श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1671–1680

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1671–1680

पृष्ठ 1671

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षट्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः चित्रसेन, अर्जुन तथा युधिष्ठिरका संवाद और दुर्योधनका छुटकारा वैशम्पायन उवाच

ततोऽर्जुनश्चित्रसेनं प्रहसन्निदमब्रवीत् ।

मध्ये गन्धर्वसैन्यानां महेष्वासो महाद्युतिः ॥ १ ॥

किं ते व्यवसितं वीर कौरवाणां विनिग्रहे ।

किमर्थं च सदारोऽयं निगृहीतः सुयोधनः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर परम कान्तिमान् महाधनुर्धर अर्जुनने गन्धर्वोंकी सेनाके बीच चित्रसेनसे हँसते हुए पूछा - ' वीर! कौरवोंको बंदी बनानेमें तुम्हारा क्या उद्देश्य था? स्त्रियोंसहित दुर्योधनको तुमने किसलिये कैद किया? ' ॥ १-२ ॥ चित्रसेन उवाच

विदितोऽयमभिप्रायस्तत्रस्थेन दुरात्मनः ।

दुर्योधनस्य पापस्य कर्णस्य च धनंजय ॥ ३ ॥

वनस्थान् भवतो ज्ञात्वा क्लिश्यमानाननाथवत् ।

समस्थो विषमस्थांस्तान् द्रक्ष्यामीत्यनवस्थितान् ॥ ४ ॥

इमेऽवहसितुं प्राप्ता द्रौपदीं च यशस्विनीम् ।

ज्ञात्वा चिकीर्षितं चैषां मामुवाच सुरेश्वरः ॥ ५ ॥

चित्रसेनने कहा — धनंजय! देवराज इन्द्रको स्वर्गमें बैठे - ही- बैठे दुरात्मा दुर्योधन और पापी कर्णका यह अभिप्राय मालूम हो गया था कि ये आपलोगोंको वनमें रहकर अनाथकी भाँति क्लेश उठाते और विषम परिस्थितिमें पड़कर अस्थिरभावसे रहते हुए जानकर भी उस अवस्थामें आपको देखने और दुःखी करनेका निश्चय कर चुके हैं । ये स्वयं सम ( सुखपूर्ण) -अवस्थामें स्थित हैं, फिर भी आप पाण्डवों तथा यशस्विनी द्रौपदीकी हँसी उड़ानेके लिये वनमें आये हैं । इस प्रकार इनकी ( आपलोगोंका अनिष्ट करनेकी ) इच्छा जानकर देवेश्वर इन्द्रने मुझसे इस प्रकार कहा— ॥ ३–५ ॥

गच्छ दुर्योधनं बद्ध्वा सहामात्यमिहानय ।

धनंजयश्च ते रक्ष्यः सह भ्रातृभिराहवे ॥ ६ ॥

स च प्रियः सखा तुभ्यं शिष्यश्च तव पाण्डवः । ' चित्रसेन! तुम जाओ और दुर्योधनको उसके मन्त्रियोंसहित बाँधकर यहाँ ले आओ । युद्धमें तुम्हें भाइयोंसहित अर्जुनकी रक्षा करनी चाहिये; क्योंकि पाण्डुनन्दन अर्जुन तुम्हारे

पृष्ठ 1672

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प्रिय सखा तथा शिष्य हैं ' ॥ वचनाद् देवराजस्य ततोऽस्मीहागतो द्रुतम् ॥ ७ ॥

अयं दुरात्मा बद्धश्च गमिष्यामि सुरालयम् ।

नेष्याम्येनं दुरात्मानं पाकशासनशासनात् ॥ ८ ॥

वहाँसे देवराजकी यह आज्ञा मानकर मैं तुरन्त यहाँ चला आया । यह दुरात्मा दुर्योधन मेरी कैदमें आ गया है; अतः अब मैं देवलोकको जाऊँगा और पाकशासन इन्द्रकी आज्ञासे इस दुरात्माको भी वहीं ले जाऊँगा ॥ ८ ॥

अर्जुनउवाच

उत्सृज्यतां चित्रसेन भ्रातास्माकं सुयोधनः ।

धर्मराजस्य संदेशान्मम चेदिच्छसि प्रियम् ॥ ९ ॥

अर्जुन बोले- चित्रसेन! दुर्योधन हमलोगोंका भाई है । यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो धर्मराजके आदेशसे इसे छोड़ दो ॥ ९ ॥

चित्रसेन उवाच

पापोऽयं नित्यसंतुष्टो न विमोक्षणमर्हति ।

प्रलब्धा धर्मराजस्य कृष्णायाश्च धनंजय ॥ १० ॥

चित्रसेनने कहा — धनंजय! यह पापी सदा राज्यसुख भोगनेके कारण हर्षसे मतवाला हो उठा है; अतः इसे छोड़ना उचित नहीं है । इसने धर्मराज युधिष्ठिर तथा द्रौपदीको धोखा दिया है ॥ १० ॥

दं चिकीर्षितं तस्य कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।

जानाति धर्मराजो हि श्रुत्वा कुरु यथेच्छसि ॥ ११ ॥

कुन्तीनन्दन धर्मराज युधिष्ठिर इसके इस कुटिल अभिप्रायको नहीं जानते हैं; अतः यह सब सुनकर तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो ॥ ११ ॥

वैशम्पायन उवाच

ते सर्व एव राजानमभिजग्मुर्युधिष्ठिरम् ।

अभिगम्य च तत् सर्वं शशंसुस्तस्य चेष्टितम् ॥ १२ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर वे सब लोग राजा युधिष्ठिरके पास गये ।

वहाँ जाकर गन्धर्वोंने दुर्योधनकी सारी कुचेष्टा कह सुनायी ॥ १२ ॥

अजातशत्रुस्तच्छ्रुत्वा गन्धर्वस्य वचस्तदा ।

मोक्षयामास तान् सर्वान् गन्धर्वान् प्रशशंस च ॥ १३ ॥

गन्धर्वोंका यह कथन सुनकर अजातशत्रु युधिष्ठिरने उस समय समस्त कौरवोंको बन्धनसे छुड़ा दिया और गन्धर्वोंकी भूरि- भूरि प्रशंसा की— ॥ १३ ॥

पृष्ठ 1673

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दिष्ट्या भवद्भिर्बलिभिः शक्तैः सर्वैर्न हिंसितः ।

दुर्वृत्तो धार्तराष्ट्रोऽयं सामात्यज्ञातिबान्धवः ॥ १४ ॥

'आप सब लोग बलवान् और सामर्थ्यशाली हैं । आपने मन्त्रियों तथा जाति-भाइयोंसहित इस दुराचारी दुर्योधनका वध नहीं किया, यह बड़े सौभाग्यकी बात है ॥ १४ ॥

उपकारो महांस्तात कृतोऽयं मम खेचरैः ।

कुलं न परिभूतं मे मोक्षणेऽस्य दुरात्मनः ॥ १५ ॥

‘ तात! आकाशचारी गन्धर्वोंने यह मेरा बहुत बड़ा उपकार किया कि इस दुरात्माको छोड़ दिया, इसलिये मेरे कुलका अपमान नहीं हुआ ॥ १५ ॥

आज्ञापयध्वमिष्टानि प्रीयामो दर्शनेन वः ।

प्राप्य सर्वानभिप्रायांस्ततो व्रजत मा चिरम् ॥ १६ ॥

‘ गन्धर्वो! अपनी अभीष्ट सेवाके लिये हमें आज्ञा दीजिये । हम सब लोग आपके दर्शनसे बहुत प्रसन्न हैं । अपनी समस्त मनोवांछित वस्तुओंको प्राप्त करनेके पश्चात् यहाँसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थान कीजियेगा ॥ १६ ॥

अनुज्ञातास्तु गन्धर्वाः पाण्डुपुत्रेण धीमता ।

सहाप्सरोभिः संहृष्टाश्चित्रसेनमुखा ययुः ॥ १७ ॥

बुद्धिमान् पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरसे आज्ञा लेकर चित्रसेन आदि सब गन्धर्व अप्सराओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे विदा हुए ॥ १७ ॥

( देवलोकं ततो गत्वा गन्धर्वैः सहितस्तदा । न्यवेदयच्च तत् सर्वं चित्रसेनः शतक्रतोः ॥ )

देवराडपि गन्धर्वान् मृतांस्तान् समजीवयत् ।

दिव्येनामृतवर्षेण ये हताः कौरवैर्युधि ॥ १८ ॥

तदनन्तर गन्धर्वोंसहित चित्रसेनने देवलोकमें पहुँचकर देवराज इन्द्रके समक्ष सब समाचार निवेदन किया । युद्धमें कौरवोंद्वारा जो गन्धर्व मारे गये थे, उन सबको देवराज इन्द्रने दिव्य अमृतकी वर्षा करके जिला दिया ॥ १८ ॥

ज्ञातींस्तानवमुच्याथ राजदारांश्च सर्वशः ।

कृत्वा च दुष्करं कर्म प्रीतियुक्ताश्च पाण्डवाः ॥ १ ९ ॥

सस्त्रीकुमारैः कुरुभिः पूज्यमाना महारथाः ।

बभ्राजिरे महात्मानः क्रतुमध्ये यथाग्नयः ॥ २० ॥

इस प्रकार उन सब भाई- बंधुओं एवं राजकुलकी महिलाओंको गन्धर्वोंसे छुड़ाकर एवं दुष्कर पराक्रम करके प्रसन्न हुए महारथी महामना पाण्डव स्त्री- बालकोंसहित कौरवोंद्वारा पूजित एवं प्रशंसित हो यज्ञ मण्डपमें प्रज्वलित अग्नियोंके समान देदीप्यमान हो रहे थे ॥ १ ९ -२० ॥

पृष्ठ 1674

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ततो दुर्योधनं मुक्तं भ्रातृभिः सहितस्तदा ।

युधिष्ठिरस्तु प्रणयादिदं वचनमब्रवीत् ॥ २१ ॥

तदनन्तर बन्धनमुक्त हुए दुर्योधनसे भाइयोंसहित युधिष्ठिरने प्रेमपूर्वक यह बात कही — ॥ २१ ॥

मा स्म तात पुनः कार्षीरीदृशं साहसं क्वचित् ।

न हि साहसकर्तारः सुखमेधन्ति भारत ॥ २२ ॥

' तात! फिर कभी ऐसा दुःसाहस न करना । भारत! दुःसाहस करनेवाले मनुष्य कभी सुखी नहीं होते ॥ २२ ॥

स्वस्तिमान् सहितः सर्वैर्भ्रातृभिः कुरुनन्दन ।

गृहान् व्रज यथाकामं वैमनस्यं च मा कृथाः ॥ २३ ॥

‘ कुरुनन्दन! अब तुम अपने सब भाइयोंके साथ कुशलपूर्वक इच्छानुसार घर जाओ ।

हमलोगोंके प्रति मनमें वैमनस्य न रखना? ॥ २३ ॥

वैशम्पायन उवाच

पाण्डवेनाभ्यनुज्ञातो राजा दुर्योधनस्तदा ।

प्रणम्य धर्मपुत्रं तु गतेन्द्रिय इवातुरः ॥ २४ ॥

पृष्ठ 1675

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विदीर्यमाणो व्रीडावान् जगाम नगरं प्रति । वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी आज्ञा पाकर राजा दुर्योधनने उन धर्मपुत्र अजातशत्रुको प्रणाम करके अपने नगरकी ओर प्रस्थान किया । उस समय जिसकी इन्द्रियाँ काम न देती हों उस रोगीकी भाँति उसका हृदय व्यथासे विदीर्ण हो रहा था । उसे अपने कुकृत्यपर बड़ी लज्जा हो रही थी ॥ २४ ॥

तस्मिन् गते कौरवेये कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ २५ ॥

भ्रातृभिः सहितो वीरः पूज्यमानो द्विजातिभिः ।

तपोधनैश्च तैः सर्वैर्वृतः शक्र इवामरैः ॥ २६ ॥

तथा द्वैतवने तस्मिन् विजहार मुदा युतः ॥ २७ ॥

दुर्योधनके चले जानेपर द्विजातियोंसे प्रशंसित होते हुए भाइयोंसहित वीर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर वहाँके समस्त तपस्वी मुनियोंसे घिरे रहकर देवताओंके बीचमें बैठे हुए इन्द्रकी भाँति शोभा पाने और प्रसन्नतापूर्वक द्वैतवनमें विहार करने लगे ॥ २५-२७ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनमोक्षणे षट्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनको छुड़ानेसे सम्बन्ध रखनेवालादोसौछियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४६ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २८ श्लोक हैं )

पृष्ठ 1676

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सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः सेनासहित दुर्योधनका मार्गमें ठहरना और कर्णके द्वारा उसका अभिनन्दन जनमेजय उवाच

शत्रुभिर्जितबद्धस्य पाण्डवैश्च महात्मभिः ।

मोक्षितस्य युधा पश्चान्मानिनः सुदुरात्मनः ॥ १ ॥

कत्थनस्यावलिप्तस्य गर्वितस्य च नित्यशः ।

सदा च पौरुषौदार्यैः पाण्डवानवमन्यतः ॥ २ ॥

दुर्योधनस्य पापस्य नित्याहंकारवादिनः ।

प्रवेशो हास्तिनपुरे दुष्करः प्रतिभाति मे ॥ ३ ॥

तस्य लज्जान्वितस्यैव शोकव्याकुलचेतसः ।

प्रवेशं विस्तरेण त्वं वैशम्पायन कीर्तय ॥ ४ ॥

जनमेजय बोले-मुने! दुर्योधनको शत्रुओंने जीता और बाँध लिया । फिर महात्मा पाण्डवोंने गन्धर्वोंके साथ युद्ध करके उसे छुड़ाया । ऐसी दशामें उस अभिमानी और दुरात्मा दुर्योधनका हस्तिनापुरमें प्रवेश करना मुझे तो अत्यन्त कठिन प्रतीत होता है; क्योंकि वह अपने शौर्यके विषयमें बहुत डींग हाँका करता था, घमंडमें भरा रहता था और सदा गर्वके नशेमें चूर रहा करता था । उसने अपने पौरुष और उदारताद्वारा सदा पाण्डवोंका अपमान ही किया था । पापी दुर्योधन सदा अहंकारकी ही बातें करता था । पाण्डवोंकी सहायतासे मेरे जीवनकी रक्षा हुई, यह सोचकर तो वह लज्जित हो गया होगा; उसका हृदय शोकसे व्याकुल हो उठा होगा । वैशम्पायनजी! ऐसी स्थितिमें उसने अपनी राजधानीमें कैसे प्रवेश किया? यह विस्तारपूर्वक कहिये ॥ वैशम्पायन उवाच

धर्मराजनिसृष्टस्तु धार्तराष्ट्रः सुयोधनः ।

लज्जयाधोमुखः सीदन्नुपासर्पत् सुदुःखितः ॥ ५ ॥

वैशम्पायनजी बोले – राजन्! धर्मराजसे विदा होकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन लज्जासे मुँह नीचा किये अत्यन्त दुःखी और खिन्न होकर वहाँसे चल दिया ॥ ५ ॥

स्वपुरं प्रययौ राजा चतुरंगबलानुगः ।

शोकोपहतया बुद्धया चिन्तयानः पराभवम् ॥ ६ ॥

राजा दुर्योधनकी बुद्धि शोकसे मारी गयी थी । वह अपने अपमानपर विचार करता हुआ चतुरंगिणी सेनाके साथ नगरकी ओर चल पड़ा ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1677

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विमुच्य पथि यानानि देशे सुयवसोदके ।

संनिविष्टः शुभे रम्ये भूमिभागे यथेप्सितम् ॥ ७ ॥

हस्त्यश्वरथपादातं यथास्थानं न्यवेशयत् । रास्तेमें एक ऐसा स्थान मिला जहाँ घास और जलकी सुविधा थी । दुर्योधन अपने

वाहनोंको वहीं छोड़कर एक सुन्दर एवं रमणीय भूभागमें अपनी रुचिके अनुसार ठहर गया ।

हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकोंको भी उसने यथास्थान ठहरनेकी आज्ञा दे दी ॥ ७३ ॥

अथोपविष्टं राजानं पर्यङ्के ज्वलनप्रभे ॥ ८ ॥

उपप्लुतं यथा सोमं राहुणा रात्रिसंक्षये । राजा दुर्योधन अग्निके समान उद्दीप्त होनेवाले ( सोनेके ) पलंगपर बैठा हुआ था । रात्रिके अन्तमें चन्द्रमापर राहुद्वारा ग्रहण लग जानेपर जैसे उसकी शोभा नष्ट हो जाती है, वही दशा उस समय दुर्योधनकी भी थी ॥ ८३ ॥

उपागम्याब्रवीत् कर्णो दुर्योधनमिदं तदा ॥ ९ ॥

दिष्ट्या जीवसि गान्धारे दिष्ट्या नः सङ्गमः पुनः ।

दिष्ट्या त्वया जिताश्चैव गन्धर्वाः कामरूपिणः ॥ १० ॥

उस समय कर्णने समीप आकर दुर्योधनसे इस प्रकार कहा- ' गान्धारीनन्दन! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम जीवित हो । सौभाग्यवश हमलोग पुनः एक- दूसरेसे मिल गये । भाग्यसे तुमने इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले गन्धर्वोपर विजय पायी, यह और भी प्रसन्नताकी बात है ॥ ९ -१० ॥

दिष्ट्या समग्रान् पश्यामि भ्रातॄंस्ते कुरुनन्दन ।

विजिगीषून् रणे युक्तान् निर्जितारीन् महारथान् ॥ ११ ॥

'कुरुनन्दन! मैं तुम्हारे सम्पूर्ण महारथी भाइयोंको, जो शत्रुओंपर विजय पा चुके हैं, युद्धके लिये उद्यत तथा पुनः विजयकी अभिलाषासे युक्त देख रहा हूँ, यह भी सौभाग्यका ही सूचक है ॥ ११ ॥

अहं त्वभिद्रुतः सर्वैर्गन्धर्वैः पश्यतस्तव ।

नाशक्नुवं स्थापयितुं दीर्यमाणां च वाहिनीम् ॥ १२ ॥

‘ मैं तो तुम्हारे देखते - देखते ही समस्त गन्धर्वोंसे पराजित होकर भाग गया था । तितर-बितर होकर भागती हुई सेनाको स्थिर न रख सका ॥ १२ ॥

शरक्षताङ्गश्च भृशं व्यपयातोऽभिपीडितः ।

इदं त्वत्यद्भुतं मन्ये यद् युष्मानिह भारत ॥ १३ ॥

अरिष्टानक्षतांश्चापि सदारबलवाहनान् ।

विमुक्तान् सम्प्रपश्यामि युद्धात् तस्मादमानुषात् ॥ १४ ॥

' बाणोंके आघातसे मेरा सारा शरीर क्षत- विक्षत हो गया था । समस्त अंगोंमें बड़ी वेदना हो रही थी; इसीलिये मुझे भागना पड़ा । भारत! तुमलोग, जो उस अमानुषिक युद्धसे

पृष्ठ 1678

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छूटकर यहाँ स्त्री, सेना और वाहनोंसहित सकुशल तथा क्षतिसे रहित दिखायी देते हो; यह बात मुझे बड़ी अद्भुत जान पड़ती है ॥ १३-१४ ॥

नैतस्य कर्ता लोकेऽस्मिन् पुमान् भारत विद्यते ।

यत् कृतं ते महाराज सह भ्रातृभिराहवे ॥ १५ ॥

‘ भरतनन्दन महाराज! इस युद्धमें भाइयोंसहित तुमने जो पराक्रम कर दिखाया है, उसे करनेवाला दूसरा कोई पुरुष इस संसारमें नहीं है ' ॥ १५ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तस्तु कर्णेन राजा दुर्योधनस्तदा ।

उवाच चाङ्गराजानं वाष्पगद्गदया गिरा ॥ १६ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! कर्णके ऐसा कहनेपर राजा दुर्योधन उस समय अश्रुगद्गद वाणीद्वारा अंगराज ( कर्ण ) - से इस प्रकार बोला ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते वर्नपर्वणि घोषयात्रापर्वणि कर्णदुर्योधनसंवादे सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २४७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें कर्णदुर्योधनसंवादविषयक दो सौ सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २४७ ॥

पृष्ठ 1679

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अष्टचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः दुर्योधनका कर्णको अपनी पराजयका समाचार बताना दुर्योधन उवाच

अजानतस्ते राधेय नाभ्यसूयाम्यहं वचः ।

जानासि त्वं जिताञ्छत्रून् गन्धर्वांस्तेजसा मया ॥ १ ॥

दुर्योधन बोला - राधानन्दन! तुम सब बातें जानते नहीं हो, इसीसे मैं तुम्हारे इस कथनको बुरा नहीं मानता । तुम समझते हो कि मैंने अपने शत्रुभूत गन्धर्वोंको अपने ही पराक्रमसे हराया है; परंतु ऐसी बात नहीं है ॥ १ ॥

आयोधितास्तु गन्धर्वाः सुचिरं सोदरैर्मम ।

मया सह महाबाहो कृतश्चोभयतः क्षयः ॥ २ ॥

महाबाहो! मेरे भाइयोंने मेरे साथ रहकर गन्धर्वोंके साथ बहुत देरतक युद्ध किया और उसमें दोनों पक्षके बहुत- से सैनिक मारे गये ॥ २ ॥

मायाधिकास्त्वयुध्यन्त यदा शूरा वियद्गताः ।

तदा नो न समं युद्धमभवत् खेचरैः सह ॥ ३ ॥

परंतु जब मायाके कारण अधिक शक्तिशाली शूरवीर गन्धर्व आकाशमें खड़े होकर युद्ध करने लगे, तब उनके साथ हमलोगोंका युद्ध समान स्थितिमें नहीं रह सका ॥

पराजयं च प्राप्ताः स्मो रणे बन्धनमेव च ।

सभृत्यामात्यपुत्राश्च सदारबलवाहनाः ॥ ४ ॥

युद्धमें हमारी पराजय हुई और हम सेवक, सचिव, पुत्र, स्त्री, सेना तथा सवारियोंसहित बंदी बना लिये गये ॥ ४ ॥

उच्चैराकाशमार्गेण हृताः स्मस्तैः सुदुःखिताः ।

अथ नः सैनिकाः केचिदमात्याश्च महारथाः ॥ ५ ॥

उपगम्याब्रुवन् दीनाः पाण्डवाञ्छरणप्रदान् । फिर गन्धर्व हमें ऊँचे आकाशमार्गसे ले चले । उस समय हमलोग अत्यन्त दुःखी हो रहे थे । तदनन्तर हमारे कुछ सैनिकों और महारथी मन्त्रियोंने अत्यन्त दीन हो शरणदाता पाण्डवोंके पास जाकर कहा— ॥ ५३ ॥

एष दुर्योधनो राजा धार्तराष्ट्रः सहानुजः ॥ ६ ॥

सामात्यदारो ह्रियते गन्धर्वैर्दिवमाश्रितैः । ‘ कुन्तीकुमारो! ये धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन अपने भाइयों, मन्त्रियों तथा स्त्रियोंके साथ यहाँ आये थे । इन्हें गन्धर्वगण आकाशमार्गसे हरकर लिये जाते हैं ॥ ६३ ॥

तं मोक्षयत भद्रं वः सहदारं नराधिपम् ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1680

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पराभवो मा भविष्यत् कुरुदारेषु सर्वशः । ‘ आपलोगोंका कल्याण हो। रानियोंसहित महाराजको छुड़ाइये । कहीं ऐसा न हो कि कुरुकुलकी स्त्रियोंका तिरस्कार हो जाय' ॥ ७३ ॥

एवमुक्ते तु धर्मात्मा ज्येष्ठः पाण्डुसुतस्तदा ॥ ८ ॥

प्रसाद्य पाण्डवान् सर्वानाज्ञापयत मोक्षणे । उनके ऐसा कहनेपर ज्येष्ठ पाण्डुपुत्र धर्मात्मा युधिष्ठिरने अन्य सब पाण्डवोंको राजी करके हम सब लोगोंको छुड़ानेके लिये आज्ञा दी ॥ ८३ ॥

अथागम्य तमुद्देशं पाण्डवाः पुरुषर्षभाः ॥ ९ ॥

सान्त्वपूर्वमयाचन्त शक्ताः सन्तो महारथाः । तदनन्तर पुरुषसिंह महारथी पाण्डव उस स्थानपर आकर समर्थ होते हुए भी गन्धर्वोंसे सान्त्वनापूर्ण शब्दोंमें ( हमें छोड़ देनेके लिये ) याचना करने लगे ॥ ९ ३ ॥ यदा चास्मान् न मुमुचुर्गन्धर्वाः सान्त्विता अपि ॥ १० ॥

( आकाशचारिणो वीरा नदन्तो जलदा इव ) ।

ततोऽर्जुनश्च भीमश्च यमजौ च बलोत्कटौ ।

मुमुचुः शरवर्षाणि गन्धर्वान् प्रत्यनेकशः ॥ ११ ॥

उनके समझाने -बुझानेपर भी जब आकाशचारी वीर गन्धर्व हमें न छोड़ सके और बादलोंकी भाँति गर्जने लगे तब अर्जुन, भीम तथा उत्कट बलशाली नकुल सहदेवने उन असंख्य गन्धर्वोंकी ओर लक्ष्य करके बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ १०-११ ॥

अथ सर्वे रणं मुक्त्वा प्रयाताः खेचराः दिवम् ।

अस्मानेवाभिकर्षन्तो दीनान् मुदितमानसाः ॥ १२ ॥

फिर तो सारे गन्धर्व रणभूमि छोड़कर आकाशमें उड़ गये और मन- ही -मन आनन्दका अनुभव करते हुए हम दीन - दुखियोंको अपनी ओर घसीटने लगे ॥ १२ ॥

ततः समन्तात् पश्यामः शरजालेन वेष्टितम् ।

अमानुषाणि चास्त्राणि प्रमुञ्चन्तं धनंजयम् ॥ १३ ॥

इसी समय हमने देखा, चारों ओर बाणोंका जाल- सा बन गया है और उससे वेष्टित हो अर्जुन अलौकिक अस्त्रोंकी वर्षा कर रहे हैं ॥ १३ ॥

समावृता दिशो दृष्ट्वा पाण्डवेन शितैः शरैः ।

धनंजयसखाऽऽत्मानं दर्शयामास वै तदा ॥ १४ ॥

पाण्डुनन्दन अर्जुनने अपने तीखे बाणोंसे समस्त दिशाओंको आच्छादित कर दिया है, यह देखकर उनके सखा चित्रसेनने अपने - आपको उनके सामने प्रकट कर दिया ॥ १४ ॥

चित्रसेनः पाण्डवेन समाश्लिष्य परस्परम् ।

कुशलं परिपप्रच्छ तैः पृष्टश्चाप्यनामयम् ॥ १५ ॥