02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1321–1330

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1321–1330

पृष्ठ 1321

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ततस्तुमुलसङ्घाते वर्तमाने युगक्षये ॥ ८८ ॥

प्रायः लोग स्वदेश छोड़कर दूसरे देशों, दिशाओं, नगरों और गाँवोंका आश्रय लेंगे और हा तात! हा पुत्र! इत्यादि रूपसे अत्यन्त दुःखद वाणीमें एक- दूसरेको पुकारते हुए इस पृथ्वीपर विचरेंगे । युगान्तकालमें संसारकी यही दशा होगी । उस समय एक ही साथ समस्त लोकोंका भयंकर संहार होगा ॥ ८६-८८ ॥

द्विजातिपूर्वको लोकः क्रमेण प्रभविष्यति ।

ततः कालान्तरेऽन्यस्मिन् पुनर्लोकविवृद्धये ॥ ८ ९ ॥

भविष्यति पुनर्दैवमनुकूलं यदृच्छया ।

यदा सूर्यश्च चन्द्रश्च तथा तिष्यबृहस्पती ॥ ९० ॥

एकराशौ समेष्यन्ति प्रपत्स्यति तदा कृतम् ।

कालवर्षी च पर्जन्यो नक्षत्राणि शुभानि च ॥ ९ १ ॥

तदनन्तर कालान्तरमें सत्ययुगका आरम्भ होगा और फिर क्रमशः ब्राह्मण आदि वर्ण प्रकट होकर अपने प्रभावका विस्तार करेंगे । उस समय लोकके अभ्युदयके लिये पुनः अनायास दैव अनुकूल होगा । जब सूर्य, चन्द्रमा और बृहस्पति एक साथ पुष्य नक्षत्र एवं तदनुरूप एक राशि कर्कमें पदार्पण करेंगे, तब सत्ययुगका प्रारम्भ होगा । उस समय मेघ समयपर वर्षा करेगा । नक्षत्र शुभ एवं तेजस्वी हो जायँगे ॥ ८ ९ – ९ १ ॥

प्रदक्षिणा ग्रहाश्चापि भविष्यन्त्यनुलोमगाः ।

क्षेमं सुभिक्षमारोग्यं भविष्यति निरामयम् ॥ ९ २ ॥

ग्रह प्रदक्षिणाभावसे अनुकूल गतिका आश्रय ले अपने पथपर अग्रसर होंगे। उस समय सबका मंगल होगा । देशमें सुकाल आ जायगा । आरोग्यका विस्तार होगा । तथा रोग-व्याधिका नाम भी नहीं रहेगा ॥ ९ २ ॥

कल्की विष्णुयशा नाम द्विजः कालप्रचोदितः ।

उत्पत्स्यते महावीर्यो महाबुद्धिपराक्रमः ॥ ९ ३ ॥

सम्भूतः सम्भलग्रामे ब्राह्मणावसथे शुभे । ( महात्मा वृत्तसम्पन्नः प्रजानां हितकृन्नृप । ) राजन्! युगान्तके समय कालकी प्रेरणासे सम्भल नामक ग्राममें किसी ब्राह्मणके मंगलमय गृहमें एक महान् शक्तिशाली बालक प्रकट होगा, जिसका नाम होगा विष्णुयशा कल्की । वह महान् बुद्धि एवं पराक्रमसे सम्पन्न महात्मा, सदाचारी तथा प्रजावर्गका हितैषी होगा । ( वह बालक ही भगवान्‌का कल्की अवतार कहलायेगा) ॥ ९ ३ ॥ मनसा तस्य सर्वाणि वाहनान्यायुधानि च ॥ ९ ४ ॥

उपस्थास्यन्ति योधाश्च शस्त्राणि कवचानि च ।

स धर्मविजयी राजा चक्रवर्ती भविष्यति ॥ ९ ५ ॥

पृष्ठ 1322

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मनके द्वारा चिन्तन करते ही उसके पास इच्छानुसार वाहन, अस्त्र- शस्त्र, योद्धा और

कवच उपस्थित हो जायँगे । वह धर्मविजयी चक्रवर्ती राजा होगा ॥ ९ ४- ९ ५ ॥

स चेमं संकुलं लोकं प्रसादमुपनेष्यति ।

उत्थितो ब्राह्मणो दीप्तः क्षयान्तकृदुदारधीः ॥ ९ ६ ॥

वह उदारबुद्धि, तेजस्वी ब्राह्मण, दुःखसे व्याप्त हुए इस जगत्को आनन्द प्रदान करेगा । कलियुगका अन्त करनेके लिये ही उसका प्रादुर्भाव होगा ॥ ९ ६ ॥ संक्षेपको हि सर्वस्य युगस्य परिवर्तकः ।

स सर्वत्र गतान् क्षुद्रान् ब्राह्मणैः परिवारितः ।

उत्सादयिष्यति तदा सर्वम्लेच्छगणान् द्विजः ॥ ९ ७ ॥

वही सम्पूर्ण कलियुगका संहार करके नूतन सत्ययुगका प्रवर्तक होगा । वह ब्राह्मणोंसे घिरा हुआ सर्वत्र विचरेगा और भूमण्डलमें सर्वत्र फैले हुए नीच स्वभाववाले सम्पूर्ण म्लेच्छोंका संहार कर डालेगा ॥ ९ ७ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि भविष्यकथने नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें भविष्यवर्णनविषयक एक सौ नब्बेवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९० ॥ ( दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ९ ७३ श्लोक हैं )

पृष्ठ 1323

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एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः भगवान् कल्कीके द्वारा सत्ययुगकी स्थापना और मार्कण्डेयजीका युधिष्ठिरके लिये धर्मोपदेश मार्कण्डेय उवाच

ततश्चोरक्षयं कृत्वा द्विजेभ्यः पृथिवीमिमाम् ।

वाजिमेधे महायज्ञे विधिवत् कल्पयिष्यति ॥ १ ॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! उस समय चोर डाकुओं एवं म्लेच्छोंका विनाश करके भगवान् कल्की अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान करेंगे और उसमें यह सारी पृथ्वी विधिपूर्वक ब्राह्मणको दे डालेंगे ॥ १ ॥

स्थापयित्वा च मर्यादाः स्वयम्भुविहिताः शुभाः ।

वनं पुण्ययशःकर्मा रमणीयं प्रवेक्ष्यति ॥ २ ॥

उनका यश तथा कर्म सभी परम पावन होंगे । वे ब्रह्माजीकी चलायी हुई मंगलमयी मर्यादाओंकी स्थापना करके ( तपस्याके लिये ) रमणीय वनमें प्रवेश करेंगे ॥ २ ॥

तच्छीलमनुवर्त्स्यन्ति मनुष्या लोकवासिनः ।

विप्रैश्चोरक्षये चैव कृते क्षेमं भविष्यति ॥ ३ ॥

फिर इस जगत्के निवासी मनुष्य उनके शील- स्वभावका अनुकरण करेंगे । इस प्रकार सत्ययुगमें ब्राह्मणोंद्वारा दस्युदलका विनाश हो जानेपर संसारका मंगल होगा ॥ ३ ॥

कृष्णाजिनानि शक्तीश्च त्रिशूलान्यायुधानि च ।

स्थापयन् द्विजशार्दूलो देशेषु विजितेषु च ॥ ४ ॥

संस्तूयमानो विप्रेन्द्रैर्मानयानो द्विजोत्तमान् ।

कल्की चरिष्यति महीं सदा दस्युवधे रतः ॥ ५ ॥

द्विजश्रेष्ठ कल्की सदा दस्युवधमें तत्पर रहकर समस्त भूतलपर विचरते रहेंगे और अपने द्वारा जीते हुए देशोंमें काले मृगचर्म, शक्ति, त्रिशूल तथा अन्य अस्त्र- शस्त्रोंकी स्थापना करते हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंद्वारा अपनी स्तुति सुनेंगे और स्वयं भी उन ब्राह्मणशिरोमणियोंको यथोचित सम्मान देंगे ॥ ४-५ ॥

हा मातस्तात पुत्रेति तास्ता वाचः सुदारुणाः ।

विक्रोशमानान् सुभृशं दस्यून् नेष्यति संक्षयम् ॥ ६ ॥

ततोऽधर्मविनाशो वै धर्मवृद्धिश्च भारत ।

भविष्यति कृते प्राप्ते क्रियावांश्च जनस्तथा ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1324

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उस समय चोर और लुटेरे दर्दभरी वाणीमें ' हाय मैया ', ' हाय बप्पा ' और ' हाय बेटा ' इत्यादि कहकर जोर- जोरसे चीत्कार करेंगे और उन सबका भगवान् कल्की विनाश कर डालेंगे । भारत! दस्युओंके नष्ट हो जानेपर अधर्मका भी नाश हो जायगा और धर्मकी वृद्धि होने लगेगी । इस प्रकार सत्ययुग आ जानेपर सब मनुष्य सत्यकर्मपरायण होंगे ॥ ६-७ ॥

आरामाश्चैव चैत्याश्च तटाकावसथास्तथा ।

पुष्करिण्यश्च विविधा देवतायतनानि च ॥ ८ ॥

यज्ञक्रियाश्च विविधा भविष्यन्ति कृते युगे ।

ब्राह्मणाः साधवश्चैव मुनयश्च तपस्विनः ॥ ९ ॥

उस युगमें नये - नये बगीचे लगाये जायँगे । चैत्यवृक्षोंकी स्थापना होगी । पोखरों और धर्मशालाओंका निर्माण होगा । भाँति- भाँतिकी पोखरियाँ तैयार होंगी । कितने ही देवमन्दिर बनेंगे और नाना प्रकारके यज्ञकर्मोंका अनुष्ठान होगा । ब्राह्मण साधु- स्वभावके होंगे । मुनिलोग तपस्यामें तत्पर रहेंगे ॥ ८ - ९ ॥

आश्रमा हतपाखण्डाः स्थिताः सत्यरताः प्रजाः ।

जनिष्यन्ते च बीजानि रोप्यमाणानि चैव हह ॥ १० ॥

आश्रम पाखण्डियोंसे रहित होंगे और सारी प्रजा सत्यपरायण होगी । खेतोंमें बोये जानेवाले सब प्रकारके बीज अच्छी तरह उगेंगे ॥ १० ॥

सर्वेष्वृतुषु राजेन्द्र सर्वं सस्यं भविष्यति ।

नरा दानेषु निरता व्रतेषु नियमेषु च ॥ ११ ॥

राजेन्द्र! सभी ऋतुओंमें सभी प्रकारके अनाज पैदा होंगे । सब लोग दान, व्रत और नियमोंमें लगे रहेंगे ॥ ११ ॥

जपयज्ञपरा विप्रा धर्मकामा मुदा युताः ।

पालयिष्यन्ति राजानो धर्मेणेमां वसुन्धराम् ॥ १२ ॥

ब्राह्मण प्रसन्नतापूर्वक जपयज्ञमें तत्पर रहेंगे और धर्ममें ही उनकी रुचि होगी ।

क्षत्रियनरेश धर्मपूर्वक इस पृथ्वीका पालन करेंगे ॥ १२ ॥

व्यवहाररता वैश्या भविष्यन्ति कृते युगे ।

षट्कर्मनिरता विप्राः क्षत्रिया विक्रमे रताः ॥ १३ ॥

शुश्रूषायां रताः शूद्रास्तथा वर्णत्रयस्य च । सत्ययुगके वैश्य सदा न्यायपूर्वक व्यापार करनेवाले होंगे । ब्राह्मण यजन-याजन, अध्ययन -अध्यापन, दान और प्रतिग्रह -इन छः कर्मोंमें तत्पर रहेंगे । क्षत्रिय बल- पराक्रममें अनुराग रखेंगे तथा शूद्र ब्राह्मण आदि तीनों वर्णोंकी सेवामें लगे रहेंगे ॥ १३३ ॥

एष धर्मः कृतयुगे त्रेतायां द्वापरे तथा ॥ १४ ॥

पश्चिमे युगकाले च यः स ते सम्प्रकीर्तितः ।

सर्वलोकस्य विदिता युगसंख्या च पाण्डव ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1325

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धर्मका यह स्वरूप सत्ययुगमें अक्षुण्ण रहेगा । त्रेता, द्वापर तथा कलियुगमें धर्मकी जैसी स्थिति रहेगी, उसका वर्णन तुमसे किया जा चुका है । पाण्डुनन्दन! तुम्हें सम्पूर्ण लोककी युग - संख्याका ज्ञान भी हो चुका है ॥ १४-१५ ॥

एतत् ते सर्वमाख्यातमतीतानागतं तथा ।

वायुप्रोक्तमनुस्मृत्य पुराणमृषिसंस्तुतम् ॥ १६ ॥

राजन्! ऋषियोंद्वारा प्रशंसित तथा वायुदेवद्वारा वर्णित पुराणकी बातोंका स्मरण करके मैंने तुमसे यह भूत- भविष्यका सारा वृत्तान्त बताया है ॥ १६ ॥

एवं संसारमार्गा मे बहुशश्चिरजीविना ।

दृष्टाश्चैवानुभूताश्च तांस्ते कथितवानहम् ॥ १७ ॥

इस प्रकार चिरजीवी होनेके कारण मैंने संसारके मार्गोंका अनेक बार दर्शन और अनुभव किया है, जिनका तुम्हारे समक्ष वर्णन कर दिया है ॥ १७ ॥

इदं चैवापरं भूयः सह भ्रातृभिरच्युत ।

धर्मसंशयमोक्षार्थं निबोध वचनं मम ॥ १८ ॥

धर्ममर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले युधिष्ठिर! तुम अपने भाइयोंसहित यह मेरी एक बात और सुनो । धर्मविषयक संदेहका निवारण करनेके लिये मेरे वचनको ध्यान देकर सुनो ॥ १८ ॥

धर्मे त्वयाऽऽत्मा संयोज्यो नित्यं धर्मभृतां वर ।

धर्मात्मा हि सुखं राजन् प्रेत्य चेह च नन्दति ॥ १ ९ ॥

धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाराज! तुम्हें अपने - आपको सदा धर्ममें ही लगाये रखना चाहिये; क्योंकि धर्मात्मा मनुष्य इस लोक और परलोकमें भी बड़े सुखसे रहता है ॥ १ ९ ॥

निबोध च शुभां वाणीं यां प्रवक्ष्यामि तेऽनघ ।

न ब्राह्मणे परिभवः कर्तव्यस्ते कदाचन ॥ २० ॥

ब्राह्मणः कुपितो हन्यादपि लोकान् प्रतिज्ञया । निष्पाप नरेश! मेरी इस कल्याणमयी वाणीको समझो, जिसे मैं अभी तुम्हें सुना रहा हूँ । युधिष्ठिर! तुम्हें कभी किसी ब्राह्मणका तिरस्कार नहीं करना चाहिए; क्योंकि यदि ब्राह्मण कुपित हो जाय और किसी बातकी प्रतिज्ञा कर ले, तो वह उस प्रतिज्ञाके अनुसार सम्पूर्ण लोकोंका विनाश कर सकता है ॥ २०३ ॥

वैशम्पायन उवाच मार्कण्डेयवचः श्रुत्वा कुरूणां प्रवरो नृपः ॥ २१ ॥

उवाच वचनं धीमान् परमं परमद्युतिः । वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! मार्कण्डेयजीकी यह बात सुनकर परम तेजस्वी और बुद्धिमान् कुरुकुलरत्न राजा युधिष्ठिरने यह उत्तम वचन कहा- ॥ २१३ ॥

पृष्ठ 1326

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कस्मिन् धर्मे मया स्थेयं प्रजाः संरक्षता मुने ॥ २२ ॥

कथं च वर्तमानो वै न च्यवेयं स्वधर्मतः । ' मुने! प्रजाकी रक्षा करते हुए किस धर्ममें स्थित रहना चाहिये । मेरा व्यवहार और बर्ताव कैसा हो, जिससे मैं स्वधर्मसे कभी च्युत न होऊँ? ' ॥ २२३ ॥

मार्कण्डेय उवाच दयावान् सर्वभूतेषु हितो रक्तोऽनसूयकः ॥ २३ ॥

सत्यवादी मृदुर्दान्तः प्रजानां रक्षणे रतः ।

चर धर्मं त्यजाधर्मं पितॄन् देवांश्च पूजय ॥ २४ ॥

मार्कण्डेयजीने कहा - राजन्! तुम सब प्राणियोंपर दया करो । सबके हितैषी बने रहो । सबपर प्रेमभाव रखो और किसीमें दोषदृष्टि मत करो । सत्यवादी, कोमलस्वभाव, जितेन्द्रिय और प्रजापालनमें तत्पर रहकर धर्मका आचरण करो । अधर्मको दूरसे ही त्याग दो तथा देवता और पितरोंकी आराधना करते रहो ॥ २३-२४ ॥

प्रमादाद् यत् कृतं तेऽभूत् सम्यग् दानेन तज्जय ।

अलं ते मानमाश्रित्य सततं परवान् भव ॥ २५ ॥

यदि प्रमादवश तुम्हारेद्वारा किसीके प्रति कोई अनुचित व्यवहार हो गया हो तो उसे अच्छी प्रकार दानसे संतुष्ट करके वशमें करो । मैं सबका स्वामी हूँ, ऐसे अहंकारको कभी पासमें न आने दो । तुम अपनेको सदा पराधीन समझते रहो ॥ २५ ॥

विजित्य पृथिवीं सर्वां मोदमानः सुखी भव ।

एष भूतो भविष्यश्च धर्मस्ते समुदीरितः ॥ २६ ॥

न तेऽस्त्यविदितं किञ्चिदतीतानागतं भुवि ।

तस्मादिमं परिक्लेशं त्वं तात हृदि मा कृथाः ॥ २७ ॥

सारी पृथ्वीको जीतकर सदा सानन्द और सुखी रहो । तात युधिष्ठिर! मैंने तुम्हें जो यह धर्म बताया है, इसका पालन भूतकालमें भी हुआ है और भविष्यकालमें भी इसका पालन होना चाहिए । भूत और भविष्यकी ऐसी कोई बात नहीं है, जो तुम्हें ज्ञात न हो; अतः इस समय जो यह क्लेश तुम्हें प्राप्त हुआ है, इसके लिये हृदयमें कोई विचार न करो ॥ २६-२७ ॥

प्राज्ञास्तात न मुह्यन्ति कालेनापि प्रपीडिताः ।

एष कालो महाबाहो अपि सर्वदिवौकसाम् ॥ २८ ॥

तात! विद्वान् पुरुष कालसे पीड़ित होनेपर भी कभी मोहमें नहीं पड़ते । महाबाहो! यह काल सम्पूर्ण देवताओंपर भी अपना प्रभाव डालता है ॥ २८ ॥

मुह्यन्ति हि प्रजास्तात कालेनापि प्रचोदिताः ।

मा च तत्र विशङ्काभूद् यन्मयोक्तं तवानघ ॥ २ ९ ॥

पृष्ठ 1327

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युधिष्ठिर! कालसे प्रेरित होकर ही यह सारी प्रजा मोहग्रस्त होती है । अनघ! मैंने तुम्हारे सामने जो कुछ भी कहा है, उसमें तुम्हें किसी प्रकारकी शंका नहीं होनी चाहिये ॥ २ ९ ॥

आशङ्कय मद्वचो ह्येतद् धर्मलोपो भवेत् तव ।

जातोऽसि प्रथिते वंशे कुरूणां भरतर्षभ ॥ ३० ॥

कर्मणा मनसा वाचा सर्वमेतत् समाचर । मेरे इस वचनमें संदेह करनेपर तुम्हारे धर्मका लोप होगा। भरतकुलभूषण । तुम कौरवोंके प्रख्यात कुलमें उत्पन्न हुए हो; अतः मन, वाणी और क्रियाद्वारा इन सब बातोंका पालन करो ॥ ३०३ ॥

युधिष्ठिर उवाच यत् त्वयोक्तं द्विजश्रेष्ठ वाक्यं श्रुतिमनोहरम् ॥ ३१ ॥

तथा करिष्ये यत्नेन भवतः शासनं विभो ।

न मे लोभोऽस्ति विप्रेन्द्र न भयं न च मत्सरः ॥ ३२ ॥

करिष्यामि हि तत् सर्वमुक्तं यत् ते मयि प्रभो । युधिष्ठिरने कहा – द्विजश्रेष्ठ! आपने मुझे जो उपदेश दिया है, वह मेरे कानोंको मधुर एवं मनको प्रिय लगा है । विभो! मैं आपकी आज्ञाका यत्नपूर्वक पालन करूँगा । ब्राह्मणश्रेष्ठ! मेरे मनमें लोभ, भय और ईर्ष्या नहीं है । प्रभो! आपने मेरे लिये जो कहा है, इसका अवश्य पालन करूँगा ॥ ३१-३२ ॥ वैशम्पायन उवाच श्रुत्वा तु वचनं तस्य मार्कण्डेयस्य धीमतः ॥ ३३ ॥

संहृष्टाः पाण्डवा राजन् सहिताः शार्ङ्गधन्वना ।

विप्रर्षभाश्च ते सर्वे ये तत्रासन् समागताः ॥ ३४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! उन परम बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीका वचन सुनकर भगवान् श्रीकृष्णसहित पाँचों पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए । साथ ही जो श्रेष्ठ ब्राह्यण वहाँ पधारे थे, उन सबको भी बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ३३-३४ ॥

तथा कथां शुभां श्रुत्वा मार्कण्डेयस्य धीमतः ।

विस्मिताः समपद्यन्त पुराणस्य निवेदनात् ॥ ३५ ॥

बुद्धिमान् मार्कण्डेयजीके मुखसे वह मंगलमयी कथा सुनकर पुराणोक्त बातोंका ज्ञान हो जानेसे सब लोग बड़े ही विस्मित और प्रसन्न हुए ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि युधिष्ठिरानुशासने एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ १ ॥

पृष्ठ 1328

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इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें युधिष्ठिरके ति उपदेशविषयक एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९ १ ॥

पृष्ठ 1329

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द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित्का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता वैशम्पायन उवाच भूय एव ब्राह्मणमहाभाग्यं वत्कुमर्हसीत्यब्रवीत् पाण्डवेयो मार्कण्डेयम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने मुनिवर मार्कण्डेयसे कहा — ‘ ब्रह्मन्! पुनः ब्राह्मणोंकी महिमाका वर्णन कीजिये' ॥ १ ॥

अथाचष्ट मार्कण्डेयोऽपूर्वमिदं श्रूयतां ब्राह्मणानां चरितम् ॥ २ ॥

तब मार्कण्डेयजीने कहा – ' राजन्! ब्राह्मणोंके इस अद्भुत चरित्रका श्रवण करो ॥ २ ॥

‘ अयोध्यायामिक्ष्वाकुकुलोद्वहः पार्थिवः परिक्षिन्नाम मृगयामगमत् ॥ ३ ॥

' अयोध्यापुरीमें इक्ष्वाकुकुलके धुरंधर वीर राजा परीक्षित् रहते थे । वे एक दिन शिकार खेलनेके लिये गये ॥ ३ ॥

तमेकाश्वेन मृगमनुसरन्तं मृगो दूरमपाहरत् ॥ ४ ॥

‘ उन्होंने एकमात्र अश्वकी सहायतासे एक हिंसक पशुका पीछा किया । वह पशु उन्हें बहुत दूर हटा ले गया ॥ ४ ॥

अध्वनि जातश्रमः क्षुत्तृष्णाभिभूतश्चैकस्मिन् देशे नीलं गहनं वनखण्डमपश्यत् ॥ ५ ॥ ‘ मार्गमें उन्हें बड़ी थकावट हुई और वे भूख-प्यास से व्याकुल हो गये । उसी समय उन्हें एक ओर नीले रंगका एक दूसरा वन दिखायी दिया, जो और भी घना था ॥ ५ ॥

तच्च विवेश ततस्तस्य वनखण्डस्य मध्येऽतीव रमणीयं सरो दृष्ट्वा साश्व एव व्यगाहत ॥ ६ ॥

‘ तत्पश्चात् राजाने उसके भीतर प्रवेश किया । उस वनस्थलीके मध्यभागमें एक अत्यन्त रमणीय सरोवर था । उसे देखकर राजा घोड़ेसहित सरोवरके जलमें घुस गये ॥ ६ ॥

अथाश्वस्तः स बिसमृणालमश्वायाग्रतो निक्षिप्य पुष्करिणीतीरे संविवेश । ततः शयानो मधुरं गीतमशृणोत् ॥ ७ ॥

‘ जल पीकर जब वे कुछ आश्वस्त हुए, तब घोड़ेके आगे कुछ कमलकी नालें डालकर स्वयं उस सरोवरके तटपर लेट गये । लेटे - ही- लेटे उनके कानोंमें कहींसे मधुर गीतकी ध्वनि सुनायी पड़ी ॥ ७ ॥

स श्रुत्वाचिन्तयन्नेह मनुष्यगतिं पश्यामि कस्य खल्वयं गीतशब्द इति ॥ ८ ॥

पृष्ठ 1330

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' उसे सुनकर राजा सोचने लगे कि ' यहाँ मनुष्योंकी गति तो नहीं दिखायी देती । फिर यह किसके गीतका शब्द सुनायी देता है ' ॥ ८ ॥

अथापश्यत् कन्यां परमरूपदर्शनीयां पुष्पाण्यवचिन्वन्तीं गायन्तीं च । अथ सा राज्ञः समीपे पर्यक्रामत् ॥ ९ ॥

‘ इतनेहीमें उनकी दृष्टि एक कन्यापर पड़ी, जो अपने परम सुन्दर रूपके कारण देखने ही योग्य थी । वह वनके फूल चुनती हुई गीत गा रही थी । धीरे- धीरे भ्रमण करती हुई वह राजाके समीप आ गयी ॥ ९ ॥

तामब्रवीद् राजा कस्यासि भद्रे का वा त्वमिति । सा प्रत्युवाच कन्याऽस्मीति तां राजोवाचार्थी त्वयाहमिति ॥ १० ॥

' तब राजाने उससे पूछा- 'कल्याणी! तुम कौन और किसकी हो?' उसने उत्तर दिया — ' मैं कन्या हूँ— अभी मेरा विवाह नहीं हुआ है । ' तब राजाने उससे कहा — ' भद्रे! मैं तुझे चाहता हूँ' ॥ १० ॥

अथोवाच कन्या समयेनाहं शक्या त्वया लब्धुं नान्यथेति राजा तां समयमपृच्छत् । कन्योवाच नोदकं मे दर्शयितव्यमिति ॥ ११ ॥

‘ कन्या बोली’ तुम मुझे एक शर्तके साथ पा सकते हो अन्यथा नहीं । ' राजाने उससे वह शर्त पूछी । कन्याने कहा- ' मुझे कभी जलका दर्शन न कराना' ॥ ११ ॥

स राजा तां बाढमित्युक्त्वा तामुपयेमे कृतोद्वाहश्च राजा परीक्षित् क्रीडमानो मुदा परमया युक्तस्तूष्णीं सङ्गम्य तया सहास्ते ॥ १२ ॥

‘ तब राजाने उससे ‘ बहुत अच्छा' कहकर उससे ( गान्धर्व) विवाह किया । विवाहके पश्चात् राजा परीक्षित् अत्यन्त आनन्दपूर्वक उसके साथ क्रीड़ा -विहार करने लगे और एकान्तमें मिलकर उसके साथ चुपचाप बैठे रहे ॥ १२ ॥

ततस्तत्रैवासीने राजनि सेनान्वगच्छत् ॥ १३ ॥

‘ राजा अभी वहीं बैठे थे, इतनेहीमें उनकी सेना आ पहुँची ॥ १३ ॥

सा सेनोपविष्टं राजानं परिवार्यातिष्ठत् । पर्याश्वस्तश्च राजा तयैव सह शिबिकया प्रायादव - घोटितया स स्वं नगरमनुप्राप्य रहसि तया सहास्ते ॥ १४ ॥

'वह सेना अपने बैठे हुए राजाको चारों ओरसे घेरकर खड़ी हो गयी । अच्छी तरह सुस्ता लेनेके पश्चात् राजा एक साफ- सुथरी चिकनी पालकीमें उसीके साथ बैठकर अपने नगरको चल दिये और वहाँ पहुँचकर उस नवविवाहिता सुन्दरीके साथ एकान्तवास करने लगे ॥ १४ ॥

तत्राभ्याशस्थोऽपि कश्चिन्नापश्यदथ प्रधानामा- त्योऽभ्याशचरास्तस्य स्त्रियोऽपृच्छत् ॥ १५ ॥

‘ वहाँ निकट होते हुए भी कोई उनका दर्शन नहीं कर पाता था । तब एक दिन प्रधान मन्त्रीने राजाके पास रहनेवाली स्त्रियोंसे पूछा— ॥ १५ ॥