02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1661–1670
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1661–1670
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भय न हो । तदनन्तर अपनी विजयसे उल्लसित होते हुए सारे गन्धर्व शत्रुओंका सामना करनेके लिये लौट पड़े ॥ ५–७ ॥
दृष्ट्वा रथागतान् वीरान् पाण्डवांश्चतुरो रणे ।
तांस्तु विभ्राजितान् दृष्ट्वा लोकपालानिवोद्यतान् ॥ ८ ॥
व्यूढानीका व्यतिष्ठन्त गन्धमादनवासिनः । उन्होंने देखा, चारों वीर पाण्डव युद्धके लिए उद्यत हो रथपर बैठे हुए आ रहे हैं और अपनी कान्तिसे लोकपालोंके समान उद्भासित हो रहे हैं । यह देखकर गन्धमादननिवासी गन्धर्व अपनी सेनाकी व्यूहरचना करके खड़े हो गये ॥ ८३ ॥
राज्ञस्तु वचनं स्मृत्वा धर्मपुत्रस्य धीमतः ॥ ९ ॥
क्रमेण मृदुना युद्धमुपक्रान्तं च भारत । भारत! परम बुद्धिमान् धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके पूर्वोक्त वचनोंको स्मरण करके पाण्डवोंने कोमलतापूर्वक ही युद्ध आरम्भ किया ॥ ९ ३ ॥ न तु गन्धर्वराजस्य सैनिका मन्दचेतसः ॥ १० ॥
शक्यन्ते मृदुना श्रेयः प्रतिपादयितुं तदा । परंतु गन्धर्वराज चित्रसेनके मूढ़ सैनिक ऐसे नहीं थे जिन्हें कोमलतापूर्ण बर्तावके द्वारा कल्याणके पथपर लाया जा सके ॥ १०३ ॥
ततस्तान् युधि दुर्धर्षान् सव्यसाची परंतपः ॥ ११ ॥
सान्त्वपूर्वमिदं वाक्यमुवाच खचरान् रणे ।
विसर्जयत राजानं भ्रातरं मे सुयोधनम् ॥ १२ ॥
तो भी उस समय शत्रुओंको संताप देनेवाले सव्यसाची अर्जुनने रणदुर्जय आकाशचारी गन्धर्वोंको समझाते हुए इस प्रकार कहा - ' तुम सब लोग मेरे भाई राजा दुर्योधनको छोड़ दो ' ॥ ११-१२ ॥
त एवमुक्ता गन्धर्वाः पाण्डवेन यशस्विना ।
उत्स्मयन्तस्तदा पार्थमिदं वचनमब्रुवन् ॥ १३ ॥
यशस्वी पाण्डुनन्दन अर्जुनके ऐसा कहनेपर गन्धर्वोंने मुसकराकर उनसे इस प्रकार — कहा- ॥ १३ ॥
एकस्यैव वयं तात कुर्याम वचनं भुवि ।
यस्य शासनमाज्ञाय चरामो विगतज्वराः ॥ १४ ॥
तेनैकेन यथाऽऽदिष्टं तथा वर्ताम भारत ।
न शास्ता विद्यतेऽस्माकमन्यस्तस्मात् सुरेश्वरात् ॥ १५ ॥
'तात! हम भूमण्डलमें केवल एक व्यक्तिकी ही आज्ञाका पालन करते हैं । भारत! जिनके शासनको शिरोधार्य करके हम निश्चिन्त हो सर्वत्र विचरते हैं । हमारे उन्हीं एकमात्र
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स्वामीने जैसी आज्ञा दी है वैसा बर्ताव हम कर रहे हैं । अतः इन देवेश्वरके सिवा दूसराकोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो हमलोगोंपर शासन कर सके ' ॥ १४-१५ ॥
एवमुक्तः स गन्धर्वैः कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।
गन्धर्वान् पुनरेवेदं वचनं प्रत्यभाषत ॥ १६ ॥
गन्धर्वोंके ऐसा कहनेपर कुन्तीनन्दन अर्जुनने पुनः उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया ॥ १६ ॥
न तद् गन्धर्वराजस्य युक्तं कर्म जुगुप्सितम् ।
परदाराभिमर्शश्च मानुषैश्च समागमः ॥ १७ ॥
‘ गन्धर्वो! परायी स्त्रियोंका अपहरण और मनुष्योंके साथ युद्ध – ये घृणित कर्म गन्धर्वराज चित्रसेनको शोभा नहीं देते हैं ॥ १७ ॥
उत्सृज्यध्वं महावीर्यान् धृतराष्ट्रसुतानिमान् ।
दारांश्चैषां विमुञ्चध्वं धर्मराजस्य शासनात् ॥ १८ ॥
‘ अतः तुमलोग धर्मराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे इन महापराक्रमी धृतराष्ट्रके पुत्रों तथा इनकी स्त्रियोंको छोड़ दो ॥
यदा साम्ना न मुञ्चध्वं गन्धर्वा धृतराष्ट्रजान् ।
मोक्षयिष्यामि विक्रम्य स्वयमेव सुयोधनम् ॥ १ ९ ॥
‘ गन्धर्वो! यदि इस प्रकार समझाने- बुझानेसे तुमलोग धृतराष्ट्रके पुत्रोंको नहीं छोड़ोगे, तो मैं स्वयं ही पराक्रम करके दुर्योधनको छुड़ा लूँगा ' ॥ १ ९ ॥
एवमुक्त्वा ततः पार्थः सव्यसाची धनंजयः ।
ससर्ज निशितान् बाणान् खचरान् खचरान् प्रति ॥ २० ॥
ऐसा कहकर सव्यसाची अर्जुनने गन्धर्वोंके एक-एक दलपर अपने तीखे आकाशगामी बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ २० ॥
तथैव शरवर्षेण गन्धर्वास्ते बलोत्कटाः ।
पाण्डवानभ्यवर्तन्त पाण्डवाश्च दिवौकसः ॥ २१ ॥
इसी प्रकार बलोन्मत्त गन्धर्व भी बाणोंकी बौछार करते हुए पाण्डवोंसे भिड़ गये ।
इधरसे पाण्डव भी गन्धर्वोंका डटकर सामना करने लगे ॥ २१ ॥
ततः सुतुमुलं युद्धं गन्धर्वाणां तरस्विनाम् ।
बभूव भीमवेगानां पाण्डवानां च भारत ॥ २२ ॥
भारत! तदनन्तर बलशाली गन्धर्वों तथा भयानक वेगवाले पाण्डवोंमें अत्यन्त भयंकर युद्ध प्रारम्भ हो गया ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि पाण्डवगन्धर्वयुद्धे चतुश्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४४ ॥
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इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें पाण्डव--गन्धर्वयुद्धविषयकग सौचौवालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २४४ ॥
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पञ्चचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः पाण्डवोंके द्वारा गन्धर्वोंकी पराजय वैशम्पायन उवाच
ततो दिव्यास्त्रसम्पन्ना गन्धर्वा हेममालिनः ।
विसृजन्तः शरान् दीप्तान् समन्तात् पर्यवारयन् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर दिव्यास्त्रोंसे सम्पन्न सुवर्णमालाधारी गन्धर्वोंने तेजोमय बाणोंकी वर्षा करते हुए चारों ओरसे पाण्डवोंको घेर लिया ॥ १ ॥
चत्वारः पाण्डवा वीरा गन्धर्वाश्च सहस्रशः ।
रणे संन्यपतन् राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २ ।
राजन्! वीर पाण्डव केवल चार थे, परंतु उस रणभूमिमें हजारों गन्धर्व उनपर एक
साथ टूट पड़े थे । यह एक अद्भुत-सी बात थी ॥ २ ॥
यथा कर्णस्य च रथो धार्तराष्ट्रस्य चोभयोः ।
गन्धर्वैः शतशश्छिन्नौ तथा तेषां प्रचक्रिरे ॥ ३ ॥
गन्धर्वोंने जैसे कर्ण तथा दुर्योधन दोनोंके रथोंको छिन्न- भिन्न करके उनके सैकड़ों टुकड़े कर दिये थे, उसी प्रकार वे पाण्डवोंके रथोंको भी टूक- टूक कर देनेकी चेष्टामें लग गये ॥ ३ ॥
तान् समापततो राजन् गन्धर्वाञ्छतशो रणे ।
प्रत्यगृह्णन् नरव्याघ्राः शरवर्षैरनेकशः ॥ ४ ॥
राजन्! रणभूमिमें सैकड़ों गन्धर्वोंको अपने ऊपर आक्रमण करते देख नरश्रेष्ठ पाण्डवोंने बार- बार बाणोंकी झड़ी लगाकर उन सबको रोक दिया ॥ ४ ॥
ते कीर्यमाणाः खगमाः शरवर्षैः समन्ततः ।
न शेकुः पाण्डुपुत्राणां समीपे परिवर्तितुम् ॥ ५ ॥
सब ओरसे बाणोंकी वर्षाका लक्ष्य होनेके कारण वे आकाशचारी गन्धर्व पाण्डवोंके समीप जानेका साहस न कर सके ॥ ५ ॥
अभिक्रुद्धानभिक्रुद्धो गन्धर्वानर्जुनस्तदा ।
लक्षयित्वाथ दिव्यानि महास्त्राण्युपचक्रमे ॥ ६ ॥
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अर्जुन -चित्रसेन युद्ध
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उस समय गन्धर्वोंको क्रोधमें भरे हुए देख अर्जुनने भी कुपित होकर महान् दिव्यास्त्रोंका प्रयोग आरम्भ किया ॥ ६ ॥
सहस्राणां सहस्राणि प्राहिणोद् यमसादनम् ।
आग्नेयेनार्जुनः संख्ये गन्धर्वाणां बलोत्कटः ॥ ७ ॥
वे अत्यन्त बलवान् थे । उन्होंने उस युद्धमें आग्नेयास्त्रका प्रयोग करके दस लाख गन्धर्वोंको यमलोक पहुँचा दिया ॥ ७ ॥
तथा भीमो महेष्वासः संयुगे बलिनां वरः ।
गन्धर्वाञ्छतशो राजञ्जघान निशितैः शरैः ॥ ८ ॥
राजन्! इसी प्रकार बलवानोंमें श्रेष्ठ महाधनुर्धर भीमसेनने अपने तीक्ष्ण सायकोंद्वारा सैकड़ों गन्धर्वोंको मार गिराया ॥ ८ ॥
माद्रीपुत्रावपि तथा युध्यमानौ बलोत्कटौ ।
परिगृह्याग्रतो राजन् जघ्नतुः शतशः परान् ॥ ९ ॥
उत्कट बलशाली माद्रीकुमार नकुल और सहदेवने भी युद्धमें तत्पर हो सैकड़ों शत्रुओंको आगेसे पकड़कर मार डाला ॥ ९ ॥
ते वध्यमाना गन्धर्वा दिव्यैरस्त्रैर्महारथैः ।
उत्पेतुः खमुपादाय धृतराष्ट्रसुतांस्ततः ॥ १० ॥
महारथी पाण्डवोंके चलाये दिव्यास्त्रोंकी मार खाकर गन्धर्व धृतराष्ट्रके पुत्रोंको लिये-दिये आकाशमें उड़ गये ॥ १० ॥
स तानुत्पतितान् दृष्ट्वा कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।
महता शरजालेन समन्तात् पर्यवारयत् ॥ ११ ॥
कुन्तीनन्दन अर्जुनने उन्हें आकाशमें उड़ते देख चारों ओर बाणोंका विस्तृत जाल- सा फैलाकर गन्धर्वोंको घेरेमें डाल दिया ॥ ११ ॥
ते बद्धाः शरजालेन शकुन्ता इव पञ्जरे ।
ववर्षुरर्जुनं क्रोधाद् गदाशक्त्यृष्टिवृष्टिभिः ॥ १२ ॥
उस जालमें वे उसी प्रकार बँध गये, जैसे पिंजड़े में पक्षी । अतः वे अत्यन्त कुपित होकर अर्जुनपर गदा, शक्ति और ऋष्टि आदि अस्त्र - शस्त्रोंकी वर्षा करने लगे ॥ १२ ॥
गदाशक्त्यृष्टिवृष्टीस्ता निहत्य परमास्त्रवित् ।
गात्राणि चाहनद् भल्लैर्गन्धर्वाणां धनंजयः ॥ १३ ॥
तब उत्तम अस्त्रोंके ज्ञाता अर्जुन उनकी गदा, शक्ति तथा ऋष्टि आदि अस्त्र- शस्त्रोंकी वर्षाका निवारण करके भल्ल नामक बाणोंद्वारा गन्धर्वोंके अंगोंपर आघात करने लगे ॥ १३ ॥
शिरोभिः प्रपतद्भिश्च चरणैर्बाहुभिस्तथा ।
अश्मवृष्टिरिवाभाति परेषामभवद् भयम् ॥ १४ ॥
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गन्धर्वोंके मस्तक, बाहु तथा पैर कट- कटकर इस प्रकार गिरने लगे मानो पत्थरोंकी वर्षा हो रही हो । इससे शत्रुओंको बड़ा भय होने लगा ॥ १४ ॥
ते वध्यमाना गन्धर्वाः पाण्डवेन महात्मना ।
भूमिष्ठमन्तरिक्षस्थाः शरवर्षैरवाकिरन् ॥ १५ ॥
महात्मा पाण्डुनन्दन अर्जुनके बाणोंसे घायल होकर आकाशमें स्थित हुए गन्धर्वोंने पृथ्वीपर खड़े हुए अर्जुनपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ की ॥ १५ ॥
तेषां तु शरवर्षाणि सव्यसाची परंतपः ।
अस्त्रैः संवार्य तेजस्वी गन्धर्वान् प्रत्यविध्यत ॥ १६ ॥
तेजस्वी परंतप सव्यसाचीने अपने अस्त्रोंद्वारा गन्धर्वोंकी बाणवर्षाका निवारण करके उन्हें फिरसे घायल कर दिया ॥ १६ ॥
स्थूणाकर्णेन्द्रजालं च सौरं चापि तथार्जुनः ।
आग्नेयं चापि सौम्यं च ससर्ज कुरुनन्दनः ॥ १७ ॥
कुरुकुलका आनन्द बढ़ानेवाले अर्जुनने स्थूणाकर्ण, इन्द्रजाल, सौर, आग्नेय तथा सौम्य नामक दिव्यास्त्रोंका प्रयोग किया ॥ १७ ॥
ते दह्यमाना गन्धर्वाः कुन्तीपुत्रस्य सायकैः ।
दैतेया इव शक्रेण विषादमगमन् परम् ॥ १८ ॥
कुन्तीकुमारके उन सायकोंसे गन्धर्व उसी प्रकार दग्ध होने लगे, जैसे इन्द्रके बाणोंद्वारा दैत्य । इससे उनको बड़ा विषाद हुआ ॥ १८ ॥
ऊर्ध्वमाक्रममाणाश्च शरजालेन वारिताः ।
विसर्पमाणा भल्लैश्च वार्यन्ते सव्यसाचिना ॥ १ ९ ॥
जब वे ऊपरकी ओर उड़ने लगते तब अर्जुनके बाणोंके जालसे उनकी गति रुक जाती थी, और जब इधर - उधर भागने लगते तब सव्यसाची अर्जुनके भल्ल नामक बाण उन्हें आगे बढ़नेसे रोकते थे ॥ १ ९ ॥
गन्धर्वांस्त्रासितान् दृष्ट्वा कुन्तीपुत्रेण भारत ।
चित्रसेनो गदां गृह्य सव्यसाचिनमाद्रवत् ॥ २० ॥
भारत! इस प्रकार कुन्तीकुमारके द्वारा गन्धर्वोंको त्रस्त हुआ देख गन्धर्वराज चित्रसेनने गदा लेकर सव्यसाची अर्जुनपर आक्रमण किया ॥ २० ॥
तस्याभिपततस्तूर्णं गदाहस्तस्य संयुगे ।
गदां सर्वायसीं पार्थः शरैश्चिच्छेद सप्तधा ॥ २१ ॥
हाथमें गदा लिये बड़े वेगसे युद्धके लिये आते हुए चित्रसेनकी उस गदाके, जो सब - की-सब लोहेकी बनी हुई थी, अर्जुनने अपने बाणोंद्वारा सात टुकड़े कर दिये ॥ २१ ॥
स गदां बहुधा दृष्ट्वा कुत्तां बाणैस्तरस्विना ।
संवृत्य विद्ययाऽऽत्मानं योधयामास पाण्डवम् ॥ २२ ॥
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वेगशाली अर्जुनके बाणोंसे अपनी गदाके अनेक टुकड़े हुए देख चित्रसेन अन्तर्धानविद्याद्वारा अपने आपको छिपाकर उन पाण्डुकुमारके साथ युद्ध करने लगे ॥ २२ ॥
अस्त्राणि तस्य दिव्यानि सम्प्रयुक्तानि सर्वशः ।
दिव्यैरस्त्रैस्तदा वीरः पर्यवारयदर्जुनः ॥ २३ ॥
उस समय उन्होंने जिन-जिन दिव्यास्त्रोंका प्रयोग किया, उन सबको वीर अर्जुनने अपने दिव्य अस्त्रोंद्वारा शान्त कर दिया ॥ २३ ॥
स वार्यमाणस्तैरस्त्रैरर्जुनेन महात्मना ।
गन्धर्वराजो बलवान् माययान्तर्हितस्तदा ॥ २४ ॥
महात्मा अर्जुनके उन अस्त्रोंसे रोके जानेपर बलवान् गन्धर्वराज मायासे अदृश्य हो गये ॥ २४ ॥
अन्तर्हितं तमालक्ष्य प्रहरन्तमथार्जुनः ।
ताडयामास खचरैर्दिव्यास्त्रप्रतिमन्त्रितैः ॥ २५ ॥
उन्हें अदृश्य होकर प्रहार करते देख अर्जुनने दिव्यास्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित किये हुए आकाशचारी बाणोंसे बींध डाला ॥ २५ ॥
अन्तर्धानवधं चास्य चक्रे क्रुद्धोऽर्जुनस्तदा ।
शब्दवेधं समाश्रित्य बहुरूपी धनंजयः ॥ २६ ॥
( रणभूमिमें सब ओर विचरनेके कारण) उस समय अर्जुन अनेक रूप धारण किये हुए जान पड़ते थे । उन्होंने कुपित होकर शब्दवेधका सहारा ले चित्रसेनकी अन्तर्धानरूप मायाको भी नष्ट कर दिया ॥ २६ ॥
स वध्यमानस्तैरस्त्रैरर्जुनेन महात्मना ।
ततोऽस्य दर्शयामास तदाऽऽत्मानं प्रियः सखा ॥ २७ ॥
चित्रसेन अर्जुनके प्यारे सखा थे । उन्होंने महात्मा अर्जुनके बाणोंसे अत्यन्त घायल होनेपर अपने - आपको उनके सामने प्रकट कर दिया ॥ २७ ॥
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चित्रसेनस्तथोवाच सखायं युधि विद्धि माम् ।
चित्रसेनमथालक्ष्य सखायं युधि दुर्बलम् ॥ २८ ॥
संजहारास्त्रमथ तत् प्रसृष्टं पाण्डवर्षभः ।
दृष्ट्वा तु पाण्डवाः सर्वे संहृतास्त्रं धनंजयम् ॥ २ ९ ॥
संजहुः प्रद्रुतानश्वाञ्छरवेगान् धनूंषि च । चित्रसेनने उनसे कहा- ' कुन्तीनन्दन! इस युद्धमें मुझे तुम अपना सखा चित्रसेन समझो । ' यह सुनकर अर्जुनने चित्रसेनकी ओर दृष्टिपात किया । अपने सखाको युद्धमें अत्यन्त दुर्बल हुआ देख पाण्डवप्रवर अर्जुनने अपने धनुषपर प्रकट किये हुए उस दिव्यास्त्रका उपसंहार कर दिया । अर्जुनको अपना अस्त्र समेटते देख सब पाण्डवोंने भी दौड़ते हुए घोड़ोंको रोक लिया तथा वेगपूर्वक छूटनेवाले बाणों और धनुषोंका संचालन भी बंद कर दिया ॥ २८-२९ ॥
चित्रसेनश्च भीमश्च सव्यसाची यमावपि ।
पृष्ट्वा कौशलमन्योन्यं रथेष्वेवावतस्थिरे ॥ ३० ॥
तत्पश्चात् गन्धर्वराज चित्रसेन, भीमसेन, अर्जुन और नकुल सहदेव सब लोग परस्पर कुशल - समाचार पूछकर अपने रथोंमें ही बैठे रहे ॥ ३० ॥
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि गन्धर्वपराभवे पञ्चचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें गन्धर्वपराजयविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २४५ ॥
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