02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1921–1930
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1921–1930
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ततस्तान् सहसा दीर्णान् दृष्ट्वा वानरपुङ्गवान् ।
निर्ययौ कपिशार्दूलो हनूमान् मारुतात्मजः ॥ ७ ॥
उन भयभीत प्रमुख वानरोंको सहसा पलायन करते देख कपिकेसरी मारुतनन्दन हनुमान्जी धूम्राक्षका सामना करनेके लिये आगे बढ़े ॥ ७ ॥
तं दृष्ट्वावस्थितं संख्ये हरयः पवनात्मजम् ।
महत्या त्वरया राजन् संन्यवर्तन्त सर्वशः ॥ ८ ॥
राजन्! पवनकुमारको युद्धके लिये उपस्थित देख सभी वानर सब ओरसे बड़ी उतावलीके साथ लौट आये ॥ ८ ॥
ततः शब्दो महानासीत् तुमुलो लोमहर्षणः ।
रामरावणसैन्यानामन्योन्यमभिधावताम् ॥ ९ ॥
फिर तो एक- दूसरेपर धावा बोलती हुई श्रीराम तथा रावणकी सेनाओंका अत्यन्त भयंकर रोमाञ्चकारी कोलाहल आरम्भ हो गया ॥ ९ ॥
तस्मिन् प्रवृत्ते संग्रामे घोरे रुधिरकर्दमे ।
धूम्राक्षः कपिसैन्यं तद् द्रावयामास पत्रिभिः ॥ १० ॥
उस घोर संग्राममें धरतीपर रक्तकी कीच जम गयी थी । इसी समय धूम्राक्ष अपने बाणोंसे उस वानरसेनाको खदेड़ने लगा ॥ १० ॥
तं स रक्षोमहामात्रमापतन्तं सपत्नजित् ।
प्रतिजग्राह हनुमांस्तरसा पवनात्मजः ॥ ११ ॥
तब शत्रुविजयी पवननन्दन हनुमान्ने अपनी ओर आते हुए उस विशालकाय राक्षसको बड़े वेगसे धर दबाया ॥ ११ ॥
तयोर्युद्धमभूद् घोरं हरिराक्षसवीरयोः ।
जिगीषतोर्युधान्योन्यमिन्द्रप्रह्लादयोरिव ॥ १२ ॥
उन दोनों वानर तथा राक्षसवीरोंमें भयंकर युद्ध छिड़ गया । वे इन्द्र और प्रह्लादकी भाँति युद्ध करके एक- दूसरेको जीतना चाहते थे ॥ १२ ॥
गदाभिः परिघैश्चैव राक्षसो जघ्निवान् कपिम् ।
कपिश्च जघ्निवान् रक्षः सस्कन्धविटपैर्द्रुमैः ॥ १३ ॥
निशाचर धूम्राक्षने गदाओं तथा परिघोंद्वारा कपिवर हनुमानजीको चोट पहुँचायी और हनुमान्जीने उस राक्षसपर तने और डालियोंसहित वृक्षोंसे प्रहार किया ॥
ततस्तमतिकोपेन साश्वं सरथसारथिम् ।
धूम्राक्षमवधीत् क्रुद्धो हनूमान् मारुतात्मजः ॥ १४ ॥
तदनन्तर मारुतनन्दन हनुमान्जीने अत्यन्त कुपित हो घोड़े, रथ और सारथिसहित धूम्राक्षको मार डाला ॥ ततस्तं निहतं दृष्ट्वा धूम्राक्षं राक्षसोत्तमम् ।
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हरयो जातविस्रम्भा जघ्नुरन्ये च सैनिकान् ॥ १५ ॥
राक्षसप्रवर धूम्राक्षको मारा गया देख अन्य वानर तथा भालुओंको अपनी शक्तिपर विश्वास हुआ और वे उत्साहपूर्वक राक्षसोंको मारने लगे ॥ १५ ॥
ते वध्यमाना हरिभिर्बलिभिर्जितकाशिभिः ।
राक्षसा भग्नसंकल्पा लङ्कामभ्यपतन् भयात् ॥ १६ ॥
विजयसे उल्लसित हुए बलवान् वानर वीरोंकी मार खाकर राक्षस हताश हो गये और भयके मारे लंकाकी ओर भाग चले ॥ १६ ॥
तेऽभिपत्य पुरं भग्ना हतशेषा निशाचराः ।
सर्वं राज्ञे यथावृत्तं रावणाय न्यवेदयन् ॥ १७ ॥
मरनेसे बचे हुए उन निशाचरोंने भग्नमनोरथ होकर लङ्कापुरीमें प्रवेश किया तथा रावणके समीप जाकर युद्धका सब समाचार ज्यों--का- त्यों निवेदन कर दिया ॥ १७ ॥
श्रुत्वा तु रावणस्तेभ्यः प्रहस्तं निहतं युधि ।
धूम्राक्षं च महेष्वासं ससैन्यं वानरर्षभैः ॥ १८ ॥
सुदीर्घमिव निःश्वस्य समुत्पत्य वरासनात् ।
उवाच कुम्भकर्णस्य कर्मकालोऽयमागतः ॥ १ ९ ॥
उनके मुखसे श्रेष्ठ वानर वीरोंद्वारा युद्धमें सेनासहित प्रहस्त तथा महाधनुर्धर धूम्राक्षके मारे जानेका वृत्तान्त सुनकर रावण बड़ी देरतक शोकभरे उच्छ्वास लेता रहा । फिर वह अपने श्रेष्ठ सिंहासनसे उछलकर खड़ा हो गया और बोला- ' अब यह कुम्भकर्णके पराक्रम दिखलानेका समय आ गया है ' ॥ १८-१९ ॥
इत्येवमुक्त्वा विविधैर्वादित्रैः सुमहास्वनैः ।
शयानमतिनिद्रालुं कुम्भकर्णमबोधयत् ॥ २० ॥
ऐसा कहकर रावणने अत्यन्त उच्च स्वरसे बजनेवाले भाँति- भाँतिके बाजे बजवाकर अधिक नींद लेनेवाले सोये हुए कुम्भकर्णको जगाया ॥ २० ॥
प्रबोध्य महता चैनं यत्नेनागतसाध्वसः ।
स्वस्थमासीनमव्यग्रं विनिद्रं राक्षसाधिपः ॥ २१ ॥
ततोऽब्रवीद् दशग्रीवः कुम्भकर्णं महाबलम् ।
धन्योऽसि यस्य ते निद्रा कुम्भकर्णेयमीदृशी ॥ २२ ॥
महान् प्रयत्नद्वारा उसे जगाकर भयभीत हुए राक्षसराज रावणने, जब महाबली कुम्भकर्ण स्वस्थ, शान्त तथा निद्रारहित होकर बैठ गया, तब उससे इस प्रकार कहा -'भैया कुम्भकर्ण! तुम धन्य हो जिसे ऐसी नींद आती है ॥ २१-२२ ॥
य इदं दारुणाकारं न जानीषे महाभयम् ।
एष तीर्त्वार्णवं रामः सेतुना हरिभिः सह ॥ २३ ॥
अवमन्येह नः सर्वान् करोति कदनं महत् ।
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मया त्वपहृता भार्या सीता नामास्य जानकी ॥ २४ ॥
‘ हमलोगोंपर जो यह अत्यन्त दारुण एवं महान् भय उपस्थित हुआ है, इसका तुम्हें पता ही नहीं है । यह राम सेतुद्वारा समुद्रको लाँघकर हमलोगोंकी अवहेलना करके वानरोंके साथ यहाँ आ पहुँचा है और राक्षसोंका महासंहार कर रहा है। मैंने इसकी पत्नी जनककुमारी सीताका अपहरण किया था ॥ २३-२४ ॥
तां नेतुं स इहायातो बद्ध्वा सेतुं महार्णवे ।
तेन चैव प्रहस्तादिर्महान् नः स्वजनो हतः ॥ २५ ॥
‘ उसे वापस लेनेके लिये ही राम महासागरपर पुल बाँधकर यहाँ आया है । उसने हमारे प्रहस्त आदि प्रमुख स्वजनोंको मार डाला है ॥ २५ ॥
तस्य नान्यो निहन्तास्ति त्वामृते शत्रुकर्शन ।
स दंशितोऽभिनिर्याय त्वमद्य बलिनां वर ॥ २६ ॥
रामादीन् समरे सर्वाञ्चहि शत्रूनरिंदम । ' शत्रुसूदन! तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है, जो उसको मार सके । बलवानोंमें श्रेष्ठ वीर! तुम शत्रुओंका दमन करनेवाले हो । आज कवच धारण करके निकलो तथा राम आदि समस्त शत्रुओंका समरभूमिमें संहार कर डालो ॥ २६ ॥
दूषणावरजौ चैव वज्रवेगप्रमाथिनौ ॥ २७ ॥
तौ त्वां बलेन महता सहितावनुयास्यतः । ‘ दूषणके छोटे भाई वज्रवेग और प्रमाथी अपनी विशाल सेनाके साथ तुम्हारा अनुसरण करेंगे' ॥ २७३ ॥
इत्युक्त्वा राक्षसपतिः कुम्भकर्णं तरस्विनम् ।
संदिदेशेतिकर्तव्यं वज्रवेगप्रमाथिनौ ॥ २८ ॥
वेगशाली वीर कुम्भकर्णसे ऐसा कहकर राक्षसराज रावणने वज्रवेग और प्रमाथीको, युद्धमें क्या- क्या करना है, इन सब बातोंको समझाया और उनके पालनका आदेश दिया ॥ २८ ॥
तथेत्युक्त्वा तु तौ वीरौ रावणं दूषणानुजौ ।
कुम्भकर्णं पुरस्कृत्य तूर्णं निर्ययतुः पुरात् ॥ २ ९ ॥
दूषणके वे दोनों वीर भाई रावणसे ' तथास्तु' कहकर कुम्भकर्णको आगे करके तुरंत नगरसे बाहर निकले ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि कुम्भकर्णनिर्गमने षडशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें कुम्भकर्णका युद्धके लिये प्रस्थानविषयक दो सौछियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८६ ॥
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सप्ताशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः कुम्भकर्ण, वज्रवेग और प्रमाथीका वध मार्कण्डेय उवाच
ततो निर्याय स्वपुरात् कुम्भकर्णः सहानुगः ।
अपश्यत् कपिसैन्यं तज्जितकाश्यग्रतः स्थितम् ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं -युधिष्ठिर! सेवकों सहित अपने नगरसे निकलकर कुम्भकर्णने अपने सामने खड़ी हुई वानरसेनाको देखा, जो विजयके उल्लाससे सुशोभित हो रही थी ॥ १ ॥
स वीक्षमाणस्तत् सैन्यं रामदर्शनकाङ्क्षया ।
अपश्यच्चापि सौमित्रिं धनुष्पाणिं व्यवस्थितम् ॥ २ ॥
फिर जब उसने भगवान् श्रीरामके दर्शनकी इच्छासे उस सेनामें इधर - उधर दृष्टि डाली, तब उसे हाथमें धनुष लिये सुमित्रानन्दन लक्ष्मण खड़े दिखायी दिये ॥ २ ॥
तमभ्येत्याशु हरयः परिवव्रुः समन्ततः ।
अभ्यघ्नंश्च महाकायैर्बहुभिर्जगतीरुहैः ॥ ३ ॥
इतनेमें ही वानरोंने चारों ओरसे आकर कुम्भकर्णको शीघ्रतापूर्वक घेर लिया और बहुत - से बड़े - बड़े पेड़ उखाड़कर उन्हींके द्वारा उसपर प्रहार करने लगे ॥ ३ ॥
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करजैरतुदंश्चान्ये विहाय भयमुत्तमम् ।
बहुधा युध्यमानास्ते युद्धमार्गेः प्लवङ्गमाः ॥ ४ ॥
नानाप्रहरणैर्भीमै राक्षसेन्द्रमताडयन् । कुछ वानरोंने कुम्भकर्णसे प्राप्त होनेवाले महान् भयकी परवा न करके उसको नखोंसे पीड़ा देनी प्रारम्भ की । युद्धकी विभिन्न प्रणालियोंद्वारा अनेक प्रकारसे युद्ध करते हुए वानरसैनिक भाँति - भाँतिके भयंकर आयुधोंद्वारा राक्षसराज कुम्भकर्णको चोट पहुँचाने लगे ॥ स ताड्यमानः प्रहसन् भक्षयामास वानरान् ॥ ५ ॥
बलं चण्डबलाख्यं च वज्रबाहुं च बानरम् ।
वानरोंके प्रहार करनेपर वह जोर- जोर से हँसने और उन्हें पकड़ - पकड़कर खाने लगा ।
देखते - देखते बल, चण्डबल और वज्रबाहु नामक वानर उसके मुखके ग्रास बन गये ॥ ५३
|| तद् दृष्ट्वा व्यथनं कर्म कुम्भकर्णस्य रक्षसः ॥ ६ ॥
उदक्रोशन् परित्रस्तास्तारप्रभृतयस्तदा ।
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राक्षस कुम्भकर्णका यह दुःखदायी कर्म देखकर तार आदि वानर भयभीत हो जोर-जोरसे चीत्कार करने लगे ॥ तानुच्चैः क्रोशतः सैन्याञ्छ्रुत्वा स हरियूथपान् ॥ ७ ॥
अभिदुद्राव सुग्रीवः कुम्भकर्णमपेतभीः । अपने सैनिकों तथा वानरयूथपतियोंका वह उच्च स्वरसे किया जाता हुआ चीत्कार सुनकर सुग्रीव निर्भय हो कुम्भकर्णकी ओर दौड़े ॥ ७ ॥
ततो निपत्य वेगेन कुम्भकर्णं महामनाः ॥ ८ ॥
शालेन जघ्निवान् मूर्ध्नि बलेन कपिकुञ्जरः । महामना कपिश्रेष्ठ सुग्रीवने बड़े वेगसे उछलकर एक शालवृक्षके द्वारा कुम्भकर्णके मस्तकपर बलपूर्वक प्रहार किया ॥ ८३ ॥
स महात्मा महावेगः कुम्भकर्णस्य मूर्धनि ॥ ९ ॥
बिभेद शालं सुग्रीवो न चैवाव्यथयत् कपिः । कपिश्रेष्ठ सुग्रीवका हृदय महान् था। उनका वेग भी महान् था । उन्होंने कुम्भकर्णके मस्तकपर पटककर उस शालवृक्षको दो टूक कर डाला; तथापि वे उसे व्यथा न पहुँचा सके ॥ ९ ३ ॥ ततो विनद्य सहसा शालस्पर्शविबोधितः ॥ १० ॥
दोर्भ्यामादाय सुग्रीवं कुम्भकर्णोऽहरद् बलात् । शालके स्पर्शसे कुम्भकर्ण कुछ सावधान हो गया । उसने सहसा गर्जना करके सुग्रीवको दोनों हाथोंसे बलपूर्वक धर दबाया और अपने साथ ले लिया ॥ १०३ ॥
ह्रियमाणं तु सुग्रीवं कुम्भकर्णेन रक्षसा ॥ ११ ॥
अवेक्ष्याभ्यद्रवद् वीरः सौमित्रिर्मित्रनन्दनः । राक्षस कुम्भकर्ण द्वारा सुग्रीवका अपहरण होता देख मित्रोंका आनन्द बढ़ानेवाले सुमित्राकुमार वीरवर लक्ष्मण उसकी ओर दौड़े ॥ ११३ ॥
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सोऽभिपत्य महावेगं रुक्मपुङ्खं महाशरम् ॥ १२ ॥
प्राहिणोत् कुम्भकर्णाय लक्ष्मणः परवीरहा । शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने कुम्भकर्णके सामने जाकर उसको लक्ष्य करके सुवर्णमय पंखसे सुशोभित एक महावेगशाली महान् बाण चलाया ॥ १२३ ॥
स तस्य देहावरणं भित्त्वा देहं च सायकः ॥ १३ ॥
जगाम दारयन् भूमिं रुधिरेण समुक्षितः । वह बाण उसके कवचको काटकर शरीरको छेदता हुआ रक्तरंजित हो धरतीको चीरकर उसमें समा गया' ॥ १३३ ॥
तथा स भिन्नहृदयः समुत्सृज्य कपीश्वरम् ॥ १४ ॥
( वेगेन महताऽऽविष्टस्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् । )
कुम्भकर्णो महेष्वासः प्रगृहीतशिलायुधः ।
अभिदुद्राव सौमित्रिमुद्यम्य महतीं शिलाम् ॥ १५ ॥
इस प्रकार छाती छिद जानेके कारण महाधनुर्धर कुम्भकर्णने वानरराज सुग्रीवको तो छोड़ दिया और बड़े वेगसे लक्ष्मणकी ओर घूमकर कहा – ' अरे! खड़ा रह, खड़ा रह ’ । तत्पश्चात् एक बहुत बड़ी शिला हाथमें लेकर वह सुमित्रानन्दन लक्ष्मणकी ओर दौड़ा ॥ १४-१५ ॥ तस्याभिपततस्तूर्णं क्षुराभ्यामुच्छ्रितौ करौ ।
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चिच्छेद निशिताग्राभ्यां स बभूव चतुर्भुजः ॥ १६ ॥
तब लक्ष्मणने भी बड़ी शीघ्रताके साथ तीखी धारवाले दो क्षुर नामक बाण मारकर अपनी ओर आते हुए कुम्भकर्णकी ऊपर उठी हुई दोनों भुजाओंको काट डाला । उनके कटते ही वह चार भुजाओंसे युक्त हो गया ॥ १६ ॥
तानप्यस्य भुजान् सर्वान् प्रगृहीतशिलायुधान् ।
क्षुरैश्चिच्छेद लघ्वस्त्रं सौमित्रिः प्रतिदर्शयन् ॥ १७ ॥
उन चारों भुजाओंमें भी उसने आयुधके रूपमें बड़ी- बड़ी चट्टानें उठा लीं । यह देख सुमित्राकुमारने अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए फिरसे पूर्वोक्त बाण मारकर उसकी उन चारों भुजाओंको भी काट दिया ॥ १७ ॥
स बभूवातिकायश्च बहुपादशिरोभुजः ।
तं ब्रह्मास्त्रेण सौमित्रिर्ददाराद्रिचयोपमम् ॥ १८ ॥
अब उसने अपना शरीर बहुत बड़ा बना लिया । उसके अनेक पैर, अनेक सिर और अनेक भुजाएँ हो गयीं । यह देख लक्ष्मणने ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करके पर्वत- समूहके समान विशाल शरीरवाले उस राक्षसको चीर डाला ॥
स पपात महावीर्यो दिव्यास्त्राभिहतो रणे ।
महाशनिविनिर्दग्धः पादपोऽङ्कुरवानिव ॥ १ ९ ॥
जैसे महान् भयंकर बिजलीके आघातसे शाखाओं और पत्तोंसहित वृक्ष दग्ध हो जाता है, उसी प्रकार लक्ष्मणके दिव्यास्त्रसे आहत होकर महापराक्रमी कुम्भकर्ण रणभूमिमें गिर पड़ा ॥ १ ९ ॥
तं दृष्ट्वा वृत्रसंकाशं कुम्भकर्णं तरस्विनम् ।
गतासुं पतितं भूमौ राक्षसाः प्राद्रवन् भयात् ॥ २० ॥
वृत्रासुरके समान वेगशाली कुम्भकर्णको प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर पड़ा देख सब राक्षस भयके मारे भाग चले ॥ २० ॥
तथा तान् द्रवतो योधान् दृष्ट्वा तौ दूषणानुजौ ।
अवस्थाप्याथ सौमित्रिं संक्रुद्धावभ्यधावताम् ॥ २१ ॥
अपने उन सैनिकोंको इस प्रकार भागते देख दूषणके दोनों भाई — वज्रवेग और प्रमाथीने किसी प्रकार उन्हें रोककर खड़ा किया और अत्यन्त कुपित हो सुमित्राकुमार लक्ष्मणपर धावा बोल दिया ॥ २१ ॥
तावाद्रवन्तौ संक्रुद्धौ वज्रवेगप्रमाथिनौ ।
अभिजग्राह सौमित्रिर्विनद्योभौ पतत्त्रिभिः ॥ २२ ॥
क्रोधमें भरे हुए वज्रवेग और प्रमाथीको अपनी ओर आते देख लक्ष्मणने बड़े जोरसे सिंहनाद किया और उन दोनोंकी गतिको बाणोंद्वारा रोक दिया ॥ २२ ॥
ततः सुतुमुलं युद्धमभवल्लोमहर्षणम् ।
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दूषणानुजयोः पार्थ लक्ष्मणस्य च धीमतः ॥ २३ ॥
युधिष्ठिर! फिर तो दूषणके भाइयों तथा बुद्धिमान् लक्ष्मणमें ऐसा भयंकर युद्ध हुआ, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ॥ २३ ॥
महता शरवर्षेण राक्षसौ सोऽभ्यवर्षत ।
तौ चापि वीरौ संक्रुद्धावुभौ तं समवर्षताम् ॥ २४ ॥
लक्ष्मण उन दोनों राक्षसोंपर बाणोंकी बड़ी भारी वर्षा कर रहे थे और वे दोनों वीर राक्षस भी अत्यन्त कुपित होकर लक्ष्मणपर बाणोंकी बौछार करते थे ॥ २४ ॥
मुहूर्तमेवमभवद् वज्रवेगप्रमाथिनोः ।
सौमित्रेश्च महाबाहोः सम्प्रहारः सुदारुणः ॥ २५ ॥
इस प्रकार वज्रवेग, प्रमाथी और महाबाहु लक्ष्मणका वह भयंकर संग्राम दो घड़ीतक अबाधगतिसे चलता रहा ॥ २५ ॥
अथाद्रिशृङ्गमादाय हनुमान् मारुतात्मजः ।
अभिद्रुत्याददे प्राणान् वज्रवेगस्य रक्षसः ॥ २६ ॥
इसी बीचमें वायुनन्दन हनुमान्जीने पर्वतका शिखर हाथमें लेकर वज्रवेग नामक राक्षसके ऊपर आक्रमण किया और उसके प्राण ले लिये ॥ २६ ॥
नीलश्च महता ग्राव्णा दूषणावरजं हरिः ।
प्रमाथिनमभिद्रुत्य प्रममाथ महाबलः ॥ २७ ॥
महाबली नील नामक वानरने एक विशाल चट्टान लेकर दूषणके छोटे भाई प्रमाथीपर हमला किया और उसका कचूमर निकाल दिया ॥ २७ ॥
ततः प्रावर्तत पुनः संग्रामः कटुकोदयः ।
रामरावणसैन्यानामन्योन्यमभिधावताम् ॥ २८ ॥
तदनन्तर श्रीराम और रावणकी सेनाओंमें परस्पर आक्रमणपूर्वक भीषण संग्राम आरम्भ हो गया जो कटु परिणामका जनक था ॥ २८ ॥
शतशो नैरृतान् वन्या जघ्नुर्वन्यांश्च नैरृताः ।
नैर्ऋतास्तत्र वध्यन्ते प्रायेण न तु वानराः ॥ २ ९ ॥
वनवासी वानरोंने सैकड़ों राक्षसोंको तथा राक्षसोंने वानरोंको घायल किया । उस युद्धमें अधिकांश राक्षस ही मारे जा रहे थे, वानर नहीं ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि कुम्भकर्णादिवधे सप्ताशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २८७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें कुम्भकर्णआदिका वधविषयक दो सौ सत्तासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८७ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल २ ९ ३ श्लोक हैं )