,… 1–10
- १२४- शर्यातिके यज्ञमें च्यवनका इन्द्रपर कोप करके वज्रको स्तम्भित करना और उसे मारनेके लिये मदासुरको उत्पन्न करना १२५- अश्विनीकुमारोंका यज्ञमें भाग स्वीकार… 11–20
- ३११- ब्राह्मणकी अरणि एवं मन्थन - काष्ठका पता लगानेके लिये पाण्डवोंका मृगके पीछे दौड़ना और दुःखी होना ३१२- पानी लानेके लिये गये हुए नकुल आदि चार भाइयोंका… 21–30
- पुरवासी बोले- अहो! हमारा यह समस्त कुल, हम तथा हमारे घर-द्वार अब सुरक्षित नहीं हैं; क्योंकि यहाँ पापात्मा दुर्योधन सुबलपुत्र शकुनिसे पालित हो कर्ण और… 31–40
- मनसो दुःखमूलं तु स्नेह इत्युपलभ्यते । स्नेहात् तु सज्जते जन्तुर्दुःखयोगमुपैति च । २७ । ' मनके दुःखका मूल कारण क्या है? इसका पता लगानेपर ' स्नेह ' (… 41–50
- अपनी किरणोंसे पृथ्वीका रस (जल ) खींचा और दक्षिणायनमें लौटकर पृथ्वीको उस रससे आविष्ट किया । ५-६ । क्षेत्रभूते ततस्तस्मिन्नोषधीरोषधीपतिः… 51–60
- गीताप्रेस गोरखपुर पाण्डवोंका वनगमन C गीताप्रेस गोरखपुर उर्वशीका अर्जुनकोशाप देना COOK गीताप्रेस गोरखपुर नलका अपने पूर्वरूपमें प्रकट होकर दमयन्तीसे मिलना… 61–70
- यज्ञियार्थाः प्रवर्तन्ते विधिमन्त्रप्रमाणतः । ८५ । युधिष्ठिरको भोजन कराकर द्रौपदी शेष अन्न स्वयं खाती थी… 71–80
- तद् वै तस्मै न रुचामभ्युपैति ततश्चाहं क्षेममन्यन्न मन्ये । १३ । तब मैंने भी ऐसी बातें बतायीं जो सर्वथा उचित तथा कौरववंश एवं धृतराष्ट्रके लिये भी हितकर और… 81–90
- आगमिष्यन्ति चेन्मोहात् पुनर्द्यूतेन तान् जय । १३ । धीरबुद्धि पाण्डव निश्चित समयकी अवधिको पूर्ण किये बिना यहाँ नहीं आयँगे; और यदि वे मोहवश आ भी जायँ तो तुम… 91–100
- ततोऽहं त्वामनुप्राप्तः कौरवाणामवेक्षया । सदा ह्यभ्यधिकः स्नेहः प्रीतिश्च त्वयि मे प्रभो । १४ । यह सुनकर मैं कौरवोंकी दशा देखनेके लिये तुम्हारे पास आया हूँ… 101–110
- ' युधिष्ठिर! यदि पहले बकासुरने भीमसेनको छोड़ दिया, तो आज मैं तुम्हारे देखते-देखते इसे खा जाऊँगा । ३६ । एनं हि विपुलप्राणमद्य हत्वा वृकोदरम्… 111–120
- सम्पूर्ण लोकोंपर विजय पानेवाले आप लोकेश्वर प्रभुने वह कर्म करके सामना करनेके लिये आये हुए समस्त दैत्यों और दानवोंका युद्धस्थलमें वध किया । १ ९… 121–130
- मातासहित पाण्डवोंको वहाँ धरतीपर सोते देख कामसे पीड़ित हो उस राक्षसीने भीमसेनकी कामना की । ९ ५ । भीमस्य पादौ कृत्वा तु स्व उत्सङ्गे ततोऽबला… 131–140
- चतुर्दशोऽध्यायः द्यूतके समय न पहुँचनेमें श्रीकृष्णके द्वारा शाल्वके साथ युद्ध करने और सौभविमानसहित उसे नष्ट करनेका संक्षिप्त वर्णन युधिष्ठिर उवाच… 141–150
- नरश्रेष्ठ! राजा शाल्वकी वह सेना सब प्रकारके आयुधोंसे सम्पन्न, सम्पूर्ण अस्त्र- शस्त्रोंके संचालनमें निपुण, रथ, हाथी और घोड़ोंसे भरी हुई तथा पैदल सिपाहियों… 151–160
- अष्टादशोऽध्यायः मूर्च्छावस्थामें सारथिके द्वारा रणभूमिसे बाहर लाये जानेपर प्रद्युम्नका अनुताप और इसके लिये सारथिको उपालम्भ देना वासुदेव उवाच… 161–170
- अप्रमादः सदा कार्यो नगरे यादवर्षभाः । ८ । भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर मैं नगरनिवासियोंको आश्वासन देकर राजा उग्रसेन, पिता वसुदेव तथा सम्पूर्ण वृष्णिवंशियोंका हर्ष… 171–180
- द्वाविंशोऽध्यायः शाल्ववधोपाख्यानकी समाप्ति और युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर श्रीकृष्ण, धृष्टद्युम्न तथा अन्य सब राजाओंका अपने- अपने नगरको प्रस्थान वासुदेव उवाच… 181–190
- धारा बह रही थी और वे वियोगके भयसे भीत हो हा नाथ! हा धर्म! इस प्रकार पुकारते हुए कह रहे थे — ‘ कुरुवंशके श्रेष्ठ अधिपति, प्रजाजनोंपर पिताका- सा स्नेह… 191–200
- गिरेः पुरा ऋष्यमूकस्य सानौ । ९ । कुन्तीनन्दन! प्राचीनकालकी बात है राजा रामचन्द्रजी भी अपने पिताकी आज्ञासे ही केवल धनुष हाथमें लिये लक्ष्मणके साथ वनमें… 201–210
- तं ते वनगतं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते । विविध सवारियाँ और नाना प्रकारके वस्त्रोंसे जिनका सत्कार होता था, उन्हीं भीमसेनको वनमें कष्ट उठाते देख… 211–220
- आत्मानमपि च क्रुद्धः प्रेषयेद् यमसादनम् । ६ । क्रोधवश वह अवध्य पुरुषोंकी भी हत्या कर सकता है और वधके योग्य मनुष्योंकी भी पूजामें तत्पर हो सकता है… 221–230
- ब्राह्मणाः सर्वकामैस्ते सततं पार्थ तर्पिताः । यतयो मोक्षिणश्चैव गृहस्थाश्चैव भारत । १२ । भुञ्जते रुक्मपात्रीभिर्यत्राहं परिचारिका… 231–240
- रक्ष्याण्येतानि देवानां गूढमाया हि देवताः । कृताशाश्च व्रताशाश्च तपसा दग्धकिल्बिषाः । प्रसादैर्मानसैर्युक्ताः पश्यन्त्येतानि वै द्विजाः । ३७… 241–250
- तत्र सिद्धिर्गतिः प्रोक्ता कालावस्थाविभागतः । ५ ९ । भारत! लोकको इसी प्रकार कार्यसिद्धि प्राप्त होती है - कार्यसिद्धिकी यही व्यवस्था है… 251–260
- ‘ आत्मबल ही धनका मूल है, इसके विपरीत जो कुछ है, वह मिथ्या है; क्योंकि हेमन्त-ऋतुमें वृक्षोंकी छायाके समान वह आत्माकी दुर्बलता किसी भी कामकी नहीं है । ६४… 261–270
- पञ्चत्रिंशोऽध्यायः दुःखित भीमसेनका युधिष्ठिरको युद्धके लिये उत्साहित करना भीमसेन उवाच संधिं कृत्वैव कालेन ह्यन्तकेन पतत्त्रिणा… 271–280
- ‘ मेरी दी हुई इस प्रतिस्मृति नामक विद्याको ग्रहण करो, जो मूर्तिमती सिद्धिके समान है । तुम मेरे शरणागत हो, इसलिये मैं तुम्हें इस विद्याका उपदेश करता हूँ… 281–290
- न लोभान्न पुनः कामान्न देवत्वं पुनः सुखम् । न च सर्वामरैश्वर्यं कामये त्रिदशाधिप । ५४ । भ्रातॄंस्तान् विपिने त्यक्त्वा वैरमप्रतियात्य च… 291–300
- ‘ वीर! तुम हमारे लिये वनके निकट आनेके कारण भय न करो । हम तो वनवासी हैं, अतः हमारे लिये इस भूमिपर विचरना सदा उचित ही है । २३… 301–310
- न मे स्यादपराधोऽयं महादेवातिसाहसात् । कृतो मयायमज्ञानाद् विमर्दो यस्त्वया सह । शरणं प्रतिपन्नाय तत् क्षमस्वाद्य शंकर । ८२… 311–320
- ' शत्रुओंका संहार करनेवाले कुन्तीकुमार! देवताओं, दानवों तथा राक्षसोंके जो अंश पृथ्वीपर उत्पन्न हुए हैं, वे युद्धमें तुम्हारे द्वारा मारे जाकर अपने… 321–330
- ततो ददर्श शक्रस्य पुरीं ताममरावतीम् । ४२ । इस प्रकार महायशस्वी पार्थने स्वर्गलोकमें विचरते हुए आगे जाकर इन्द्रपुरी अमरावतीका दर्शन किया । ४२… 331–340
- ‘ जैसे अस्त्रविद्या सीख लेनेके पश्चात् अर्जुनको मेरी आज्ञासे तुमने संगीतविद्याद्वारा सम्मानित किया है, उसी प्रकार वे स्त्रीसंगविशारद हो सकें, ऐसा प्रयत्न… 341–350
- उर्वश्युवाच तव पित्राभ्यनुज्ञातां स्वयं च गृहमागताम् । यस्मान्मां नाभिनन्देथाः कामबाणवशंगताम् । ४ ९ । तस्मात् त्वं नर्तनः पार्थ स्त्रीमध्ये मानवर्जितः… 351–360
- मैं दिन- रात विचार करनेपर भी यह नहीं समझ पाता कि युद्धमें ‘ गाण्डीवधन्वा ’ अर्जुनका सामना कौन रथी कर सकता है? । ८… 361–370
- स्थास्येते सिंहविक्रान्तावश्विनाविव दुःसहौ । ७ । न शेषमिह पश्यामि मम सैन्यस्य संजय । तौ प्रतिरथो युद्धे देवपुत्रौ महारथौ । ८… 371–380
- ‘ मैं ऐसा कोई देश या स्थान नहीं देखता, जहाँ अत्यन्त दुष्टचित्त, दुरात्मा दुर्योधन अपने गुप्तचरोंद्वारा हमलोगोंका पता न लगा ले… 381–390
- एवमुक्ता तु हंसेन दमयन्ती विशाम्पते । ३१ । अब्रवीत् तत्र तं हंसं त्वमप्येवं नले वद । तथेत्युक्त्वाण्डजः कन्यां विदर्भस्य विशाम्पते… 391–400
- षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः नलका दमयन्तीसे वार्तालाप करना और लौटकर देवताओंको उसका संदेश सुनाना बृहदश्वउवाच सा नमस्कृत्य देवेभ्यः प्रहस्य नलमब्रवीत्… 401–410
- छायाद्वितीयो म्लानस्रग्रजःस्वेदसमन्वितः । भूमिष्ठो नैषधश्चैव निमेषेण च सूचितः । २५ । उन पाँचोंमें एक पुरुष ऐसे हैं, जिनकी परछाईं पड़ रही है… 411–420
- 04 राजन् पौरजनो द्वारि त्वां दिदृक्षुरवस्थितः । मन्त्रिभिः सहितः सर्वै राजभक्तिपुरस्कृतः । १५ । तं द्रष्टुमर्हसीत्येवं पुनः पुनरभाषत… 421–430
- उद्वेजते मे हृदयं सीदन्त्यङ्गानि सर्वशः । तव पार्थिव संकल्पं चिन्तयन्त्याः पुनः पुनः । २६ । हृतराज्यं हृतद्रव्यं विवस्त्रं क्षुच्छ्रमान्वितम्… 431–440
- हा नाथ मामिह वने ग्रस्यमानामनाथवत् । ग्राहेणानेन विजने किमर्थं नानुधावसि । २३ । (वह विलाप करती हुई कहने लगी- ) ' हा नाथ! इस निर्जन वनमें यह अजगर सर्प मुझे… 441–450
- भवान् मृगाणामधिपस्त्वमस्मिन् कानने प्रभुः । ३२ । वह वनका राजा कान्तिमान् सिंह मेरे सामने चला आ रहा है, इसके चार दाढ़ें और विशाल ठोड़ी है… 451–460
- समूह स्वच्छ जलसे सुशोभित एक सुन्दर रमणीय नदीको पार कर रहा था । नदीका जल बहुत ठंडा था । उसका पाट चौड़ा था… 461–470
- पुरवासियोंने उसे उन्मत्ताकी भाँति जाते देखा । चेदिनरेशकी राजधानीमें उसे प्रवेश करते देख उस समय बहुत से ग्रामीण बालक कौतूहलवश उसके साथ हो लिये थे… 471–480
- सप्तषष्टितमोऽध्यायः राजा नलका ऋतुपर्णके यहाँ अश्वाध्यक्षके पदपर नियुक्त होना और वहाँ दमयन्तीके लिये निरन्तर चिन्तित रहना तथा उनकी जीवलसे बातचीत… 481–490
- GEIL ततः सुदेवमानाय्य राजमाता विशाम्पते । पप्रच्छ भार्या कस्येयं सुता वा कस्य भाविनी । ३६ । कथं च नष्टा ज्ञातिभ्यो भर्तुर्वा वामलोचना… 491–500
- सप्ततितमोऽध्यायः पर्णादका दमयन्तीसे बाहुकरूपधारी नलका समाचार बताना और दमयन्तीका ऋतुपर्णके यहाँ सुदेव नामक ब्राह्मणको स्वयंवरका संदेश देकर भेजना… 501–510
- ‘ इसके शरीरकी रूपहीनताको लक्ष्य करके मेरी बुद्धिमें यह भेद नहीं पैदा होता कि यह नल नहीं है, परंतु राजा नलकी जो मोटाई है, उससे यह कुछ दुबला- पतला है… 511–520
- स तु राज्ञा समागम्य विदर्भपतिना तदा । २१ । अकस्मात् सहसा प्राप्तं स्त्रीमन्त्रं न स्म विन्दति । भूपाल ऋतुपर्ण रमणीय कुण्डिनपुरमें ठहर गये… 521–530
- दमयन्तीके ऐसा कहनेपर केशिनी पुनः वहाँ गयी और अश्वविद्याविशारद बाहुकके लक्षणोंका अवलोकन करके वह फिर लौट आयी । ६३… 531–540
- तथा ब्रुवति वायौ तु पुष्पवृष्टिः पपात ह । देवदुन्दुभयो नेदुर्ववौ च पवनः शिवः । ४० । वायुदेवके ऐसा कहते समय आकाशसे फूलोंकी वर्षा हो रही थी, देवताओंकी… 541–550
- Humay स तथा सत्कृतो राज्ञा मासमुष्य तदा नृप । प्रययौ पुष्करो हृष्टःस्वपुरं स्वजनावृतः । २ ९ । महत्या सेनया सार्धं विनीतैः परिचारकैः… 551–560
- पश्यामि च दिशः सर्वास्तिमिरेणावृता इव । जिन महाबाहु अर्जुनका आश्रय लेकर पाञ्चाल और कुरुवंशके वीर युद्धके लिये उद्यत देवताओंकी सेनाका सामना करनेसे भी भयभीत… 561–570
- सिद्धिं समभिसम्प्राप्ताः पुण्येन महतान्विताः । २६ । महाभाग! पुष्करमें पहले देवता तथा ऋषि महान् पुण्यसे सम्पन्न हो सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं । २६… 571–580
- दीर्घसत्रमुपासन्ते दीक्षिता नियतव्रताः । १० ९ । वे नियमपूर्वक व्रतका पालन करते हुए दीक्षा लेकर दीर्घसत्रकी उपासना करते हैं । १० ९… 581–590
- भरतवंशी महाराज! वहीं मातृतीर्थ है, जिसमें स्नान करनेवाले पुरुषकी संतति बढती है और वह कभी क्षीण न होनेवाली सम्पत्तिका उपभोग करता है… 591–600
- ‘ अनघ! ब्रह्मा आदि सब देवता आपहीमें दिखायी देते हैं । इस जगत्के करने और करानेवाले सब कुछ आप ही हैं । १२ ९ । त्वत्प्रसादात् सुराः सर्वे मोदन्तीहाकुतोभयाः… 601–610
- चतुरशीतितमोऽध्यायः नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा पुलस्त्यउवाच ततो गच्छेन्महाराज धर्मतीर्थमनुत्तमम् । यत्र धर्मो महाभागस्तप्तवानुत्तमं तपः । १… 611–620
- तत्र दत्तं पितृभ्यस्तु भवत्यक्षयमुच्यते । ८३ । वहाँ तीनों लोकोंमें विख्यात अक्षयवट है । उनके समीप पितरोंके लिये दिया हुआ सब कुछ अक्षय बताया जाता है । ८३… 621–630
- पञ्चाशीतितमोऽध्यायः गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य पुलस्त्य उवाच अथ संध्यां समासाद्य संवेद्यं… 631–640
- भरतनन्दन! यह देवताओंकी संस्कार की हुई यज्ञभूमि है । यहाँ दिया हुआ थोड़ा- सा भी दान महान् होता है । ८२ । न वेदवचनात् तात न लोकवचनादपि… 641–650
- इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि धौम्यतीर्थयात्रायां षडशीतितमोऽध्यायः । ८६ । इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें धौम्यकी… 651–660
- बह्वाश्चर्यं महाराज दृश्यते तत्र पर्वते । पुण्ये स्वर्गोपमे चैव देवर्षिगणसेविते । ८ । राजन्! देवर्षिगणोंसे सेवित वह पुण्यपर्वत स्वर्गके समान सुन्दर एवं… 661–670
- तपसो हि परं नास्ति तपसा विन्दते महत् । १ ९ । ‘ उन्होंने मुझसे कहा— द्विजोत्तम! इसमें संदेह नहीं कि आप घूमते- घामते मनुष्यलोकमें भी जायँगे; अतः मेरे… 671–680
- तत्पश्चात् उन दिव्य और मानव महर्षियोंने उन सबके लिये स्वस्तिवाचन किया । २४ । लोमशस्योपसंगृह्य पादी द्वैपायनस्य च… 681–690
- षण्णवतितमोऽध्यायः इल्वल और वातापिका वर्णन, महर्षि अगस्त्यका पितरोंके उद्धारके लिये विवाह करनेका विचार तथा विदर्भराजका महर्षि अगस्त्यसे एक कन्या पाना… 691–700
- अष्टनवतितमोऽध्यायः धन प्राप्त करनेके लिये अगस्त्यका श्रुतर्वा, ब्रध्नश्व और त्रसदस्यु आदिके पास जाना लोमशउवाच ततो जगाम कौरव्य सोऽगस्त्यो भिक्षितुं वसु… 701–710
- दक्षिणां वै दिशं सर्वां प्लावयन्ती च मातृवत् । पूर्वं शम्भोर्जटाभ्रष्टा समुद्रमहिषी प्रिया । अस्यां नद्यां सुपुण्यायां यथेष्टमवगाह्यताम् । ३३… 711–720
- विभिन्न स्थानोंमें अधिक शोभा पानेवाला महर्षि दधीचका वह मनोरम आश्रम स्वर्गके समान प्रतीत होता था । देवता लोग वहाँ आ पहुँचे । १८… 721–730
- ‘ सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अवध्य महादैत्य बलिको भी आपने ही वामनरूप धारण करके त्रिलोकीके राज्यसे वंचित किया । २३ । असुरश्च महेष्वासो जम्भ इत्यभिविश्रुतः… 731–740
- पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः अगस्त्यजीके द्वारा समुद्रपान और देवताओंका कालेय दैत्योंका वध करके ब्रह्माजीसे समुद्रको पुनः भरनेका उपाय पूछना लोमशउवाच समुद्रं स… 741–750
- वध्यमानास्ततो लोकाः सागरैर्मन्दबुद्धिभिः । ब्रह्माणं शरणं जग्मुः सहिताः सर्वदैवतैः । ७ । मन्दबुद्धि सगरपुत्रोंद्वारा सताये हुए सब लोग सम्पूर्ण देवताओंके… 751–760
- इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायामगस्त्यमाहात्म्यकथने सप्ताधिकशततमोऽध्यायः । १०७… 761–770
- याद करने लगते थे । इस प्रकार बहुत- सी अद्भुत बातें देखकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने लोमशजीसे पुनः इस अद्भुत अवस्थाके विषयमें पूछा… 771–780
- वेश्योवाच ममाश्रमः काश्यपपुत्र रम्य- स्त्रियोजनं शैलमिमं परेण । तत्र स्वधर्मो नाभिवादनं मे न चोदकं पाद्यमुपस्पृशामि । ११… 781–790
- स्मृतानि चित्रोज्ज्वलगन्धवन्ति । ४ । वत्स! जिसे तुम जल समझते थे, वह मद्य था । वह पापजनक और अपेय है, उसे कभी नहीं पीना चाहिये… 791–800
- स्थान हो । ' पाण्डुनन्दन! इस सत्य वाक्यका उच्चारण करते हुए तुम शीघ्रतापूर्वक इस वेदीपर आरूढ़ हो जाओ । २७… 801–810
- सा तु चित्ररथं नाम मार्तिकावतकं नृपम् । ददर्श रेणुका राजन्नागच्छन्ती यदृच्छया । ६ । क्रीडन्तं सलिले दृष्ट्वा सभार्यं पद्ममालिनम्… 811–820
- अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः युधिष्ठिरका विभिन्न तीर्थोंमें होते हुए प्रभासक्षेत्रमें पहुँचकर तपस्यामें प्रवृत्त होना और यादवोंका पाण्डवोंसे मिलना वैशम्पायन… 821–830
- चामीकराभान् क्षितिजान् प्रफुल्लान् । विचित्रवीर्यस्य सुतः सपुत्रः कृत्वा नृशंसं बत पश्यति स्म । १२… 831–840
- श्रीकृष्णको विदा करके धर्मराज युधिष्ठिर लोमशजी, भाइयों और सेवकोंके साथ विदर्भनरेशद्वारा पूजित, उत्तम तीर्थोंवाली पुण्य नदी पयोष्णीके तटपर गये । ३१… 841–850
- त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः अश्विनीकुमारोंकी कृपासे महर्षि च्यवनको सुन्दर रूप और युवावस्थाकी प्राप्ति लोमशउवाच कस्यचित् त्वथ कालस्य त्रिदशावश्विनौ नृप… 851–860
- पञ्चविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः अश्विनीकुमारोंका यज्ञमें भाग स्वीकार कर लेनेपर इन्द्रका संकट--मुक्त होना तथा लोमशजीके द्वारा अन्यान्य तीर्थोंके महत्त्वका वर्णन… 861–870
- तेन द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां महात्मना । वृष्टं सस्यविवृद्ध्यर्थं मिषतो वज्रपाणिनः । ४२ । उन महामना नरेशने बारह वर्षोंतक होनेवाली अनावृष्टिके समय… 871–880
- एकोनत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः कुरुक्षेत्रके द्वारभूत प्लक्षप्रस्रवण नामक यमुनातीर्थ एवं सरस्वतीतीर्थकी महिमा लोमशउवाच अस्मिन् किल स्वयं राजन्निष्टवान् वै… 881–890
- सुपर्णः पक्षिराट् किं त्वं धर्मज्ञश्चास्यसंशयम् । १४ । राजाने कहा —पक्षिश्रेष्ठ! तुम्हारी बातें अत्यन्त कल्याणमय गुणोंसे युक्त हैं… 891–900
- ततो वर्षे द्वादशे श्वेतकेतु- रष्टावक्रं पितुरङ्के निषण्णम् । अपाकर्षद् गृह्य पाणौ रुदन्तं नायं तवाङ्कः पितुरित्युक्तवांश्च । १८… 901–910
- चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः बन्दी और अष्टावक्रका शास्त्रार्थ, बन्दीकी पराजय तथा समङ्गामें स्नानसे अष्टावक्रके अंगोंका सीधा होना अष्टावक्र उवाच अत्रोग्रसेन… 911–920
- लोमशजी कहते हैं — युधिष्ठिर! तदनन्तर महामना वरुणद्वारा पूजित हुए वे समस्त ब्राह्मण ( जो बन्दीद्वारा जलमें डुबोये गये थे, ) सहसा राजा जनकके समीप प्रकट हो… 921–930
- स लब्धकामः पितरं समेत्याथेदमब्रवीत् । ४२ । लोमशजी कहते हैं- राजन्! तब इन्द्रने महातपस्वी यवक्रीतके कथनानुसार उन्हें वर देते हुए कहा — ‘ यवक्रीत! तुम्हारे… 931–940
- बेटा! आज रैभ्यके इस कठोर कर्मसे मुझे पुत्रशोक प्राप्त हुआ है । तुम्हारे बिना मैं इस पृथ्वीपर अपने परम प्रिय प्राणोंका भी परित्याग कर दूँगा । १४… 941–950
- चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः भीमसेनका उत्साह तथा पाण्डवोंका कुलिन्दराज सुबाहुके राज्यमें होते हुए गन्धमादन और हिमालय पर्वतको प्रस्थान युधिष्ठिर उवाच… 951–960
- द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवोंद्वारा गंगाजीकी वन्दना, लोमशजीका नरकासुरके वध और भगवान् वाराहद्वारा वसुधाके उद्धारकी कथा कहना लोमशउवाच द्रष्टारः… 961–970
- त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः गन्धमादनकी यात्राके समय पाण्डवोंका आँधी - पानीसे सामना वैशम्पायन उवाच ते शूरास्ततधन्वानस्तूणवन्तः समार्गणाः… 971–980
- पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष, नर- नारायणाश्रम और… 981–990
- सहस्रपत्रमर्काभं दिव्यं पद्ममुपाहरत् । २ । तदनन्तर ईशानकोणकी ओरसे अकस्मात् वायु चली । उसने सूर्यके समान तेजस्वी एक दिव्य सहस्रदल कमल लाकर वहाँ डाल दिया… 991–1000
- गर्जन - तर्जन वज्रपातकी गड़गड़ाहटके समान था । वे विद्युत्पातके सदृश चञ्चल प्रतीत होते थे । ७६ । बाहुस्वस्तिकविन्यस्तपीनह्रस्वशिरोधरम्… 1001–1010
- अष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः हनुमान्जीका भीमसेनको संक्षेपसे श्रीरामका चरित्र सुनाना हनूमानुवाच हृतदारः सह भ्रात्रा पत्नीं मार्गन् स राघवः… 1011–1020
- दीर्घलाङ्गूलमाविध्य दिशो व्याप्य स्थितः कपिः । तद् रूपं महदालक्ष्य भ्रातुः कौरवनन्दनः । ६ । विसिष्मिये तदा भीमो जहृषे च पुनः पुनः… 1021–1030
- भ्रातृत्वं त्वं पुरस्कृत्य वरं वरय भारत । यदि तावन्मया क्षुद्रा गत्वा वारणसाह्वयम् । ९ । धार्तराष्ट्रा निहन्तव्या यावदेतत् करोम्यहम्… 1031–1040
- व्यगाहत महाबाहुर्नलिनीं तां महाबलः । १३ । वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! सभी राक्षसोंसे ऐसा कहकर अमर्षमें भरे हुए महाबली महाबाहु भीमसेन उस सरोवरमें प्रवेश… 1041–1050
- ' रमणीय पर्वतों और समस्त सरोवरोंमें विशेषतः परम पुण्यमय समुद्रके जलमें इन महात्माओंके साथ भलीभाँति स्नान एवं आचमन किया है । ७… 1051–1060
- इष्टेन च शपे राजन् सूदयिष्यामि राक्षसम् । ५५ । फिर वे युधिष्ठिरसे बोले - ' महाराज! मैं अपनी, सब भाइयोंकी, धर्मकी, पुण्य कर्मों तथा यज्ञकी शपथ खाकर कहता… 1061–1070
- चकोरैः शतपत्रैश्च भृङ्गराजैस्तथा शुकैः । ५२ । कोकिलैः कलविङ्कैश्च हारितैर्जीवजीविकैः । प्रियकैश्चातकैश्चैव तथान्यैर्विविधैः खगैः । ५३… 1071–1080
- भरतकुलभूषण पाण्डवो! तुम्हें यहीं रहकर वह सब कुछ देखना या सुनना चाहिये । वहाँ पर्वतके ऊपर जानेका विचार तुम्हें किसी प्रकार भी नहीं करना चाहिये । २१… 1081–1090
- शक्तिशूलगदापाणिरभ्यधावत् स पाण्डवम् । ६२ । ऐसा कहकर राक्षस मणिमान्ने उन सबको लौटाया और हाथोंमें शक्ति, शूल तथा गदा लेकर भीमसेनपर धावा किया । ६२… 1091–1100
- ‘ पाण्डुनन्दन! तुम्हें भीमसेनपर क्रोध नहीं करना चाहिये । ये यक्ष और राक्षस कालके द्वारा पहले ही मारे गये थे । तुम्हारे भाई तो इसमें निमित्तमात्र हुए हैं… 1101–1110
- ‘तात! सब धर्मोंके ज्ञाता मनीषी महर्षि इस दिशाको देवराज इन्द्र तथा कुबेरका निवासस्थान कहते हैं… 1111–1120
- (निवातकवचयुद्धपर्व ) पञ्चषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः अर्जुनका गन्धमादन पर्वतपर आकर अपने भाइयोंसे मिलना वैशम्पायन उवाच ततः कदाचिद्धरिसम्प्रयुक्तं महेन्द्रवाहं… 1121–1130
- एतदिच्छाम्यहं श्रीतुं विस्तरेण महाद्युते । यथा तुष्टो महादेवो देवराजस्तथानघ । ७ । यच्चापि वज्रपाणेस्तु प्रियं कृतमरिंदम । एतदाख्याहि मे सर्वमखिलेन धनंजय… 1131–1140
- ' मेरी आज्ञासे मातलि तुम्हें स्वर्गमें पहुँचा देगा । पाण्डवश्रेष्ठ! यहाँ रहकर जो तुम अत्यन्त दुष्कर तप कर रहे हो, इसके कारण देवताओं तथा महात्मा मुनियोंमें… 1141–1150
- एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः अर्जुनका पातालमें प्रवेश और निवातकवचोंके साथ युद्धारम्भ अर्जुनउवाच ततोऽहं स्तूयमानस्तु तत्र तत्र महर्षिभिः… 1151–1160
- स्वर्गसे लेकर पृथ्वीतक एक सूत्रमें आबद्ध- सी होकर पृथ्वीपर सब ओर जलकी धाराएँ लगातार गिर रही थीं, जिन्होंने वहाँ मुझे मोहमें डाल दिया था । ७… 1161–1170
- राजन्! दैत्योंके उस अद्भुत दिखायी देनेवाले नगरको देखकर मैंने मातलिसे पूछा -' सारथे! यह कौन - सा अद्भुत नगर है? ' । ६… 1171–1180
- चतुःसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः अर्जुनके मुखसे यात्राका वृत्तान्त सुनकर युधिष्ठिरद्वारा उनका अभिनन्दन और दिव्यास्त्रदर्शनकी इच्छा प्रकट करना अर्जुनउवाच ततो… 1181–1190
- ‘ परंतु ऐसा होनेपर चराचर जगत्में आपकी पुण्यमयी कीर्ति नष्ट हो जायगी । इसलिये कुरुवंश-शिरोमणि अपने पूर्वजोंके उस महान् राज्यको प्राप्त करके ही हम और कोई… 1191–1200
- चकोरैरुपचक्रैश्च पक्षिभिर्जीवजीवकैः कोकिलैर्भृङ्गराजैश्च तत्र तत्र निनादितान् । ७ । वहाँ भिन्न - भिन्न स्थानोंमें चकोर, उपचक्र, जीव -जीवक, कोकिल और… 1201–1210
- मद्विनाशात् परिद्यूनाविति मे वर्तते मतिः । ३८ । ‘ वे मेरे विनाशसे उत्साहशून्य हो जायँगे, अपने बल और पराक्रम खो बैठेंगे और सर्वथा शक्तिहीन हो जायँगे, ऐसा… 1211–1220
- एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः युधिष्ठिरद्वारा अपने प्रश्नोंका उचित उत्तर पाकर संतुष्ट हुए सर्परूपधारी नहुषका भीमसेनको छोड़ देना तथा युधिष्ठिरके साथ वार्तालाप… 1221–1230
- सिन्धवः शोभयांचक्रुः काननानि तपात्यये । ६ । वर्षा -ऋतुकी नदियाँ बड़े वेगसे छूटनेवाले शीघ्र- गामी बाणोंकी भाँति सनसनाती हुई चलती थीं… 1231–1240
- स्तांश्चाभिमन्युः सततं कुमारः । २ ९ । 'शिक्षा देनेमें निपुण और आलस्यरहित कुमार अभिमन्यु तुम्हारे शूर- वीर पुत्रोंको गदा और ढाल - तलवारके दाँव- पेंच सिखाते… 1241–1250
- इह वैकस्य नामुत्र अमुत्रैकस्य नो इह । इह वामुत्र चैकस्य नामुत्रैकस्य नो इह । ८८ । वक्ताओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! मनुष्यलोकमें मैं जिसे परम कल्याणकी बात… 1251–1260
- मुनियोंके सामने खड़े होकर जब वे दोनों इस प्रकार विवाद कर रहे थे, उस समय उन्हें देखकर जिनका यज्ञमें पहलेसे वरण हो चुका था, वे ब्राह्मण पूछने लगे — ' ये… 1261–1270
- सरस्वत्युवाच तं वै परं वेदविदः प्रपन्नाः परं परेभ्यः प्रथितं पुराणम् । स्वाध्यायवन्तो व्रतपुण्ययोगै- स्तपोधना वीतशोका विमुक्ताः । २७… 1271–1280
- मत्प्रसादात् प्रजासर्गे न च मोहं गमिष्यति । ५४ । ' इन्हें तीव्र तपस्याके द्वारा जगत्की सृष्टि करनेकी प्रतिभा प्राप्त हो जायगी… 1281–1290
- भरतकुलभूषण! उस समय जो भी तृण- काष्ठ अथवा सूखे - गीले पदार्थ होते हैं, वे सभी भस्मीभूत दिखायी देने लगते हैं । ६८ । ततः संवर्तको वह्निर्वायुना सह भारत… 1291–1300
- (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १४४ श्लोक हैं ) * अट्टमन्नं शिवो वेदो ब्राह्मणाश्च चतुष्पथाः । केशो भगं समाख्यातं शूलं तद् विक्रयं विदुः… 1301–1310
- युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर मुनिश्रेष्ठ महर्षि मार्कण्डेयने वृष्णिप्रवर श्रीकृष्ण तथा पाण्डवोंको आनन्दित करते हुए पुनः इस प्रकार कहा— । ६… 1311–1320
- ततस्तुमुलसङ्घाते वर्तमाने युगक्षये । ८८ । प्रायः लोग स्वदेश छोड़कर दूसरे देशों, दिशाओं, नगरों और गाँवोंका आश्रय लेंगे और हा तात! हा पुत्र! इत्यादि रूपसे… 1321–1330
- किमत्र प्रयोजनं वर्तते इत्यथाब्रुवंस्ताः स्त्रियः । १६ । ' यहाँ तुम्हारा क्या काम है? ' उनके ऐसा पूछनेपर उन स्त्रियोंने कहा- । १६… 1331–1340
- एकं हि मे सायकं चित्ररूपं दिग्धं विषेणाहर संगृहीतम् । येन विद्धो वामदेवः शयीत संदश्यमानः श्वभिरार्तरूपः । ६२… 1341–1350
- चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः क्षत्रिय राजाओंका महत्त्व- सुहोत्र और शिबिकी प्रशंसा वैशम्पायन उवाच ततः पाण्डवाः पुनर्मार्कण्डेयमूचुः । १… 1351–1360
- जो राजा अपनी शरणमें आये हुए भयभीत प्राणीको उसके शत्रुके हाथमें दे देता है, उसकी पैदा हुई संतान छोटी अवस्थामें ही मर जाती है… 1361–1370
- नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः राजा इन्द्रद्युम्न तथा अन्य चिरजीवी प्राणियोंकी कथा वैशम्पायन उवाच मार्कण्डेयमृषयः पाण्डवाः पर्यपृच्छन्नस्ति कश्चिद् भवतश्चिरजाततर… 1371–1380
- धारां वसूनां प्रतिमुञ्चतीव । ४१ । जो अपने परिश्रमसे उपार्जित और संचित किया हुआ धन- धान्य सुशील ब्राह्मणको दान करता है, उसके ऊपर वसुधादेवी अत्यन्त संतुष्ट… 1381–1390
- जाते हैं । ११३ । शुष्कं तर्क परित्यज्य आश्रयस्व श्रुतिं स्मृतिम् । एकाक्षराभिसम्बद्धं तत्त्वं हेतुभिरिच्छसि । बुद्धिर्न तस्य सिद्धयेत साधनस्य विपर्ययात्… 1391–1400
- द्वयधिकद्विशततमोऽध्यायः उत्तङ्कका राजा बृहदश्वसे धुन्धुका वध करनेके लिये आग्रह मार्कण्डेय उवाच इक्ष्वाकौ संस्थिते राजन् शशादः पृथिवीमिमाम्… 1401–1410
- भगवान् विष्णुके द्वारा मधुकैटभका जाँघोंपर वध आवां वरय देव त्वं वरदौ स्वः सुरोत्तम । दातारौ स्वो वरं तुभ्यं तद् ब्रवीह्यविचारयन् । २५… 1411–1420
- पञ्चाधिकद्विशततमोऽध्यायः पतिव्रता स्त्री तथा पिता- माताकी सेवाका माहात्म्य वैशम्पायन उवाच ततो युधिष्ठिरो राजा मार्कण्डेयं महाद्युतिम्… 1421–1430
- जितेन्द्रियो धर्मपरः स्वाध्यायनिरतः शुचिः । ३४ । कामक्रोधौ वशौ यस्य तं देवा ब्राह्मणं विदुः । जो जितेन्द्रिय, धर्मपरायण, स्वाध्यायतत्पर और पवित्र है तथा… 1431–1440
- ष्ट हो जाता है । ४५ । कर्म चैतदसाधूनां वृजिनानामसाधुवत् । न धर्मोऽस्तीति मन्वानाः शुचीनवहसन्ति ये । ४६ । अश्रद्दधाना धर्मस्य ते नश्यन्ति न संशयः… 1441–1450
- इनके सिवा और भी बहुत- से जीवोंका वध वे करते रहते हैं । इस विषयमें आप क्या समझते हैं? । धान्यबीजानि यान्याहुर्व्रह्यादीनि द्विजोत्तम… 1451–1460
- सन्ति ह्यागमविज्ञानाः शिष्टाः शास्त्रे विचक्षणाः । स्वधर्मेण क्रिया लोके कर्मणः सोऽप्यसंकरः । ४५… 1461–1470
- इन्द्रियोंके संसर्गसे ही मनुष्य निःसंदेह दुर्गुण-दुराचार आदि दोषोंको प्राप्त होते हैं । उन्हीं इन्द्रियोंको अच्छी तरह वशमें कर लेनेपर उन्हें सर्वथा सिद्धि… 1471–1480
- सम्पूर्ण उपायोंसे लोभ और क्रोधकी वृत्तियोंको दबाना चाहिए । संसारमें यही पवित्र तप है और यही सबके लिये भवसागरसे पार उतारनेवाला सेतु माना गया है । २८… 1481–1490
- पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता - पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना मार्कण्डेय… 1491–1500
- न शोचामि च वै विद्वन् कालाकाङ्क्षी स्थितो ह्यहम् । एतैर्निदर्शनैर्ब्रह्मन् नावसीदामि सत्तम । २ ९ । विद्वन्! मैं अन्तकालकी प्रतीक्षा करता हूँ… 1501–1510
- आक्रोशतां हि भूतानां यः करोति हि निष्कृतिम् । अग्निः स निष्कृतिर्नाम शोभयत्यभिसेविते । १४ । वे वेदनासे पीडित होकर आर्तनाद करनेवाले प्राणियोंको उस कष्टसे… 1511–1520
- जो देहधारियोंके प्राणोंका आश्रय लेकर उनके शरीरको कार्यमें प्रवृत्त करते हैं, उनका नाम है, ‘ संनिहित ' अग्नि । ये मनुके तीसरे पुत्र हैं… 1521–1530
- पुरंदरस्तु तामाह मा भैर्नास्ति भयं तव । एवमुक्त्वा ततोऽपश्यत् केशिनं स्थितमग्रतः । ८ । यह सुनकर इन्द्रने उससे कहा- ' भद्रे! डरो मत, अब तुम्हें कोई भय नहीं… 1531–1540
- शिवा बोली— अग्निदेव! तुम हमें सदा ही प्रिय रहे हो; परंतु हमलोग तुमसे सदा डरती आ रही हैं । इन दिनों तुम्हारी चेष्टाओंसे मनकी बात जानकर मेरी सखियोंने मुझे… 1541–1550
- लाल सागरकी एक क्रूर स्वभाववाली कन्या थी, जिसका रक्त ही भोजन था । वह महासेनको पुत्रकी भाँति हृदयसे लगाकर सर्वतोभावेन उनकी रक्षा करने लगी । २८… 1551–1560
- त्वमेव राजा भद्रं ते त्रैलोक्यस्य ममैव च । १ ९ । करोमि किं च ते शक्र शासनं तद् ब्रवीहि मे । स्कन्द बोले — देवेन्द्र! आप ही देवराजके पदपर प्रतिष्ठित रहें… 1561–1570
- स्कन्द बोले — देवियो! आपलोगोंने यह दुःखकी बात कही है, तो भी मैं आपको पहलेकी मातृकाओंकी संतानको अर्पित कर देता हूँ; परंतु आपलोग उन सबकी रक्षा करें; इसीसे… 1571–1580
- मार्कण्डेय उवाच यदाभिषिक्तो भगवान् सैनापत्येन पावकिः । तदा सम्प्रस्थितः श्रीमान् हृष्टो भद्रवटं हरः । २८ । रथेनादित्यवर्णेन पार्वत्या सहितः प्रभुः… 1581–1590
- व्यद्रवन्त रणे भीता विकीर्णायुधकेतनाः । ८६ । उस महिषासुरको आते देख इन्द्र आदि सब देवता भयभीत हो अपने अस्त्र- शस्त्र और ध्वजा फेंककर युद्धभूमिसे भागने लगे… 1591–1600
- (द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्व) त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना वैशम्पायन उवाच उपासीनेषु विप्रेषु… 1601–1610
- चतुस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः पतिदेवको अनुकूल करनेका उपाय -पतिकी अनन्यभावसे सेवा द्रौपद्युवाच इमं तु ते मार्गमपेतमोहं वक्ष्यामि चित्तग्रहणाय भर्तुः… 1611–1620
- शेते पृथिव्यामतथोचिताङ्गः कृष्णासमक्षं वसुधातलस्थः । ११ । ‘ भीमसेनका शरीर हवा और धूपका कष्ट सहन करनेसे अत्यन्त दुर्बल हो गया होगा… 1621–1630
- ' जुएका अवसर उपस्थित होनेपर विदुरजीने मुझसे, तुमसे तथा ( मामा) शकुनिसे जैसी बातें कही थीं, उन्हें तो तुम जानते ही हो । ६… 1631–1640
- प्रसन्नताके साथ ग्वालोंसे घिरकर उस वनमें विहार करने लगा । ६ । स च पौरजनः सर्वः सैनिकाश्च सहस्रशः । यथोपजोषं चिक्रीडुर्वने तस्मिन् यथामराः । ७… 1641–1650
- राजेन्द्र! दुर्योधनके कैद हो जानेपर गन्धर्वोंने रथपर बैठे हुए दुःशासनको भी सब ओरसे घेरकर पकड़ लिया । ७ । विविंशतिं चित्रसेनमादायान्ये विदुद्रुवुः… 1651–1660
- भय न हो । तदनन्तर अपनी विजयसे उल्लसित होते हुए सारे गन्धर्व शत्रुओंका सामना करनेके लिये लौट पड़े । ५–७ । दृष्ट्वा रथागतान् वीरान् पाण्डवांश्चतुरो रणे… 1661–1670
- षट्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः चित्रसेन, अर्जुन तथा युधिष्ठिरका संवाद और दुर्योधनका छुटकारा वैशम्पायन उवाच ततोऽर्जुनश्चित्रसेनं प्रहसन्निदमब्रवीत्… 1671–1680
- फिर तो चित्रसेन और अर्जुन दोनों एक- दूसरेसे मिले और कुशल -मंगल तथा स्वास्थ्यका समाचार पूछने लगे । १५ । ते समेत्य तथान्योन्यं सन्नाहान् विप्रमुच्य च… 1681–1690
- एकपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः शकुनिके समझानेपर भी दुर्योधनको प्रायोपवेशनसे विचलित होते न देखकर दैत्योंका कृत्याद्वारा उसे रसातलमें बुलाना वैशम्पायन उवाच… 1691–1700
- प्रख्यातास्तेऽर्जुनं वीरं हनिष्यन्ति च मा शुचः । असपत्ना त्वया हीयं भोक्तव्या वसुधा नृप । २४ । इसीलिये हमलोंगोंने भी एक लाख दैत्यों तथा राक्षसोंको इस… 1701–1710
- अङ्गान् वङ्गान् कलिंगांश्च शुण्डिकान् मिथिलानथ । मागधान् कर्कखण्डांश्च निवेश्य विषयेऽऽत्मनः । ८ । आवशीरांश्च योध्यांश्च अहिक्षत्रं च निर्जयत्… 1711–1720
- दूतगण तेज चलनेवाले वाहनोंपर सवार हो जिन्हें जैसी आज्ञा मिली थी, उसके अनुसार कर्तव्यपालनके लिये प्रस्थित हुए । उन्हींमेंसे एक जाते हुए दूतसे दुःशासनने कहा… 1721–1730
- मरुभूमेः शिरःस्थानं तृणबिन्दुसरः प्रति । १३ । तत्रेमां वसतिं शिष्टां विहरन्तो रमेमहि । ‘ अतः अब हम पुनः असंख्य मृगोंसे युक्त, रमणीय तथा उत्तम काम्यकवनमें… 1731–1740
- निराहारस्तु स मुनिरुञ्छमार्जयते पुनः । न चैनं विक्रियां नेतुमशकन्मुद्गलं क्षुधा । १९ । मुनि निराहार रहकर पुनः अन्नके दाने बीनने लगे… 1741–1750
- ' ओह! पतनके बाद तो स्वर्गवासी मनुष्योंको अत्यन्त भयंकर महान् दुःख और अनुताप होता है और फिर वे इसी लोकमें विचरते रहते हैं; इसलिये मुझे स्वर्गमें जानेकी… 1751–1760
- तथैव संकटादस्मान्मामुद्धर्तुमिहार्हसि । १६ । ‘ भगवन्! पहले कौरव सभामें दुःशासनके हाथसे जैसे तुमने मुझे बचाया था, उसी प्रकार इस वर्तमान संकटसे भी मेरा… 1761–1770
- पञ्चषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः कोटिकास्यका द्रौपदीसे जयद्रथ और उसके साथियोंका परिचय देते हुए उसका भी परिचय पूछना कोटिक उवाच का त्वं कदम्बस्य विनाम्य शाखा-… 1771–1780
- पतिव्रता द्रौपदी चाहती थी कि मेरे पति अभी यहाँ आ जायँ । अतः वह जयद्रथसे वाद-विवाद करती हुई उसे बातोंमें फँसाये रखनेकी चेष्टा करने लगी । २०… 1781–1790
- ‘ अब शीघ्र आश्रमकी ओर लौटो । हमें विलम्ब नहीं करना चाहिये; क्योंकि मेरा मन बुद्धिकी विवेकशक्तिको आच्छादित करके व्यथित तथा चिन्तासे दग्ध हो रहा है… 1791–1800
- स एष वीरो नकुलः पतिर्मे । जो समस्त धर्म और अर्थके निश्चयको जानते हैं, भयसे पीड़ित मनुष्योंका भय दूर करते हैं, जो परम बुद्धिमान् हैं, इस भूमण्डलमें जिनका… 1801–1810
- कथं ह्यनुचरान् हित्वा शत्रुमध्ये पलायसे । ५ ९ । ' राजकुमार! लौटो, तुम्हें पीठ दिखाकर भागना शोभा नहीं देता… 1811–1820
- दंष्ट्रेणैकेन चोद्धृत्य स्वे स्थाने न्यविशन्महीम् । ५५ । ‘ इस प्रकार यज्ञवाराहरूप धारण करके भगवान्ने जलके भीतर प्रवेश किया और एक ही दाँतसे पृथ्वीको उठाकर… 1821–1830
- पञ्चसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, खर और शूर्पणखाकी उत्पत्ति, तपस्या और वरप्राप्ति तथा कुबेरका रावणको शाप देना मार्कण्डेय उवाच… 1831–1840
- कामवीर्यबलाश्चैव सर्वे युद्धविशारदाः । १३ । उनका शरीर वज्रके समान दुर्भेद्य और सुदृढ़ था । वे सभी राशि - राशि बलके आश्रय थे… 1841–1850
- केनास्येवं कृताभद्रे मामचिन्त्यावमन्य च । ४८ । अपने मन्त्रियोंको विदा करके उसने एकान्तमें शूर्पणखासे पूछा-' भद्रे! किसने मेरी परवा न करके — मेरी सर्वथा… 1851–1860
- एकोनाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः रावणद्वारा जटायुका वध, श्रीरामद्वारा उसका अन्त्येष्टि- संस्कार, कबन्धका वध तथा उसके दिव्य स्वरूपसे वार्तालाप मार्कण्डेय उवाच… 1861–1870
- मयि शिष्ये च भृत्ये च सहाये च समाश्वस । ६ । ‘ हम दोनों यहाँसे वानरराज सुग्रीवके पास चलें, जो ऋष्यमूक पर्वतके शिखरपर रहते हैं… 1871–1880
- रुदती रुधिरार्द्राङ्गी व्याघ्रेण परिरक्षिता । असकृत् त्वं मया दृष्टा गच्छन्ती दिशमुत्तराम् । ७१ । ' सपनेमें मैंने तुमको भी कई बार देखा… 1881–1890
- स तत् सर्वमशेषेण श्रुत्वा प्रह्वः कृताञ्जलिः । १५ । सभृत्यदारो राजेन्द्र सुग्रीवो वानराधिपः । इदमाह वचः प्रीतो लक्ष्मणं नरकुञ्जरम् । १६… 1891–1900
- श्रीमान् दधिमुखो नाम हरिवृद्धोऽतिवीर्यवान् । प्रचकर्ष महासैन्यं हरीणां भीमतेजसाम् । ७ । वानरोंमें वृद्ध तथा अत्यन्त पराक्रमी श्रीमान् दधिमुख भयंकर तेजसे… 1901–1910
- आह त्वां राघवो राजन् कोसलेन्द्रो महायशाः । प्राप्तकालमिदं वाक्यं तदादत्स्व कुरुष्व च । १० । राजन्! कोसलदेशके महाराज महायशस्वी श्रीरामचन्द्रजीने तुमसे… 1911–1920
- ततस्तान् सहसा दीर्णान् दृष्ट्वा वानरपुङ्गवान् । निर्ययौ कपिशार्दूलो हनूमान् मारुतात्मजः । ७ । उन भयभीत प्रमुख वानरोंको सहसा पलायन करते देख कपिकेसरी… 1921–1930
- Fut F2I CL) Kos Fas अष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः इन्द्रजित्का मायामय युद्ध तथा श्रीराम और लक्ष्मणकी मूर्च्छा मार्कण्डेय उवाच ततः श्रुत्वा हतं संख्ये… 1931–1940
- फिर उस निशाचरने युद्धके लिये प्रस्थान करनेका निश्चय करके तलवार रख दी और आज्ञा दी - ' मेरा रथ तैयार किया जाय ' । ३३… 1941–1950
- इसी समय विशुद्ध अन्तःकरणवाले कमलयोनि जगत्स्रष्टा चतुर्मुख ब्रह्माजीने विमानद्वारा वहाँ आकर श्रीरामचन्द्रजीको दर्शन दिया । १७… 1951–1960
- परंतप! इन सब सहायकोंके होते हुए तुम विषाद क्यों करते हो? तुम्हारे ये भाई तो मरुद्गणोंसहित वज्रधारी इन्द्रकी सेनाको भी परास्त कर सकते हैं । ७… 1961–1970
- तदैव तस्य वचनं प्रतिगृह्येदमब्रवीत् । ६ मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! पिताके यह कहनेपर कि ' बेटी! तू अपनी यात्राका वृतान्त विस्तारके साथ बतला '… 1971–1980
- आरम्भ किया है । ६ । द्युमत्सेन उवाच व्रतं भिन्धीति वक्तुं त्वां नास्मि शक्तः कथञ्चन । पारयस्वेति वचनं युक्तमस्मद्विधो वदेत् । ७… 1981–1990
- स्तव प्रसादाज्ज्वलनार्कसंनिभः । २७ । सावित्री बोली- भगवन्! मेरे श्वशुर अपने राज्यसे भ्रष्ट होकर वनमें रहते हैं । उनकी आँखें भी नष्ट हो गयी हैं… 1991–2000
- मार्कण्डेय उवाच उपलभ्य ततः संज्ञां सुखसुप्त इवोत्थितः । दिशः सर्वा वनान्तांश्च निरीक्ष्योवाच सत्यवान् । ६८ । फलाहारोऽस्मि निष्क्रान्तस्त्वया सह सुमध्यमे… 2001–2010
- कहा जा सकता है कि सत्यवान् जीवित है । १८ । धौम्य उवाच सर्वैर्गुणैरुपेतस्ते यथा पुत्रो जनप्रियः । दीर्घायुर्लक्षणोपेतस्तथा जीवति सत्यवान् । १ ९… 2011–2020
- अभिप्रायमथो ज्ञात्वा महेन्द्रस्य विभावसुः । कुण्डलार्थे महाराज सूर्यः कर्णमुपागतः । ६ । महाराज! कुण्डलके विषयमें देवराज इन्द्रका मनोभाव जानकर भगवान् सूर्य… 2021–2030
- मैं मृत्युसे भी उतना नहीं डरता जितना झूठसे डरता हूँ । विशेषतः सदा समस्त सज्जन ब्राह्मणोंको उनके माँगनेपर अपने प्राण देनेमें भी मुझे कोई सोच - विचार नहीं… 2031–2040
- क्योंकि पृथ्वीपते! महाभाग ब्राह्मण भलीभाँति पूजित होनेपर सेवकको तारनेमें समर्थ होते हैं; और इसके विपरीत अपमानित होनेपर विनाशकारी बन जाते हैं । ७… 2041–2050
- वैशम्पायन उवाच ततोऽपश्यत् त्रिदशान् राजपुत्री सर्वानेव स्वेषु धिष्ण्येषु खस्थान् । प्रभावन्तं भानुमन्तं महान्तं यथाऽऽदित्यं रोचमानांस्तथैव । २१… 2051–2060
- रुदती पुत्रशोकार्ता निशीथे कमलेक्षणा । धात्र्या सह पृथा राजन् पुत्रदर्शनलालसा । २३ । जनमेजय! आधी रातके समय कमलनयनी कुन्ती पुत्रशोकसे आतुर हो उसके दर्शनकी… 2061–2070
- कर्णको इन्द्रका शक्ति - दान Grmil युधिष्ठिर और बगुलारूपधारी यक्ष कर्णउवाच संशयं परमं प्राप्य विमोक्ष्ये वासवीमिमाम्… 2071–2080
- अनादृत्य तु तद् वाक्यं नकुलः सुपिपासितः । अपिबच्छीतलं तोयं पीत्वा च निपपात ह । १३ । नकुलकी प्यास बहुत बढ़ गयी थी… 2081–2090
- यक्षोऽहमस्मि भद्रं ते नास्मि पक्षी जलेचरः । ३६ । मयैते निहताः सर्वे भ्रातरस्ते महौजसः । यक्षने कहा — तुम्हारा कल्याण हो… 2091–2100
- है । ९ २ । यक्ष उवाच को मोहः प्रोच्यते राजन् कश्च मानः प्रकीर्तितः । किमालस्यं च विज्ञेयं कश्च शोकः प्रकीर्तितः । ९ ३… 2101–2110
- यक्षने कहा – कुन्तीनन्दन महाराज युधिष्ठिर! उस ब्राह्मणके अरणीसहित मन्थनकाष्ठको तो तुम्हारी परीक्षाके लिये मैं ही मृगरूपसे लेकर भाग गया था… 2111–2120
- । ॐ श्रीपरमात्मने नमः । महाभारत- सार मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च । संसारेष्वनुभूतानि यान्ति यास्यन्ति चापरे… 2121–2130
- इसने पाँच वर्षोंतक देवराज इन्द्रके भवनमें रहकर ऐसे दिव्यास्त्र प्राप्त किये हैं, जिनका मनुष्योंमें होना एक अद्भुत- सी बात है… 2131–2140
- झूठ बोलनेवाले मनुष्योंके प्रति राजालोग दोषदृष्टि कर लेते हैं । इसी प्रकार वे मिथ्यावादी मन्त्रीका भी अपमान करते हैं । १७… 2141–2150
- येन वीरः कुरुक्षेत्रमभ्यरक्षत् परंतपः । अमुञ्चद् धनुषस्तस्य ज्यामक्षय्यां युधिष्ठिरः । २० । परंतप वीर युधिष्ठिरने जिसके द्वारा समूचे कुरुक्षेत्रकी रक्षा… 2151–2160
- सुरक्तमाञ्जिष्ठवराम्बरः शिखी पवित्रपाणिर्ददृशे तदद्भुतम् । वे कमण्डलु और पगड़ी धारण किये त्रिदण्डधारी तरुण ब्राह्मण बन गये… 2161–2170
- इसके सिवा शारीरिक बलमें भी मेरी समता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है । भूपाल! मैं सदा कुश्ती लड़नेवाला पहलवान हूँ; हाथियों और सिंहोंसे भी भिड़ जाता हूँ… 2171–2180
- दशमोऽध्यायः सहदेवका राजा विराटके साथ वार्तालाप और गौओंकी देखभालके लिये उनकी नियुक्ति वैशम्पायन उवाच सहदेवोऽपि गोपानां कृत्वा वेषमनुत्तमम्… 2181–2190
- द्वादशोऽध्यायः नकुलका विराटके अश्वोंकी देखरेखमें नियुक्त होना वैशम्पायन उवाच अथापरोऽदृश्यत पाण्डवः प्रभु- र्विराटराजं तरसा समेयिवान्… 2191–2200
- कभी वे प्रतिपक्षीको गोदमें घसीट लाते, कभी खेलमें ही उसे सामने खींच लेते, कभी आगे - पीछे, दायें - बायें पैंतरे बदलते और कभी सहसा पीछे ढकेलकर पटक देते थे… 2201–2210
- अपनी जातिकी स्त्रियाँ मनुष्यके लिये इहलोक और परलोकमें भी हितकारिणी होती हैं । वे प्रेतकार्य ( अन्त्येष्टि - संस्कार) करती और जलांजलि देकर मृतात्माको तृप्त… 2211–2220
- वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! बहिनके वचनसे इस प्रकार आश्वासन मिलनेपर कीचक उस समय वहाँसे चला गया और घर जाकर उसने यथासमय चतुर रसोइयोंके द्वारा राजाओंके… 2221–2230
- विवादेषु प्रवृत्तेषु समं कार्यानुदर्शिना । राज्ञा धर्मासनस्थेन जितौ लोकावुभावपि । जो प्रियजनों तथा द्वेषपात्रोंमें भी समानभाव रखते हैं, प्रजाजनोंमें विवाद… 2231–2240
- योऽसौ त्वां कामसम्मत्तो दुर्लभामवमन्यते । ५० । सुदेष्णाने कहा – सुन्दर लटोंवाली सुन्दरी! यदि तुम्हारी सम्मति हो, तो मैं कीचकको मरवा डालूँ; जो कामसे… 2241–2250
- अष्टादशोऽध्यायः द्रौपदीका भीमसेनके प्रति अपने दुःखके उद्गार प्रकट करना वैशम्पायन उवाच ( सा लज्जमाना भीता च अधोमुखमुखी ततः… 2251–2260
- स्प्रष्टुं राजसहस्राणि तेजसाप्रतिमानि वै । समरे नाभ्यवर्तन्त वेलामिव महार्णवः । २२ । सोऽयं राज्ञो विराटस्य कन्यानां नर्तको युवा… 2261–2270
- एकविंशोऽध्यायः भीमसेन और द्रौपदीका संवाद भीमसेन उवाच धिगस्तु मे बाहुबलं गाण्डीवं फाल्गुनस्य च । यत् ते रक्तौ पुरा भूत्वा पाणी कृतकिणाविमौ । १… 2271–2280
- एवमेतत् करिष्यामि यथा सुश्रोणि भाषसे । एको भद्रे गमिष्यामि शून्यमावसथं तव । १४ । कीचक बोला- ठीक है । सुश्रोणि! तुम जैसा कहती हो, वैसा ही करूँगा… 2281–2290
- अद्याहमनृणो भूत्वा भ्रातुर्भार्यापहारिणम् । शान्तिं लब्धास्मि परमां हत्वा सैरन्ध्रिकण्टकम् । ७९… 2291–2300
- चतुर्विंशोऽध्यायः द्रौपदीका राजमहलमें लौटकर आना और बृहन्नला एवं सुदेष्णासे उसकी बातचीत वैशम्पायन उवाच 'दृष्ट्वा निहतान् सूतान् राज्ञे गत्वा न्यवेदयन्… 2301–2310
- इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें गुप्तचरोंके लौटकर आ सम्बन्ध रखनेवाला पचीसवाँ अध्याय पूरा हुआ । २५… 2311–2320
- ‘ उन जनपदमें गौओंकी अधिकता होगी और वे गौएँ कृश या दुर्बल न होकर खूब हृष्ट-पुष्ट होंगी । उनके दूध, दही और घी भी बड़े स्वादिष्ट तथा हितकारी होंगे । २२… 2321–2330
- ‘ जिधरसे आक्रमणका निश्चय हो, उसी ओर हम कौरव सैनिकोंके साथ चलें । महारथी सुशर्मा भी त्रिगर्तोंके साथ निश्चित दिशाकी ओर जायँ और अपने समस्त बल ( सेना) एवं… 2331–2340
- सेनाकी धूलसे आच्छादित होकर उड़ते हुए पक्षी भी भूमिपर गिर जाते थे । दोनों ओरसे छूटे हुए बाणोंद्वारा ( आकाश खचाखच भर जानेके कारण) सूर्यदेवका दीखना बंद हो… 2341–2350
- स चचार गदापाणिर्वृद्धोऽपि तरुणो यथा । ४२ । इसी बीचमें बलवान् राजा विराट सुशर्माके रथसे कूद पड़े और उसकी गदा लेकर उसीकी ओर दौड़े… 2351–2360
- त्वया परिषदो मध्ये श्लाघते स नराधिपः । पुत्रो ममानुरूपश्च शूरश्चेति कुलोद्वहः । १२ । ‘ वे सभामें आपसे प्रभावित होकर आपकी प्रशंसामें बड़ी - बड़ी बातें किया… 2361–2370
- सा सारथ्यं मम भ्रातुः कुरु साधु बृहन्नले । पुरा दूरतरं गावो ह्रियन्त कुरुभिर्हि नः । १२ । ‘ अतः बृहन्नले! इसके पहले कि कौरवलोग हमारी गौओंको बहुत दूर लेकर… 2371–2380
- क एष वेषसंच्छन्नो भस्मन्येव हुताशनः । किंचिदस्य यथा पुंसः किंचिदस्य यथा स्त्रियः । ३३ । ‘ यह कौन है जो राखमें छिपी हुई अग्निकी भाँति नारीके वेशमें छिपा… 2381–2390
- एकचत्वारिंशोऽध्यायः उत्तरका अर्जुनके आदेशके अनुसार शमीवृक्षसे पाण्डवोंके दिव्य धनुष आदि उतारना उत्तर उवाच अस्मिन् वृक्षे किलोद्बद्धं नः श्रुतम्… 2391–2400
- उत्तर उवाच दश पार्थस्य नामानि यानि पूर्वं श्रुतानि मे । प्रब्रूयास्तानि यदि मे श्रद्दध्यां सर्वमेव ते । ७… 2401–2410
- सहायो घोषयात्रायां कस्तदाऽऽसीत् सखा मम । ३६ । Gmmiy अर्जुनका शङ्खनाद तथा प्रतिभये तस्मिन् देवदानवसंकुले I खाण्डवे युध्यमानस्य कस्तदाऽऽसीत् सखा मम । ३७… 2411–2420
- ' जिन विषयोंमें दुविधा पड़ जाती है, उनमें सदा संदेह बना रहता है । किसी विषयको अन्य प्रकारसे सोचा जाता है, किंतु पता लगनेपर वह किसी और ही प्रकारका सिद्ध… 2421–2430
- एकश्च पञ्च वर्षाणि ब्रह्मचर्यमधारयत् । एकः सुभद्रामारोप्य द्वैरथे कृष्णमाह्वयत् । ६ । उन्होंने अकेले ही पाँच वर्षतक कठोर तप करते हुए ब्रह्मचर्यव्रतका पालन… 2431–2440
- अश्वत्थामाने कहा – पुरुषश्रेष्ठ! हमारी न्यायोचित बातकी निन्दा नहीं की जानी चाहिये । आचार्य द्रोणने पाण्डवोंपर हुए पहलेके अन्यायोंका स्मरण करके रोषपूर्वक… 2441–2450
- नैषोऽन्तरेण राजानं बीभत्सुः स्थातुमिच्छति । तस्य पार्ष्णिं ग्रहीष्यामो जवेनाभिप्रयास्यतः । १७… 2451–2460
- विहाय संग्रामशिरः प्रयातो वैकर्तनः पाण्डवबाणतप्तः । ३६ । अर्जुनके छोड़े हुए बाणोंकी चोट खाकर सूर्यपुत्र कर्ण तिलमिला उठा और एक हाथीसे पराजित हुए दूसरे… 2461–2470
- षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः अर्जुन और कृपाचार्यका युद्ध देखनेके लिये देवताओंका आकाशमें विमानोंपर आगमन वैशम्पायन उवाच तान्यनीकान्यदृश्यन्त कुरूणामुग्रधन्विनाम्… 2471–2480
- अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः अर्जुनका द्रोणाचार्यके साथ युद्ध और आचार्यका पलायन वैशम्पायन उवाच कृपेऽपनीते द्रोणस्तु प्रगृह्य सशरं धनुः… 2481–2490
- अर्जुनके उत्तम बाणोंसे द्रोणके कवच और ध्वज छिन्न - भिन्न हो चुके थे । वे स्वयं भी बहुत घायल हो गये थे, अतः मौका पाते ही वेगशाली घोड़ोंको बढ़ाकर तुरंत… 2491–2500
- एकषष्टितमोऽध्यायः अर्जुनका उत्तरकुमारको आश्वासन तथा अर्जुनसे दुःशासन आदिकी पराजय वैशम्पायन उवाच ततो वैकर्तनं जित्वा पार्थो वैराटिमब्रवीत्… 2501–2510
- शरसंघमहावर्तां नागनक्रां दुरत्ययाम् । महारथमहाद्वीपां शङ्खदुन्दुभिनिःस्वनाम् । चकार च तदा पार्थो नदीं दुस्तरशोणिताम् । २१… 2511–2520
- जनमेजय! चित्रसेनके ऐसा कहनेपर देवराज इन्द्रने दिव्य पुष्पोंकी वर्षा करके अर्जुन और भीष्मके इस अद्भुत संग्रामके प्रति आदर प्रकट किया । ४४… 2521–2530
- भीष्मस्य संज्ञां तु तथैव मन्ये जानाति सोऽस्त्रप्रतिघातमेषः । एतस्य वाहान् कुरु सव्यतस्त्व- मेवं हि यातव्यममूढसंज्ञैः । १४… 2531–2540
- वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तब अर्जुनके कथनानुसार उत्तरने बड़ी उतावलीके साथ दूतोंको आज्ञा दी - 'जाओ और सूचित करो कि महाराजकी विजय हुई है… 2541–2550
- उत्तरः प्रविशत्वेको न प्रवेश्या बृहन्नला । ५४ । तब जाते हुए सेवकके कानमें युधिष्ठिरने धीरेसे कहा- ' पहले अकेले राजकुमार उत्तर ही यहाँ आवें… 2551–2560
- राजन्! जैसे देवगण धनाध्यक्ष कुबेरका दरबार किया करते हैं, वैसे ही सब राजा और कौरव किंकरोंकी भाँति इनकी नित्य उपासना करते थे । २१… 2561–2570
- अत्र शङ्कां न पश्यामि तेन शुद्धिर्भविष्यति । ६ । पुत्रवधू और पुत्रीमें तथा पुत्र अथवा आत्मामें भेद नहीं है, अतः उसे पुत्रवधूके रूपमें ग्रहण करनेपर मुझे… 2571–2580