02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1311–1320
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1311–1320
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युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर मुनिश्रेष्ठ महर्षि मार्कण्डेयने वृष्णिप्रवर श्रीकृष्ण तथा पाण्डवोंको आनन्दित करते हुए पुनः इस प्रकार कहा— ॥ ६ ॥
मार्कण्डेय उवाच
शृणु राजन् मया दृष्टं यत् पुरा श्रुतमेव च ।
अनुभूतं च राजेन्द्र देवदेवप्रसादजम् ॥ ७ ॥
भविष्यं सर्वलोकस्य वृत्तान्तं भरतर्षभ ।
कलुषं कालमासाद्य कथ्यमानं निबोध मे ॥ ८ ॥
मार्कण्डेय बोले — भरतश्रेष्ठ राजन्! मैंने देवाधिदेव भगवान् बालमुकुन्दकी कृपासे पूर्वकालमें, निकृष्ट कलिकालके प्राप्त होनेपर सम्पूर्ण लोकोंके भावी वृत्तान्तके विषयमें जो कुछ देखा- सुना या अनुभव किया है, वह बताता हूँ, सुनो और समझो ॥ ७-८ ॥
कृते चतुष्पात् सकलो निर्व्याजोपाधिवर्जितः ।
वृषः प्रतिष्ठितो धर्मो मनुष्ये भरतर्षभ ॥ ९ ॥
भरतश्रेष्ठ! सत्ययुगमें मनुष्योंके भीतर वृषरूप धर्म अपने चारों पादोंसे युक्त होनेके
कारण सम्पूर्ण रूपमें प्रतिष्ठित होता है । उसमें छल- कपट या दम्भ नहीं होता ॥ ९ ॥
अधर्मपादविद्धस्तु त्रिभिरंशैः प्रतिष्ठितः ।
त्रेतायां द्वापरेऽर्धेन व्यामिश्रो धर्म उच्यते ॥ १० ॥
किंतु त्रेतामें वह धर्म अधर्मके एक पादसे अभिभूत होकर अपने तीन अंशोंसे ही प्रतिष्ठित होता है । द्वापरमें धर्म आधा ही रह जाता है । आधेमें अधर्म आकर मिल जाता है ॥ १० ॥
त्रिभिरंशैरधर्मस्तु लोकानाक्रम्य तिष्ठति ।
तामसं युगमासाद्य तदा भरतसत्तम ॥ ११ ॥
चतुर्थांशेन धर्मस्तु मनुष्यानुपतिष्ठति ।
आयुर्वीर्यमथो बुद्धिर्बलं तेजश्च पाण्डव ॥ १२ ॥
मनुष्याणामनुयुगं ह्रसतीति निबोध मे ।
राजानो ब्राह्मणा वैश्याः शूद्राश्चैव युधिष्ठिर ॥ १३ ॥
व्याजैर्धर्मं चरिष्यन्ति धर्मवैतंसिका नराः ।
सत्यं संक्षेप्स्यते लोके नरैः पण्डितमानिभिः ॥ १४ ॥
परंतु भरतश्रेष्ठ! कलियुग आनेपर अधर्म अपने तीन अंशोंद्वारा सम्पूर्ण लोकोंको आक्रान्त करके स्थित होता है और धर्म केवल एक पादसे मनुष्योंमें प्रतिष्ठित होता है । पाण्डुनन्दन! प्रत्येक युगमें मनुष्योंकी आयु, वीर्य, बुद्धि, बल तथा तेज क्रमशः घटते जाते हैं । युधिष्ठिर! अब कलियुगके समयका वर्णन सुनो । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी जातियोंके लोग कपटपूर्वक धर्मका आचरण करेंगे और धर्मका जाल बिछाकर दूसरे
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लोगोंको ठगते रहेंगे । अपनेको पण्डित माननेवाले लोग सत्यका त्याग कर देंगे ॥ ११ – १४ ॥
सत्यहान्या ततस्तेषामायुरल्पं भविष्यति ।
आयुषः प्रक्षयाद् विद्यां न शक्ष्यन्त्युपजीवितुम् ॥ १५ ॥
सत्यकी हानि होनेसे उनकी आयु थोड़ी हो जायगी और आयुकी कमी होनेके कारण वे अपने जीवन- निर्वाहके योग्य विद्या प्राप्त नहीं कर सकेंगे ॥ १५ ॥
विद्याहीनानविज्ञानाल्लोभोऽप्यभिभविष्यति ।
लोभक्रोधपरा मूढाः कामासक्ताश्च मानवाः ॥ १६ ॥
वैरबद्धा भविष्यन्ति परस्परवधैषिणः । विद्याके बिना ज्ञान न होनेसे उन सबको लोभ दबा लेगा । फिर लोभ और क्रोधके वशीभूत हुए मूढ़ मनुष्य कामनाओंमें फँसकर आपसमें वैर बाँध लेंगे और एक- दूसरेके प्राण लेनेकी घातमें लगे रहेंगे ॥ १६ ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः संकीर्यन्तः परस्परम् ॥ १७ ॥
शूद्रतुल्या भविष्यन्ति तपःसत्यविवर्जिताः ।
अन्त्या मध्या भविष्यन्ति मध्याश्चान्त्या न संशयः ॥ १८ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य -से आपसमें संतानोत्पादन करके वर्णसंकर हो जायँगे । वे सभी तपस्या और सत्यसे रहित हो शूद्रोंके समान हो जायँगे। अन्त्यज ( चाण्डाल आदि ) क्षत्रिय - वैश्य आदिके कर्म करेंगे और क्षत्रिय - वैश्य आदि चाण्डालोंके कर्म अपना लेंगे, इसमें संशय नहीं है ॥ १७-१८ ॥
ईदृशो भविता लोको युगान्ते पर्युपस्थिते ।
वस्त्राणां प्रवरा शाणी धान्यानां कोरदूषकाः ॥ १ ९ ॥
युगान्तकाल आनेपर लोगोंकी ऐसी ही दशा होगी । वस्त्रोंमें सनके बने हुए वस्त्र अच्छे समझे जायँगे । धानोंमें कोदोका आदर होगा ॥ १ ९ ॥
भार्यामित्राश्च पुरुषा भविष्यन्ति युगक्षये ।
मत्स्यामिषेण जीवन्तो दुहन्तश्चाप्यजैडकम् ॥ २० ॥
गोषु नष्टासु पुरुषा ये s पि नित्यं धृतव्रताः ।
तेऽपि लोभसमायुक्ता भविष्यन्ति युगक्षये ॥ २१ ॥
उस युगक्षयके समय पुरुष केवल स्त्रियोंसे ही मित्रता करनेवाले होंगे । कितने ही लोग मछलीके मांससे जीविका चलायेंगे । गायोंके नष्ट हो जानेके कारण मनुष्य भेड़ और बकरीका भी दूध दुहकर पीयेंगे । जो लोग सदा व्रत धारण करके रहनेवाले हैं, वे भी युगान्त कालमें लोभी हो जायँगे ॥ २०-२१ ॥
अन्योन्यं परिमुष्णन्तो हिंसयन्तश्च मानवाः ।
अजपा नास्तिकाः स्तेना भविष्यन्ति युगक्षये ॥ २२ ॥
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लोग एक- दूसरेको लूटेंगे और मारेंगे । युगान्तकालके मनुष्य जपरहित, नास्तिक और चोरी करनेवाले होंगे ॥ २२ ॥
सरित्तीरेषु कुद्दालेर्वापयिष्यन्ति चौषधीः ।
ताश्चाप्यल्पफलास्तेषां भविष्यन्ति युगक्षये ॥ २३ ॥
नदियोंके किनारेकी भूमिको कुदालोंसे खोदकर लोग वहाँ अनाज बोयेंगे । उन अनाजोंमें भी युगान्तकालके प्रभावसे बहुत कम फल लगेंगे ॥ २३ ॥
श्राद्धे दैवे च पुरुषा येऽपि नित्यं धृतव्रताः ।
तेऽपि लोभसमायुक्ता भोक्ष्यन्तीह परस्परम् ॥ २४ ॥
जो सदा ( परान्नका त्याग करके ) व्रतका पालन करनेवाले लोग हैं, वे भी उस समय लोभवश देवयज्ञ तथा श्राद्धमें एक- दूसरेके यहाँ भोजन करेंगे ॥ २४ ॥
पिता पुत्रस्य भोक्ता च पितुः पुत्रस्तथैव च ।
अतिक्रान्तानि भोज्यानि भविष्यन्ति युगक्षये ॥ २५ ॥
कलियुगके अन्तिम भागमें पिता पुत्रकी और पुत्र पिताकी शय्या आदिका उपभोग करने लगेंगे । उस समय त्याज्य ( अभक्ष्य ) पदार्थ भी भोजनके योग्य समझे जायँगे ॥ २५ ॥
न व्रतानि चरिष्यन्ति ब्राह्मणा वेदनिन्दकाः ।
न यक्ष्यन्ति न होष्यन्ति हेतुवादविमोहिताः ।
निम्नेष्वीहां करिष्यन्ति हेतुवादविमोहिताः ॥ २६ ॥
ब्राह्मणलोग व्रत और नियमोंका पालन तो करेंगे नहीं, उलटे वेदोंकी निन्दा करने लग जायँगे । कोरे तर्कवादसे मोहित होकर वे यज्ञ और होम छोड़ बैठेंगे । वे केवल तर्कवादसे मोहित होकर नीच - से - नीच कर्म करनेके लिये प्रयत्नशील रहेंगे ॥ २६ ॥
निम्ने कृषिं करिष्यन्ति योक्ष्यन्ति धुरि धेनुकाः ।
एकहायनवत्सांश्च योजयिष्यन्ति मानवाः ॥ २७ ॥
मनुष्य नीची भूमिमें ( अर्थात् गायोंके जल पीने और चरनेकी जगहमें) खेती करेंगे । दूध देनेवाली गायोंको भी बोझ ढोनेके काममें लगा देंगे और सालभरके बछड़ोंको भी हलमें जोतेंगे ॥ २७ ॥
पुत्रः पितृवधं कृत्वा पिता पुत्रवधं तथा ।
निरुद्वेगो बृहद्वादी न निन्दामुपलप्स्यते ॥ २८ ॥
पुत्र पिताका और पिता पुत्रका वध करके भी उद्विग्न नहीं होंगे । अपनी प्रशंसाके लिये लोग बड़ी- बड़ी बातें बनायेंगे, किंतु समाजमें उनकी निन्दा नहीं होगी ॥ २८ ॥
म्लेच्छभूतं जगत् सर्वं निष्क्रियं यज्ञवर्जितम् ।
भविष्यति निरानन्दमनुत्सवमथो तथा ॥ २ ९ ॥
सारा संसार म्लेच्छोंकी भाँति शुभ कर्म और यज्ञ- यागादि छोड़ देगा तथा आनन्दशून्य और उत्सवरहित हो जायगा ॥ २ ९ ॥
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प्रायशः कृपणानां हि तथाबन्धुमतामपि ।
विधवानां च वित्तानि हरिष्यन्तीह मानवाः ॥ ३० ॥
लोग प्रायः दीनों, असहायों तथा विधवाओंका भी धन हड़प लेंगे ॥ ३० ॥
स्वल्पवीर्यबलाः स्तब्धा लोभमोहपरायणाः ।
तत्कथादानसंतुष्टा दुष्टानामपि मानवाः ॥ ३१ ॥
परिग्रहं करिष्यन्ति मायाचारपरिग्रहाः ।
समाह्वयन्तः कौन्तेय राजानः पापबुद्धयः ॥ ३२ ॥
परस्परवधोद्युक्ता मूर्खाः पण्डितमानिनः ।
भविष्यन्ति युगस्यान्ते क्षत्रिया लोककण्टकाः ॥ ३३ ॥
उनके शारीरिक बल और पराक्रम क्षीण हो जायँगे । वे उद्दण्ड होकर लोभ और मोहमें डूबे रहेंगे । वैसे ही लोगोंकी चर्चा करने और उनसे दान लेनेमें प्रसन्नताका अनुभव करेंगे । कपटपूर्ण आचारको अपनाकर वे दुष्टोंके दिये हुए दानको भी ग्रहण कर लेंगे । कुन्तीनन्दन! पापबुद्धि राजा एक- दूसरेको युद्धके लिये ललकारते हुए परस्पर एक-दूसरेके प्राण लेनेको उतारू रहेंगे और मूर्ख होते हुए अपनेको पण्डित मानेंगे । इस प्रकार युगान्तकालके सभी क्षत्रिय जगत्के लिये काँटे बन जायँगे ॥ ३१–३३ ॥
अरक्षितारो लुब्धाश्च मानाहङ्कारदर्पिताः ।
केवलं दण्डरुचयो भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ३४ ॥
कलियुगकी समाप्तिके समय वे प्रजाकी रक्षा तो करेंगे नहीं, उनसे रुपये ऐंठनेके लिये लोभ अधिक रखेंगे । सदा मान और अहंकारके मदमें चूर रहेंगे। वे केवल प्रजाको दण्ड देनेके कार्यमें ही रुचि रखेंगे ॥ ३४ ॥
आक्रम्याक्रम्य साधूनां दारांश्चापि धनानि च ।
भोक्ष्यन्ते निरनुक्रोशा रुदतामपि भारत ॥ ३५ ॥
भारत! लोग इतने निर्दयी हो जायँगे कि सज्जन पुरुषोंपर भी बार- बार आक्रमण करके उनके धन और स्त्रियोंका बलपूर्वक उपभोग करेंगे तथा उनके रोने -बिलखनेपर भी दया नहीं करेंगे ॥ ३५ ॥
न कन्यां याचते कश्चिन्नापि कन्या प्रदीयते ।
स्वयंग्राहा भविष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते ॥ ३६ ॥
कलियुगका अन्त आनेपर न तो कोई किसीसे कन्याकी याचना करेगा और न कोई कन्यादान ही करेगा । उस समयके वर- कन्या स्वयं ही एक- दूसरेको चुन लेंगे ॥
राजानश्चाप्यसंतुष्टाः परार्थान् मूढचेतसः ।
सर्वोपायैर्हरिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ॥ ३७ ॥
कलियुगकी समाप्तिके समय असंतोषी तथा मूढचित्त राजा भी सब तरहके उपायोंसे दूसरोंके धनका अपहरण करेंगे ॥ ३७ ॥
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म्लेच्छीभूतं जगत् सर्वं भविष्यति न संशयः ।
हस्तो हस्तं परिमुषेद् युगान्ते समुपस्थिते ॥ ३८ ॥
उस समय सारा जगत् म्लेच्छ हो जायगा – इसमें संशय नहीं । एक हाथ दूसरे हाथको लूटेगा – सगा भाई भी भाईके धनको हड़प लेगा ॥ ३८ ॥
सत्यं संक्षिप्यते लोके नरैः पण्डितमानिभिः ।
स्थविरा बालमतयो बालाः स्थविरबुद्धयः ॥ ३ ९ ॥
अपनेको पण्डित माननेवाले मुनष्य संसारमें सत्यको मिटा देंगे। बूढ़ोंकी बुद्धि बालकों-जैसी होगी और बालकोंकी बूढ़ों- जैसी ॥ ३ ९ ॥
भीरुस्तथा शूरमानी शूरा भीरुविषादिनः ।
न विश्वसन्ति चान्योन्यं युगान्ते पर्युपस्थिते ॥ ४० ॥
युगान्तकाल उपस्थित होनेपर कायर अपनेको शूर वीर मानेंगे और शूर- वीर कायरोंकी
भाँति विषादमें डूबे रहेंगे । कोई एक- दूसरेका विश्वास नहीं करेंगे ॥ ४० ॥
एकाहार्यं युगं सर्वं लोभमोहव्यवस्थितम् ।
अधर्मो वर्द्धते तत्र न तु धर्मः प्रवर्तते ॥ ४१ ॥
युगके सब लोग लोभ और मोहमें फँसकर भक्ष्याभक्ष्यका विचार किये बिना ही एक साथ सम्मिलित होकर भोजन करने लगेंगे । अधर्म बढ़ेगा और धर्म विदा हो जायगा ॥ ४१ ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या न शिष्यन्ति जनाधिप ।
एकवर्णस्तदा लोको भविष्यति युगक्षये ॥ ४२ ॥
नरेश्वर! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंका नाम भी नहीं रह जायगा । युगान्तकालमें सारा विश्व एक वर्ण, एक जातिका हो जायगा ॥ ४२ ॥
न क्षंस्यति पिता पुत्रं पुत्रश्च पितरं तथा ।
भार्याश्च पतिशुश्रूषां न करिष्यन्ति संक्षये ॥ ४३ ॥
युगक्षय - कालमें पिता पुत्रके अपराधको क्षमा नहीं करेंगे और पुत्र भी पिताकी बात नहीं सहेगा । स्त्रियाँ अपने पतियोंकी सेवा छोड़ देंगी ॥ ४३ ॥
ये यवान्ना जनपदा गोधूमान्नास्तथैव च ।
तान् देशान् संश्रयिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ॥ ४४ ॥
युगान्तकाल आनेपर ( लोग) उन प्रदेशोंमें चले जायँगे जहाँ जौ और गेहूँ आदि अनाज अधिक पैदा होते हैं ( चाहे वह देश निषिद्ध ही क्यों न हो ) ॥ ४४ ॥
स्वैराचाराश्च पुरुषा योषितश्च विशाम्पते ।
अन्योन्यं न सहिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ॥ ४५ ॥
महाराज! युगान्तकाल आनेपर पुरुष और स्त्रियाँ स्वेच्छाचारी होकर एक- दूसरेके कार्य और विचारको नहीं सहेंगे ॥ ४५ ॥
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म्लेच्छभूतं जगत् सर्वं भविष्यति युधिष्ठिर ।
न श्राद्धैस्तर्पयिष्यन्ति दैवतानीह मानवाः ॥ ४६ ॥
युधिष्ठिर! उस समय सारा जगत् म्लेच्छ हो जायगा । मनुष्य श्राद्ध और यज्ञ- कर्मोंद्वारा पितरों और देवताओंको संतुष्ट नहीं करेंगे ॥ ४६ ॥
न कश्चित् कस्यचिच्छ्रोता न कश्चित् कस्यचिद् गुरुः ।
तमोग्रस्तस्तदा लोको भविष्यति जनाधिप ॥ ४७ ॥
राजन्! उस समय कोई किसीका उपदेश नहीं सुनेगा और न कोई किसीका गुरु ही होगा । सारा जगत् अज्ञानमय अन्धकारसे आच्छादित हो जायगा ॥ ४७ ॥
परमायुश्च भविता तदा वर्षाणि षोडश ।
ततः प्राणान् विमोक्ष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते ॥ ४८ ॥
पञ्चमे वाथ षष्ठे वा वर्षे कन्या प्रसूयते ।
सप्तवर्षाष्टवर्षाश्च प्रजास्यन्ति नरास्तदा ॥ ४ ९ ॥
उस समय युगान्तकाल उपस्थित होनेपर लोगोंकी आयु अधिक- से - अधिक सोलह वर्षकी होगी, उसके बाद वे प्राणत्याग कर देंगे । पाँचवें या छठे वर्षमें स्त्रियाँ बच्चे पैदा करने लगेंगी और सात - आठ वर्षके पुरुष संतानोत्पादनमें प्रवृत्त हो जायँगे ॥ ४८-४९ ॥
पत्यौ स्त्री तु तदा राजन् पुरुषो वा स्त्रियं प्रति ।
युगान्ते राजशार्दूल न तोषमुपयास्यति ॥ ५० ॥
नृपश्रेष्ठ! युगान्तकाल आनेपर स्त्री अपने पतिसे और पति अपनी स्त्रीसे संतुष्ट नहीं होंगे ॥ ५० ॥
अल्पद्रव्या वृथालिङ्गा हिंसा च प्रभविष्यति ।
न कश्चित् कस्यचिद् दाता भविष्यति युगक्षये ॥ ५१ ॥
कलियुगके अन्तभागमें लोगोंके पास धन थोड़ा रहेगा और लोग दिखावेके लिये साधुवेष धारण करेंगे । हिंसाका जोर बढ़ेगा और कोई किसीको कुछ देनेवाला नहीं रहेगा ॥ ५१ ॥
अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः ।
केशशूलाः स्त्रियश्चापि भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ५२ ॥
युगक्षयकालमें सभी देशोंके लोग अन्न बेचेंगे । ब्राह्मण वेदविक्रय करेंगे और स्त्रियाँ वेश्या वृत्ति अपना लेंगी ॥ ५२ ॥
म्लेच्छाचाराः सर्वभक्षा दारुणाः सर्वकर्मसु ।
भाविनः पश्चिमे काले मनुष्या नात्र संशयः ॥ ५३ ॥
युगान्तकालके मनुष्य म्लेच्छों जैसे आचारवाले और सर्वभक्षी यानी अभक्ष्यका भी भक्षण करनेवाले हो जायँगे । वे प्रत्येक कर्ममें अपनी क्रूरताका परिचय देंगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ५३ ॥
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क्रयविक्रयकाले च सर्वः सर्वस्य वञ्चनम् ।
युगान्ते भरतश्रेष्ठ वित्तलोभात् करिष्यति ॥ ५४ ॥
भरतश्रेष्ठ! युगान्तकालमें धनके लोभसे क्रय- विक्रयके समय सभी सबको ठगेंगे ॥ ५४ ॥
ज्ञानानि चाप्यविज्ञाय करिष्यन्ति क्रियास्तथा ।
आत्मच्छन्देन वर्तन्ते युगान्ते समुपस्थिते ॥ ५५ ॥
क्रियाके तत्त्वको न जानकर भी लोग उसे करनेमें प्रवृत्त होंगे। युगान्तकालके सभी मानव स्वेच्छाचारी हो जायँगे ॥ ५५ ॥
स्वभावात् क्रूरकर्माणश्चान्योन्यमभिशंसिनः ।
भवितारो जनाः सर्वे सम्प्राप्ते तु युगक्षये ॥ ५६ ॥
आरामांश्चैव वृक्षांश्च नाशयिष्यन्ति निर्व्यथाः ।
भविता संशयो लोके जीवितस्य हि देहिनाम् ॥ ५७ ॥
सभी स्वभावतः क्रूर और एक-दूसरेपर मिथ्या कलंक लगानेवाले होंगे । युगान्तकाल उपस्थित होनेपर सब लोग बगीचों और वृक्षोंको कटवा देंगे और ऐसा करते समय उनके मनमें पीड़ा नहीं होगी । प्रत्येक मनुष्यके जीवनधारणमें भी शंका हो जायगी । अर्थात् प्रत्येक मनुष्यका जीवन धारण करना कठिन हो जायगा ॥ ५६-५७ ॥
तथा लोभाभिभूताश्च भविष्यन्ति नरा नृप ।
ब्राह्मणांश्च हनिष्यन्ति ब्राह्मणस्वोपभोगिनः ॥ ५८ ॥
राजन्! सब लोग लोभके वशीभूत होंगे और ब्राह्मणोंका धन उपभोग करनेका जिनका स्वभाव पड़ गया है, वे धनके लिये ब्राह्मणोंको मार भी डालेंगे ॥
हाहाकृता द्विजाश्चैव भयार्ता वृषलार्दिताः ।
त्रातारमलभन्तो वै भ्रमिष्यन्ति महीमिमाम् ॥ ५ ९ ॥
शूद्रोंके सताये हुए ब्राह्मण भयसे पीड़ित हो हाहाकार करने लगेंगे और अपने लिये कोई रक्षक न मिलनेके कारण सारी पृथ्वीपर निश्चय ही भटकते फिरेंगे ॥ ५ ९ ॥
जीवितान्तकराः क्रूरा रौद्राः प्राणिविहिंसकाः ।
यदा भविष्यन्ति नरास्तदा संक्षेप्स्यते युगम् ॥ ६० ॥
जब दूसरोंके जीवनका विनाश करनेवाले क्रूर, भयंकर तथा जीवहिंसक मनुष्य पैदा होने लगें, तब समझ लेना चाहिये कि युगान्तकाल उपस्थित हो गया ॥
आश्रयिष्यन्ति च नदीः पर्वतान् विषमाणि च ।
प्रधावमाना वित्रस्ता द्विजाः कुरुकुलोद्वह ॥ ६१ ॥
कुरुकुलतिलक युधिष्ठिर! अत्याचारियोंसे डरे हुए ब्राह्मण इधर- उधर भागकर नदियों, पर्वतों तथा दुर्गम स्थानोंका आश्रय लेंगे ॥ ६१ ॥
दस्युभिः पीडिता राजन् काका इव द्विजोत्तमाः ।
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कुराजभिश्च सततं करभारप्रपीडिताः ॥ ६२ ॥
धैर्यं त्यक्त्वा महीपाल दारुणे युगसंक्षये ।
विकर्माणि करिष्यन्ति शूद्राणां परिचारकाः ॥ ६३ ॥
राजन्! श्रेष्ठ ब्राह्मण भी लुटेरोंसे पीड़ित होकर कौओंकी तरह काँव- काँव करते फिरेंगे । दुष्ट राजाओंके लगाये हुए करोंके भारसे सदा पीड़ित होनेके कारण वे धैर्य छोड़कर चल देंगे और शूद्रोंकी सेवा- शुश्रूषामें लगे रहकर धर्मविरुद्ध कार्य करेंगे । भूपाल! भयंकर कलियुगके अन्तमें जगत्की यही दशा होगी ॥ ६२-६३ ॥
शूद्रा धर्मं प्रवक्ष्यन्ति ब्राह्मणाः पर्युपासकाः ।
श्रोतारश्च भविष्यन्ति प्रामाण्येन व्यवस्थिताः ॥ ६४ ॥
विपरीतश्च लोकोऽयं भविष्यत्यधरोत्तरः ।
एडूकान् पूजयिष्यन्ति वर्जयिष्यन्ति देवताः ॥ ६५ ॥
शूद्र धर्मोपदेश करेंगे और ब्राह्मणलोग उनकी सेवामें रहकर उसे सुनेंगे तथा उसीको प्रामाणिक मानकर उसका पालन करेंगे । समस्त लोकका व्यवहार विपरीत और उलट - पुलट हो जायगा । ऊँच नीच और नीच ऊँच हो जायँगे । लोग हड्डी जड़ी हुई दीवारोंकी तो पूजा करेंगे और देवविग्रहोंको त्याग देंगे ॥ ६४-६५ ॥
शूद्राः परिचरिष्यन्ति न द्विजान् युगसंक्षये ।
आश्रमेषु महर्षीणां ब्राह्मणावसथेषु च ॥ ६६ ॥
देवस्थानेषु चैत्येषु नागानामालयेषु च ।
एडूकचिह्ना पृथिवी न देवगृहभूषिता ॥ ६७ ॥
युगान्तकालमें शूद्र द्विजातियोंकी सेवा नहीं करेंगे। वह समय आनेपर महर्षियोंके आश्रमोंमें, ब्राह्मणोंके घरोंमें, देवस्थानोंमें, चैत्यवृक्षोंके आस- पास और नागालयोंमें जो भूमि होगी, उसपर हड्डी जड़ी हुई दीवारोंका चिह्न तो उपलब्ध होगा; परंतु देवमन्दिर उस भूमिकी शोभा नहीं बढ़ायेंगे ॥ ६६-६७ ॥
भविष्यति युगे क्षीणे तद् युगान्तस्य लक्षणम् ।
यदा रौद्रा धर्महीना मांसादाः पानपास्तथा ॥ ६८ ॥
भविष्यन्ति नरा नित्यं तदा संक्षेप्स्यते युगम् । यह सब युगान्तका लक्षण समझना चाहिये । जब सब मानव सदा भयंकर स्वभाववाले, धर्महीन, मांसखोर और शराबी हो जायँगे, उस समय युगका संहार होगा ॥ पुष्पं पुष्पे यदा राजन् फले वा फलमाश्रितम् ॥ ६ ९ ॥
प्रजास्यति महाराज तदा संक्षेप्स्यते युगम् ।
अकालवर्षी पर्जन्यो भविष्यति गते युगे ॥ ७० ॥
महाराज! जब फूलमें फूल, फलमें फल लगने लगेगा, उस समय युगका संहार होगा ।
युगान्तकालमें मेघ असमयमें ही वर्षा करेंगे ॥ ६ ९-७० ॥
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अक्रमेण मनुष्याणां भविष्यन्ति तदा क्रियाः ।
विरोधमथ यास्यन्ति वृषला ब्राह्मणैः सह ॥ ७१ ॥
मनुष्योंकी सारी क्रियाएँ क्रमसे विपरीत होंगी । शूद्र ब्राह्मणोंके साथ विरोध करेंगे ॥ ७१ ॥
मही म्लेच्छजनाकीर्णा भविष्यति ततोऽचिरात् ।
करभारभयाद् विप्रा भजिष्यन्ति दिशो दश ॥ ७२ ॥
सारी पृथ्वी थोड़े ही समयमें म्लेच्छोंसे भर जायगी । ब्राह्मणलोग करोंके भारसे भयभीत होकर दसों दिशाओंकी शरण लेंगे ॥ ७२ ॥
निर्विशेषा जनपदास्तथा विष्टिकरार्दिताः ।
आश्रमानुपलप्स्यन्ति फलमूलोपजीविनः ॥ ७३ ॥
सारे जनपद एक- जैसे आचार और वेशभूषा बना लेंगे । लोग बेगार लेनेवालों और कर लेनेवालोंसे पीड़ित हो एकान्त आश्रमोंमें चले जायँगे और फल- मूल खाकर जीवन- निर्वाह करेंगे ॥ ७३ ॥
एवं पर्याकुले लोके मर्यादा न भविष्यति ।
न स्थास्यन्त्युपदेशे च शिष्या विप्रियकारिणः ॥ ७४ ॥
इस तरह उथल - पुथल मच जानेपर संसारमें कोई मर्यादा नहीं रह जायगी । शिष्य गुरुके
उपदेशपर नहीं चलेंगे । वे उलटे उनका अहित करेंगे ॥ ७४ ॥
आचार्योऽपनिधिश्चैव भर्त्स्यते तदनन्तरम् ।
अर्थयुक्त्या प्रवत्स्यन्ति मित्रसम्बन्धिबान्धवाः ॥ ७५ ॥
अपने कुलका आचार्य भी यदि निर्धन हो तो उसे निरन्तर शिष्योंकी डाँट- फटकार सुननी पड़ेगी । मित्र, सम्बन्धी या भाई- बन्धु धनके लालचसे ही अपने पास रहेंगे ॥
अभावः सर्वभूतानां युगान्ते सम्भविष्यति ।
दिशः प्रज्वलिताः सर्वा नक्षत्राण्यप्रभाणि च ॥ ७६ ॥
युगान्तकाल आनेपर समस्त प्राणियोंका अभाव हो जायगा । सारी दिशाएँ प्रज्वलित हो उठेंगी और नक्षत्रोंकी प्रभा विलुप्त हो जायगी ॥ ७६ ॥
ज्योतींषि प्रतिकूलानि वाताः पर्याकुलास्तथा ।
उल्कापाताश्च बहवो महाभयनिदर्शकाः ॥ ७७ ॥
ग्रह उलटी गतिसे चलने लगेंगे । हवा इतनी जोरसे चलेगी कि लोग व्याकुल हो उठेंगे ।
महान् भयकी सूचना देनेवाले उल्कापात बार- बार होते रहेंगे ॥ ७७ ॥
षड्भिरन्यैश्च सहितो भास्करः प्रतपिष्यति ।
तुमुलाश्चापि निर्ह्रादा दिग्दाहाश्चापि सर्वशः ॥ ७८ ॥
एक सूर्य तो है ही, छः और उदय होंगे और सातों एक साथ तपेंगे । सब ओर बिजलीकी भयानक गड़गड़ाहट होगी, सब दिशाओंमें आग लगेगी ॥ ७८ ॥
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पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
कबन्धान्तर्हितो भानुरुदयास्तमने तदा ।
अकालवर्षी भगवान् भविष्यति सहस्रदृक् ॥ ७९ ॥
उदय और अस्तके समय सूर्य राहुसे ग्रस्त दिखायी देगा । भगवान् इन्द्र समयपर वर्षा नहीं करेंगे ॥
सस्यानि च न रोक्ष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ।
अभीक्ष्णं क्रूरवादिन्यः परुषा रुदितप्रियाः ॥ ८० ॥
युगान्तकाल उपस्थित होनेपर बोयी हुई खेती उगेगी ही नहीं; स्त्रियाँ कठोर
स्वभाववाली और सदा कटुवादिनी होंगी । उन्हें रोना ही अधिक पसंद होगा ॥ ८० ॥
भर्तॄणां वचने चैव न स्थास्यन्ति ततः स्त्रियः ।
पुत्राश्च मातापितरौ हनिष्यन्ति युगक्षये ॥ ८१ ॥
वे पतिकी आज्ञामें नहीं रहेंगी । युगान्तकालमें पुत्र माता -पिताकी हत्या करेंगे ॥ ८१ ॥
सूदयिष्यन्ति च पतीन् स्त्रियः पुत्रानपाश्रिताः ।
अपर्वणि महाराज सूर्यं राहुरुपैष्यति ॥ ८२ ॥
नारियाँ अपने बेटोंसे मिलकर पतिकी हत्या करा देंगी । महाराज! अमावस्याके बिना ही राहु सूर्यपर ग्रहण लगायेगा ॥ ८२ ॥
युगान्ते हुतभुक् चापि सर्वतः प्रज्वलिष्यति ।
पानीयं भोजनं चापि याचमानास्तदाध्वगाः ॥ ८३ ॥
न लप्स्यन्ते निवासं च निरस्ताः पथि शेरते । युगान्तकाल आनेपर सब ओर आग भी जल उठेगी । उस समय पथिकोंको माँगनेपर कहीं अन्न, जल या ठहरनेके लिये स्थान नहीं मिलेगा । वे सब ओरसे कोरा जवाब पाकर निराश हो सड़कोंपर ही सो रहेंगे ॥ निर्घातवायसा नागाः शकुनाः समृगद्विजाः ॥ ८४ ॥
रूक्षा वाचो विमोक्ष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ।
मित्रसम्बन्धिनश्चापि संत्यक्ष्यन्ति नरास्तदा ॥ ८५ ॥
जनं परिजनं चापि युगान्ते पर्युपस्थिते । युगान्तकाल उपस्थित होनेपर बिजलीकी कड़कके समान कड़वी बोली बोलनेवाले कौवे, हाथी, शकुन, पशु और पक्षी आदि बड़ी कठोर वाणी बोलेंगे । उस समयके मनुष्य अपने मित्रों, सम्बन्धियों, सेवकों तथा कुटुम्बीजनोंको भी अकारण त्याग देंगे ॥ ८४-८५३ || अथ देशान् दिशश्चापि पत्तनानि पुराणि च ॥ ८६ ॥
क्रमशः संश्रयिष्यन्ति युगान्ते पर्युपस्थिते ।
हातात हा सुतेत्येवं तदा वाचः सुदारुणाः ॥ ८७ ॥
विक्रोशमानश्चान्योन्यं जनो गां पर्यटिष्यति ।